कदम न रुकेंगे, सांसें भले रुक जाएं : एसएन विनोद

: दैनिक 1857 के एक साल पूरा होने पर प्रधान संपादक की विशेष टिप्पणी : स्वामी विवेकानंद ने एक अवसर पर कहा था, ”विष और शस्त्र से केवल एक की हत्या होती है, कुविचार से बहुतों का नाश होता है।” आज जब आपका ‘दैनिक 1857’ अपने प्रकाशन का प्रथम वर्ष पूरा कर रहा है तो, मैं शपथपूर्वक यह कहने की स्थिति में हूं कि आपके इस अखबार ने कुविचारों को कभी स्थान नहीं दिया। हां, सच और साहस को प्रतिपादित करते हुये हमने निडरता, निष्पक्षतापूर्वक कुछ कड़वे सच अवश्य उकेरे। हमने पिछले एक वर्ष की यात्रा कांटों भरी ही नहीं, अवरोधक के रूप में खड़ी विशाल चट्टानों का सामना करते पूरी की है। क्या नहीं झेलना पड़ा हमें?

मुझे याद है 4 अक्टूबर 2009 की वह संध्या जब स्थानीय पत्रकार भवन सभागृह में ‘दैनिक 1857’ का लोकार्पण हो रहा था, लोकमत समाचारपत्र समूह के अध्यक्ष श्री विजय दर्डा व अंग्रेजी दैनिक हितवाद के प्रबंध संपादक श्री बनवारीलाल पुरोहित ने इसे लोकार्पित किया था। सभागृह के अंदर और बाहर कुछ फुसफुसाहटें उभरी थीं- ”…आखिर कब तक?… हफ्ते-10 दिन या महीना भर से ज्यादा चलेगा क्या?” आशंका व्यक्त करने के कारण मौजूद थे। प्रकाशक के रूप में कोई बड़ा मीडिया हाउस या बिजनेस हाउस नहीं। नौकरीपेशा- एक श्रमजीवी पत्रकार जब दैनिक अखबार निकाले तब लोगों के दिलों में स्वाभाविक रूप से ऐसी शंका तो उठनी ही थी। मित्रों, शुभचिंतकों और पाठकों के विश्वास की पूंजी के साथ मैंने इस ‘दैनिक 1857’ का प्रकाशन शुरू किया। एक बिल्कुल पृथक, बौद्धिक आजादी के आंदोलन के रूप में। यात्रा शुरू हुई तो आज इसने आरंभ का 1 वर्ष पूरा भी कर लिया।

जिन अवरोधकों की मैंने चर्चा की है, उसकी टीस हमेशा सालती रहेगी। नागपुर जैसे अपेक्षाकृत शांत शहर के भीड़ भरे चौराहे पर ‘दैनिक 1857’ की प्रतियां जलाई गईं। हमारा दोष यह था कि हमने एक अंग्रेज द्वारा लिखित उस पुस्तक के कुछ अंश प्रकाशित किए जिसमें उस लेखक द्वारा महात्मा गांधी को चरित्रहीन साबित करने की कोशिश की गई है। प्रसंगवश बता दूं कि हमने जितना प्रकाशित किया था, उससे कई गुना ज्यादा अंश बड़े समाचारपत्रों एवं पत्रिका में प्रकाशित हो चुके थे। लेकिन प्रतियां जलाई गईं सिर्फ ‘दैनिक 1857’ की। और बता दूं, वह पुस्तक ‘गांधी: नेकेड एम्बिशन’ आज नागपुर सहित देश के प्राय: सभी शहरों में बिक रही है। लेकिन आपके अखबार की होली जलाने वाले कथित गांधीवादियों ने आंखें मूंद रखी हैं। यह एक उदाहरण काफी है यह साबित करने के लिए कि अखबार को जलाने के पीछे उनकी मंशा क्या थी। गांधी के प्रति उनका प्रेम तो सिर्फ दिखावा था।

षड्यंत्र यहीं नहीं रुका, जब विदर्भ के हर क्षेत्र से इस अखबार की मांग होने लगी, अखबार वहां पहुंचने लगा तब इसका वितरण षड्यंत्रपूर्वक रोका गया। विरोधस्वरूप हम यह लड़ाई लड़ रहे हैं और लड़ते रहेंगे। बड़े अखबारों के बीच देश में स्पर्धा के नाम पर जारी हथकंडों की जानकारी तो हमें है किंतु ‘दैनिक 1857’ जैसे एक पत्रकार के अखबार के विरुद्ध ऐसा षड्यंत्र? लेकिन मैं आश्वस्त हूं पाठकीय सहयोग-समर्थन के प्रति। मैं जानता हूं कि वार करनेवालों के खिलाफ एक दिन यह पाठकवर्ग हमारा सुरक्षा कवच बनकर चट्टान की तरह तनकर खड़ा रहेगा। षड्यंत्रकारियों को बेनकाब वह स्वयं कर देगा। अब 1 वर्ष की यात्रा के पश्चात् जब हम आगे की यात्रा की योजना बना रहे हैं तो हमारे सुधी पाठक यह जान लें कि ‘दैनिक 1857’ कुविचारों से दूर, सुविचारों के साथ प्रत्येक पाठक को आंदोलित करता रहेगा। प्रत्येक सुबह उनके दरवाजों पर दस्तक देता रहेगा। सीमित संसाधन से शुरू यह अखबार आकांक्षी है आपके सहयोग-समर्थन का। हमने चुनौती कुविचारों को दी है, सद्विचारों की गूंज हर पाठक के आंगन में पहुंचाने का बीड़ा उठाया है हमने। इस दौर में कदम तो नहीं रुकेंगे, सांसें भले रुक जाएं।

इस विशेष संपादकीय टिप्पणी का प्रकाशन आज नागपुर से प्रकाशित हिंदी ‘दैनिक 1857’ में हुआ है.

Comments on “कदम न रुकेंगे, सांसें भले रुक जाएं : एसएन विनोद

  • ajay tripathi says:

    विनोद सर,
    आपके साथ काम करने का मौका बहुत कम समय के लिए मिला, वह भी सुखदायी नहीं रहा। लेकिन कम समय में मैंने आपके बारे में जो जाना उसके दम पर मैं कह सकता हूं कि १८५७ हर संघर्ष करके जीतेगा और चलेगा। एक साल पूरा होने पर बधाई।

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  • prafulla nayak 094251-11001 gwalior says:

    RESP sir, pranam ke sath badhai be pauche. aapke sath sirf 2 month ke sath me kaafe kuch naya seekhne or karne ko mila, aaj tak usi seekh ko pakadkar aage badne ke kosis kar raha hoo. dainik 1857 ke ek saal poore hone par fir se badhai.

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  • Hirendra Kaushik says:

    Congratulation Sir……we want u to write your success stories year after year…..move ahead with truth and trustworthiness………..

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  • Bijay Singh. says:

    congratulations vinod ji. shayad ye Jamshedpur ke mukesh bhagat ke sath aapka joint venture hai.lage rahiye ,kamyabi jarur milegi.

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  • anis ahmad khan says:

    Vinod Bhai
    MANZIL MILE MILE NA MILE IS KA GHAM NAHI
    MANZIL KI JUSTJOO ME MERA KARWAN TO HE
    Apki himmat ko dad dene ko dil karta he VINOD Bhai

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  • anis ahmad khan says:

    EAH EJAZ HE MERI AWARGHI KA
    JAHA BHI GAYE NAKSHE PA CHHOD AYE
    Vinod ji apki himmat ko dad dene ko dil karta he
    Apka Shaghird
    ANIS AHMAD KHAN

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  • shridhr hatagale says:

    sir namste
    maine apke sath rashtrprakash me kam kiya hai me apake sampadikiy padhata hun aap jis tarah se shasan -samaj our sanskriti par bebak likhate hai wah asmarniy hai
    dhanyawad

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