अखबारों ने निभाई स्‍टाफगीरी, नहीं छपी सुब्रत राय वाली खबर

स्टाफगीरी के चलते चालक, परिचालक बसों में फ्री चलते हैं, इसी तरह एक नाई दूसरे नाई से शेव करने के पैसे नहीं लेता। ऐसी ही स्टाफगीरी अखबार की दुनिया में निभाई जाने लगी है। यह स्टाफगीरी सही है या गलत, इस पर मैं कुछ नहीं कह सकता, पर सहारा ग्रुप के चेयरमैन सुब्रत राय के मामले में अखबारों की स्टाफगीरी देख कर वाकई आश्चर्य हुआ।

हालांकि पिछले दिनों सेबी की कार्रवाई वाली सुब्रत राय की खबर को अधिकांश अखबारों ने प्रथम पेज पर स्थान दिया था, लेकिन अगले ही दिन सुब्रत राय ने अधिकांश अखबारों में प्रथम पेज पर विज्ञापन के माध्यम से अपना पक्ष रखा, तो फिर सभी अखबारों से खबर गायब हो गयी, जबकि वह विज्ञापन की जगह प्रेसवार्ता के माध्यम से ही अपना अधिकारपूर्ण पक्ष रख सकते थे और अखबारों को उनका पक्ष प्रकाशित भी करना पड़ता, पर उन्होंने ऐसा करने की बजाये विज्ञापन के माध्यम से सभी अखबारों की आत्माओं को खरीदना उचित समझा, लेकिन अखबार मालिक तर्क दे रहे हैं कि सुब्रत राय मीडिया से जुड़े हैं, इसलिए उनके विरुद्ध खबरें नहीं छापनी चाहिए।

अखबार मालिकों के इस तर्क पर सवाल उठता है कि उन्होंने जब सेबी वाली खबर छापी थी, तब उनका तर्क कहां गया था? तर्क को अगर सही भी मान लिया, तो सवाल यह भी उठ रहा है कि सटोरिये या दाउद इब्राहिम भी अखबार निकालने लगें, तो क्या उनके साथ भी स्टाफगीरी निभायेंगे? खैर, तर्क जो भी दिये जायें, पर असलियत यही है कि सुब्रत राय ने अधिकांश अखबारों को खरीद लिया है, तभी सुब्रत राय को अदालत द्वारा भगोड़ा घोषित करने की कार्रवाई की खबर किसी बड़े अखबार में नहीं छापी गयी है। बदायूं में अधिकांश पाठक बड़े अखबारों की आलोचना करते नजर आये, क्योंकि बदायूं अमर प्रभात ने इस खबर को प्रथम पेज पर प्रमुखता से प्रकाशित किया है।

बदायूं से बीपी गौतम की रिपोर्ट.

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