गरीब का कोई रिश्‍तेदार नहीं होता : विष्णु नागर

विष्णु नागर
विष्णु नागर
इंटरव्यूविष्णु नागर (वरिष्ठ पत्रकार – साहित्यकार) : पार्ट वन : स्कूली ट्रिप पर दिल्‍ली आया तो टाइम्‍स बिल्डिंग देख सोचा, मुझे यहां काम करना चाहिए : रघुवीर सहाय बोले- मैं तुम्‍हें काम दे सकता हूं, मुझे लगा वो फ्री-लांसिंग कराएंगे : सर्वेश्‍वरजी ने सिफारिशी पत्र लिखा तो नौकरी मिली : बॉस से दुखी हो इस्तीफा दे दिया : ‘हिंदुस्तान’ छोड़ने पर मृणालजी को बुरा लगा था :

-नागर साहब. मैं चाहूंगा कि पहले आप अपने बर्थ प्लेस, बचपन के बारे में बताएं. यह भी कि पत्रकारिता में कैसे आए?

–मध्‍य प्रदेश का एक जिला है ‘शाजापुर’, जो कि आगरा बाम्‍बे राजमार्ग पर है, मैं उस शहर का रहने वाला हूं. वहीं से मैंने बीए तक की पढ़ाई की. घर की आर्थिक स्थिति अच्‍छी नहीं थी. पिता जी की मौत मेरे बचपन में ही हो गई थी. मैंने अपनी स्‍मृति में पिता जी को देखा नहीं था. मां ने ही पालन पोषण किया. बीए करने के बाद मेरे एक दोस्‍त नरेन्‍द्र गौड़, जो खुद अच्‍छे कवि हैं, ने योजना बनाई कि उनके जयपुर वाले चाचा से मिलने चलते हैं. तब जयपुर में ही मेरा एक कवि मित्र असद जैदी भी रहता था. तो मैंने भी चलने की हामी भर दी. मैं उन दिनों ट्यूशन पढ़ाता था. अपने खर्च के लिए.  ट्यूशन से मैंने जो पैसे इकट्ठे किए थे, उन्‍हें लिया. सोचा, चलो चलते हैं. बाकी जो होगा, बाद में देखा जायेगा.

-पिता के न होने पर तो बचपन का जीवन काफी मुश्किल रहा होगा? कहते हैं कि मुश्किल और संघर्ष में पले-बढ़े बच्चे अपनी उम्र के अन्य बच्चों से ज्यादा मेच्योर हो जाते हैं.

–पिता का साया नहीं होने पर मां को भरण पोषण करना पड़ा. घर की सारी जिम्‍मेदारी भी उन्‍हें उठानी पड़ती थी,  मेरी आवारगी रोकने, मुझे ठीक दिशा में रखने की कोशिश भी करनी होती थी. हालांकि मां का उतना कंट्रोल अक्‍सर नहीं होता है, जितना एक पिता का होता है. मैंने युवा होते ही सोचना शुरू किया कि मुझे कुछ ऐसा करना चाहिए ताकि मैं अपनी इन परिस्थितियों से बाहर निकल सकूं. मेरी तीव्र आकांक्षा थी कि मैं शाजापुर से बाहर निकलूं. शाजापुर उस समय छोटा कस्‍बा था, अब भी है. तब बीस-तीस हजार आबादी थी. विकास और मूलभूत सुविधा के पैमाने पर अविकसित जिला था. बहुत इच्‍छा थी कि कहीं ना कहीं बाहर जाया जाय. इसकी प्रेरणा मुझे काफी समय पहले मिली थी. मां ने उन मुश्किल दिनों में भी मुझे स्‍कूल की तरफ से जा रहे एक ट्रिप पर भेजा था. मुझे याद है, उसमें कुल मिलाकर पचास रुपये लगे थे. उसमें मुझे ग्‍वालियर, जयपुर, आगरा और दिल्‍ली ले जाया गया.. तब मैं आठवीं में पढ़ता था. इसके पहले उज्‍जैन से आगे नहीं गया था. जाहिर है, जब दिल्‍ली आया तो यह शहर उस जमाने में शाजापुर जैसे कस्‍बे से आए आमदी के लिए आश्‍चर्य लोक जैसा था, उसी ट्रिप के दौरान घूमते-घामते दिल्‍ली गेट पर आए. तब टाइम्‍स ऑफ इंडिया की बिल्डिंग बन चुकी थी. बिल्डिंग देखकर मन में हल्‍का सा विचार आया कि मुझे यहां काम करना चाहिए. हालांकि ऐसे विचार का आना  लिए कोई बड़ी बात नहीं थी. इस तरह की कई आकांक्षाएं मन में पलती रहती थीं. खैर, इसके बाद मैंने शाजापुर से बीए किया.

वो बात जो कह रहा था, अधूरी रह गई. जब हम जयपुर पहुंचे तो मैंने असद से कहा कि मैं एमए करने के बाद दिल्‍ली जाना चाहता हूं, तब लेक्‍चररशिप मिलने में आसानी होगी. मेरी इच्‍छा थी कि मैं अध्‍यापन के कार्य में लगूं. मुझे विश्‍वास था कि एमए विष्णु नागरकरुंगा तो फर्स्‍टक्‍लास आ ही जाऊंगा और लेक्‍चररशिप मिलनी आसान हो जायेगी. मेरे दोस्‍त ने मुझे सलाह दी, जो मुझे अब भी ठीक सलाह लगती है, कि ऐसा मत करो, दो साल बाद जाओगे तो भी इतना ही संघर्ष करना पड़ेगा, अभी चले जाओ, दो साल क्‍यों गंवाते हो. मुझे यह सलाह जंच गई. मैंने असद से वहीं कुछ पैसा लिया हालांकि वो भी उस समय मुश्किल दिनों से गुजर रहे थे. इसके बाद मैं फिर दिल्‍ली आ गया. अबकी अकेले आया. कुछ दिन तक कोशिशें कीं. कुछ दिनों रहा पर बात नहीं बन रही थी. छोटे कस्‍बे से दिल्‍ली आया तो कई तरह का अजनबीपन यहां महसूस होता था. यहां का खाना-पीना अलग था. अब तो दिल्‍ली में खाने की विविधता है, उन दिनों सिर्फ पंजाबी खाना मिलता था.

आने के पहले ही दिन दिनमान गया, वहां पहले सर्वेश्‍वर दयाल सक्सेना से मिला, जो दिनमान में चीफ सब एडिटर थे. मैंने उन्‍हें अपनी कविताएं बताई और दिल्‍ली में बसने की अपनी आकांक्षा जताई तो उन्‍होंने कहा कि तुम रघुवीर सहाय से मिलो, वो तुम्‍हें काम दे सकते हैं. रघुवीर जी से या दिल्‍ली में किसी से कोई व्‍यक्तिगत परिचय पहले से नहीं था. मुझे कोई जानता नहीं था. मैं रघुवीर सहाय से मिलने पहुंचा. मेरे पास कुल एक एयरबैग था, जिसमें मेरा सारा सामान था, दिनमान और नवभारत टाइम्‍स एक ही बिल्डिंग में उस जमाने में थे. मुझे अंदर बैग ले जाना अच्‍छा नहीं लगा. इसी बिल्डिंग के सेकेण्‍ड फ्लोर पर मुख्‍य दरवाजे के पास मैंने अपना बैग रख दिया. तब इतने रिस्ट्रिक्‍शन्‍स नहीं थे. मैं रघुवीर जी से मिला. उन्‍होंने लगभग घंटा-सवा घंटा बात की. कविताएं देखीं. फिर उन्‍हें अचानक याद आया कि उन्‍हें कहीं जाना था. वे हड़बड़ी में निकले, इसी दौरान उन्‍होंने कहा कि मैं तुम्‍हें काम दे सकता हूं. लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आया कि काम देने का मतलब फ्री-लांसिंग कराना नहीं होता है. इसके बाद मैं वापस शाजापुर लौट आया. दिल्ली में अकेले रहते हुए मुझे जाने क्यों लगा कि मेरी मां बीमार है. उस समय सूचना के साधन नहीं थे. मैं शाजापुर गया तो देखा कि मेरी मां बिलकुल ठीक थीं.

शाजापुर में जब मैंने रघुवीर सहाय के काम देने के बारे में अपने एक अध्‍यापक को जानकारी दी तो उन्‍होंने मुझे बहुत डांटा और कहा- मूर्ख हो, जिस टाइम्‍स ऑफ इंडिया में जाने के लिए लोग जाने क्‍या-क्‍या तिकड़म लगाते हैं और तुम्‍हें खुद रघुवीर सहाय कह रहे हैं कि काम दे सकते हैं तो तुम यहां चले आए. अध्यापक की बात सुनकर मुझे लगा कि मैंने दिल्ली से लौट कर अच्छा नहीं किया. इसके बाद मैं उसी दिन वापस दिल्‍ली चला आया. यहां आया तो पता चला कि रघुवीर सहाय तो बांग्‍लादेश युद्ध के कवरेज के लिए गए हुए हैं. सर्वेश्‍वर जी से मिला तो उन्‍होंने स्‍पष्‍ट किया कि काम देने का मतलब नौकरी देना नहीं है. काम देने का मतलब फ्री-लांसिंग करवाना है. मुझे झटका लगा. लेकिन सोचा कि अब फिर वापस जाना ठीक नहीं रहेगा. यहीं दिल्ली में कुछ कोशिश करते हैं. दो महीने तक इधर उधर घूमता रहा. लेकिन कहीं काम नहीं बन पाया. तब मैंने ठान लिया था कि कुछ दिनों तक और नौकरी नहीं मिली तो वापस लौट जाऊंगा. इसी दौरान सर्वेश्‍वर जी ने एक सिफारिशी पत्र लिखा. उस समय दिल्‍ली प्रेस में चन्‍द्रमा प्रसाद खरे हुआ करते थे, उन्‍होंने मुझे नौकरी पर रख लिया. मुझे ‘मुक्‍ता’ पत्रिका में दो सौ रुपये पर ट्रेनी का काम मिल गया. यह सन 71 की बात है.

-दिल्ली में किस जगह रहकर नौकरी की तलाश कर रहे थे?

–जब नौकरी नहीं मिली थी तब सर्वेश्‍वर जी ने, एक प्रसिद्ध कवि हैं कमलेश, जो समाजवादी पार्टी से भी जुड़े रहे, उनसे कह दिया था साथ रखने के लिए. वो नार्थ एवेन्‍यू में एक फ्लैट के ऊपर बनी बरसाती में रहते थे. कमलेश के साथ मेरे अलावा गोरखपुर का एक अन्य लड़का भी रहता था. बाद में गांधी नगर में एक कमरा किराये पर लिया. तब गांधी नगर में बने बनाए कपड़ों का बाजार नहीं हुआ करता था. मामूली सी, गरीबों की जगह हुआ करती थी. सस्‍ता इलाका था. तीस रुपये में मुझे एक कमरा मिला. लेकिन दिक्‍कत यह थी कि यहां मच्‍छर बहुत ज्‍यादा थे. मैं एक दिन में ही भाग खड़ा हुआ. मकान मालिक ने जिस जगह वह खुद रहता था, वहीं एक छोटा सा कमरा दिलवा दिया. इसके बाद मैं अपनी मां को दिल्‍ली ले आया. यह कमरा इतना छोटा था कि जब मैं और मां सोते थे तो हम लोगों के पैर कई बार टकराते थे और कमरे की लम्‍बाई में अलग-अलग दिशाओं में सोते थे.

तीन महीने बाद मेरी यह नौकरी छूट गई. बात ये हुई कि मेरे जो इमीडियेट बॉस हुआ करते थे, उनका नाम नहीं लूंगा, वो बहुत प्रेशर बनाते थे. मैं काम के मामले में नया नया था. शाजापुर में रहकर उज्‍जैन के छोटे-मोटे लोकल अखबारों में कुछ काम किया था. लेकिन मुझे बहुत ज्‍यादा कुछ आता-जाता नहीं था. उधर बॉस मालिकों की नजर में चढ़ने के लिए ऊपर तक मेरी शिकायत करते रहते थे. सात-आठ घंटे काम कता था. दिन में काम के दौरान इतना प्रेशर रहता कि जब रात में सोता तो शाजापुर के सुनहरे सपने आते लेकिन सुबह उठते ही फिर तनाव होने लगता था. काम बहुत ज्‍यादा था. इमीडियेट बॉस शिकायत के अलावा अपमान भी किया करते थे. मजबूरी थी, बड़ी मुश्किल से खड़े होने की जगह मिली थी. लेकिन एक दिन दिल्‍ली प्रेस के मालिकों में से एक ने मेरे बॉस की अनुपस्थिति में मुझसे कुछ पूछा और मैं नहीं बता पाया तो मुझ पर फट पड़े. कहने लगे कि आप बिल्‍कुल जिम्‍मेदारी से काम नहीं करते हैं. मैंने भी कह दिया कि अब मुझे काम नहीं करना है, मैंने अपना इस्‍तीफा उन्‍हें थमा दिया और कहा कि जा रहा हूं.

इसके बाद चंद्रमा प्रसाद जी ने, जिन्होंने मुझे नियुक्त किया था,  कहा कि तुम कैसे चले गए, तुम्‍हें तो मैंने रखा था, तुम्‍हें अपने मन से नहीं जाना चाहिए था. खैर, मैंने छोड़ दिया तो छोड़ दिया. दिल्ली प्रेस में जितने दिनों काम किया, उसके काफी कुछ सीख गया था. सीखने की बढि़या जगह है दिल्‍ली प्रेस. दिल्ली प्रेस छोड़ने के बाद कभी फ्रीलांसिंग, कभी नौकरी की. जार्ज फर्नाडीज के ‘प्रतिपक्ष’ में भी रहा. ऐसे ही चलता रहा. अंत में सन 74 में जाकर कुछ स्‍थायित्‍व आया, हालांकि 72 में ही टाइम्‍स में नौकरी लग सकती थी, परन्‍तु उस जमाने में न्‍यूज प्रिंट की क्राइसिस हो गई. अखबारों के पन्‍ने कम हो गए. नवभारत टाइम्‍स भी आठ या दस पेज का हो गया था. अत: मेरा और मेरे साथियों का सलेक्‍शन दिल्‍ली में होकर रूक गया, मुंबई का फाइनल सलेक्‍शन अटक गया. जब स्थिति 1974 में सुधरी तो ट्रेनिंग स्‍कीम में लिया गया. जरूरत की वैकेंसी निकाली गई. मैं बाम्‍बे गया.

-आपके बैच में कौन-कौन थे? मुंबई में ट्रेनिंग के कुछ अनुभव बताएं.

–मधुसूदन आनंद, अशोक ओझा और एक जगदीश द्विवेदी थे. इंग्लिस में खालिद अहमद भी थे जो अंग्रेजी के प्रसिद्ध फिल्‍म क्रिटिक और निर्देशक हैं. हिन्‍दी-अंग्रेजी वालों की संयुक्त ट्रेनिंग होती थी. मेरा समय अच्‍छा होने लगा. तनख्‍वाह भी ठीक ठाक मिलने लगी. खूब मौज मारते थे. महीने के आखिरी दिनों में खाना खाने को पैसे नहीं बचते थे. एक बार जब जेब में पैसे नहीं थे तो हम लोगों ने हमें ट्रेनिंग देने वाले एक सज्‍जन से पैसे मांगने की योजना बनाई. इसके लिए मुझे आगे किया गया. जब मैंने उनसे पैसे मांगे तो उन्‍होंने मना कर दिया. फिर उन्‍होंने किसी से पूछा कि क्‍या सचमुच इस लड़के की हालत बहुत खराब है और इसके पास खाने को पैसे भी नहीं हैं. ऐसे ही हम लोगों की मस्‍ती चलती रही. पहले नेशनल हॉस्‍टल में रहते थे, फिर तीन-चार लोग माहिम में साथ रहते थे, जिसमें मैं, मधूसूदन आनंद, अशोक ओझा और एक सज्‍जन अमर स्‍नेह रहने लगे.

अमर स्‍नेह का पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं था, वो थियेटर के कलाकार थे. हम लोगों से हॉस्‍टल में उनसे गहरी दोस्‍ती हुई, जो अब भी कायम है. एक बार की बात याद है. हम तीनों के जेब में कुछ नहीं था. भूख लगी थी. हम तीनों में अशोक ज्‍यादा व्यावहारिक था. वो बोला- रुको मैं कुछ करता हूं. वो सड़क के उस पार गया, वहां एक रेस्टोरेंट था. वहां जाकर उसने उसके मालिक से इधर-उधर की बातें की. होटल मालिक को वह  अंकल कह कर काम बनाता था. पहले उसने खाया-पिया, फिर कहा कि मेरे खाते में लिख लीजिए. इसके बाद उसने उससे कहा कि मेरे दोस्‍त भी आए हुए हैं और उनके लिए ब्रेड मक्‍खन चाहिए. वो अंकल को पटाकर ब्रेड मक्‍खन ले आया और कहा हमसे- लो, मरो सालों, खाओ. एक बार फिर ऐसी स्थिति हुई कि खाने तक के लिए हम लोगों की जेब में कुछ भी नहीं था. तब हम लोग एक परिचित वरिष्‍ठ सहकर्मी के यहां दशहरा मिलने इसी नीयत से चले गए थे कि शायद खाने को कुछ मिल जाये. हम लोगों की मौज मस्‍ती इसी तरह चलती रहती थी. बीयर वगैरह भी कभी-कभी पी लेते थे. मैं 77 तक वहां रहा. बाम्‍बे में मेरा मन नहीं लगता था. मैं दिल्‍ली आना चाहता था लेकिन कोई रास्‍ता नहीं था.

-उस दौरान माता जी कहां थीं?

–माता जी को बाम्‍बे नहीं ले जा पाया. बाम्‍बे में तनख्‍वाह तो ठीक मिलती थी लेकिन इतनी नहीं मिलती थी कि एक कमरा अलग से ले सकूं. मैं माता जी को साथ नहीं रख पाया. ये मेरे जीवन के सबसे बड़े दुखों में से एक है. उस जमाने में बाम्‍बे में कमरा किराया पर लेने के लिए अच्छी खासी पगड़ी देनी पड़ती थी. पगड़ी के बाद ही ढंग का मकान मिल सकता था. पगड़ी विष्णु नागरदेने के लिए मेरे पास दस से बीस हजार रुपये नहीं थे. झुग्‍गी-झोपड़ी का सहारा था तो मैं मां को वहां नहीं रख सकता था. शाजापुर में ही उनकी मृत्‍यु हो गई. हालांकि मैं उनकी मौत के समय उनके साथ था. मां की मौत के बाद मैं बिल्‍कुल अकेला हो गया. मैं अपनी मां का अकेला संतान हूं.

-आपके रिश्तेदार वगैरह तो रहे होंगे?

–अगर आपने गरीबी देखी होगी तो पता होगा कि गरीब आदमी का कोई रिश्‍तेदार नहीं होता है. सब कोई अपने-अपने संघर्ष में लगा रहता है. कुछ एक रिश्‍तेदारों के यहां कभी-कभार का आना-जाना था. रिश्‍तेदारी क्‍या होती है, ये ठीक से मैंने शादी के बाद ही जाना.

-शादी कब की?

–मेरी शादी भी एक कहानी है. मेरे मित्र आनंद ने प्रेम विवाह किया था तो मैं उनकी शादी में शामिल होने के लिए मुंबई से दिल्‍ली आने वाला था. उसी दौरान हमारे एक पड़ोसी जिन्‍हें मैं मामा मानता था, उन्‍होंने कहा कि लड़की देख लो. छुट्टी न होने की वजह से तय हुआ कि वापस दिल्ली जाते वक्त नागदा स्‍टेशन पर, जहां गाड़ी पांच मिनट रुकती है, वहीं वे लड़की को लेकर आ जाएंगे. उसे देख लेंगे और बातचीत भी हो जायेगी. वो लोग नागदा स्‍टेशन पर मुझसे मिलने आए. वहीं बात पक्‍की हो गई. देवास में मेरी शादी प्रमिला के साथ सन 76 में हो गई. मेरे ससुर मदन मोहन व्‍यास मालवी भाषा के कवि हैं. अभी 85 की उम्र में स्‍वस्‍थ्‍य हैं.

-मुंबई से दिल्ली कैसे आए?

–शादी के बाद मैं बाम्‍बे में नहीं रहना चाहता था. एक बार स्थिति ये हो गई कि मकान मालिक ने इतना तंग किया कि मैं परेशान हो गया. दूसरा मकान मिल नहीं रहा था. लगा सामान सड़क पर आ जायेगा. परन्‍तु मेरे आफिस के एक वरिष्‍ठ, जो बहुत सज्‍जन आदमी थे तथा खेल पेज के इंचार्ज थे, उन्‍होंने कहा कि तुम चिंता मत करो, अपना सामान लाकर मेरे घर में रख दो और वहीं रहो. मुझे नहीं पता कि उन्‍होंने शादी की थी अथवा नहीं, लेकिन वो अकेले रहते थे. संयोग यह था कि उस समय अज्ञेय जी नवभारत टाइम्‍स के संपादक बन चुके थे. एक बार बाम्‍बे आए तो मैंने उनसे खुद जाकर पर्सनली रिक्‍वेस्‍ट किया दिल्ली भेजने के लिए. उन्‍होंने पूछा- यहां क्‍या कर रहे हो? मैंने बताया- मैं यहां रिपोर्टर हूं. अज्ञेय जी ने कहा कि रिपोर्टिंग में तो दिल्ली में जगह नहीं है लेकिन जो साप्‍ताहिक पेज है, उसमें मैं रख सकता हूं. हालांकि मैं रिपोर्टर के रूप में दिल्‍ली आता तो मुझे तीन-चार सौ रुपये का फायदा होता. लेकिन दिल्‍ली आना मेरी जरूरत थी, इसलिए मैं यहां डेस्क पर भी आने को तैयार हो गया.

तब से सन 97 के शुरू तक नवभारत टाइम्‍स, दिल्ली में ही विभिन्‍न पदों पर काम करता रहा. आलोक मेहता जब हिन्‍दुस्‍तान में आए तो उन्होंने ब्‍यूरो मे बुलाया. मैंने नवभारत टाइम्‍स को अलविदा कह दिया. इसके बाद मैं फरवरी 1997 में हिन्‍दुस्‍तान के साथ जुड़ गया. 2003 में मृणाल जी ने मुझे कादम्बिनी संभालने को कहा. मुझे वहां पहले एसोसिएट एडिटर बनाकर भेजा. फिर कुछ समय बाद कार्यकारी संपादक बनाया. सन 2008 अगस्‍त तक मैं कादंबिनी में रहा. इसके बाद जब नई दुनिया अखबार दिल्ली से आने को हुआ तो आलोक मेहता का दबाव पड़ा कि नये वेंचर में साथ चलो. काफी सोच विचार के बाद मैंने अंतत: नई दुनिया ज्वाइन करने का फैसला ले लिया. हालांकि मृणाल जी को स्‍वभाविक रूप से ही मेरा यह कदम बुरा लगा. उन्‍होंने कहा कि आपने भी मेरा साथ छोड़ दिया. मुझे उनका साथ छोड़ने का गहरा अफसोस था. लेकिन मैं फैसला कर चुका था. बदलाव चाहता था. दैनिक पत्रकारिता को लेकर आकर्षण था. बेहतर ऑफर भी था. मैं नई दुनिया चला आया.

….जारी…

Comments on “गरीब का कोई रिश्‍तेदार नहीं होता : विष्णु नागर

  • ish madhu talwar says:

    bahut achchha…nagar ji ka yah safar bataata hai ki sangharsh ke kis daur se gujarte hue unhone apna mukaam banaaya…aadmi badaa aise hi banta hai… i salute him…

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  • Nagar Ji,

    Apne apne Germany prawas ke baare mein to kuch nahin bataya. Kuch Apne bachchon ke baare mein bhi bataye. Alok Mehta ji se dosti kaise hui, iss ke baare mein bhi readers ko batayen.

    Apka Shubhekshu
    Jigyasu

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  • PRAVIN KUMAI RAI says:

    nagar ji ka interview acha hai eisme kuch bhasahi dosh hai jise mane bata dia hai .agar app ese ddur kar sakte hai to dur kar de.

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  • PRAVIN KUMAI RAI says:

    हालांकि ऐसे विचार का आना लिए कोई बड़ी बात नहीं थी।इस पंक्ति में सुधार की जरूरत है।

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  • Akhilendra Nath says:

    nagarji ne apne swabhav ke baare me nahin bataya…yeh baat main isliye janana chahta hoon kyonki jab wo kadambini me deputy editor the to madam prabha bhardwaj ne unse mujhe milwane ki poori kosis kee thee.. kintu unhone na jane kyon mujhse milne se inkaar kar diya tha…tab mujhe laga tha ki iss insaan ke andar insaniyat tak nahin hai!!!!… anyway, main firse doobara nahin gaya…

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  • Ye jankar ekbaar phir man saham gaya ki garibon ka koi rishtedaar nahi hote. Manhgai se trast log tab v dukhi the evang aaj v.purani pidhi ke logon se sangharsh karne ki prerna milti hai

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