: एक-दूसरे को सरेआम मां-बहन से तौल डाला, झोंटा-नुचव्वल की नौबत : सरकारी कालोनी में मर्दाना गालियों से लैस भिड़ीं दो आधुनिकायें : लखनऊ : यूपी के बदलते माहौल का अंदाजा लगाना हो तो यह टेप सुन लीजिए। यहां राजनीतिक तौर पर तो हालात सड़कछाप हो ही चुके हैं, प्रबुद्ध और जिम्मेदार माने जाने वाले वर्ग भी अब सड़कछाप होते जा रहे हैं।
मसलन, यूपी के बेअंदाज और बदतमीज अधिकारी और पत्रकारिता की टोपी पहनकर धौंसपट्टी का धंधा लोग। अपने दफ्तरों में तो यह अफसर आम आदमी पर अपने रूआब को गालिब रखना शान समझते ही हैं, सरकारी कालोनियों में रहने के दौरान भी यह लोग बाकी लोगों को घटिया मानते हैं, जबकि पत्रकारिता के नाम पर अपनी दुकान चलाते हुए सरकारी रकम और सरकारी मकान पर कब्जा जमाये इन नये तथाकथित पराड़करियों की जमात भी इनसे हजार हाथ आगे है। अब तो सड़क पर इनके घर की महिलाएं भी उतर आयी हैं। इनका नया हथियार है किसी को शर्मिंदा कर देने वाली गालियां, जिन्हें सुनकर साथ रहे रहे पड़ोसियों और उनके बच्चों के कान की लवें तक लाल हो जाएं।
यह टेप ऐसी ही बातचीत का है, जिसे सड़कछाप झगड़ा कहा जाता है। हुआ यह कि तहजीब और तमद्दुन का शहर समझे जाने वाले लखनऊ के अलीगंज में साइंस सेंटर से सटी राज्य सम्पत्ति विभाग की आवासीय कालोनी है एमआईजी। यहां रविवार को दो महिलाओं के बीच झगड़ा हो गया। अपनी अभद्रता के लिए पूरी कालोनी में कुख्यात और इंदिरा भवन स्थित बाल विकास विभाग की एक अधिकारी रूबीना बेग यहां एक नम्बर के मकान में रहती हैं, जबकि उनके बगल वाले चार नम्बर में पत्रकारिता के नाम पर धौंसपट्टी का धंधा करने वाले रमेश सिंह का परिवार रहता है। बताते हैं कि आजकल वे अपने धंधे के सिलसिले में यूपी से बाहर है, लेकिन घरवाले यहीं जमे हैं। हालांकि राज्य सम्पत्ति विभाग उनका यह महान अवैध करार देकर मकान खाली करने की नोटिस भी उन्हें थमा चुका है, लेकिन साहब चूंकि पत्रकार होने का दावा करते हैं, सो दबंगई से काबिज हैं। हां, कुछ रिश्तेदारी भी उन्होंने राज्य सम्पत्ति विभाग में निकाल ली है।
रूबीना बेग के पीसीएस अफसर रहे पति का निधन करीब पंद्रह साल पहले हो चुका था। इसके बाद वे एक दूसरे पीसीएस अफसर सत्येंद्र सिंह रघुवंशी के साथ रहने लगीं। सत्येंद्र सिंह की एक पहली पत्नी निरालानगर में अपने बच्चों के साथ हैं। हालांकि दो पत्नियां रखना कानूनन जुर्म है, लेकिन यूपी में दबंग अफसरों को इसकी परवाह कहां। सत्येंद्र सिंह से उनके दो बच्चे भी हैं जो इंटर व हाईस्कूल में पढ़ते हैं। पूरी कालोनी में रूबीना बेग केवल बेअदब और झगड़ालू महिला के तौर पर ही पहचान बना पायी हैं। दफ्तर में भी उनकी यही छवि है।
उधर रमेश सिंह पत्रकारिता के नाम पर इस मकान में तब काबिज हुए जब भाजपा में कुसुम राय की तूती बोलती थी। अपने पत्रकारीय जीवन में रमेश सिंह सन 90 में बीस दिन तक बरेली अमर उजाला और उसके बाद डेढ़ महीना तक बरेली में ही दैनिक जागरण में रहे। अगले छह बरसों तक वे केबिल आपरेटर का काम करते रहे, फिर कुबेर फाइनेंस कंपनी के अखबार में सात महीना तक काम किया। आखिरकार वहां से भी निकाले गये। केबिल आपरेटर का काम तो चल ही रहा था, एक पीसीओ भी उन्होंने खोल लिया। सन 2010 में वे साप्ताहिक आग में विज्ञापन सहायक हो गये। केवल तीन दिन के लिए। उसके एक महीने बाद वे डीएनए में विज्ञापन सहायक के तौर पर जुड़े लेकिन अगले ही दिन उनकी विदाई हो गयी। तब से लेकर आज तक वे पत्रकारिता से कोसों दूर अपना केबिल और पीसीओ का धंधा कर रहे हैं। दरअसल, हाल के दिनों में वे मीडिया से इस कारण जुड़ना चाहते थे ताकि उनका सरकारी मकान बचा रहे। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। फर्जी कागजात लगा कर उन्होंने हाईकोर्ट से राहत पाने की उम्मीद पाली तो जरूर, लेकिन हाईकोर्ट ने उन्हें पत्रकार मानने से ही इनकार कर दिया।
बहरहाल, रविवार को रमेश सिंह की पत्नी और रूबीना बेग के बीच झगड़ा हो गया। पत्नी कमजोर पडी तो अपनी बहन को बुला लिया। बेहद मामूली मसले से शुरू हुआ यह विवाद किस स्तर तक पहुंचा, आप खुद ही देख लीजिए। टेप में तेज आवाज रमेश सिंह की पत्नी और उनकी साली की है, जबकि दबी हुई आवाज रूबीना बेग की है। दबी इसलिए है क्योंकि वे अपने घर के किचन की खिड़की से बोल रही हैं। हां, एक खास बात यह कि इस झगड़े के दौरान कालोनी के बाकी लोगों ने अपने बच्चों को घर में बुलाकर अपने खिड़की-दरवाजे बंद कर लिए थे। लेकिन पीडब्ल्यूडी के काम पर लगे मजदूरों और गुजरते लोगों ने बाकायदा मजमा लगा कर इसका मजा लिया।
दोनों महिलाओं के बीच की गालीवार्ता सुनने के लिए नीचे दिए गए आडियो प्लेयर के साउंड को फुल कर लें और प्ले कर लें…
लखनऊ से कुमार सौवीर की रिपोर्ट. संपर्क- 09415302520












Harishankar Shahi
September 1, 2011 at 11:41 am
धन्य हो गुरुदेव अपने ही मोहल्ले में स्टिंग आपरेशन कर डाला आपने. यशवंत भाई जी के भडासी आश्रम में मोहल्ले की भड़ास की जगह मिल रही है. वैसे सच उजागर हुआ कि पत्रकार और अफसर बनने के पीछे कारण क्या है? सिर्फ धौंस गिरी ही काम में लाने के लिए हो रही पत्रकारिता और अफसरी.
आपके स्टिंग से यह भी पता चल गया की आपकी कालोनी में खतरनाक टाइप के जीव भी रहते हैं. अब बचकर निकलना पड़ेगा उधर से. धन्य हैं आप और धन्य है भडासी आश्रम जहां से गालियाँ भी सर्वसुलभ हो गई.
Sudhanshu Kumar Tiwari
September 1, 2011 at 1:37 pm
पता नहीं श्रीमान् कुमार सौवीर जी अपने आपको पत्रकार मानते हैं या फिर कुछ और ही हैं … मुझे सौवीर जी के बारे में कुछ भी नहीं पता, लेकिन आपने मुहल्ले में झगड रहीं दो पडोसी महिलाओं का टेप किस उद्देश्य से यहॉं दिया हैं स्पष्ट नहीं हो पाया । मेरा विचार है कि आपका जरूर कोई मतभेद इन लोगों से रहा होगा जो आप इन लोगों को व्यक्तिगत रूचि लेकर बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं । ये पत्रकारिता तो कतई नहीं हो सकती है । कुमार सौवीरजी, मैं इस टिप्पणी के माफी चाहता हूँ, लेकिन ये कहना जरूरी था।
मदन कुमार तिवारी
September 1, 2011 at 4:57 pm
सर जी लगता है आप भी पडोस में हीं रहते हैं। आपको जाना चाहिये था झगडा छुडाने के लिये, पडोसी के नाते यह आपका फ़र्ज था। फ़िर नजदीक जाते तो गालियाम साफ़ सुनाई पडती
rakeshraj
September 20, 2011 at 7:12 am
कुमार सौवीर जैसे लोग पत्रकार भी कहलाते हैं. ताज्जुब की बात है. भंडुवा शब्द इनके लिए एकदम सटीक है. दूसरों के इंक्रीमेंट लेटर के बारे में लिखना. दूसरों की गाली गलौच के बारे में लिखना और अपनी बात को बचपन में पढ़ी सुभाषितानि से सही साबित करना इनका शगल है. वैसे इनका यह लेखन तब इतना दहाड़े क्यों नहीं मारता था जब ये मुख्यधारा की पत्रकारिता में थे. तब तेल लगाने में ही सारा वक्त जाया हो जाता था. अब उसी तेल को शिव का गरल बताते हैं और कहते हैं कि उस गरल को पीकर जीवट पत्रकार बना हूं. बैठे ठाले के धंधे को शिव के गरल से सटीक जोड़ा है.