सिनेमा देखने निकली युवती के साथ बलात्‍कार होना बाजार के लिए खतरनाक है!

: बलात्कार, बाजार और मीडिया : दिल्ली गैंग रेप को लेकर हुयी अविवादी प्रतिक्रिया में बाजार और बजारू मीडिया की भूमिका को भी समझा जाना चाहिये। एक दलित, गरीब या मजदूरी करने को मजबूर महिला के साथ होने वाला बलात्कार एवं भयानक उत्पीड़न युवा पीढ़ी, मीडिया एवं ​अभिजात वर्ग को क्यों परेशान नहीं करता है। यह समझने की जरूरत है। दिल्ली गैंग रेप पर हुयी प्रतिक्रिया का चरित्र अगर समझ लें तो बाजार का खेल समझ आ जाता है।

एक लड़की अपने प्रेमी के साथ सिनेमा देख कर निकलती है और उसके साथ बलात्कार हो जाता है और उसके साथ ऐसी भयानक बर्बरता होती है। किसी समाज में ऐसी किसी भी हाल में नहीं होनी चाहिये। इसका विरोध होना चाहिये, लेकिन उसी तरह से और उसी जोरदार तरीके से उस बर्बरता का भी विरोध होना चाहिये जो गांवों में, शहरों में अन्य श्रमजीवी, गरीब और दलित महिलाओं के साथ होता है। लेकिन मीडिया, बाजार एवं गुमराह होने वाली युवा पीढ़ी को इन महिलाओं के साथ होने वाली बर्बरता से परेशानी नहीं होती। आखिर क्यों। क्योंकि अपने ब्याय फ्रेंड के साथ डेटिंग पर निकली या अपने दोस्त के साथ रात में सिनेमा देखने निकली युवती के साथ बलात्कार होना बाजार के लिये खतरनाक है।

उस बाजार के लिये जिसमें प्यार—रोमांस और सेक्स से भरपूर फिल्में, विज्ञापन, फ्रेंडशिप कार्ड, ​वेलेनटाइन कार्ड, फैशन के पोशाक, लड़कों एवं लड़कियों को लुभाने के तमाम साजो..समान, मोबाइल फोन, इत्या​दि…इत्यादि शामिल है। अगर ऐसी घटनायें और हो गयी तो प्रेम और सौंदर्य का अरबों..खरबों रुपयों का विशाल बाजार सिमट जायेगा। अगर लडके..लड़कियों का पार्कों में, सिनेमा घरों में, माल्स में, हुक्का बारों में, डांस क्लबों में आना बंद हो गया…डेटिंग बंद हो गयी, वेलेंटाइन डे मनाना बंद हो गया तो फिर इस बाजार का क्या होगा।

मेरा कहने का आशय कतई नहीं कि लड़कियों और लडकों का हाथ में हाथ डाल कर घूमना बंद होना चाहिये या उनके साथ किसी तरह का कोई हादसा होनी चाहिये….लेकिन यह सवाल अवश्य है कि महिलाओं के साथ होने वाले उन अपराधों पर चुप्पी क्यों पसर जाती है जिनमें दलित, गरीब, महेनतकश महिलायें शिकार बनती हैं। क्योंकि उनके साथ कोई अपराध होने से प्रेम, रोमांस और सौंदर्य का वह बाजार प्रभावित नहीं होता जिससे मीडिया भी संचालित होता है और इस बाजार को बचाये रखना मीडिया के हित में है।

लेखक विनोद विप्‍लव वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा पीटीआई से जुड़े हुए हैं.

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