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क्षमा का हकदार है उत्सव

[caption id="attachment_16889" align="alignleft"]उत्तमा दीक्षितउत्तमा दीक्षित[/caption]बीएचयू का गोल्ड मेडलिस्ट कुछ दिनों से न्याय-अन्याय की बातें ज्यादा करने लगा था :  उत्सव का नाम पहले भी सुना है मैंने। टेनिस खिलाड़ी रुचिका गेहरोत्रा को आत्महत्या के लिए मजबूर कर देने वाले हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एसपीएस राठौड़ पर एक छोटे से चाकू से हमला करने वाला उत्सव ऐसा क्यों कर बैठा, कोई नहीं समझ पा रहा। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की फाइन आर्ट्स फैकल्टी में बीएफए का यह गोल्ड मेडलिस्ट सबको याद है। गोल्ड मेडलिस्ट है, तो बताने की जरूरत नहीं कि एक्स्ट्रा आर्डिनरी परफॉर्मेंस की वजह से उसे सब जानते थे। उसके साथियों को याद है कि उत्सव में जबर्दस्त कांफिडेंस था। वह खुलकर कहता, मेरा नेशनल स्कूल आफ डिजाइनिंग में चयन होगा। ऐसा हुआ भी। यह इंस्टीट्यूट कला के छात्रों का एक सपना होता है, खासकर एप्लाइड आर्ट स्टूडेंट्स के लिए। उत्सव ने वहां भी रंग जमा लिया। इसका उदाहरण प्रतिष्ठित अवार्ड के लिए उसकी शार्ट फिल्म ‘चाय ब्रेक’ का चयन होना है।

उत्तमा दीक्षितबीएचयू का गोल्ड मेडलिस्ट कुछ दिनों से न्याय-अन्याय की बातें ज्यादा करने लगा था :  उत्सव का नाम पहले भी सुना है मैंने। टेनिस खिलाड़ी रुचिका गेहरोत्रा को आत्महत्या के लिए मजबूर कर देने वाले हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एसपीएस राठौड़ पर एक छोटे से चाकू से हमला करने वाला उत्सव ऐसा क्यों कर बैठा, कोई नहीं समझ पा रहा। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की फाइन आर्ट्स फैकल्टी में बीएफए का यह गोल्ड मेडलिस्ट सबको याद है। गोल्ड मेडलिस्ट है, तो बताने की जरूरत नहीं कि एक्स्ट्रा आर्डिनरी परफॉर्मेंस की वजह से उसे सब जानते थे। उसके साथियों को याद है कि उत्सव में जबर्दस्त कांफिडेंस था। वह खुलकर कहता, मेरा नेशनल स्कूल आफ डिजाइनिंग में चयन होगा। ऐसा हुआ भी। यह इंस्टीट्यूट कला के छात्रों का एक सपना होता है, खासकर एप्लाइड आर्ट स्टूडेंट्स के लिए। उत्सव ने वहां भी रंग जमा लिया। इसका उदाहरण प्रतिष्ठित अवार्ड के लिए उसकी शार्ट फिल्म ‘चाय ब्रेक’ का चयन होना है।

एक मेधावी छात्र का इस तरह की वारदात कर बैठना चिंता पैदा करता है। मनो चिकित्सक मां प्रोफेसर इंदिरा शर्मा बताती हैं कि वह डिप्रेशन का शिकार था और अहमदाबाद में चार माह से उसका इलाज चल रहा था। एसोसिएशन आफ साइकियाट्रिस्ट इन यूएस की एक रिपोर्ट बताती है कि कलाकारों में डिप्रेशन के मामलों की संख्या ज्यादा होती है, विशेषकर फाइन आर्ट्स से जुड़े लोगों में। यह भी सच है कि कलाकार अधिक संवेदनशील भी होते हैं। उत्सव भी कलाकार है। पिता प्रो. एसके शर्मा बताते हैं कि वह कुछ दिन से न्याय-अन्याय की ज्यादा बातें करने लगा था। हम भी उद्वेलित होते हैं और रुचिका प्रकरण तो है ही ऐसा।

पुलिस का एक अफसर उभरती हुई टेनिस खिलाड़ी को विदेश जाने से रोक लेता है। अभद्रता करता है और शिकायत न की जाए, इसके लिए परिवार पर जमकर दबाव बनाया जाता है। इससे ज्यादा बेशर्मी क्या होगी कि मुंह न खोलने देने के लिए भाई की गिरफ्तारी कर ली जाती है। आरोप लगाया जाता है कार चोरी का। यही नहीं, फिर हरियाणा भर में कार चोरी के मामलों में उसका नाम जोड़ा जाने लगता है। चंडीगढ़ के स्कूल से सिर्फ फीस लेट हो जाने पर रुचिका का नाम काट दिया जाता है। पिता और बाकी परिवार अघोषित नजरबंदी का शिकार बनता है और नतीजा, अभद्रता की शिकार चौदह साल की रुचिका आत्महत्या कर लेती है। चंद लाइनों में मैंने जो कहानी कहने की कोशिश की है, वास्तव में वह मन में आक्रोश की हजारों लाइनें पैदा कर देती है। एक अफसर और उसके सामने पूरे प्रदेश के पुलिस तंत्र का नतमस्तक हो जाना एवं नेताओं के साथ रिश्तों की बदौलत साथ ही उसे प्रोन्नति मिलते जाना, अकल्पनीय तो नहीं लेकिन शर्मनाक है।

गण के इस तंत्र में गण ही कहीं गौण-सा है और उसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं। और तो और… पीड़ित परिवार को किसी तरह न्याय की उम्मीद बंधती है तो उसमें भी रोड़े डाल दिए जाते हैं। राठौड़ सजा सुनाए जाने के बाद भी आजाद है तो क्यों कोई उत्सव का आक्रोश न भड़के। बकौल प्रो. इंदिरा, उनके यहां कोई भी रुचिका के परिवार को नहीं जानता। ऐसे में उत्सव में जो आक्रोश पैदा हुआ, वह अन्याय की खबरें सुनकर हुआ। वह चंडीगढ़ में था, राठौड़ की पेशी और रुचिका कांड की खबरें वहां हवा में घुली हुई हैं तो वह कैसे बचता। जब पूरा देश प्रतिक्रिया में है तो चंडीगढ़ में तो यह स्थिति और भी तीव्र हो जाती है। जब आम मुजरिम को थर्ड डिग्री से नवाजने वाली पुलिस राठौड़ को किसी वीआईपी की तरह ट्रीट करे, जैसे वह अब भी उनका अफसर हो तो हिंदुस्तान में अपराधी के हिस्से आने वाली यह थर्ड डिग्री देने के लिए कोई उत्सव तो आएगा ही। वैसे, शुक्र अदा करने की बात यह है कि राठौड़ को सजा देने की तैयारी शुरू हुई है। उसकी पेंशन काटी जा रही है, हरियाणा के मुख्यमंत्री सख्त हैं। उत्सव उन भावनाओं का प्रतीक है जो रुचिका प्रकरण में हर आम भारतीय के मन में घुमड़ रही हैं लेकिन बाहर नहीं आ पा रहीं। उत्सव के साथ शायद कानून नहीं होगा लेकिन भीड़ है तमाम भारतवासियों की। एक मेधावी छात्र के एकाएक अपराधी बन जाने की वजह जो है, उससे तो वह कानून से भी क्षमा का हकदार है।

लेखिका डा. उत्तमा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पेंटिंग की सीनियर लेक्चरर हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लिया गया है.

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0 Comments

  1. गुरमीत

    February 9, 2010 at 7:56 am

    एक मेधावी छात्र होते हुए उत्सव ने जिस तरह अपने भविष्य को दांव पर लगाया है वह निश्चित ही हमारे समाज व वयवस्था पर कई सवालों को खड़ा करता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अदालत उसके साथ सहानुभूति दिखाते हुए उसे सुधरने का मौका भी देगी। लेकिन करूणा कई बार न्याय के निर्वांह में बाधा भी बन जाती है,रामचंद्र शुक्ल की इस पंक्ति को भी ध्यान में रखना होगा। कई समाज में सुधार के लिए अब उत्सव के रास्ते पर चलने का एक विकल्प ही बचा है? सबसे बड़ा सवाल यह मुंह बाए खड़ा है

  2. mukesh pandey

    February 9, 2010 at 8:30 am

    utma ji hum bhi sahmat hain apke bicharon se/ pr kisi ka bhi kanoon hath men lana thik nhi, chahe rathaur ho ya utsaw-mukesh

  3. Savi

    February 9, 2010 at 9:27 am

    नन्यालय जितनी देर लगाये गी रुचिका को इन्साफ देने में उतने ही उत्सव जैसे युवकों को आमंत्रित करेगी अपने भविष्य के साथ खिलवाड़ करने के लिए !

  4. Sushil Rana

    February 9, 2010 at 9:41 am

    aaj har sahar, nagar, kasbe mein aap dekh sakte hai ki massom aadmi, kamobesh aisi hi peeda jhel raha hai aur use nayaay aur kanooni karyavahi ke naam paar idhar se udhar tarkaya jaata, ya aur pareshan kiya jaata hai.
    Jab kanoon majaak ban jaaye to, abhi ek do log mukhar huai hain, aage aur Utsav paida honge. Aur main aise sabhi Utsav ka har tarike se samarthan karta hoon.
    Sushil Rana

  5. राम मुरारी

    February 9, 2010 at 1:37 pm

    जब सितम की इंतिहां होती है, तो आक्रोश का लावा इसी तरह फूटता है… तकरीबन 60 साल के भारतीय गणतंत्र में तंत्र की तानाशाही में गण दबा, कुचला और पिसा ही गया है… उत्सव का हमला राठौर के खिलाफ नहीं, बल्कि इस अमानवीय और तानाशाह व्यवस्था के प्रति है, जो कानून के मनमाने इस्तेमाल की छूट देती है… बहरहाल उत्सव के इस रवैये से सहमत न होने के बावजूद उससे सहानुभूति नहीं, बल्कि फख्र है उसपर… आखिर कोई तो है, जो अन्याय के खिलाफ चुप नहीं बैठा… इसकी परवाह किए बगैर की जिसके लिए उसने ये कदम उठाया है, वो उसकी कुछ नहीं लगती… और न ही ये सोचकर कि इसके बाद उसका क्या होगा… अपने-पराए में लोगों को बांटकर सहानुभूति के चंद जुमले उछालकर घरों में बैठने के लिए हम लोग तो हैं हीं… यकीनन उत्सव हमसे अलग है… आखिर ऐसे ही तो नहीं कहा जा रहा कि उत्सव की दिमागी हालत सही नहीं है… सही होती तो वो भी हमारी तरह चुप ही नहीं रहता… क्यों..?

  6. ambuj

    February 9, 2010 at 3:11 pm

    i dont like to comment over utsav’s act. whatever he has done may be good but it is high time to think why such students goes in to depression.

    proper treatment for such talent should be given

  7. rajendrakumar

    February 9, 2010 at 6:23 pm

    Utsav ke saath narmi bhale hi na dikhyan magar kanoon ko yeh to dekhna hi hoga ki ek medhavi ne is tarah ka kaam kyon kiya. Rathoau jaise logon ka aajaad ghoomna sabhya samaaj per sawaliya nishan hi. desh ke karndharon ko jaagna hoga. ruchika hamari apni thi is dard ko samajhna hoga.

  8. Sonu kumar

    February 9, 2010 at 10:44 pm

    jab logo ke sabra ke bandh tut jate hai to we kisi b had tak chale jate hai. Utsav to ek udaharan ban kar samne aaya hai waise logo ke liye jinke man me samaj me ho rahe anyay ko dekhkar gussa hai, agar har aadmi anyay ke khilaf is tarah se samne aa jaye to fir sarkar ke liye muskil ho jayegi. utsav ke is kadam ke bad b agar nyay prakriya me sudhar nahi hua to aane wala samay bahut hi bhayanak hone wala hai.

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