कांग्रेस में कमजोर कड़ियों को कसने की कवायद शुरू

राजस्थान में विधानसभा चुनाव सर पर है। कांग्रेस ने तैयारी कर ली है। सीएम अशोक गहलोत कमर कस चुके हैं। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मिलकर बहुत सारे कामों की इजाजत एक साथ ले ली है। अब थोड़ी सी तेजी आनेवाली है। सवाल सिर्फ राजस्थान में कांग्रेस की सत्ता फिर से लाने का नहीं है। निशाना केंद्र की सरकार में फिर से आने पर भी है। यानी पहले प्रदेश, फिर पूरा देश। इसीलिए हर स्तर पर कांग्रेस की कमजोर कड़ियों को कसने की कवायद शुरू हो गई है। साथ ही ब्लॉक स्तर ही नहीं गांव और बूथ लेवल तक के मैनेजमेंट को भी मजबूत किया जा रहा है। सरकार और संगठन में सामंजस्य की तैयारी है और जो जहां मजबूत है वहां उसे ज्यादा जोरदार बनाने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है।

खास बात यह है कि राहुल गांधी की राय और सोनिया गांधी की सलाह पर राजस्थान में कांग्रेस ने सभी जिलों के अपने उन नेताओं पर भी नजर रखना शुरू कर दिया है, जो बड़े नेताओं के विरोध के बूते पर अपनी गली में ताकतवर बने हुए हैं। वैसे तो अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है। लेकिन ऐसे बहुत सारे शेर बने कुत्ते खुद को मजबूत करने की कोशिश में ज्यादा भौं-भौं करके घर और गली की शांति भंग करते रहते है। कांग्रेस ऐसे शेर बने कार्यकर्ताओं की नाक में नकेल की तैयारी है। तय हो गया है कि सख्ती से निपटा जाए। ज्यादा चूं-चपड़ करें, तो दरवाजा भी दिखाया जा सकता है। चेहरे जाने पहचाने हैं। क्योंकि बदमाशों को गांव, गली और मोहल्ले वाले तो बाद में जानते हैं। सबसे पहले घर के लोग उनकी असलियत पहचानते हैं। सो, कौन बदमाशी कर सकता हैं और कौन किसी भी हालात में बदमाशी करने से नहीं चूकेगा, सबके बारे में कांग्रेस को पता है। सूची बन गई है। नकेल तैयार है, और नाक भी। बस डालने की देर हैं। अपना मानना है कि सख्ती जरूरी है और कारवाई भी। क्योंकि सत्ता में बने रहने के लिए भले ही यह सब जरूरी नहीं हो, पर सत्ता में फिर से आने के लिए यह कुछ ज्यादा ही जरूरी है।

कांग्रेस को सत्ता में फिर से आना है। करो या मरो वाले हालात हैं। अभी नहीं तो कभी नहीं। जरा सी चूक हुई तो, पांच साल के लिए घर बैठना पड़ेगा। इस बार घर बैठना भारी पड़ेगा। क्योंकि मामला सिर्फ प्रदेश की सरकार का नहीं है। विधान सभा चुनावों के तत्काल बाद छह महीनो में ही लोकसभा के चुनाव हैं। विधानसभा हाथ से गई तो लोकसभा में भी सीटें नहीं आएगी। एक सीढ़ी से फिसले, तो दूसरी पर भी फिसलना तय है। विधानसभा तो झांकी है, दिल्ली की सत्ता में फिर से आना अभी बाकी है। कांग्रेस मान रही है कि प्रदेश अगर हाथ से निकल गया तो बाजी बीजेपी के हाथ रहेगी। क्योंकि जो जीता वो सिकंदर। महारानी श्रीमती वसुंधरा राजे वैसे भी कोई कम सिकंदर नहीं हैं। माहौल दमादम मस्त कलंदर वाला है। आक्रामक होकर मैदान में उतरी है। कांग्रेस इसीलिए बहुत सधे हुए कदमों से चल रही है। सबसे पहले घर संभालने की कोशिश है। संभालने के बाद उसे मजबूती देने की कवायद है।

कांग्रेस में भीतरघात की परंपरा पुरानी है। पर, इस बार बहुत सारी नई परंपराओं का निर्माण होगा। राहुल गांधी ने अशोक गहलोत से मिलकर इस बार कई पुराने मानदंडों से बहुत आगे की सोच का सख्त ताना बाना तैयार किया है। घर के गुंडों को औकात में रहने का संदेश दे दिया गया है। बदमाश इसलिए डरने लगे हैं। जिन्होंने अनुशासन तोड़ा है, वे ज्यादा डरे हुए हैं। करतूतें ही ऐसी हैं, तो डरना भी जरूरी है। सो, अनुशासनहीन भाई लोगों, जरा सावधान। दाढ़ी बढ़ाकर दबंगई करने की कोशिश अब नहीं चलेगी। अहसान फरामोश लोगों को इस तथ्य का भी खयाल रखना चाहिए कि कांग्रेस में बिना उस्तरे के हजामत बनाने की परंपरा भी बहुत पुरानी है। 

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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