: जयंती पर विशेष : किसी नागवार गुज़रती चीज़ पर/ मेरा तड़प कर चौंक जाना/ उबल कर फट पड़ना/ या दर्द से छ्टपटाना/ कमजोरी नहीं है/ मैं ज़िंदा हूं/ इस का घोषणापत्र है/ लक्षण है इस अक्षय सत्य का कि आदमी के अंदर बंद है एक शाश्वत ज्वालामुखी/ये चिंगारियां हैं उसी की जो यदा कदा बाहर आती हैं/ और ज़िंदगी अपनी पूरे ज़ोर से अंदर/ धड़क रही है-/ यह सारे संसार को बताती है/ शायद इसी लिए जब दर्द उठता है/ तो मैं शरमाता नहीं, खुल कर रोता हूं/भरपूर चिलाता हूं/ और इस तरह निष्पंदता की मौत से बच कर निकल जाता हूं।
कन्हैयालाल नंदन होना दरअसल धारा के विरुद्ध उल्टी तैराकी करना है. सिस्टम में हो कर भी सिस्टम से लड़ना किसी को सीखना हो तो नंदन जी से सीखे. और वह भी बडे़ सलीके से. अपनी एक कविता में वह सीधे ईश्वर से टकराते मिलते हैं. वह साफ कहते हैं कि, ‘लोग तुम्हारे पास प्रार्थना ले कर आते हैं/मैं ऐतराज़ ले कर आ रहा हूं.’ इतना ही नहीं वह एक दूसरी कविता में चार कदम और आगे जाते हुए कहते हैं; ‘तुमने कहा मारो/और मैं मारने लगा/ तुम चक्र सुदर्शन लिए बैठे ही रहे और मैं हारने लगा/ माना कि तुम मेरे योग और क्षेम का/ भरपूर वहन करोगे/ लेकिन ऐसा परलोक सुधार कर मैं क्या पाऊंगा/ मैं तो तुम्हारे इस बेहूदा संसार में/ हारा हुआ ही कहलाऊंगा/ तुम्हें नहीं मालूम/ कि जब आमने सामने खड़ी कर दी जाती हैं सेनाएं/ तो योग और क्षेम नापने का तराजू/ सिर्फ़ एक होता है/ कि कौन हुआ धराशायी/ और कौन है/ जिसकी पताका ऊपर फहराई/ योग और क्षेम के/ ये पारलौकिक कवच मुझे मत पहनाओ/ अगर हिम्मत है तो खुल कर सामने आओ/ और जैसे हमारी ज़िंदगी दांव पर लगी है/ वैसे ही तुम भी लगाओ.’
सचमुच वह विजेता की ही तरह हम से विदा हुए. सोचिए कि भला कोई डायलिसिस पर भी दस बरस से अधिक समय जी कर दिखा सकता है? नंदन जी ने दिखाया. और वह भी बिना किसी प्रचार के. नहीं लोगों को तो आज ज़रा सी कहीं फुंसी भी होती है, खांसी-जुकाम भी होता है तो समूची दुनिया को बताते फिरते, सहानुभूति और चंदा भी बटोरते फिरते हैं. पर नंदन जी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया. करना तो दूर किसी को बताते भी नहीं फिरते थे कि वह डायलिसिस पर चल रहे हैं. अपने कवि मित्र रमानाथ अवस्थी की उस गीत पंक्ति की तरह कि, ‘किसी से कुछ कहना क्या/ किसी से कुछ सुनना क्या / अभी तो और जलना है.’ वह चलते रहे. और तो और इस डायलिसिस की भयानक यातना में भी वह ज्ञानपीठ के लिए अज्ञेय संचयन पर काम करते रहे. अपनी आत्म-कथा के तीन खंड पूरे किए. और कि तमाम कवियों की प्रतिनिधि कविताओं का संपादन भी. अपनी रूटीन यात्राएं, काम-काज भी.
डाक्टर हैरान थे उन की इस जिजीविषा पर. हालां कि अपनी मौत को साक्षात देख पाना आसान नहीं होता. और नंदन जी देख रहे थे. डाक्टरों की तमाम घोषणाओं को तो वह भले धता बता रहे थे लेकिन लिख भी रहे थे, ‘बांची तो थी मैं ने/ खंडहरों में लिखी इबारत/ लेकिन मुमकिन कहां था उतना/ उस वक्त ज्यों का त्यों याद रख पाना /और अब लगता है/ कि बच नहीं सकता मेरा भी इतिहास बन पाना/ बांचा तो जाऊंगा/ लेकिन जी नहीं पाऊंगा.’ नंदन जी की यह यातना कि ‘बांचा तो जाऊंगा/ लेकिन जी नहीं पाऊंगा’ को बांचना भी कितना यातनादायक है तो वह तो इस यातना को जी ही रहे थे, सोच कर मन हिल जाता है. नंदन जी यह कोई पहली बार यातना नहीं बांच रहे थे. यातना-शिविर तो उन के जीवन में लगातार लगे रहे. लोगबाग बाहर से उन्हें देखते थे तो पाते थे कि वह कितने तो सफल हैं. उन की विदेश यात्राएं. उन का पद्मश्री पाना, बरसों-बरस संपादक बने रहना सफलता के ही तो सारे मानक थे. और क्या चाहिए था. तिस पर कवि सम्मेलनों में भी वह हमेशा छाए रहते थे. बतौर कवि भी और बतौर संचालक भी. उन का संचालन बरबस लोगों को मोह लेता था.
एक पत्रकार मित्र हैं जिन का कविता से कोई सरोकार दूर-दूर तक नहीं है, एक बार नंदन जी को सुनने के बाद बोले, ‘पद्य के नाम पर यह आदमी खड़ा-खड़ा गद्य पढ़ जाता है, पर फिर भी अच्छा लगता है.’ तो सचमुच जो लोग नंदन जी को नहीं भी पसंद करते थे वह भी उन का विरोध कम से कम खुल कर तो नहीं ही करते थे. वह फ़तेहपुर में जन्मे, कानपुर और इलाहाबाद में रह कर पढे़, मुंबई में पढ़ाए और धर्मयुग की नौकरी किए, फिर लंबा समय दिल्ली में रहे और वहीं से महाप्रयाण भी किया. पर सच यह है कि उन का दिल तो हरदम कानपुर में धड़कता था. हालां कि वह मानते थे कि दिल्ली उन के लिए बहुत भाग्यशाली रही. सब कुछ उन्हें दिल्ली में ही मिला. खास कर सुकून और सम्मान. ऐसा कुछ अपनी आत्मकथा में भी उन्हों ने लिखा है. पर बावजूद इस सब के दिल तो उन का कानपुर में ही धड़कता था. तिस में भी कानपुर का कलक्टरगंज. वह जब-तब उच्चारते ही रहते थे, ‘झाडे़ रहो कलक्टरगंज!’ या फिर, ‘कलेक्टरगंज जीत लिया.’

कन्हैयालाल नंदन से लोक कवि अब गाते नहीं उपन्यास पर पुरस्कार लेते दयानंद पांडेय. इस मौके पर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के तत्कालीन उपाध्यक्ष और सुपरिचित गीतकार सोम ठाकुर तथा पूर्व सांसद व कवि उदयप्रताप सिंह
बहुत कम लोग जानते हैं कि नंदन जी ने प्रेम विवाह किया था. वह भी अंतरजातीय. न सिर्फ़ अंतरजातीय बल्कि एक विधवा से. कन्हैयालाल नंदन असल में कन्हैयालाल तिवारी हैं. अब सोचिए कि अपने उम्र के जिस मोड़ पर नंदन जी ने यह प्रेम विवाह किया, पिछड़ी जाति की विधवा महिला से उस समय कितनी चुनौतियों से उन्हें दो-चार होना पड़ा होगा? एक ऊच्च कुल का ब्राह्मण और वह भी पिछड़ी जाति की विधवा महिला से विवाह करे, सो भी अपने गांव में ही, विरोध की पराकाष्ठा न झेलेगा तो क्या फूल बरसेगा उस के ऊपर? आज भी यही हालात हैं. पर नंदन जी ने तब के समय में यह किया. और न सिर्फ़ किया बल्कि डंके की चोट पर किया. हां, इस को भुनाते-बताते नहीं फिरे यह सब. सब कुछ भुगत लिया पर उफ़्फ़ नहीं किया. भगवान ने उन को जाने कितना धैर्य दे रखा था.
वह तो जब वह दिनमान-सारिका-पराग क्या दस दरियागंज के संपादक थे तब के दिनों की बात है. वह बार-बार भाग-भाग कानपुर जाते रहते थे. हफ़्ते में दो-दो बार. अंतत: सहयोगियों ने पूछा कि, ‘आखिर बात क्या है?’ तो नंदन जी के चेहरे पर संकोच और पीड़ा एक साथ उभर आई. बोले, ‘असल में पिता जी बहुत बीमार हैं. उन का इलाज चल रहा है.’ तो माहेश्वर्रदयालु गंगवार ने छूटते ही कहा, ‘तो पिता जी को दिल्ली ले आइए. यहां ज़्यादा बेहतर इलाज हो सकेगा. और कि आप को भाग-भाग कर कानपुर नहीं जाना पडेगा.’ वहां उपस्थित सभी ने गंगवार जी के स्वर में स्वर मिलाया. ‘अरे कहां कि बात कर रहे हैं आप लोग?’ नंदन जी धीरे से भींगे स्वर में बोले, ‘कैसे लाऊ? मेरे हाथ का पानी तक तो वह पीते नहीं.’ कह कर वह सर्र से अपनी केबिन में चले गए. फिर बाद में उन्हों ने बताया कि इस वज़ह से पिता उन के हाथ का पानी नहीं पीते. आज जब नंदन जी की याद आती है तो उन का वह कहा भी याद आता है, ‘अरे कहां कि बात कर रहे हैं आप लोग?’ ऐसे जैसे वह कोई तमाचा मार रहे हों अपने आप को ही. फिर उन्हीं की एक कविता याद आ जाती है;
अंगारे को तुम ने छुआ
और हाथ में फफोला भी नहीं हुआ
इतनी सी बात पर
अंगारे पर तो तोहमत मत लगाओ
ज़रा तह तक जाओ
आग भी कभी-कभी आपद धर्म निभाती है
और जलने वाले की क्षमता देख कर जलाती है
सचमुच नंदन जी की क्षमता ज़बर्दस्त थी. हाथ में जो जल कर फफोला पड़ भी जाए तो वह किसी को बताने वाले जल्दी नहीं थे. हां, यह ज़रूर था कि अगर किसी और के हाथ में फफोला पड़ जाए तो वह उसे सुखाने में ज़रूर लग जाते थे. युवाओं पर हमेशा मेहरबान रहते. मैं खुद जब उन से मिला तो युवा क्या बिलकुल लड़का ही था. बल्कि पहली बार जब उन से चिट्ठी-पत्री हुई तब तो मैं बी.ए. का छात्र ही था. गोरखपुर में. यह 1978 की बात है. गोरखपुर में प्रेमचंद ने लंबा समय गुज़ारा है. वह वहां विद्यार्थी भी थे और नौकरी भी किए. बल्कि वहीं बाले मियां के मैदान में गांधी जी का भाषण सुन कर शिक्षा विभाग के डिप्टी डायरेक्टर की नौकरी छोड़ दी. अंगरेजों के खिलाफ लड़ाई में कूद गए. दरअसल उसी गोरखपुर में प्रेमचंद ने जीवन के न सिर्फ़ कई रंग देखे, कई स्वाद चखे बल्कि कई रचनाएं भी रचीं. ईदगाह, पंच परमेश्वर से लगायत रंगभूमि तक की रचना की. अगर चीनी-रोटी खाने के लिए वह तरसे तो इसी गोरखपुर में, अफ़सरी भी की उन्हों ने इसी गोरखपुर में और नौकरी छोड़ कर खादी के लट्ठर कंधे पर लाद कर वह बेंचते भी फिरे इसी गोरखपुर में. लेकिन उन की याद में बने प्रेमचंद पार्क की बदहाली, उन की मूर्ति की फज़ीहत और कुल मिला कर प्रेमचंद की उपेक्षा को ले कर एक छोटी सी टिप्प्णी भेजी थी, तब सारिका को.
नंदन जी तब इस के संपादक थे. भेजते ही पहले उन का टेलीग्राम आया फिर चिट्ठी. वह वहां प्रेमचंद से जुड़ी फोटो भी चाहते थे. फोटो किसी तरह खिंचवा कर भेजी. किसी तरह इस लिए कि मेरे पास फ़ोटोग्राफ़र को एडवांस देने के लिए पैसे नहीं थे. और कोई फ़ोटोग्राफ़र बिना पैसे लिए फ़ोटो खींचने को तैयार नहीं था. सब कहते स्टूडेंट का क्या भरोसा? और मैग्ज़ीन से बाद में पैसा आए न आए? पिता से पैसे मांगने कि हिम्मत नहीं थी.खैर, किसी तरह एक फ़ोटोग्राफ़र, एक सज्जन की ज़मानत पर तैयार हुआ. भेज दी फ़ोटो. जुलाई में प्रेमचंद जयंती पर रिपोर्ट भेजी थी, अगस्त में फ़ोटो भेजी. अक्टूबर में मय फ़ोटो के रिपोर्ट छप गई. प्रेमचंद की मूर्ति की बगल में खडे़ हो कर मैं ने अपनी भी एक फ़ोटो खिचवाई थी.वह भी छप गई. शीर्षक छपा था जहां प्रेमचंद ने रंगभूमि की रचना की. मुझे यह सब कुछ इतना अच्छा लगा कि सारिका का वह पेज जिस में मेरी फ़ोटो भी छपी थी प्रेमचंद की मूर्ति के साथ, शीशे में फ़्रेम कर के घर की कच्ची दीवार पर टांग दिया.
एक बार रामेश्वर पांडेय घर पर आए. जाडे़ की रात थी. शायद दिसंबर का महीना था. लालटेन की रोशनी में भी उन्हों ने वह चित्र देख लिया. बड़ी देर तक देखते रहे. मैं ने पूछा क्या देख रहे हैं

कन्हैयालाल नंदन के साथ दयानंद पांडेय
खैर बात आई गई हो गई. बाद में डाक्टर कमल किशोर गोयनका की चिट्ठी पर चिट्ठी आने लगी. वह उन दिनों प्रेमचंद विश्वकोश पर काम कर रहे थे. वह प्रेमचंद के बारे में गोरखपुर से जुडी बातें जानना चाहते थे. लंबी-लंबी चिट्ठियों कई-कई सवाल होते. और हर बार वह एक सवाल ज़रूर पूछते कि आप क्या करते हैं? मैं हर बार इस सवाल को पी जाता था. अंतत: उन्हों ने लिखा कि दिल्ली विश्वविद्यालय के फला कालेज में 14 सालों से मैं हिंदी पढ़ाता हूं, आप क्या करते हैं? मैं ने जवाब में थोड़ी बेवकूफी बघार दी, खिलंदडी कर दी और लिखा कि आप 14 सालों से हिंदी पढ़ाते हैं और मुझे अभी १४ साल पढ़ते हुए भी नहीं हुआ. बात आई गई हो गई. पर उन की चिट्ठियां फिर भी आती रहीं. पर एक बार क्या हुआ कि मैं पिता जी के साथ दिल्ली घूमने गया. तो बहुत सारे लेखकों से भी मिला. जैनेंद्र कुमार, विष्णु प्रभाकर से लगायत श्रीकांत वर्मा तक. कमल किशोर गोयनका से भी मिला. अद्भुत व्यक्ति थे वह. मेरी हर चिट्ठी उन्हों ने बहुत संभाल कर न सिर्फ़ रखी थी बल्कि फाइल बना रखी थी. ला कर वह सारी चिट्ठी पिता जी को दिखाने लगे. मेरा यह लिखना उन को बहुत बुरा लगा था कि आप 14 साल से हिंदी पढ़ा रहे हैं और मुझे अभी 14 साल पढ़ते हुए भी नहीं हुआ. पिता जी को उन्हों ने यह भी दिखाया. अब मुझे काटो तो खून नहीं. पिता जी ने मुझे बस पीटा भर नहीं, बाकी मेरे सारे करम हो गए. बाद में यह बात गोयनका जी ने नंदन जी को भी बताई. आखिर अध्यापक थे वह और किसी विद्यार्थी को बिगड़ते हुए वह देखना नहीं चाहते थे.
हुआ यह कि जब मैं दिल्ली बाकायदा रहने लगा था, नौकरी करने लगा था सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट में, तब की बात है. सर्वोत्तम में लिखने की कुछ गुंजाइश तो होती नहीं थी तो मैं पत्रिकाओं के दफ़्तर के चक्कर मारा करता था. साप्ताहिक हिंदुस्तान से लगायत दिनमान तक. नंदन जी की वैसे भी मुझ पर विशेष कृपा रहती थी. नंदन जी ने मुझ से क्या – क्या नहीं लिखवाया. आज सोचता हूं तो अपने आप से भी रश्क हो आता है. सोचिए कि उस नादान उम्र में भी नंदन जी ने मुझ से चौधरी चरण सिंह के बागपत चुनाव क्षेत्र का बागपत भेज कर कवरेज करवाया बल्कि चरण सिंह का इंटरव्यू भी करवाया और खूब फैला कर छापा भी. उन दिनों क्या था कि नंदन जी एक साथ सारिका, पराग और दिनमान तीनों पत्रिकाओं के संपादक थे. और हर महीने इन में से किसी एक पत्रिका में क्या कई बार तो दो-दो में मैं छपता ही छपता था. आप कह सकते हैं कि मुझे तब छपास की बीमारी ने घेर रखा था. नंदन जी इन तीन पत्रिकाओं के तो संपादक थे ही बाद में निकली वामा और खेल भारती में भी वह पूरा हस्तक्षेप रखते थे. सो लोग उन्हें 10 दरियागंज का संपादक कहने लगे थे. उन की तूती बोलती थी उन दिनों. उन से मिलना उन दिनों बहुत दूभर था. एक तो वह बिल्कुल एरिस्टोक्रेटिक स्टाइल से रहते थे. दूसरे दफ़्तर आते ही कहीं जाने की तैयारी में होते थे. उन के पीए नेगी जी सब कुछ कैसे संभालते थे, देखते बनता था.
काम में नंदन जी हर किसी पर विश्वास करते थे. एक संपादक का सहयोगियों पर कैसे भरोसा होना चाहिए यह नंदन जी से सीखा जा सकता था. खास कर इस लिए भी कि वह जिस संपादक के साथ काम कर के आए थे धर्मयुग से, उस के संपादक धर्मवीर भारती थे तो विद्वान और सफल संपादक. पर परम अविश्वासी. इस बात की चुगली एक नहीं अनेक लोग कर गए हैं. और नंदन जी ने यह पीड़ा अपनी आत्म-कथा में बार-बार पिरोई है. नंदन जी ने हालां कि थोड़ी मुलायमियत बरती है पर रवींद्र कालिया ने गालिब छुटी शराब में नंदन जी की पीड़ा को जो स्वर दिया है, भारती जी द्वारा उन्हें सताए जाने का जो तल्ख व्यौरा परोसा है, वह भारती जी के लिए खीझ ही उपजाता है. ऐसे ही रघुवीर सहाय जब दिनमान के संपादक थे तो वह भले लोहियावादी थे, पर व्यवहार अपने सहयोगियों के साथ उन का घोर सामंती था. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जैसों तक से वह पूरी अभद्रता से पेश आते थे. बाकियों की तो बिसात ही क्या थी. तो ऐसे में नंदन जी का सहयोगियों से संजीदगी से पेश आना, उन पर विश्वास करना सब को भा जाता. लोग अपनी पूरी क्षमता से काम करते.
खैर हुआ यह कि नेशनल स्कूल आफ़ ड्रामा पर एक विशेष रिपोर्ट लिखने के लिए नंदन जी ने मुझ से कहा. उन दिनों वहां भारी अराजकता फैली हुई थी. लड़के आत्महत्या करने लगे थे. डा. लक्ष्मीमल सिंधवी जो सुप्रीम कोर्ट के तब बडे़ वकीलों में शुमार थे. नेशनल स्कूल आफ़ ड्रामा के ट्रस्टी भी थे. उन से फ़ोन कर बात करने के लिए मिलने का समय मांगा. बड़ी मुश्किल से वह तैयार हुए. दस मिनट का समय दिया. पर जब साऊथ एक्स्टेंसन वाले उन के घर पहुंचा, बात शुरू हुई तो आधा घंटा लग गया. बाद में उन्हों ने नंदन जी से शिकायत करते हुए कहा कि बिल भेज दूं क्या? तुम्हारे उस बालक ने दस मिनट का समय मांग कर आधा घंटा का समय ले लिया. नंदन जी ने मुझे यह बात बताई और पूछा कि उन की आधे घंटे की फीस मालूम है? उतनी मेरी तनख्वाह भी नहीं है. फिर उन्हों ने हिदायत दी कि जो जितना समय दे उस का उतना ही समय लेना चाहिए. और गोयनका जी की चिट्ठी का ज़िक्र किया और कहा लिखते अच्छा हो इस लिए तुम्हें छापता हूं. पर यह लौंडपना और नादानी भी तो छोड़ो.
लेकिन गलतियां तो होती रहती थीं. कभी -कभी अनजाने भी. एक बार क्या हुआ कि अमृतलाल नागर का एक इंटरव्यू नंदन जी को दिया. सारिका के लिए. उन दिनों दिल्ली से एक सांध्य दैनिक सांध्य समाचार छपता था. उस का फ़ीचर पेज प्रताप सिंह देखते थे. नागर जी के उस इंटरव्यू का ज़िक्र किया तो उन्हों ने पढ़ने को मांगा. दे दिया. गलती यह हुई कि उन से यह नहीं बताया कि यह इंटरव्यू सारिका में छपने वाला है. उन को इंटरव्यू अच्छा लगा और सांध्य समाचार में झट छाप दिया. संयोग देखिए कि उसी दिन सारिका बाज़ार में आई और उस में नागर जी के उसी इंटरव्यू को अगले अंक में छापने की घोषणा भी. अब मुझे काटो तो खून नहीं. नंदन जी बहुत खफ़ा हुए. बोले, ‘इस दो कौड़ी के अखबार के चलते मेरी सारी इज़्ज़त उतार दी तुम ने.’ उन के कुछ सहयोगियों ने मुझे अंतत: ब्लैक लिस्ट करने की सलाह दी. नंदन जी इस पर भी भड़क गए. बोले, ‘ऐसे तो एक लिखने वाले आदमी को हम मार डालेंगे!’ और उन्हों ने मुझे ब्लैक लिस्ट नहीं किया. कुछ दिन खफ़ा- खफ़ा रहे फिर सामान्य हो गए. मैं फिर छ्पने लगा 10, दरियागंज में. पहले ही की तरह. बरबस उन के एक गीत की याद आ गई. जो वह सस्वर पढ़ते थे.
खंड-खंड अपनापन
टुकडों में जीना
फटे हुए कुर्ते-सा
रोज-रोज सीना
संबंधों के सूनेपन की अरगनियों में
जगह-जगह
अपना ही बौनापन
टांग गए
उन दिनों वह खुद फ़िएट चलाते थे. एक दिन मैं आईटीओ के बस स्टाप पर खड़ा था. दोपहर का समय था. अचानक बस स्टाप पर उन की फ़िएट रूकी. फाटक खोल कर मुझे बुला कर बैठा लिया. उन की बगल की सीट पर तमाम किताबें, कागज अटा पड़ा था. कार स्टार्ट करते हुए बोले, ‘कहां जाओगे?’ मैं ने बताया, ‘बाराखंबा रोड.’ पूछा, ‘वहां क्या काम है?’ बताया कि, ‘सोवियत एंबेसी में रमाकांत जी से मिलना है.’ बोले, ‘अच्छा है. सब से मिलना चाहिए. पर इस सब से पढ़ने लिखने का समय बहुत नष्ट होता है. इस से बचो. जल्दी ही बाराखंबा रोड आ गया. मुझे उतार कर वह चले गए. जब रवींद्र कालिया ने वागर्थ का संपादन संभाला तो मैं ने देखा कि वह हर किसी छोटे-बडे़, इस खेमे, उस खेमे गरज यह कि बिना खेमेबाज़ी के सब को छापने लगे थे. एक बार वह मिले तो मैं ने उन से कहा कि यह अच्छा कर रहे हैं आप और उन्हें बताया कि नंदन जी भी सारिका में यही करते थे. सब को छापते थे. वह चुप रहे. तो मैं ने यह बात फिर दुहराई. तो कालिया जी बोले, ‘ वो तो ठीक है यार पर नंदन जी कहानीकार नहीं थे न?’
रवींद्र कालिया की पीड़ा समझ में आ गई. बाद के दिनों में जब वह नया ज्ञानोदय में आए तो उन की पीड़ा का विस्तार सामने था. नंदन जी अपने संपादक के गोल्डेन पीरियड में व्यस्त बहुत रहते थे. उन से न मिल पाने की शिकायत बडे़-बड़ों को थी. मैं ने उपेंद्रनाथ अश्क जैसे लेखक को भी उन का इंतज़ार करते देखा है. पर वह जब मिलते थे तब खुल कर मिलते थे. उन की व्यस्तता अपनी जगह थी और उन की जवाबदेही अपनी जगह. अब तो खैर किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री से मिलना फिर भी आसान है पर ज़्यादातर संपादकों से मिलना मुश्किल है. हिमालयी अहंकार के बोझ से लदे- फदे यह संपादक लोग लोगों की चिट्ठी का जवाब देना तो जैसे गाली ही समझते हैं. लेकिन नंदन जी या उन के समय के संपादकों के साथ ऐसा नहीं था. वह अगर कोई रचना अस्वीकृत भी करते थे तो मुकम्मल जवाब के साथ. मुझे याद है कि जब नंदन जी ने सारिका में प्रेमचंद वाला फ़ीचर छापा था तो लगभग उसी के बाद मैं ने पराग के लिए एक कविता भेजी. नंदन जी की एक चिट्ठी के साथ वह कविता लौटी थी.
उन्हों ने लिखा था कि बच्चों के लिए कुछ लिखने में बहुत सतर्कता बरतनी होती है. खास कर कविता में तो बहुत. और अगर बच्चों के लिए कविता लिखनी है तो छंदबद्ध लिखें. बिना छंद की कविता बच्चों के लिए ठीक नहीं है. सो अभी छंद का अभ्यास करें. फिर कुछ पराग के लिए भेजें. और उन दिनों नंदन जी ही क्या आप किसी को भी चिट्ठी लिखें, लोग जवाब तो देते ही थे. मेरे पास बनारसीदास चतुर्वेदी, मन्मथनाथ गुप्त, अमृतलाल नागर से लगायत शरद जोशी तक के पत्र हैं. और नंदन जी तो और तमाम मामलों में भी लोगों से और आगे रहे. जाने कितनों का करियर उन्हों ने बनाया. वायस आफ़ अमरीका, रेडियो जापान से लगायत बी.बी.सी तक में लोगों को रखवाया. टाइम्स ग्रुप में भी. लेकिन बाद के दिनों में वह राजनीति कहिए या और कुछ नवभारत टाइम्स भेज दिए गए. 10 दरियागंज का संपादक अब 4 पेज का रविवारी परिशिष्ट देखने लगा. इंतिहा यही नहीं थी जब वह धर्मयुग में संयुक्त संपादक ही नहीं नेक्स्ट टू धर्मवीर भारती थे तब सुरेंद्र प्रताप सिंह उन के साथ बतौर अप्रेंटिश रहे, उन सुरेंद्र प्रताप सिंह के अधीन कर दिया गया नंदन जी को. और बिना परदे की एक केबिन बीचोबीच दी गई. अद्भुत था यह. शायद ऐसी स्थितियों में ही उन्हों ने लिखा होगा:
सब पी गए पूजा नमाज़ बोल प्यार के
और नखरे तो ज़रा देखिए परवरदिगार के
लुटने में कोई उज्र नहीं आज लूट ले
लेकिन उसूल कुछ तो होंगे लूट मार के
अब यह संयोग कहिए या कुछ और. जिस प्रेमचंद की वज़ह से मैं नंदन जी से जुड़ा था वही प्रेमचंद ही नंदन जी से अंतिम मुलाकात के भी सबब बने. हुआ यह कि उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने मेरे उपन्यास लोक कवि अब गाते नहीं को प्रेमचंद सम्मान से नवाज़ा. अब तो यह सारे सम्मान समाप्त हो चुके हैं पर पहले परंपरा सी थी कि यह सम्मान मुख्यमंत्री दिया करते थे. पर उस बार मुख्यमंत्री विधानसभा में अपनी सरकार बचाने में मशगूल रहे. नहीं आए. तो पुरस्कार समिति में शामिल नंदन जी के हाथों मुझे यह सम्मान मिला. यह मेरा सौभाग्य ही था कुछ और नहीं. और दुर्भाग्य देखिए कि यही मुलाकात हमारी अंतिम मुलाकात साबित हुई. उन का एक क्या दो शेर याद आते है:
मुहब्बत का अंजाम हरदम यही था
भंवर देखना, कूदना, डूब जाना
ये तनहाइयां, याद भी, चांदनी भी
गज़ब का वज़न है संभल कर उठाना
सचमुच नंदन जी की यादों का वज़न उठाना अपने आप को भी उठाना लगता है मुझे. नंदन जी के बिना उन की पहली जयंती पर और क्या कह सकता हूं. उन की ही कविता पंक्ति में फिर कहूं

दयानंद पाण्डेय
लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार तथा उपन्यासकार हैं. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है.












kumar harsh
July 1, 2011 at 12:02 pm
sansmaran likhane men jawab nahi aapka.adbhut.
pramod kumar.muz.bihar
July 1, 2011 at 1:31 pm
nandan ji par aapaka alekh ek mahatwapurna dastavej hai. is aalekha me aapane jin ghatanawon aur sukhad chanon ko likha hai unhe padhkr man bhar ata hai.apaki ek galati ko unhone galaati mana hin nahi, aise bare dil wale sampadak ab ikke dukke bache hain.
भारतेन्दु मिश्र
July 1, 2011 at 1:36 pm
श्रद्धांजलि
Ila
July 1, 2011 at 3:05 pm
एक अतरंग संस्मरण ! कई जानकारियों से भरा यह संस्मरण अपने को पढ़वा ले जाता है। बीच बीच में नंदन जी की कविता- पंक्तियों से गुजरना अच्छा लगा।
राम दत्त त्रिपाठी
July 1, 2011 at 3:24 pm
नंदन जी पर बहुत सुन्दर लिखा है, दया नन्द जी. एक बार में पूरा पढ़ गया. ढेर सारी यादें ताजा हो गयीं.
राम दत्त
pankaj
July 1, 2011 at 7:17 pm
boss! nandan ji ke sunday mail ke jamane main kahan the aap? bahut dino se padh raha hoon aur dhoondh bhi raha hoon .
क. वा.
July 2, 2011 at 1:16 am
आज दो बार पढ़ा है यह संस्मरण । नंदन जी जैसी साहित्यिक ईमानदारी इतिहास की वस्तु बन गई है उनके बाद।
२०१० की जनवरी के प्रथम सप्ताह में दिल्ली, हिन्दी भवन में आयोजित एक गोष्ठी में उनकी साहित्यिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता की मैं भी साक्षी हूँ । जहाँ सारा आयोजन आँय बाँय रह गया था मुँह ताकता ।
…. पर हिन्दी वाले बड़े नाशुकरे लोग हैं । मुझे तो निराला जी द्वारा प्रेमचन्द पर लिखे संस्मरण में दिए श्राप की रह रह कर याद आती है … क्या खाकर अब कोई करेगा इसके साहित्य का उत्थान ! कहाँ से लाएँगे वह ईमानदारी व देने की भावना ?
वार्षिकी पर उन्हें शत शत नमन !!
डॉ. कविता वाचक्नवी
July 2, 2011 at 4:54 am
आज दो बार पढ़ा है यह संस्मरण । नंदन जी जैसी साहित्यिक ईमानदारी इतिहास की वस्तु बन गई है उनके बाद। २०१० की जनवरी के प्रथम सप्ताह में दिल्ली, हिन्दी भवन में आयोजित एक गोष्ठी में उनकी साहित्यिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता की मैं भी साक्षी हूँ । जहाँ सारा आयोजन आँय बाँय रह गया था मुँह ताकता । …. पर हिन्दी वाले बड़े नाशुकरे लोग हैं । मुझे तो निराला जी द्वारा प्रेमचन्द पर लिखे संस्मरण में दिए श्राप की रह रह कर याद आती है … क्या खाकर अब कोई करेगा इसके साहित्य का उत्थान ! कहाँ से लाएँगे वह ईमानदारी व देने की भावना ? वार्षिकी पर उन्हें शत शत नमन !!”
डॉ. सरोज गुप्ता
July 3, 2011 at 7:21 am
“मैंने सुबह -सुबह आज यही नोट पढ़ा ,गदगद हो गयी ..यादे कैसे संजोयी है आपने ,बहुत प्रभावशाली लेख …नंदन जी के कुछ अनछुए अंश से भी आपने रूबरू कराया !धन्यवाद !!!आपकी मित्रता के लिए शुक्रिया !!!!”
Lalita Pandey
July 3, 2011 at 7:24 am
Kanhaiya Lal Nandan means “a person who gave a world of fantasy to Indian children”………….
“नंदन” एकलौती बच्चों की मैगजीन होती थी..विक्रम बैताल की कहानी होती थी…कवितायेँ होती थी…सपने होते थे.
सारिका……ये एक साहित्यिक पत्रिका होती थी..”हंस” और “सारिका” ने हिंदी साहित्य की दृष्टि प्रदान की है.
कन्हैया लाल नंदन के बाद बच्चों की पत्रिका पर किसी ने रूचि नहीं ली.अभी “सरस सलिल” के बारे में सुनती हूँ कि ग्रामीण क्षेत्र में काफी अच्छी पकड़ है.पसंद की जाती है.
Purnima Awasthi
July 3, 2011 at 7:26 am
nandan padhkar hum bhi bade hue .
Lalita Pandey .
July 3, 2011 at 7:29 am
: “”नंदन” एकलौती बच्चों की मैगजीन होती थी..विक्रम बैताल की कहानी होती थी…कवितायेँ होती थी…सपने होते थे. सारिका……ये एक साहित्यिक पत्रिका होती थी..”हंस” और “सारिका” ने हिंदी साहित्य की दृष्टि प्रदान की है. कन्हैया लाल नंदन के बाद बच्चों की पत्रिका पर किसी ने रूचि नहीं ली.अभी “सरस सलिल” के बारे में सुनती हूँ कि ग्रामीण क्षेत्र में काफी अच्छी पकड़ है.पसंद की जाती है.”
bablu upadhya
July 3, 2011 at 6:00 pm
nandan je ko samrpit artekel agke jamane ke patkaro ke leia parena hai . bahut bahut danyabad daynand je
bablu upadhya buxar
July 3, 2011 at 6:08 pm
nandan je ke yad me samrpit artkil agke patkaro ke leayi paraena hai. daynand je apko bahut bahut danyabad
bablu upadhya buxar
July 3, 2011 at 6:15 pm
nandan je ke yad me artekl ag ke patkaro ke leya lession hai
Rakesh Ojha
July 4, 2011 at 6:40 am
Bahut sundar aur prabhavshali lekh! Tamam nai jankariyan milin Nandan ji ke bare mein. Shraddhanjali !!
देवमणि पाण्डेय
July 4, 2011 at 7:44 am
पांडेय जी, आप बधाई के हक़दार हैं। नंदन जी पर आपका यह आत्मीय आलेख बहुत सुंदर, सार्थक और असरदार है। मुम्बई में उन्हें परिवार पुरस्कार से सम्मानित किया गया था तो उनके साथ काव्य पाठ का गौरव मुझे भी प्राप्त हुआ था। मंच पर उनकी मौजूदगी से गरिमा और अनुशासन कायम रहता था। उनकी स्मृति को नमन!
अरविंद कुमार
July 4, 2011 at 10:34 am
दयानंद पांडेय आज के समर्थ लेखकों मॆं से हैं. मैं स्वयं नंदन जी के साथ बरसों रहा, मुंबई में भी (वह धर्मयुग में थे, मैं माधुरी में, और वहाँ मैं ने नंदन की घुटन देखी थी – भारती जी के हाथों – और तभी डाक्टर तरनेजा और मैं ने उन्हें दिल्ली भिजवाया था – और दिल्ली में भी. पर मैं ऐसा मार्मिक लेख कभी न लिख पाता.
कल नंदन जी की नवीनतम पुस्तक (सामयिक प्रकाशन) के विमोचन के अवसर पर अस्वस्थता के कारण न जा पाया.
उमेश अग्निहोत्री
July 7, 2011 at 11:16 am
नंदन जी अमेरिका आते थे तो मेरे यहां रुकते थे । पहली बार 82-63 में आये थे । उसके बाद आना बना रहा । एक बार फिलेडेल्फिया से वाशिग्टन तक कार में उनसे बहुत अंतरंग बातें हुं,ई पर दयानंद जी कं लेख में उनके जीवन के कई पक्ष जानने को मिले । एक बार जिसको भाई मान लिया तो आजीवन निभाया । अब यह तो हो नहीं सकता कि कभी किसी मित्र ने उन्हें धोखा न दिया हो, लेकिन मैत्री की भावना को उन्होने जैसा ऊंचा पद और सम्मान दिया, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है । वह कहते थे — भूख ने, प्यास ने इखलास ने पाला है मुझे, जब भी बिखरा हूं, यारों ने संभाला है मुझे ।
उमेश अग्निहोत्री
चंद्र मौलेश्वर
July 7, 2011 at 11:17 am
हिंदी के विख्यात हस्ताक्षर की याद में यह लेख सार्थक है। आभार॥
चंद्र मौलेश्वर
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अनिल जनविजय
July 7, 2011 at 11:19 am
नंदन जी के बारे में बहुत अच्छा लेख है। मैं तो कितने बरस उन्हें बिना जाने ही चापलूस समझता रहा। बाद में पता लगा कि यह आदमी तो दूसरी ही मिट्टी का बना है।
दीप्ति
July 7, 2011 at 11:20 am
निस्संदेह कुछ लोग अपने में एक इतिहास होते हैं. उत्तम आलेख !
दीप्ति
कमल
July 7, 2011 at 11:22 am
शायद इसीलिये
जब दर्द उठता है
तो मैं शर्माता नहीं खुल कर रोता हूँ
भरपूर चिल्लाता हूँ
और इस तरह निष्पंदता की मौत से बच कर निकल जाता हूँ
2
बहुत सही कहा ,
हममें से बहुत यही करते हैं
पर साफ़ साफ़ बता नहीं पाते
अपना रोना चिल्लाना
समझा नहीं पाते
कमल
अमित त्रिपाठी
July 7, 2011 at 11:24 am
नंदन जी कि स्मृति को नमन और यह संस्मरण हमसे बांटने के लिए आभार!
सादर
अमित
नंदन जी कि स्मृति को नमन और यह संस्मरण हमसे बांटने के लिए आभार!
सादर
अमित
चंद्र मौलेश्वर
July 7, 2011 at 11:26 am
आप धन्य है ।
उनकी कविता अच्छी लगी पर वह गीत याद आ गया
मैं भी अजब हू दीवाना
ना सोता हूं न जगता हूं
कहीं यह न समझ लेना
कि मैं तुझ से मुहब्बत करता हूं ;[लीडर]
चंद्र मौलेश्वर
cmpershad.blogspot.com
अनूप भार्गव
July 7, 2011 at 11:31 am
आदरणीय नन्दन जी से दो बार मिलने का अवसर मिला था । २००६ में जब वह ’भारतीय विद्या भवन’ के निमंत्रण पर गुलज़ार साहब , , शीन काफ़ निजाम साहब और विश्वनाथ सचदेव जी के साथ मुशायरा/कवि सम्मेलन में भाग लेने के लिये न्यूयार्क आये थे । उन के साथ काफ़ी समय मेजबानी में और फ़िर उन के साथ कविता पाठ के दौरान गुज़ारने को मिला । बहुत ही सरल, सहज व्यक्तित्व और पहली बार मिलने पर भी अपनापन सा लगा । तबियत तब भी ठीक नहीं थी । डायलेसिस चल रहा था लेकिन ऊपर से देख कर ज़रा भी अहसास नहीं होता था कि वह अन्दर से कितने कमजोर हो चुके हैं , बिल्कुल भी शिकायत नहीं किसी से । आवाज़ में ठहराव और गहराई जो अन्दर तक बैठ जाये । न्यूयार्क में प्रबुद्ध श्रोता थे , नन्दन जी काफ़ी सराहे गये । दयानन्द जी द्वारा उद्धृत लगभग सभी कविताएं उन्होनें सुनाई थी ।
दूसरी बार जुलाई २००७ में मिलना हुआ , हिन्दी विश्व सम्मेलन के दौरान । इस बार पहले से कुछ अधिक कमजोर लगे । यूनाइटेड नेशन्स में उद्घाटन के बाद होटल आते हुए वह अपने साथियों से बिछड़ गये थे, अकेले थे , सौभाग्य से मैनें उन्हें देख लिया और उन्हें पास ही खड़ी बस तक ले आया । बड़े स्नेह से उन्होनें मुझे अपने पास ही बैठने को कहा , पूरी रास्ते बोले अधिक नहीं लेकिन मेरा हाथ अपने हाथ में पकड़ कर बैठे रहे ।
आज दयानन्द जी का लेख पढ कर उन के कुछ चित्र और विश्व हिन्दी सम्मेलन में उन का कविता पाठ यादों के पिटारे से निकाला है ।
एक कविता चलते चलते …
—-
ज़िन्दगी की ये ज़िद है
ख़्वाब बन के
उतरेगी।
नींद अपनी ज़िद पर है
– इस जनम में न आएगी
दो ज़िदों के साहिल पर
मेरा आशियाना है
वो भी ज़िद पे आमादा
-ज़िन्दगी को
कैसे भी
अपने घर
बुलाना है।
—-
कन्हैयालाल नंदन
अनूप भार्गव
न्यू जर्सी – अमेरिका
अनूप भार्गव
July 7, 2011 at 3:50 pm
आदरणीय नन्दन जी से दो बार मिलने का अवसर मिला था । २००६ में जब वह ’भारतीय विद्या भवन’ के निमंत्रण पर गुलज़ार साहब , , शीन काफ़ निजाम साहब और विश्वनाथ सचदेव जी के साथ मुशायरा/कवि सम्मेलन में भाग लेने के लिये न्यूयार्क आये थे । उन के साथ काफ़ी समय मेजबानी में और फ़िर उन के साथ कविता पाठ के दौरान गुज़ारने को मिला । बहुत ही सरल, सहज व्यक्तित्व और पहली बार मिलने पर भी अपनापन सा लगा । तबियत तब भी ठीक नहीं थी । डायलेसिस चल रहा था लेकिन ऊपर से देख कर ज़रा भी अहसास नहीं होता था कि वह अन्दर से कितने कमजोर हो चुके हैं , बिल्कुल भी शिकायत नहीं किसी से । आवाज़ में ठहराव और गहराई जो अन्दर तक बैठ जाये । न्यूयार्क में प्रबुद्ध श्रोता थे , नन्दन जी काफ़ी सराहे गये । दयानन्द जी द्वारा उद्धृत लगभग सभी कविताएं उन्होनें सुनाई थी ।
दूसरी बार जुलाई २००७ में मिलना हुआ , हिन्दी विश्व सम्मेलन के दौरान । इस बार पहले से कुछ अधिक कमजोर लगे । यूनाइटेड नेशन्स में उद्घाटन के बाद होटल आते हुए वह अपने साथियों से बिछड़ गये थे, अकेले थे , सौभाग्य से मैनें उन्हें देख लिया और उन्हें पास ही खड़ी बस तक ले आया । बड़े स्नेह से उन्होनें मुझे अपने पास ही बैठने को कहा , पूरी रास्ते बोले अधिक नहीं लेकिन मेरा हाथ अपने हाथ में पकड़ कर बैठे रहे ।
आज दयानन्द जी का लेख पढ कर उन के कुछ चित्र और विश्व हिन्दी सम्मेलन में उन का कविता पाठ यादों के पिटारे से निकाला है ।
http://www.youtube.com/watch?v=j9aUBccI3fU
एक कविता चलते चलते …
—-
ज़िन्दगी की ये ज़िद है
ख़्वाब बन के
उतरेगी।
नींद अपनी ज़िद पर है
– इस जनम में न आएगी
दो ज़िदों के साहिल पर
मेरा आशियाना है
वो भी ज़िद पे आमादा
-ज़िन्दगी को
कैसे भी
अपने घर
बुलाना है।
—-
कन्हैयालाल नंदन
अनूप भार्गव
न्यू जर्सी – अमेरिका