औरत जवान और खूबसूरत हो तो फिर बात ही क्या…

: मुझे बताया गया था- ”साहित्य और संगीत से लड़कियों को दूर रहना चाहिए क्योंकि इन विषयों के ज्यादातर शिक्षकों का चरित्र अच्छा नहीं होता” : अभी भड़ास पर सोम ठाकुर जी का साक्षात्कार पढ़ा. यह साक्षात्कार महाराज सिंह परिहार द्वारा लिया गया था. इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि कवि-सम्मेलनों में काव्य पाठ करना एक विजुअल आर्ट है, जैसा कि सोम जी ने भी कहा है.

पर यह सिर्फ कवयित्रियों पर ही लागू होता है और हर दर्शक आकर्षक और जवान महिला को ही देखना चाहता है, उनकी इस बात से मैं बिलकुल ही सहमत नहीं हूँ. फिर उनका यह विचार कि महिलाओं में लेखन की प्रतिभा प्रायः नगण्य होती है और ज्यादातर महिलायें मंचों पर अपनी आकर्षक देहयष्टि व गलेबाजी के कारण हैं, यह उनकी पुरुषवादी मानसिकता को दर्शाता है. फिर मैं तो जितने भी काव्य-सम्मेलनों में गई हूँ उसमें कवियों के मुकाबले कवयित्रियों की संख्या नाममात्र को ही रही है. वैसे भी पुरुषों के लिए किसी भी स्त्री की उपलब्धि को कम कर आंकने का सबसे अच्छा तरीका यही होता है कि उसकी उपलब्धि के लिए उसके औरत होने को ही कारण बताएं. खास कर यदि वह औरत जवान और खूबसूरत हो तो फिर बात ही क्या.

इस पूरे साक्षात्कार के केंद्रबिंदु में मंचीय कविता और उसका गिरता स्तर था. इस विषय पर  सोम जी ने अपने विचार भी बड़ी ही बेबाकी से रखे हैं. पर जिस बात ने मुझे लिखने पर विवश किया वह थी सोम जी की महिला कवयित्रियों के ऊपर की गई टिप्पणी. मैं कोई कवयित्री नहीं हूँ और न ही मुझे मंचीय कविता का कोई अनुभव है. कविता से जो मेरा थोड़ा-बहुत जुड़ाव हुआ वह मेरा साहित्य के विद्यार्थी होने के नाते हुआ. पर कवि-सम्मेलनों में जाने का मौका मुझे अपने विवाह के बाद मिला. मुझे याद है जब मैंने बीए आनर्स में हिंदी साहित्य लेने का फैसला किया था तो मेरे इस फैसले का मेरे घर में कितना विरोध हुआ था.

मेरे इस विरोध का कारण पूछने पर मुझे जो जवाब मिला वह अपने-आप में कम रोचक नहीं था. उनका मानना था कि साहित्य और संगीत से लड़कियों को दूर रहना चाहिए क्योंकि इन विषयों के ज्यादातर शिक्षकों का चरित्र अच्छा नहीं होता और न जाने साहित्य के नाम पर प्रेम संबंधी बातें और उपन्यास वगैरह ही क्यों पढाते हैं. फिर उनकी नजरों में इन बातों को समझने लायक मेरी उम्र नहीं थी. पर मैं यह नहीं समझ पाती कि चरित्र का साहित्य पढ़ने से क्या सम्बन्ध है. वह तो भला हो कि हमारे एक रिश्तेदार हिंदी-साहित्य में ही विश्वविद्यालय में रीडर के पद पर थे. मेरे  दादाजी से उनकी धार्मिक विषयों पर खूब बातें होती थी. जब उन्होंने समझाया कि साहित्य में सिर्फ यही सब नहीं है किसी ने आपको गलत बता दिया है तब जाकर घर वाले इस बात पर सहमत हुए.

सहमत होने का एक कारण यह भी था कि जिस कालेज में मैं पढ़ती थी वह सिर्फ लड़कियों के लिए था और वहाँ पढाने वाली सारी शिक्षिकाएं थीं. पर मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि वे पुरुष शिक्षकों की तुलना में किसी भी तरह से कमतर थीं. उनमें से कुछ कवि-सम्मेलनों में भी जाती थीं पर मुझे उन्हें सुनने का मौका अपने विवाह के बाद मिला. चूँकि मेरे पति की रुचि इसमें थी इसलिए अक्सर हम कवि-सम्मेलनों में जाया करते थे. मेरे लिए यह बिलकुल नया अनुभव था. इससे पहले टीवी पर कुछ कवियों को सुना था पर प्रत्यक्ष देखने और सुनने का अवसर अब मिला था.

पर एक चीज जिसे देख मैं हतप्रभ थी और अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पा रही थी वह थी अपनी एक अध्यापिका का व्यवहार जो उस कवि सम्मलेन में आईं थीं. हमेशा आत्मविश्वास से भरी रहने वाली वे शिक्षिका उस दिन डरी-सहमी सी मंच पर एक तरफ बैठी थीं. मैं खासतौर से उस दिन उन्हें सुनने गई थी. जिनकी कवितायें पूरे कालेज में बड़े मनोयोग से सुनी जाती थी और जिनके बारे में हम सुनते थे कि उन्होंने लालकिले से भी काव्य पाठ किया है. कई बार टीवी पर भी गाते सुना था. उनकी यहाँ ऐसी दशा क्यों है, यह बात किसी भी तरह से मेरी समझ में नहीं आ रही थी.

वह तो आयोजको ने जब मुख्य अतिथि होने के नाते मेरे पति को मंच पर बुलाया तो उनसे मिलने के लिए मैं भी उनके साथ हो ली. मंच पर बैठते ही मुझे उनके इस तरह से दबे-सहमे होने का राज समझ में आ गया. ज्यादातर कवियों ने शराब पी रखी थी. और उनके अनुसार यह तो उनकी शुरुआत थी. जैसे-जैसे सम्मलेन आगे  बढ़ता, उनके पीने की रफ़्तार भी बढ़ती जाती. और अगर उन्हें पैसों की जरूरत न होती तो वे यहाँ कभी नहीं आतीं. कवियों का ऐसा रूप भी हो सकता है, यह उस समय मेरी समझ से परे था. उसके बाद भी कुछ कवि सम्मेलनों में अपने पसंददीदा कवियों को सुनने मैं गई. पर इन सम्मेलनों के माहौल को देख कर अब मैं उसमें जाने की हिम्मत जल्दी नहीं जुटा पाती हूँ.

अंत में यही कहना चाहूंगी कि यदि सचमुच मंचीय कविता और कवियों की गरिमा और लोकप्रियता को बचाये रखना है तो सबसे पहले इस क्षेत्र में फैली हुई गुटबाजी को खत्म करना चाहिए. ज्यादातर कवि मंच पर शराब पीकर काव्य पाठ करते हैं और कई तो मंच पर भी पीना शुरू कर देते हैं. ऐसे कवियों को सम्मलेन में तब तक न बुलाया जाए जब तक वो ऐसा करना छोड़ न दें. हास्य के नाम पर द्विअर्थी व अश्लील कविताओं को सुनना-सुनाना बंद करें. साथ ही देर रात तक के कवि सम्मेलनों की जगह शाम के समय में यदि इसे आयोजित किया जाए तो निश्चित ही गंभीर श्रोताओं की संख्या बढ़ेगी.

डॉ. नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम

लखनऊ

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Comments on “औरत जवान और खूबसूरत हो तो फिर बात ही क्या…

  • Ankit Khandelwal says:

    Haalanki main umar or tajurbe main sabhi se kaafi chota hoon.. but main nutan ji ki baat se bilkul sehmat hoon..

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  • Abhimanyu Tyagi says:

    Yeh toh hum log bhi dekh rahe hain .. jitne bhi kavi sammelan ya mushayere mein ja rahe hain wahan sunne wale jo kuch log hote hain woh he mahilao ko capture kiye hote hai yahan tak ki un mahilao ko laane lejaane ka kaam bhi wahi log kerte hain
    Bahut bhadiya likha aapne

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  • vikas bihari singh says:

    kabisammelan ki safalta kelie to aaj kal kavitriyo ka manch par hona jaroori mana ja raha hai. lekin jin kathinaiyo ka jikra aapane kiya hai wo sahi hai. mahilayo ke prati kaviyo ki masikata me badlaw hona chahiye. kavi sammelano me sharab pi kar kavita paath karane par bhi rok lagani chahiye.

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  • Nutan ji ,aap ko hairat hogi yeh rog sirf Som Thakur ko hi nahi laga hai.aur bhi bahut log hai .aap ko aur likhna chahihe aur jabab bhi dena chahiye.

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