टाइम्स आफ इंडिया अखबार प्रकाशित करने वाली कंपनी बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड (बीसीसीएल) की तरफ से एक नया प्रयोग किया जाने वाला है। टीओआई का एक वीकली प्रीमियम एडिशन निकालने पर तेजी से काम चल रहा है। टाइम्स आफ इंडिया के इस साप्ताहिक एलीट अखबार का दाम छह रुपये होगा। कुल 32 पन्ने होंगे। यह प्रत्येक शनिवार को पाठकों तक पहुंचेगा। इस अखबार का नाम क्या होगा, यह तय नहीं हो पाया है लेकिन कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि ‘टीओआई प्रामियम एडिशन’, ‘टाओआई थिंक’, ‘टीओआई एलीट’, ‘टीओआई क्रेस्ट’ जैसे कई नामों पर विचार चल रहा है। टाइम्स आफ इंडिया प्रबंधन ने अपने पाठकों से टीओआई के प्रीमियम एडिशन के बारे में बताना शुरू कर दिया है।
इसके लिए ब्राशर का सहारा लिया गया है। पाठकों तक पहुंचाए जा रहे इस ब्राशर में प्रीमियम एडिशन के बारे में कई तरह की जानकारियां दी गई हैं। पाठकों से इस प्रीमियम वीकली अखबार को अग्रिम रूप से बुक करने का अनुरोध भी किया गया है। इस ब्राशर में ‘फुड फार थाट’, ‘अ डाइट फार द माइंड’, ‘न्यूज इज अ लिटिल लाइक मैथ’… जैसे जुमले उछालते हुए टीओआई प्रबंधन ने अपने पाठकों को बताया है कि रोजाना के रुटीन राजनीतिक, क्राइम आदि की खबरों से जब दिमाग थक जाता है तो एक समझदार पाठक को विचारवान अखबार चाहिए। टीओआई प्रामियम इसीलिए हैं। इस वीकली अखबार की लांचिंग का डेट तय नहीं किया गया है लेकिन लांचिंग से पहले मार्केट का कई तरह से टेस्ट किया जा रहा है। पाठकों की मनःस्थिति और मांग, अभिरुचि, बाजार की स्थिति, बिक्री का तरीका, सरकुलेशन की स्थिति आदि का विश्लेषण कर इसे पूरी तरह जमीनी व प्रामाणिक बनाया जा रहा है ताकि जब यह नया प्रोडक्ट बाजार में आए तो इसे किसी तरह का झटका न लगे।
टाइम्स से जुड़े सूत्रों का कहना है कि मार्केट के रिस्पांस के आधार पर इस प्रीमियम वीकली न्यूजपेपर का भविष्य तय किया जाएगा। अगर मार्केट ने इसे न स्वीकारा तो इसे प्रिंट करते रहने का कोई मतलब नहीं है। ज्ञात हो कि बीसीसीएल पहले से ही प्रत्येक शनिवार को ‘द इकोनामिक टाइम्स’ को 10 रुपये में बेच रहा है। इकोनामिक टाइम्स का वीकेंड प्रीमियम एडिशन का प्रयोग फिलहाल सफल माना जा रहा है। बाजार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि ज्यादा से ज्यादा कवर प्राइस रखने के इस नए प्रयोग में टाइम्स ग्रुप सफल होता है तो दूसरे मीडिया हाउस भी इसका अनुकरण कर सकते हैं। अभी तक लड़ाई कम से कम कवर प्राइस रख कर लड़ी जाती है लेकिन ऐसी स्थिति में रेवेन्यू के लिए मीडिया हाउसों का बाजार व विज्ञापनदाताओं पर निर्भरता ज्यादा बढ़ जाती है। आर्थिक मंदी को देखते हुए व विज्ञापन से आने वाले रेवेन्यू में कमी के कारण मीडिया हाउस ऊंचे कवर प्राइस का प्रयोग करने की राह पर चल पड़े हैं।











