अखबार नंबर वन!

अमिताभमैं अपने घर चार अखबार मंगवाता हूँ हिंदी में दैनिक जागरण, हिंदुस्तान और अंग्रेजी में हिंदुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ़ इंडिया. इसका यह मतलब नहीं कि मैं बाकी के अखबारों को इनसे किसी तरह कमतर आंकता हूँ. अव्वल तो मेरे ऊपर-नीचे आंकने से कोई अंतर नहीं पड़ता और उससे बढ़ कर मैं व्यक्तिगत रूप से तो यही चाहता हूँ कि अधिक से अधिक संख्या में अखबार मंगवाऊं पर बीच में मेरी धर्मपत्नी नूतन आ जाती हैं, जो प्रति अखबार खर्चा जोड़ कर इसे घर के बजट से जोड़ते हुए तुरंत ही इस पर अपनी कैंची चलाने को तैयार रहती हैं. मैं कुछ कहने को होता हूँ तो तुरंत मेरी तनख्वाह नहीं मिलने और घर चलाने की जिम्मेदारी जैसे ऐसे महत्वपूर्ण प्रश्नों पर बहस करने लगती हैं जिस पर मैं गलती से भी नहीं जाना चाहता.

लेकिन यहाँ मेरा उद्देश्य अपने घर के बजट को नहीं, आज इन चारों अखबारों में लगभग एक ही प्रकार से निकले एक खबर पर डिस्कशन करना है. मैं अपनी बात कहने के पहले इन चारों अखबारों के इस सम्बन्ध में दिए गए हेड-लाइन प्रस्तुत करता हूँ. हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार- “रीडर’स च्वायस- हिंदुस्तान टाइम्स” तो टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार- “”टीओआई बैक एज नंबर वन इन डेल्ही एनसीआर.” जागरण का कहना था- “”दैनिक जागरण फिर बना सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला अखबार” और हिंदुस्तान का कहना था-” “हिंदुस्तान बना एक करोड़ आठ लाख पाठकों की आवाज.”

ये सारी खबरें मूलतः इंडियन रीडरशिप सर्वे की ताजा सर्वेक्षण के नतीजों के आधार पर प्रस्तुत की जा रही थीं.  हेड लाइन के अन्दर जाएँ तो इनमे से प्रत्येक अखबार इन सर्वेक्षण आंकड़ों से काफी प्रसन्न नज़र आ रहे थे. टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने बताया कि उसका औसत रीडरशीप अब 72.54 लाख हो गया है जो पिछले आंकड़ों से करीब डेढ़ लाख ज्यादा है. हिंदुस्तान टाइम्स का भी यही कहना था कि वह लगातार तीसरी बार दिल्ली का बेताज बादशाह घोषित हुआ था. उसने कई तरह से आंकड़े प्रस्तुत किये थे जो यह बताते थे कि कैसे टाइम्स ऑफ़ इंडिया की तुलना ने वह रीडरशिप में दिल्ली में ऊपर है. हिंदुस्तान के शब्दों में- “आईआरएस क्यू3 2010 के ताजा नतीजों ने एक बार फिर बता दिया है कि हिंदुस्तान ही पाठकों की असली आवाज़ है.” तो जागरण के अनुसार-“दैनिक जागरण अखबार पाठकों की संख्या के लिहाज से लगातार अव्वल बना हुआ है.”

मैंने तो सिर्फ यही चार अखबार देखे लिहाजा मेरे पास इतनी ही सूचना है पर मैं समझता हूँ कि शायद अन्य कई अखबारों ने भी अपने-अपने ढंग से इन सर्वेक्षणों के आंकड़ों को अत्यंत प्रमुखता से अवश्य ही पेश किया होगा, जिसमें कई सारी बातें देश स्तर पर, राज्यवार, क्षेत्रवार पेश हुई होंगी. मेरे जैसा आदमी, जो आम तौर पर अखबारों को पढ़ना और उनको मनन करना पसंद करता है, वह तो इन सभी सूचनाओं को सही ही मानेगा, भले ही उसे थोड़ा सा भ्रम जरूर हो जाए कि यदि ये चारों और इसी जैसे अन्य तमाम बड़े अखबार एक साथ सही हैं तो इनमे से वास्तव में नंबर एक पर कौन है. कुछ-कुछ वैसी ही दशा जो कई सारे डिटरजेंटों के विज्ञापन को एक साथ देखने के बाद हो जाती है या फिर जिस प्रकार से कई सारे टूथपेस्ट ग्राहकों को अपनी-अपनी खासियतों के बखान के बीच कुछ दिग्भ्रमित से कर देते हैं.

पर इससे बढ़ कर एक बात जो मुझे लगती है वह यह कि अन्य सामानों की तुलना में अखबारों का कारोबार कुछ अलग सा जरूर होगा और अंत में इनका बिकना इनके कंटेंट और इनकी पाठकों के प्रति ईमानदारी पर ही आ कर आधारित हो जाती होगी. पाठक का अखबार से बड़ा गहरा और नाजुक रिश्ता होता है और वह किसी भी सर्वेक्षण के परिणामों की तुलना में पाठकों के मन में अखबारों के प्रति उठने वाले आतंरिक भाव से ज्यादा प्रभावित होता है. कम से कम मैं तो ऐसा ही मानता हूँ.

लेखक अमिताभ ठाकुर पुलिस अधिकारी हैं. इन दिनों अवकाश लेकर शोध, लेखन और घुमक्कड़ी के काम में व्यस्त हैं. उनसे संपर्क amitabhthakurlko@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

Comments on “अखबार नंबर वन!

  • kumar kalpit says:

    amitabh jee isse achcha tu rastriya sahara hai. mai isi liye uska fan hoon .yah nambar ek pachre me parata hee nahee.kabhee uska add nambar ek ka dava kane wala.ab yah alag baat hai ki dava karne kee usak haishyat hee nahi hai.har jagah neeche se nambar 1 hai.kahne ko apne ko sabse bada media house kahta hai..;D

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  • अमिताभ ठाकुर ji Aapka khna so fisadi sahi hai. sbhi अखबार अपने-अपने ढंग से इन सर्वेक्षण krate hai. fir aab to gooskhori ka jmana hai jo chahe kara lo

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