और ये रही ‘जनवाणी’ की दूसरी समीक्षा

: इसे जनवाणी, मेरठ से जुड़े एक पत्रकार ने भेजा है– एक लंबी पारी की आहट, खेल शुरू हुआ है, सबकी नजर है, दो गेंदें फेंकी जा चुकी हैं, स्कोर बोर्ड पर अभी कोई विकेट दर्ज नहीं है और गेंद सीमा रेखा के पार भी नहीं पहुंची है, कसी हुई फील्डिंग के बीच देखिए कब ढीली गेंद मिलेगी या फिर फील्डर को छकाते हुए कोई सनसनाता चौका गुजरेगा या फिर कोई आसमानी शॉट एक ही झटके में स्कोर में छह पायदान की बढ़त दिला देगा, देखते रहिए ये मैच बहुत लंबा है, पर नीरस नहीं :

बाजार बेरहम होता है। बाजार हवाएं फैलाता है। कभी शताब्दी के अंत की, कभी विचारों के अंत की और कभी इतिहास के अंत की। अंत एक शुरुआत से जुड़ा होता है और विचार की काली सुरंगों में अंत के साथ ही एक महीन और सजग शुरुआत होती है। बाजार को शोरगुल पसंद है और जनवाणी के आगमन को भी कैश करने की फिराक में यह शोर बीते चार महीनों से मेरठ की फिजाओं से होता हुआ पूरे पश्चिमी यूपी और उसके आसपास के क्षेत्र व जुड़े शहरों में फैलता रहा। इस शोरगुल में अब कुछ नई खुरपेंच शामिल हो गई हैं। समीक्षाओं का दौर शुरू हो गया है। हम जो पाठक हैं और पत्रकार भी उन्हें पता था।

कोई प्रॉडक्ट बाजार में आता है, तो उसके दावों को तौला ही जाता है। वे कसौटी पर थे। विभिन्न पिचों पर रन बरसाने वाले और विरोधी गोलंदाजों को सीमारेखा के पार गेंद की लंबाई दिखाने वाले बल्लेबाज कसौटी पर थे। अच्छे और मंजे हुए बल्लेबाज जब नई पिचों पर पहुंचते हैं, तो पहली गेंद को पूरे सम्मान के साथ खेलते हैं, फिर यहां तो तीन धुरंधर और अनुभवी गोलंदाज थे। पहली गेंद को सीमारेखा पर पहुंचाने की उत्साही कोशिशें कोई नया बल्लेबाज ही करेगा। लंबी पारी की बुनियाद बड़े शॉट्स और तीखे हमले पर नहीं, एक-एक र्इंट को पूरी मजबूती से लगाने पर होती है। यह बात यशपाल सिंह से बेहतर शायद ही मेरठी पत्रकारिता में कोई जानता हो।

निजी बातचीत में वे अक्सर इस तरह के रूपकों का इस्तेमाल करते हैं। इस रूपक के साथ मीडिया की जटिल होती, दुनिया को समझने वाले जानते हैं कि महज पत्रकारिता या कंटेट के सहारे मार्केट में टिके रहने के नैतिक दावों में अब दम नहीं हैं। एक नवप्रवेशी अखबार ने जो हलचल मेरठ के मीडिया जगत में की है, उसके पीछे के हौसले, विश्वास और जुनून को सलाम करने का दिन है यह। साथ ही पाठकों की सत्ता में वापसी का भी दिन है। जो बुनियादी बदलाव अब मेरठ की पत्रकारिता में होने जा रहे हैं, उन्हें परखने का भी समय है।

याद कीजिए कि आखरी बार कब एक अखबार की लॉचिन्ग में टीम के नाम इस तरह व्यापक रूप से प्रचारित हुए थे। भास्कर की बीते दशक में ताबड़तोड़ लॉचिन्ग हों, या जागरण समूह के पसरने की कवायद, या फिर अमर उजाला के पंजाब से हाथ पीछे खींचने की शुरुआत या फिर हिंदुस्तान के चंडीगढ़ और कोलकाता से कदम पीछे हटाने का दौर या फिर पत्रिका समूह के नाम परिवर्तन के साथ दक्षिण और मध्य भारत में जाने का दौर। इनमें से किसी भी लॉचिन्ग में संपादक हाशिए पर थे। प्रबंधन की नीतियां प्रमुख थीं। दुआएं कीजिए कि प्रभात खबर की लॉचिन्ग के बाद एक और उदाहरण हिंदी पत्रकारिता में सामने आया है कि एक संपादक के हाथों में पूरी टीम की कमान है। हरिवंश जी से यशपाल सिंह की तुलना एक जल्दबाज तुलना है, लेकिन उम्मीद के जिस सिरे पर हम खड़ें हैं, उसके पीछे एक लालची दलदल है और सामने ऐसी ही छोटी-छोटी उम्मीदें।

खबर है कि अखबार की समीक्षा कई सिरों से की जा रही है। भाषाई अशुद्धियां और कंटेट की उठापटक के बीच खबरों की सनसनी पर भी भोंहें टेड़ी की जा रही हैं। अच्छी बात है। यह करना ही चाहिए, लेकिन जरूरी यह है कि जनवाणी की टीम इसे एक स्वस्थ आलोचना की तरह ले और साबित करे कि अभी गंगा में बहुत पानी बहेगा। फिर भी सेंटर्स पर जुटी दिग्गजों की भीड़, संपादकीय से लेकर प्रबंधन और सर्कूलेशन से लेकर मार्केटिंग तक के बड़े नामों का रात-रात भर शहर में भटकना बहुत कुछ कह देता है। बहरकैफ जनवाणी सधी हुई शुरुआत की लंबी लड़ाई के लिए गफलती माहौल तैयार की रणनीति के तरह देखने वाले दिमाग भी कम नहीं है। कुछ खिसियाहटें भी हैं, जो आसानी से जान सकते हैं कि किनकी होंगी। कुछ वे होंगे, जो अपने अपने अखबारों से दुखी होकर चेंज चाहते होंगे। कुछ को अपनी छुपी प्रतिभा पर ऐतबार होगा और उन्हें याद नहीं किया गया और कुछ प्रबंधनों के चरणों में लोटने वाले खबरफरोश होंगे।

अंत में यह याद रखना भी जरूरी है कि यह अखबारी लीपापोती से परे मार्केट की लड़ाई है और इसमें हमें देखना होगा कि कौन कहां खड़ा है। जागरण, उजाला और हिंदुस्तान के बहुमुखी प्रतिभाशाली और अनुभवी दिमागों को टटोलिए, उनके चेहरे के तनावों से गुजरिए। शोरगुल सन्नाटे में टूटा या फिर एक बड़ी उम्मीद को थोड़े में समेटकर बड़ी पारी की नींव रखी गई, यह बहस का मुद्दा है, उनके लिए जो महज खबरों तक सोचते हैं। विचारों और खबरों से दीवालिया होने की घोषणाएं हों या फिर फ्लाप शो की एकसूत्रीय आलोचना। दोनों को ही उस हल्के और नासमझ समीक्षक की बेचैनी से उपजा बयान मानना चाहिए, जिसे इतिहास की गति और भविष्य की दूरी का न तो अंदाजा है और न ही अंदेशा।

समाजशास्त्र का एक सामान्य नियम है कि बदलाव नई चीजें पैदा करते हैं। अमर उजाला   जब मेरठ की पत्रकारिता में आया तो कुछ बदलाव हुए, हिंदुस्तान ने भी बहुत सारे अच्छे बदलाव किये, जनवाणी भी उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। पत्रकारों के हालात बेहतर हुए, उन्हें आर्थिक विपन्नता से छुटकारा मिला और काम के अवसर भी ज्यादा हुए। बदलाव के इस दौर में ही हम कह सकते हैं, कि अब फिर कल का सूरज ही आज चमकेगा, लेकिन उसका कोण बदल जाएगा। सूरज के घूमने से नहीं, धरती के घूमने के कारण। धूप थोड़ी तीखी होगी और लड़ाई भी। बेहतरी की उम्मीद के साथ।

शुभकामनाएं, मेरठ की पूरी पत्रकार बिरादरी को।

लेखक जनवाणी, मेरठ के जर्नलिस्ट हैं और उनका अनुरोध है कि उनका भी नाम समीक्षा के साथ प्रकाशित न किया जाए. अगर ‘जनवाणी’ अखबार के शुरुआती दो दिनों के अंक के बारे में कोई कुछ और कहना चाहता है या कोई समीक्षा लिखकर भेजना चाहता है तो उसका भी स्वागत है. इसी तरह लखनऊ के पत्रकारों व पाठकों से भी अनुरोध है कि वे नए लांच अखबार जनसंदेश टाइम्स के शुरुआती कुछ दिनों के अंकों के आधार पर कंटेंट की समीक्षा करके भेजें. हमारी मेल आईडी bhadas4media@gmail.com है. इन समीक्षाओं से पूरे देश के मीडिया जगत को यह जानने का मौका मिलता है कि आखिर नए अखबार किस प्रकार के हैं और उनके तेवर व तमीज किस तरह के हैं.

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Comments on “और ये रही ‘जनवाणी’ की दूसरी समीक्षा

  • sunil navprabhat@gmail.com says:

    समाजशास्त्र का एक सामान्य नियम है कि बदलाव नई चीजें पैदा करते हैं

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  • डॉ. महाराज सिंह परिहार says:

    बहुत अच्‍छी टिप्‍पणी की है नवीनतम जनवाणी के संदर्भ में। टिप्‍पणीकार ने यह लिखा है कि अधिकांश अखबारों की लांचिंग में संपादक हाशिये पर रहे हैं। शायद उन्‍हें यह सच्‍चाई पता नहीं है कि अभी विगत 8 फरवरी को लखनऊ में दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स की लांचिंग हुई थी। लांचिंग प्री कार्यक्रम में इस अखबार के संपादक डा. सुभाष राय ही छाये हुए थे। संपादकीय समृद्धि से आपूरित यह अखबार लखनऊ और आसपास के जिलों में अपना उद्घोष कर रहा है।

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  • जनवाणी की मजबूती का सबसे बड़ा श्रेय यशपाल जी को जाता है, जो टीम उन्होने खड़ी की है वो सभी अपनी-अपनी विधा के मंजे हुए खिलाड़ी है। मेरी एक छोटी सी सलाह है आने वाले दिनों में अखबार को भरने की कोशिश ना करें बल्कि सच की आंख से आंख मिलाकर बेखोफ अभिव्यक्ति प्रकट करे। कल का अंक मिला ही नहीं आज दूसरा अंक देखा बहुत बढि़या लगा। कैरियर वाले पेज में गुंजाइश थी। विनित शारदा के विज्ञापन को देखकर दुख हुआ। अखबार कैसे बचेगा सस्ती चाटूकारिता से।

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  • Ek din me danik janwani ke alochna karna sahi nahi hai, expert ke team collect ho gayi hai, abi intjar karna hoga, acha result aa sakta hai

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