‘चापलूस’ पत्रकारों को यूपी सरकार का झटका

लखनऊ। अखिलेश यादव सरकार से सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के मामले में मुलायमपंथी कई दिग्गज पत्रकारों को काफी निराशा हाथ लगी है। अभी किसी के नाम की घोषणा नहीं की गई है। लेकिन जिन लोगों के नाम पर सहमति बनी है उनमें एक सपा मुखिया के रिश्तेदार बताए जा रहे हैं। जिन लोगों को मौका नहीं मिला है उनमें काफी संख्या ऐसे पत्रकारों की है जो मुलायमपंथ के अनुयायी रहे हैं।

सपा सरकार जब भी सत्ता में होती है तो ऐसे चापलूस पत्रकारों की बाढ़ आ जाती है। लेकिन इस सबके बावजूद जो खबरें छन के आ रही हैं, उनमें ऐसे लोगों को फिलहाल कोई रेवड़ी नहीं दी गई है। सूत्रों की माने तो सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए दो सौ से ज्यादा पत्रकारों ने आवेदन किया था। इनमें वे लोग भी शामिल थे जिन्होंने मुलायम की पूर्ववर्ती सरकार में विवेकाधीन कोष से मोटी मलाई काटी थी। और कुछ वो भी थे जो मायावती की पिछली सरकार में अपना जनेऊ दिखाकर मलाई काटने में आगे रहे। यह बात दीगर है कि इस टाइप के दलाल पत्रकारों को बसपा सरकार में हाशिए पर रखा गया। जिन पत्रकारों ने लोहिया ट़्रस्ट के मंच पर नेताजी और सपा की शान के कसीदे पढ़े वो लोग भी नहीं पूछे गए।
 
मजेदार बात तो यह है कि सूचना आयुक्तों की भर्ती के लिए आवेदन करने वाले कुछ आठवीं पास इलेक्ट्रानिक चैनल के कैमरामैन और कुछ काबीना मंत्री मोहम्मद आजम खां के करीबी लोगों को भी दरकिनार कर दिया गया। सूचना आयुक्त बनने की चाह की एक पत्रकार ऐसे भी थे जो नेताओं से लेकर अधिकारियों तक को ताकत बढ़ाने की गोलियां मुहैया कराते आए हैं। यह महाशय पिछली बसपा सरकार में अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन के सलाहकार रह चुके हैं। आयुक्तों के नामों की घोषणा होने तक सभी एक-दूसरे से अपने नामों को पुष्टि कराने में लगे हैं।

पत्रकारों के रूप में आवेदन करने वाले लोगों में वो लोग भी थे, जिनका जरायम की दुनिया से भी वास्ता रहा। लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद ऐसे लोगों को लगने लगा कि मानों उनकी मुंह मांगी मुराद पूरी हो गई। वे बाकायदा मान्यता लेकर सत्ता के गलियारों में नेताओं अफसरों की चंपूगिरी करते देखे जा सकते हैं। आयुक्तों के नामों की घोषणा में जिन नामों की घोषणा हो जाएगी उसके बाद भी लोग थकने वाले नहीं है। लोग सलाहकार बनकर लालबत्ती पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। बसपा सरकार में जनेऊ कान में चढ़ाकर और नीला झंडा उठाकर अपनी वल्दियत बदलने तक की शर्त पर कुछ भी पाने की लालसा रखे थे, वहीं लोग इस समय घर के भीतर बाहर सपा का झंडा लगाकर कुछ भी हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

सफेदपोश नटवरलाल की ढाल और दुधारू गाय बना स्वतंत्र भारत

लखनऊ। गौरवशाली अतीत वाला दैनिक समाचार पत्र स्वतंत्र भारत सफेदपोश नटरवर लाल केके श्रीवास्तव के लिए दुधारू गाय बन गया है। स्वतंत्र भारत के सेन्ट्रल बैंक का खाता नम्बर 1233701786 के स्टेटमेंट से यही संकेत मिल रहे हैं। खाते में प्रतिमाह लगभग तीस लाख रुपए का ट्रांजेक्शन हो रहा है। इसके बावजूद जहां सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं करोड़ों रुपए का ऋण बकाया है वहीं स्वतंत्र भारत के कर्मचारियों को छह माह से वेतन नहीं मिला है। कर्मचारियों की बदहाली पर मीडिया के स्वंयभू नेता और सरकार चुप्पी साधे हुए हैं।

उल्लेखनीय है कि बीते सात दशकों में स्वतंत्र भारत उत्तर प्रदेश का सबसे अधिक प्रसार संख्या वाला समाचार पत्र था। इस समचार पत्र में राजनाथ सूर्य, जैसे नामचीन सम्पादकों ने अपनी लेखनी के बल पर स्वतंत्र भारत को बड़ी पहचान दिलाई। वर्ष 1998 के बाद स्वतंत्र भारत की प्रतिष्ठा और आय में तेजी से गिरावट आई। इसकी वजह यह रही है कि स्वतंत्र भारत के चेयरमैन केके श्रीवास्तव ने अपने काले कारनामों के लिए सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं से करोड़ों रुपए का ऋण लिया। लेकिन 'जिसका लेना, उसका कभी न देना' की तर्ज पर कभी किसी का ऋण नहीं लौटाया। सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं ने अपने ऋण वसूली के लिए कई बार नोटिस और कुर्की के आदेश दिए लेकिन स्वतंत्र भारत के बल पर काले कारनामों के परिणामों से केके श्रीवास्तव बचे हुए हैं।

सेन्ट्रल बैंक का खाता नम्बर 1233701786 का 1 अप्रैल से 30 अगस्त 2013 तक स्टेटमेंट से स्पष्ट होता है कि स्वतंत्र भारत को जानबूझकर घाटे में साबित किया जा रहा है। इसी खाते के माध्यम से स्वतंत्र भारत के सीएमडी ने अपने लिए महंगी लक्जरी गाडिय़ों की किश्तों का भुगतान किया है। स्वतंत्र भारत के वर्तमान कर्मचारियों को बीते छह माह से वेतन नहीं मिला है। जबकि स्वतंत्र भारत के पूर्व 78 कर्मचारियों का लगभग 62 करोड़ रुपए बकाया है।

कई कर्मचारियों ने बताया कि अब स्वतंत्र भारत मैनेजमेंट समाचार पत्र के साथ खिलवाड़ कर रहा है। 2008 में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग से जारी हुए दो टेंडरों को सिर्फ फाइल कॉपी में छापा था। जिसकी शिकायत पर हुई जांच में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग ने स्वतंत्र भारत समाचार पत्र को ब्लैकलिस्ट कर दिया था। लेकिन अपने हरफनमौला कार्यशैली के बल पर केके श्रीवास्तव ने स्वतंत्र भारत ब्लैकलिस्ट से बाहर करवा दिया है। उन्होंने बताया कि स्वतंत्र भारत मालिकान के काले कारनामों को छिपाने की ढाल बन गया है। श्रमजीवी पत्रकारों के वेतन निर्धारण के लिए कई आयोग गठित हुए। लेकिन स्वतंत्र भारत में सरकारी नियमों को ताक पर रखकर मनरेगा मजदूरों से कम वेतन ढाई से तीन हजार रुपए के बीच दिया जा रहा है।

यूपी न्यूज पेपर इम्प्लाइल यूनियन की अध्यक्ष श्रीमती चंद्रलेखा ने बताया कि स्वतंत्र भारत के सीएमडी के.के. श्रीवास्तव ने पूर्व कर्मचारियों का बकाया वेतन का भुगतान जल्द नहीं किया तो पूर्व कर्मचारी आंदोलन करेंगे। उन्होंने कहा कि सरकार इस मामले की उच्चस्तरीय जांच कराकर कार्रवाई करे।

निष्‍पक्ष दिव्‍य संदेश में प्रकाशित अब्दुल हसैनन ताहिर की रिपोर्ट. खुलासे से जुड़ी अन्‍य खबरों को पढ़ने के लिए कमेंट बाक्‍स से नीचे जाएं.

दिग्गज पत्रकारों को ठगा सफेदपोश नटवर लाल ने

लखनऊ। भगवान राम का 14 वर्ष में वनवास पूरा हो गया था, लेकिन स्वतंत्र भारत के कर्मचारियों का वनवास अभी भी जारी है। सफेदपोश नटवरलाल स्वतंत्र भारत के मालिक के.के. श्रीवास्तव ने अपने जालसाजी और राजनीतिक पहुंच के बल पर बड़े-बड़े दिग्गज पत्रकारों को छला है। वर्ष 1998 में स्वतंत्र भारत में तालाबंदी से सड़क पर आए सैकड़ों कर्मचारी आज भी न्याय के लिए लड़ रहे हैं।

बीते 15 वर्षों में न्याय की लड़ाई लड़ते-लड़ते कई पत्रकारों का निधन हो गया, लेकिन न्याय नहीं मिला। स्वतंत्र भारत कर्मचारियों के निलम्बन का प्रकरण जहां श्रम न्यायालय में चल रहा है वहीं हाईकोर्ट में 10 साल से फैसला सुरक्षित है, लेकिन अभी तक फैसले की घोषणा नहीं हो पाई है।

मालूम हो कि लखनऊ से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र स्वतंत्र भारत का प्रकाशन आजादी की पहली किरण (15 अगस्त 1947) के साथ जयपुरिया ग्रुप ने शुरू किया था। इसके बाद इस समाचार पत्र को थॉपर ग्रुप ने अधिग्रहण कर लिया था। थॉपर ग्रुप से 15 मई 1996 को एग्रो फाइनेंस एंड इनवेस्टमेंट प्राईवेट लिमिटेड ने खरीदकर प्रकाशन शुरू किया था। एग्रो फाइनेंस एंड इनवेस्टमेंट प्राईवेट लिमिटेड के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक के.के. श्रीवास्तव हैं। एग्रो फाइनेंस एंड इनवेस्टमेंट प्राईवेट लिमिटेड के पास स्वतंत्र भारत का प्रबंधन आते ही दुर्दिन शुरू हो गए थे। स्वतंत्र भारत के मालिक के.के. श्रीवास्तव की गलत नीतियों के चलते घाटा होने लगा था। 12/13 अक्टूबर 1998 की रात को अचानक स्वतंत्र भारत प्रबंधन ने तालाबंदी कर दी गई। इससे लगभग सैकड़ों कर्मचारी सड़क पर आ गए।

स्वतंत्र भारत के कर्मचारियों ने न्याय के लिए श्रम न्यायालय, औद्योगिक न्यायधिकरण और हाईकोर्ट की शरण में गए। लेकिन न्याय नहीं मिला। लगभग 100 दिन की तालाबंदी के बाद स्वतंत्र भारत प्रबंधन ने 22 जनवरी 1999 को तालाबंदी समाप्त करने की घोषणा की। स्वतंत्र भारत प्रबंधन ने पुराने कर्मचारियों को न रखकर नए कर्मचारियों से काम करवाना शुरू कर दिया। जिसका पुराने कर्मचारियों ने जमकर विरोध किया। लेकिन स्वतंत्र भारत प्रबंधन की सियासी पहुंच के कारण कोई कार्रवाई नहीं हो पाई।

यूपी न्यूज पेपर इम्प्लाइल यूनियन की अध्यक्ष श्रीमती चंद्रलेखा ने बताया कि स्वतंत्र भारत प्रबंधन की कुनीतियों के कारण कई कर्मचारियों ने न्याय की उम्मीद में संघर्ष करते-करते दम तोड़ दिया है। उन्होंने बताया कि स्थायी कर्मचारियों का वेतन, डीए, एचआरए, सीसीए लाखों रुपए बकाया है। इस तरह स्वतंत्र भारत के प्रत्येक कर्मचारी का लगभग 8 लाख रुपए बकाया है।

उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत के मालिक के.के. श्रीवास्तव ने किसी भी पत्रकार का बकाया वेतन आदि नहीं दिया है। मौजूदा समय स्वतंत्र भारत के कर्मचारियों के लिए कोई भी नियम-कानून नहीं लागू हैं। अधिकतर पत्रकार और अन्य कर्मचारी ढाई से तीन हजार रुपए के वेतन पर काम कर रहे हैं। बीते छह माह से पत्रकारों और कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला है। इस संबंध में स्वतंत्र भारत के मालिक के.के. श्रीवास्तव से सम्पर्क किए जाने पर प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई है। निष्पक्ष दिव्य संदेश की पहल पर श्रम विभाग ने आश्वासन दिया है कि जल्द ही इस पर कार्रवाई की जाएगी। जिससे कर्मचारियों को न्याय मिल सके।

15 वर्ष से वनवास काट रहे हैं स्वतंत्र भारत के पत्रकार : स्वतंत्र भारत के पीडि़त कर्मचारियों में श्रीमती चंद्रलेखा, सहदेव सिंह मलिक, उदित नारायन झा, जी.पी. निराला, किशन सिंह रावल, दिनेश सिंह, दिवंगत बाबू राम शर्मा, विजय वीर सहाय, श्याम नारायण पाण्डेय, जगदीश जोशी, आर.डी. शुक्ला, संजय शर्मा, अशोक कुमार त्रिपाठी द्वितीय, माता प्रसाद मिश्र, वेद प्रकाश शर्मा, हरीश चंद्र श्रीवास्तव, दिवंगत दिलीप कुमार पाठक, श्रीराम वर्मा, दिवंगत अशोक शर्मा, ए.के. सिद्दीकी, छवि नारायण पाण्डेय, अंजु गुप्ता, सुनीता अग्रवाल, रंजना गुप्ता, अलका पाण्डेय, श्रीमती रुक्मणी, मनोज रानी, गीता मुखर्जी, चंद्र कुमार वर्मा, अखिलेश कुमार अवस्थी, अशोक कुमार, नरेश चंद्र चौरसिया, विश्वजीत चौधरी, कृष्ण गोपाल, अशोक सिंह, मुनेश्वर सिंह, हैदर आगा, आरिफ हुसैन, शेष कुमार गुप्ता, राम सिंह, अवधेश कुमार पाण्डेय, रामशंकर मिश्र, दुखहरन सिंह, राजीव पाठक, रणजीत सिंह, राजकुमार यादव, देवराज यादव, दिग्विजय नाथ पांडेय, दिनेश कुमार पाण्डेय, मोहम्मद असलम खान, रामेश्वर मिश्र, राजेश कुमार कश्यप, अविनाश पाण्डेय, रामानंद सैनी, विश्वजीत भट्टाचार्या, अभिषेक वाजपेयी, इन्द्रमणि श्रीवास्तव, संजय श्रीवास्तव, संतोष सिंह, उमेश जोशी, एरिक थामसन, ज्ञान प्रकाश श्रीवास्तव, राकेश चौधरी ज्ञानेन्द्र कुमार पाण्डेय, राम बाबू, अनुग्रह नारायण पाण्डेय, ललित मिश्र, सिद्घनाथ त्रिपाठी, वाई.एन. पाण्डेय देवराज मौर्या, प्रतिभा कटियार, सुशील डिक्शन, विनोद जोशी, शेषमणि दुबे, मुकुल मिश्र, राकेश चंद्र शुक्ला, प्रमोद जोशी और वीर विक्रम बहादुर मिश्र हैं।  (क्रमश:)

निष्‍पक्ष दिव्‍य संदेश में प्रकाशित अब्दुल हसैनन ताहिर की रिपोर्ट.

स्‍वतंत्र भारत : मालिक लूटे मजा, कर्मचारी काटे सजा

लखनऊ। एग्रो पेपर मोल्डस लिमिटेड जगदीशपुर, एग्रो फाइबर जगदीशपुर, एग्रो पेपर एंड पल्प, एग्रो फाइनेंस एवं प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार की नींव पर हुई थी। यही वजह है की चारों कम्पनियां दम तोड़ चुकी है। जहां इन कम्पनियों पर सरकारी और गैर सरकारी वित्तीय संस्थाओं का करोड़ों रुपए बकाया है वहीं निवेशकों का पैसा भी डूब गया है। जबकि इन कम्पनियों का मालिक विलासतापूर्ण जीवन जी रहा है।

7 अगस्त 1984 को एग्रो पेपर मोल्डस लिमिटेड कम्पनी का रजिस्ट्रेशन हुआ था। इस कम्पनी के चेयनमैन और प्रबंध निदेशक कौशल किशोर श्रीवास्तव, निदेशक नंदकिशोर श्रीवास्तव, जे.सी. मोहंती और वीना श्रीवास्तव थे। इनमें से नंदकिशोर श्रीवास्तव की आकस्मिक निधन हो चुका है। 24 नवम्बर 1984 को  एग्रो पेपर मोल्डस लिमिटेड पूंजी के लिए बाजार में उतरी थी। कम्पनी ने बाजार से करोड़ों रुपए उठाया। लेकिन कुछ सालों के बाद गायब हो गई। तमाम निवेशकों का पैसा डूबा गया। शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई।

निवेशकों का करोड़ों रुपए हड़पने के बाद भी कोई कार्रवाई न होने से एग्रो पेपर मोल्डस के प्रबंध निदेशक कौशल किशोर श्रीवास्तव के हौसले काफी बढ़ गए। इसके बाद एग्रो फाइबर, एग्रो पेपर एंड पल्प, एग्रो फाइनेंस कम्पनियां शुरू की। इन कम्पनियों को स्थापित करने के लिए वर्ष 1996 में पिकप से एग्रो पेपर मोल्डस फैक्ट्री के नाम पर 249.57 लाख रुपए ऋण लिया था, जो 31 मार्च 2013 तक बढ़कर 2323.58 लाख रुपए हो गया है। इसी तरह एग्रो फाइनेंस एवं इन्वेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड के नाम पर 87.40 लाख रुपए लिए थे, जो अब बढ़कर 2487.17 लाख रुपए हो गया है। इस तरह पिकप का कुल इन दो कम्पनियों पर 4810.75 लाख रुपए बाकी है।

इंडियन आयॅल और पंजाब एंड सिंध बैंक का करोड़ों रुपए बकाया है। अरबों रुपए का कर्जा एग्रो पेपर मोल्डस लिमिटेड जगदीशपुर, एग्रो फाइबर जगदीशपुर, एग्रो पेपर एंड पल्प, एग्रो फाइनेंस एवं प्राइवेट लिमिटेड कम्पनियों पर बकाया है। इसके बावजूद इन कम्पनियों का चेयरमैन के.के. श्रीवास्तव विलासितापूर्ण जीवन जी रहा है। राजधानी लखनऊ के महंगे क्लब एमबी क्लब, गोल्फ क्लब, जिमखाना क्लब, अवध क्लब और दिल्ली व मुम्बई के कई क्लबों की सदस्यता के.के. श्रीवास्तव के पास हैं। इसके साथ ही गोमती नगर के विशाल खण्ड में किराए की आलीशान कोठी में निवास है। इसका सम्पूर्ण खर्च स्वतंत्र भारत की आय से हो रहा है। जबकि स्वतंत्र भारत के कर्मचारियों को बीते छह माह से वेतन नहीं मिला है। इस संबंध में एग्रो पेपर मोल्डस लिमिटेड के मैनेजमेंट से सम्पर्क किए जाने पर प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई।  (क्रमश:)

दिव्‍य संदेश में प्रकाशित अब्‍दुल हसैनन ताहिर की रिपोर्ट.

सफेदपोश नटवरलाल! : स्‍वतंत्र भारत अखबार के मालिक पर करोड़ों रुपए बकाया

लखनऊ। 1912 से लेकर 1996 तक 8 राज्यों के उद्योगपतियों के लिए चुनौती बने मिथलेश कुमार श्रीवास्तव उर्फ नटवरलाल अपने ठगी के कारनामों से जो शोहरत हासिल की थी, उस राह पर अब उत्तर प्रदेश का एक सफेदपोश नटवरलाल चल रहा है। इस सफेदपोश नटवरलाल ने अपनी ठगी के कौशल के बल पर जहां सरकारी संस्थाओं को करोड़ों रुपए का चूना लगाया वहीं आजादी की पहली किरण का साक्षी दैनिक समाचार पत्र स्वतंत्र भारत के पूर्व और वर्तमान कर्मचारियों को दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर कर दिया है। इस सफेदपोश नटवरलाल के खिलाफ सरकारी धन को हड़पने के कई मामले चल रहे हैं, लेकिन कुछ आईएएस अफसर और राजनीतिक आकाओं के संरक्षण के कारण कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है।

उल्लेखनीय है कि एग्रो पेपर मोल्डस लिमिटेड जगदीशपुर, एग्रो फाइबर जगदीशपुर, एग्रो पेपर एंड पल्प, एग्रो फाइनेंस एवं प्राइवेट लिमिटेड और स्वतंत्र भारत समाचार पत्र के मालिक कौशल किशोर श्रीवास्तव ने इन कम्पनियों के नाम पर सरकारी संस्थाओं और प्राइवेट उद्योगपतियों से वर्ष 1994 से लेकर अगस्त 2013 तक जमकर धोखाधड़ी की है। जगदीशपुर में एग्रो पेपर मोल्डस और एग्रो फाइबर फैक्ट्री स्थापित करने के लिए पिकप से करोड़ों रुपए का ऋण लिया था।

पिकप द्वारा जारी डिफाल्टरों की सूची के मुताबिक एग्रो पेपर मोल्डस फैक्ट्री के नाम पर 249.57 लाख रुपए लिया था, जो 31 मार्च 2013 तक बढ़कर 2323.58 लाख रुपए हो गया है। इसी तरह एग्रो फाइनेंस एवं इन्वेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड के नाम पर 87.40 लाख रुपए लिए थे, जो अब बढ़कर 2487.17 लाख रुपए हो गया है। पिकप का कुल इन दो कम्पनियों पर 4810.75 लाख रुपए बाकी है। इस ऋण को हासिल करने के लिए कम्पनी के निदेशक कौशल किशोर श्रीवास्तव ने जमकर हेराफेरी की। इस हेराफेरी में पिकप के कुछ आला अफसरों ने भी साथ दिया था। जिससे आज तक पिकप कौशल किशोर श्रीवास्तव से बकाया ऋण वसूल नहीं सका है।

पिकप ने ऋण वसूली के लिए कई बार नोटिस जारी किया। साथ ही ऋण वसूली के लिए स्वतंत्र भारत की मशीन की नीलामी के लिए अखबारों में नोटिस जारी किया। लेकिन जर्जर हो चुकी स्वतंत्र भारत की मशीन 4810.75 लाख रुपए में खरीदने के लिए कोई भी सामने नहीं आया। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि पिकप के अफसरों की मिलीभगत के कारण ऋण की वसूली नहीं हो पा रही है। इसकी मुख्य वजह यह है कि पिकप हमेशा स्वतंत्र भारत की मशीन की नीलामी करने का स्वांग करता है। पिकप कभी भी स्वतंत्र भारत के टाइल की नीलामी के लिए कोई प्रक्रिया नहीं शुरू किया। जबकि स्वतंत्र भारत का टाइटल आज भी करोड़ों रुपए की वैल्यू रखता है।

विभागीय सूत्रों का कहना है कि पिकप के कुछ अफसर इस मामले को दबाए रखने के लिए प्रतिमाह स्वतंत्र भारत से 10 हजार रुपए नकद वसूल रहे हैं। इसके साथ ही कुछ नौकरशाह और ताकतवर नेता पिकप की वसूली में रोड़ा डाल रहे हैं।  इस संबंध में  एग्रो पेपर मोल्डस लिमिटेड के डिफाल्टर घोषित के.के. श्रीवास्तव से सम्पर्क किए जाने पर प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई। (क्रमश:)

निष्‍पक्ष दिव्‍य संदेश में प्रकाशित अब्दुल  हसैनन ताहिर/त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (25) : अपात्र पत्रकारों को खदेड़ने के लिए पीआईएल के इंतजार में सरकार!

लखनऊ। अपात्र पत्रकारों से सरकारी आवास खाली कराने से सरकार हिचक रही है। खुद का निजी आवास होने के बाद फर्जी हलफनामों के सहारे सरकारी आवासों में मौज कर रहे पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सरकार जनहित याचिका का इंतजार कर रही है। यही वजह है कि भारी संख्या में सरकारी आवासों में अपात्र पत्रकारों रह रहे हैं। जबकि वाजिब पत्रकार सरकारी आवास के लिए मारे-मारे घूम रहे हैं।

सरकारी आवासों और कुछ भ्रष्ट पत्रकारों के खिलाफ निष्पक्ष दिव्य संदेश की चलाई गई मुहिम से राज्य सम्पत्ति विभाग थोड़ा सचेत तो जरूर हुआ, लेकिन कार्रवाई के नाम पर पीछे हट गया। राज्य सम्पत्ति अधिकारी राजकिशोर यादव का कहना है कि अपात्र पत्रकारों से सरकारी आवास खाली कराए जाने की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन इस बात का जवाब देने से हिचकते हैं कि कब तक ऐसे पत्रकारों से आवास खाली हो जाएंगे। वे स्वीकार करते हैं कि अपात्र पत्रकारों से सरकारी आवास खाली कराने के प्रयासों के साथ ही बड़े अफसरों और नेताओं की सिफारिशें आनी शुरू हो जाती हैं, जिससे अभियान प्रभावित होता है। इसका विकल्प सिर्फ कोर्ट के पास हैं।

वे सुझाव देते हैं कि खबरों के प्रकाशित करने के साथ ही इस मुद्दे को लेकर जनहित याचिका हो, तब जाकर इस समस्या का निवारण होगा। राज्य सम्पत्ति विभाग के सूत्रों का कहना है कि 300 से ज्यादा सरकारी आवासों पर पत्रकारों का कब्जा है। इनमें से काफी संख्या में पत्रकार पत्रकारिता से रिटायर हो गए हैं। इसके बावजूद सरकारी आवासों पर काबिज हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अधिकतर पत्रकारों के पास सरकार द्वारा सब्सिडी पर दिए प्लाट और आवास होने के बावजूद सरकारी आवासों में रह रहे हैं। अपने निजी आवास किराए पर देकर कमाई कर रहे हैं। इस फर्जीवाड़े में नामचीन पत्रकारों की संख्या काफी है।

राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के एक सदस्य का कहना है कि वरिष्ठ पत्रकारों को नैतिकता के आधार पर सरकारी आवास छोड़ देना चाहिए। लेकिन बेशर्मी के कारण सरकारी आवास पर काबिज हैं। उन्होंने कहा कि इन वरिष्ठ पत्रकारों के कारण वाजिब पत्रकारों को सरकारी आवास नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने कहा कि उनकी जानकारी में ऐसे-ऐसे पत्रकार हैं, जिन्होंने पत्रकारिता के नाम पर आवास हासिल किया है, जिनका पत्रकारिता से दूर-दूर तक नाता नहीं है।

राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति हेमंत तिवारी ने इस मुद्दे पर कहा कि जिन पत्रकारों ने सरकार से सब्सिडी प्लॉट और आवास लिए हैं, और आर्थिक तंगी के कारण बनवा नहीं पाए हैं, उनका सरकारी आवास में रहना मजबूरी है। लेकिन जिन पत्रकारों के पास बड़े-बड़े बंगले टाइप निजी आवास हैं, उनको जरूर नैतिकता का परिचय देना चाहिए।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.


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भ्रष्‍ट पत्रकारिता (24) : पत्रकारों के मुफ्त इलाज के सीएम की घोषणा पर नौकरीशाही का ठेंगा

पीजीआई में राज्य कर्मचारियों की भांति मान्यता प्राप्त पत्रकारों को मुफ्त इलाज कराए जाने की मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की घोषणा अभी तक पूरी नहीं हो पाई है। उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष ने कई बार मुख्यमंत्री को अपनी घोषणा पर अमल करने की याद दिलाई। लेकिन नौकरशाही के निरंकुश रवैए के कारण मुख्यमंत्री की घोषणा अमल में नहीं हो पाई है। इसको लेकर पत्रकारों में रोष है।

पीआईबी देती है पत्रकारों को आर्थिक सहायता : केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने श्रमजीवी पत्रकारों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के लिए पत्रकार कल्याण निधि का गठन 25 अगस्त 2010 को किया था। इस निधि के माध्यम से पत्रकारों के आश्रितों को 3 से 5 लाख रुपए की आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। भारत सरकार ने इसके लिए एक कमेटी गठित कर रखी है। इस कमेटी की संस्तुति पर पत्रकार की मृत्यु होने या अभावग्रस्त जीवन पर पांच लाख रुपए की आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। गम्भीर रूप से बीमारी के इलाज के लिए 3 लाख रुपए की सहायता प्रदान की जाती है। भारत सरकार ने इसके लिए लोक लेखा में ब्याज वाली आरक्षित निधि से प्रावधान किया है। वरिष्ठ पत्रकार दिलीप सिन्हा ने कहा कि यूपी सरकार भी केन्द्र सरकार की तर्ज पर पत्रकार कल्याण कोष गठित करे, जिससे पत्रकारों को आर्थिक सहायता मिल सके।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (23) : सरकार की नजर में पत्रकार के मौत की कीमत बीस हजार!

लखनऊ। प्रदेश सरकार की नजर में ईमानदार पत्रकार की मौत का मुआवजा सिर्फ बीस हजार रुपए है। दुख, दर्द और अभावों में जीवनयापन कर रहीं दिवंगत मान्यता प्राप्त पत्रकार सुधीर कुमार लहरी की पत्नी निधि श्रीवास्तव ने जहां 20 हजार रुपए की आर्थिक सहायता अखिलेश यादव सरकार को वापस करके तगड़ा झटका दिया है वहीं पत्रकारों की गैरत को ललकारा है। उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति इस मुद्दे को लेकर जल्द मुख्यमंत्री से मिलकर पत्रकार कल्याण कोष गठित करने की मांग करेगी।

मालूम हो कि मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार सुधीर कुमार लहरी की 5 सितम्बर 2011 को लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया था। श्री लहरी कई बड़े समाचार पत्रों में संवाददाता रहे थे। ईमानदारी के कारण श्री लहरी का जीवन काफी अभावग्रस्त था। लेकिन श्री लहरी ने कभी भी अपनी ईमानदारी का सौदा नहीं किया। यही वजह रही कि श्री लहरी का निधन इलाज के अभाव में हो गया था। 21 मार्च 2013 को श्रीमती निधि श्रीवास्तव ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र लिखकर 20 हजार रुपए की आर्थिक सहायता दिए जाने पर सवाल उठाए हैं।

पत्र में श्रीमती निधि श्रीवास्तव ने लिखा है कि मेरी आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब होने के बावजूद अभी मेरा मान-सम्मान बाकी है। मैं एक सम्मानित मान्यता प्राप्त पत्रकार स्वर्गीय सुधीर कुमार लहरी की पत्नी हूं, मैं अपने पति और पत्रकार वर्ग का सम्मान करना जानती हूं। सरकार ने जो आर्थिक सहायता प्रदान की है, उससे कई गुना आर्थिक सहायता हमारे पत्रकार बंधुओं ने दी है। सरकार द्वारा दी गई बीस हजार रुपए की आर्थिक सहायता स्वीकार किए जाने से पत्रकार वर्ग को अपमानित करने जैसा है। सरकार द्वारा दी गई बीस हजार रुपए की आर्थिक सहायता का चेक संख्या 169064 वापस कर रही हूं।

9 जनवरी 2008 को स्वतंत्र भारत के स्थानीय सम्पादक अरविंद सिंह का कैंसर की बीमारी से निधन हो गया था। तत्कालीन मायावती सरकार ने श्री सिंह के परिजनों को पांच लाख रुपए दिए जाने की घोषणा की थी। श्री सिंह की पत्नी गीता सिंह ने तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती को पत्र लिखकर आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की गुहार लगाई थी। इसके बाद सरकार अपनी घोषणा से मुकरते हुए 1.30 लाख रुपए की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई थी। उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति की गुरुवार को हुई बैठक में दिवंगत पत्रकारों को कम आर्थिक सहायता दिए जाने का मुद्दा जोर-शोर से उठा। कई सदस्यों ने सरकार की संवेदनहीनता को आड़े हाथों लिया।

समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने कहा कि यह काफी दुखद हैं कि यूपी सरकार ने ईमानदार पत्रकार की कीमत मात्र बीस हजार रुपए आंकी है। बीस हजार रुपए की आर्थिक सहायता मीडिया का मजाक उड़ाने जैसा है। उन्होंने कहा कि समिति का एक प्रतिनिधि मण्डल जल्द मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलकर पत्रकार कल्याण कोष गठित करने की मांग करेगा।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (22) : प्रेस क्लब में खुला है अवैध रेस्‍टोरेंट, किराया चौकड़ी की झोली में!

प्रेस क्लब को एक पदाधिकारी ने अवैध रेस्टारेंट खुलवाने में अहम भूमिका निभाई। दलाली मोहल्ले का कोई दलाल अगर गलत कार्यों पर उतर आए तो भले ही खुद अनाधिकृत कब्जेदार हो, लेकिन उसने अपने ऐशोआराम के लिए यूपी प्रेस क्लब को ही किराए पर चलाना शुरू कर दिया। दलाली मोहल्ले के इसी दलाल और यूपी वर्किग जर्नलिस्ट यूनियन की चौकड़ी ने मिलकर प्रेस क्लब में लंबी-चौड़ी राशि पर लोगों को किराए पर रेस्टोरेंट दे रखा है।

क्लब के जरिए अपने साथ-साथ साथी बाराती को ऐश करने वाला कोई और नहीं बल्कि यही दलाली मोहल्ले वाले एक दलाल है। जिसकी कहानी ही प्रूफ रीडर से शुरू होकर रिपोर्टर आने पर समाप्त हो सकती है। अपनी बात को यह भले कई टुकड़ों में कहे लेकिन जब बात लेने की आ जाए तो जनाब सब कुछ एक ही हिचकी में डकारने का माद्दा रखते है। बरसों से प्रेस क्लब को दीमक की तरह चाटे हुए है। इतने दिन में शायद लकड़ी भी खत्म हो जाती है। लेकिन प्रेस क्लब की इतनी आमदनी है कि एक दलाल तो क्या कई दलाल लग जाए फिर भी क्लब की सेहत पर असर पडऩे वाला नहीं।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (21) : खामियों की खान है प्रेस क्लब, टायर्ड-रिटायर्ड लोगों की भरमार

: नए पत्रकारों के लिए बंद है प्रेस क्‍लब के दरवाजे : 9 नवंबर 1989 को प्रदेश सरकार ने रानी लक्ष्मीबाई मार्ग स्थित चाइना बाजार स्थित इस भवन को तीस वर्षों के लिए 8 लाख 78 हजार 460 के नजराने पर दिया था और सालाना 21961.30 पैसे सालाना लीज पर दिया था। 1968 में इस भवन का पट्टा यूपी वर्किग जर्नलिस्ट यूनियन के नाम पर दस वर्ष के लिए हुआ था। 1978 में यह पट्टा समाप्त हो गया। तीस साल बीत गए लेकिन इसका पट्टा बढ़वाने की कार्रवाई नहीं की गई। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इस पर लखनऊ विकास प्राधिकरण ने भी चुप्पी साध रखी है।

जानकार बताते है कि इस मामले में प्रीमियम के नाम पर जो 8 लाख 78 हजार 460 रुपए तय हुआ इस राशि का भुगतान सूचना विभाग से कर लिया गया, लेकिन इसे एलडीए में नहीं जमा किया। और इस राशि को लेकर बंदरबांट हुई। आज की स्थिति में खुद अनाधिकृत कब्जेदार होने के बावजूद प्रेस क्लब ने ओपेन एयर रेस्टोरेंट दे रखा है। यह सब एलडीए की देखरेख में हो रहा है। उसने स्वयं कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया। आज की तारीख में प्रेस क्लब का रजिस्ट्रेशन नहीं है। और वह पट्टेदारी नियमों का उल्लंघन कर रही हे। एलडीए ने अपने रिकार्ड में प्रेस क्लब के भवन को ऐतिहासिक धरोहर घोषित कर रखा है, और ऐतिहासिक इमारत में भी दुकानें किराए पर चल रही है।

सूची में टायर्ड और रिटायर्ड लोगों की भरमार : यूपी प्रेस क्लब में मेम्बरशिप को लेकर बड़ा घालमेल है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भले हर साल पुनरीक्षण होता हो लेकिन यहां की वोटर लिस्ट जो दशकों पहली बनी थी उसी के अनुसार चुनाव होता है और उन्हीं लोगों मताधिकार दिया जाता है। वोटर लिस्ट में काफी संख्या में ऐसे लोगों की भरमार है जो पत्रकारिता छोड़  चुके है, या फिर पूरी तरह से निष्क्रिय है। सूची में बड़ी टायर्ड और रिटायर्ड लोगो की जमात है।

नए सदस्यों को बनाए जाने के मुद्दे पर नियमावली को ऐसा जटिल किया गया है कि कोई लिखने पढऩे वाला पत्रकार प्रेस क्लब का मेम्बर हो ही नहीं सकता। यदि 200 सदस्यों की सूची का अवलोकन कर लिया जाए तो तस्वीर खुद ब खुद साफ हो जाएगी। मेम्बरशिप के नाम पर ऐसे लोगों को शामिल किया गया है जिनके पास पढऩे लिखने के अलावा हर काम है। लेकिन क्लब में जो भी पदाधिकारी बैठे हैं वे नहीं चाहते कि किसी नए पत्रकार को मेम्बर बनाया जाए। जो भी नए मेम्बर बनाए गए है उनमे से अधिकांश जेनुइन पत्रकार होने के बजाए झोला छाप डाक्टरों की तरह डायरी छाप पत्रकार है।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (20) : कुछ पत्रकारों की निजी जागीर बना यूपी प्रेस क्‍लब!

लखनऊ। बीते 57 सालों में यूपी की आबादी बढ़कर लगभग 22 करोड़ के करीब पहुंच गई है। भले ही केन्द्र और प्रदेश सरकारों के तमाम प्रयासों के बावजूद जनसंख्या नियंत्रण करने में असफल हो गए हों, लेकिन 57 साल पहले स्थापित यूपी प्रेस क्लब के सदस्यों की संख्या 200 से अधिक पार नहीं कर पाई है। यह अजब कारनामा यूपी प्रेस क्लब ने किया है।

केन्द्र और प्रदेश सरकारों को जनसंख्या नियंत्रण के लिए यूपी प्रेस क्लब से प्रेरणा लेनी चाहिए। यूपी प्रेस क्लब को निजी जागीर बनाने के कारनामों पर आईएफडब्ल्यूजे और वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र वाजपेयी ने पत्र लिखकर सवाल खड़े किए थे। इसके बावजूद अभी तक प्रेस क्लब की कार्यप्रणाली में कोई सुधार नहीं आया है।

उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब की स्थापना 18 नवम्बर 1956 को उत्तर प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के महासचिव रहे उपेन्द्र वाजपेयी और पायोनियर के पूर्व प्रधान सम्पादक एस.एन. घोष के प्रयासों से हुआ था। पत्रकारिता जगत के हस्ताक्षर माने जाने वाले तमाम पत्रकार यूपी प्रेस क्लब के अध्यक्ष पद पर सुशोभित हो चुके हैं। बीते एक दशक में यूपी प्रेस क्लब अपनी गरिमा खो चुका है।

यूपी प्रेस क्लब के सदस्यों की सूची पर नजर डालने से हैरत में पड़ जाने वाले तथ्य सामने आए हैं। प्रेस क्लब सदस्यों की सूची में अभी भी ऐसे नाम शुमार हैं, जो दिवंगत हो गए हैं और जिन्होंने पत्रकारिता को अलविदा कह दिया है। काफी संख्या में अन्य राज्यों में शिफ्ट हो गए हैं। कई महिला पत्रकार अब हाउस वाइफ की जिम्मेदारियों में रस-बस गई हैं। इन खामियों को कई वरिष्ठ और नवागत पत्रकारों ने उठाया है, लेकिन 57 साल से यूपी प्रेस क्लब के सदस्यों की सूची में कोई खास बदलाव नहीं आया है। नए पत्रकारों को प्रेस क्लब की सदस्यता किसी भी सूरत में नहीं मिलती है। इसको लेकर पत्रकारों में काफी रोष है।

आईएफडब्ल्यूजे के अध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार के. विक्रम राव ने प्रेस क्लब की कार्यप्रणाली पर 15 सितम्बर 2011 को प्रेस क्लब के अध्यक्ष रवीन्द्र कुमार सिंह और महामंत्री जोखू प्रसाद तिवारी को सम्बोधित एक पत्र लिखा था। जिसमें प्रेस क्लब के पदाधिकारियों द्वारा की जा रही तमाम वित्तीय अनियमितताओं का मुद्दा उठाया था। पत्र में कहा गया था कि कुछ स्वार्थी पत्रकार प्रेस क्लब को निजी जागीर बना लिया है।

यही वजह है कि प्रेस क्लब में नए सदस्यों का प्रवेश पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। इससे पूर्व यूपी प्रेस क्लब के महासचिव रहे वरिष्ठ और सम्मानित पत्रकार उपेन्द्र वाजपेयी ने 8 सितम्बर 2006 को तत्कालीन अध्यक्ष रामदत्त त्रिपाठी को पत्र लिखकर मांग की थी कि यूपी प्रेस क्लब सभी पत्रकारों के लिए खोला जाना चाहिए। उसकी अर्हता सिर्फ पत्रकार होना हो। इसके साथ ही प्रेस क्लब को बुराइयों से बचाने के लिए तमाम सुझाव दिए थे। जिनका प्रेस क्लब ने आज तक पालन नहीं किया।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (19) : कौन है निष्‍पक्ष प्रतिदिन का मालिक?

लखनऊ। राजधानी लखनऊ से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र निष्पक्ष प्रतिदिन का असल मालिक कौन है, यह यक्ष प्रश्न मीडिया और नौकरशाही को परेशान कर रहा है। आरटीआई के तहत मिली सूचनाओं से यह तथ्य प्रकाश में आए हैं कि निष्पक्ष प्रतिदिन समाचार पत्र का असल मालिक सहकारी समिति लखनऊ है। यह समाचार पत्र 2002 से लेकर 2007 तक बंद रहा। सरकारी दस्तावेजों में घोषित 420 और फ्राड पत्रकार जगदीश नारायण शुक्ल का अब इस समाचार पत्र पर अवैध कब्जा है।

उल्लेखनीय है कि बसपा के सदस्य डा. धर्मपाल सिंह द्वारा 28 मई 2012 को शुरू हुए विधान सभा के प्रथम सत्र में पहले सोमवार को पूछे गए सवाल के लिखित जवाब में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा था कि लखनऊ और सीतापुर से प्रकाशित दैनिक निष्पक्ष प्रतिदिन का प्रकाशन पूर्णतया अनियमित एवं अवैध है। उन्होंने बताया था कि हिन्दी दैनिक निष्पक्ष प्रतिदिन के कथित प्रकाशक, मुद्रक और सम्पादक जगदीश नारायण शुक्ल ने शासन को गुमराह कर धोखाधड़ी और जालसाजी करते हुए भ्रामक सूचनाओं एवं झूठे अभिलेखों के आधार पर विज्ञापन प्राप्त करने और शासन को राजस्व की हानि पहुंचाने के आरोप पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक लखनऊ से प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर 16 मार्च 2012 को हजरतगंज थाने में मु0अ0सं0 96/12 धारा 419/420/467/468 भादवि बनाम जगदीश नारायण शुक्ल के खिलाफ पंजीकृत कराया गया था।

मालूम हो कि लखनऊ के पूर्व जिलाधिकारी अनिल कुमार सागर ने 20 जनवरी 2012 को निष्पक्ष प्रतिदिन समाचार पत्र के मालिकाना हक को लेकर जगदीश नारायण शुक्ल द्वारा किए गए फर्जीवाड़े का संज्ञान लेते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया था। 6 फरवरी 2012 को निष्पक्ष प्रतिदिन के घोषणा पत्र को निरस्त करने की कार्रवाई की गई थी। इस समाचार पत्र को हथियाने के लिए कथित सम्पादक जगदीश नारायण शुक्ल ने तमाम फर्जीवाड़े किए हैं। आरएनआई में पहली बार निष्पक्ष प्रतिदिन समाचार पत्र का पंजीकरण 38852/82 सांध्‍य समाचार पत्र के रूप में किया गया था। इसका मुद्रण कार्यालय का पता गुंजनिका प्रिन्टर्स 289 चंद्रलोक कालोनी था। निष्पक्ष प्रतिदिन का प्रकाशन 2002 से लेकर 2007 तक बंद रहा। दुबारा इस समाचार पत्र को प्रकाशित करने के लिए दिए गए घोषणा पत्र में मुद्रण कार्यालय का पता टिन-टिन प्रिन्टेक प्राइवेट लिमिटेड सी-33 अमौसी इंडस्ट्रियल एरिया नादरगंज अंकित किया गया। 20 अक्टूबर  2010 को दिए गए घोषणा पत्र में मुद्रण स्थल का पता अवध प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड छठा मिल, सीतापुर रोड, कमलाबाद बढ़ौली दर्शाया गया।

इस घोषणा पत्र की सबसे खास बात यह रही कि सांध्य संस्करण को प्रात: संस्करण में बदलने की घोषणा की गई। प्रकाशक, मुद्रक द्वारा 12 अक्टूबर 2011 को फिर दिए गए घोषणा पत्र में निष्पक्ष प्रतिदिन का स्वामित्व जगदीश नारायन शुक्ला दर्शाया गया। डा. राम लखन गुप्ता ने 6 दिसम्बर 2010 को सूचना अधिनियम के तहत आरएनआई से मांगी गई सूचनाओं से स्पष्ट हो गया कि दुबारा प्रकाशन शुरू किए जाने की स्थिति में पंजीकरण संख्या में बदलाव हो जाएगा। घोषणा पत्र में किए गए कई बार बदलावों की जानकारी आरएनआई को नहीं दी गई। इन सब तथ्यों के आधार पर लखनऊ के पूर्व जिलाधिकारी अनिल कुमार सागर ने 20 जनवरी 2012 को निष्पक्ष प्रतिदिन समाचार पत्र घोषणा पत्र निरस्त कर दिया था। जिलाधिकारी के इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। जिस पर उच्च न्यायालय ने जिलाधिकारी के आदेश को निरस्त करते हुए निर्देशित किया था कि दो सप्ताह में याची के प्रत्यावेदन को व्यक्तिगत सुनवाई कर निस्तारण करें।

24 फरवरी 2012 को डिप्टी रजिस्ट्रार के पत्र साफ किया गया था कि 2007 से लेकर जनवरी 2012 के अंक नियमित जमा किए गए हैं। इसके साथ ही आरएनआई ने इस पत्र में मालिकाना हक की स्थिति साफ करने को कहा गया था। इसी पत्र को आधार मानकर जिलाधिकारी अनुराग यादव ने 20 जून 2012 को कुछ शर्तों के साथ निष्पक्ष प्रतिदिन के घोषणा पत्र को बहाल किया था। साथ ही आरएनआई द्वारा उठाई गई खामियों को तत्काल दूर कर अवगत कराने का निर्देश दिया गया था। दस माह बीत जाने के बावजूद अभी तक खामियां दूर नहीं की गई हैं।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (18) : शरत प्रधान और कमाल खान ने सम्‍पत्ति के लिए बनाया सिंडीकेट!

लखनऊ। चैनलों पर तमाम सेलेब्रिटी टाइप पत्रकारों को अक्सर अफसरों और नेताओं के भ्रष्टाचार पर नैतिकता का पाठ पढ़ाते और डिबेट करते हुए देखा होगा। लेकिन रियल लाइफ में उनसे कम नहीं हैं। लखनऊ के कुछ पत्रकारों को अकूत सम्पत्ति बनाने का जुनून है। करोड़ों रुपए की चल-अचल सम्पत्ति को हासिल करने के लिए कुछ पत्रकारों सिंडीकेट बनाकर योजनाबद्ध ढंग से मुहिम में लगे हुए हैं।

स्वतंत्र पत्रकार शरत प्रधान और एनडीटीवी के पत्रकार कमाल खान का आपसी कारोबारी गठजोड़ है। इस गठजोड़ का खुलासा मोहनलाल गंज के गांव गोपाल खेड़ा में स्वतंत्र पत्रकार शरत प्रधान और एनडीटीवी के पत्रकार कमाल खान द्वारा 12 दिसम्बर 2012 को 24,74,000 रुपए में खरीदी गई 0.8215 हेक्टेयर कृषि भूमि से होता है।

नियम-कानून को ताक पर रखकर एनडीटीवी के पत्रकार कमाल खान बी-28 बटलर पैलेस कालोनी और स्वतंत्र पत्रकार शरत चंद्र प्रधान बी-4 दिलकुशा सरकारी कालोनी में रह रहे हैं। इस गठजोड़ का असर एनडीटीवी चैनल पर अक्सर देखने को मिलता है। जहां स्वतंत्र पत्रकार शरत प्रधान चैनल पर नेताओं और अफसरों को अपने शब्द बाणों से भ्रष्ट साबित करने में तुले रहते हैं, उस वक्त अपने कारनामें नहीं याद आते हैं।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (17) : दिव्‍य संदेश ने खोला जगदीश नारायण शुक्‍ल के खिलाफ मोर्चा, बताया 420 पत्रकार

लखनऊ। ये दो कहावतें 'कौवा चला हंस की चाल' और 'नौ सौ चूहे खा के बिल्ली हज को चली' निष्पक्ष प्रतिदिन के तथाकथित सम्पादक जगदीश नारायण शुक्ल पर सटीक साबित होती है। तमाम नेताओं और अफसरों के खिलाफ अनर्गल खबरें छपवाकर अपने काले कारनामों से मीडिया को शार्मिंदा करने वाले यह सफेदपोश 420 पत्रकार करोड़ों रुपए की चल-अचल का मालिक बन गया है। पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी शशांक शेखर सिंह का करीबी होने के कारण इस 420 पत्रकार के खिलाफ ब्लैकमेलिंग और घपलों की तमाम शिकायतों के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।

मालूम हो कि जिस तरह पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी शशांक शेखर सिंह ने अपनी पूरी नौकरी बगैर कागजातों के करने का कारनामा अंजाम दिया। मौजूदा समय न तो नियुक्ति विभाग और न ही नागरिक उड्डयन विभाग के पास पूर्व कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह के सेवा अभिलेख मौजूद हैं। ठीक वैसे ही 420 पत्रकार जगदीश नारायण शुक्ल ने पग-पग पर सरकार को गुमराह करके ठगी की।
बसपा के सदस्य डा. धर्मपाल सिंह द्वारा 11 अप्रैल 2012 को शुरू हुए विधान सभा के प्रथम सत्र में पहले सोमवार को पूछे गए सवाल के लिखित जवाब में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा था कि लखनऊ और सीतापुर से प्रकाशित दैनिक निष्पक्ष प्रतिदिन का प्रकाशन पूर्णतया अनियमित एवं अवैध है।

मुख्यमंत्री अपने लिखित उत्तर में यह भी अवगत कराया है कि सहकारी समिति के संयुक्त निदेशक दिनेश कुमार शुक्ल ने 23 मार्च 2005 को दि लखनऊ सहकारी प्रेस लिमिटेड 289 चंद्रलोक कालोनी का निबंधन रद्द कर दिया था। 28 फरवरी 2012 को कार्रवाई के लिए संयुक्त निदेशक ने जिलाधिकारी लखनऊ को पत्र लिखा था। इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने यह भी कहा था कि हिन्दी दैनिक निष्पक्ष प्रतिदिन समाचार पत्र 2007 से अस्तित्व में नहीं है। इस समाचार पत्र के प्रकाशक, मुद्रक और सम्पादक जगदीश नारायण शुक्ल ने सरकार को गुमराह करते हुए वर्ष 2007 से लेकर अप्रैल 2011 तक सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के विज्ञापन मद से 30,50,844,15 लाख रुपए प्राप्त किया है। इसके अतिरिक्त श्री शुक्ला ने प्रदेश और भारत सरकार के अन्य विभागों रेलवे, डीएवीपी, पॉवर कारपोरेशन, आवास विकास, विकास प्राधिकरण व अन्य विज्ञापन मदों में धनराशि प्राप्त कर शासकीय धन की क्षति पहुंचाई है।

विज्ञापन के माध्यम से अवैध ढंग से प्राप्त की गई धनराशि की वसूली के लिए 14 मार्च 2012 को पावर कारपोरेशन, राजकीय निर्माण निगम, आयुक्त नगर विकास, पर्यटन विभाग, महाप्रंधक राष्ट्रीय राजमार्ग, लखनऊ विकास प्राधिकरण, मण्डी परिषद के अधिकारियों को पत्र लिखा गया है। हिन्दी दैनिक निष्पक्ष प्रतिदिन के कथित प्रकाशक, मुद्रक और सम्पादक जगदीश नारायण शुक्ल ने शासन को गुमराह कर धोखाधड़ी और जालसाजी करते हुए भ्रामक सूचनाओं एवं झूठे अभिलेखों के आधार पर विज्ञापन प्राप्त करने और शासन को राजस्व की हानि पहुंचाने के आरोप पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक लखनऊ से प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर 16 मार्च 2012 को हजरतगंज थाने में मु0अ0सं096/12 धारा 419/420/467/468 भादवि बनाम जगदीश नारायण शुक्ल के खिलाफ पंजीकृत कराया गया था। इसके अलावा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने लिखित जवाब में कहा है कि अवध प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड का भवन कमलाबाद, बढ़ौली छठवां मील सीतापुर रोड के बारे में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग ने 14 मार्च 2012 को लखनऊ के जिलाधिकारी को पत्र लिखकर 6 बिन्दुओं पर एक जांच रिपोर्ट मांगी थी।

इसके साथ ही 23 मार्च 2005 से निष्पक्ष प्रतिदिन समाचार पत्र बंदी के दौरान 420 पत्रकार जगदीश नारायण शुक्ल ने डीएवीपी से 14 लाख 74 हजार 50 रुपए का विज्ञापन लेकर धोखाधड़ी की है। इसके अलावा विज्ञापन लेने के लिए समाचार पत्र के प्रचार संख्या में भी हेरा-फेरी की है। नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी शशांक शेखर सिंह ने 420 पत्रकार जगदीश नारायण शुक्ल को करोड़ों रुपए का विज्ञापन और अन्य जरियों से काली कमाई करवाई। मौजूदा समय इस 420 पत्रकार की लखनऊ, इलाहाबाद, वारणासी, दिल्ली और उत्तराखण्ड में लगभग 50 करोड़ रुपए की चल-अचल सम्पत्ति है। उन्होंने कहा कि पूर्व कैबिनेट सचिव का खास होने के कारण न तो जिलाधिकारी अनुराग यादव और न ही सूचना निदेशक प्रभात मित्तल कोई कार्रवाई कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस 420 पत्रकार ने निष्पक्ष प्रतिदिन में कई अफसरों के खिलाफ फर्जी खबरें प्रकाशित करवाई हैं। जिनमें पूर्व पासपोर्ट अधिकारी जहूर जैदी, आईपीएस नवनीत सिकेरा, पूर्व आईएएस जय शंकर मिश्र, पूर्व मुख्य सचिव अनूप मिश्र, संजय अग्रवाल, नेतराम आदि तमाम अफसर हैं। इस इस 420 पत्रकार ने तमाम अफसरों, नेताओं, इंजीनियरों को ब्लैकमेल किया है। इनमें से कई अफसरों ने फर्जी खबरों को लेकर मानहानि का दावा भी ठोंक रखा है।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (16) : पत्रकार जगदीश नारायण शुक्‍ल के खिलाफ फर्जीवाड़े के कई मुकदमे

पत्रकार जगदीश नारायण शुक्ल का विवादों से गहरा नाता रहा है। नेताओं और अफसरों को भ्रष्ट बताने वाले ये महानुभाव पत्रकार के खिलाफ फर्जीवाड़े कई जगह मुकदमें चल रहे हैं। सिर्फ पत्रकारिता के सहारे नो प्रॉफिट, नो लॉस के फंडे के बल पर पत्रकार श्री शुक्ल को करोड़पति बनने का गौरव प्राप्त हुआ है। भ्रष्टाचार की खबरें प्रकाशित करवाकर और जनहित याचिका दाखिल कर नेताओं और आईएएस अफसरों को घुटने टिकवाने की कला के बल पर उस कहावत 'मेरा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं' को चरितार्थ कर दी है।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष डा. पीएल पुनिया ने कहा कि बीते दशक में पत्रकारिता में काफी बदलाव आया है। इस बदलाव के चलते पत्रकारिता कर रहे कुछ सफेदपोश पत्रकारों के कारनामों के कारण छवि धूमिल हुई है। उन्होंने कहा कि पत्रकार जगदीश नारायण शुक्ल नेताओं और अफसरों को कागजों पर भ्रष्ट बताने में पीछे नहीं हैं। लेकिन खुद इसमें अकंठ तक लिप्त हैं। इसका अंदाजा श्री शुक्ल की करोड़ों रुपए की चल-अचल सम्पत्ति से लगाया जा सकता है। लेकिन यह बड़ा दुर्भाग्य है कि भ्रष्ट पत्रकारों की जांच का ऐसा कोई मैकेनिज्म नहीं है, जिससे ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो सके।

राज्यसभा सांसद रहे वरिष्ठ पत्रकार राजनाथ सूर्य ने कहा कि अब मीडिया को अपनी छवि को लेकर सर्तक रहना होगा। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता में अब ऐसे-ऐसे लोग आ गए हैं, जिनका ध्येय पत्रकारिता नहीं बल्कि पैसा कमाना है। मीडिया को ऐसे पत्रकारों के कारनामों को भी उजागर करना चाहिए जो पत्रकारिता की छवि धूमिल कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारों को आह्वानित करते हुए कहा कि अपनी प्रतिष्ठा को बरकरार रखने के लिए ऐसे लोगों को चिन्हित कर एक्सपोज करें।

आईएएस बदल चटर्जी ने कहा कि पत्रकार जगदीश नारायण शुक्ल फर्जी खबरों के आधार पर अफसरों की छवि को धूमिल करते हैं। जो अफसर डर जाता है, वह कम्प्रोमाइज कर लेता है। हमारी इसी कमजोरी के कारण ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाती है। उन्होंने कहा कि सूचना विभाग में तैनाती के दौरान पत्रकार जगदीश नारायण शुक्ल के कई फर्जीवाड़े को पकड़ा और कार्रवाई की। इससे रुष्ट होकर मेरे खिलाफ फर्जी खबरें छपी हैं। जिसको लेकर कोर्ट में मानहानि का दावा किया है। एक आईएएस अफसर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि आईएएस अफसर जावेद उस्मानी, के. धनलक्ष्मी, जितेन्द्र कुमार, नेतराम, संजय अग्रवाल, चंचल तिवारी, अनिल सागर, अनूप मिश्र, आलोक रंजन, अनिल कुमार गुप्ता और बादल चटर्जी समेत तमाम अफसरों के खिलाफ खबरें छापकर दबाव बनाया। उन्होंने इस पत्रकार की कार्यप्रणाली को एक गिरगिट से तुलना करते हुए कहा कि लाभ के लिए कभी मायावती, कभी मुलायम सिंह यादव सरकार की सरकार की बखिया उखाड़ा जाता है।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (15) : निष्‍पक्ष प्रतिदिन के संपादक के आगे क्‍यों नतमस्‍तक है सरकार?

लखनऊ। क्या यूपी की अखिलेश यादव सरकार सफेदपोश पत्रकार जगदीश नारायण शुक्ल के आगे नतमस्तक हो गई हैं? यह सवाल मीडिया और नौकरशाही को बीते 11 माह से मथ रहा है। इस पत्रकार के फर्जीवाड़े के कारनामों की गूंज विधान सभा में गूंज चुकी है। विधान सभा में मुख्यमंत्री को इस भ्रष्ट पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई के लिए आश्वासन देना पड़ा। लगभग 11 माह बीत जाने के बाद लखनऊ के जिलाधिकारी ने अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है।

बसपा के सदस्य डा. धर्मपाल सिंह द्वारा 11 अप्रैल 2012 को शुरू हुए विधान सभा के प्रथम सत्र में पहले सोमवार को पूछे गए सवाल के लिखित जवाब में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा था कि लखनऊ और सीतापुर से प्रकाशित दैनिक निष्पक्ष प्रतिदिन का प्रकाशन पूर्णतया अनियमित एवं अवैध है। मुख्यमंत्री अपने लिखित उत्तर में यह भी अवगत कराया है कि सहकारी समिति के संयुक्त निदेशक दिनेश कुमार शुक्ल ने 23 मार्च 2095 को दि लखनऊ सहकारी प्रेस लिमिटेड 289 चंद्रलोक कालोनी का निबंधन रद्द कर दिया था। 28 फरवरी 2012 को कार्रवाई के लिए संयुक्त निदेशक ने जिलाधिकारी लखनऊ को पत्र लिखा था।

इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने यह भी कहा था कि हिन्दी दैनिक निष्पक्ष प्रतिदिन समाचार पत्र 2007 से अस्तित्व में नहीं है। इस समाचार पत्र के प्रकाशक, मुद्रक और सम्पादक जगदीश नारायण शुक्ल ने सरकार को गुमराह करते हुए वर्ष 2007 से लेकर अप्रैल 2011 तक सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के विज्ञापन मद से 30,50,844,15 लाख रुपए प्राप्त किया है। इसके अतिरिक्त श्री शुक्ला ने प्रदेश और भारत सरकार के अन्य विभागों रेलवे, डीएवीपी, पॉवर कारपोरेशन, आवास विकास, विकास प्राधिकरण व अन्य विज्ञापन मदों में धनराशि प्राप्त कर शासकीय धन की क्षति पहुंचाई है। विज्ञापन के माध्यम से अवैध ढंग से प्राप्त की गई धनराशि की वसूली के लिए 14 मार्च 2012 को पावर कारपोरेशन, राजकीय निर्माण निगम, आयुक्त नगर विकास, पर्यटन विभाग, महाप्रंधक राष्ट्रीय राजमार्ग, लखनऊ विकास प्राधिकरण, मण्डी परिषद के अधिकारियों को पत्र लिखा गया है।

हिन्दी दैनिक निष्पक्ष प्रतिदिन के कथित प्रकाशक, मुद्रक और सम्पादक जगदीश नारायण शुक्ल ने शासन को गुमराह कर धोखाधड़ी और जालसाजी करते हुए भ्रामक सूचनाओं एवं झूठे अभिलेखों के आधार पर विज्ञापन प्राप्त करने और शासन को राजस्व की हानि पहुंचाने के आरोप पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक लखनऊ से प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर 16 मार्च 2012 को हजरतगंज थाने में मु0अ0सं096/12 धारा 419/420/467/468 भादवि बनाम जगदीश नारायण शुक्ल के खिलाफ पंजीकृत कराया गया था। इसके अलावा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने लिखित जवाब में कहा है कि  अवध प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड का भवन कमलाबाद, बढ़ौली छठवां मील सीतापुर रोड के बारे में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग ने 14 मार्च 2012 को लखनऊ के जिलाधिकारी को पत्र लिखकर 6 बिन्दुओं पर एक जांच रिपोर्ट मांगी थी।

बसपा के सदस्य डा. धर्मपाल सिंह ने कहा कि सरकार ने सदन में कार्रवाई का आश्वासन देकर 11 माह का समय बीत जाने के बाद भी अभी तक कुछ नहीं किया है। आरएनआई द्वारा 24 फरवरी 2012 को लिखे गए पत्र का हवाला देते हुए जिलाधिकारी अनुराग यादव ने 20 जून 2012 को इस शर्त पर निष्पक्ष प्रतिदिन का टाइटिल बहाल कर दिया कि तत्काल आरएनआई द्वारा इंगित की गई कमियों को निराकरण कर अवगत कराएंगे। लखनऊ के जिलाधिकारी अनुराग यादव ने इस संबंध में कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्त करने से मना कर दिया। सूत्रों का कहना है कि जिलाधिकारी ने इस टाइटिल को एक 'बड़े मंत्री' के कहने पर बहाल किया है। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के निदेशक प्रभात मित्तल से सम्पर्क किए जाने पर प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई।

पत्रकार जगदीश नारायण शुक्ल करोड़ों रुपए की चल-अचल सम्पत्ति के मालिक हैं। यह खुलासा 18 जनवरी 2012 को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के टिकट पर सेउता विधान सभा सीट से चुनाव लडऩे के लिए निर्वाचन आयोग को दिए गए हलफनामे से हुआ है। इसके तहत वित्त वर्ष 2011-12 में श्री शुक्ल और उनकी पत्नी ने 5,20,078 रुपए का आयकर दाखिल किया है। श्री शुक्ल और उनकी पत्नी ने 200 ग्राम सोना जिसका मूल्य लगभग 5,60,000 और चांदी आधा किलो जिसका मूल्य 30,000 दर्शाया गया है। 2006 में श्री शुक्ल ने कमलाबाद, बढ़ौली छठवां मील सीतापुर रोड पर 7.50 एकड़ कृषि भूमि और 60,000 वर्ग फीट का आवास 2,48,000 रुपए में खरीदने का उल्लेख किया गया है। 1989 में अलीगंज चंद्रलोक कालोनी में आवास संख्या 289 और 2008 में नोएडा में सुपरटेक हाउसिंग इंदिरा पुरम में क्रमश: 26,000 और 52,00,000 में खरीदे गए हैं। इस तरह श्री शुक्ल ने कुल 6 करोड़ 84 लाख रुपए की घोषित की है। इससे आप सहज अंदाजा लगा सकते हैं कि कुछ लोगों के लिए पत्रकारिता एक सबसे कमाऊ पेशा बन गया है।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (14) : नाम का रोजगार, पर करोड़पति शरद प्रधान!

मन मैला, तन ऊजरा, भाषण लच्छेदार,
ऊपर सत्याचार है, भीतर भ्रष्टाचार।
झूठों के घर पंडित बांचें, कथा सत्य भगवान की,
जय बोलो बेईमान की!

प्रजातंत्र के पेड़ पर, कौआ करें किलोल,
टेप-रिकार्डर में भरे, चमगादड़ के बोल।
नित्य नई योजना बन रहीं, जन-जन के कल्याण की,
जय बोलो बेईमान की!

प्रसिद्ध कवि काका हाथरसी की यह कविता सूबे के वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान पर सटीक साबित होती हैं। नेशनल हेरल्ड समाचार पत्र से अपने कैरियर शुरू करने वाले ये पत्रकार महानुभाव भले ही अपनी कलम से कोई खास कारनामा न कर पाए हो, लेकिन जनहित याचिका के माध्यम से भ्रष्टाचार के आरोप में यूपी के दो पूर्व मुख्य सचिवों की कुर्सी से बेदखल कराने की उपलब्धि जरूर हासिल की है। लेकिन नौकरशाही के भ्रष्टाचार को उजागर करते-करते उसी दलदल में फंस गए हैं। अपनी पहुंच और प्रभाव के बल पर जहां झूठे हलफनामों के सहारे सरकारी आवास का लुत्फ उठा रहे हैं वहीं लखनऊ विकास प्राधिकरण की कई योजनाओं में प्लॉट लेकर अकूत अचल सम्पत्ति के मलिक बन गए हैं।

उल्लेखनीय है कि यूपी के पूर्व मुख्य सचिव अखण्ड प्रताप सिंह और नीरा यादव पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा जनहित याचिका करने से सुर्खियों में आए वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान का विवादों से गहरा नाता रहा है। श्री प्रधान का 24 शंकर नगर लखनऊ में पैतृक आवास है। मौजूदा समय श्री प्रधान सरकारी कालोनी दिलकुशा के आवास संख्या बी-4 में रह रहे हैं। लखनऊ विकास प्राधिकरण के रिकार्ड के मुताबिक पत्रकार कोटे के तहत अलीगंज में आवासीय योजना के तहत सीपी-19 आवास शरद चंद्र प्रधान के नाम से आवंटित है। गोमती नगर के विजय खण्ड में प्लाट संख्या 3/13 शरत सी. प्रधान के नाम से आवंटित है। गोमती नगर में ही विनीत खण्ड में 5/185 प्लाट कामिनी प्रधान के नाम पर आवंटित है। लखनऊ विकास प्राधिकरण ने 30 मार्च 1988 को कानपुर रोड योजना के तहत एक दुकान शरत सी. प्रधान के नाम से आवंटित है। गोमती नगर के विशेष खण्ड में बी- 2/163 शरत सी. प्रधान के नाम से आवंटित है। पत्रकार शरत प्रधान ने अपने पुत्र कुनाल प्रधान के नाम से गोमती नगर के वास्तु खण्ड में प्लॉट संख्या 3/793 आवंटित करवाया है। इस प्लॉट के आवंटन के लिए श्री कुनाल ने अपना पता बी-63 आदिति अर्पाटमेंट नई दिल्ली दर्शाया है।

इन अचल सम्पत्तियों से वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान की कार्यप्रणाली का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। श्री प्रधान ने इन सम्पत्तियों को हासिल करने के लिए कई बार अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर जहां मनचाहा भूखण्ड प्राप्त किया वहीं ब्याज को भी माफ करवाया। श्री प्रधान ने इन सम्पत्तियों को हासिल करने के लिए तमाम नियमों को ताक पर रखकर झूठे हलफनामें दिए हैं। सबसे खास बात यह है कि अगर आपके पास कोई नौकरी नहीं है और करोड़पति बनना चाहते हैं तो इस विधा का प्रशिक्षण इन महानुभव पत्रकार से ले सकते हैं। इन महानुभव पत्रकार के पास कोई स्थाई नौकरी न होने के बावजूद करोड़ों रुपए की चल-अचल सम्पत्ति बनाने की अजब पैटर्न तैयार किया है। जिससे करोड़पति आसानी से बना जा सकता है। तमाम पत्रकारों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि शरत प्रधान की अनैतिक कार्यप्रणाली से पत्रकारिता की छवि धूमिल हुई है। इन पत्रकारों का मानना है कि जब आईएएस अफसर, वकील और नेताओं के भ्रष्टाचार को लेकर उनके संगठन या सहयोगी दागियों को चिन्हित करने का अभियान चला सकते हैं तो पत्रकार संगठनों को भी अपने बीच इस तरह के पत्रकारों को चिहिंत करने का अभियान चलाया जाना चाहिए। जिससे पत्रकारिता की गरिमा को बरकरार रखा जा सके।

2005 में मुख्यमंत्री के पूर्व सचिव चंद्रमा प्रसाद यादव और लखनऊ विकास प्राधिकरण के तत्कालीन उपाध्यक्ष बी.बी. सिंह ने एक प्रेसवार्ता कर सब्सिडी से प्लॉट लेने वाले पत्रकारों के नामों का खुलासा किया था। इस प्रेसवार्ता में शरद प्रधान और उनकी पत्नी व पुत्र के नाम से चार प्लॉट के बारे में बताया गया था। मौजूदा समय दिलकुशा के आवास संख्या बी-4 में सरकारी आवास में रह रहे हैं वहां पर मीडिया टेक के नाम से एक कम्पनी भी चल रही है। यह कम्पनी होर्डिग्स बैनर का काम कर रही है। श्री प्रधान ने अपने सरकारी आवास की पहली मंजिल पर राज्य सम्पत्ति विभाग की अनुमति के बगैर एक कमरे का निर्माण करवाया लिया गया है। कई पत्रकारों ने बताया कि आईएएस विजय शंकर पाण्डेय के इशारे पर पूर्व मुख्य सचिव अखण्ड प्रताप सिंह और नीरा यादव के खिलाफ जनहित याचिका की थी।

समाचार पत्र समाजवाद का उदय के वरिष्ठ संवाददाता प्रभात त्रिपाठी ने कहा कि जिन पत्रकारों ने सरकार से सब्सिडी पर आवास या भूखण्ड ले, उन पत्रकारों को सरकारी आवास छोड़ देने चाहिए। उन्होंने कहा कि कई पत्रकारों के भ्रष्ट आचरण की वजह से पत्रकारिता का स्तर दिनों-दिन गिरता जा रहा है। आईएफडब्ल्यूजे के अध्यक्ष के. विक्रम राव ने कहा कि पत्रकारों के भ्रष्ट कारनामों की जांच सरकार करें। उन्होंने कहा कि एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से हजरतगंज में कराए गए सौंदर्यीकरण घोटाले में कुछ पत्रकारों की भूमिका पाई गई थी। उन्होंने मुख्यमंत्री से इस मामले की जांच की मांग की थी। श्री राव ने कहा कि पत्रकारिता में ऐसे-ऐसे लोगों का आगमन हो गया है, जिनका पत्रकारिता से दूर-दूर तक नाता नहीं है, वे केवल दलाली के लिए इस पेशे में आ गए हैं। इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान से सम्पर्क किए जाने पर प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (13) : विधानसभा में चंपूगिरी करके जमाते हैं धाक

विधानसभा के जितनी संख्या विधायकों की है, उससे कुछ ही कम संख्या प्रेस दीर्घा में बैठने वाले मीडिया कर्मियों की है। जिस हिसाब से थोक के भाव में मीडियाकर्मियों को प्रेस दीर्घा के पास निर्गत किए गए उसके चलते अब विधानसभा की ऊपर नीचे दो दीर्घाएं इतनी हाउसफुल है कि अब पत्रकार तीसरी दीर्घा की ओर लोग बढऩे लगे है। प्रेसदीर्घा के पास निर्गत करने का कोई मापदंड नहीं है। जिले से लेकर तहसील और मंडल स्तर तक के मान्यता प्राप्त पत्रकारों को सत्र कवरेज के पास निर्गत हुए हैं। ऐसे लोगों के पास निर्गत करने की सिफारिश करने वालों में अपने ही बीच के लोग है।

प्रेस दीर्घा में बैठने वाले मीडियाकर्मियों की दिलचस्पी समाचार संकलन से ज्यादा इस बात की ज्यादा रहती है कि वे जिस दिन किसी मंत्री विधायक की चंपूगिरी करते हैं, वह उन्हें प्रेस दीर्घा में बैठा देख ले। यही नहीं सदन स्थगित होने या फिर विधायकों मंत्रियों के टंडन हाल या कैफेटेरिया में जाने पर यह चंपू टाइप के पत्रकार उनके पीछे तब तक लगे रहते हैं, जब तक उनसे भरपेट खाना या नाश्ता नहीं पा जाते। कुछ तो इनसे भी बढ़कर है कि जब सदन में जब मुख्यमंत्री उठने की मुद्रा में होते हैं, उससे पहले ही कार्यकर्ता से पत्रकार बने लोग विधानसभाध्यक्ष के कक्ष के बाहर मंडराने लगते हैं और मुख्यमंत्री के बाहर निकलते ही सुरक्षाकर्मियों के धकियाने के बाद भी मुख्यमंत्री तक पहुंचने, उन्हें अपना चेहरा दिखाने की हर कोशिश करते हैं।

व्यस्तता के बीच यदि मुख्यमंत्री ऐसे किसी पत्रकार की ओर मुखातिब हो जाएं तो उसे मानो मुंह मांगी मुराद मिल जाती है। मंत्रियों की चंपूगीरी करने वाले पत्रकारों में बहुतायत उन पत्रकारों की है जो पत्रकार बनने से पहले पार्टी वर्कर थे। नेतागिरी में दाल नहीं गली तो डायरी और सचिवालय और सत्र का पास बनवाकर पत्रकार गए। ऐसे पत्रकारों में कई महिला पत्रकार भी शामिल हैं। हालांकि मंत्री विधायकों की चंपूगिरी करने का यह फंडा कार्यकर्ता से पत्रकार बने इन लोगों को अपने वरिष्ठों से ही मिला है। एनेक्सी से लेकर सीएम आवास तक चेहरा दिखाने की होड़ और सबसे बेहतर अपने को साबित करने में सभी एक दूसरे की कमियां बताकर अपना नंबर बढ़वाने में लगे रहते हैं।

सत्र के दौरान पत्रकारों की आई बाढ़ का कारण ही है वास्तविक पत्रकारों को पटल कार्यालय से मिलने वाली सामग्री मिल नहीं पाती। फट्टेबाज टाइप के कार्यकर्ता से पत्रकार बने लोग साहित्य के नाम पर रद्दी बटोरने पहले ही पहुंच जाते है। बात यहीं तक खत्म होती तो ठीक था। सत्र के दौरान प्रेस दीर्घा का पास बनवाने लोगों में वे लोग भी शामिल है, जो सरकार से लाभ का पद पाने की प्रत्याशा में लगे हुए है। प्रिंट मीडिया की तरह से गली मोहल्लों में चलने वाले केबिलों के लोग भी हल्का फुल्का कैमरा लेकर टंडन हाल में मंडराया करते हैं। कैमरा नेताओं की कमजोरी के कारण ही आठवां पास या फिर हाईस्कूल फेल लोग प्रेस दीर्घा से लेकर कैफेटेरिया तक अपना रूतबा गालिब करते देखे जा सकते हैं। जिलों के कुछ पत्रकार भी प्रेस दीर्घा का पास बनवाकर अपने जिलों के मंत्रियों से सदन के बाहर पिछलग्गू बने घूमते हैं। प्रेस दीर्घा में बैठने वाले कुछ की जहां अपराधिक पृष्ठभूमि के हैं तो कुछ ऐसे भी हैं, जो नेताओं और अफसरों की मौज मस्ती का सामान जुटाने के आपूर्तिकर्ता भी है।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (12) : सरकारी आवास में मजा, निजी आवास में कारोबार

अपने पेशे के प्रति कम और राजनीतिक दलों के साथ अधिक निष्ठा दिखाई है यूपी के कई नामचीन पत्रकारों ने, इस कला को मीडिया और जनता ने भी देखा है। यूएनआई में कभी पत्रकार रहे एक महाशय शुरुआती समय सपा के कई नेताओं के करीबी रहे। लेकिन सपा में इन पत्रकार महोदय का मिशन नहीं पूरा हो पाया। लेकिन गोमती नगर के विराज खण्ड में 1/61 सब्सिडी प्लाट प्राप्त करने में जरूर सफलता हासिल की। इन्होंने बीते एक दशक के अंदर अपनी निष्ठा में बदलाव करते हुए बसपा सुप्रीमो पर एक किताब लिख डाली।

इस किताब के बल पर इन पत्रकार महोदय को 2007 में बनी बसपा सरकार में मीडिया सलाहकार का पद प्राप्त हुआ। बसपा सरकार के कार्यकाल के दौरान कार्यकर्ता बने यह पत्रकार महोदय मीडिया को हेय की दृष्टि से देखते रहे। इस दौरान अपने प्रभाव के बल पर जमकर अवैध धन की उगाही की। गोमती नगर के अतिरिक्त नोएडा में भी प्लाट हासिल किए हैं। मौजूदा समय इन पत्रकार महोदय की माली हालत करोड़पति की है। इन पत्रकार महोदय का जोड़तोड़ का कारनामा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अपनी अल्प शिक्षित श्रीमती को सूचना आयुक्त जैसे महत्वपूर्ण पद पर तैनात करवाने में कामयाब रहे। सरकार भले ही नहीं है, लेकिन ठसका अभी भी उसी तरह से बरकरार है।

सूबे के सबसे अधिक प्रसार संख्या वाले से लेकर सबसे अधिक विवादित समाचार पत्र के सम्पादक रहे पत्रकार के कारनामों से मीडिया अच्छी तरह से परिचित हैं। लेकिन इन पत्रकार महोदय ने राजनीतिक दल के प्रति निष्ठा के एवज में सूचना आयुक्त का पद हासिल कर लिया। पांच साल तक इस पद पर बने रहने के दौरान सपा-बसपा के नेताओं को अपनी कीमती सलाह से गुमराह करते रहे। सूचना आयुक्त पद से रिटायर होने के बाद अब उनकी सलाह किसी भी राजनीतिक दल को रास नहीं आ रही है। इस लिए दुबारा पत्रकार बनने की कसरत कर रहे हैं। राजनीतिक दल और मीडिया ने इन पत्रकार महोदय का असल चेहरा देखकर अपनी दूरी बनाए रखी है।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (11) : झूठे हलफनामे के सहारे सरकारी आवासों में जमें हैं कई पत्रकार

लखनऊ। एक अनार सौ बीमार। यह कहावत पत्रकारों पर सटिक साबित हो रही है। सरकारी आवास पाने की आकांक्षा वाले पत्रकारों की लम्बी फेहरिस्त है। लेकिन राज्य सम्पत्ति विभाग की लापरवाही और सफेदपोश क्रीमीलेयर पत्रकारों की सरकारी आवासों पर अघोषित कब्जे की वजह से वास्तविक पत्रकार मारे-मारे घूम रहे हैं। जबकि सफेदपोश क्रीमीलेयर पत्रकारों ने सरकार से गोमती नगर में सब्सिडी प्लाट और आवास लेने के बाद कारोबार कर रहे हैं।

9 नवम्बर 2012 को पत्रकारों के आवास आवंटन और नवीनकरण के लिए प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री राकेश गर्ग और सचिव मुख्यमंत्री अनीता सिंह की अध्यक्षता में हुई राज्य सम्पत्ति विभाग की बैठक में तमाम निर्णय हुए। बैठक में 44 पत्रकारों के आवास आवंटन पर चर्चा हुई, जिन मान्यता प्राप्त पत्रकारों के आवास आबंटन का नवीनीकरण नहीं हुआ है, वे दुबारा प्रार्थना पत्र दें। गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों को नोटिस देकर आवास खाली कराएं। मुख्यालय से बाहर स्थानांतरित पत्रकारों के आवास निरस्तीकरण किया जाए। जिन पत्रकारों का निधन हो गया है, उनके आश्रितों में यदि कोई मान्यता प्राप्त पत्रकार है, तो उनको छोड़कर सभी के आवास निरस्त करने के साथ ही सख्ती से खाली कराया जाए। चार माह बीत जाने के बावजूद राज्य सम्पत्ति विभाग ने इनमें से अधिकतर निर्णयों को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि सरकारी आवास पाने के लिए तमाम पत्रकारों ने झूठे हलफनामें दायर कर दिए हैं कि उनके पास निजी आवास नहीं हैं।

राज्य सम्पत्ति विभाग ने इन बातों को नजरअंदाज करते हुए दैनिक आज के चीफ रिर्पोटर सुरेश यादव को विधायक निवास ए-94 एक वर्ष के लिए आवंटित किया है। जबकि उन्‍होंने सरकार से पत्रकार कोटे के तहत गोमती नगर के विराज खण्ड में प्लाट संख्या डी 1/85 आवंटित करवा रखा है। राज्य सम्पत्ति विभाग ने सहारा चैनल के आलोक गुप्ता का एक वर्ष के लिए पार्क रोड स्थित आवास संख्या सी-9 नवीनीकरण किया गया है। उर्दू दैनिक सियासत जदीद के ब्यूरो चीफ मोहम्मद शब्बीर, एमएच वन चैनल के ब्यूरो चीफ प्रदीप विश्वकर्मा को 1/4 कैसरबाग कालोनी, सलार ए आवाज के संवाददाता नवाब सिद्दीकी बी-51 विधायक निवास, राष्ट्रीय स्वरूप के संवाददाता रहे शिवशरण सिंह का एमआईजी -27 अलीगंज, राष्ट्रीय सहारा के फोटोग्राफर दीपचंद गुप्ता का 1203 लाप्लास, सरदार टाइम्स के अफताब अहमद खां का विधायक आवास संख्या 2, दैनिक वारिस ए अवध के इफित्तदा भट्टी का आवास संख्या 45 विधायक निवास, वारिए ए अवध के लाल बहादुर सिंह का आवास 38, दैनिक सवेरा के सम्पादक कुमदेश चन्द्र का एक वर्ष के लिए नियमितीकरण किया गया है।

जबकि रोजनामा शफीर ए नव के संवाददाता अबरार अहमद फारूखी, टाइम्स ऑफ इंडिया की संवाददाता शैलवी शारदा से आवास खाली कराए जाने की संस्तुति की गई है। इसके साथ ही दैनिक सुल्तान ए अवध के सम्पादक जितेन्द्र सिंह, सियासत जदीद के सम्पादक मोहम्मद इरशाद इल्मी, दैनिक जागरण के सम्पादक रहे शशांक शेखर त्रिपाठी, उद्यमी राजधानी टाइम्स की सम्पादक प्रतिभा सिंह, सहारा न्यूज के प्रदेश प्रभारी पवन मिश्रा और वारिस ए अवध के सम्पादक आफिस बर्नी आवेदन पत्रों पर संशय होने के कारण यह निर्णय लिया गया कि सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग इस बात की पुष्टि करके बताए कि जिस संस्थान का हवाला दिया गया है कि उसमें कार्यरत हैं कि नहीं।

राज्य सम्पत्ति विभाग ने तमाम मान्यता प्राप्त पत्रकारों के प्रार्थना पत्र को खारिज किया है। जिसमें खोज इंडिया के ब्यूरो चीफ अभिलाष भट्ट, इंडिया टुडे के मनीष अग्निहोत्री, सहारा समय के राजेश सिंह, वरिष्ठ पत्रकार बृजेन्द्र सिंह सेंगर, एक्सप्रेस मीडिया सर्विस के जितेन्द्र शुक्ला, पीटीआई के संवाददाता अभिनव पाण्डेय, वीक एंड टाइम्स के संजय शर्मा, स्वतंत्र चेतना के उमेश चंद्र मिश्रा, दैनिक त्रिगुट के रजा रिजवी, इंडिया इनसाइट के शेखर श्रीवास्तव, साधना न्यूज चैनल के अनुराग शुक्ला, सहारा समय के संजीव सिंह, राहत टाइम्स के अजय शुक्ला, दैनिक सहाफत की संवाददाता श्रीमती सुमन हुसैन, लोहिया क्रांति के अरूण कुमार त्रिपाठी, राहत टाइम्स के अमित सक्सेना, साप्ताहिक मधुपाल टाइम्स की श्रीमती कुमकुम गुप्ता, लोक प्रिय इंडियन न्यूज के सम्पादक मोहम्मद जुबैर अहमद, राष्‍ट्रीय सहारा के राकेश कुमार सिंह, उपभोक्ता की दुनिया के शारदा प्रसाद पाठक, निषाद चेतना के सम्पादक जे.आर. निषाद, कमल समाचार पत्र के सम्पादक सुधीर कुमार सिंह, अवल्ल न्यूज के मोहम्मद वसीम, चर्चित राजनीति के संवाददाता संजय कुमार शर्मा, हिन्दी मीडिया सेंटर के सचिव सत्य प्रकाश सिंह, वारिस टाइम्स के एम.ए. वारसी और दैनिक किरण कमल के सम्पादक सुधीर कुमार सिंह हैं। राज्य सम्पत्ति विभाग ने प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री राकेश गर्ग की अध्यक्षता वाली बैठक के तमाम निर्णयों को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।

इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार रजनीकांत वशिष्ठï ने कहा कि कुछ सफेदपोश पत्रकारों की वजह से पत्रकारिता में काफी गिरावट आई है। पूर्व में यह व्यवस्था थी कि जिन पत्रकारों के पास आवास नहीं होते थे, सरकार उनको सरकारी आवास उपलब्ध करा देते थे। इनमें से कई पत्रकारों ने गलत परम्परा डाल दी है। सरकार से सरकारी प्लाट और आवास लेने के बाद भी सरकारी आवासों पर कब्जा किए बैठे हैं। ऐसे लोगों को तत्काल सरकारी आवास खाली कर देने चाहिए। जिससे जरूरतमंद पत्रकारों को आवास मिल सके। जरूरतमंद पत्रकारों की लम्बी फेहरिस्त है। पत्रकारों के गलत आचरण की वजह से अब सरकार सिर्फ एक वर्ष के लिए आवास आवंटित करती है। मायाजाल में जकड़े कुछ पत्रकारों ने पत्रकारिता के साथ विश्वासघात तो किया ही, लेकिन राजनीतिक लाभ पाने के लिए अपनी निष्ठा, ईमान को दांव पर रखकर गिरगिट की तरह रंग बदला। ऐसे कई पत्रकार राजनीतिक दलों के चिहिन्त कार्यकर्ता बनने की उपलब्धि भी हासिल की। इसी उपलब्धि को नौकरशाही पर बेजा इस्तेमाल कर अकूत सम्पत्ति बनाई है।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (10) : देखिए सरकार से सस्‍ते दर पर प्‍लाट पाने वाले पत्रकारों की लिस्‍ट

लखनऊ में पत्रकारिता करने वाले सैकड़ों लोगों को यूपी सरकार पत्रकार कोटे से सस्‍ते दर पर प्‍लाट उपलब्‍ध करा चुकी है. तमाम पत्रकार इन प्‍लाटों पर निर्माण भी करा चुके हैं. इसके बावजूद ज्‍यादा पत्रकार अपने प्‍लाटों पर बनाए गए भवनों को किराए पर देकर सस्‍ते दर पर सरकारी आवासों में रह रहे हैं. कई लोग तो गलत हलफनामा देकर सरकारी आवासों में नियम विरुद्ध निवास कर रहे हैं. मामला पत्रकारों से जुड़ा होने के चलते सरकारी अधिकारी भी इसमें ज्‍यादा खोजबीन नहीं करते.

इस कारण से तमाम पत्रकार अपने निजी आवास होते हुए भी सरकारी आवासों में कब्‍जा जमाए बैठे हैं. नीचे लखनऊ के कुछ ऐसे पत्रकारों की सूची जो सरकार से सस्‍ते दर पर प्‍लाट पा चुके हैं. इनमें से कई तो प्‍लाट मिलने के बावजूद सरकारी आवासों में कब्‍जा जमाए हुए हैं. नीचे गोमती नगर में पत्रकार कोटे से लाभान्वित पत्रकार.

पत्रकार का नाम                                प्लॉट संख्या

अखिलेश कुमार गौरव                       1/24 विराज खण्ड
सैयद कौसर हुसैन                            1/36 विराज खण्ड
मधुसूदन त्रिपाठी                              1/46 विराज खण्ड
संगीता बकाया                                 1/33 विराज खण्ड
मुन्ने बख्शी                                    1/41 विराज खण्ड
इंदु रस्तोगी                                     1/2 विराज खण्ड
जमील अख्तर                                 1/64 विराज खण्ड
अनुपमा एस. मनी                             1/67 विराज खण्ड
प्रदीप कुमार उपाध्याय                        1/74 विराज खण्ड
अशुतोष पंत                                     1/35 विराज खण्ड
राकेश कुमार गुप्ता                             1/82 विराज खण्ड
उदय एस. सिन्हा                                1/71 विराज खण्ड
आदित्य कुमार शुक्ला                          1/7 विराज खण्ड
मधुलिका सिंह                                   1/59 विराज खण्ड
सरिता सिंह                                       1/84 विराज खण्ड
विनय कृष्ण रस्तोगी                            1/8 विराज खण्ड
रामअनुज सिंह                                   1/77 विराज खण्ड
राजीव त्रिपाठी                                    1/49 विराज खण्ड
सद्गुरू शरण                                     1/70 विराज खण्ड
सुरेन्द्र दुबे                                         1/15 विराज खण्ड
नथुनी यादव                                      1/6 विराज खण्ड
अरूण श्रीवास्तव                                 1/42 विराज खण्ड
उपेन्द्र पाण्डेय                                    1/4 विराज खण्ड
विकांत शाही                                      1/16 विराज खण्ड
मुकेश कुमार हजेला                             1/51 विराज खण्ड
घनश्याम यादव                                  1/17 विराज खण्ड
संतोष सुरज                                      1/20 विराज खण्ड
इजहारूल हक                                    1/79 विराज खण्ड
रिपुदमन सिंह                                    1/13 विराज खण्ड
रामशरण अवस्थी                               1/21 विराज खण्ड
नाहिद फरजाना                                  1/78 विराज खण्ड
राजेश नारायण सिंह                            1/60 विराज खण्ड
राकेश पाण्डेय                                    1/76 विराज खण्ड
अशोक कुमार श्रीवास्तव                       1/45 विराज खण्ड
अतीक खान                                      1/62 विराज खण्ड
खलील अहमद                                   1/11 विराज खण्ड
सादिया अख्तर                                  1/66 विराज खण्ड
नाज                                               1/63 विराज खण्ड
आर. नारायन                                    1/38 विराज खण्ड
अर्जुन सारग                                     1/5 विराज खण्ड
लक्ष्मी शंकर नारायन                           1/37 विराज खण्ड
विजय सिंह                                       1/52 विराज खण्ड
राजश्री पंत                                        1/72 विराज खण्ड
मनमोहन शर्मा                                   1/18 विराज खण्ड
उमेश के. रघुवंशी                                1/44 विराज खण्ड
आनंद शुक्ला                                      1/39 विराज खण्ड
शरद कुमार गुप्ता                                 1/58 विराज खण्ड
मोहम्मद नावेद अंसारी                           1/43 विराज खण्ड
अनुपमा सिंह                                       1/54 विराज खण्ड
अरविंद नारायण सिंह                             1/48 विराज खण्ड
सुभाष चंद्र मिश्र                                    1/30 विराज खण्ड
अक्षय कुमार                                        1/68 विराज खण्ड
सुनील अग्निहोत्री                                  1/22 विराज खण्ड
अब्दुल किदवई                                     1/75 विराज खण्ड
अर्चना श्रीवास्तव                                   1/32 विराज खण्ड
तवसी श्रीवास्तव                                    1/61 विराज खण्ड
हेमंत शर्मा                                           1/50 विराज खण्ड
जयदीप हजेला                                      1/55 विराज खण्ड
संजीव त्रिपाठी                                       1/26 विराज खण्ड
मुकेश अलख                                         1/73 विराज खण्ड
संतोष कुमार वाल्मिकी                             1/40 विराज खण्ड
महेश चंद्र पाण्डेय                                    1/81 विराज खण्ड
मोहम्मद इशहाक                                    1/67 विराज खण्ड
राजीव रंजन झा                                      1/80 विराज खण्ड
मोहम्मद सईद रिजवी                               1/89 विराज खण्ड
विश्वदीप घोष                                         1/103 विराज खण्ड
अजय तिवारी                                          1/148 विराज खण्ड
पूनम नेगी                                              1/107 विराज खण्ड
उदय यादव                                              1/149 विराज खण्ड
संदेश तलवार                                            1/209 विराज खण्ड
हेमंत शुक्ला                                             1/164 विराज खण्ड
रणविजय सिंह                                          1/85 विराज खण्ड
राम चंद्र श्रीवास्तव                                     1/139 विराज खण्ड
रवि कुमार                                               1/197 विराज खण्ड
सैयद निजाम अली रिजवी                            1/188 विराज खण्ड
रीता सिन्हा                                              1/102 विराज खण्ड
दिनेश पाठक                                             1/134 विराज खण्ड
मनोज चतुर्वेदी                                           1/106 विराज खण्ड
बंशीधर मिश्रा                                             1/184 विराज खण्ड
नीलमनि लाल                                           1/123 विराज खण्ड
एस. सुषमा कुकरेती                                     1/92 विराज खण्ड
दिनेश चंद्र मिश्र                                          1/212 विराज खण्ड
राजेन्द्र प्रसाद मुंशी                                       1/96 विराज खण्ड
लारेंस लेविस                                              1/116 विराज खण्ड
अरूण कुमार अस्थाना                                   1/110 विराज खण्ड
अशोक हमराही                                            1/128 विराज खण्ड
हसीन अहमद                                              1/201 विराज खण्ड
एस.एम.अफरोज वसी रिजवी                           1/124 विराज खण्ड
सुनील कुमार द्विवेदी                                     1/195 विराज खण्ड
गोविंद वल्लभ नैनवाल                                    1/161 विराज खण्ड
इजहार अहमद                                               1/160 विराज खण्ड
अजय कुमार सिंह                                           1/126 विराज खण्ड
जगदीश जोशी                                                1/133 विराज खण्ड
प्रेमकांत तिवारी                                              1/108 विराज खण्ड
हरी मोहन वाजपेयी                                          1/114 विराज खण्ड
बृजेन्द्र दुबे                                                     1/162 विराज खण्ड
श्याम सुन्दर                                                   1/159 विराज खण्ड
सुरेश द्विवेदी                                                   1/125 विराज खण्ड
विनय सक्सेना                                                 1/137 विराज खण्ड
मोहम्मद शाहिद                                                1/101 विराज खण्ड
राजीव ओझा                                                     1/178 विराज खण्ड
मीना श्रीवास्तव                                                 1/158 विराज खण्ड
नंद किशोर श्रीवास्तव                                          1/113 विराज खण्ड
दया शंकर राय                                                   1/124 विराज खण्ड
नैयर जैदी                                                         1/207 विराज खण्ड
रमेश सिंह                                                          1/135 विराज खण्ड
विनोद कुमार त्रिपाठी                                              1/136 विराज खण्ड
के.डी. बनर्जी                                                        1/151 विराज खण्ड
दर्शन कुमार शर्मा                                                  1/99 विराज खण्ड
संजय शर्मा                                                           1/215 विराज खण्ड
अनिल सिन्हा                                                        1/213 विराज खण्ड

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (9) : महेंद्र मोहन और संजय गुप्‍ता ने भी हथिया रखे हैं सरकारी बंगले!

'अंतरपट में खोजिए, छिपा हुआ है खोट,
मिल जाएगी आपको, बिल्कुल सत्य रिपोर्ट'

प्रसिद्ध कवि काका हाथरसी की यह कविता कुछ पत्रकारों पर सटीक साबित होती है। अगर आपको नियम-कानून की धज्जियां उड़ानी नहीं आती है तो इसका प्रशिक्षण इन कुछ दिग्गज पत्रकारों से ले सकते हैं। इस अनमोल प्रतिभा ने 'क्रीमीलेयर पत्रकार' बना दिया है। नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले हरफनमौला पत्रकारों के 'किस्सों' से मीडिया और राजनीतिक दल का हर तबका परिचित है। लेकिन मीडिया के नियम विरूद्ध कारनामों पर कार्रवाई करने की हिम्मत न तो नौकरशाहों में है और नहीं सरकारों में है।

आपको जानकर हैरानी होगी कि नेता और अफसर अपने पद से रिटायर हो जाता है लेकिन पत्रकार कभी रिटायर नहीं होता है। अपने को मुख्यधारा में बनाए रखने के लिए हर हथकंडे अपनाता है। मीडिया संस्थानों से रिटायर होने जाने के बाद सरकारी आवासों पर कब्जा बरकरार रखने के लिए क्रीमीलेयर पत्रकार यह खेल वर्षां से खेल रहे हैं। राज्य सम्पत्ति विभाग ने 21 मई 1985 में समाचार पत्रों के मान्यता प्राप्त सम्पादकों, उपसम्पादक और पत्रकारों को सरकारी आवास आवंटन के लिए एक शासनादेश किया था। इस शासनादेश में इस बात का प्रावधान किया गया था कि जिनका निजी आवास होगा या अपने कार्यरत संस्थानों से आवास भत्ता प्राप्त कर रहे मान्यता प्राप्त सम्पादकों, उपसम्पादक और पत्रकारों को सरकारी आवास का आवंटन नहीं किया जाएगा। 27 साल बीत जाने के बाद भी राज्य सम्पत्ति विभाग ने अपने इस शासनादेश में कोई फेरबदल नहीं किया है। अभी भी पुराने शासनादेश पर अमल कर रहा है। सरकारों और नौकरशाहों के लचीली कार्यप्रणाली के चलते क्रीमीलेयर पत्रकारों ने बड़ी संख्या में सरकारी आवासों पर वर्षों से कब्जा जमा रखा है।

देश का सबसे बड़ा लगभग 10,064.02 लाख रुपए टर्नओवर वाला मीडिया हाउस दैनिक जागरण भी नियमों को ताक पर रखकर सरकारी आवास हथियाने में पीछे नहीं है। दैनिक जागरण के प्रधान सम्पादक महेन्द्र मोहन गुप्त के नाम से दिलकुशा कालोनी में बी-1 और बी-2 सम्पादक संजय गुप्ता के नाम से बंगले आवंटित हैं। यूं तो महेन्द्र मोहन गुप्त 7/51 पूर्ण निवास तिलक नगर कानपुर दो और संजय गुप्त डी 210-211, सेक्टर 63 नोएडा गौतमबुद्ध नगर के स्थायी निवासी हैं। जबकि इन दोनों सम्पादकों का निजी आवास होने और मान्यता प्राप्त न होने के बावजूद राज्य सम्पत्ति विभाग ने नियमों को ताक पर रखकर बड़े बंगले आवंटित कर रखा है। राज्य सम्पत्ति विभाग के सूत्रों का कहना है कि दैनिक जागरण के प्रधान सम्पादक महेन्द्र मोहन गुप्त और सम्पादक संजय गुप्ता के नाम पर आवंटित बंगलों का उपयोग 'गेस्ट हाउस' की तरह किया जा रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेन्द्र शर्मा किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। सबसे अधिक प्रसार संख्या वाले समाचार पत्र से लेकर सबसे अधिक विवादित अखबार के सम्पादक बनने का गौरव हासिल है। अपनी हरफनमौला कला के बल पर श्री शर्मा की उपलब्धियों में सूबे का राज्य सूचना आयोग का आयुक्त बनना भी शुमार है। सूचना आयुक्त बनने से पूर्व राज्य सम्पत्ति विभाग ने श्री शर्मा को पत्रकार कोटे से 23 गुलिस्तां कालोनी आवास आवंटित किया था। सूचना आयुक्त के पद पर तैनाती के समय राज्य सूचना आयोग ने सरकारी आवास 23 गुलिस्तां कालोनी का किराया राज्य सम्पत्ति विभाग को चुकाया है। सूचना आयुक्त पद से रिटायर होने के बाद अब फिर से पत्रकार कोटे से इस सरकारी आवास को अपने पास बनाए रखा है। भले ही इस समय किसी भी समाचार पत्र में नहीं हैं, लेकिन वरिष्ठ पत्रकार होने का तमगा सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग से मिल गया है। गोमती नगर के पत्रकार पुरम आवास संख्या 3/78 निजी आलीशान मकान होने के बाद भी श्री शर्मा सरकारी गुलिस्तां कालोनी के 23 नम्बर आवास में रह रहे हैं। सरकार द्वारा सब्सिडी पर दिए गए मकान को किराए पर दे रखा है।

कभी राजधानी लखनऊ से प्रकाशित होने वाला समाचार पत्र नवजीवन में प्रूफ रीडर रहे जोखू प्रसाद तिवारी यूपी प्रेस क्लब के महामंत्री हैं। श्री तिवारी का विवादों से गहरा नाता रहा है। बीते 30 सालों से यूपी प्रेस क्लब पर एकछत्र राज है। प्रेस क्लब पर से कब्जा न हट जाए, इसके लिए न तो नए लोगों को प्रेस क्लब की सदस्यता पर अघोषित रोक लगा रखी है। यूपी प्रेस क्लब में तमाम वित्तीय अनियमितताएं प्रकाश में आई, लेकिन क्रीमीलेयर पत्रकारों की एकजुटता ने इस सच्चाई पर पर्दा डाल रखा है। निष्पक्ष दिव्य संदेश ने प्रेस क्लब के काले कारनामों को प्रकाशित किया था, लेकिन इन क्रीमीलेयर पत्रकारों ने अपने प्रभाव से कोई कार्रवाई नहीं होने दी है। पत्रकारों के नेता बने श्री तिवारी का इस समय पत्रकारिता से दूर-दूर तक नाता नहीं है, लेकिन सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग से जोड़-तोड़ कर के स्वतंत्र पत्रकार का तमगा हासिल कर लिया है। सरकार से 1/204 विराज खण्ड सब्सिडी प्लॉट ले रखा है। श्री तिवारी इस समय 3/43 टिकैत राय सरकारी कालोनी में रह रहे हैं। प्रतिष्ठित समाचार पत्र से रिटायर होने के बाद सज्जन प्रवृत्ति के रवीन्द्र जायसवाल अब स्वतंत्र मान्यता प्राप्त पत्रकार है। पत्रकार पुरम में 3/21 निजी आवास को किराए पर देने के बाद सरकारी आवास 56 आफीसर्स हास्टल छोडऩे का मोह नहीं त्याग पा रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार एस.एल सिंह का मानना है कि पत्रकारिता अब आम के आम गुठलियों के दाम बन गई है। सरकारी और अन्य सेवा की महत्वपूर्ण नौकरी प्राप्त करना भले ही टेढ़ी खीर हो, लेकिन पत्रकार बनना काफी आसान है। किसी भी छोटे से लेकर बड़े समाचार पत्र में अपनी पहुंच और जोड़-तोड़ के बल पर नौकरी आसानी से हासिल की जा सकती है। बस इसके लिए चालाक होने की योग्यता जरूरी है। अगर आप चालाक हैं तो पत्रकारिता की दुकान आसानी से चल जाएगी। आप भी आलीशान हवेलियों के मालिक बन जाएंगे।

पंजाब केसरी अखबार से मान्यता प्राप्त संवाददाता नासिर खान ने कहा कि नेताओं की सिफारिश पर थोक के भाव में ऐसे पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की मान्यताएं हो गई हैं, जो गैरकानूनी कार्यों में लिप्त हैं। इन लोगों का पत्रकारिता से दूर-दूर तक नाता नहीं है, लेकिन नेताओं और अफसरों से संबंध बनाने के लिए सारे मापदण्ड ताक पर रखे जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि विधान सभा सत्र का बजट कवरेज करने के लिए 377 पत्रकारों को पास जारी किए गए हैं, जबकि पत्रकार कक्ष में बैठने की क्षमता मात्र 150 लोगों की है। कई विधायकों ने विधान सभा अध्यक्ष और प्रमुख सचिव से शिकायत की है कि सेंट्रल हाल और कैंटीन में पत्रकार कुर्सियों पर कब्जा करके बैठ जाते हैं, उनको खड़े रहना पड़ता है। श्री खान ने कहा कि उन्होंने मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष और सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के निदेशक से राज्य मुख्यालय की मान्यता प्रदान करने में सभी नियमों का पालन किये जानक मांग कर रखी है। जिससे पत्रकारिता की खराब हो रही छवि को सुधारा जा सके।
उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने पत्रकारों के भ्रष्टाचार पर कोई भी प्रतिक्रिया देने के बजाए चुप्पी साध रखी। जबकि अन्य पत्रकार संगठनों ने क्रीमीलेयर पत्रकारों के कारनामों की सरकार से जांच कराए जाने की मांग की है।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (8) : ‘गरीब पत्रकार’ बन गए आ‍लीशान हवेलियों के मालिक?

लखनऊ। यूपी के कई दिग्गज पत्रकारों के लिए पत्रकारिता शोपीस बन गई है, तभी तो इसकी आड़ में पत्रकारिता के बजाए फंड मैनेजर का काम कर रहे हैं। अब काफी संख्या में पत्रकारों में गलत कार्यों की कलई खोलने के बजाए मलाई खाने का कल्चर काफी बढ़ गया है। 

इंडिया टुडे-नीलसन द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण में सामने आया है कि पत्रकार भी नौकरशाही और न्यायपालिका में भ्रष्टाचार में कम नहीं है। सर्वेक्षण में चार फीसदी लोगों ने पत्रकारों, नौकरशाही और न्यायपालिका को भ्रष्ट बताया है। यह कटु सच है कि यूपी के पत्रकारों को न तो मणिसाना आयोग के मुताबिक वेतन और न ही छठें वेतन आयोग की तरह तनख्वाह मिल रही है। इसके बावजूद ये गरीब पत्रकार आलीशान हवेलियों के मलिक हैं।
 
राजधानी की सबसे पॉश क्षेत्र गोमती नगर में पत्रकारों को सब्सिडी दरों पर मिले आवासों में अब शराब की दुकानें और होटल खुल गए हैं। इन सफेदपोश पत्रकारों के कारनामों से जहां क्षेत्रीय जनता परेशान है वहीं मीडिया का एक बड़ा तबका आहत है। सरकार इनके कारनामों पर आंखें बंद किए हुए है।
 
पत्रकार पुरम बना 'कारोबार पुरम' : गोमती नगर स्थित पत्रकार पुरम अब कारोबार पुरम के रूप में तब्दील हो गया है। इस कालोनी के अधिकतर आवास पत्रकारों के नाम पर आवंटित हुए थे। कुछ पत्रकारों ने अपने आवास बेच दिए हैं, अब कुछ इसमें कारोबार शुरू करवा दिए हैं। पत्रकारिता जगत के हस्ताक्षर माने जाने वाले पंडित वीर विक्रम बहादुर मिश्र को सरकार ने पत्रकार पुरम में 3/92 आवास आवंटित किया था। अब इस आवास में किराए पर एक बड़ी शराब की दुकान खुली है। पत्रकार के आवास में शराब की दुकान खुलने से क्षेत्रीय जनता में काफी नाराजगी है, इसको लेकर धरना-प्रदर्शन भी हुए। लेकिन मामला बड़े पत्रकार के होने की वजह से कोई कार्रवाई नहीं हुई। 
 
मौजूदा समय श्री मिश्र स्वतंत्र पत्रकार हैं और कैसरबाग की सरकारी कालोनी के आवास संख्या 3/8 में रह रहे हैं। श्री मिश्र के दो पुत्र बेहतर जॉब में हैं। आर्थिक संकट नहीं है, इसके बावजूद अधिक कमाई के लिए अपने आवास में शराब की मॉडल शॉप खुलवा रखा है। 3/93 आवास पत्रकार विनोद श्रीवास्तव के नाम पर आवंटित हुआ था, इस आवास को बेचे जाने की  सूचना है। अब इस आवास में मारूति ड्राइविंग स्कूल चल रहा है। लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी को पत्रकार पुरम में 3/91 आवास आवंटित है। अब इस आलीशान आवास में आंध्रा बैंक खुल गया है। माली हालत बेहतर होने के बावजूद मौजूदा समय श्री त्रिपाठी सरकारी गुलिस्ता कालोनी के 55 आवास में रह रहे हैं।
 
पत्रकार पुरम के पत्रकार 'कारोबारी पत्रकारों' की कार्यप्रणाली से काफी आहत हैं। वरिष्ठ पत्रकार रजनीकांत वशिष्ठ ने कहा कि जब से कुछ पत्रकारों ने अपने आवासों के व्यवसायिक गतिविधियां शुरू कर दी हैं, उससे काफी समस्याएं बढ़ गई हैं। कुछ आवासों में शराब की दुकानें और कुछ में होटल खुल गए हैं। इससे हर समय अराजक तत्वों का जमावाड़ा लगा रहता है। आए दिन छेड़छाड़ और लूटपाट की घटनाएं घटित होती रहती हैं। इससे क्षेत्रीय जनता को काफी परेशानी होती है। कई बार इस समस्या के निवारण के लिए क्षेत्रीय जनता ने विरोध प्रदर्शन भी किया, लेकिन कोई हल नहीं निकल सका। इसके साथ ही काफी संख्या में पत्रकारों ने अपने आवास बेच दिए हैं।
 
त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (7) : नोटिस के बाद भी सरकारी आवासों में जमे हैं पत्रकार

यूपी के इतिहास में पहली बार 54 पत्रकारों को सरकारी आवास खाली कराने का नोटिस राज्य सम्पत्ति विभाग ने दिया। इसका श्रेय प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री राकेश गर्ग, सचिव मुख्यमंत्री अनीता सिंह और राज्य सम्पत्ति विभाग के विशेष सचिव राजकिशोर यादव को जाता है। बीते 9 नवम्बर 2012 को हुई पत्रकारों के आवास आवंटन और नवीनीकरण के लिए हुई बैठक में यह बात सामने आई कि काफी संख्या में अपात्र पत्रकार सरकारी आवासों पर निवास कर रहे हैं। 

शासन के आला अफसरों के निर्देश पर 54 पत्रकारों को आवास खाली करने का नोटिस भेजा गया है। शासन के इस कड़े कदम से सफेदपोश पत्रकारों में 'व्यक्तिगत लाभ' के लिए नतमस्तक पत्रकार गोमती नगर के पत्रकार पुरम में कुछ पत्रकारों के आवासों में खुली हैं बैंक, शराब और कबाब की दुकानें में हड़कम्प मचा हुआ है। कागजों पर और शोपीस के लिए पत्रकारिता कर रहे तथाकथित पत्रकारों ने अपने आका अफसरों और पत्रकारों के लिए चरण वंदना शुरू कर दी है। लेकिन मीडिया में आ रही खबरों के बाद राज्य सम्पत्ति विभाग ने अपना रूख और सख्त कर दिया है।
 
राज्य सम्पत्ति विभाग के विशेष सचिव राजकिशोर यादव ने कहा कि निष्पक्ष दिव्य संदेश में प्रकाशित समाचार को गम्भीरता से अध्ययन कर रहा है। राज्य सम्पत्ति विभाग ने लखनऊ विकास प्राधिकरण और आवास विकास परिषद से पत्रकार कोटे से आवंटित लोगों की सूची मांगी है। जिससे दोहरा लाभ ले रहे पत्रकारों पर कार्रवाई की जा सके।
 
त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (6) : सूचना विभाग भी कन्‍फ्यूज – पत्रकार हैं या मैनेजर?

नौकरशाही के लचीले रुख के कारण तथाकथित पत्रकार पंकज वर्मा राजभवन कालोनी के आवास संख्या पांच (टाइप-5) में कई वर्षों से नियम-कानून को ताक पर रखकर निवास कर रहे हैं। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग अभी यह तय नहीं कर पाया है कि श्री वर्मा पत्रकार हैं या मैनेजर। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग का मानना है कि पंकज वर्मा न तो पूर्णकालिक पत्रकार की श्रेणी में आते हैं और न ही राजनीतिक सम्पादक। उनको राजनीतिक सम्पादक के रूप में आवंटित हुआ आवास नियमों के तहत उचित हैं। आवास आवंटन को बचाए रखने के लिए पंकज वर्मा कोर्ट गए, लेकिन कोई राहत नहीं मिली। 

राज्य सम्पत्ति विभाग के पास इस बात की भी जानकारी है कि पंकज वर्मा के पास विनय खण्ड गोमती नगर में 5/59 निजी आवास है, इसका व्यवसायिक उपयोग किया जा रहा है। पंकज वर्मा ने अपने आवास नवीनीकरण के लिए दिए गए प्रत्यावेदन में उल्लेख किया है कि न तो शहर में उनका कोई निजी आवास है और न ही कोई आवास किराए पर चल रहा है। शासन ने इस मामले की जांच के लिए सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग को जिम्मेदारी सौंपी है।
 
त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (5) : नवीन जोशी और इंदुशेखर पंचोली अच्‍छी पत्रकारिता के रोड मॉडल

निष्पक्ष दिव्य संदेश में प्रकाशित हो रही खबरों से मीडिया के कुछ पत्रकारों की प्रतिक्रिया उत्साहित करने की रही और कुछ पत्रकारों को यह नागवार गुजरा। लेकिन मीडिया के लगभग 70 फीसदी पत्रकारों ने निष्पक्ष दिव्य संदेश की खबरों की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सराहना की है। मीडिया से जुड़े लोगों का मानना है कि पत्रकारिता के दिग्गजों को इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए कि उनके आचरण से पत्रकारिता के पवित्र पेशे पर उंगली न उठे। 

काफी संख्या में लखनऊ के पत्रकारों का मानना है कि नामचीन अखबारों के सम्पादकों पर नजर डाली जाए तो हिन्दुस्तान के सम्पादक नवीन जोशी और अमर उजाला के सम्पादक इंदुशेखर पंचोली के आचरण पत्रकारों के लिए रोल मॉडल की तरह है। इन सम्पादकों ने पत्रकारिता की साख बनाए रखने के लिए किसी भी दबाव के आगे नहीं झुके।
 
त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (4) : स्‍वतंत्र एवं वरिष्‍ठ के नाम पर उठा रहे गलत फायदा

लखनऊ में स्वतंत्र और वरिष्ठ पत्रकारों की भरमार है। स्वतंत्र पत्रकारों में के. विक्रम राव, घनश्याम दुबे, योगेन्द्र द्विवेदी, अजय कुमार, सर्वेश कुमार सिंह, राजीव शुक्ला, अनूप श्रीवास्तव, सुरेश द्विवेदी, मसूद हसन, निरंकार सिंह, रवीन्द्र सिंह, मुदित माथुर, हसीब सिद्दीकी, राम उग्रह, श्याम कुमार, कुलसुम तल्हा, अजय कुमार सिंह, मुकेश कुमार अलख, कुमार सौवीर, राजेश नारायण सिंह, पवन कुमार सिंह हैं। 

वरिष्ठ पत्रकारों में पीएस सेठी, राजनाथ सिंह सूर्य, सरोजेश गाजीपुरी, इशरत अली सिद्दीकी, श्यामचरण तिवारी, करूणा शंकर सक्सेना, मदन मोहन बहुगुणा, जे.पी. शुक्ला, एस. कौसर हुसैन, पी.बी. वर्मा, भगवंत प्रसाद पाण्डेय, राजीव रंजन झा, सत्येन्द्र शुक्ल, अशोक निगम, आर.सी. श्रीवास्तव, जोखू प्रसाद तिवारी, वीर विक्रम बहादुर मिश्र, राजेन्द्र द्विवेदी, पी.के. राय, अफजल अहमद अंसारी, राम सागर, शिव शंकर त्रिपाठी, सुरेन्द्र दुबे, उपेन्द्र शुक्ला, आबिद सुहेल, कमल नयन, ए.एम. खान, बृजेन्द्र प्रताप सेंगर, उमा शंकर त्रिपाठी, अजय सिंह और ज्ञानेन्द्र शर्मा हैं। 
 
इनमें से अधिकतर लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार हैं। आज भी कई पत्रकारों के लेख 75 हजार से ज्यादा प्रसार संख्या वाले समाचार पत्रों में प्रकाशित होते हैं। लेकिन इनमें से कुछ पत्रकार सिर्फ कागजों पर पत्रकारिता कर रहे हैं। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के पूर्व निदेशक का कहना है कि स्वतंत्र और वरिष्ठ पत्रकार के नाम पर कुछ लोग गलत फायदा उठा रहे हैं। कई पत्रकार खुद को नियम-कानून से ऊपर मानते हैं। स्वतंत्र पत्रकार की मान्यता प्राप्त करने के लिए फर्जी कागजात लगा रखा है। अगर इसकी जांच हो जाए तो काफी पत्रकार इसमें फंसेंगे। 
 
उन्होंने कहा कि पत्रकारों को अपनी छवि स्वच्छ रखने के लिए ऐसा अभियान चलाएं जिससे पत्रकारिता का नाम बदनाम न हों। अपनी लेखनी से समाज को आईना दिखाने का काम जिन लोगों को है। आज उन्हे स्वयं यह करने की आवश्यकता है। जो हाथ अपनी लेखनी से दूसरों को न्याय दिलाने के लिए उठनी चाहिए। उसी लेखनी को नेताओं अफसरों के आगे गिरवी रखकर खबरनवीस उनके आगे याची की मुद्रा में है। किसी को लालबत्ती को चाहिए तो किसी को सत्तारूढ़ दल से बड़ा राजनीतिकलाभ।
 
त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (3) : लाल बत्‍ती की लालसा में परेशान हैं

बात एक ऐसे पत्रकार की जो कभी अपने को राष्‍ट्रीय स्वंय संघ की  पृष्ठभूमि बताकर लाभ लेते रहे और अब वे मौजूदा सरकार से कोई लाभ का पद लेने के लिए खासे उतावले है। कई बार अपना बायोडाटा ऊपर तक पहुंचा चुके है। उनकी करीबियों की माने तो उन्होंने पद्मश्री पाने के लिए एक सिफारिशी चिट्ठी लिखाई। यही नहीं इससे पूर्व उन्होंने सरकार से लालबत्ती करने के लिए काफी कोशिश की लेकिन बाकी लोगों की तरह उन्हें इंतजार करने की घुट्टी दे दी गई। 

इनके बारे में यह भी चर्चा आम है जब इनके साथ कोई घटना या दुर्घटना हो जाती है तो घर से लेकर अस्पताल तक उनकी हालचाल लेने वाले लाल नीली बत्ती वालों का शुमार हो जाता है। बसपा सरकार में यह महोदय बादशाह सिंह और बाबू सिंह कुशवाहा जैसे उन मंत्रियों की गणेशपरिक्रमा में रहते थे जिनके पास मलाईदार विभाग थे। नेताओं की तरह इनका भी निष्ठा बदलने में कोई जोड़ नहीं है।
 
त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (2) : लाभ पाने में खुद सबसे आगे, दूसरों को नसीहत

कमोबेश यही स्थिति एक वरिष्ठ पत्रकार की है एक विदेशी न्यूज एजेन्सी का संवाददाता होने के साथ ही वे काफी समय तक पत्रकारों के नेता भी रहे हैं। इलाहाबाद के बाद लखनऊ को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले यह महोदय नहीं चाहते कि उनके आगे कोई दूसरा अपने को सत्तारूढ़ दल का सबसे बड़ा वफादार साबित करे। प्रेस क्लब हो या मान्यता समिति दोनों के लिए अध्यक्ष रह चुके यह महोदय कंधे पर बैग टांगे लोगों को स्वस्थ्य पत्रकारिता के टिप्स दिया करते है।

पूर्ववर्ती सरकार में यशभारती पाने के लिए खासी मशक्कत की लेकिन कामयाबी नहीं मिली लेकिन किसी संस्था द्वारा एक लाख का पुरस्कार पाने में जरूर कामयाब रहे। गोमतीनगर में सरकार से सब्सिडी से प्लाट लेकर तिमंजिला मकान बनवाया उसे किराए पर उठाकर स्वयं महोदय एक बड़ी सरकारी कालोनी में विराजते है। इस सरकारी आवास में उन्होंने राज्य सम्पत्ति की अनुमति के बिना कमरों का निर्माण कराया। सरकार और सत्तारूढ़ दल से जुड़े लोगों का वफादार होने के नाते विभाग के किसी अधिकारी ने उनके खिलाफ कुछ लिखना पढऩा जरूरी नही समझा। सरकार से इतना भरपूर लाभ लेने के बाद वे इस समय भी लाभ का कोई पद लेने के लिए अथक प्रयासों में लगे हैं।
 
त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (1) : पत्रकार हैं- लड़ते-भिड़ते, उलझते-गालियां खाते दिख ही जाते हैं

दो तीन समाचार पत्रों के ब्यूरोचीफ की जिम्मेदारी निभा चुके यह महोदय इन दिनों अपनी इस समय एक ऐसे समाचार पत्र में यह ओहदा संभाले हुए है। जिसकी बुनियाद में ही बसपा सरकार के घोटालेबाज मंत्री का सब कुछ लगा है। हमेशा दूसरों को परेशान करने के लिए परेशान रहने वाले इन महोदय के सामने इस समय पहचान का बड़ा संकट है। जब किसी अधिकारी या नेता को फोन करते है तो पहले उस अखबार का नाम बताते हैं, जहां पहले काम करते थे फिर कहते हैं सरजी अब इस अखबार को देख रहा हूं। 

नेता से लेकर गेट पर खड़े सिक्योरिटी गार्ड तक से भिड़ जाते हैं। कोई असरदार नेता और अफसर सामने पड़ जाता है तो भीगी बिल्ली बन जाते हैं, लेकिन और चपरासी तक से पत्रकारिता का रौब गांठकर उसे हैसियत में रहने की सलाह देते हैं। लेकिन स्टैंडवाले को पैसा न देने पड़े इसके लिए अपने प्रभाव दिखाते हैं लेकिन गालियां भी खाते हैं, धक्कामुक्की करते हैं तो मार भी खाते हैं और बड़बड़़ाते हुए किनारे हो जाते हैं। 
 
हाल ही में अपने एक सहयोगियों की छुट्टी कराने के बाद से अपने को बड़ा शूरवीर समझ रहे यह महोदय इन दिनों अपने नए आका को लेकर सचिवालय से लेकर महत्वपूर्ण स्थानों पर घुमा फिराकर अपनी नौकरी पक्की करने में लगे हैं। सहयोगियों की गाली खाते हैं घर में नशे करके पहुंचते है तो वहां भी उठा के पटके जाते हैं लेकिन इनसबके बावजूद अपनी हरकतो से बाज नहीं आते। ऐसे स्वामी जी की जय।
 
त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

प्रॉपर्टी के लिए लखनऊ के बड़े पत्रकारों ने नैतिकता रखी ताक पर, देखें लिस्‍ट

लखनऊ। 'राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों का पाप धोते-धोते' की तरह नेताओं और अफसरों के भ्रष्टाचार को उजागर करते-करते पत्रकारों के दामन भी मैले हो गए हैं। मीडिया के भ्रष्टाचार ने साबित कर दिया है कि नेता, अफसर और पत्रकार भ्रष्‍टाचार के हमाम में सब नंगे हैं। समाज के लिए आईना माने जाने वाले कुछ पत्रकारों ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए प्रतिष्ठित पेशा पत्रकारिता को बदनाम कर दिया है। शासन भी पत्रकारों के मुद्दे पर कोई खास कार्रवाई करने के मूड में नहीं है।

भ्रष्ट नेताओं और अफसरों के गठजोड़ की बदौलत काफी संख्या में नामचीन पत्रकारों ने सरकार से कई-कई अनुदानित दरों पर प्लाट और आवास प्राप्त कर करोड़पति बन गए। इसके बावजूद सरकारी आवास का मोह नहीं छोड़ पाए। सरकारी आवास हासिल करने के लिए राज्य सम्पत्ति विभाग को झूठे हलफनामे दिए कि उनके पास कोई भी निजी आवास नहीं है। कई पत्रकार निजी आवास महंगे किराए पर दे रखा है, खुद सरकारी सस्ते-सुलभ आवास का मौज ले रहे हैं। कई पत्रकारों ने सरकार ने अनुदानित दरों वाले प्लाट और आवास लेकर बेच भी चुके हैं।

लखनऊ विकास प्राधिकरण के रिकार्ड के मुताबिक गोमती नगर के विराज खण्ड में पत्रकार कोटे से कई पत्रकारों को सब्सिडी दरों पर प्लाट दिया है। इनमें से कई पत्रकारों अपने रिश्तेदारों के नाम से लखनऊ विकास प्राधिकरण और आवास विकास की कई योजनाओं में कई-कई प्लाट और आवास हासिल किया है। सबसे खास बात यह है कि इनमें से काफी पत्रकार उस समय एलडीए की बीट कवरेज करते थे। जिसकी वजह से इन पत्रकारों को आवास आवंटित कराने में कोई समस्या का सामना नहीं करना पड़ता था। मौजूदा समय इनमें से काफी पत्रकार आज भी सरकारी आवासों में रहे हैं।

एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सरकार से मांग की है कि पत्रकारिता के पवित्र व्यवसाय को कंलकित करने वाले पत्रकारों के प्रकरणों की जांच कराई जानी चाहिए। सरकार से अनुदानित दरों पर प्लाट और आवास हासिल करने वाले पत्रकारों से सरकारी आवास खाली कराए जाने चाहिए। जिससे जरूरतमंद और आवास विहीन पत्रकारों को सरकारी आवास मिल सके। इसके साथ ही तमाम ऐसे लोग को मान्यता प्राप्त संवाददाता का तमगा हासिल कर लिया है, जिनका पत्रकारिता से दूर-दूर तक नाता नहीं है। इस मामले की जांच के लिए सरकार को एक पत्र लिख रहे हैं।
पत्रकारों को सरकारी आवास देने के लिए पीआईबी की तरह नीति बने। जिससे पारदर्शिता आएगी। एक स्वतंत्र पत्रकार ने कहा कि झूठा हलफनामा लगाकर सरकारी आवास प्राप्त करने वाले पत्रकारों के खिलाफ 420 का मुकदमा दर्ज करवा कार्रवाई की जाए। विशेष सचिव और राज्य सम्पत्ति अधिकारी राजकिशोर यादव ने कहा कि अभी उनके पास इस बात की कोई सूची नहीं है कि कितने पत्रकारों ने अनुदानित दरों पर प्लाट और आवास प्राप्त करने के बाद भी सरकारी आवास का लाभ ले रहे हैं। इसकी सूची प्राप्त करने के लिए कोई कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार सरकारी आवास पाए अपात्र पत्रकारों की सूची तैयार कर रही है। जल्द ही इस पर कार्रवाई होगी।

प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री राकेश गर्ग ने कहा कि सरकार इस मुद्दे पर काफी संवेदनशील है। मान्यता प्राप्त और जरूरतमंद पत्रकारों को सरकारी आवास उपलब्ध कराने के लिए प्रयासरत है। उसमें कुछ कार्रवाई की गई है। जल्द ही इसके रिजल्ट सामने आएंगे। उन्होंने कहा कि अगर किसी पत्रकार ने गलत तरीके से आवास हासिल किए है, तो आवास खाली कराने के साथ ही जांच भी कराई जाएगी। दोषी लोगों को सरकार किसी भी दशा में बख्शेगी नहीं। सचिव मुख्यमंत्री अनीता सिंह से कई बार सम्पर्क किए जाने पर प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई। सरकार से प्लाट और आवास लेने वाले कई पत्रकारों से सम्पर्क करने पर प्रतिक्रिया नहीं दी।

पत्रकारों का नाम        प्लॉट और आवास पता

अतुल चंद्रा               विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी-2/119
गोलेश स्वामी            विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी-2/120
अजय जायसवाल       विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी- 2/45
मोहित दुबे                विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी- 2/197
कमल दुबे                 विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी- 2/130
मनोज श्रीवास्तव        विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी- 2/121
आशुतोष शुक्ल           विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी- 2/122
संदीप रस्तोगी            विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी- 2/123
रवि एस. दत्ता            विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी-2/125
स्वदेश कुमार              विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी-2/63 सी
विष्णु प्रकाश त्रिपाठी     विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी-2/187
नदीम                       विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी-2/136ए        
रूमा सिन्हा                विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी-1/156ए
कामिनी हजेला            विराज खण्ड में प्लॉट संख्या 3/214
विनोद कुमार कपूर       विराज खण्ड में प्लॉट संख्या 2/124
संजय मोहन जौहरी       विराज खण्ड में प्लॉट संख्या 1/47
संजय भटनागर           विराज खण्ड में प्लॉट संख्या 1/29
प्रज्ञान भट्टाचार्य           विराज खण्ड में प्लॉट संख्या सी 3/7
शरत पाण्डेय               विराज खण्ड में प्लॉट संख्या सी 2/50 सी
विश्वदीप बनर्जी           विराज खण्ड में प्लॉट संख्या 2/216
सुधीर मिश्रा                विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी 2/118
सुरेश यादव                 विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी 1/85
अनिल के. अंकुर           सी 3/10 विराट खण्ड
ज्ञानेन्द्र शर्मा               3/78 पत्रकार पुरम
कामिनी प्रधान              सी 3/132 विराज खण्ड
एम.पी. सिंह                 1/353 विनम्र खण्ड
अश्विनी श्रीवास्तव         2/64 विराट खण्ड
विनोद शुक्ल (दिवंगत)     2/50 डी विराज खण्ड
पंकज वर्मा                    4/49 विनय खण्ड
प्रदीप विश्वकर्मा              सी 1/311 विकल्प खण्ड
मोहम्मद तारिक खान       सी 1/312 विकल्प खण्ड
बालकृष्ण                       सी 1/313 विकल्प खण्ड
प्रदुम्न तिवारी                  1/157 विराज खण्ड
कमाल खान                     विराज खण्ड 1/97, सी 1/315 विकल्प खण्ड
दिलीप कुमार अवस्थी         पत्रकार पुरम 2/77
रामदत्त त्रिपाठी                पत्रकार पुरम 2/91

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुका है.