वर्तिका नंदा पत्रकार रही हैं. आजकल मीडिया समीक्षक बन गई हैं. टीवी जर्नलिज्म में जबरदस्त ग्रोथ पाने का जो रिकार्ड वर्तिका के नाम है, उसे तोड़ पाना हर किसी के बूते का काम नहीं. देखते ही देखते वे चैनल हेड तक बन गईं. पर जितनी जल्दी जितनी उचाइयों पर चढ़ीं, उतनी ही जल्दी वे मुख्यधारा से बाहर भी निकल गईं. सो, अब गोष्ठियों-सेमिनारों में भाग लेना, अखबारों में लिखना, पत्रकारिता के बच्चों को पढ़ाने जैसे तमाम काम करती हैं. वर्तिका नंदा के पति उदय सहाय आईपीएस हैं और दिल्ली सरकार के विज्ञापनों के विभाग के सर्वेसर्वा रहे हैं, इसलिए मीडिया कंपनियां इस दंपति को खूब पूछती-पूजती हैं. इन्हीं वर्तिका नंदा का लिखा एक आलेख आज दैनिक भास्कर, नेशनल एडिशन में प्रकाशित हुआ है.
वर्तिका ने अपने आलेख में टीवी न्यूज चैनलों के प्रबंधन को गरियाते हुए टीवी पत्रकारों की निरीहता का जिक्र किया है. प्राथमिक नजर में लेखन का उद्देश्य बड़ा साफ पाक दिख रहा है. पढ़कर लग रहा है कि वर्तिका ने आम पत्रकारों के हित में आवाज उठा दी है. पर यहां आम पत्रकारों में वे विभेद कर बैठी हैं. उन्हें केवल टीवी न्यूज चैनलों का पत्रकार ही निरीह पत्रकार नजर आया है. उन्हें टीवी न्यूज चैनलों का मैनेजमेंट ही घटिया मैनेजमेंट समझ में आया है. उनकी नजर प्रिंट से निकाले गए हजारों जर्नलिस्ट पर नहीं पड़ी. खासकर दैनिक भास्कर समूह में छंटनी के दिनों में जिस तरह से लोग यहां-वहां से भारी पैमाने पर हटाए गए, भगाए गए, वो वर्तिका को नहीं दिखाई पड़े.
वर्तिका नंदा की पीड़ा है कि निरीह पत्रकार अपनी आवाज खुलकर नहीं उठा पाते. वे आगे कहती हैं- हां, कुछ पत्रकारों ने अपनी वेबसाइट और ब्लॉग खोल डाले हैं, जिनके जरिए वे अपनी भड़ास निकाल कर संतुष्टि पा लेते हैं. अब वर्तिका नंदा को कौन समझाए कि उन्हें जिस तरह बड़े-बड़े अखबारों में अपने लेख छपवाने में जो संतुष्टि मिलती है, बड़े-बड़े चैनलों में बड़े-बड़े पद हासिल करने में उन्हें जो खुशी मिलती रही है, उसी तरह की खुशी वेब-ब्लाग वालों को अपने मन में आई सोच-सच को लिखने-कहने में मिलती है. संभव है, वेब-ब्लाग वालों का सच और आपका सच अलग-अलग हो लेकिन यह तो तय है कि वेब-ब्लाग वालों का कोई हिडेन एजेंडा नहीं है. पर आप जैसे बुद्धिजीवियों का घनघोर हिडेन एजेंडा होता है. और, इन्हीं हिडेन एजेंडाओं के तहत ही आप लोग देश के बुद्धिजीवी बन जाते हो. इतनी बात कोई मूर्ख भी समझ सकता है कि जर्नलिस्टों की बात उठाते हुए आप सिर्फ टीवी जर्नलिस्टों के मुद्दे पर ही लिख पाई हैं क्योंकि अगर आप प्रिंट को भी शामिल करतीं तो जिस बड़े अखबार ने आपका आर्टिकल छापा, उसे कतई नहीं पब्लिश करता. सो, आपको समझौता करना पड़ा और आपने सिर्फ टीवी के मैनेजमेंट को गरियाकर अपनी बहादुरी साबित कर दी.
यह हवा-हवाई व प्लांड बहादुरी जीना दिल्ली वालों का शगल है. जब तक वर्तिका नंदा टीवी न्यूज चैनलों में रहीं, उन्हें कभी किसी न्यूज चैनल के अंदर कोई गड़बड़ी नहीं दिखी. अगर गड़बड़ी दिखी भी होगी तो उन्होंने उसके खिलाफ कोई लड़ाई नहीं लड़ी. लेकिन अब जबकि वे किसी न्यूज चैनल में नहीं हैं, उन्हें हर जगह गड़बड़ी ही गड़बड़ी दिख रही है. मजेदार तो यह कि उन्हें खुद के अलावा कोई और इन मीडिया प्रबंधन के खिलाफ आवाज उठाता नहीं दिख रहा है. अरे भाई, आप ही बता दीजिए कि आपने कितनी बार धरना-प्रदर्शन न्यूज चैनलों के प्रबंधन के खिलाफ किया है. आपने न्यूज चैनलों के प्रबंधन के खिलाफ कब-कब आवाज उठाई है? आपने किस निरीह पत्रकार की लड़ाई लड़ दी है?
अगर आपमें इतना ही साहस था तो आपने अपने आलेख में छंटनी करने वाले न्यूज चैनलों का नाम व एक प्रमुख न्यूज चैनल का नाम क्यों नहीं दिया. आप अगर बहादुर हैं तो आपको नाम भी दे देना चाहिए था. आखिर आपको किससे डर लगता है? यह दोहरापन दिल्ली के ज्यादातर बुद्धिजीवी जीते हैं. खुद तो सोर्स-सिफारिश भिड़ाकर चैनल हेड का पद हासिल कर लेंगे और दूसरों को ज्ञान व सिद्धांत का भाषण देंगे. खुद जिन तीन तिकड़मों से पत्रकारिता की ऊंचाइयों पर ये हिप्पोक्रेट पहुंचते हैं, उसके बारे में तो ये खुलासा करने का साहस नहीं रखते. ऐसे में इन्हें दुनिया को आधा-अधूरा ज्ञान देने से बचना चाहिए.
अगर टीवी मीडिया में गड़बड़ियों पर आप लिखती हैं तो आपको चैनलों का नाम देना चाहिए था ताकि उन चैनलों के प्रबंधन के घटिया करतूत देश-दुनिया के लोग पूरी तरह जान पाते और उन चैनलों पर ऐसा गलत काम न करने का सामाजिक दबाव बन पाता. वेब-ब्लाग वाले जब लिखते हैं तो न्यूज चैनलों और अखबारों का नाम दे देते हैं, न्यूज चैनलों व अखबारों का नाम लिखकर उनकी कमियों का उल्लेख करते हैं फिर गरियाते हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि वे हिप्पोक्रेट नहीं होते और उन्हें किसी न्यूज चैनल व अखबार से कोई लाभ नहीं लेना होता. हो सकता है आपने नाम इसलिए न दिया हो क्योंकि क्या पता कल आपको उन्हीं चैनलों में से किसी से बड़े पद पर ज्वाइन करने का बुलावा आ जाए. अगर ऐसा है तो फिर आपकी क्रांतिकारिता विशुद्ध अवसरवादी है. अगर ऐसा नहीं है तो फिर वही सवाल है कि आपने टीवी जर्नलिस्टों के साथ प्रिंट जर्नलिस्टों का जिक्र क्यों नहीं किया? टीवी वालों का भी किया तो न्यूज चैनलों का नाम क्यों नहीं लिखा? इसका मतलब आपने सिर्फ लिखने के लिए लिख दिया क्योंकि लिखने-छपने से चर्चा में बने रहना आसान होता है और चर्चा में बने रहने का यह धंधा काफी पुराना है.
लेकिन सवाल है कि ऐसे बुद्धिजीवी लिखेंगे नहीं तो करेंगे क्या? इनके पास भी तो कोई काम नहीं है. ये दिल्ली में बैठे हैं. बड़े-बड़े लोगों से जान-पहचान है. उपर से मीडिया में बने रहना है. चर्चा में बने रहना है. सो, कुछ न कुछ तो करना-लिखना ही होगा. ऐसे में हवाई तलवारबाजी के जरिए खुद को क्रांतिकारी दिखाने में क्या हर्ज है? लीजिए, महान पत्रकार वर्तिका नंदा का दैनिक भास्कर में प्रकाशित यह सौ फीसदी एकांगी आलेख पढ़िए जिसमें से प्रिंट मीडिया पूरी तरह गायब है. -यशवंत, भड़ास4मीडिया
प्रबंधन की साजिशें और निरीह टीवी पत्रकार
-वर्तिका नंदा-
दिल्ली के दो न्यूज चैनलों में स्टाफ को पिछले तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिली है। देश का एक प्रमुख चैनल अभी कुछ महीने पहले ही करीब ढाई सौ लोगों की छंटनी कर चुका है। एक टीवी चैनल में जब ऊपरी पदों पर लोग बदले गए, तो उन्हें एक बंद कमरे में बुला कर साफ तौर पर बता दिया गया कि अगर टिकना है तो विज्ञापन लाइए। भारत के समाचार चैनलों में मैनेजमेंट का फंडा अब बदल रहा है। प्रबंधन की कोशिश यह रहती है कि असलियत सामने न आने पाए।
प्रबंधन एक और काम कर रहा है। जो लोग कायदे की बात ज्यादा करते हैं, उन्हें अतिव्यस्त कर दिया जाता है ताकि वे दोपहर में सोने के सिवा किसी और काम के न रहें। दूसरे, उन्हें कई बार प्रमोशन देकर दूसरों को परेशान करने के धंधे में लगा दिया जाता है। विभिन्न चैनलों के प्रबंधन ने बड़े सुनियोजित ढंग से एडिटोरियल और मैनेजमेंट के बीच एक खाई भी पैदा कर दी है। एडिटोरियल अब नहीं कह सकता कि कंटेंट इज दी किंग। उसके हाथ में अब कोई अधिकार नहीं है। वह हर चीज के लिए मुंह ताकता है और कठपुतली की तरह दी गई ताल पर नाचता है।
उधर टीवी पत्रकारों की हालत यह है कि भले ही वह किसी पर भी तीखी स्टोरी कर दें, लेकिन अपने मामले को न वे खुलकर कह सकते हैं और न ही कोई उन्हें छापता-दिखाता है। हां, कुछ पत्रकारों ने अपनी वेबसाइट और ब्लॉग खोल डाले हैं, जिनके जरिए वे अपनी भड़ास निकाल कर संतुष्टि पा लेते हैं। इसके बावजूद सच यही है कि खासकर टीवी का पत्रकार अब एक निरीह प्राणी बन कर रह गया है।
मैनेजमेंट का एक और फंडा हाल में मालूम हुआ। एक पत्रकार ने बताया कि मैनेजमेंट उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। इसके लिए उसने एक फॉर्मूला खुद बनाया है। जब भी उसे मैनेजमेंट की तरफ से खतरे की घंटी का आभास होता है, वह सीनियर मैनेजर के सबसे करीबी किसी बड़े आदमी पर खुफिया स्टोरी दे देता है। मैनेजर उसका प्रसारण नहीं चाहता, इसलिए उसे अक्सर खुश रखा जाता है। हालांकि सच्चाई यह है कि मैनेजमेंट की तिकड़मों के आगे यह एक खिलौने जैसा ही फॉर्मूला है।
चैनलों के प्रबंधन ने बड़े चालाकी से तमाम विभागों को आपस में भिड़ा दिया है। उलझाए रखने की यह कूटनीति बरसों पहले चाणक्य ने बनाई थी। मीडिया प्रबंधन ने टेढ़ा होना तो सीख लिया, लेकिन प्रबंधन भूल गया कि इस मंत्र को देने वाले कूटनीतिज्ञ का अंत कैसे हुआ था। चंद्रगुप्त मौर्य को षडयंत्रों से बचने के सूत्र बताते हुए चाणक्य का अंत खुद एक षडयंत्र के तहत ही हुआ था। पता नहीं, ऐसे प्रबंधकों का हश्र कैसा होगा। साभार : दैनिक भास्कर












yashwant second
March 22, 2010 at 8:15 am
ye to lekh poora TV PATRAKARON PAR HAI< itani see baat nahee samajhare.
bhadasi
March 22, 2010 at 8:32 am
es lekh mei tv news channeles ka naam nahi dena vartika ki chhoti soch ko dikhaata hai. ye sab hawa hawayi buddhijivi hain jinhe khul kayi media houses se laabh lena hota hai. koyi ense puchhe ye sahara samay kiski sifaarish aur kis shart pe pahuchi thi.
विवेक
March 22, 2010 at 8:43 am
समझ में आया, वर्तिका ने वेब-ब्लाग वालों की अपने लेख में थोड़ी उपेक्षा व उनके प्रति हिकारत का भाव क्या दर्शा दिया, आप वर्तिका जी का भांडा फोड़ने में, उनकी औकात बताने में लग गए. हालांकि ये अच्छा है कि सब एक दूसरे का भांडा फोड़ दें ताकि कोई दूध का धुला न बचे. वैसे कोई दूध का धुला है भी नहीं. अगर हैं तो वे बेचार वेब ब्लाग वाले ही हैं जो एक टाइम खाकर दोनों टाइम क्रांति के बारे में लिखते बात करते रहते हैं. वेब-ब्लाग जिंदाबाद.
machmohan
March 22, 2010 at 10:12 am
यशवंत भाई आपका लेख पड़ा आपकी जानकारी के लिए एक बात आपको बता देता हूं कि, वर्तिका नंदा के पति उदय सहाय अब ओसी यानी ओग्रेनाजिंग कमेटी में विग्यापन विभाग नहीं देख हे हैं। उन्हें बैकफुट पर वापस किसी दूसरे विभाग में भेज दिया गया है….. उनकी जगह प्रिया सिंह पॉल देख रही हैं वो जी न्यूजी की सीईओ भी रहे चुकी है….. उदय के भी दिन गए भइया
sanjay soni sr. sub editor peoples
March 22, 2010 at 1:38 pm
apke lekh patniya our dastavgh hote hain
Animesh
March 22, 2010 at 2:30 pm
Vyaktigat aarop, Channelon Par aarop, padhte padhte BP high ho jata hai. Hari Anant, Hari Katha Ananta! Sabko pata hai, chahey channel ho, ya akhbar, sabke sab bependi ke lotey hain. Satta ke saamne gidgidatey rahte hain. Gine-chuney hi akhbar they, jo Satta se do-do haath karte they. Aisey akhbar bhi ab khatm. Ab to bas un akhbaron me hone wale sex kaand ke serial Dayanand Pandey ki kripa se padh rahe hain. Aane wale saalon me koi aur Pandey channelon ke sex-kaandon par likhega. Hari Anant Hari Katha Ananta.
sanjay arora
March 22, 2010 at 3:32 pm
वर्तिका जी इंगली उठाने वाले लोगों की परवाह जीवन में ना किजिये …अपनि लेखनी की धार जारी रखिये ….इसी से समाज को कुछ नया मिलता है ..धन्यवाद
k
March 23, 2010 at 5:14 am
कृपया संशोधन कर लें या दोबारा पुष्टि कर लें। उपरोक्त नाम का कोई शख्स किसी चैनल का कभी भी प्रमुख नहीं रहा।
Rita Singh
March 23, 2010 at 12:13 pm
वर्तिका का पूरा लेख टीवी इंडस्ट्री की मौजूदा स्थिति पर था । अगर उन्होंने इसमें प्रिंट के पत्रकारों की हालत का जिक्र नहीं किया तो इसमें इतनी हाय तौबा करने जैसी क्या बात हो गई ? यह बात यशवंत भाई, आपके पूरे लेख को पढ़ने के बाद भी समझ नहीं आया । अलबत्ता इतना जरुर महसूस हुआ कि आप कहीं न कहीं किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं । आप चाहते तो वर्तिका के लेख को को उसमें उठाये गये सवाल को आगे बढ़ा सकते थे । इस लेख का इस तथ्य से क्या लेना देना कि वर्तिका के पति क्या करते हैं और क्या नहीं । वो जितनी तेजी से पत्रकारिता की बुलंदियों पर चढी उतनी हीं तेजी से मुख्य धारा से कट गई..यह आपने कैसे मान लिया । हर आदमी का अपना एक मकसद होता है , एक लक्ष्य होता है । अगर वर्तिका अपने लंबे अनुभव को अब पत्रकारिता के छात्रों को बांज रही है तो इसमें क्या गलत है । रही बात प्रिंट के पत्रकारों को लेकर तो उन्हें पढने वाले जानते हैं कि उन्होंने प्रिंट पत्रकारिता और प्रिंट पत्रकारों पर कितना लिका है । यशवंत जी, भास्कर के अलावा रविवार को हिन्दुस्तान भी पढ लिया कीजिये ।स्तकर ल
alok nandan
March 23, 2010 at 6:41 pm
वर्तिका नंदा बेहतर लिख रही हैं, टीवी पत्रकारिता पर लिखा गया यह आलेख भी सच्चाई के करीब है।
mahesh lilolia
March 24, 2010 at 10:25 am
VARTIKA NANDA se puchiye ki LOKSABHA CHANNEL,SAHARA SAMAY, IIMC ki postings kaise jugad ki thi..ab jab SAHARA SAMAY ne nikal pheka, toh lagi gariyane..ye in tathakathit patrakaro ka shagal bann gaya hai…kisi achhe journalist ko VARTIKA NANDA ne kabi avsar nahi diya..LOKSABHA TV ke samay chun-chun kar unn logo ko aane nahi diya, jinse vartika ko khatara ho sakta tha..SAHARA SAMAY ki posting me UDAY SAHAY (jinki ye dusri patni hai) ka yogdan raha..VARTIKA NANDA ko pahle DAINIK BHASKAR ke bare me likhna chhahiye..ye sab NANDA KA NATAK HAI..Jai Bhadas..
lucky tiwari
March 24, 2010 at 4:37 pm
दरअसल वर्तिका नंदा उन कथाकथित पत्रकारों की जमात में शामिल हैं, जो आदर्शवादिता की खोखली बातें करते हैं, दूसरों की किताबों से पढ़कर छात्रों को अव्याहारिक रूप से समझाती हैं और अपने पति के रिश्तो के दम पर जुगाड़ के जरिए बिना काबिलियत- ऊंची नौकरियां हासिल करने में कामयाब हो जाती हैं। सहारा समय में छै महीने के दौरान एक भी ढंग का प्रोग्राम वर्तिका जी नहीं दे पाईं। एक दर्जन लोगों की टीम के साथ उहोंने सहारा में बाल मजदूरों पर जो घटिया प्रोग्राम उन्होंने तैयार किया, उसे देखने वालों की नजर में उनकी क्षमता साफ हो गई। उनके पीछे चस्पां जो बड़े बड़े नाम हैं, वो उनकी काबिलियत से नहीं, बल्कि विशुद्ध जुगाड़ की देन हैं। उनकी आदर्शवादिता की बातें बताती हैं कि उन्हें व्यावहारिक पत्रकारिता का जरा भी अंदाजा नहीं है। ये विरोध करने के लिए नहीं है, बल्कि जिन लोगों ने उनके साथ काम किया है,, वे अच्छी तरह बता सकते हैं। वे आजकल इसलिए घर पर हैं क्योंकि उनके पति इस समय मलाईदार पोस्ट पर नहीं है। हो सकता है फिर आ जाएं, तब आप उन्हें फिर किसी चैनल में देख सकते हैं।