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भ्रष्‍ट पत्रकारिता (21) : खामियों की खान है प्रेस क्लब, टायर्ड-रिटायर्ड लोगों की भरमार

: नए पत्रकारों के लिए बंद है प्रेस क्‍लब के दरवाजे : 9 नवंबर 1989 को प्रदेश सरकार ने रानी लक्ष्मीबाई मार्ग स्थित चाइना बाजार स्थित इस भवन को तीस वर्षों के लिए 8 लाख 78 हजार 460 के नजराने पर दिया था और सालाना 21961.30 पैसे सालाना लीज पर दिया था। 1968 में इस भवन का पट्टा यूपी वर्किग जर्नलिस्ट यूनियन के नाम पर दस वर्ष के लिए हुआ था। 1978 में यह पट्टा समाप्त हो गया। तीस साल बीत गए लेकिन इसका पट्टा बढ़वाने की कार्रवाई नहीं की गई। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इस पर लखनऊ विकास प्राधिकरण ने भी चुप्पी साध रखी है।

: नए पत्रकारों के लिए बंद है प्रेस क्‍लब के दरवाजे : 9 नवंबर 1989 को प्रदेश सरकार ने रानी लक्ष्मीबाई मार्ग स्थित चाइना बाजार स्थित इस भवन को तीस वर्षों के लिए 8 लाख 78 हजार 460 के नजराने पर दिया था और सालाना 21961.30 पैसे सालाना लीज पर दिया था। 1968 में इस भवन का पट्टा यूपी वर्किग जर्नलिस्ट यूनियन के नाम पर दस वर्ष के लिए हुआ था। 1978 में यह पट्टा समाप्त हो गया। तीस साल बीत गए लेकिन इसका पट्टा बढ़वाने की कार्रवाई नहीं की गई। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इस पर लखनऊ विकास प्राधिकरण ने भी चुप्पी साध रखी है।

जानकार बताते है कि इस मामले में प्रीमियम के नाम पर जो 8 लाख 78 हजार 460 रुपए तय हुआ इस राशि का भुगतान सूचना विभाग से कर लिया गया, लेकिन इसे एलडीए में नहीं जमा किया। और इस राशि को लेकर बंदरबांट हुई। आज की स्थिति में खुद अनाधिकृत कब्जेदार होने के बावजूद प्रेस क्लब ने ओपेन एयर रेस्टोरेंट दे रखा है। यह सब एलडीए की देखरेख में हो रहा है। उसने स्वयं कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया। आज की तारीख में प्रेस क्लब का रजिस्ट्रेशन नहीं है। और वह पट्टेदारी नियमों का उल्लंघन कर रही हे। एलडीए ने अपने रिकार्ड में प्रेस क्लब के भवन को ऐतिहासिक धरोहर घोषित कर रखा है, और ऐतिहासिक इमारत में भी दुकानें किराए पर चल रही है।

सूची में टायर्ड और रिटायर्ड लोगों की भरमार : यूपी प्रेस क्लब में मेम्बरशिप को लेकर बड़ा घालमेल है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भले हर साल पुनरीक्षण होता हो लेकिन यहां की वोटर लिस्ट जो दशकों पहली बनी थी उसी के अनुसार चुनाव होता है और उन्हीं लोगों मताधिकार दिया जाता है। वोटर लिस्ट में काफी संख्या में ऐसे लोगों की भरमार है जो पत्रकारिता छोड़  चुके है, या फिर पूरी तरह से निष्क्रिय है। सूची में बड़ी टायर्ड और रिटायर्ड लोगो की जमात है।

नए सदस्यों को बनाए जाने के मुद्दे पर नियमावली को ऐसा जटिल किया गया है कि कोई लिखने पढऩे वाला पत्रकार प्रेस क्लब का मेम्बर हो ही नहीं सकता। यदि 200 सदस्यों की सूची का अवलोकन कर लिया जाए तो तस्वीर खुद ब खुद साफ हो जाएगी। मेम्बरशिप के नाम पर ऐसे लोगों को शामिल किया गया है जिनके पास पढऩे लिखने के अलावा हर काम है। लेकिन क्लब में जो भी पदाधिकारी बैठे हैं वे नहीं चाहते कि किसी नए पत्रकार को मेम्बर बनाया जाए। जो भी नए मेम्बर बनाए गए है उनमे से अधिकांश जेनुइन पत्रकार होने के बजाए झोला छाप डाक्टरों की तरह डायरी छाप पत्रकार है।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

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