दैनिक भास्कर, बठिंडा एक बार फिर सुर्ख़ियों में है. भास्कर की इस यूनिट में पहले से निचले कर्मचारियों में रोष है. उन्हें छुट्टी माँगने पर साफ़ कह दिया जाता है कि छुट्टी चाहिए तो नौकरी छोड़ दो. मगर अब यहाँ कंपनी नहीं अपनी जेब भरने की होड़ मची है. जिससे आजकल अंदरखाने विज्ञापन विभाग और संपादकीय विभाग में भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. विज्ञापन विभाग टारगेट पूरा करने के लिए दिन रात एक कर रहा है, मगर संपादकीय विभाग से अब उसे सहयोग नहीं मिलने से उसके सामने दिक्कत आ रही है.
दरअसल विज्ञापन विभाग के भी कुछ क्लाइंट होते हैं जो अपनी खबर छपवाना चाहते हैं, मगर अब बठिंडा यूनिट में बड़ों के इशारे पर कुछ पत्रकारों को सिर्फ वसूली अभियान में लगा दिया गया है. स्वयं ब्यूरो चीफ भी वसूली अभियान में लगे हैं. उन्हें खुली छूट दे दी गयी है कि वे ऐसे क्लाइंट से पैसे लेकर खबर लगायें, मगर वो पैसा कंपनी में नहीं जमा होना है. भास्कर, बठिंडा के न्यूज़ एडिटर की भी पत्रकारों से रोज़ विशेष ब्रांड की मांग रहती है. उसे पूरा करने के लिए और अपनी जेब भरने के लिए कुछ पत्रकार तो इसमें शामिल हो गए हैं. मगर जो पत्रकार ऐसा नहीं कर पा रहे हैं वो परेशान हैं.
ऐसे पत्रकार संपादक महेंद्र कुशवाहा से भी अपना दर्द नहीं कह पा रहे. दरअसल दफ्तर में अन्दर खाने यह चर्चा रहती है कि संपादक का भी संरक्षण इसमें मिला हुआ है. क्योंकि संपादक वही करते हैं जो उन्हें उनके न्यूज़ एडिटर समझाते हैं. खुद का नाक कान बंद किये रखने से स्थानीय यूनिट के लोगों में संपादक के प्रति भी रोष है, मगर अप्रैल में इन्क्रीमेंट के लालच में अभी वे कुछ बोल नहीं पा रहे हैं. जबकि डेस्क और रिपोर्टिंग के कई लोग दूसरे संस्थानों में अपनी बात चला रहे हैं. कंपनी के लोगों का भी मानना है कि यदि जल्दी हालात नहीं बदले तो यहाँ भगदड़ फिर मच सकती है.
कानाफूसी






