नरेंद्र मोदी दिल्ली आ रहे हैं। देश ने, आपने–हमने और खासकर कांग्रेस ने मोदी को इस मुकाम पर ला दिया है कि अब उनके पास दिल्ली आने के सिवाय कोई चारा नहीं बचा है। वक्त आ गया है कि गुजरात से बाहर निकलें। वहीं रहे, तो जितने हैं, उससे बड़े नहीं होंगे। हालांकि देश के पीएम की कुर्सी पर बैठे होने के बावजूद अपने सरदारजी की गुजरात के सीएम मोदी के सामने कोई बहुत बड़ी राजनीतिक औकात नहीं है। मोदी का कद इतना बड़ा हो गया है कि गुजरात के फ्रेम की साइज से उनकी तस्वीर बाहर निकलने लगी है। अब वे दिल्ली आएंगे। और देश की राजनीति में छाएंगे तो कांग्रेस को डर है कि मोदी बहुत कुछ अपने साथ बहा ले जाएंगे।
बीजेपी भी ऐसा ही मान रही है। इसीलिए मोदी को दिल्ली ला रही है। हालांकि पीएम के रूप में पेश करने से हिचक रही है। तकलीफ साथियों की है। लेकिन मोदी को गुजरात में रखते हुए गुजरात से निकाल कर देश राजनीति में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को लेकर कुछ अहम फैसले होने वाले हैं। अपनी खबर है कि अगले आम चुनाव में उनके ऊपर अहम जिम्मेदारी होगी। बहुत संभव है कि अगले कुछ दिनों में मोदी को देश के स्तर पर बीजेपी में बड़ी पोजिशन पर लाकर बड़ा धमाका किया जाएगा। कद तो उनका बड़ा है ही, पद भी इतना खास होगा कि पूरा का पूरा चुनाव उन्हीं के इर्द – गिर्द घूमता रहे। दो और तीन मार्च को दिल्ली में बीजेपी अध्यक्ष राजनाथसिंह की पहली कार्यकारिणी की बैठक होने वाली है। इसी में उनकी नई टीम की घोषणा होगी।
राजस्थान से ओम प्रकाश माथुर महासचिव हो सकते हैं। ओमजी भाई साहब के राजनीतिक उत्थान से जलनेवालों के बारे में विस्तार से कभी और बात करेंगे। फिलहाल मोदी का मामला निपटा लें। संघ परिवार ने अपनी सहमति दे दी है। राजनाथ सिंह ने खुद भी कहा ही है कि मार्च में होनेवाली पार्टी संसदीय बोर्ड की बैठक में फैसला लिया जाएगा कि बीजेपी का अपना पीएम का उम्मीदवार कब घोषित करेगी। हालांकि, मोदी को पार्टी का सबसे लोकप्रिय चेहरा बताकर राजनाथ सिंह ने इशारों इशारों में वैसे भी बहुत कुछ कह ही दिया है। वैसे, खबर यही है कि मोदी को बीजेपी की इलेक्शन कमेटी का मुखिया मनोनीत किया जा सकता है। ताकि टिकट बांटने में तो उनकी भूमिका रहे ही, दूसरी पार्टियों के साथ गठजोड़ और बीजेपी की हर बैठक में स्थायी रूप से शामिल होने के उनके रास्ते भी खुले रहें।
हालांकि अगर वक्त पर हुए तो लोकसभा के चुनाव 2014 में जून के आस पास होंगे। इसीलिए बीजेपी समझदारी से कदम उठा रही है। इसी साल राजस्थान, दिल्ली, एमपी सहित कुछ राज्यों में विधानसभा के चुनाव भी हैं। वहां भी कोई कम झंझट नहीं हैं। मोदी के सामने कोई बहुत ज्यादा लपड़ – झपड़ नहीं करेगा और इन विधानसभा चुनावों से देश के मामले में मोदी की ट्रेनिंग भी हो जाएगी। दूसरी तरफ देखा जाए, तो कांग्रेस नरेंद्र मोदी के नाम से चिढ़ती है। गुजरात के विकास की बात से कुढ़ती है। और आपस में ही लड़ती है। बीजेपी इसका भी फायदा उठाएगी। अपना मानना है कि मोदी के मामले में कांग्रेस से बहुत बड़ी गलती हो गई है। गलती कोई एकाध नहीं और गलती कोई हाल की भी नहीं। राजनीतिक नजरिए से देखें तो मोदी को उनके राजनीतिक जीवन में यह मुकाम बख्शने में कांग्रेस का ही सबसे बड़ा रोल रहा है। वह जिस तरह, तरीके और तेवर से मोदी का विरोध करती रही, मोदी उन्हीं तरह, तरीकों और तेवर को कांग्रेस को खिलाफ हथियार
बनाकर हर बार विजेता बनते रहे। दरअसल, मोदी को आंकने में कांग्रेस ने जो गलती की, उसका भुगतान बहुत भारी हो रहा है। अब, जब वे दिल्ली आ रहे हैं, तो गांधीनगर में बैठकर गांधी परिवार के विरोध के जरिए देश जितने बड़े बननेवाले मोदी दिल्ली आकर देश के दिल में कितनी जगह बना पाते है, यह सबसे बड़ा सवाल है।
लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.





