खून चूस लेते हैं अमर उजाला वाले

अजय कृष्ण त्रिपाठी: कोल्हू के बैल से भी बदतर अमर उजाला कर्मी : कहते हैं कि कोल्हू का बैल दिनभर कोल्हू के चक्कर लगाता रहता है थककर चूर होने के बावजूद उफ् तक करने की गुंजाइश कोल्हू के बैलों में नहीं देखी गयी लेकिन उनके परिश्रम को संवेदनशील प्राणी महसूस कर लेता है। लगभग यही स्थिति अमर उजाला कर्मियों की भी है हालांकि इसी से मिलती जुलती स्थितियां बाकी सभी अखबारों में काम करने वालों की भी है। लेकिन अमर उजाला पसीना बहवाने में कोई कसर नहीं छोड़ता।