बख्‍श दीजिए दीपक चौरसिया को, उन्‍हें इंडिया न्‍यूज चलाने दीजिए!

फेसबुक पर दीपक चौरसिया के खिलाफ घुमड़ रहे तमाम पोस्टों को पढ़ा। मुझे एक पुरानी बात याद आ गयी कि इस दुनिया में लोग अपने दुःख से दुखी नहीं हैं बल्कि दूसरों के सुख को देख उससे ज्यादा दुखी हैं। पिछले कुछ दिनों से दीपक चौरसिया के "इंडिया न्यूज" ज्वाइन करने बाद से लोगों ने उनके खिलाफ निगेटिव कमेंट्स की झड़ी लगा दी है। मैं खुद मीडिया इंडस्ट्री में हूँ और मैं ये अच्छी तरह जानता हूँ कि आज के दौर में कितनी ईमानदारी से खबरें लिखी या बनायीं जाती हैं।

जब मीडिया भी एक व्यावसायिक इंडस्ट्री बन चुकी है जहाँ वर्ष के हर चौथाई महीनों के बाद लाभ-नुकसान देखा जाता हो वहां कैसी नैतिकता और कैसा बिकाऊ-पन? आज के दौर में खबरें बनती नहीं है, बल्कि बनायी जाती हैं और वो भी लाभ कमाने के लिए और टीआरपी बढ़ाने के लिए। मीडिया जगत में उच्च पदों पर भर्ती के समय ये बातें विशेष रूप से ध्यान में रखी जाती है कि आप कितना लाभ दे सकते हैं, कोई ये नहीं सोचता कि आप कितने ईमानदार हैं या आप अपने विषय का कितना ज्ञान रखते हैं। मैं दीपक चौरसिया की तारीफ में कसीदे नहीं पढ़ रहा, बल्कि मैं ये कहना चाहता हूँ कि किसी के आगे बढ़ने पर उसकी टाँगे न खींचिये।

दीपक की जिम्मेदारी इंडिया-न्यूज को आगे लाने की है, वो उसके लिए संघर्षरत हैं, उन्हें इस के लिए शुभकामनायें। रही बात नैतिक और आदर्शवादी पत्रकारिता कि तो ऐसी पत्रकारिता आज कोई भी मीडिया संस्थान नहीं कर सकता। मौजूदा समय में मीडिया हॉउस चलाने के लिए इतने धन की आवश्यकता है कि इसके लिए कहीं न कहीं आपको झुकना होगा और झुकना पड़ा तो बिकना भी पड़ेगा। इसलिए आप सब दीपक चौरसिया को अब बख्‍श दीजिये क्योंकि वो इंडिया न्यूज में आदर्शवादी पत्रकारिता करने नहीं आये बल्कि इस चैनल को तमाम न्यूज चैनलों में एक ऊंचा मुकाम देने की जिम्मेदारी लेकर आये हैं और इसके लिए उन्हें तमाम गलत-सही हथकंडे भी अपनाने पड़ेंगे। दीपक आप सफल हो मेरी आपको शुभकामनायें।

लेखक अजीत राय जनसंदेश टाइम्‍स, गोरखपुर में सहायक प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं.

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