‘सर आप डिप्रेशन जैसी बातें न लिखें, इससे डिप्रेशन हम लोगों को होने लगता है’

Shambhunath Shukla : कल अमर उजाला के सीनियर एडिटर हरवीर सिंह मिल गए। भरे गले से बोले- सर आप डिप्रेशन जैसी बातें न लिखा करिए। इससे हम लोगों को भी डिप्रेशन होने लगता है। हमें तो आप पर गर्व है। और आपको कमी किस बात की है? हरवीरजी, कृषि और अर्थ क्षेत्र के नामी पत्रकार हैं। हिंदी बेल्ट में कृषि की समझ रखने वाले ऐसे पत्रकार कम हैं। मुझे उनकी बात से लगा कि नहीं, लोगों को मेरी पीड़ा का अहसास है।

लेकिन मेरी पीड़ा आर्थिक कम, अपने खालीपन का अहसास को लेकर ज्यादा है। एक पत्रकार वह भी संपादक के लिए खबरों से अलग कोई न तो साहित्य होता है न उसकी अलग कोई दुनिया। वह हर चीज में खबर ही तलाशता है और उसे लगता है कि कैसे इस खबर से अपने अखबार को समृद्ध करे। अगर हम खबर को बांट नहीं सकते तो हमारा पत्रकार होना व्यर्थ है। अलग-अलग पत्रकार उसी खबर को अलग तरीके से पेश करते हैं। कोई उसमें मानवीय भाव तलाशता है तो किसी को उसी खबर में दैन्य अथवा दैत्य भाव का अहसास होता है। लेकिन यदि हमने किसी भी घटना को यूं ही छोड़ दिया तो उसका मतलब हैं कि हममें पत्रकारिता के जर्म्स नहीं हैं।

हैदराबाद के सीरियल ब्लास्ट को ही लिया जाए। टीवी चैनल वालों ने अपने-अपने हिसाब से दोषियों को तलाशना भी शुरू कर दिया। और उसमें मजहब और धर्म भी तलाश डाले। लेकिन क्या ऐसी आपराधिक घटनाएं सिर्फ आतंकवाद की उपज होती हैं। क्या कुछ अपराधी ऐसी घटनाएं अपनी विकृत मानसिकता के चलते नहीं करते। अब भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने पहले से चेताया था, ऐसी बातें हर घटना के बाद नहीं बताई जातीं? तब फिर नया क्या है? न किसी पत्रकार ने ऐसा सोचा और न ही किसी राजनेता ने। दरअसल एक को अपनी टीआरपी या टीआरए की फिक्र है तो दूसरे को अपने वोट बैंक की। क्या पत्रकारिता की सारी सीमाएं यहीं पर खत्म हो जाती हैं। और साहित्य भी अपने को ऐसी घटनाओं से दूर ही रखता है। भला एक साहित्यकार को इससे क्या लेना-देना? हां मृत और घायल व्यक्तियों के परिवारीजनों की पीड़ा दर्शाकर वे अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं।

फेसबुक से.

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