आपकी बेटियों को दिल्ली की बसों से कब साबका पड़ता है!

देश का तर्कशास्त्र कितना पोच हो गया है! पुलिस कमिश्नर, गृहमंत्री और अब प्रधानमंत्री भी कहते हैं कि वे दर्द समझते हैं क्योंकि उनके भी बेटियां हैं। तो जिनके बेटियां नहीं हैं, वे? और कोई पूछे कि आपकी बेटियों को दिल्ली की बसों से कब साबका पड़ता है! "दर्द" समझते हैं, तो राजपथ पर पूस की शाम ठंडे पानी से पिटते लड़के-लड़कियों को देख क्यों दर्द नहीं उमड़ा? पुलिस आपा खोकर लाठी-गोले उठा ले, हाथ-पाँव तोड़ दे, कैमरे फोड़ दे तो फर्ज; प्रदर्शनकारी नियंत्रण खोकर पत्थर उठा लें तो असामाजिक-अराजक तत्त्व, उपद्रवकारी, यहाँ तक कि hoolingans अर्थात गुण्डे! इसलिए, विरोध के रास्ते भी करो बंद! न्याय माँगा था, लो दिया न्याय! …. चाहे बलात्कार का हादसा हो, चाहे राजपथ का पुलिस राज — दोनों से एक ही सन्देश मिलता है: विफल शासन, विफल प्रशासन।

वरिष्‍ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से साभार.

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