श्रीलाल शुक्ल को इलाज के लिए साहित्य अकादमी ने एक लाख रुपए दिए

लखनऊ। एक अच्छी खबर है। हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक श्रीलाल शुक्ल को इलाज के लिए साहित्य अकादमी ने एक लाख रुपए की मदद स्वीकृत की है। यह पहली बार हुआ है कि साहित्य अकादमी ने किसी हिंदी लेखक को इलाज के लिए इतनी बड़ी सहायता दी है। उल्लेखनीय है कि श्रीलाल शुक्ल गोमती नगर स्थित सहारा हास्पिटल में बीते हफ़्ते से भर्ती हैं और उन की हालत में निरंतर सुधार हो रहा है।

अभी श्रीलाल जी को ज्ञानपीठ सम्मान भी राज्यपाल श्री वी. एल.जोशी ने सहारा हास्पिटल में जा कर उन्हें दिया था। साहित्य अकादमी तथा व्यास सम्मान सहित तमाम सम्मान श्रीलाल जी को मिल चुके हैं। रागदरबारी उपन्यास श्रीलाल जी का बेस्ट सेलर उपन्यास है। इसी उपन्यास पर उन्हें चालीस साल पहले साहित्य अकादमी भी मिला था। लखनऊ के मोहनलालगंज के पास बसे गांव अतरौली के श्रीलाल शुक्ल पद्म भूषण से भी बीते साल विभूषित किए गए थे। अब वह कोई दो साल से अस्वस्थ चल रहे हैं। साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने बताया कि यह पहली बार है कि साहित्य अकादमी ने किसी हिंदी लेखक को इलाज के लिए कोई धनराशि उपलब्ध कराई है।

अकादमी में ऐसी कोई नियमावली भी नहीं है। [इस के पहले एक बार बांग्ला भाषा की लेखिका मल्लिका सेनगुप्ता को भी साहित्य अकादमी द्वारा इलाज के लिए मदद दी गई थी। उन्हें कैंसर था। अब वह दिवंगत हैं।] पर श्रीलाल जी के हिंदी में अवदान को देखते हुए यह फ़ौरी निर्णय लिया गया है। यह एक लाख की धनराशि चेक से सहारा हास्पिटल के नाम आज भेज भी दी गई है। गौरतलब है कि साहित्य अकादमी के इतिहास में भी यह पहली बार हुआ है कि हिंदी का कोई लेखक साहित्य अकादमी का उपाध्यक्ष हुआ है। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी पहले भी साहित्य अकादमी में हिंदी के संयोजक थे। अब उपाध्यक्ष हैं। वह आज रात कनाडा जा रहे हैं। टोरंटो, ओटावा में हिंदी फ़ेस्टिवल में शिरकत करने। 12 सदस्यीय भारतीय लेखकों के एक प्रतिनिधिमंडल का वह नेतृत्व करेंगे। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी श्रीलाल शुक्ल का हालचाल उन के परिवारीजनों से लिया है।

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

मायावती, मीडिया और नोएडा का अपशकुन

: तो क्या मायावती अगली बार फिर भी मुख्यमंत्री बन पाएंगी? : सवाल दिलचस्प है कि क्या मायावती अगली बार मुख्यमंत्री बन पाएंगी? यह सवाल उन की नोएडा यात्रा को ले कर है। अभी तक तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी भी मुख्यमंत्री के लिए नोएडा एक अपशकुन की तरह रहा है। इसे अंधविश्वास मानें या कुछ और लेकिन हुआ अभी तक यही है कि बतौर मुख्यमंत्री जो भी नोएडा गया है वह अपना मुख्यमंत्रित्व फिर दुहरा नहीं पाया है।

नारायणदत्त तिवारी, वीरबहादुर सिंह, कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह सब के सब नोएडा अपशकुन की चपेट में कहिए चहेट में कहिए आ चुके हैं। लेकिन मज़ा यह कि किसी भी भाषा के अखबार या चैनल ने इस अपशकुन को ज़रा ठहर कर ही सही याद दिलाने की ज़ुर्रत नहीं की। कारण भी साफ है। मीडिया पर मायावती का खौफ़ इस कदर तारी है कि किसी भी अखबार या चैनल में दम नहीं है कि इस बात या मायावती की किसी भी बात पर असहमति या विरोध दर्ज कर सके। जो कोई भी गलती से कर गया उस की नौकरी नहीं रहेगी यह पूरी तरह तय है। या फिर वह अखबार या चैनल उत्तर प्रदेश में चल नहीं सकता। यह भी तय है। और अब हम सब जानते हैं कि मीडिया जो कारपोरेट सेक्टर की बांदी है सो किसी कारपोरेट सेक्टर की हैसियत नहीं है कि मायावती से ज़रा भी चू-चपड करने की सपने में भी सोच सके।

कुछ बरस पहले हिंदुस्तान टाइम्स के एक स्थानीय संपादक सीके नायडू जो दक्षिण भारत से लखनऊ आए थे, मायावती के खिलाफ़ अंबेडकर पार्क के बाबत एक टिप्पणी लिखने के ज़ुर्म में दूसरे ही दिन छुट्टी पा गए थे। कहा गया कि उन का कांट्रैक्ट खत्म हो गया था। ऐसी जाने कितनी घटनाएं हैं जो मायावती के खिलाफ़ क्या किसी भी सत्तानशीन छोडिए किसी भी राजनीतिज्ञ या अफ़सर के खिलाफ़ लिखने या कहने की अब किसी की हिम्मत नहीं होती। जिस भी किसी ने लिखा या कहा बरबाद हो गया। और कोई एक भी उस के पक्ष में खड़ा होना तो दूर नैतिक समर्थन भी देने वाला नहीं मिला। पत्रकार पहले भी नौकरी करते थे, वाचडाग कहे जाते थे पर अब वह पेट डाग हैं। जिन की भूमिका अब सत्तानशीनों पर गुर्राने, भूंकने की नहीं दुम हिलाने तक सीमित कर दी गई है। अब किसी की नौकरी जाती है तो आपसी वैमनस्य में या जोड़-तोड़ में। खबर लिखने के लिए नहीं। तो जो हर बार किसी मुख्यमंत्री के नोएडा जाने या न जाने पर अपशकुन का कयास भी लिख दिया जाता था, किसी अखबार ने इस पर सांस नहीं ली। नहीं मुख्यमंत्री नोएडा जाए तो भी नहीं जाए तो भी टाप बाक्स हर अखबार की खबर होती थी, अपशकुन के मसले पर।

याद कीजिए जब नोएडा का निठारी कांड हुआ था तब तमाम हो हल्ले के बावजूद तब के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह इसी डर से नोएडा नहीं गए तो नहीं गए। उन्हों ने अपनी जगह अपने मूर्ख और जाहिल भाई शिवपाल सिंह यादव को तब नोएडा भेजा था, मासूमों की लाश पर आंसू बहाने के लिए, परिजनों के आंसू पोछने के लिए। और उस मूर्ख और संवेदनहीन शिवपाल ने तब नोएडा जा कर कहा था कि बडे़-बडे़ शहरों में छोटी-छोटी घटनाएं होती रहती हैं। गया था यह मूर्ख आंसू पोछने पर मासूमों के परिजनों के ज़ख्मों पर नमक छिड़क कर चला आया। निठारी कांड में मासूमों की हत्या से भी ज़्यादा हैरतनाक घटना थी यह। मुलायम फिर भी नोएडा नहीं गए। इस डर से कि अगर नोएडा गए तो अगली बार वह मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगे। अब अलग बात है कि उन के राज में गुंडई और भ्रष्टाचार की बयार इस कदर बही कि यह बयार आंधी में तब्दील हो गई। इस आंधी में वह बह गए। गलतियां और भी कई कीं उन्हों ने पर उन के राज में छाई गुंडई ने उन के राज के ताबूत पर आखिरी कील का काम किया। वह इतने बदहवास गए कि कल्याण सिंह से हाथ मिला बैठे। रही सही ताकत भी गंवा बैठे। और फिर जिस के दोस्त और सलाहकार अमर सिंह हों उस को भला दुश्मनों की भी क्या ज़रुरत? परिवारवाद और जातिवाद का पलीता भी अभी उन्हें दीवाली का पटाका लग रहा है। इसी का फ़ायदा मायावती उठा रही हैं। यह मुलायम समझ नहीं पा रहे। तिस पर डा. अयूब की पीस पार्टी अब की चुनाव में उन की मुस्लिम वोटों की ज़मीदारी भी छीनने की बिसात बिछा बैठी है। और वह मायावती से डरे दीखते हैं। और मायावती उन से। तभी तो मायावती ने कल नोएडा में जो गगनविहारी संवाद कांग्रेस के लिए जारी किए हैं कि मीरा कुमार या शिंदे को कांग्रेस प्रधानमंत्री बना सकती है उस की मार कांग्रेस पर कम मुलायम पर उन्हों ने ज़्यादा डाली है। बिना मुलायम या उन की पार्टी का नाम लिए।

राजनीति हमेशा से संभावनाओं का शहर रही है और रहेगी। पर क्या कांग्रेस सचमुच किसी मीरा कुमार, किसी शिंदे या किसी और दलित नेता को प्रधानमंत्री बना सकती है अभी और बिलकुल अभी? हरगिज़ नहीं। तो फिर मायावती ने तीर या तुक्का आखिर क्यों छेड़ा? इस लिए भी कि चुनाव अभी लोकसभा के नहीं उत्तर प्रदेश विधान सभा के आसन्न हैं। और कि यह भी कि यह बात कहने के लिए मायावती ने नोएडा को ही क्यों चुना? इस के दो निशाने हैं। पहले मुलायम और दूसरे कांग्रेस। हालां कि अभी यह कयास लगाना बहुत जल्दबाज़ी होगी तो भी मायावती के डर से कांग्रेस और मुलायम चुनावी समझौता कर सकते हैं। मुलायम मायावती से डरे हैं तो कांग्रेस अन्ना से। इसी लिए एक सांस में मायावती ने अन्ना और रामदेव के आंदोलन पर सकरात्मक प्रतिक्रिया दी है। कि अन्ना आएं उत्तर प्रदेश में और कांग्रेस का पटरा बैठाएं। राहुल का तंबू कनात उखाडें। कांग्रेस, मुलायम दोनों को एक साथ निपटाएं। दूसरे मायावती ने इसी भाषण में एक और कौड़ी खेली है, एक और बिसात बिछाई है अपने प्रधानमंत्री बनने की। याद कीजिए बीते लोकसभा चुनाव में वाम मोर्चे तथा कुछ धड़ों ने उन्हें अपना प्रधानमंत्री का उम्मीदवार नामित किया था। अस्सी एकड़ का दलित पार्क बना कर उन्हों ने राष्ट्रपति भवन के तर्ज़ पर दिल्ली का दूसरा सत्ता केंद्र दिखा दिया है बरास्ता दलित कार्ड। आप को जो करना हो करिए। मायावती ने बता दिया है कि वह तो दलित कार्ड और अपनी तानाशाही के बूते देश पर राज करने को तैयार हैं। कितना कोई रोकेगा?

उन का न यह डरा हुआ मीडिया कुछ बिगाड़ सकता है न अदालतें, न ही यह राजनीतिक दल। नहीं सोचिए कि चाहे लखनऊ का अंबेडकर पार्क हो, कांशीराम पार्क हो या नोएडा का यह राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल पार्क हो, सुप्रीम कोर्ट आर्डर-आर्डर करता रह गया, कंटेम्प्ट आफ़ कोर्ट की नोटिस देता रह गया लेकिन मायावती का यह काम रुकने के बजाय दिन रात चलता रहा। अभी भी चल रहा है। न कोई अदालत रोक पाई, न कोई मीडिया, न कोई प्रतिपक्षी दल। यह एक नई आहट है। इसे कोई राजनीतिक पंडित, कोई मीडिया, कोई संवैधानिक संस्था नहीं जान पा रही या कह पा रही है सब कुछ जानते समझते हुए भी तो इसे क्या कहेंगे? मायावती के एक कैबिनेट सचिव हैं शशांक शेखर। आईएएस नहीं हैं। पर बडे़-बडे़ आईएएस अफ़सरों पर चाबुक चलाते हैं। और ये श्रेष्ठता का मारे आईएएस अफ़सर कांख भी नहीं पाते। सुप्रीम कोर्ट पूछ कर रह जाती है कि यह कैसे कैबिनेट सेक्रेटरी बना दिए गए हैं? अचानक वह जनहित याचिका वापस हो जाती है। अब देखिए दूसरी जनहित याचिका भी दायर होती है इसी बात को ले कर। सुप्रीम कोर्ट अभी तारीखों के मकड़जाल में है। देखिए फिर कब कुछ पूछती है। पूछ्ती भी है कि नहीं। नहीं पूछना होता तो आय से अधिक संपत्ति पर अभी तक फ़ैसला आ गया होता। लेकिन मायावती के मसले पर सुप्रीमकोर्ट सुस्त है। मीडिया तो कुत्ता हो ही गई है। नहीं मीडिया में ही सही ज़रा भी जान होती तो देश की यह दुर्गति तो हर्गिज़ नहीं होती। अब यहीं देखिए कि सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई ने मुलायम, मायावती दोनों के खिलाफ़ आय से अधिक की संपत्ति के विवरण दे रखे हैं। है किसी अखबार या चैनल में दम कि आरटीआई के रास्ते या फिर उस की नकल मांग कर उस छाप दे? या फिर विदेशी बैंकों में भी जमा कालाधन की सूची सुप्रीमकोर्ट से निकाल कर देश की जनता को दिखा दे? अफ़सोस कि अपने देश में कोई असांचे भी तो नहीं है!

हां, उत्तर प्रदेश में एक मायावती हैं जो प्रदेश के राजमार्गों पर बोर्ड लगा देती हैं कि केंद्र सरकार पैसा नहीं दे रही कि इन सड़कों को बनाने के लिए, इस लिए नहीं बन पा रही। यही हाल बाकी पूरी न हो रही योजनाओं का भी है। रोना यही है कि केंद्र पैसा नहीं दे रहा। लेकिन पत्थर की मूर्तियां या पार्क बनाने के लिए अरबों रुपए कहां से आ जाते हैं, यह कोई कैसे पूछे भला? बल्कि पूछे भी कौन? अब दो साल में तीन सीएमओ मार दिए जाते हैं तो वह क्या करें? दर्जन भर मंत्री भ्रष्टाचार के घेरे में आ कर लोक आयुक्त की जांच में आ कर छुट्टी पाते जा रहे हैं तो वह बिचारी मायावती क्या करें? यह सब दोष तो दिल्ली का ही है न! आखिर अगर उत्तर प्रदेश में एक मायावती हैं तो हमारे देश में एक मनमोहन सिंह भी तो हैं। जिस के राजा, कलमाडी, मारन, चिदंबरम नवरत्न हैं। तो बिचारी मायावती के नवरत्न भी क्या करें? केंद्र राजमार्ग बनाने के लिए पैसा भले न देता हो पैसा कमाने के लिए प्रेरणा तो देता ही है। बेचारी दलित की बेटी मायावती का इस में क्या दोष भला? अब अगर वह मुख्यमंत्री बनती है तो दलित की बेटी है ही, और जो नहीं बनती है तो क्या इन मनुवादी शक्तियों ने उसे मुख्यमंत्री ने बनने दिया वह कहेंगी और यही मीडिया उसे छापेगा, बिना कोई सवाल पूछे।

आप जानते ही हैं कि मायावती कभी किसी पत्रकार के सवाल का जवाब देना तो दूर की बात है, सवाल सुनना भी गंवारा नहीं करती। लिखा वक्तव्य ही पढ़ती हैं और चली जाती हैं बिना किसी की तरफ देखे। ये भडुए पत्रकार आखिर जाते भी क्यों हैं ऐसी किसी प्रेस कांफ़्रेंस में, मेरी समझ में आज तक नहीं आया। एक समय मुलायम तो पत्रकारों को सरकारी खजाने से लाखों रुपए बांटते थे और जो कोई अप्रिय सवाल उन से पूछ लेता था तब वह उसे डपटते हुए पूछते थे, तुम्हारी हैसियत क्या है? और उस की नौकरी अंतत: खा जाते थे। और अब देखिए न कि भ्रष्टाचार के खिलाफ रथयात्रा कर रहे आडवाणी भी पांच-पांच सौ रुपए में खबर छपवाने का टेंडर खोल बैठे हैं। तो यह सिर्फ़ पेड न्यूज़ की बलिहारी भर नहीं है। राजेश विद्रोही का एक शेर याद आता है, ‘कितना महीन है अखबार का मुलाजिम भी, खुद खबर है पर दूसरों की लिखता है।’ हालां कि यह शेर पत्रकारों के शोषण के बाबत लिखा गया था, पर अगर इस अर्थ में भी इस का इस्तेमाल किया जाए तो बुरा नहीं है। अपशकुन भले हो! पर यह भी लिखेगा कौन? कहीं मायावती ने सुन लिया तो? रही बात मनमोहन सिंह की तो वह तो अंधे भी हैं और बहरे भी। सोनिया का ही कहना वह सुनते हैं और उन्हीं का दिखाया देखते हैं। अब देखिए यहीं फ़ैज़ भी याद आ चले हैं, ‘हम देखेंगे/ लाजिम है कि हम भी देखेंगे/ वो दिन कि जिस का वादा है/ जो लौहे अजल में लिखा है/ जब जुल्मे सितम को कोहे मरां/ रुई की तरह उड जाएंगे/…… हम अहले सफ़ा/ मरदूदे हरम मसनद पे बिठाए जाएंगे/ सब ताज उछाले जाएंगे/ सब तख्त गिराए जाएंगे/ राज करेगी खल्के खुदा/ जो मैं भी हूं/.. ….हम देखेंगे / लाजिम है कि हम भी देखेंगे!’

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

अमरकांतजी को मिले ज्ञानपीठ के बहाने मठाधीशों की खोज खबर

अमरकांत जी इन दिनों फिर चर्चा में हैं। ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने पर। अभी कुछ समय पहले भी वह चर्चा में थे। इन्हीं हथियारों से उपन्यास पर साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने पर। पर यह पुरस्कार भी उन्हें देरी से मिला था। बहुत देरी से। यह ज्ञानपीठ पुरस्कार अब की श्रीलाल शुक्ल को भी दिया गया है। उन्हों ने तो साफ कहा है कि यह पुरस्कार पा कर उन्हें हर्ष तो हुआ है पर रोमांच नहीं।

स्पष्ट है कि श्रीलाल जी दूसरे शब्दों मे कह रहे हैं हैं कि उन्हें यह पुरस्कार बहुत देर से मिला है। यही बात उन्हों ने अभी बीते दिनों पद्म-विभूषण पाने पर भी कही थी। हालां कि श्रीलाल जी भाग्यशाली थे कि उन्हें रागदरबारी पर जवानी में ही साहित्य अकादमी मिल गया था। पर अमरकांत जी इस अर्थ में भाग्यशाली नहीं थे। उन्हें तो जवानी क्या बुढ़ौती में भी संघर्ष ही नसीब में मिला है। श्रीलाल जी ब्यूरोक्रेट थे, अच्छी खासी पेंशन भी पाते हैं। उन को रायल्टी भी ठीक-ठाक मिल जाती है। रागदरबारी उन का बेस्ट सेलर है। पुरस्कार भी कई मिल चुके हैं। हालां कि जब उन को व्यास सम्मान मिला था तब एक दिन उधर मिले कुछ पुरस्कारों को ले कर कहने लगे कि इतना पैसा तो आज तक रायल्टी में भी नहीं मिला। पर अमरकांत जी ठहरे खालिस पत्रकार। उन के पास कोई बेस्ट सेलर भी नहीं है। सो उन्हें अपने इलाज के लिए भी पैसों के लिए दूसरों का मुंह देखना पड़ता है। सरकारों से फ़रियाद करनी पड़ती है। और सरकारें नहीं पसीजतीं। एक धेला भी नहीं देतीं। सो ऐसे में उन्हें इस ज्ञानपीठ पुरस्कार में मिलने वाले पांच लाख रुपए की सचमुच बहुत दरकार थी। हालां कि अमरकांत जी का लिखना और मस्ती बावजूद तमाम अभाव के छूट्ती नहीं है।

कुछ समय पहले मैं इलाहाबाद गया था तो उन से भेंट की थी। मैं गोरखपुर का हूं जान कर वह भावुक हो गए। न सिर्फ़ भावुक हो गए बल्कि गोरखपुर की यादों में डूब गए। अचानक भोजपुरी गाने ललकार कर गाने लगे। बलिया से एक बार कैसे वह गोरखपुर बारात में आए थे, यह बताने लगे। यह भी कि बड़हलगंज में कैसे तो पूरी बस को नाव पर लादा गया था तब सरयू नदी पार करने के लिए। और एक से एक बातें। वह कुछ समय गोरखपुर में रह कर पढे़ भी हैं यह भी बताने लगे। फिर जब वह ज़्यादा खुल गए तो मैं ने उन्हें गोरखपुर में उन के एक मित्र की याद दिलाई जिन की बेटी से वह अपने बेटे अरुण वर्धन की शादी करने की बात चला चुके थे। उन मित्र को उन्हों ने खुद बेटे से शादी का प्रस्ताव दिया और कहा कि कोई लेन देन नहीं, और कोई अनाप शनाप खर्च नहीं। बारात को सिर्फ़ एक कप काफी पिला देना। बस!

तब के दिनों अमरकांत जी के इस हौसले की गोरखपुर में बड़ी चर्चा थी। लेकिन यह शादी नहीं हो सकी। मैं ने उन से धीरे से पूछा कि आखिर क्या बात हो गई कि वह शादी हुई नहीं? तो अमरकांत जी उदास हो गए। बोले, ‘असल में बेटे को मंजूर नहीं था। वह असल में कहीं और इनवाल्व हो गया था तो बात खत्म करनी पड़ी।’ यादों में वह जैसे खो से गए। कहने लगे कि, ‘अब आप को बताऊं कि उस की शादी में क्या क्या नहीं देखना-भुगतना पड़ा मुझे! लड़की तक भगानी पड़ी। पुलिस, कचहरी तक हुई। मेरे खिलाफ़ रिपोर्ट तक हुई। असल में वह लोग ब्राह्मण थे। हम लोग कायस्थ। तो वह लोग तब मान नहीं रहे थे। लड़की तैयार थी, लड़का तैयार था तो यह सब अपने बेटे के लिए मुझे करना पड़ा। खैर कुछ समय लगा, यह सब रफ़ा-दफ़ा

अमरकांत जी के साथ बैठे दयानंद पांडेय
होने में। बाद में सब ठीक हो गया। फिर वह अचानक अपने आज़ादी की लड़ाई के दिनों में लौट गए। और एक भोजपुरी गाना फिर गुनगुनाने लगे।

हालां कि पुरस्कारों की राजनीति कितनी नंगी है इस पर जितनी भी बात की जाए कम ही है। खास कर कथाकारों को ले कर बहुत राजनीति हुई है। अब देखिए न कि, कमलेश्वर और मनोहर श्याम जोशी जैसे कथाकारों को साहित्य अकादमी एकदम निधन के पूर्व मिला। तब जब कि लीलाधर जगूडी, मंगलेश डबराल या वीरेन डंगवाल जैसे कवियों को इतनी जल्दी साहित्य अकादमी दे दिया गया कि लोग चौंक-चौंक गए। हर बार। यह सिर्फ़ और सिर्फ़ नामवर सिंह की राजनीति थी। कि कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी या अमरकांत जैसे कथाकारों को देर ही नहीं बहुत देर से यह सम्मान मिला। वह भी तब जब वह साहित्य अकादमी की ठेकेदारी से अलग हुए तब। यह तथ्य भी दिलचस्प है कि नामवर सिंह को साहित्य अकादमी पहले मिल गई और उन के आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को उन से दो साल बाद। वह भी आलोचना पर नहीं, उपन्यास पर। यह भी अद्भुत था कि एक समय आवारा मसीहा जब छप कर आया तो उस की धूम मच गई। लेकिन आवारा मसीहा के लेखक विष्णु प्रभाकर को साहित्य अकादमी नहीं दिया गया। तब मुद्राराक्षस ने अलग से एक समारोह आयोजित कर दिल्ली में ही विष्णु प्रभाकर को एक रुपए की राशि से उन्हें सम्मानित कर साहित्य अकादमी को अंगूठा दिखाया था। इस समारोह में देश भर से लेखक जुटे थे।

विष्णु जी को साहित्य अकादमी मिला बाद में पर उन की एक कमजोर कृति पर। पर मुद्राराक्षस को तो आज तक साहित्य अकादमी नहीं मिली। और इस के लिए वह बिना नाम लिए बाकायदा लिख कर श्रीलाल जी और उन के मित्रों पर संकेतों में ही सही लगातार इल्ज़ाम पर इल्ज़ाम लगाते रहे हैं। खुल्लमखुल्ला। इस को ले कर उन का अवसाद भी एक समय देखा जाता था। और तो छोडिए यशपाल जैसे लेखक भी राजनीति का शिकार हुए। उन के कालजयी उपन्यास झूठा सच पर साहित्य अकादमी नहीं दिया गया। इस लिए कि उस में नेहरु की आलोचना थी। महादेवी वर्मा दिनकर से पहले से लिख रही थीं और प्रतिष्ठित भी थीं पर दिनकर से दस साल बाद उन्हें साहित्य अकादमी मिला। इतना ही नहीं अज्ञेय जी को भी महादेवी से पहले साहित्य अकादमी मिला। अभी तो उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी पिछली दफ़ा मिल गया, अशोक वाजपेयी के जोर से पर एक ज़माने तक वह भी इस को ले कर प्राकारांतर से कुपित ही रहते थे और जब -तब साहित्य अकादमी की राजनीति पर तलवार लिए खडे़ दीखते थे। कौन नहीं जानता कि मैत्रेयी पुष्पा साहित्य अकादमी पाने के लिए क्या-क्या यत्न कर गई हैं और अभी भी वह हारी नहीं हैं।

सोचिए कि कामतानाथ जैसा बड़ा लेखक अभी भी साहित्य अकादमी से कोसों दूर है। तो यह पुरस्कारों में राजनीति की एक नई खिड़की है। अब अलग बात है कि कालकथा जैसा कालजयी उपन्यास रचने के बावजूद कामतानाथ कभी पुरस्कारों की छुद्र दौड़ में उलझे नहीं। ऐसे ही एक नाम रामदरश मिश्र का भी है। वह भी बडे़ लेखक हैं। पर किसी खेमे के नहीं हैं सो वह न सिर्फ़ पुरस्कारों से बल्कि चर्चा तक में तिरस्कृत हैं। कोई गुट उन का नाम भी नहीं लेता। इलाहाबाद में रह रहे शेखर जोशी जैसे अप्रतिम कथाकार भी ऐसी ही राजनीति के शिकार हैं। ज्यां पाल सार्त्र ने तो एक समय नोबेल पुरस्कार ठुकरा दिया था और कहा था कि पुरस्कार और आलू के बोरे में कोई फ़र्क नहीं है। अब अलग बात है कि एक समय इलाहाबाद में उपेंद्रनाथ अश्क इस लिए बिखरे-बिखरे घूमते थे कि उन्हें नोबेल नहीं मिल रहा था। वास्तव में इलाहाबाद की राजनीति में वह आकंठ फंस चुके थे और उन्हें लगता था कि उन की रचनाओं का अगर अंगरेजी में ठीक से अनुवाद हुआ होता तो नोबेल उन से दूर नहीं था।

शहरों की राजनीति में फंस कर आदमी ऐसे ही हो जाता है। दूर जाने की ज़रूरत नहीं है। लखनऊ में ही दो बडे़ कथाकार हैं। एक हरिचरण प्रकाश और दूसरे नवनीत मिश्र। पर लखनऊ में ही इन का नाम मठाधीश लोग भूल कर भी नहीं लेते। न किसी चर्चा में न किसी आयोजन में। अखबारों की टिप्पणियों तक से यह लोग खारिज हैं। रही बात मुद्रा राक्षस की तो एक मुहावरा याद आता है कि अकेला चना कभी भाड़ नहीं फोडता। तो अपने मुद्रा जी अकेला चना हैं। और मज़ा यह कि इस मुहावरे को झुठलाते हुए वह भाड़ भी फोड़ते ही रहते हैं जब-तब। जिस को जो कहना हो कहता रहे, वह उस की परवाह हरगिज़ नहीं करते। वह बिखरते और बनते रहते हैं अपनी ही शर्तों पर। लेकिन एकला चलो रे की उन की धुन कभी कोई छुड़ा नहीं पाया उन से।  कई बार इस फेर में वह अतियों के भी शिकार हो जाते हैं। पर इस सब से वह बेफिक्र अपने एकला चलो में व्यस्त हैं। इस पर सोचने की सचमुच ज़रुरत है कि उन्हें इस एकला चलो के हाल में पहुंचाने वाले कौन लोग हैं?

यह तो हुई कथाकारों की बात। एक कवि हैं बाबूलाल शर्मा प्रेम। क्या तो गीत हैं उन के पास। ‘ चांदनी को छू लिया है, हाय मैं ने क्या किया है!’ जैसे एक से एक अप्रतिम गीत उन्हों ने लिखे हैं। और तो और रजनीश ने उन के कई गीतों पर बडे़ विस्तार से प्रवचन किए हैं। पर लोग उन्हें नहीं जानते। यह जो काकस है न लखनऊ से लगायत दिल्ली, बनारस और इलाहाबाद तक का किसी भले आदमी को खड़ा नहीं होने देता। अलग बात है कि काकस में शामिल लोगों के पास फ़तवे जोड-गांठ ज़्यादा हैं पर गांठ में रचनाएं क्षीण हैं। सो फतवेबाज़ी और सीनाजोरी में सारी कसरत बेकार जाएगी यह जानने में इन महारथियों को समय लगेगा। अब अलग बात है कि यह लोग एक से एक द्विजेंद्रनाथ मिश्र निर्गुण को भी पी गए हैं। पर बनारस के पानी और उन की रचनाओं की ताकत ने उन्हें पाठकों के बीच आज भी बनाए रखा है। ऐसे बहुतेरे रचनाकार हैं जो मठाधीशों की मठाधीशी को धूल चटाते हुए, पुरस्कारों को आलू का बोरा बताते हुए अपनी रचनाओं के दम पर पाठकों में अपनी जगह और जड़ें दोनों ही मज़बूत की हैं। नहीं खारिज करने को तो एक समय भैया लोगों ने प्रेमचंद और निराला को भी कर दिया था। तो क्या वह लोग खारिज हो गए? पता चला कि वह लोग तब के मठाधीश थे और देखिए न कि उन मठाधीशों के नाम अब हमें ही याद नहीं आ रहे। तो हम क्या करें? इन मठाधीशों की जय बोलें कि इन रचनाकारों की! अपने लिए यह आप ही तय कर लें तो बेहतर होगा। हम तो रचनाकारों की जय बोल रहे हैं। जय हो !

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

संसद में आग लगाने वाले राहत इंदौरी के शेर पर सांसद मौन क्यों?

क्या वर्तमान भारतीय संसद और उस की सर्वोच्चता, उस की गरिमा, गौरव और उस का गगन अब सचमुच खतरे में पड़ गया है? नहीं मैं सिर्फ़ आतंकवादी हमले की बात नहीं कर रहा हूं। कि जो चाहे उस पर जब चाहे वार कर सकता है। अभी बीते संसद सत्र में जिस तरह सांसदों ने अपने मुह मियां मिट्ठू बनते हुए संसद की सर्वोच्चता के भजन एक सुर में गाए थे, वह अद्भुत था।

बताइए कि लालू यादव जैसे लोग जो भ्रष्टाचार में आकंठ डूब कर, संसदीय और सार्वजनिक गरिमा और शुचिता दोनों पर जाने कितनी कालिख पोत कर अपना राजपाट गंवा बैठे हैं, सब से ज़्यादा उन्हीं को संसद की पवित्रता खतरे में दिख रही थी। और वह मनमोहन सिंह को सलाह कम निर्देश भी लगभग घुड़पते हुए फ़ुल सामंती अंदाज़ में दे रहे थे कि शासन लुंज-पुंज हो कर नहीं, रौब से चलता है। शरद यादव जैसे पढे़-लिखे, समझदार नेता भी लालू के सुर में ही संसद की पवित्रता का भजन गाते दिखे। लगभग कुतर्क करते हुए। उस दिन ओमपुरी और किरन बेदी की भी खूब भर्त्सना हुई और कहा गया कि यह संसद और सांसदों का मज़ाक है। और यह देखिए कि देखते ही देखते एक एक कर अरविंद केजरीवाल, किरन बेदी, ओम पुरी और प्रशांत भूषण को संसद की अवमानना की नोटिसें मिल गईं।

यह जैसे कोढ़ में खाज हो गया वाली बात हो गई। यह सांसद और राजनीतिज्ञ ऐसे पेश आ रहे हैं गोया जनता से भी उपर संसद हो गई है। जिस संविधान को दिन रात बदल कर अपने अनुरुप बनाते जा रहे यह नेता उस में संशोधन कर कर के उस का लोथड़ा बना चुके हैं। उसी संविधान की दुहाई दे-दे कर जनता को गाय की तरह सुई लगा-लगा कर दूहने वाले यह राजनीतिज्ञ अपनी सुविधा और सुख के लिए दिन रात देश को बेचने लगे हैं। एक नहीं अनेक मामले हैं। और सब को सब कुछ पता है।

राहत इंदौरी तो साफ लिख रहे हैं कि, ‘सच बात कौन है जो सरे आम कह सके/ मैं कह रहा हूं मुझ को सज़ा देनी चाहिए/ सौदा यहीं पे होता है हिंदुस्तान का/ संसद भवन में आग लगा देनी चाहिए।’ और राहत इंदौरी ने यह शेर या गज़ल कोई आज नहीं लिखी है। यह कोई 6 या 7 साल पुराना शेर है। तो क्यों नहीं राहत इंदौरी के इस शेर पर अपने सांसद लोग कोई प्रतिक्रिया जता पाए? क्यों नहीं उन पर भी अवमानना की नोटिस वाली तलवार लटका पाए? क्या इस लिए कि वह शायर हैं? या इस लिए कि वह अल्पसंख्यक हैं और मुस्लिम वोट बैंक की थाती छूट जाएगी इन पेड़ों और भैंसों को प्रणाम करने वालों से?

बताइए कि शरद यादव एक दिन संसद में बोल रहे थे कि हम लोग तो पेड़, भैंस सब को प्रणाम करते हैं चुनाव में। पर मज़ा देखिए कि रामलीला मैदान में जुटी जनता को वह प्रणाम करने की बजाय दुत्कार रहे थे। देश भर में जगह-जगह अन्ना के समर्थन में जुटी जनता उन्हें या सरकार को अमरीकी साज़िश लग रही थी और है। आरएसएस और भाजपा की चाल लग रही थी। इस लिए कि यह जनता उन की सीधी वोटर नहीं थी। उन दिनों अपनी आका के देश में न रहने पर चुप्पी साधे दिग्विजय भी अब मुंह खोलने लगे हैं। बिल्कुल खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाले अंदाज़ में। वह कह रहे हैं कि अन्ना ने आरएसएस वालों के हाथ में तिरंगा थमा कर काली टोपी की जगह सफ़ेद टोपी पहनवा दिया। तो क्या यह जनता का ज्वार अब भाजपा के पक्ष में जा रहा है? दिग्विजय जी को तो यह खतरे की घंटी सुननी चाहिए। पर वह तो अलर्ट होने के बजाय मज़ा ले रहे हैं।

खैर यह उन का अपना अंदाज़ है। वह ही जानें। हम तो यह जानते हैं कि समाज और जनता अब करवट ले रही है। इन राजनीतिज्ञों को इस इबारत को पढ़ना और समझना चाहिए। यह संसद की सर्वोच्चता की सनक में सुन्न लोग क्या एक ऐसा विधेयक भी पास करने का हौसला रखते हैं कि जिस दाम पर और जिस गुणवत्ता वाला भोजन, नाश्ता वह संसद में छकते हैं, उसी दाम में और उसी गुणवत्ता वाला भोजन नाश्ता वह कम से कम गरीबी रेखा के नीचे जीने वालों को भी उपलब्ध करवाने की हुंकार भरें! या फिर अपने वेतन का चौथाई ही सही  बेरोजगारों के लिए बेरोजगारी भत्ता ही देने का विधेयक पास कर दें! या फिर अपनी सांसद निधि को रोजगार देने वाले कामों के नाम कर दें? लेकिन हम जानते हैं कि ऐसा तो यह सांसद सपने में भी नहीं सोच सकते हैं। सोच लेंगे तो उन की पवित्रता और सर्वोच्चता संकट में नहीं पड जाएगी?

प्रेमचंद कहते थे कि साहित्य समाज के आगे चलने वाली मशाल है। तो शायद इसी मशाल को ध्वनित करते हुए धूमिल चालीस साल पहले संसद से सड़क तक की कैफ़ियत बांच रहे थे। धूमिल जैसे अपनी कविताओं से इस व्यवस्था और संसद पर तेजाब डाल रहे थे। एक बानगी देखिए, ‘मुझ से कहा गया कि/ संसद देश की धड़कन को/ प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है/ जनता को/ जनता के विचारों का नैतिक समर्पण है/ लेकिन क्या यह सच है?/ या यह सच है कि/ अपने यहां संसद-/ तेली की वह घानी है/ जिस में आधा तेल है/ और आधा पानी है/ और यदि यह सच नहीं है/ तो यहां एक ईमानदार आदमी को/ अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है?/ जिस ने सत्य कह दिया है/ उस का बुरा हाल क्यों है?’

तो तब के सांसदों और तब की संसद ने क्यों नहीं हुंकार भरी कि संसद की अवमानना हो गई? शायद इस लिए कि तब तक वोट इस कदर जातियों और संप्रदायों के खाने में नहीं बंटे थे। न ही राजनीतिज्ञ इतने पतित हुए थे। न ही सामंती आचरण की बू उन में इस लपट के साथ भभकती थी। और कि शायद वह तब वोटरों को अपना भगवान, अपना खुदा, अपना गॉड दिखावे के लिए सही मानते थे। खुद को खुदा मानने की बीमारी उन में बेहयाई की इस सीमा तक नहीं समाई थी। और कि उन में तब जनता को सुनने की इच्छा भी थी, कहीं न कहीं।

कोई पैंतीस साल पहले दुष्यंत कुमार लिख रहे थे, ‘कल नुमाइश में मिला था चिथडे़ पहने हुए/ मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है।’ वह जैसे जोड़ते थे, ‘.सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर/ झोले में उसके पास कोई संविधान है/ वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है/ माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है।’  दुष्यंत का शेर तो ऐन आपातकाल में आया था। जब कि धूमिल की कविता बस उस के पहले। संयोग देखिए कि धूमिल आपातकाल बस लगने के पहले हम से बिछडे़ और दुष्यंत आपातकाल लगने के छह महीने बाद। पर आपातकाल और फिर नब्बे के दशक में आए आर्थिक उदारीकरण की बयार में सारी नैतिकता, शुचिता समाज में खंडित हो कर दिन-ब-दिन हमारे सामने नंगी होती गई है। राजनीतिज्ञों की सारी नैतिकता में पलीता लग गया।

भ्रष्टाचार की विष बेल के साथ-साथ उन का अहंकार, जातियों और साप्रदायिकता का घटाटोप अंधकार बढ़ता ही गया है। क्या अगर नंदीग्राम और सिंगूर में हुए जुल्म की आवाज़ के खिलाफ भाजपा खड़ी हो जाती है तो सिंगुर की जनता भाजपाई और सांप्रादायिक हो जाती है? माहौल यही बन गया है अब। दरअसल राजनीति में तो विमर्श और बहस के नाम पर अब सिर्फ़ कुतर्क और कुचक्र ही शेष रह गया है। दंगों की बात चलती है तो भाजपा कांग्रेस को 1984 के दंगों का आइना दिखाती है। कांग्रेस भाजपा को गुजरात दंगों का दर्पण दिखाती है। अपने-अपने दर्पण में कोई कभी नहीं देखता और न सबक लेता है। भ्रष्टाचार मसले पर भी यही हाल है। सभी एक दूसरे के भ्रष्टाचारियों की कुंडली बांचने में विभोर हो जाते हैं। बतर्ज़ तेरी साड़ी, मेरी साड़ी से ज़्यादा सफ़ेद कैसे?

संसदीय व्यवस्था, मर्यादा और उस की शुचिता की बांग देने वाली इन राजनीतिक पार्टियों की बेहूदगी अब सारी हदें लांघ कर जनता की गाढ़ी कमाई के खर्च पर अब एक नई अराजक संसदीय व्यवस्था कायम करने की ओर अग्रसर है, जिस में सारे गैर प्रजातांत्रिक तौर तरीके सामंती कलफ़ लगा कर जनता को सबक सिखाने के लिए औज़ार बाहुत यत्न से बटोरे जा रहे हैं। दुष्यंत के एक शेर में ही जो कहें कि, ‘आप दीवार गिराने के लिए आए थे/ आप दीवार उठाने लगे ये तो हद है!’

और मज़ा यह कि अपने कुछ इंटेलेक्चुअल और लेखक भी जो अब जनता और उस की संवेदना और भावना से इस कदर कट गए हैं कि बकरी की बेचारगी में तब्दील हो चुकी जनता अगर शासन रुपी शेर से लड़ने की सोचती भी है तो वह बकरी के तौर तरीके पर ऐतराज़ ही नहीं जताते जैसे एक मुहिम सी भी छेड़ बैठते हैं। यह एक नया संकट है। कि सारे ऐब बकरी में ही हैं, शेर तो दूध का धोया है ही। तो क्या प्रेमचंद गलत ही कह गए हैं कि साहित्य समाज की मशाल है? और कि राहत इंदौरी भी बेजां ही लिख रहे हैं कि ‘सौदा यहीं पे होता है हिंदोस्तान का/ संसद भवन में आग लगा देनी चाहिए!’

सच मानिए आज की संसद हमारी संसद हरगिज़ नहीं है। धूमिल के शब्दों मे जो कहें कि संसद देश की धड़कन को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है! अब यह दर्पण खंडित हो चुका है। यह संसद अब नपुंसक और कायर हो चुकी है। अपने ही ऊपर हमला करने वाले आतंकवादी को सज़ा देने या सबक देने लायक नहीं रह गई है। अपने रक्षकों को कानून और सुरक्षा का कवच नहीं दे सकती। शहीद हो गए तो उन की बला से। जनता की दुश्मन बन चुकी यह संसद जनता के लिए कुशासन, महंगाई और भ्रष्टाचार की भट्ठी बनाती है। राहत इंदौरी ठीक ही कह रहे हैं कि इस संसद को आग लगा देनी चाहिए। देश को अब नई संसद की ज़रुरत है। वह संसद जिस के दर्पण में देश की धड़कन प्रतिबिंबित हो, जो जनता को अपने से ऊपर माने, जनता का खुदा मानने से बाज़ आए!

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

हिंदी फ़िल्मों में रोमांस का रस

हिंदी फ़िल्मों में रोमांस उतना ही पुराना है, उतना ही शाश्वत और चिरंतन है जितना कि हिंदी फ़िल्म है, जितना कि हमारा जीवन है, जितना कि यह ब्रह्मांड है। सोचिए कि बिना प्रेम के यह दुनिया होती तो भला कैसी होती? और फिर फ़िल्म और वह भी बिना प्रेम के? शायद सांस भी नहीं ले पाती। और मामला फिर वहीं आ कर सिमट जाता कि ‘जब दिल ही टूट गया तो जी के क्या करेंगे?’ और फिर जो ‘दिल दा मामला’ न होता तो ‘तू गंगा की मौज मैं जमुना की धारा’ भी भला कहां होती और भला कैसे बहती?

हम कैसे गाते भला ‘बचपन की मुहब्बत को दिल से न जुदा करना! जब याद मेरी आए मिलने की दुआ करना!’ कैसे सुनते ‘जब तुम ही चले परदेस/छुड़ा कर देस/ तो प्रीतम प्यारा/ दुनिया में कौन हमारा!’ कहां से सुनते ‘ओ दुनिया के रखवाले/ सुन दर्द भरे मेरे नाले! मंदिर गिरिजा फिर बन जाता/ दिल को कौन संभाले?’ दरअसल हिंदी फ़िल्मों में प्रेम का पाग इतना गहरा, इतना रसीला, इतना मधुर और इतना चटक है कि उसकी महक और उस की चहक झूले में पवन के आई बहार भी प्यार बन के ही छलकती है। इतना कि कोयल कूकने लगती है, मोर नाचने लगता है और मन मल्हार गाने ही लगता है। प्यार की चादर हिंदी फ़िल्मों में इतनी तरह से बीनी गई कि उसे किसी एक रंग, एक पन और एक गंध में नहीं बांध सकते हैं, न जान सकते हैं। परदे पर यों  तो प्रेम के जाने कितने पाग हैं पर राजकपूर ने जो चाव, जो चमक और जो धमक प्रेम का उपस्थित किया है वह अविरल है। आवारा हालां कि एक सामाजिक फ़िल्म थी पर चाशनी उस में प्रेम की ही गाढ़ी थी। शायद तभी से प्यार को आवारगी का जामा भी पहना दिया गया। आवारा हूं गाने ने इस की चमक को और धमक दी। हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गाएगा, दीवाना सैकड़ों में पहचाना जाएगा जैसे गीतों के मार्फ़त राज कपूर ने इस आवारगी के जामे को और परवान चढ़ाया।

बाबी में तो वह साफ कहते ही हैं- देती है दिल दे, बदले में दिल ले। संगम, हिना, राम तेरी गंगा मैली हो गई जैसी उन की फ़िल्में प्रेम के ही बखान में पगी हैं तो प्रेम रोग, श्री चार सौ बीस, जिस देस में गंगा बहती है का कथ्य अलग-अलग है, बावजूद इस के बिना प्यार के यह फ़िल्में भी सांस नहीं ले पातीं। प्रेम रोग है तो विधवा जीवन की त्रासदी पर लेकिन उस की बुनियाद और अंजाम प्रेम की मज़बूत नींव पर टिकी है। इसी तरह जिस देस में गंगा बहती है है तो डाकू समस्या पर लेकिन इस की नाव भी प्रेम की नदी में ही तैरती मिलती है। मेरा नाम जोकर तो जैसे राजकपूर के प्रेम की व्याख्या ही में ही, उस की स्थापना में ही रची-बसी है। जाने कहां गए वो दिन कहते थे तेरी याद में नज़रों को हम बिछाएंगे जैसे गीत राजकपूर के प्यार की समुंदर जैसी गहराई का पता देते हैं। प्यार कि जिस विकलता और उस की विफलता को सूत्र दिया है मेरा नाम जोकर में वह अविरल ही नहीं अनूठा और अंतहीन है।

राजकपूर के बाद अगर किसी ने प्यार को उसी बेकली को विभोर हो कर बांचा है तो वह हैं यश चोपड़ा। उन की भी लगभग सभी फ़िल्में प्यार की ही पुलक में पगी पड़ी हैं। वह जैसे प्यार को ही स्वर देने के लिए फ़िल्में बनाते रहे हैं। कभी-कभी से लगायत वीर जारा तक वह एक से एक प्रेम कथाएं परोसते हैं। चांदनी, लम्हे, कुछ कुछ होता है, दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे भी उन की इसी राह का पता देती हैं। लम्हे तो अविस्मरणीय है। प्यार की बनी बनाई लीक से कोसों दूर ही नहीं, पलट कर भी है। गुरुदत्त की कागज के फूल और चौदवीं की रात या फिर साहब बीवी और गुलाम और प्यासा भी प्यार की अकथ कहानी ही कहती हैं। गुरुदत्त की फ़िल्मों में प्यार का जो ठहराव और बुनाव है वह अन्यत्र दुर्लभ है। दिलीप कुमार, देवानंद और राजकपूर जब प्रेम को ग्लैमर में बांध रहे थे तब गुरुदत्त प्यार को सादगी की चांदनी में चटक कर रहे थे। यह आसान नहीं था। दिलीप कुमार अभिनीत और विमल राय द्वारा निर्देशित देवदास हिंदी फ़िल्म में रोमांस का मानक बन कर उभरी तो गुरुदत्त की कागज के फूल रोमांस का एक नया क्राफ़्ट ले कर हमारे सामने उपस्थित है। देवानंद की गाइड प्रेम का एक नया ही बिरवा रचती है। प्रेम पुजारी, तेरे मेरे सपने में प्रेम की दूसरी इबारत वह भले लिखते हैं पर गाइड को वह छू भी नहीं पाते।

प्यार की बात चले और पाकीज़ा को हम भूल जाएं? भला कैसे संभव है। एक सादी सी फ़िल्म हो कर भी अपने गीतों और संवादों के चलते पाकीज़ा प्रेम की एक नई डगर पर हिंदी सिनेमा को ले जाती है। फिरते हैं हम अकेले/ बाहों में कोई ले ले/ आखिर कोई कहां तक तनहाइयों से खेले की जो स्वीकारोक्ति है वह आसान नहीं है। पांव ज़मीन पर मत रखिएगा, नहीं मैले हो जाएंगे या फिर अफ़सोस कि लोग दूध से भी जल जाते हैं जैसे मोहक और मारक संवाद और इस के दिलकश गाने पाकीज़ा को उस की पाकीज़गी तक इस आसानी से ले जाते हैं कि फिर कोई और फ़िल्म इस को छू नहीं पाती। तो कमाल अमरोही के समर्पण और उन के संवादों की ही यह तासीर है कुछ और नहीं। लेकिन जो कहते हैं कि मुहब्बत में बगावत वह पहली बार अपने दाहक रुप में अगर उपस्थित हुआ तो मुगले-आज़म में ही। कमाल अमरोही की ही कलम का यह कमाल है कि मुगले-आज़म में प्यार का जो अंदाज़ पेश किया के आसिफ़ ने उसे अभी तक कोई लांघना या साधना तो बहुत दूर की बात है कोई छू भी नहीं सका है। ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ का मानक अभी भी सिर चढ़ कर बोलता है। प्रेम कहानी पर इतनी मेहनत, इतना समर्पण, इतनी निष्ठा कभी फिर देखी नहीं गई किसी फ़िल्म में। सोचिए भला कोई निर्देशक फ़िल्म पर इतना आसक्त हो जाए कि फ़िल्म स्टूडियो में ही चटाई बिछा कर रोज-ब-रोज सोने लगे? पर के. आसिफ़ तो सोते थे। इस फ़िल्म को ले कर जाने कितनी कहानियां, किताबें लिखी और सुनाई गई हैं कि पूछिए मत। दो तीन वाकए यहां हम भी सुनाए देते हैं। बल्कि दुहराए देते हैं। सुनाए तो और लोगों ने हैं।

कभी नौशाद साहब यह वाकया सुनाते थे। एक दिन के आसिफ़ ने उन से पूछा कि ये तानसेन वाला गाना किस से गवाया जाए! तो नौशाद साहब ने फ़र्माया कि आज के तानसेन तो बडे़ गुलाम अली साहब हैं। उन्हीं से गवाना चाहिए। पर एक दिक्कत यह है कि वह गाएंगे नहीं। क्यों कि वह प्लेबैक नहीं देते। पर के आसिफ़ ने नौशाद से कहा कि वह गाएंगे। आप चलिए उन के पास। नौशाद ने बहुत ना-नुकुर की। पर के आसिफ़ माने नहीं। पहुंचे नौशाद को ले कर बडे़ गुलाम अली खां साहब के घर। नौशाद ने जैसा कि वह बताते थे बडे़ गुलाम अली साहब से सब कुछ बता दिया यह बताते हुए कि मैं ने इन्हें बता दिया है कि आप प्लेबैक नहीं देते हैं फिर भी यह आ गए हैं हम को ले कर। तो बडे़ गुलाम अली खां ने नौशाद से कहा कि ऐसा करते हैं कि इन से इतना ज़्यादा पैसा मांग लेते हैं कि यह खुद ही भाग जाएंगे। तो नौशाद साहब ने उन से कहा कि इस पर आप को पूरा अख्तियार है। नौशाद साहब बताते थे कि उन दिनों सब से महंगी गायिका थीं लता मंगेशकर। वह एक गाने का तब पांच सौ रुपए लेती थीं। और बडे़ गुलाम अली खां साहब ने के आसिफ़ से तब एक गाने का पचीस हज़ार रुपए मांग लिया। के आसिफ़ तब सिगरेट पी रहे थे। पचीस हज़ार सुनते ही उन्हों ने सिगरेट से राख झाड़ी और बोले, ‘डन !’ फिर अपनी जेब से दस हज़ार रुपए बडे़ गुलाम अली साहब को देते हुए बोले, ‘अभी इसे रखिए बाकी भिजवाता हूं।’

अब जब गाना रिकार्ड होने लगा तो जो चाहते थे नौशाद वह नहीं मिल पा रहा था। अंतत: बडे़ गुलाम अली खां नाराज हो गए। और बोले कि पहले फ़िल्म शूट करो फिर मैं गाऊंगा। अब देखिए रातोंरात दिलीप कुमार और मधुबाला को बुला कर फ़िल्म शूट की गई और फिर गाना रिकार्ड किया गया। नतीज़ा देखिए कि क्या राग आलापा खां सहब ने! ऐसे ही एक दृश्य में तपती रेत पर पृथ्वीराज कपूर को चलवाया के आसिफ़ ने। किसी ने कहा कि तपती रेत पर चलाते या ठंडी रेत पर चलाते कैमरा तो सिर्फ़ रेत ही दिखाएगा। तो के आसिफ़ बोले कि तपती रेत पर जो चेहरे पर तकलीफ़ चाहता था पृथ्वीराज कपूर से वह सिर्फ़ अभिनय से नहीं मिल पाता। इसी तरह एक दृश्य में उन्हों ने दिलीप कुमार को सोने के जूते पहनाए। जूते बनने के जब आर्डर के आसिफ़ दे रहे थे तब कैमरामैन ने उन से कहा कि ब्लैक एंड ह्वाइट में तो हमारा कैमरा वहां जूते को ठीक से दिखा भी नहीं पाएगा कि सोने का है तो क्या फ़ायदा? तो के आसिफ़ ने कहा कि सोने के जूते पहने कर हमारे हीरो के चेहरे पर जो भाव आएगा, जो चमक आएगी वह तो कैमरे में दिखेगा न? तो इतने समर्पण, इतनी निष्ठा से बनाई गई यह फ़िल्म मुगले आज़म रोमेंटिक फ़िल्मों का मानक और मक्का मदीना बन गई। जिस की मिसाल हाल फ़िलहाल तक कोई और नहीं है। एक एक दृश्य, एक एक संवाद और एक एक गाने आज भी उस के सलमे सितारे की तरह टंके हुए हैं।

बाद के दिनों में भी रोमेंटिक फ़िल्में बनीं आज भी बन रही हैं लेकिन मुगले आज़म के एक गाने में ही जो कहें कि पायल के गमों का इल्म नहीं झंकार की बातें करते हैं वाली बात हो कर रह गईं। और जो उस में एक संवाद है न कि दिल वालों का साथ देना दौलत वालों का नहीं। वह बात भी, वह तासीर भी बावजूद तमाम कोशिशों के नहीं बन पाई, नहीं आ पाई। हां प्यार के ट्रेंड ज़रूर बदलते रहे हैं, मिजाज और मूड बदलता रहा है। राजकपूर का अपना तेवर था, उन के प्यार में एक  अजब ठहराव था। तो दिलीप कुमार के अंदाज़ में ट्रेजडी वाला ट्रेंड था। इतना कि उन्हें ट्रेजडी किंग कहा जाने लगा। तो वहीं शम्मी कपूर उछल कूद करते हुए याहू ट्रेंड सेटर हो गए। राजेश खन्ना अपनी फ़िल्मों में एक नया अंदाज़ ले कर एक नए तरह के प्रेमी बन कर उपस्थित हुए और एक नया स्टारडम रचा। बीच में अनिल धवन दोराहा और हवस के प्रेमी बन कर चल रहे थे। विजय अरोडा भी थे। हां धर्मेंद्र, जितेंद्र सरीखे नायक भी थे। ठीक वैसे ही जैसे पहले विश्वजीत, जाय मुखर्जी जैसे नायक भी थे। लेकिन राजेश खन्ना की फ़िल्मों का प्रेमी एक साथ प्रेम की कई इबारते बांच रहा था। प्रेम की एक नई पुलक की आंच में वह जो पाग पका रहे थे, उस में एक टटकापन और मस्ती भी थी। सिर्फ़ रोना धोना ही नहीं। अमिताभ बच्चन अभिनीत फ़िल्मों ने प्यार को भी गुस्से में बदलने की फ़ितरत परोसी। मतलब एंग्री यंगमैन अब प्यार कर रहा था। जो कभी अभिमान में गायक था, कभी-कभी में शायर था या एक नज़र में जुनून की हद से गुज़र जाने वाला प्रेमी अब तस्कर था दीवार में और प्यार कर रहा था। उसी तस्करी वाले अंदाज़ में। कि पिता पहले बनता है शादी की बात बाद में सोचता है। यह अनायास नहीं है कि चंदन सा बदन चंचल चितवन जैसा मादक गीत लिखने वाले इंदीवर बाद में सरकाय लेव खटिया जाड़ा लगे लिखने लगे। और अब तो सब कुछ शार्ट में बतलाओ ना, सीधे प्वाइंट पर आओ ना! या फिर इश्क के नाम पर अब सब रचाते रासलीला है मैं करुं तो साला करेक्टर ढीला है! जैसे गानों से हिंदी फ़िल्मों में रोमांस की बरसात हो रही है।

खैर अस्सी के दशक में जब मैंने प्यार किया आई तो सलमान खान प्यार के नए नायक बन गए। प्यार का एक नया ट्रेंड हिंदी फ़िल्मों मे आया। एक नई बयार बहने लगी। एंग्री यंगमैन के अंदाज़ से अब टीन एज अंदाज़ का रोमांस हिंदी फ़िल्मों में सांस लेने लगा। कयामत से कयामत तक की बात आ गई। बात फिर चूडी मजा न देगी, कंगन मजा न देगा से होने लगी। लगा कि रोमांस लौट आया है। लेकिन ओ जो मुकेश ने एक गाना गाया है न कि तुम अगर मुझ को न चाहो तो कोई बात नहीं, गैर के दिल को सराहोगी तो मुश्किल होगी वाले अंदाज़ में हिंदी फ़िल्में सांस लेने लगीं। जिस्म जैसी फ़िल्में आने लगीं जो बिपाशा जैसी खुली तबीयत वाली अभिनेत्रियों के मार्फ़त प्यार के बहाने देह की खिड़की खोल रही थीं और बता रही थीं कि प्यार अब पवित्र ही नहीं रहा सेक्स भी हो गया है। फिर तो प्यार के रंग में सेक्स का रंग सिर चढ़ कर बोलने लगा। और अब फ़सल सामने है। एक से एक चुंबन, एक से एक बोल्ड और न्यूड दृश्य अब आम बात हो चली है। मुन्नी बदनाम और शीला जवान हो गई तो जलेबी बाई भी भला काहे पीछे रहतीं? इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं या आप की याद आती रही रात भर अब बिसर कर अब बारह महीने में बारह तरीके से प्यार की इबारत बांचने लगा हिंदी सिनेमा का रोमांस।

एक समय था जब मधुबाला, मीना कुमारी, वैजयंती माला, आशा पारिख, वहीदा रहमान की बाहों और आहों में हिंदी सिनेमा रोमांस की गलबहियां करता था, रोमांस की चादर बीनता था। शोला जो भड़के, दिल मेरा धड़के या फिर जवानी बीत जाएगी ये रात फिर ना आएगी गा कर मन को प्यार के हिडोले पर बैठाता था। अशोक कुमार, राजकुमार, राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त के साथ देविका रानी,साधना, नूतन, तनूजा हेमा मालिनी, रेखा, श्रीदेवी, जयाप्रदा, तब्बू  के तेवर में प्यार के तराने गाने वाला हिंदी सिनेमा अब इमरान हाशमी और मलिका शेरावत के चुंबनों में चूर होने लगा। रोमांस की यह एक नई धरती एक नया आकाश हिदी सिनेमा के दिल में धड़कना और बसना शुरु हुआ। पहले फ़िल्मी गानों में पेड़ों की डालियां हिलती थीं अब देह हिलने लगी। हिलने क्या लगी उछले कूदने और दौड़ने लगी। रोमांस का एक नया रंग था। आनंद बख्शी कभी लिखते थे देवानंद के लिए बैठ जा बैठ गई और गाते थे किशोर कुमार पर अब तो लिरिक के नाम पर खड़ा का खड़ा गद्य और संगीत के नाम पर शोर सुनाई देने लगा है रोमेंटिक गानों में। गाने अब गाने नहीं डांस नंबर बन चले हैं। लिखते थे कभी चित्रलेखा सरीखी फ़िल्म के लिए साहिर लुधियानवी कि सखी रे मेरा मन उलझे, तन डोले! अब तो यह है कि तन ही तन है मन तो किसी भयानक खोह में समा गया है। शोखियों में घोला जाए थोड़ा सा शबाब उस में फिर मिलाई जाए थोड़ी सी शराब होगा यूं नशा जो तैयार वो प्यार है प्यार! जैसे मादक और दाहक गीत लिखने वाले नीरज और उस को संगीत देने वाले सचिन देव वर्मन को जिस को याद करना हो करे अब तो डेल्ही बेली का गाना सुन रहे हैं लोग भाग बोस डी के। अब इस के उच्चारण में लोगों के मुह से गालियां निकलती हैं तो उन की बला से। यह एक नया रोमांस है।

भारत भूषण और मीना कुमारी का वह दौर नहीं है कि आप तू गंगा की मौज मैं जमुना की धारा के संगीत में आप गोते मारें। एक दूजे के लिए में गाती रही होंगी कभी लता मंगेशकर सोलह बरस की बाली उमर को सलाम ऐ प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम! अब तो आप सुनिए ज़रा शार्ट में समझाओ ना सीधे प्वाइंट पर आओ ना! अब सब कुछ हाइटेक है तो रोमांस भी कब तक भला और कैसे भला पीछे रहता? अब उस रोमांस का ज़माना बीत और रीत गया जिस को कभी सहगल, बेगम अख्तर, लता मंगेशकर, मुबारक बेगम,मुहम्मद रफ़ी, मुकेश किशोर, मन्ना डॆ या तलत महमूद, सुमन कल्यानपुर, मनहर हेमलता की गायकी में निर्माता निर्देशक और संगीतकार हिंदी फ़िल्मों मे परोसते थे। कभी लिखते रहे होंगे भरत व्यास, राजा मेंहदी अली खां, शकील बदांयूनी, साहिर लुधियानवी, नरेंद्र शर्मा, शैलेंद्र, नीरज, मज़रूह सुल्तानपुरी, गुलज़ार, जावेद अखतर प्रेम गीत। एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा या फिर चांदनी रात में एक बार तुझे देखा है, या मोरा गोरा अंग लई ले, मोहि श्याम रंग दई दे! भूल जाइए पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है और मत सोचिए कि ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है! आप तो बस सीधे प्वाइंट पर आइए ना! और गाइए भाग बोस डी के !। आज की हिंदी फ़िल्म में रोमांस की यही कैफ़ियत है। आगे और बदलेगी।

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

हमको तो चलना आता है केवल सीना तान के

: भगवती चरण वर्मा की जयंती 30 अगस्‍त पर विशेष : कुछ लेखक होते हैं जो बहुत कुछ लिख जाने के बाद भी अपना पता नहीं दे पाते तो कुछ लेखक ऐसे भी होते हैं जिन की रचनाएं तुरंत उन का पता दे देती हैं। पर किसी लेखक की रचना ही अगर उस का पता बन जाए तो? किसी रचनाकार की रचना ही उस का पता हो जाए ऐसा नसीब मेरी जानकारी में दुनिया के सिर्फ़ एक ही लेखक के हिस्से में आया है। रचना है चित्रलेखा और लेखक हैं भगवती चरण वर्मा।

तब के दिनों में चिट्ठी लिखने का चलन था। और लोग भगवती चरण वर्मा को चिट्ठी लिखते थे और पता के रूप में लिखते थे चित्रलेखा के लेखक। न कोई मुहल्ला, न कोई शहर न कोई देश या प्रदेश। कुछ भी नहीं लिखते थे लोग। और मजा देखिए कि भगवती चरण वर्मा के पास वह चिट्ठी सही सलामत और समय से पहुंच जाती थी। और फिर ऐसी चिट्ठियों की संख्या दो-चार-दस नहीं असंख्य थीं। ऐसी लोकप्रियता वाले लेखक भगवती चरण वर्मा इसी लखनऊ में अपने जीवन का अधिकांश समय गुजार कर गए हैं। पर अब लखनऊ तो छोड़िए उसी महानगर मुहल्ले में जहां वह रहते थे चित्रलेखा नाम से ही घर बनवा कर उसी चित्रलेखा या भगवती बाबू के घर के बारे में पूछिए तो घर तो बहुत दूर की बात है भगवती चरण वर्मा को ही लोग जानने से मुकर जाएंगे। बताइए भी कि यह कौन सा समय है? आखिर किस समय में हम जी रहे हैं अब? एक वह समय था कि चित्रलेखा के लेखक भर लिख देने से चिट्ठी भगवती चरण वर्मा को मिल जाती थी। मैं ने तो वह समय भी देखा है कि जब लखनऊ के हजरतगंज में भी किसी से पूछ लीजिए कि भगवती चरण वर्मा कहां रहते हैं तो लोग बता ही देते थे। न सिर्फ़ पता बता देते थे बल्कि वहां जाने का रास्ता भी बता देते थे।

इलाहाबाद में एक त्रिवेणी और थी निराला, पंत और महादेवी की। तो एक त्रिवेणी लखनऊ में भी। कल-कल, छल-छल करती गोमती से भी ज़्यादा वेग में बहती यह त्रिवेणी थी भगवती चरण वर्मा, यशपाल और अमृतलाल नागर के साहित्य की त्रिवेणी। तीनों की धारा अलग थी, रंग और गंध अलग थी। भाषा, शिल्प और कथ्य में भी तीनों अलग थे। पर बहते रहते साथ-साथ थे। उठते-बैठते साथ-साथ थे। आपसी मतभेद भी बहुत थे पर मजाल क्या था कि कोई किसी पर कोई ऐसी-वैसी टिप्पणी भी कर दे या कोई सुन ले। तीनों आपस में एक दूसरे का सम्मान करते हुए थकते नहीं थे। एक छोटा सा वाकया सुनिए। भगवती बाबू के निवास चित्रलेखा पर ही कुछ लेखकों का जमावड़ा था। आपस में चुहुल भी जारी थी। यशपाल जी का घर भी उसी महानगर में थोड़ी दूरी पर ही बन रहा था। किसी ने मारे खुशी के यशपाल जी से कहा कि, ‘आप भी अपने घर का नाम दिव्या रख लीजिए !’  यशपाल जी ने बहुत धीरे से अपनी आपत्ति रख दी थी, ‘ मैं ने सिर्फ़ दिव्या ही नहीं लिखा है।’  और बात खत्म हो गई थी।

चित्रलेखा नाम से एक शानदार घर जरूर बनवाया भगवती चरण वर्मा ने लखनऊ में पर सच यह है कि लखनऊ उन्हें बहुत पसंद नहीं था। वह तो लखनऊ को खंडहरों का शहर बताते थे। वह इसे अपनी ग़लती बताते थे। उन्हों ने लिखा है कि, ‘हम खंडहर में बस गए हैं यानी हमारा मतलब यह है कि हमें अब आ कर पता चला कि हम खंडहरों के शहर में बस कर धीरे-धीरे खुद खंडहर बनते जा रहे हैं।’  इस पर उन्हों ने एक कविता भी लिखी :  ‘ हम खंडहर के वासी, साधो, हम खंडहर के वासी/ ज्ञान हमारा बड़ा अटअटा, मति है सत्यानाशी/  हम तो जनम-जनम के मूरख, जग है निकट बिसासी/ दास भगौती अपनी ही गति, लखि-लखि आवत हांसी/ साधो हम खंडहर के वासी।’  सचमुच अगर वह आकाशवाणी की नौकरी न किए होते लखनऊ में तो शायद यहां घर तो नहीं ही बनाते। हुआ यह कि जब आकाशवाणी की नौकरी उन्हों ने छोड़ी तो उन की जगह इलाचंद्र जोशी की नियुक्ति हुई। जोशी जी को ले कर नगर महापालिका के तत्कालीन प्रशासक से वह मिले कि जोशी जी को महापालिका का एक फ्लैट किराए पर मिल जाए। उसी प्रशासक ने उन्हें महानगर में जमीन लेने की सलाह दे दी। तब के दिनों वह

भगवती चरण वर्मा
विशेश्वरनाथ रोड पर अपने भतीजे के बंगले में रहते थे। उन्हों ने प्लाट ले लिया और 1960 में चित्रलेखा बन कर तैयार हो गया। वह स्थाई रूप से लखनऊ के वासी बन गए।

उन्नाव के एक गांव सफीपुर में पैदा हुए भगवती चरण वर्मा कानपुर के रहने वाले थे। बचपन में पिता नहीं रहे। तो भी उन्हों ने बी.ए. एल.एल.बी. किया। कानपुर, हमीरपुर से लगायत प्रतापगढ़ तक में प्रैक्टिस की। पर वकालत उन की कहीं भी चली नहीं। भदरी के राजा सहित कुछ सेठों की भी नौकरियां की उन्हों ने पर टिक कर कहीं रहे नहीं। हफ्ते दस दिन वाली नौकरियां भी की उन्हों ने। पर उन का अक्खड़ स्वभाव उन्हें यहां वहां घुमाता रहा। कोलकाता से लगायत मुंबई तक की फ़िल्म इंडस्ट्री में भी वह रहे। पर बात कहीं जमी नहीं। कोलकाता में तो वह फ़िल्म छोड़ कर प्रेस खोल बैठे। और विचार नाम से एक पत्रिका भी निकाली। पर जल्दी ही वह मुंबई चले गए। देविका रानी की फ़िल्म कंपनी में रहे। पर देविका रानी के एक सहयोगी अमिय चक्रवर्ती से पटी नहीं तो वह फ़िल्म कंपनी भी छोड़ बैठे। मुंबई में भी वह प्रेस लगाने के जुगाड़ में थे कि लखनऊ से नवजीवन छपने की बात हुई। वह संपादक बन कर लखनऊ आ गए। पर मुख्यमंत्री गोविंदबल्लभ पंत और रफी अहमद किदवई की रस्साकशी में वह ज़्यादा दिन संपादक नहीं रह पाए। आकाशवाणी उन का नया ठिकाना बनी। और वह फिर लखनऊ के हो कर रह गए। भले वह लखनऊ को खंडहर कहते रहे हों पर उन की रचनाओं में लखनऊ लगातार उपस्थित है।

अमृतलाल नागर की तरह वह भले न लखनऊ पर फिदा होते रहे हों पर लखनऊ उन पर हमेशा फिदा रहा। उन के उपन्यास, उन की कहानियां और उन की कविताएं लखनऊ की आब और मस्ती में निरंतर ऊभ-चूभ रही हैं। दो बांके जैसी उन की कहानी लखनऊ के जिस खिलंदड़पने को बाचती हैं वह अविरल है। और सारी उठापटक के बाद जब बात आती है कि चारपाई के उस पार के तुम, और इस पार के हम तो फिर झगड़ा किस बात का? लखनऊ के रकाबगंज का रंग और लखनऊ की नफासत क्या तो इस कहानी में कलफ लगा कर बोलती है। यही हाल मुगलों ने सल्तनत बख्श दी में है। यह कहानी अपने रूप रंग में एक बार लगती है कि ऐतिहासिक है। पर सच यह है कि इस का इतिहास-उतिहास से कुछ लेना देना नहीं है। सिर्फ़ माहौल बुनते हैं भगवती बाबू इस में ऐतिहासिकता का। और इस बहाने वह चोट करते हैं साम्राज्यवाद पर। साम्राज्यवाद के विस्तार पर। भगवती चरण वर्मा के यहां असल में न ज्ञान है न ऐतिहासिकता न कोई दर्शन-वर्शन। उन के यहां तो सिर्फ़ और सिर्फ़ किस्सागोई है। आप को किस्सा कहानी का मजा लेना हो तो आइए भगवती चरण वर्मा के कथालोक में। नहीं ज्ञान, दर्शन, इतिहास आदि की भूख हो तो कहीं और जाइए। वह तो अपने को निरा भाग्यवादी बताते थे और गाते फिरते थे, ‘हम दीवानों की क्या हस्ती/ हैं आज यहां कल वहां चले,/ मस्ती का आलम साथ चला,/ हम धूल उड़ाते जहां चले।’  कवि सम्मेलनों में उन का यह गीत तब इतना मशहूर हुआ था कि किशोर साहू ने अपनी फिल्म ‘राजा’  में इसे इस्तेमाल किया। फिर तो यह गीत सिर चढ़ कर बोलने लगा।

वह यहीं नहीं रुके और लिखते रहे,’वैसे वैभव और सफलता से हमको भी मोह है’  पर क्या करें? /कि हम कायल हैं धर्म और ईमान के/ हमको तो चलना आता है केवल सीना तान के।’  लोग बताते हैं कि भगवती बाबू तब के दिनों कवि सम्मेलनों में अपने सस्वर पाठ और कविता में अलग गंध बोने के कारण खूब लोकप्रिय थे। उन के लेखन में वह चाहे कविता हो या कहानी, उपन्यास किसी में भी आलोचकों को कला वला नहीं मिलती। उन के यहां वैसे भी सीधे-सीधे नैरेशन हैं। कोई आलोचक जो उन्हें टोकता भी इस बात पर कि आप की कला कमज़ोर है, शिल्प पर ध्यान दीजिए। तो वह कहते कि यह कला वला अपने पास रखो। हमें तो बिना कला के ही सब से ज़्यादा रायल्टी मिलती है। मेरा बैंक बैलेंस इसी से बनता है। सचमुच लोग बताते हैं कि उन दिनों राजकमल प्रकाशन दो ही लेखकों को सब से ज़्यादा रायल्टी देता था। एक सुमित्रा नंदन पंत को दूसरे भगवती चरण वर्मा को। भगवती चरण वर्मा असल में मध्य वर्ग के लेखक हैं। मध्य वर्ग की ही तरह वह पूरे भाग्यवादी हैं। कर्म को हालांकि वह खारिज नहीं करते फिर भी भाग्य को वह बड़ा मानते थे। जीवन में भी और रचना में भी। उन के नाटक भी मध्यवर्ग की कथाओं में ही लिपटे हैं और कहानी उपन्यास भी। प्रेमचंद को वह अपना आधार मानते थे। और साफ कहते थे कि प्रेमचंद न होते तो हम न होते। सोचिए कि कभी सातवीं कक्षा में हिंदी में फेल होने वाला विद्यार्थी कक्षा नौ तक आते आते कवि बन जाता है। अठारह बीस बरस तक आते-आते वह बड़े-बड़े कवियों के साथ उठने बैठने लगता है। और एक दिन हिंदी का शीर्ष लेखक भी बन जाता है। यह भी क्या विरल संयोग है कि हिंदी सिनेमा में दो ही ऐसे उपन्यास हैं जिन पर दो बार फिल्म बनी है। एक शरत बाबू की देवदास पर दूसरी भगवती बाबू की चित्रलेखा पर।

अशोक कुमार, मीना कुमारी और प्रदीप वाली फ़िल्म तो रंगीन में बनी और पैसे भी खूब मिले। पर यह भी एक इत्तफाक ही है कि भगवती बाबू चित्रलेखा पर बनी दोनों ही फिल्मों से निराश थे। दोनों ही उन्हें अच्छी नहीं लगीं। चित्रलेखा की कहानी माना जाता है कि अनातोले फ्रांस के उपन्यास ‘थाया’  से मिलती जुलती है। बाद में उन्हों ने यह तो माना कि चित्रलेखा लिखने की प्रेरणा अनातोले फ्रांस की ‘थाया’  से मिली है और कि दोनों पुस्तकों की मूलभूत विषयवस्तु में कुछ समानता है। पर यह भी कहा कि चित्रलेखा और अनातोले फ्रांस की ‘थाया’  में वही अंतर है जो उन में और अनातोले फ्रांस में है। वैसे भी थाया में जो पाप और पुण्य की विवेचना जो गंभीरता लिए हुई है वह चित्रलेखा में उस घनत्व में नहीं है और कि कथा भी भारतीय परिवेश की हो गई है। जो तमाम पाठकों को ऐतिहासिक गंध भी देती चलती है। तब जब कि सच यह है कि चित्रलेखा का ऐतिहासिकता से कुछ भी लेना देना नहीं है। सिवाय एक माहौल बुनने के।
कुछ-कुछ वैसे ही जैसे कि जब वह पद्मभूषण से सम्मानित किए गए तो लोगों से वह कहते फिरे कि, ‘अगर तुम्हीं को पद्मभूषण बना दिया जाए तो सरकार का क्या कर लोगे?’  उनका एक आत्मकथात्मक उपन्यास है धुप्पल। तो वह अपने को भाग्यवादी मानते हुए यह भी मानने लग गए थे कि उन के जीवन में जो भी कुछ घटा या मिला जुला सब धुप्पल में ही था। बताइए कि पैसे की जरूरत हो और आप उस के लिए एक नोटबुक खरीद कर जितने पन्ने उस में हों, उतनी कविताएं एक ही दिन में लिख कर प्रकाशक से पैसे लेने पहुंच जाएं क्या ऐसा हो सकता है? भगवती चरण वर्मा ने यह किया। और यह कविता संग्रह छपा भी एक दिन शीर्षक से। इस पूरे वाकए का बहुत ही विभोर भाव में नागर जी ने वर्णन लिखा है।

उन के पास कार थी, सारी सुविधाएं थीं फिर भी वह पैदल ही लखनऊ घूमते-धांगते मिल जाते थे लोगों को। वह महानगर से पैदल ही हजरतगंज काफी हाऊस चले आते थे या अमीनाबाद चले जाते थे, चौक में नागर जी के यहां चले जाते थे। कभी पैदल, कभी रिक्शे से। अजब था यह। मैं जब उन से पहली बार मिला तो जाहिर है वह अमृतलाल नागर की तरह दिल खोल कर नहीं मिले। न ही यह एहसास करवाया कि वह कितने मिलनसार हैं। संयोग देखिए कि मैं महानगर में उन के घर के पास ही थोड़ी दूर पर उन्हीं से उन्हीं के घर का पता पूछ रहा था। और उन्हों ने एक बार भी नहीं कहा कि मैं ही भगवती चरण वर्मा हूं। वह तो पान खाते हुए हाथ के इशारे से अपने साथ-साथ चलने का इशारा कर चलने लगे। इस के पहले मैं ने एक पान वाले से चित्रलेखा और भगवती चरण वर्मा का घर पूछा था। उस ने भी बिन बोले इशारे से उन की ओर हाथ दिखा दिया। शायद वह मारे संकोच के कुछ बोल नहीं पाया। और मैं उस का इशारा ठीक से समझ नहीं पाया। और उन्हीं से उन का पता पूछने लगा। चित्रलेखा जब आ गया तो वह बड़े इत्मीनान से घर के बरामदे में आ कर बेंत वाली कुर्सी पर बैठते हुए सामने की कुर्सी पर बैठने का इशारा किए। मैं बैठ तो गया पर थोड़ा झल्लाते हुए बोला, ‘पर मुझे भगवती चरण वर्मा से मिलना है!’  उन्हों ने उगालदान में पान थूका और मुझे घूरते हुए धीरे से बोले, ‘मैं ही हूं। क्या काम है?’  मैं लज्जित हुआ। उन से क्षमा मांगी। और उन्हें बताया कि जो छपी फोटो उन की देखी थी उन से उन का चेहरा पहचानने में भूल हुई। वह बोले, ‘कोई बात नहीं। पुरानी फोटो रही होगी।’  फिर मेरे बारे में पूरी पूछताछ की। उन दिनों वह राज्यसभा में मनोनीत सांसद थे।

मैं ने राजनीति पर इंटरव्यू करना चाहा तो वह बोले, ‘राजनीति पर नहीं कोई और प्रश्न हो तो पूछो।’  यह सुनते ही मुझे धर्मवीर भारती का लिखा याद आ गया। लेख का शीर्षक ही था एक प्रश्न यात्री! खैर बात बहुत ज़्यादा नहीं हुई। क्यों कि उन्हें जल्दी ही कहीं जाना था। पर जितने सवाल मैं लिख कर लाया था वह सब पूछ चुका था। जिस के जवाब में मैं ने पाया कि उन्हों ने कुछ बहुत उत्साह नहीं दिखाया। जैसे सपाट मेरे प्रश्न थे वैसे ही सपाट उन के उत्तर। लगा ही नहीं कि मैं सबहिं नचावत राम गोंसाईं के लेखक से मिल रहा हूं। उन दिनों मैं सबहि नचावत राम गोसाईं नया नया पढे़ था। उस का जैसे नशा सा तारी था मुझ पर। दरअसल आप अगर अमृतलाल नागर जैसे व्यक्ति से मिलने के बाद भगवती चरण वर्मा जैसे व्यक्ति से मिलेंगे तो यही होगा। अगर आज मुझे कोई उस की तुलना करने को कहे तो कहूंगा कि अमिताभ बच्चन से मिलने के बाद अगर दिलीप कुमार से आप मिलेंगे तो ऐसा ही लगेगा। संयोग यह भी देखिए कि दिलीप कुमार नाम भी उन्हें भगवती चरण वर्मा ने ही दिया हुआ है। हैं तो वह यूसुफ ख़ान। खैर बाद में यह बात मैंने नागर जी को बताई तो वह बोले ऐसा तो नहीं होना चाहिए। पर उन्हों ने यह जरूर जोड़ा कि तुम भी दही खाने के बाद दूध पीयोगे तो यही होगा। फिर बोले हो सकता है व्यस्त रहे होंगे। मैं ने बताया कि नहीं वह तो अकेले थे। फिर नागर जी बोले दुबारा मिलना तब देखना। नागर जी उन्हें नेता कह कर संबोधित करते थे। पर कुछ दिन बाद जब दुबारा मिला तब भी वह थोड़ा खुले तो पर वह जो सहजता कहते हैं, वह बात नहीं आई। फिर मैं ने यह बात और दो एक मित्रों से चलाई तो सब सहमत थे इस बात पर कि भगवती बाबू नागर जी तो नहीं हो सकते।

खैर, हर आदमी का अपना-अपना स्वभाव होता है। किसी से वह खुल कर मिलता है, सहज हो कर मिलता है तो किसी से बंद-बंद या असहज भी हो सकता है। लेकिन इस से उस का काम या रचना का मूल्यांकन करना ठीक बात नहीं होती। कई बार कई चीजें हो जाती हैं। आप अपनी कल्पना में किसी को और तरह से जीते हैं और वह किसी और तरह से आप से मिलता है। भगवती बाबू भी शायद ऐसे ही रहे हों। जो भी हो उन की कविताएं, उपन्यास और कहानियां, नाटक आदि हमें ऐसे रचना समय में ले जाते हैं जिन का कोई और विकल्प नहीं सूझता। उन के पहले उपन्यास पतन में ही उन की कथा संभावना को हेरा जा सकता है। चित्रलेखा तो उन का उत्कर्ष ही है। पर टेढे़ मेढ़े रास्ते के मार्फत जो सामाजिक और राजनीतिक उथल पुथल का ताना-बाना वह बुनते हैं वह अविकल और अविस्मरणीय बन जाता है। गांधीवाद और मार्क्सवाद और फिर इस बहाने एक परिवार की सत्त्ता की जो मुठभेड़ वह कराते हैं वह लाजवाब है। भूले बिसरे चित्र में भी एक परिवार की चार पीढ़ी की कथा वह परोसते हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के आखिर से नमक सत्याग्रह तक की कथा में तत्कालीन समाज में हो रहे बदलाव और मूल्यों के क्षरण का जो कोलाज वह रचते हैं, जो द्वंद्व परोसते हैं तब के कथा संसार में वह दुर्लभ ही है।

सीधी सच्ची बातें भी राजनीतिक उपन्यास है। और इस में गांधी से उन का मोहभंग साफ देखा जा सकता है। जब कि प्रश्न और मारीचिका अपनी कथा और काया दोनों ही में उन के बाकी उपन्यासों से जुदा है। साढ़े पांच सौ से भी अधिक पृष्ठों वाला यह उपन्यास तमाम अर्थों में दिलचस्प है। है तो यह भी राजनीतिक आंच में पका हुआ उपन्यास जो आज़ादी से चीन भारत युद्ध तक के समय को समेटे हुए है। सिस्टम को यह उपन्यास सीधे चुनौती भी देता दिखता है पर कोई समाधान नहीं परोसता है यह उपन्यास। तो कुछ आलोचक इस पर निराशा जताते हैं। वह शायद यह बात भूल जाते हैं जिस में कहा गया है कि साहित्य समाज का दर्पण है। जो समाज में घटेगा उपन्यासकार वही तो दर्ज करेगा। पर हां एक बडे़ फलक पर कई प्रश्न यह उपन्यास जरूर उपस्थित करता है। शायद इसी लिए धर्मवीर भारती जैसे लोग उन्हें एक प्रश्न यात्री के रूप में देखने लगते हैं। तब के चाहे आज के समाज में या समय में प्रश्न करना, या सिस्टम से टकराना कोई आसान काम है? भगवती चरण वर्मा यह काम करते थे। अपनी रचनाओं के मार्फत वह प्रश्न भी करते थे और सिस्टम से टकराते भी थे। शायद इसी लिए वह आज भी प्रासंगिक हैं और कि आगे भी रहेंगे। वह यों ही नहीं लिखते थे कि, ‘हमको तो चलना आता है केवल सीना तान के।’ वह जैसा लिख गए हैं, वैसा कर भी गए हैं। मतलब केवल सीना तान कर चलना सिखा भी गए हैं। नहीं यह पूछना आसान नहीं था कि, ‘अगर तुम्हीं पद्मभूषण बन जाओगे तो सरकार का क्या कर लोगे?’  ठीक वैसे ही जैसे कि इलाज वह अपने कैंसर का करवा रहे थे पर हम सब से बिछड़े भी तो हार्ट अटैक से।

दयानंद पांडेय
लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं.  उनका यह लेख राष्‍ट्रीय सहारा में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.  दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

ध्यान रखना कांग्रेसियों, ये रामदेव नहीं, अन्ना हैं, अबकी खदेड़े तुम लोग जाओगे

दयानंद पांडेय: धृतराष्ट्र, मगध और अन्ना : आप को याद होगा कि पांडवों ने कौरवों से आखिर में सिर्फ़ पांच गांव मांगे थे जो उन्हें नहीं मिले थे। उलटे लाक्षागृह और अग्यातवास वगैरह के पैकेज के बाद युद्ध क्या भीषण युद्ध उन्हें लड़ना पडा था। अपनों से ही अपनों के खिलाफ़ युद्ध लड़ना कितना संघातिक तनाव लिए होता है, हम सब यह जानते हैं।

तो क्या अब हम एक अघोषित युद्ध की ओर बढ रहे हैं? आखिर अन्ना और उन की टीम जो कह रही है, जनता उस को सुन रही है, गुन रही है। दस दिन से दिन रात एक किए हुई है और अपनी सरकार समय की दीवार पर लिखी इबारत को क्यों नहीं पढ पा रही है, इसे जानना कोई मुश्किल काम नहीं है। लोग अन्ना नाम की टोपी पहने घूमने लगे हैं। अभी एक दिन एक लतीफ़ा चला कि आज सुबह मनमोहन सिंह भी एक टोपी लगाए घूमते पाए गए। इस टोपी पर लिखा था मैं अंधा हूं। तो एक सच यह भी है कि मनमोहन सिंह नाम का यह प्रधानमंत्री इन दिनों धृतराष्ट्र में तब्दील है। नहीं, जो मनमोहन सिंह एक समय अमरीका से परमाणु समझौते खातिर वाम मोर्चे का समर्थन खो कर अपनी सरकार को दांव पर लगाने की हद तक चला गया था, वही मनमोहन सिंह अब लोकपाल पर सर्वदलीय समर्थन की टोपी लगा कर देश की जनता के साथ छ्ल की बिसात बिछा कर संसदीय मर्यादाओं की दुहाई देता घूम रहा है तो ज़रा नहीं पूरा अफ़सोस होता है।

अन्ना ने जब लोकपाल पर अप्रैल में जंतर मंतर पर अनशन किया था तब तो इसी मनमोहन सरकार ने संवेदनशीलता का परिचय देते हुए रातोरात अध्यादेश जारी कर दिया था। पर बाद के दिनों में यही सरकार शकुनि चाल के फंदे में लगातार अनेक लाक्षागृह निर्माण करने में युद्ध स्तर पर लग गई। कपिल सिब्बल, सुबोधकांत टाइप के अश्वमेधी अश्व भी छोड़े। और लोकपाल की बैठकों के बीच में ही अन्ना टीम अपने को छला हुआ महसूस करने लगी। इस छल को कांग्रेस ने छुपाया भी नहीं। असल में इस बीच एक और बिसात बिछ गई। यह बिसात भाजपा की थी। इस चाल में बहुत आहिस्ता से भाजपा ने कांग्रेस को महसूस करवाया कि सिविल सोसायटी को अगर इसी तरह सिर पर बिठाया गया तो संसद और संसदीय गरिमा और उस की शक्ति का, उस के विशेषाधिकार और उस की सर्वोच्चता का क्या होगा?

कांग्रेस इस फंदे में बहुत आसानी से आ गई। ठीक वैसे ही जैसे बहेलिए के जाल में कोई कबूतर या कोई चिड़िया आ जाय। यहां भाजपा ने जाल के नीचे संसद की अस्मिता का दाना डाल रखा था। कांग्रेस को यह दाना मुफ़ीद लगा। जाल नहीं देख पाई। और फिर धीरे-धीरे इस संसदीय अस्मिता के दाने की आस में देश की सभी राजनीतिक पार्टियां फंसती गईं। भाजपा का काम हो गया था। कांग्रेस अब जनता के सीधे निशाने पर थी। कांग्रेस को अपने छले जाने और भाजपा के जाल का एहसास तो हुआ पर अब तक बहुत देर हो चुकी थी।

अचानक रंगमंच पर महत्वोन्माद की बीमारी के मारे योग के मल्टीनेशनल व्यापारी रामदेव ने एंट्री ले ली। उन को लगा कि जैसे वह योग के नाम पर अपने अनुयायियों की आंख में धूल झोंक कर अपना व्यवसाय दिन दूना रात चौगुना कर गए हैं वैसे ही वह देश की बहुसंख्य जनता को भी फांस लेंगे। रामलीला मैदान में उन्हों ने अपनी दुकान सजा ली। रामलीला मैदान को जैसे शापिंग माल में कनवर्ट कर बैठे वह। मनमोहन सरकार इसी फ़िराक में थी। पहले रामदेव की पतंग को वह शिखर तक ले गई फिर लंबी ढील दी और अंतत: उन की ओर से बालकृष्ण की लिखी चिट्ठी सार्वजनिक कर उन की मिट्टी पलीद कर दी। बताया कि रामदेव भाजपा और आर.एस.एस. के इशारे पर काम कर रहे हैं। और आधी रात बिजली काट कर रामदेव की रही सही कसर भी निकाल दी।

रामदेव की पतंग काटने की बजाय उन के हाथ से चर्खी ही छीन ली। उन को औरतों की सलवार कमीज पहन कर भागना पडा। जिस को नहीं करना था उस ने भी कांग्रेस की थू-थू की। लेकिन कांग्रेस और उस के टामियों को लगा कि उन्हों ने न सिर्फ़ मैदान मार लिया बल्कि आने वाले दिनों में संभावित आंदोलनों का मंसूबा बांधने वालों के लिए एक बडी लक्ष्मण रेखा भी खींच दी है कि कोई अब हिम्मत भी नहीं कर पाएगा। चाहे पेट्रोल के दाम बढें या दूध के, जनता भी चूं नहीं करेगी। तो जब अन्ना ने १६ अगस्त से अनशन पर जाने की हुंकार भरी  तो कांग्रेस को लगा कि वह फ़ूंक मार कर चींटी की तरह उन्हें भी उडा देगी।

कोशिश यही की भी। पहले के दिनों में राजा जब लडाई लडते थे तो जब देखते थे कि वह हार जाएंगे या मारे जाएंगे तो अपने आगे एक गाय खडी कर लेते थे। उन की रक्षा हो जाती थी। गो हत्या के डर से अगला उस पर वार नहीं करता था। तो इन दिनों जब कांग्रेस या सो काल्ड सेक्यूलर ताकतों को जब कोई बचाव नहीं मिलता तो वह भाजपा और आरएसएस नाम की एक गाय सामने रख देते हैं कि अरे इस के पीछे तो भाजपा है, आर.एस.एस है।जैसे कभी हर गलती को छुपाने के लिए सी.आई.ए. का जाप करती थीं। सो बहुत सारे लोग इसी भाजपा, आर.एस.एस. परहेज में उस प्रकरण से अपने को अलग कर लेते हैं।

कांग्रेस या सो काल्ड सेक्यूलर लोगों का आधा काम यों ही आसान हो जाता है। रामदेव और अन्ना हजारे के साथ भी कांग्रेस ने यही नुस्खा आजमाया। रामदेव तो दुकानदार थे पिट कर चले गए। उन को पहले कोई यह बताने वाला नहीं था कि दुकानदारी और आंदोलन दोनों दो चीज़ें हैं। पर वृंदा करात वाले मामले में वह कुछ चैनलों और मीडिया को पेड न्यूज की हवा में अरेंज कर मैनेज कर ‘हीरो’ बन गए थे तो उन का दिमाग खराब हो गया था, महत्वाकांक्षाएं पेंग मारने लगी थीं। लेकिन झूला उलट गया। होश ठिकाने आ गए हैं अब उन के। और जो अब वह कभी-कभी इधर-उधर बंदरों की तरह उछल-कूद करते दिख जाते हैं तो सिर्फ़ इस लिए कि मह्त्वोन्माद की बीमारी का उन के अभी ठीक से इलाज होना बाकी है अभी। और यह औषधि उन्हें कोई आयुर्वेदाचार्य ही देगा यह भी तय है। एलोपैथी के वश के वह हैं नहीं।

खैर कांग्रेस और उस के टामियों ने तमाम भूलों में एक बड़ी भूल यह की कि अन्ना को भी उन्होंने रामदेव का बगलगीर मान लिया। और टूट पड़े सारा राशन-पानी ले कर। नहा-धो कर। अन्ना की चिट्ठी का जवाब भी जो कहते हैं कि ईंट का जवाब पत्थर की तर्ज़ में राजनीतिक भाषा और संसदीय मर्यादा से पैदल प्रवक्ता मनीष तिवारी से दिलवाया। बिल्कुल बैशाखनंदनी व्याख्या में ‘तुम अन्ना हजारे!’ की शब्दावली में। गोया अन्ना, अन्ना नहीं दाउद के हमराह हों! अब की बार पहला तारा यहीं टूटा। हाय गजब कहीं तारा टूटा के अंदाज़ में। दूसरे दिन सरकार ने धृतराष्ट्र के अंदाज में अन्ना को गिरफ़्तार कर लिया।

और फिर आए कैम्ब्रिज, आक्सफ़ोर्ड के पढे लिखे चिदंबरम, कपिल सिब्बल और अंबिका सोनी जैसे लोग। सरलता का जटिल मुखौटा लगाए। फिर यह वकील टाइप नेता मंत्री लोग जैसे कचहरी के दांव-पेंच में मुकदमे निपटाते, उलझाते हैं, उसी दांव-पेंच को अन्ना के साथ भी आज़माने लगे। पर अन्ना ठहरे मजे हुए सत्याग्रही।उन के आगे इन वकीलों की दांव पेंच खैर क्या चलती? तो भी वह चलाते तो रहे ही। क्या तो जो भी कुछ हुआ, किया दिल्ली पुलिस ने और कि वही जाने। कहां हैं अन्ना? सवाल का जवाब भी गृहमंत्री ने इस अंदाज़ में दिया गोया वह गृहमंत्री नहीं कोई मामूली प्रवक्ता हो। और बताया कि यह भी उन्हें नहीं मालूम। कपिल सिब्बल ने फिर आर. एस.एस. और भाजपा की टेर लगाई।

पर जब शाम तक तक लोग तिहाड पहुंचने लगे तो देश की जनता समझ गई। यह बात चिल्ला चिल्ला कर एक ही खबर दिन रात दिखाने वाले चैनल समझ गए पर सरकार नहीं समझी।पर दूसरे दिन जब बाकायदा तिहाड ही धरनास्थल हो गया तो हफ़्ते भर का रिमांड भूल सरकार ने रिहा कर दिया अन्ना को। अब अन्ना ने सरकार को गिरफ़्तार किया। ऐसा खबरिया चैनलों ने चिल्ला चिल्ला कर कहा भी। अन्ना ने कहा कि बिना शर्त रिहा होंगे। और फिर ्सरकार को घुटने टिकवाते हुए जेल से बाहर निकले। भरी बरसात मे बरास्ता गांधी समाधि रामलीला मैदान। अपनी दौड से सब को चकित करते हुए। अब देश की जनता थी और अन्ना थे। रामलीला मैदान ही नहीं देश भर में मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना और वंदे मातरम की गूंज में नहाया हुआ।

अब शुरू हुआ देश के बुद्धिजीवियों का खोखलापन। अरुंधती राय से लगायत अरुणा राय तक खम ठोंक कर अन्ना का मजाक उडाती हुई खडी हो गईं। और यह देखिए सारे दलित चिंतक एक सुर में गाने लगे कि यह तो अपर कास्ट का आंदोलन है। और कि संविधान विरोधी भी। बैकवर्ड चिंतकों ने भी राग में राग मिलाया और बताया कि इस आंदोलन में तो वही वर्ग शामिल है जो आरक्षण के विरोध में झाडू लगा रहा था, पालिस लगा रहा था। यह भी संविधान विरोधी की तान बताने लगे।

[तो क्या यह दलित और पिछड़े इस अन्ना की आंधी से इस कदर डर गए हैं कि उन को लगने लगा है कि आरक्षण की जो मलाई वह काट रहे हैं संविधान में वर्णित मियाद बीत जाने के बाद भी राजनीतिक तुष्टीकरण की आंच में, एक्स्टेंशन दर एक्स्टेंशन पा कर, कभी उस पर भी हल्ला बोल सकती है यह अन्ना की जनता? सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सरकार से इस पर जवाब मांगा भी है।]

खैर, सरकार अपने मनमोहनी राग में धृतराष्ट्र की राह चलती भैंस की तरह पगुराती रही। भाजपा ने तरकश से तीर निकाले जो दोमुहे थे। वह अन्ना आंदोलन का खुल कर समर्थन करती हुई जन लोकपाल से असहमति का दूध भी धीमी आंच पर गरमाती रही। कि चित्त भी मेरी और पट्ट भी मेरी।कांग्रेस ने अन्ना को बढते जनसमर्थन को देखते हुए एक दिन राग दरबारी गाना छोड़ कर राग अन्ना गाने का रियाज़ किया। भाजपा ने उसे फिर से संसदीय परंपरा और और संसद की सर्वोच्चता की अफ़ीम सुंघाई।

सरकार फिर रुआब और संसद की सर्वोच्चता के नशे में झूम गई है। और सारी राजनीतिक पार्टियां अब एक ही राग में न्यस्त होकर यह साबित करने में लग गई हैं गोया अन्ना देश के लिए खास कर संसद के लिए, संसदीय जनतंत्र के लिए भारी बोझ बन गए हैं। सभी कमोबेश यह साबित करने में लग गए हैं कि अन्ना तो बहुत अच्छे आदमी हैं पर उन की मांगें और जनलोकपाल की उन की जिद देश को डुबो देगी। अन्ना उन्हें लुटेरा बताते हुए काला अंगरेज बता रहे हैं। वह तो कह रहे हैं कि प्रशंसा में भी धोखा होता है। पर सरकार है कि उन्हें गिव एंड टेक का रुल समझाते हुए ऐसे पेश आ रही हो गोया सरकार एंपलायर हो और अन्ना उस के कर्मचारी। कि आओ इतना नहीं, इतना परसेंट बोनस ले लो और छुट्टी करो।

याद कीजिए ऐसे ही दबावों, समझौतों और प्रलोभनों में पिसते-पिसते देश से ट्रेड यूनियनों का कोई नामलेवा नहीं रह गया। यही हाल जनांदोलनों का भी हुआ है। अब ज़माने बाद कोई जनान्दोलन आंख खोल कर हमारे सामने उपस्थित है तो इसे अपर कास्ट और संविधान विरोधी या संसदीय सर्वोच्चता से जोड़ कर इसे कुंद नहीं कीजिए। समय की दीवार पर लिखी इबारत को पढिए। कि यह सिर्फ़ अन्ना की ज़िद नहीं है, महंगाई और भ्रष्टाचार की चक्की में पिसती जनता की चीत्कार है। यह हुंकार में बदले और आंदोलन हिंसा की तरफ मुड़े उस से पहले जनता की रिरियाहट भरी पुकार को सुनना ज़रूरी है, बेहद ज़रूरी। नहीं तो समूचा देश कहीं नक्सलवाणी या दंतेवाला में तब्दील हुआ तो उसे संभालना बहुत कठिन हो जाएगा। सारी संसदीय सर्वोच्चता बंगाल की खाड़ी में गोताखोरों के ढूंढने पर भी नहीं मिलेगी। बिला जाएगी।

संसद को संसद ही रहने दीजिए। जनता के माथे पर उसे बोझ बना कर बाप मत बनिए। उस पर आग मत मूतिए। रही बात भाजपा की तो उस को देख कर कभी जानी लीवर द्वारा सुनाया एक लतीफ़ा याद आता है। कि एक सज्जन थे जो अपने पड़ोसी रामलाल को सबक सिखाना चाहते थे। इस के लिए उन्हों ने अपने एक मित्र से संपर्क साधा और कहा कि कोई ऐसी औरत बताओ जिस को एड्स हो। उस के साथ मैं सोना चाहता हूं। मित्र ने कहा कि इस से तो तुम्हें भी एड्स हो जाएगा। जनाब बोले यही तो मैं चाहता हूं। मित्र ने पूछा ऐसा क्यों भाई? जनाब बोले कि मुझे अपने पड़ोसी रामलाल को सबक सिखाना है।

मित्र ने पूछा कि इस तरह रामलाल को कैसे सबक सिखाओगे भला? जनाब बोले- देखो इस औरत के साथ मैं सो जाऊंगा तो मुझे एड्स हो जाएगा। फिर मैं अपनी बीवी के साथ सोऊंगा तो बीवी को एड्स हो जाएगा। मेरी बीवी मेरे बड़े भाई के साथ सोएगी तो बड़े भाई को एड्स हो जाएगा। फिर बड़ा भाई से भाभी को होगा और भाभी मेरे पिता जी के साथ सोएगी तो पिता जी को एड्स हो जाएगा। फिर मेरी मां को भी एड्स हो जाएगा। और जब पड़ोसी रामलाल मेरी मां के साथ सोएगा तो उस को भी एड्स हो जाएगा। तब उस को सबक मिलेगा कि मेरी मां के साथ सोने का क्या मतलब होता है!

तो अपनी यह भाजपा भी सत्ता में आने के लिए कांग्रेस को सबक सिखाना चाहती है हर हाल में। देश की कीमत पर भी। चाहे संसद मटियामेट हो जाए पर उस की सर्वोच्चता कायम रहनी चाहिए। भले काजू बादाम के दाम दाल बिके, पेट्रोल के दाम हर दो महीने बढते रहें, दूध के दाम और तमाम चीज़ों के दाम आसमान छुएं। इस सब से उसे कोई सरोकार नहीं। भले विपक्ष का काम अन्ना हजारे जैसे लोग करें इस से भी उसे कोई सरोकार नहीं। उसे तो बस कांग्रेस को सबक सिखाना है। रही बात कांग्रेस की तो उन के पास तो एक प्रधानमंत्री है ही, मैं अंधा हूं, की टोपी लगा कर घूमने वाला! जो देश की जनता को आलू प्याज भी नहीं समझता है। उसे बस देश के उद्योगपतियों और बेइमानों की तरक्की और जीडीपी की भाषा समझ में आती है।

श्रीकांत वर्मा की एक कविता मगध की याद आती है। उन्हों ने लिखा है कि, ‘मगध में विचारों की बहुत कमी है।’ सचमुच हमारा समूचा देश अब मगध में तब्दील है! यह देश का विचारहीन मगध में तब्दील होना बहुत खतरनाक है। और जब जनता की आवाज़ चुनी ही सरकार और चुने हुए लोग ही न सुनें तो फिर मुक्तिबोध जैसे कवि लिखने लगते हैं: ‘कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई !’ क्या यही देखना अब बाकी है?

लेखक दयानंद पांडेय जाने माने साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं. लखनऊ में निवास कर रहे दयानंद से संपर्क dayanand.pandey@yahoo.com, 09335233424 और 09415130127 के जरिए किया जा सकता है. उनके लिखे पिछले दो आलेख नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं.

महिला लेखन यानी भूख की मारी चिड़िया

अमिताभ बच्चन की सफलता और विनम्रता की मार्केटिंग

अमृतलाल नागर : हम फ़िदाए लखनऊ, लखनऊ हम पे फ़िदा!

मौकापरस्ती, धोखा और बेशर्मी जैसे शब्द भी राजीव शुक्ला से शर्मा जाएंगे

महिला लेखन यानी भूख की मारी चिड़िया

महिला लेखन की बिसात और ज़मीन अब बदल गई है। शर्म, संकोच और शराफ़त की जगह अब शरारत, शातिरपन और शोखी अपनी जगह बना रही है। जैसे समाज और व्यवहार बदल रहा है, औरत बदल रही है, वैसे ही महिला लेखन भी। खुलापन का आकाश और बोल्ड होने की अकुलाहट की इबारत महिला लेखन की नई बिसात और चाहत में तब्दील है। ‘आंचल में है दूध और आंखों में पानी’ की तसवीर अब बिलकुल उलट है।

यह तासीर, यह तसवीर अपने नए तेवर में उपस्थित है। उत्तर प्रदेश की लेखिकाएं भी बदलाव की इस लपट से लापता नहीं हैं, अछूती नहीं है। लिखती थीं कभी इलाहाबाद में बैठ कर महादेवी वर्मा कि, ‘मैं नीर भरी दुख की बदली / उमड़ी कल थी मिट आज चली।’ पर उसी इलाहाबाद में महादेवी के जीते जी ममता कालिया लिखने लग गई थीं कि , ‘प्यार शब्द घिसटते-घिसटते अब चपटा हो गया है/ अब हमें सहवास चाहिए।’ उसी इलाहाबाद में नासिरा शर्मा कहानियों में बोल्डनेस बोने लग गई थीं। सुभद्रा कुमारी चौहान लिखती थीं, ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी !’

पर गोरखपुर से कात्यायनी लिखने लगीं, ‘हे भगवान मुझे एक औरत दो पाप करने के लिए।’ तो बुंदेलखंड की धरती की गंध में ऊभ-चूभ कहानियां लिखने वाली मैत्रेयी पुष्पा बोल्ड लेखन के नए मानक और बुनावट बीन कर एक नई चादर बिछा रही हैं इन दिनों। लगभग विद्रोह की एक नई आंच परोसती मैत्रेयी अब भले नोएडा और दिल्ली की सीमा में बसती हैं पर उन के लेखन का भूगोल अब नारी मुक्ति का नया व्याकरण गढने में मशगूल है, एक नई ज़मीन और एक नई परिधि के साथ उपस्थित है। पुरुष सत्ता को न सिर्फ़ चुनौती देता बल्कि एक हद तक उसे मटियामेट करता।

मैत्रेयी के कथाजगत में समाई स्त्रियां पुरुष सत्ता को न सिर्फ़ चुनौती दे रही हैं बल्कि उन से अपनी गुलामी की जंजीर को तुडाती हुई आइने में उन की तसवीर भी दिखाती हैं और उन की हैसियत भी। उन के ‘इदन्नम’  और अन्य उपन्यासों में ऐसे व्यौरे अनायास मिलते चलते हैं। उन की आत्मकथा में भी बोल्डनेस की जैसे पराकाष्ठा है। ममता कालिया का कथा संसार हालां कि उन की कविताओं की तरह ‘बोल्ड’  नहीं है पर चेतना से लैस है। ममता का उपन्यास ‘दौड’ करियर के दांव-पेंच में उलझे युवाओं की ऐसी दास्तान है जो अविरल है।

करियर की दुरभिसंधि में नष्ट और पस्त होती युवा पीढी की जो आंच ममता कालिया परोसती हैं वह दिल दहलाने वाली है। बेघर से अपनी पहचान बनाने वाली ममता इतने शहरों में रही है कि उन्हें किसी एक शहर में बांधना दुश्वार है। दुक्खम-सुक्खम उन का नया पडाव है। और अब वह भले दिल्ली में रहने लगी हैं पर दिल उन का इलाहाबाद में ही धडकता है। इलाहाबाद एक समय हिंदी लेखकों का गढ हुआ करता था।

छायावाद की त्रयी पंत, निराला, महादेवी की त्रयी आज भी याद की जाती है। पर जो महादेवी वर्मा की गरिमा थी, जो ओज और अवदान था आज भी कोई लेखिका उसे छूना तो दूर आस पास भी नहीं फटक पाई है। तब जब कि महादेवी के पास कोई सवा सौ गीत ही हैं। कुछ रेखा-चित्र, निबंध और लेख हैं। स्त्री विमर्श पर, स्त्री स्वाभिमान पर उन का संग्रह ‘श्रृंखला की कडियां’ का आज भी कोई जोड नहीं है। सुनते हैं कि एक महादेवी की उपस्थिति भर से पूरा महौल अनुशासित हो जाता था। एक वाकया सुनिए।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का। मंच पर महादेवी थीं और फ़िराक गोरखपुरी भी। फ़िराक साहब ने किसी बात पर हिंदी को ले कर महादेवी पर कोई अभद्र टिप्पणी कर दी। बस क्या था कि गीतकार उमाकांत मालवीय ने लपक कर फ़िराक साहब का गिरेबान पकड लिया और कैलाश गौतम ने फ़िराक साहब की टांगें। किसी तरह मामला दहरम बहरम हुआ। लेकिन फ़िराक साहब के पक्ष में कोई एक नहीं खडा हुआ। याद आता है अभी बीते बरस नया ग्यानोदय को दिए एक इंटरव्यू में विभूति नारायन राय ने कुछ  लेखिकाओं की आत्मकथा में वर्णित देह संबंधों के मद्देनज़र उन्हें छिनाल कह दिया।

मैत्रेयी पुष्पा समेत बहुतेरी लेखिकाएं और लेखक उन पर पूरा राशन पानी ले कर टूट पडीं । विभूति को अंतत: ‘औपचारिक’ माफ़ी मांगनी पडी। पर उन का वह विरोध लेखिकाएं उस तरह नहीं कर पाईं जिस तरह करना चाहिए था। उलटे पुरुषों की बैसाखी पर टिकी बहुतेरी लेखिकाओं ने तो विभूति के पक्ष में बयान भी दिए। या फिर चुप रहीं। तो शायद इस लिए भी कि एक तो ज़्यादातर लेखिकाएं उन से उपकृत थीं । इस लिए भी कि लेखिकाओं ने महादेवी जैसी गरिमा भी नहीं अर्जित की है। न लेखन में, न व्यवहार में, न जीवन में।

चंद्रकिरन सोनरिक्सा एक ऐसी ही लेखिका हैं जिन्हों ने लेखन और व्यवहार दोनों में गरिमा अर्जित की। खास कर जीवन के अंतिम पडाव में आई उन की आत्मकथा ‘पिंजरे की मैना’ ने जो तहलका मचाया अपनी साफगोई, ईमानदारी और बेबाकी के लिए उस का कोई जोड है नहीं। उन का जीवन संघर्ष जो छन कर आया है वह अप्रतिम है। आकाशवाणी लखनऊ की नौकरी और उन के पी सी एस पति की लंपटई और निकम्मई, इंदिरा गांधी से उनका बेबाकी से मिलना, उन का बच्चन जी से शादी होते-होते रह जाना आदि इस विकलता से उपस्थित होता है कि लगता है हम कोई सिनेमा देख रहे हों। उन की कहानियों में भी यही तत्व बार बार उपस्थित होता है।

सुमित्रा कुमारी सिनहा और रमा सिंह जैसी कवियत्रियां भी लखनऊ में रही हैं तो कई-कई बार मिनिस्टर रहीं स्वरूप कुमारी बख्शी भी अभी 93 वर्ष की उम्र में भी साहित्यक जगत में अपनी सक्रियता बनाए हुई हैं। ‘देह छीन ली तुम ने मेरी मन कैसे ले पाओगे’ जैसी कविताएं लिखने वाली अनीता श्रीवास्तव भी हैं। उषा सक्सेना जैसी लेखिकाएं अपने चौथेपन में भी खूब सक्रिय हैं। अनीता गोपेश, आशा उपाध्याय, सुमन राजे, दया दीक्षित भी सक्रिय हैं। दरअसल् लेखिकाओं में संभावना बहुत है पर रास्ता कठिन है। और ज़्यादातर लेखिकाओं में शार्टकट की बीमारी बहुत है।

वह सब कुछ एक साथ और तुरंत ही साध लेना चाहती हैं, हर कीमत पर। पुरुषों को चुनौती भी देती हुई और उन से अपेक्षा भी रखती हुई। वैसे ही जैसे मुट्ठी भी बंधी रहे, हाथ भी उठा रहे और कांख भी छुपी रहे। शायद इसी लिए सब कुछ के बावजूद, सब कुछ बदलने और सब कुछ उलट-पुलट के बावजूद महिला लेखन अपने नए मुकाम पर पहुंचने से निरंतर चूक रहा है। कुछ महिला कहानीकार तो जैसे ज़िंदगी छलावे की जी रही हैं वैसी ही यूटोपिया में उलझी कहानियां भी लिख रही हैं। बिलकुल हवा-हवाई कहानियां। हकीकत का कहीं कोई ओर-छोर नहीं, कोई वास्ता नहीं। वह तो बस लिखे जा रही हैं। और छ्पती भी जा रही हैं, महिला कार्ड खेल कर। और उन की झूठी वाह-वाह करने को पुरुष संपादकों-आलोचकों की एक फ़ौज बैठी हुई है लार टपकाती हुई।

महिला लेखन की एक बडी त्रासदी यह भी है कि आलोचना और संपादन में उन का प्रतिनिधित्व या तो शून्य है या फिर वह पिछ्लग्गू बन कर खडी हैं।दूसरे, अगर कोई कुछ साफ-साफ कह दे कि यह तो ऐसे नहीं ऐसे तो यह लेखिकाएं सीधे दिल पर ले लेती हैं। और कहने वाले के खिलाफ लगभग मोर्चा खोल देती हैं। खुद आलोचक नहीं हो पाईं तो क्या आलोचना भी उन्हें हरगिज़ बर्दाशत नहीं है। हंस, अगस्त,२०११ अंक में अभी छ्पी किरन सिंह की कहानी ‘कथा सावित्री सत्यवान की’ पढ लीजिए। बात समझ में आ जाएगी।

बताइए कि हिंदी में ऐसा कोई एक लेखक भी अगर हो कि किसी महिला की चिट्ठी को आधार बना कर लिखी कहानी का मुआवजा छ लाख रुपए दे दे? पर किरन सिंह की सावित्री अपने बीमार पति के इलाज के लिए ऐसा ही लेखक ढूंढ लेती है। एक प्रकाशक भी है इस सावित्री के पास जो उस के उत्तरी गोलार्ध या दक्षिणी गोलार्ध दबाने और भोगने के लिए नित नए और मंहगे गिफ़्ट भेंटता रहता है। इतना ही नहीं इस सावित्री की इंतिहा तो देखिए कि छ लाख पाने के बाद उस से उस का पति कहता है कि, ‘साल भर का तो तुम ने इंतज़ाम कर दिया। उस के बाद…?’  सत्यवान की सावित्री अपने पूरे गुमान और रौ में कहती है, ‘उस के बाद मैं कोई और ज़िंदगी लिखूंगी, कही और से, किसी और को, अगली कहानी के लिए।’;

महिला और महिला लेखन पर  साफ-साफ आकलन रखना ही हो तो बिना किसी का नाम लिए बगैर गोरखपुर की एक समर्थ कवियत्री रंजना जायसवाल की एक कविता पर गौर करें: ‘बहेलिया/ प्रसन्न है/उस ने अन्न के ऊपर/ जाल बिछा दिया है/ भूख की मारी/ चिडिया/ उतरेगी/ ही।’और इसी चिडिया श्रूंखला की दूसरी कविता देखें, ‘चिडिया/ उदास है/उसे सुबह अच्छी लगती है/ पर देख रही है वह/ धरती के किसी भी छोर पर/ नहीं हो रही है/ सुबह।’

महिला और महिला लेखन का पूरा वर्तमान परिदृष्य दरअसल यही और यही है कुछ और नहीं। महादेवी वर्मा की गरिमा, विद्वता और साधना अभी तो बिसर ही गई है महिला लेखन के हिस्से से। अभी और बिलकुल अभी सभी कुछ पा लेने की छटपटाहट में सनी पडी यश:प्रार्थी बनी बहुतेरी लेखिकाओं की लंबी कतार है। उन के लेखन की धरती के किसी भी छोर पर सुबह नहीं हो रही तो उन की बला से ! उन का सूर्योदय तो हो गया है न ! यह लंबी कतार इसी में खुश है। आमीन!

वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय का लिखा यह आलेख संडे इंडियन में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

अमृतलाल नागर : हम फ़िदाए लखनऊ, लखनऊ हम पे फ़िदा!

: अमृतलाल नागर जयंती पर विशेष : कहना बहुत कठिन है कि अमृतलाल नागर का दिल लखनऊ में धड़कता था कि लखनऊ के दिल में अमृतलाल नागर धड़कते थे। ‘हम फ़िदाए लखनऊ, लखनऊ हम पे फ़िदा’ की इबारत दरअसल नागर जी पर ऐसे चस्पा होती है गोया लखनऊ और नागर जी दोनों एक दूसरे के लिए ही बने हों। हिंदी ही क्या समूचे विश्व साहित्य में कोई एक लेखक मुझे ऐसा नहीं मिला जिस की सभी रचनाओं में सिर्फ़ एक ही शहर धड़कता हो…

….एक ही शहर की कहानी होती हो फिर भी वह कहानी सब को ही अपनी ही कहानी लगती हो और कि पूरी दुनिया में छा जाती हो। लिखने को लखनऊ को अपनी रचनाओं में बहुतेरे लेखकों ने रचा है प्रेमचंद से ले कर श्रीलाल शुक्ल, कामतानाथ तक ने। मैं ने खुद भी। पर जैसा नागर जी ने रचा है, वैसा तो न भूतो, न भविष्यति। और उस लखनऊ में भी चौक। चौक ही उन की कहानियों में खदबदाता रहता है ऐसे जैसे किसी पतीली में कोई भोज्य पदार्थ। आते तो वह बनारसी बाग और सिकंदर बाग तक हैं पर लौट-लौट जाते हैं चौक। जैसे करवट में वह जाते तो कोलकाता भी हैं पर बताते लखनऊ और चौक ही हैं। यहीं की यादें हैं। खत्री परिवार की तीन पीढियों की इस कथा में जो बदलाव के कोलाहल का कोलाज वह रचते हैं वह अप्रतिम है। उस अंगरेज मेम के यूज एंड थ्रो की जो इबारत एक अविरल देहगंध की दाहकता और रंगीनी के रंग में रंगते और बांचते हैं, जिस शालीनता और संकेतों की मद्धिम आंच में उसे पगाते हैं, वह देहयात्रा अविस्मरणीय बन जाती है।

गोमती से बरास्ता गंगा नाव यात्रा से कोलकाता पहुंचने के बीच उस नौजवान खत्री के साथ रंगरेलियां मनाती रेजीडेंसी में तैनात किसी बडे़ अंगरेज अफ़सर की वह अंगरेज मैम कोलकाता पहुंच कर कैसे तो उसे न सिर्फ़ पहचानने से कतराती है बल्कि तिरस्कृत भी करती है तो नौकरी की आस में आया यह नौजवान कैसे तो टूट जाता है। फिर वह लखनऊ की यादों और संपर्कों की थाह लेता है। बूंद और समुद्र नागर जी का महाकाव्यात्मक उपन्यास है। पर समूची कथा लखनऊ के चौक में ही चाक-चौबस्त है। बूंद और समुद्र की ताई विलक्षण चरित्र है। ताई के बडे अंधविश्वास हैं। बहुत कठोर दिखने वाली ताई बाद में पता चलता है कि भीतर से बहुत कोमल, बहुत आर्द्र हैं। वनकन्या, नंदो, सज्जन, शीला, महिपाल, कर्नल आदि तमाम पात्र बूंद और समुद्र में हमारे सामने ऐसे उपस्थित होते हैं गोया हम उन्हें पढ़ नहीं रहे हों, साक्षात देख रहे हों। बिल्कुल किसी सिनेमा की तरह।

फ़िल्म, रेडियो और फ़िल्मी गानों से तर-बतर मिसेज वर्मा का चरित्र भी तब के दिनों में रचना नागर जी के ही बूते की बात थी। मिसेज वर्मा न सिर्फ़ फ़िल्मों और फ़िल्मी गानों से प्रभावित हैं बल्कि असल ज़िंदगी में भी वह उसे आज़माती चलती हैं। शादी करना और उसे तोड़ कर फिर नई शादी करना और बार-बार इसे दुहराना मिसेज वर्मा का जीवन बन जाता है। कोई बूंद कैसे तो किसी समुद्र में तूफ़ान मचा सकती है यह बूंद और समुद्र पढ़ कर ही जाना जा सकता है। पांच दशक से भी अधिक पुराना यह उपन्यास लखनऊ के जीवन में उतना ही प्रासंगिक है

अमृतलाल नागर
जितना अपने छपने के समय था। अमृत और विष वस्तुत: एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास है। अरविंद शंकर इस उपन्यास में लेखक पात्र है। लखनऊ के अभिजात्य वर्ग की बहुतेरी बातें इस उपन्यास में छ्न कर आती हैं।

नागर जी कोई भी उपन्यास अमूमन बोल कर ही लिखवाते थे। उन का उपन्यास लिखते-लिखते जाने कितने लोग लेखक संपादक हो गए। मुद्राराक्षस उन्हीं में से एक हैं। अवध नारायन मुदगल जो बाद में सारिका के संपादक हुए। ऐसे और भी बहुतेरे लोग हैं। बूंद और समुद्र तो उन्हों ने अपने बच्चों को ही बोल कर लिखवाया। इस की लंबी दास्तान नागर जी के छोटे पुत्र शरद नागर ने बयान की है। कि कैसे रात के तीसरे पहर जब यह उपन्यास लिखना खत्म हुआ जो शरद नागर को ही बोल कर वह लिखवा रहे थे, तब घर भर को जगा कर यह खुशखबरी बांटी थी, नागर जी ने। बा को भी सोते से जगाया था और बताया था बिलकुल बच्चों की तरह कि आज बूंद और समुद्र पूरा हो गया।

नागर जी असल में फ़िल्मी कथा-पटकथा लिख चुके थे। सारा नरम गरम देख चुके थे। जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव देख चुके थे सो जब वह बोल कर लिखवाते थे तो ऐसे गोया वह दृश्य उन के सामने ही घटित हो रहा है बिलकुल किसी सिनेमा की तरह। नागर जी तो कई बार चिट्ठियां तक बोल कर लिखवाते थे। ऐसे ही उन की एक और आदत थी कि वह जब कोई उपन्यास लिखते थे तो उस को लिखने के पहले जिस विषय पर लिखना होता था उस विषय पर पूरी छानबीन, शोध करते थे। कई बार किसी अखबार के रिपोर्टर की तरह जांच-पडताल करते गोया उपन्यास नहीं कोई अखबारी रिपोर्ट लिखनी हो। नाच्यो बहुत गोपाल हो या खंजन नयन। उन्हों ने पूरी तैयारी के साथ ही लिखा।

सुहाग के नूपुर पौराणिक उपन्यास है जब कि शतरंज के मोहरे ऐतिहासिक। पर इन दोनों उपन्यासों को भी पूरी पड़ताल के बाद ही उन्हों ने लिखा। ये कोठे वालियां तो इंटरव्यू आधारित है ही। गदर के फूल लिखने के लिए भी वह जगह-जगह दौड़ते फिरे। मराठी किताब का एक अनुवाद भी उन्हों ने पूरे पन से किया था- आंखों देखा गदर। नागर जी ने आकाशवाणी लखनऊ में नौकरी भी की और बहुतेरे रेडियो नाटक भी लिखे। नाटकों में वैसे भी उन की गहरी दिलचस्पी थी। नागर जी ने इसी लखनऊ में कई छोटे-मोटे काम किए। मेफ़ेयर के पास डिस्पैचर तक के काम किए। बाद के दिनों में वह पूर्णकालिक लेखक हो गए। 1985 की बात है उन्हों ने एक बार बताया था कि राजपाल प्रकाशन वाले उन्हें हर महीने चार हज़ार रुपए देते हैं और साल के अंत में रायल्टी के हिसाब में एडजस्ट कर देते हैं।

तब के दिनों में नागर जी के कई उपन्यास विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में लगे पडे़ थे। वह चौक में तब शाह जी की हवेली में किराएदार थे। और सोचिए कि हिंदी का यह इतना बड़ा लेखक लखनऊ में या कहीं और भी अपना एक घर नहीं बना सका। किराए के घरों में ही ज़िंदगी बसर कर ली। उन को पद्म भूषण भी मिला ज़रुर था पर अंतिम समय में उन के इलाज के लिए इसी मेडिकल कालेज में सिफ़ारिशें लगानी पड़ी थीं। और वह सिफ़ारिशें भी नाकाम रहीं थीं। तब जब कि नागर जी जन-जन के लेखक थे। उन के जाने के बाद लखनऊ क्या अब हिंदी जगत के पास भी कोई एक लेखक नहीं है जिसे देख कर लोग दूर से ही पहचान लें कि देखो वह हिंदी का लेखक जा रहा है। या किसी लेखक के घर का पता आप पूछें तो कोई आप को उस के घर तक पहुंचा भी आए। घर पहुंचाना तो दूर वह उस लेखक को ही न जानता हो। लेखक पाठक का वह जो रिश्ता था वह अब बिसर गया है। जनता लेखक से और लेखक जनता से कट चुका है। कह सकते हैं आप कि अब न रहे वे पीने वाले, अब न रही वो मधुशाला!

जापान में शेक्सपीयर को ले कर एक सर्वे हुआ था। एक जापानी से पूछा गया कि शेक्सपीयर यहां क्यों इतना लोकप्रिय हैं? तो उस जापानी का सीधा सा जवाब था – क्यों कि शेक्सपीयर जापानियों के बारे में बहुत अच्छा लिखते हैं। नागर जी के बारे में भी यह बात कही जा सकती है। क्यों कि नागर जी भी भले लखनऊ को ही अपनी कथावस्तु बनाते थे, पर वह कथा तो सभी शहरों की होती थी। उन से एक बार मैं ने पूछा था कि, ‘आप गांव के बारे में भी क्यों नहीं लिखते?’ वह बोले, ‘अरे मैं नागर हूं, गांव के बारे में मुझे क्या मालूम? फिर कैसे लिखूं?’ करवट में देह प्रसंगों को ले कर एक बार मैं ने उन से संकोचवश ज़िक्र किया और पूछा कि, ‘ यह दृश्य रचना कैसे संभव हुआ आप के लिए?’ पान कूंचते हुए वह मुस्‍कुराए और बोले, ‘क्या हम को एकदम बुढऊ समझते हो? अरे हमने भी दुनिया देखी है और तरह-तरह की? तुम लोग क्या देख-भोग पाओगे जो हमने देखी-भोगी है।’ कह कर वह फिर अर्थपूर्ण ढंग से मुस्‍कुराए।

वह अकसर सब के बारे में बहुत विनय और आदर भाव रखते थे पर पता नहीं क्यों जब कभी श्रीनारायण चतुर्वेदी की बात आती तो वह भड़क जाते। एक श्रीनारायण चतुर्वेदी और दूसरे महंगाई दोनों से वह बेतरह भड़कते। नागर जी से पहली बार मैं 1979 में मिला था। तब विद्यार्थी था। पिता जी के साथ दिल्ली घूमने जा रहा था। तब गोरखपुर से दिल्ली की सीधी ट्रेन नहीं हुआ करती थी। लखनऊ आ कर ट्रेन बदलनी होती थी। सुबह गोरखपुर से आया। रात को काशी विश्वनाथ पकड़नी थी। वेटिंग रूम में बैठे-बैठे मैं ने पिता जी से कहा कि मैं नागर जी से मिलने जाना चाहता हूं। पिता जी ने अनुमति दे दी। मैं स्टेशन से बाहर निकला। एक टेलीफ़ोन बूथ पर जा कर टेलीफ़ोन डायरेक्ट्री में नागर जी का नंबर ढूंढा। नंबर मिलाया। नागर जी ने खुद फ़ोन उठाया। उन से मिलने की इच्छा जताई और बताया कि गोरखपुर से आया हूं। स्टेशन से बोल रहा हूं। उन्हों ने स्टेशन से आने के लिए बस कहां मिलेगी बताया और कहा कि बस चौक चौराहे पर रुकेगी वहां उतर कर ऐसे-ऐसे चले आना मेरा घर मिल जाएगा। मैं चौक चौराहे पर उतर कर जब नागर जी के बारे में पूछने लगा तो हर कोई नागर जी का पता बताने लगा। जैसे होड़ सी लग गई। और अंतत: एक सज्जन नहीं माने मुझे ले कर नागर जी के घर पहुंचा आए।

दोपहर हो चली थी। नागर जी ऐसे ठठा कर मिले जैसे कितने जन्मों से मुझे जानते हों। अपने बैठके में बिठाया। हाल चाल पूछा। फिर पूछा कैसे आना हुआ। मैं उन से कहना चाहता था कि आप से मिलने आया हूं पर मुंह से निकला आप का इंटरव्यू करना चाहता हूं। वह अचकचाए,  ‘इंटरव्यू?’ फिर बोले,’ ठीक है। ले लो इंटरव्यू।’  मैं ने इंटरव्यू शुरु किया बचकाने सवालों के साथ। पर वह जवाब देते गए। थोड़ी देर बाद बोले, ‘बेटा थोड़ी जूठन गिरा लो फिर इंटरव्यू करो।’ मैं उन का जूठन गिराने का अभिप्राय समझा नहीं। तो वह बोले, ‘अरे दो कौर खा लो।’  असल में मैं खुद भूख से परेशान था। पेट में मरोड़ उठ रही थी। छूटते ही बोला, ‘हां-हां।’ शरद जी की पत्नी को नागर जी ने बुलाया और कहा कि कुछ जूठन गिराने का बंदोबस्त करो। वह जल्दी ही पराठा सब्जी बना कर ले आईं। खा कर उठा तो वह बोले, ‘दरअसल बेटा तुम्हारे चेहरे पर लिखी भूख मुझ से देखी नहीं जा रही थी।’  मैं झेंप गया।

इंटरव्यू ले कर जब चलने लगा तो वह बडे मनुहार से बोले, ‘ बेटा यह इंटरव्यू छपने भेजने के पहले मुझे भेज देना। फिर जब मैं वापस ठीक कर के भेजूं तब ही कहीं छपने भेजना। सवाल तो तब मेरे कच्चे थे ही लिखना भी कच्चा ही था। यह तब पता चला जब नागर जी ने वह इंटरव्यू संशोधित कर के भेजा। दंग रह गया था वह बदला हुआ इंटरव्यू देख कर। एक सुखद अनुभूति से भर गया था तब मैं। समूचे इंटरव्यू की रंगत बदल गई थी। अपने कच्चेपन की समझ भी आ गई थी। नागर जी द्वारा संशोधित वह इंटरव्यू आज भी मेरे पास धरोहर के तौर पर मौजूद है। और छपा हुआ भी। एक बार फिर उन से मिला लखनऊ आ कर। तब प्रेमचंद पर कुछ काम कर रहा था। संपादन मंडल में उन्हों ने न सिर्फ़ अपनी भागीदारी तय की, अपना लेख दिया बल्कि जैनेंद्र कुमार के लिए भी एक चिट्ठी बतौर सिफ़ारिश लिख कर दी। नागर जी की तरह जैनेंद्र जी को भी दिल्ली के दरियागंज में सब लोग जानते थे। नेता जी सुभाष मार्ग पर राजकमल प्रकाशन के पास ही उन के बारे में पूछा। वहां भी सब लोग जैनेंद्र जी के बारे में बताने को तैयार। एक आदमी वहां भी मिला जो जैनेंद्र जी के घर तक
मुझे पहुंचा आया।

जैनेंद्र जी बहुत कम बोलने वाले लोगों में थे। नागर जी की चिट्ठी दी तो मुस्‍कुराए। कहा कि जब यह चिट्ठी ले कर आए हैं तो ‘न’ करने का प्रश्न कहां से आता है?’ उन्हों ने भी सहमति दे दी संपादक मंडल के लिए। लिखने की बात आई तो वह बोले, ‘इतना लिख चुका हूं प्रेमचंद पर कि अब कुछ लिखने को बचा ही नहीं। बात कर के जो निकाल सकें, निकाल लें। लिख लें मेरे नाम से।’  खैर, नागर जी से चिट्ठी पत्री बराबर जारी रही। एक बार गोरखपुर वह गए। संगीत नाटक अकादमी के नाट्य समारोह का उद्घाटन करने। मुझे ढूंढते फिरे तो लोगों ने बताया। जा कर मिला। बहुत खुश हुए। बोले, ‘तुम मेरे शहर में मिलते हो आ कर तो मुझे लगा कि तुम्हारे शहर में मैं भी तुम से मिलूं।’ यह कह कर वह गदगद हो गए।

जब मेरा पहला उपन्यास दरकते दरवाजे छपा तब मैं दिल्ली रहने लगा था। 1983-84 की बात है। यह उपन्यास नागर जी को ही समर्पित किया था। उन्हें उपन्यास देने दिल्ली से लखनऊ आया। मिल कर दिया। वह बहुत खुश हुए। थोड़ी देर पन्ने पलटते रहे। मैं उन के सामने बैठा था। फिर अचानक उन्हों ने मेरी तरफ देखा और बोले, ‘इधर आओ!’ और इशारा कर के अपने बगल में बैठने को कहा। मैं संकोच में पड़ गया। फिर उन्हों ने लगभग आदेशात्मक स्वर में कहा, ‘यहां आओ!’ और जैसे जोड़ा, ‘यहां आ कर बैठो !’ मैं गया और लगभग सकुचाते हुए उन की बगल में बैठा। और यह देखिए आदेश देने वाले नागर जी अब बिलकुल बच्चे हो गए थे। मेरे कंधे से अपना कंधा मिलाते हुए लगभग रगड़ते हुए बोले, ‘अब मेरे बराबर हो गए हो !’ मैं ने कुछ न समझने का भाव चेहरे पर दिया तो वह बिलकुल बच्चों की तरह मुझे दुलारते हुए बोले. ‘अरे अब तुम भी उपन्यासकार हो गए हो ! तो मेरे बराबर ही तो हुए ना !’ कहते हुए वह हा-हा कर के हंसते हुए अपनी बाहों में भर लिए। आशीर्वादने लगे, ‘खूब अच्छा लिखो और यश कमाओ !’ आदि-आदि।

बाद के दिनों में मैं लखनऊ आ गया स्वतंत्र भारत में रिपोर्टर हो कर। तो जिस दिन कोई असाइनमेंट दिन में नहीं होता तो मैं भरी दुपहरिया नागर जी के पास पहुंच जाता। वह हमेशा ही धधा कर मिलते। ऐसे गोया कितने दिनों बाद मिले हों। भले ही एक दिन पहले ही उन से मिल कर गया होऊं। हालां कि कई बार शरद जी नाराज हो जाते। कहते यह उन के लिखने का समय होता है। तो कभी कहते आराम करने का समय होता है। एकाध बार तो वह दरवाजे से ही लौटाने के फेर में पड़ जाते तो भीतर से नागर जी लगभग आदेश देते, ‘ आने दो- आने दो।’ वह सब से ऐसे ही मिलते थे खुल कर। सहज मन से। सरल मन से बतियाते हुए। उन से मिल कर जाने क्यों मैं एक नई ऊर्जा से भर जाता था। हर बार उन से मिलना एक नया अनुभव बन जाता था। उन के पास बतियाने और बताने कि जाने कितनी बातें थीं। साहित्य,पुरातत्व,फ़िल्म, राजनीति, समाज, बलात्कार, मंहगाई। जाने क्या-क्या। और तो और जासूसी उपन्यास भी।

शाम को विजया उन की नियमित थी ही। विजया मतलब भांग। खुद बडे़ शौक से घोंटते। जो भी कोई पास होता उस से एक बार पूछ ज़रुर लेते। किसी के साथ ज़बरदस्ती नहीं करते। एक बार मुझे पीलिया हो गया। महीने भर की छुट्टी हो गई। कहीं नहीं गया। नागर जी के घर भी नहीं। उन की एक चिट्ठी स्वतंत्र भारत के पते से आई। लिखा था क्या उलाहना ही था कि बहुत दिनों से आए नहीं। फिर कुशल क्षेम पूछा था और लिखा था कि जल्दी आओ नहीं यह बूढ़ा खुद आएगा तुम से मिलने। अब मैं तो दफ़्तर जा भी नहीं रहा था। यह चिट्ठी विजयवीर सहाय जो रघुवीर सहाय के अनुज हैं उन के हाथ लगी। वह बिचारे चिट्ठी लिए भागे मेरे घर आए। बोले, ‘कहीं से उन को फ़ोन कर ही सूचित कर दीजिए नहीं नाहक परेशान होंगे।’ मेरे घर तब फ़ोन था नहीं। टेलीफ़ोन बूथ से फ़ोन कर उन्हें बताया तो उन्हों ने ढेर सारी हिदायतें कच्चा केला, गन्ना रस, पपीता वगैरह की दे डालीं।

उन दिनों वह करवट लिख रहे थे। बाद में बताने लगे कि, ‘उस में एक नए ज़माने का पत्रकार का भी चरित्र है जो तुम मुझे बैठे -बिठाए दे जाते हो इस लिए तुम्हारी तलब लगी रहती है।’ वास्तव में वह अपने चरित्रों को ले कर, उपन्यास में वर्णित घटनाओं को ले कर इतने सजग रहते थे, कोई चूक न हो जाए, कोई छेद न रह जाए के डर से ग्रस्त रहते थे कि पूछिए मत। करवट में ही एक प्रसंग में अंगरेजों के खिलाफ एक जुलूस का ज़िक्र है। पूरा वर्णन वह लिख तो गए पर गोमती के किस पुल से होते हुए आया वह जुलूस इस को ले कर उन्हें संशय हो गया। फिर उन्हें याद आया कि हरेकृष्ण अवस्थी भी उस जुलूस में थे। वही हरेकृष्ण अवस्थी जो विधान परिषद सदस्य रहे हैं और कि लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति भी। नागर जी ने वह पूरा अंश अवस्थी जी को एक चिट्ठी के साथ भेजा और अपना संशय बताया और लिखा कि इस में जो भी चूक हो उसे दुरुस्त करें। अवस्थी जी राजनीतिक व्यक्ति थे। जवाब देने में बहुत देर कर बैठे। पर जवाब दिया और जो भी चूक थी उसे बताया और देरी के लिए क्षमा मांगी।

नागर जी ने उन्हें जवाब में लिखा कि देरी तो बहुत हो गई पर चूंकि बिटिया अभी ससुराल नहीं गई है, घर पर ही है। इस लिए कोई देरी नहीं हुई है। पुल तो वही था जो नागर जी ने वर्णित किया था पर कुछ दूसरी डिटेल में हेर-फेर थी। जिसे अवस्थी जी ने ठीक करवा दिया। इस लिए भी कि अवस्थी जी ने इस जुलूस में खुद भी अंगरेजों की लाठियां खाई थीं। नागर जी रचना को बिटिया का ही दर्जा देते थे। बिटिया की ही तरह उस की साज-संभाल भी करते थे। और ससुराल मतलब प्रकाशक। नागर जी का एक उपन्यास है अग्निगर्भा। दहेज को ले कर लिखा गया यह उपन्यास अनूठा है। कथा लखनऊ की ही है। लेकिन इस की नायिका जिस तरह दहेज में पिसती हुई खम ठोंक कर दहेज और अपनी ससुराल के खिलाफ़ अचानक पूरी ताकत से खड़ी होती है वह काबिले गौर है। पर सोचिए कि अग्निगर्भा जैसा मारक और दाहक उपन्यास लिखने वाले नागर जी खुद व्यक्तिगत जीवन में दहेज से अभिशप्त रहे।

क्या हुआ कि उन दिनों उन्हें लगातार दो -तीन लखटकिया पुरस्कार मिल गए थे। व्यास सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान और बिहार सरकार का भी एक लखटकिया सम्मान। मैं ने उन से मारे खुशी के कहा कि चलिए अब जीवन कुछ आसान हो जाएगा। सुनते ही वह कुपित हो गए। बोले, ‘खाक आसान हो जाएगा?’ पोतियों की शादी करनी है। जहां जाते हैं लोग मुंह बड़ा कर लेते हैं कि आप के पास तो पैसा ही पैसा है। अग्निगर्भा के लेखक की यह बेचैनी और यातना मुझ से देखी नहीं गई। फिर मुझे उन का ही कहा याद आया। एक बार एक इंटरव्यू में उन से पूछा था कि, ‘क्या साहित्यकार भी टूटता है?’  तो नागर जी पान की गिलौरी मुंह में दाबे धीरे से बोले थे, ‘साहित्यकार भी आदमी है, टूटता भी होगा।’ उन का वह कहा और यह टूटना अब मैं देख रहा था। उन को बेतरह टूटते मैं ने एक बार फिर देखा जब बा नहीं रहीं थीं। बा मतलब उन की धर्मपत्नी। जिन को वह अक्सर बात बात में कहते, ‘बुढिया कहां गई? अभी आती होगी।’ वगैरह-वगैरह कहते रहते थे।

उसी बुढिया के न रहने पर इस बूढे को रोता देखना मेरे लिए दुखदाई हो गया था तब। तब मैं भी रो पड़ा था। करता भी क्या उन को अपने जीवन में मैं ने पहली बार फूट-फूट कर रोते देखा था। कोई 72-73 वर्ष की उम्र में वह रो रहे थे। तेरही के बाद एक दुपहरिया गया तो वह फिर फूट पडे। रोते-रोते अचानक बा के लिए वह गाने लगे, ‘तुम मेरे पास होते हो गोया जब कोई दूसरा नहीं होता।’  अदभुत था यह। पतियों के न रहने पर बिलखते-रोते तो मैं ने बहुतेरी औरतों को देखा था पर पत्नी के न रहने पर बिलखते रोते मैं पहली बार ही इस तरह किसी पुरुष को देख रहा था। यह पुरुष नागर जी थे। नागर जी ही लोक लाज तज कर इस तरह रो सकते थे। रोते-रोते कहने लगे- मेरा ज़्यादतर जीवन संघर्ष में बीता। बुढिया ने बच्चों को भले चने खिला कर सुला दिया पर कभी मुझ से कोई उलाहना नहीं दिया। न कभी किसी से कुछ कहने गई, न किसी के आगे हाथ पसारा। कह कर वह फिर उन की याद में रोने लगे।

मैं ने तब स्वतंत्र भारत में ही नागर जी की इस व्यथा को रेखांकित करते हुए एक भावांजलि लिखी। जो संडे को संपादकीय पेज पर छ्पी थी। बाद में यही भावांजलि नागर जी के एक इंटरव्यू के साथ कोलकोता से प्रकाशित रविवार में बाक्स बन कर छपी। अब शरद नागर फिर मुझ पर बेतरह नाराज। कहने लगे, ‘पहले आप ने स्वतंत्र भारत में यह सब लिखा तो वह उसे पढ़ कर रोते रहे। अब किसी तरह स्थिर हुए तो अब रविवार पढ़ – पढ़ कर रो रहे हैं। ऐसा क्यों कर रहे हैं आप? बंद कीजिए यह सब !’ मैं निरुत्तर था। और देखिए कि बा के जाने के बाद नागर जी सचमुच इस कदर टूट गए थे कि जल्दी ही खुद भी कूच कर गए। वह शायद पीढियां उपन्यास पूरा करने के लिए ही अपने को ढो रहे थे। 74 वर्ष की उम्र में उन का महाप्रयाण सब को तोड़ देने वाला था। उन के 75 वर्ष में अमृत महोत्सव की तैयारियां थीं। जैसे बा के जाने पर नागर जी कहते रहे थे कि, ‘ज़्यादा नहीं भगवान से बस यही मांगा था कि दो-तीन साल का साथ और दे देते !’ ठीक वैसे ही शरद नागर अब बिलख रहे थे कि बस अमृत महोत्सव मना लिए होते…..!’ खैर।

नागर जी जैसे लोग हम तो मानते हैं कि कभी मरते नहीं। वह तो अभी भी ज़िंदा हैं, अपने तमाम-तमाम पात्रों में। अपनी अप्रतिम और अनन्य रचनाओं में। इस लखनऊ के कण-कण में। लखनऊ के लोग अब उन्हें भले बिसार दें तो भी वह बिसरने वाले हैं नहीं। चौक में होली की जब भी बात चलती है, नागर जी मुझे लगता है हर होली जुलूस में खडे़ दीखते हैं अपनी पूरी चकल्लस के साथ। वहां के कवि सम्मेलनों का स्तर कितना भी क्यों न गिर जाए नागर जी की याद के बिना संपन्न होता नहीं। चौक में उन की हवेली को स्मारक का दर्जा भले न मिल पाया हो पर चौक के वाइस चांसलर तो वह आज भी हैं। हकीकत है यह। सोचिए कि एक बार जब उन्हें एक यूनिवर्सिटी का वाइस चांसलर बनाने का प्रस्ताव रखा गया तो उन्हों ने उस प्रस्ताव को ठुकराते हुए यही कहा था कि मैं अपनी चौक यूनिवर्सिटी का वाइस चांसलर ही ठीक हूं। क्या उस चौक में उन का दिल अब भी धडकता न होगा? उन के परिवार के लोग भी अब चौक छोड़ इंदिरा नगर, विकास नगर और मुंबई भले रहने लगे हैं पर उन के पात्र? वह तो अभी भी वही रहते हैं। बूंद और समुद्र की ताई को खोजने की ज़रूरत नहीं है न ही करवट के खत्री बंधुओं की न अग्निगर्भा के उस नायिका को, नाच्यो बहुत गोपाल की वह ब्राह्मणी भी अपने सारे दुख सुख संभाले मिल जाएगी आप को इसी लखनऊ के चौक में।

और जो सच कहिए तो मैं भी वही गाना चाहता हूं जो नागर जी बा के लिए कभी गा गए हैं, ‘तुम मेरे पास होते गोया जब कोई दूसरा नहीं होता !’ लेकिन यह तो हमारी या हम जैसे कुछ थोडे़ से लोगों की बात है। खामखयाली वाली। एक कड़वा सच यह है कि इस लखनऊ में लेखन की जो त्रिवेणी थी उस की अजस्र धारा में भीगे लोग अब कृतघ्न हो चले हैं। नागर जी की याद में यह शहर तभी जागता है जब उन के परिवारीजन उन की जयंती और पुण्‍य-तिथि पर कोई आयोजन करते हैं। यही हाल भगवती चरण वर्मा का भी है कि जब उन के परिवारीजन उन की जयंती व पुण्‍य-तिथि पर कोई आयोजन करते हैं तब शहर उन की याद में भी जाग लेता है। अब बचे यशपाल जी। उन के बेटे और बेटी में सुनते हैं कि उन की रायलटी को ले कर लंबा विवाद हो गया और फिर वह लोग देश से बाहर रहते हैं। उन की पत्नी प्रकाशवती पाल भी इलाज के लिए सरकारी मदद मांगते हुई सिधार गईं। सो यशपाल जी को उन की जयंती या पुण्‍य-तिथि पर कोई फूल माला भी नहीं नसीब होती इस शहर में कभी। तब जब कि वह सिर्फ़ लेखक ही नहीं क्रांतिकारी भी थे। और भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी के दल में।

दुर्गा भाभी के साथ प्रकाशवती पाल भी उस यात्रा में साझीदार थीं और राज़दार भी जिस में भगत सिंह को अंगरेज वेष-भूषा में ट्रेन से निकाल कर ले गई थीं। ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले/वतन पर मरने वालों का बस यही बाकी निशां होगा !’ शायद हम लोग झूठ ही गाते रहे हैं। नहीं अभी वर्ष 2003 में यशपाल और भगवती चरण वर्मा की जन्मशती थी। यह कब निकल गई लखनऊ ने या हिंदी जगत ने जाना क्या? अभी नागर जी की भी जन्मशती करीब है, कोई चार साल बाद। देखना होगा कि कौन सा बाकी निशां होगा! यह कौन सा झूठा सच है मेरे लखनऊ वालो, हिंदी वालो! आखिर कृतघ्नता की भी कोई हद होती है दोस्तो! एक फ़िल्मी गाने के सहारा ले कर ही जो कहूं तो ‘जो तुम पर मिटा हो उसे ना मिटाओ !’ सचमुच गुजरात से उन के पूर्वज भले आए थे यहां पर नागर जी तो लखनऊ पर मर मिटे। बात यहां तक आई कि एक समय वह तस्लीम लखनवी तक बन बैठे। तो मसला वही था कि हम फ़िदाए लखनऊ, लखनऊ हम पे फ़िदा! आखिर इस तस्लीम लखनवी की याद को लखनऊ भी तस्लीम [स्वीकार] कर ले तो आखिर हर्ज़ क्या है!

दयानंद
लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं.  उनका यह लेख राष्‍ट्रीय सहारा में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.  दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

अमिताभ बच्चन की सफलता और विनम्रता की मार्केटिंग

दयानंदअमिताभ बच्चन अब तो जब-तब लखनऊ आते रहते हैं। पर पहले ऐसा नहीं था। बहरहाल वह जब 1996 में एक बार लखनऊ आए थे तब मैं ने उन से एक लंबा इंटरव्यू लिया था। हिंदी फ़िल्मों में ऊट-पटांग ट्रीटमेंट पर जब बात की तो वह अपनी तरफ से कुछ कहने के बजाय हरिवंश राय बच्चन की शरण में चले गए।

बोले, ‘बाबू जी कहते हैं कि हिंदी फ़िल्में पोयटिक जस्टिस करती हैं।’ और भी बहुतेरी बातें अमिताभ ने बताईं। जिन सब का व्योरा दे पाना यहां मुमकिन नहीं है। हां पूरी बातचीत में उन की अतिशय विनम्रता ने मुझे बहुत चकित किया। क्यों कि बहुतेरे फ़िल्मी अभिनेताओं-अभिनेत्रियों,राजनितिज्ञों या और अन्य तमाम लोगों से मिलने बतियाने का मुझे मौका मिलता रहा है। दिलीप कुमार तक से दो बार मिला हूं। वह कलफ़ लगी उर्दू ही बोलते हैं या फिर अंगरेजी। और उन के मिलने-बतियाने में भी वह कलफ़ उतरती नहीं है। बल्कि और चढ़ जाती है। ज़्यादातर लोगों का मिजाज बहुत दिखावे वाला होता है। उपेक्षित भाव से मिलते हैं। कई बार अपमानित करने का भाव भी मिल जाता है। लेकिन भीतर से। बाहर से तो वह हंसते हुए ही मिलते हैं। पर पता तो चल ही जाता है। पर तब मैं ने पाया कि अमिताभ बच्चन इस से बिलकुल उलट हैं।

उन की अतिशय विनम्रता से जब मैं अफना गया तो उन से पूछ ही लिया इंटरव्यू खत्म होने के बाद कि,’यह जो आप की अतिशय विनम्रता है, वह ओढ़ी हुई है, अभिनय है या सचमुच ही आप इतने विनम्र हैं?’ यह सवाल सुन कर कोई भी भड़क सकता है। पर यह देखिए अमिताभ बच्चन बिलकुल नहीं भड़के। उलटे और विनम्र हो गए। हाथ जोड़ कर बोले, ‘अब आप जो समझ लें।’ यह कह कर मुसकुरा पडे़। बहुत बाद में जब कौन बनेगा करोड़पति आया तब भी सब के साथ उन की विनम्रता की वही भंगिमा, विनय की उसी भाषा से हम बार-बार परिचित होते रहे। तो क्या अमिताभ बच्चन तमाम अंतरविरोधों के बावजू्द इस लिए सफल हैं कि वह विनय की भाषा जानते हैं और कि अतिशय विनम्र हैं?

मित्रो, आप की क्या राय है? तब और जब उन के प्रबल प्रतिद्वंद्वी शत्रुघ्न सिन्‍हा को भी उन की नकल करते हुए भोजपुरी में उतरना पड़ता है। शत्रुघ्न सिन्‍हा भी पहले लखनऊ बहुत आते थे। तब वह भी यहां से चुनाव लड़ने का मन बना रहे थे। बावजूद इस के बतियाते वह तिरछा हो कर ही थे। पर अब तो वह भी विनम्रता का चोला ओढ़ चले हैं। हालां कि रस्सी भले जल गई हो पर अकड़ अभी गई नहीं है उन की। सारी विनम्रता उन की एक ‘खामोश’ में डूब जाती है। फिर भी बाज़ार में सफलता की कुंजी अब विनम्रता की तराजू पर चढ़ कर ही मिल रही है। सो विनम्रता का चोला मुफ़ीद पड़ने लगा है। यकीन न हो तो एक ही परिवार के राहुल गांधी और वरूण गांधी से मिल लीजिए। बात समझ में आ जाएगी। जब कि काम और लक्ष्य दोनों का एक ही है।

खैर बात यहां अमिताभ बच्चन और उन की विनम्रता की हो रही थी। तो उन के फ़िल्मी रुतबे को छीनने के सब से बडे़ दावेदार शाहरूख भी उन का कद छीनते-छीनते उन्हीं के जिए को दुहराने लगते हैं। सवाल यह भी है कि क्या यह सिर्फ़ उन की विनम्रता ही है या मार्केटिंग मैनेजमेंट भी है? कि वह अपने को बेचने के लिए कहिए या जमाए रखने के लिए कुछ भी बेच लेते हैं। हाजमोला से ले कर तेल, ट्रैक्टर, सीमेंट वगैरह सब। इतना कि लोग कहते हैं कि वह पैसे के लिए कुछ भी कर सकते हैं। यहां तक कि पैंट भी उतार सकते हैं। सफलता और द्रौपदी जीतने के लिए। तो फिर अकड़ क्या चीज़ है।

यह इस लिए भी कहा कि यह वही अमिताभ बच्चन हैं जो एक समय जब शुरुआती शिखर पर थे तब प्रेस का ही क्या अपनी इस विनम्रता का भी बायकाट किए हुए थे। पर जब वह शिखर से सरके तो लौटे विनम्रता की प्रतिमूर्ति बन कर ही। और वह अब अपने ही गढे़ शिखर पर फिर विराजमान हैं। जहां लोग फटक भी नहीं पा रहे। नहीं होने को तो राजेश खन्ना भी हम लोगों के बीच अभी भी हैं, जिन से स्टारडम छीन कर ही अमिताभ बच्चन सुपर स्टार बने। तब जब कि राजेश खन्ना की फ़िल्मोग्राफी में अमिताभ से ज़्यादा फ़िल्में हैं, ज़्यादा सफल फ़िल्में हैं, ज़्यादा अच्छे गाने हैं। तब के समय वह अमिताभ से भी ज़्यादा लोकप्रिय थे। फिर भी राजेश खन्ना आज की तारीख में बिसर गए हैं।

तो यह क्या है? क्या वह विनम्रता और मार्केटिंग मैनेजमेंट में गच्चा खा गए? जो भी है आज की तारीख में अमिताभ से लोहा लेने वाला कोई और दीखता नहीं फ़िल्म इंड्स्ट्री में। न विनम्रता में, न मार्केटिंग मैनेजमेंट में। पर इस विनम्रता में मिलावट कितनी है इस की निर्मम पडताल भी ज़रूरी है। बेहद ज़रूरी। हम सभी जानते हैं और देखते भी हैं कि अमिताभ बच्चन अपने पिता हरिवंश राय बच्चन की कविताओं का पाठ बडे़ मन और जतन से करते हैं। खास कर मधुशाला का सस्वर पाठ कर तो वह लहालोट हो जाते हैं। अपने अशोक वाजपेयी भी अमिताभ के इस बच्चन कविता पाठ के भंवर में जैसे डूबे ही नहीं लहालोट भी हो गए।

अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन और केदारनाथ अग्रवाल की जन्मशती पर उन्हों ने योजना बनाई कि इन कवियों की कविताओं का पाठ क्यों न अमिताभ बच्चन से ही करवा लिया जाए। उन्हों ने अमिताभ बच्चन को चिट्ठी लिखी इस बारे में। और सीधा प्रस्ताव रखा कि वह इन कवियों की कविताओं का पाठ करना कुबूल करें। और कि अगर वह चाहें तो कविताओं का चयन उन की सुविधा से वह खुद कर देंगे। बस वह काव्यपाठ करना मंजूर कर लें। जगह और प्रायोजक भी वह अपनी सुविधा से तय कर लें। सुविधा के लिए अशोक वाजपेयी ने हरिवंश राय बच्चन से अपने संबंधों का हवाला भी दिया। साथ ही उन के ससुर और पत्रकार रहे तरुण कुमार भादुडी से भी अपने याराना होने का वास्ता भी दिया। पर अमिताभ बच्चन ने सांस नहीं ली तो नहीं ली।

अशोक वाजपेयी ने कुछ दिन इंतज़ार के बाद फिर एक चिट्ठी भेजी अमिताभ को। पर वह फिर भी निरुत्तर रहे। जवाब या हां की कौन कहे पत्र की पावती तक नहीं मिली अशोक वाजपेयी को। पर उन की नादानी यहीं खत्म नहीं हुई। उन्हों ने जनसत्ता में अपने कालम कभी कभार विस्तार से इस बारे में लिखा भी। फिर भी अमिताभ बच्चन नहीं पसीजे। न उन की विनम्रता जागी। इस लिए कि कवितापाठ में उन के पिता की कविता की बात नहीं थी, उन की मार्केटिंग नहीं थी, उन को पैसा नहीं मिल रहा था।

अशोक वाजपेयी आईएएस अफ़सर रहे हैं, विद्वान आलोचक और संवेदनशील कवि हैं,  बावजूद इस सब के वह भी अमिताभ बच्चन के विनम्रता के टूल में फंस गए। विनम्रता के मार्केटिंग टूल में। तो हम आप क्या चीज़ हैं? पता नहीं क्यों मुझे कई बार लगता है कि अमिताभ उतने ही विनम्र है जितने कि वह किसान हैं। बाराबंकी में उन की बहू ऐश्वर्या के नाम पर बनने वाला स्कूल उन के किसान बनने की पहली विसात थी। किसान नहीं बन पाए तो स्कूल की बछिया दान में दे दी। स्कूल नहीं बना तो उन की बला से। वह तो फिर से लखनऊ में किसान बन गए। और विनम्रता की बेल ऐसी फैली कि यह देखिए वह अपने खेत में ट्रैक्टर चला कर फ़ोटो भी खिंचवा कर अखबारों में छपवा बैठे। अब जो संतुष्टि उन्हें अपने पिता की कविताओं का पाठ कर के या अपने खेत में ट्रैक्टर चला कर मिलेगी, उन की विनम्रता को जो खाद मिलेगी वह अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन या केदार की कविताओं के पाठ से तो मिलने से रही।

यह भी एक अबूझ रेखा है कि वह अपनी रेखा को भी उसी विनम्रता से भुलाए बैठे हैं। किसी से उस बारे में बात तक नहीं करते। पर जब इंडिया क्रिकेट में विश्वकप जीतती है तो अद्भुत विनम्रता से वह चैनल वालों को सूचित कर के आधी रात को मुंबई की सड़कों पर जश्न मनाने निकल पड़ते हैं। बेटे, बहू को साथ ले कर। पूरी विनम्रता से सब का अभिवादन स्वीकार करते। आइए हम भी, आप भी उन की इस विनम्रता को प्रणाम करें। तब और जब अभी वह आरक्षण की आग अभी बस जलाने ही वाले हैं बरास्ता प्रकाश झा।

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

मौकापरस्ती, धोखा और बेशर्मी जैसे शब्द भी राजीव शुक्ला से शर्मा जाएंगे

राजीव शुक्ला
राजीव शुक्ला
: इंडिया टुडे में एक स्टोरी छपी जिसमें एक जगह लिखा था कि राजीव शुक्ला अमर सिंह से भी बडे पावर ब्रोकर हैं : सफलता का अब एक और नाम है मौकापरस्ती. पर जब राजीव शुक्ला का नाम आता है तो यह मौकापरस्ती शब्द भी शर्मा जाता है. तब और जब उसमें एक और तत्व जुड़ जाता है धोखा.

और अब देखिए राजीव शुक्ला का नाम आते ही धोखा शब्द भी शर्माने लगा. बेशर्मी शब्द भी उनसे शर्मा-शर्मा जाता है. ऐसे बहुतेरे शब्द हैं जो राजीव शुक्ला नाम आते ही पानी मांगने लग जाते हैं. रही बात निष्ठा, आस्था जैसे शब्दों की तो यह शब्द उनके शब्दकोष से नदारद हैं. राजीव शुक्ला कभी पत्रकार भी थे. तब यह पत्रकारिता शब्द भी उनसे शर्माता था. बेतरह शर्माता था. लेकिन राजीव शुक्ला पर तब सफलता के नशे में सीढी दर सीढी चढते जाने की धुन सवार थी. उन्हें इन सब चीज़ों की हरगिज परवाह नहीं थी कि उनके बारे में कौन क्या कह रहा है. वह तो एक सीढी तलाशते हैं और चढ जाते हैं ऊपर. और फिर उस सीढी को तोड़ कर कहिए या छोड़ कर आगे बढ जाते हैं.

यह उनकी सुविधा और मूड पर है कि वह तोड़ते हैं कि छोड़ देते हैं. कानपुर में एक पत्रकार हैं दिलीप शुक्ला. वरिष्ठ पत्रकार हैं. सत्तर के दशक में जब कानपुर से आज शुरू हुआ तो वह विनोद शुक्ला की टीम के ‘योद्धा’ थे. कह सकते हैं सफल पत्रकार. पर विनोद शुक्ला की सोहबत और मदिरापान के व्यसन में वह जय हो गए हैं. खैर, तबके समय रात की ड्यूटी में जब वह होते तो राजीव शुक्ला दिलीप शुक्ला के लिए टिफिन में खाना लेकर आते थे. नेकर पहनने की उम्र थी तब राजीव शुक्ला की. नेकर पहन कर ही आते थे. ज़िक्र ज़रूरी है कि राजीव शुक्ला दिलीप शुक्ला के अनुज हैं.

खैर, कह सकते हैं कि अखबार से राजीव शुक्ला का बचपन से ही वास्ता पड़ गया. बाद के दिनों में वह जब बालिग हुए तो कानपुर में ही दैनिक जागरण में आ गए. जल्दी ही नरेंद्र मोहन ने उनकी ‘प्रतिभा’ को पहचान लिया. और राजीव शुक्ला को लखनऊ ब्यूरो में रख दिया. राजीव शुक्ला ने अपना हुनर दिखाया और तबके उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के खास बन गए. उनके साथ इधर-उधर डोलने लगे. उनसे ‘काम-धाम’ भी करवाने लगे. जल्दी ही लखनऊ में राजीव शुक्ला की पहचान एक अच्छे लायजनर में शुमार हो गई.

विश्वनाथ प्रताप सिंह जब मुख्यमंत्री पद से विदा हुए तब भी सत्ता के गलियारे में राजीव शुक्ला की धमक बनी रही. लेकिन अब राजीव शुक्ला को लखनऊ का आकाश छोटा लगने लगा. वह दिल्ली के लिए पेंग मारने लगे. और जब 1983 में जनसत्ता छपा तो राजीव शुक्ला भी पहली टीम में थे.  बाकायदा इम्तहान पास करके. पर चयन के बाद प्रभाष जोशी तक राजीव शुक्ला की प्रसिद्धि पहुंची. उन्होंने राजीव शुक्ला का चयन तो नहीं रद किया पर उन्हें ब्यूरो में नहीं रखा. डेस्क पर कर दिया. पर राजीव शुक्ला ने डेस्क का काम भी बढिया ढंग से संभाला. और प्रभाष जोशी को लगातार प्रसन्न करने की कोशिश में लगे रहे.

कानपुर में प्रभाष जोशी की ससुराल है. उन संपर्कों से भी दबाव बनवाया राजीव ने. पर सब बेकार. क्योंकि प्रभाष जोशी कुछ और ही मिट्टी के बने थे. तो भी राजीव शुक्ला ने हार नहीं मानी. लगे रहे. जनसत्ता ज्वाइन करने के बाद तमाम सहयोगी किराए का सस्ता घर खोजते फिर रहे थे. और ज़्यादातर लोग जमुनापार ही में घर पा पाए. प्रभाष जोशी खुद जमुनापार निर्माण विहार में एक छोटे से मकान में रहते थे. पर राजीव शुक्ला ने साऊथ डेल्ही में एक बढिया मकान लिया. न सिर्फ़ बढिया मकान लिया बढिया फ़र्नीचर भी मंगवा लिए.

हां तो राजीव शुक्ला की जनसत्ता के सहयोगियों में चर्चा थी. गुपचुप. वैसे भी तब जनसत्ता में कानपुर लाबी और मध्य प्रदेश लाबी हावी थी. कई फ़ैक्टर थे तब. दो लाबी और थी. बनवारी लाबी और दूसरी हरिशंकर व्यास लाबी. पर इन सब पर भारी थी कानपुर लाबी. एक तो जोशी जी की ससुराल तिस पर कानपुर के लोगों की संख्या भी सर्वाधिक थी. आक्रामक भी. कानपुर के ही देवप्रिय अवस्थी तो तबके कार्यकारी समाचार संपादक गोपाल मिश्र की पैंट हरदम उतारते रहते थे. फ़ुल नंगई के साथ. खैर बात राजीव शुक्ला की हो रही थी. अपने मन की न होने के बावजूद राजीव शुक्ला ने कभी बगावती तेवर नहीं दिखाए. लगातार डिप्लोमेसी से अपना काम चलाते रहे. सबसे हंसी मजाक भी. दोनों हथेलियां मलते हुए. ऐसे जैसे हथेली न मल रहे हों, गोया ताश के पत्ते फ़ेंट रहे हों. लगभग वैसे ही जैसे कई सारे रामदेव के अनुयायी नाखून से नाखून रगड़ते मिलते है. क्या तो बाल जल्दी सफेद नहीं होंगे.

राजीव शुक्ला उन दिनों लतीफ़े भी खूब सुनाते और सच्चे झूठे किस्से भी. पूरा रस ले-ले कर. सोहनलाल द्विवेदी उनके प्रिय शगल थे. उनके ताबड़तोड दो किस्से वह सुनाते थे. ठेंठ कनपुरिया अंदाज़ में. आप भी सुनिए. उन दिनों सोहनलाल द्विवेदी राष्ट्र कवि कहे जाते थे. एक कवि सम्मेलन और मुशायरा में वह ज़रा नहीं पूरी देरी से पहुंचे. इतनी देरी हो गई थी कि अध्यक्षता कर रहे फ़िराक साहब अपना कलाम पढ रहे थे. अचानक सोहनलाल द्विवेदी अपने चेलों चपाटों के साथ पहुंचे. अफरा-तफरी मच गई. इतनी कि फ़िराक साहब ने अपना कलाम पढना रोक दिया.

और जब सोहनलाल द्विवेदी मसनद लगा कर तिरछा हो कर बैठ गए तब फ़िराक साहब बोले कि अभी क्या सुना रहा था, मैं तो भूल गया. पर चलिए अब सोहनलाल जी आए हैं तो इन्हीं पर कुछ सुन लीजिए. और उन्होंने शुरू किया- सोहनलाल द्विवेदी आए, सोहनलाल द्विवेदी आए. और यही मिसरा पूरे आरोह-अवरोह के साथ पांच-छ बार फ़िराक साहब ने दुहराया. और जब वह कहते सोहनलाल द्विवेदी आए तो सोहनलाल जी और चौडे़ हो कर बैठ जाते. सीना और फुलाते, मारे गुरूर के और तिरछे हो जाते. मसनद पर और फैल जाते. अंतत: फ़िराक साहब ने शेर पूरा किया- सोहनलाल द्विवेदी आए, एतना बड़ा-बड़ा चूतड लाए. अब सोहनलाल द्विवेदी का चेहरा फक्क. मुशायरा समाप्त.

सोहनलाल द्विवेदी को लेकर वह एक और वाकया सुनाते. हुआ यह कि एक बार जागरण ने दिल्ली में अपने एक संवाददाता को नौकरी से निकाल दिया. उन दिनों खबर भेजने के लिए टेलीग्राफिक अथारिटी का इस्तेमाल किया जाता था. वह उस संवाददाता ने वापस नहीं किया. और नौकरी से निकाले जाने के कुछ दिन बाद उसने सोहनलाल द्विवेदी के निधन की एक डिटेल पर फर्जी खबर लिखी और देर रात उसी टेलीग्राफिक अथारिटी से जागरण कानपुर को भेज दिया. जागरण में वह खबर लीड बन कर पहले पन्ने पर छ्प गई.

तब कानपुर में आकाशवाणी के संवाददाता और आगे की चीज़ थे. उन्होंने सुबह पांच बजे अखबार में छपी खबर देखी और फ़ौरन अपने दिल्ली आफ़िस खबर भेज दी. सुबह छ बजे की बुलेटिन में सोहनलाल द्विवेदी के निधन की खबर प्रसारित हो गई. सुबह आठ बजे की बुलेटिन में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लगायत देश भर से शोक संदेश का तांता लग गया. अब सोहनलाल द्विवेदी जीवित और थे कानपुर में ही थे.  उनके घर लोग आने लगे. अंतत: उन्होंने जागरण अखबार के सामने धरना दे दिया.

ऐसे तमाम किस्से सुनते-सुनाते राजीव शुक्ला जनसत्ता डेस्क पर अपना टाइम पास करते रहे, जोशी जी को मनाते रहे. एक बार किसी ने उनसे कभी चंठई की तो वह उसे तरेरते हुए बोले, ‘होश में रहा करो. और यह मत भूलो कि मैं कभी तुम्हें नौकरी भी दे सकता हूं.’ वह सहयोगी तब भी राजीव की हंसी उड़ा बैठा. बोला, ‘तुम्हारे जैसे छत्तीस ठो रोज मिलते हैं.’ बहरहाल जनसत्ता का जब मेरठ ब्यूरो खुला तब राजीव मेरठ चले गए. रिपोर्टिंग करने. और वहां से भी एक से एक खबरें फ़ाइल करने लगे. मुझे याद है तब कमलापति त्रिपाठी का एक बड़ा सा इंटरव्यू उन्होंने मेरठ से ही फ़ाइल किया था, जो खासा चर्चित भी हुआ था. लेकिन राजीव शुक्ला ने मेरठ में ज़्यादा दिन नहीं गुज़ारे.

फ़रवरी, 1985 में पत्रकारिता में काफी बदलाव हुआ. सुरेंद्र प्रताप सिंह रविवार कलकत्ता छोड़ कर नवभारत टाइम्स दिल्ली आ गए. उदयन शर्मा रविवार के संपादक बन गए. उन्होंने संतोष भारतीय को लखनऊ से बुला कर अपनी जगह ब्यूरो चीफ़ बना दिया. संतोष भारतीय की जगह लखनऊ में शैलेश को प्रमुख संवाददाता बना दिया. और इसी उलटफेर में राजीव शुक्ला भी मेरठ से दिल्ली आ गए रविवार में प्रमुख संवाददाता बन कर. मैं भी इसी फ़रवरी, 1985 में दिल्ली छोड कर स्वतंत्र भारत लखनऊ आ गया था.

राजीव शुक्ला मुझे उसी फ़रवरी में लखनऊ में मिले तो कहने लगे, ‘यह 1985 का फ़रवरी महीना हिंदी पत्रकारिता के लिए ऐतिहासिक है.’ उन्होंने जोडा, ‘ यह मैं नहीं कह रहा, एसपी कहते हैं.’  खैर, अब राजीव शुक्ला थे और उनके पास दिल्ली का आकाश था उडने के लिए.  इस बीच राजनीतिक परिवर्तन भी हो चुका था. इंदिरा गांधी की हत्या हो चुकी थी. दिल्ली सहित देश में दंगे हो चुके थे. राजीव गांधी प्रधानमंत्री बन चुके थे और कि अमिताभ बच्चन भी बाल सखा राजीव गांधी की मदद में राजनीति में आ कर इलाहाबाद से सांसद हो चुके थे.

शुरू शुरू में तो सब कुछ ठीक रहा पर जल्दी ही इलाहाबाद की राजनीति में अमिताभ बच्चन और विश्वनाथ प्रताप सिंह आमने-सामने हो गए. बाद में बोफ़ोर्स भी आ गया. लपेटे में अमिताभ बच्चन भी आ चले. सांसद पद से उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया और राजनीति को प्रणाम किया. इसी बीच एक और घटना घटी. इधर उत्तर प्रदेश में मुलायम भी विश्वनाथ प्रताप सिंह से किसी बात पर खफ़ा हुए. और उनके डहि्या ट्र्स्ट में घपले की खबर लेकर दिल्ली के अखबारों में घूमने लगे. किसी ने भाव नहीं दिया तो उन्होंने लगभग साइक्लोस्टाईल करवा कर इसे सभी अखबारों और राजनीतिक गलियारों में भी बंटवा दिया. तब भी किसी ने इसे बहुत तरजीह नहीं दिया. पर अचानक रविवार के एक अंक में राजीव शुक्ला के नाम से डहि्या ट्र्स्ट पर कवर स्टोरी छपी मिली. लोग हैरान थे. कि यह राजीव शुक्ला तो विश्वनाथ प्रताप सिंह का बड़ा सगा, बड़ा खास था. फिर भी एक साइक्लोस्टाइल बंटे कागज को कवर स्टोरी लिख दिया?

बहरहाल, राजीव शुक्ला की ‘सफलता’ में रविवार की यह डहि्या ट्र्स्ट की कवर स्टोरी मील का पत्थर साबित हुई. नतीज़ा यह हुआ कि अमिताभ बच्चन को राजीव शुक्ला बड़े काम की चीज़ लगे. और अपने पास बुलवाया. जल्दी ही राजीव शुक्ला को उन्होंने राजीव गांधी से भी मिलवा दिया. कहते हैं कि राजीव गांधी ने ही अपनी मित्र अनुराधा प्रसाद से राजीव शुक्ला को मिलवाया. बाद में शादी भी करवा दी. इसके बाद राजीव शुक्ला ने जो उड़ान भरी वह लगातार जारी है. उन्हीं दिनों राजीव गांधी एक बार कानपुर आए तो खुली जीप में उन के साथ एक तरफ अनुराधा प्रसाद खडी थीं हाथ जोड़े तो दूसरी तरफ राजीव शुक्ला. बाकी नेता आगे-पीछे.

अब इसी से राजीव गांधी से राजीव शुक्ला और अनुराधा प्रसाद की करीबी जानी जा सकती है. उन दिनों एक बार शैलेष दिल्ली से लखनऊ आए. किसी बात पर बताने लगे कि कैबिनेट मिनिस्टर की भी कार प्राइम मिनिस्टर के घर के बाहर रोक दी जाती है. पर राजीव शुक्ला की कार सीधे प्राइम मिनिस्टर की पोर्च में रूकती है. तब सचमुच राजीव शुक्ला का जलवा था. पर व्यक्तिगत कंजूसी उनकी वैसी ही थी.

उन दिनों अमेठी में उपचुनाव हो रहा था. रविवार बंद हो चुका था.  राजीव अब संडे में पोलिटिकल एडीटर थे. लखनऊ के हज़रतगंज में घूमते-घामते मिल गए. मोती महल रेस्टोरेंट की तरफ बढते हुए बोले, ‘ यहां दही बताशे बहुत अच्छे बनते हैं. चलो खिलाओ.’ पेमेंट मुझ से ही करवाया.

खैर, मैंने पूछा कि, ‘कब आए.?’

बोले, ‘बस एयरपोर्ट से चला आ रहा हूं.’

मैंने पूछा, ‘सामान कहां है?’

वह बोले, ‘कोई सामान नहीं है.’

फिर मैंने पूछा, ‘काम कैसे चलेगा? आखिर कपड़े-लत्ते, पेस्ट, ब्रश वगैरह.’

‘अरे सब होटल में मिल जाता है. कंपनी पेमेंट कर देती है.’

‘ओह!’ कह कर फिर मैं चुप हो गया.

क्या कहता भला? फिर पूछा कि, ‘इतनी अंगरेजी लिखने आती है कि संडे के लिए काम करने लगे?’

यह सवाल सुनने पर वह थोड़ा बिदके. पर बोले, ‘हो जाता है काम. अरेंज हो जाता है.’

बात खत्म हो गई. कुछ समय बाद पता चला कि राजीव अंबानी के अखबार संडे आब्जर्वर में संपादक हो गए. एक बार दिल्ली गया तो बाराखंबा रोड के आफ़िस में उनसे मिला. वह मिले तो ठीक से पर व्यस्त बहुत दिखे. बाद में यह अखबार भी बंद हो गया. फिर न्यूज़ चैनलों का ज़माना आ गया. वह ‘रूबरू’ करने लगे. लायजनिंग जो पहले दबी ढंकी करते थे, खुल्लमखुल्ला करने लगे. अब वह पावर ब्रोकर कहलाने लगे. खेल गांव में तो वह पहले ही से रहते थे, अब ‘खेल’ करने भी लगे. अमर सिंह जैसे लोग उनसे पानी मांगने लगे. उन दिनों अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे.

इंडिया टुडे में एक स्टोरी छपी जिसमें एक जगह लिखा था कि राजीव शुक्ला अमर सिंह से भी बडे पावर ब्रोकर हैं. बताया गया था कि राजीव शुक्ला इतने बडे पावर ब्रोकर हैं कि अगर चाहें तो किसी को एक साथ अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया गांधी से मिलवा सकते हैं. वगैरह-वगैरह. मैंने इंडिया टुडे में एक मित्र जो जनसत्त्ता में काम कर चुके थे, से पूछा कि, ‘राजीव शुक्ला के बारे में ऐसा आप लोगों ने छाप दिया. राजीव शुक्ला ने बुरा नहीं माना?’ मित्र बोले, ‘बुरा?’ और उन्होंने जैसे जोड़ा, ‘अरे उसने यह सब कह कर लिखवाया है.’ मैं ‘ओह!’ कह कर रह गया.

राजीव की पावर ब्रोकरी का जहाज अब आसमान पूरे शबाब पर था. राजीव गांधी के निधन से थोड़ा ब्रेक ज़रूर लगा लेकिन जल्दी ही उन्होंने फिर से रफ़्तार पकड़ ली. आखिर सौ तालों की चाभी एक अनुराधा प्रसाद उनके पास थी. बाद के दिनों में सोनिया और अमिताभ के रिश्ते खराब हुए तो उन्होंने भी आस्था बदलने में देरी नहीं की. अमिताभ को लात मार कर खट शाहरूख खान को पकड़ लिया. इन दिनों बसपा के एक राज्यसभा सदस्य हैं नरेश अग्रवाल. मौकापरस्ती में राजीव शुक्ला से भी बीस कदम आगे. एक समय कांग्रेसी थे. पर भाजपा सरकार में साझीदार बनने के लिए कांग्रेस तोड़ कर नई पार्टी बना बैठे.

उन दिनों वह राजनाथ सिंह सरकार में ताकतवर मंत्री थे. ऊर्जा विभाग देखते थे. ‘सेक्यूलर ताकतों’ की पैरवी में लगे रहने वाले राजीव शुक्ला ने नरेश अग्रवाल को जाने क्या सुंघा दिया कि उन्होंने राज्यसभा के लिए तब हो रहे चुनाव में राजीव शुक्ला को अपना ‘निर्दलीय’ उम्मीदवार बना दिया. तब जबकि जीतने भर की संख्या में कुछ कमी थी उनके पास. पर भाजपा के कुछ वोट सरप्लस थे. वह वोट तो उन्हें मिले ही और भी जाने कहां-कहां से वोट मिल गए. सेक्यूलरिज़्म का दिन-रात पहाड़ा पढने वाले राजीव शुक्ला भाजपा के मिले वोटों की बदौलत रिकार्ड मतों से राज्यसभा के लिए चुन लिए गए. भाजपा प्रत्याशियों को भी उतना वोट नहीं मिला. अप्रत्याशित था यह.

सबने माना कि राजीव के लिए नरेश अग्रवाल ने पूरा ज़ोर लगा दिया. और यह देखिए कि उन्हीं नरेश अग्रवाल की पार्टी का सम्मेलन हरिद्वार में हो रहा था. राजीव शुक्ला भी गए थे. उन दिनों मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह से नरेश की ठनी हुई थी. बीच सम्मेलन में राजनाथ सिंह ने नरेश अग्रवाल को मंत्री पद से बर्खास्त कर दिया. यह खबर ज्यों राजीव शुक्ला को मिली, वह खट हरिद्वार से दिल्ली निकल गए. सिराज़ मेंहदी को साथ लेकर. नरेश अग्रवाल से मिलना या फ़ोन करना भी उन्हें तब अपराध लगा. ऐसे ही जाने कितनी कथाएं राजीव शुक्ला के जीवन में भरी पड़ी हैं कि अपनी सफलता की द्रौपदी पाने के लिए आस्था बदलने में उन्होंने क्षण भर की भी देरी नहीं की.

विश्वनाथ प्रताप सिंह, अमिताभ बच्चन, नरेश अग्रवाल मात्र कुछ पड़ाव हैं. ऐसे अनगिनत पड़ाव है उनके जीवन में. लिखा जाए तो पूरी किताब कम पड़ जाएगी. अब तो वह क्रिकेट के भी खेवनहार बरसों से बने बैठे हैं. भाजपा से लाख मतभेद हों पर क्रिकेट की राजनीति में वह अरूण जेटली के साथ हैं. जो वह कभी सहयोगियों से कहते थे कि नौकरी दूंगा. तो अब वह खुद अरबों रूपयों की कंपनी के सर्वेसर्वा हैं. न्यूज़ २४ वह चला ही रहे हैं. जाने किस-किस का पैसा वह वहां लगवाए बैठे हैं. मुझे तो हैरत थी कि अभी तक वह मंत्री पद से क्यों महरूम रहे?

आखिर बरसों से वह प्रियंका गांधी के आगे पीछे डोल रहे थे. उनके बच्चों के पोतड़े धो रहे थे. चलिए भले ज़रा देर से ही सही, पोतड़े धोने का इनाम मिला तो सही. अब देखिए न कहने को तो गांधी और नेहरू भी पत्रकार थे. विंस्ट्न चर्चिल भी. पर चलिए छोड़िए वह लोग श्रमजीवी पत्रकार नहीं थे. और मेरी जानकारी में हिंदी के श्रमजीवी पत्रकारों में पंडित कमलापति त्रिपाठी ही कैबिनेट मंत्री तक पहली बार पहुंचे. पर आखिर में उनकी बहुत भद पिटी.

कमलापति जी के बाद भी बहुत पत्रकार राजनीति और सत्ता की कुर्सी भोगते रहे हैं. श्रीकांत वर्मा से लगायत खुशवंत सिंह,  तक राज्यसभा में रहे. चंदूलाल चंद्राकर तो मंत्री भी बने. पर एक घोटाले में भद पिटी और पद छोड़ना पडा. अरूण शौरी भी फ़ज़ीहत फ़ेज़ में पड़े बैठे हैं. राज्यसभा के पत्रकारों की सूची लंबी है. लोकसभा में भी कुछ पत्रकार रहे हैं. अब राजीव शुक्ला भी सत्ता में मंत्री पद के स्वाद की चाकलेट पा गए हैं. तो मुकेश का गाया एक पुराना फ़िल्मी गाना याद आ रहा है कि, ‘सपनों का सौदागर आया/ तुमसे किस्मत खेल चुकी/ अब तुम किस्मत से खेलो.’ आखिर अब समय भी कहां आ गया है भला?

दिल्ली पहुंचने वाले अब तमाम युवा पत्रकार अज्ञेय, रघुवीर सहाय, मनोहर श्याम जोशी, प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर या रामशरण जोशी आदि बनने का सपना लिए नहीं जाते. वह तो राजीव शुक्ला, रजत शर्मा या आलोक मेहता बनना चाहते हैं. अब इसके लिए आस्था बदलनी पड़े, मां, बहन, बेटी या और भी कुछ कुर्बान करना पड़े तो वह सहर्ष तैयार बैठे हैं. आप दयानंद पांडेयमौका देकर तो देखिए. कोई उद्योगपति चाहे तो राजीव शुक्ला जैसे लोगों को बनाने की फ़ैक्ट्री खोल ले तो यकीन मानिए कच्चे माल की कमी हरगिज नहीं होगी. हमारे युवा प्राण-प्रण से टूट पड़ेंगे.

लेखक दयानंद पांडेय चर्चित पत्रकार और साहित्यकार हैं.  उनसे संपर्क 09335233424 या 09415130127 या dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

फ़ेसबुक में फंसे चेहरे

दयानंद पांडेय : कहानी : राम सिंगार भाई इन दिनों फ़ेसबुक पर हैं। उन्हों ने जब एक दोस्त के कहने पर अपना एकाउंट फ़ेसबुक पर खोला था तब वह यह हरगिज नहीं जानते थे कि वह फ़ेसबुक पर नहीं अपने अकेलेपन की, लोगों के अकेलेपन की आंधी में समाने का एकाउंट खोल रहे हैं। फ़ेसबुक खोल कर कई बार राम सिंगार भाई सोचते हैं तो सोचते ही रह जाते हैं।

‘आदमी के आत्म विज्ञापन की यह राह क्या उसे अकेलेपन की आह और आंधी से बचा पाएगी?’ वह पत्नी से बुदबुदा कर पूछते हैं। पत्नी उन का सवाल समझ ही नहीं पाती। बगल के स्टूल पर चाय-बिस्किट रख कर वापस किचेन में चली जाती है। वह फिर से लोगों की पोस्ट देखने लग जाते हैं। एक गिरीश जी हैं। हिमाचल की वादियों से लौटे हैं। नहाते-धोते, खाते-पीते सारी तस्वीरें पोस्ट कर बैठे हैं। फ़ोटो में पत्नी-बच्चे सभी हैं। पर यह देखिए कमेंट भी इस फ़ोटो पर यही लोग कर रहे हैं। ‘गज़ब पापा, नाइस पापा।’  पत्नी का भी कमेंट है, ‘ब्यूटीफुल।’ गिरीश जी खुद भी ‘वेरी नाइस’ का कमेंट ठोंके बैठे हैं। अद्भुत।

मिसेज सिनहा ने तो अपनी ही फ़ोटो पोस्ट की है। देवर लोग कमेंट लिख रहे हैं, ‘ब्यूटीफुल, भाभी जी।’ ननदोई लिख रहे हैं, ‘मैं तो फ़िदा हो गया!’  मिसेज सिनहा पलट कर जवाब देती हैं : ‘जीजा जी आप का दिल दीदी जी के पास पहले ही से फंसा है मैं जानती हूं।’  एक किसी और का कमेंट भी है जो लगता है मिसेज सिनहा का कुलीग है। लिखा है, ‘क्या बात है, बहुत जम रही हैं।’ मिसेज सिनहा ने पलट कर जवाब दिया है, ‘आफिस की ही है। रीतेश ने क्लिक की है।’ राम सिंगार भाई किसी मित्र से फ़ोन पर बता रहे हैं मन की तकलीफ और फ़ेसबुक को बहाना बनाए हैं। बता रहे हैं, ‘बताइए आदमी इतना अकेला हो गया है कि अपनी ही फ़ोटो पर अपने ही घर में चर्चा नहीं कर पा रहा है। फ़ेसबुक पर चर्चा कर रहा है। आफिस के लोग भी फ़ेसबुक या ट्विट पर बात कर रहे हैं आरकुट से हालचाल ले रहे हैं? और तो और सदी के सो काल्ड महानायक भी ट्विट पर अपना खांसी-जुकाम परोसते ही रहते है जब-तब। हर सेकेंड जाने कितनी स्त्रियां गर्भवती होती हैं, मां बनती हैं। पर इन महानायक की बहू जब विवाह के चार बरस बाद मां बनती है तो वह ट्विट कर दुनिया को बताते हैं। हद है। और तो और इन्हीं के एक पूर्व मित्र हैं। महाभ्रष्ट हैं। खुद को दलाल, सप्लायर सब बताते हैं। राजनीतिक गलियारे से खारिज हैं इन दिनों। वह भी ब्लाग पर जाने  क्या-क्या बो रहे हैं।’

‘फैशन है राम सिंगार भाई! फ़ैशन!!’  मित्र जैसे जोड़ता है, ‘और पैशन भी!’

‘भाड़ में जाए ऐसा फ़ैशन और पैशन!’  राम सिंगार भाई किचकिचाते हैं।

‘आप फिर भी देख तो रहे हैं राम सिंगार भाई!’ मित्रा चहकते हुए कहता है।

‘सो तो है।’  कह कर राम सिंगार भाई फ़ोन रख देते हैं।

फिर फ़ेसबुक पर लग जाते हैं। किसी अरशद की नई पोस्ट देख रहे हैं। अरशद का शग़ल कहिए, पागलपन कहिए या कोई महत्वाकांक्षाएं, अकसर किसी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के कवर पर अपनी बड़ी सी फ़ोटो पेस्ट कर पोस्ट लगा देते हैं। बड़ी मासूमियत के साथ यह लिखते हुए कि, ‘क्या करें अब की फला मैगजीन ने मुझ पर कवर स्टोरी की है।’  अरशद की पोस्ट देख कर लगता है जैसे दिन रात वह फ़ेसबुक पर ही बैठे रहते हैं। अपना खाना, सोना, घूमना, काम-धाम, कहां जाना है, कहां से आए हैं सब कुछ का ब्यौरा परोसते रहते हैं। पल-प्रतिपल। कभी अपनी पुरानी फ़ोटो के साथ तो कभी नई फ़ोटो के साथ। इन फ़ोटुओं का बखान भी ऐसे गोया गांधी जी किसी गोलमेज कांफ्रेंस से लौटे हों। बिलकुल बहस तलब बनाते हुए। और एक से एक बुद्धिहीन इस पर दिमाग ताक पर रख कर कि घोड़े पर बैठा कर बे सिर पैर का कमेंट करते हुए जमे बैठे हैं।

‘यह कौन सी दुनिया बना रहे हैं हम?’  राम सिंगार भाई बुदबुदाते हैं।

‘क्या है?’  पत्नी अचानक चाय का कप उठाते हुए थोड़ा कर्कश आवाज़ में पूछती है।

‘कुछ नहीं।’  वह बहुत धीरे से बोलते हैं।

‘पता नहीं क्या-क्या अपने ही से बतियाते रहते हैं।’  कहती पत्नी फिर चली जाती है।

अगली पोस्ट एक कवि की है। फ़ोटो में एक प्रख्यात आलोचक के पीछे कंधे पर हाथ रखे ऐसे खड़े हैं गोया महबूबा के पीछे खड़े हों। एक ख़ूबसूरत अपार्टमेंट के सामने खड़े दोनों मुसकुरा रहे हैं। राम सिंगार भाई फ़ोटो पर क्लिक करते हैं। बड़ी कर के देखने के लिए। फ़ोटो बड़ी हो जाती है। मौखिक ही मौलिक है के प्रवर्तक रहे आलोचक की यह मासूम मुस्कान देखने लायक है। इतने करीब से भला उन्हें कोई छू भी सकता है और वह फिर भी मुसकुरा सकते हैं, देख कर अच्छा लगता है आंखों को। राम सिंगार भाई फ़ोटो के नेक्स्ट पर क्लिक करते हैं। करते ही जाते हैं नेक्स्ट-नेक्स्ट-नेक्स्ट। कवि की पत्नी की फोटुएं हैं। साज-सिंगार करती हुई स्टेप बाई स्टेप। आगे से, पीछे से। ड्रेसिंग टेबिल के सामने जूड़ा बांधते भी, स्टेप पर स्टेप। कुछ कमेंट भी हैं। प्रशंसात्मक कमेंट। लगभग चाकलेट की तरह चुभलाते हुए कमेंट। कवि की विवाह की फ़ोटो भी हैं और उन के लाल और लाली की भी। मतलब बेटे और बेटी की। कुछ किताबों के कवर और उनकी समीक्षाएं भी। माता-पिता नहीं हैं, भाई, बहन, नाते रिश्तेदार नहीं हैं। लोग-बाग नहीं हैं। पत्नी है, बेटा है, बेटी है और आलोचक है। क्या एक कवि को सिर्फ़ इतना ही चाहिए? तो क्या यह कवि भी अकेला हो गया है?

वह सोचते हैं जिस समाज में कवि भी अकेला हो जाए वह समाज कितने दिन तक सड़ने से बचा रह पाएगा? राम सिंगार भाई फ़ेसबुक लॉग-ऑफ कर कंप्यूटर टर्न ऑफ कर देते हैं। बिस्तर पर आ कर लेट जाते हैं। पर मन फ़ेसुबक में फंसे तमाम चेहरों में ही लगा पड़ा है। वह सोचते हैं कि क्या यह वही फ़ेसबुक है जिसने उत्तरी अफ्रीका और कि अरब जगत में तानाशाहों के खि़लाफ चल रहे जन विद्रोह में शानदार भूमिका निभाई है। इतना कि चीन जैसे देश के तानाशाहों ने मारे डर के चीन में फ़ेसबुक पर बैन लगा दिया। क्या वह यही फ़ेसबुक है जिस के सदस्यों की संख्या 75 करोड़ को पार कर एक अरब होने की ओर अग्रसर है? क्या यह वही फ़ेसबुक है जिस पर तमाम राष्ट्राध्यक्ष अपनी बात कहने के लिए प्लेटफ़ार्म की तरह इस्तेमाल करते हैं। जनता से संवाद करते हैं। फे़सबुक हो ट्विटर या आरकुट! अपने प्रधानमंत्री तो खै़र संसद या प्रेस से भी नहीं बोलते। मौन साध जाते हैं। पर गूगल बोलता है कि अब वह भी फ़ेसबुक की तरह गूगल प्लस लाएगा। लाएगा क्या ला भी दिया। पर वह नशा नहीं  घोल पाया जो फ़ेसबुक ने लोगों के जेहन में घोल रखा है। क्या यह वही फे़सबुक है? जो सब को हिलाए हुए है?

फिर वह बुदबुदाते हैं कि, ‘है तो वही फ़ेसबुक!’ राम सिंगार भाई के दफ़्तर में एक सहयोगी के जन्म दिन की सूचना उन्हें फ़ेसबुक पर ही मिली। उन्हों ने फ़ेसबुक पर उन्हें जन्म दिन की बधाई लिखी। और उन के नाम पर क्लिक कर उन के प्रोफ़ाइल पर बस यूं ही नज़र डाली। उन्हों ने देखा कि तमाम सूचनाओं के साथ उन की पढ़ाई एक नामी गर्ल्स डिग्री कॉलेज में हुई दर्ज थी। दूसरे दिन उन्हों ने आफिस में जन्म दिन की बधाई देते हुए लगभग चुहुल करते हुए तमाम सहयोगियों को यह सूचना परोसी कि ‘देखिए भाई यह फला गर्ल्स डिग्री कालेज के पढ़े हुए हैं।’  उन सहयोगी को यह बात चुभ गई। तो राम सिंगार भाई ने बताया कि, ‘भाई, सपना देख कर तो बता नहीं रहा हूं। आप ने अपने फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल पर खुद दर्ज कर रखा है।’  तो यह कहना भी उन को नागवार गुज़रा। बोले, ‘फिर आप ने ही लिख दिया होगा।’

‘मैं कैसे आप की प्रोफ़ाइल में कुछ लिख सकता हूं?’

‘आप कुछ भी कर सकते हैं।’

‘ओह आप का जन्म दिन है आज। कम से कम आज तो कड़वाहट मत घोलिए। और मस्ती कीजिए।’

‘आप ही तो सब कुछ कर रहे हैं।’

बात बढ़ती देख राम सिंगार भाई ने क्षमा मांगी और चुपचाप अपनी सीट पर आ कर बैठ गए थे। फिर भी उन्होंने फ़ेसबुक पर लगातार उन की प्रोफ़ाइल चेक की पर गर्ल्स कालेज में उनके पढ़ने का डिटेल हटा नहीं था। दो महीने बाद तब हटा जब उन्होंने समय निकाल कर एक सहयोगी की मदद ली। और अपनी बर्थ डे की फ़ोटो पोस्ट की। पता चला कि वह खुद कुछ पोस्ट नहीं कर पाते। किसी न किसी सहयोगी की मदद ले कर पोस्ट कर पाते हैं। पिछली दफ़ा भी दफ़्तर में नई आई एक लड़की से एकाउंट खुलवाया था। तो उस ने अपने कालेज का नाम रूटीन में लिख दिया। जिसे यह चेक कर नहीं पाए। पर फ़ेसबुक पर बने रहने का जो शौक़ था, जो रोमांच था, जो अकेलेपन की आंच और सब से जुड़े रहने का चाव था, उन्हें फ़ेसबुक से बांधे रहा। राम सिंगार भाई के साथ भी यही कुछ ऐसे-ऐसे ही तो नहीं है पर है कुछ-कुछ ऐसा-वैसा ही। आख़िर पचास-पचपन के फेंटे में आने के बाद टेकनीक से दोस्ती बहुधा कम ही लोग कर पाते हैं। ज़्यादातर नहीं कर पाते। राम सिंगार भाई भी नहीं कर पाते। मेल एकाउंट खोलना हो, फ़ेसबुक एकाउंट खोलना हो, कुछ पोस्ट करना हो, अटैच, कापी, पेस्ट वह सब कुछ बच्चों के भरोसे करते-कराते हैं। छोटा बेटा इसमें ज़्यादा मददगार साबित होता है। पर जो भी कुछ होता है वह उसे री-चेक ज़रूर कर लेते हैं। कहीं कुछ ग़लत होता है या कई बार सही भी होता है और उन्हें शक हो जाता है तो फ़ौरन रिमूव करवा देते हैं। न सिर्फ़ फ़ेसबुक या इंटरनेट पर बल्कि असल ज़िंदगी में भी वह इसी अदा के आदी हैं।

फ़ेसबुक पर राम सिंगार भाई चैटिंग भी करते हैं। इसमें रोमन में टाइप कर के काम चलाते हैं। क्यों कि अंगरेजी बहुत आती नहीं और हिंदी में टाइप करने आता नहीं। सो रोमन बहुत मुफ़ीद पड़ती है। याहू मैसेंजर पर भी कभी-कभी राम सिंगार भाई चैटिंग करने पहुंच जाते हैं। फर्जी मेल आई-डी बना कर। यह फर्जी मेल आई-डी भी उन्होंने बेटे से बनवाई है। पर पासवर्ड खुद डाला। बेटा यह देख कर हौले से मुस्‍कराया। पर जाहिर नहीं होने दिया। टीनएज बेटा समझ गया कि बाप कुछ खुराफात करने की फ़िराक़ में है। याहू मैसेंजर पर फर्जी नाम से चैटिंग में राम सिंगार भाई अपनी सारी यौन वर्जनाएं धो-पोंछ डालते हैं। वह भी खुल्लमखुल्ला। औरतें भी एक से एक मिल जाती हैं कभी असली, कभी नकली। कभी देशी-कभी विदेशी। मर्दों से ज़्यादा दिलफेंक, ज्यादा आक्रामक मूड। फुल सेक्सी अवतार में। वात्स्यायन के सारे सूत्रों को धकियाती, नए-नए सूत्र गढ़ती-मिटाती, एक नई ही दुनिया रचती-बसाती। एक दिन तो हैरत में पड़ गए राम सिंगार भाई। एक देसी कन्या बार-बार गैंगरेप की गुहार लगाने लगी। कहने लगी, ‘हमें गंदी-गंदी गालियां दो। अच्छी लगती हैं।’  राम सिंगार भाई टालते रहे। अंततः उस ने लिखा, ‘कैसे मर्द हो जो गाली भी नहीं दे सकते? गैंगरेप भी नहीं कर सकते?’  वगैरह-वगैरह मर्दानियत को चुनौती सी देती। तमाम अभद्र और अश्लील बातें। गालियों की संपुट के साथ। ऐसे तमाम वाकये उन के साथ मैसेंजर की चैटिंग में हुए। कभी इस तरह, तो कभी उस तरह।

पर फ़ेसबुक की चैटिंग में यह सब चीज़ें नहीं मिलीं राम सिंगार भाई को। चूंकि पूरी पहचान के साथ ज़्यादातर लोग होते हैं, सब के संवाद का नया पुराना रिकार्ड भी होता है तो लोग-बाग शालीनता की खोल में समाए रहते हैं। थोड़ा-बहुत इधर-उधर की फ़्लर्ट के बावजूद शालीनता का शाल वन उन के पर्यावरण को फिट बनाए रखता है। पर जो अकेलेपन और संत्रास का तनाव तंबू पाते हैं फ़ेसबुक पर राम सिंगार भाई तो हिल जाते हैं। जो दिखावा कहिए,  आत्म विज्ञापन कहिए, आत्म मुग्धता या चाहे जो कहिए वह उन्हें फ़ेसबुक से तो जोड़ता है, पर भीतर-भीतर कहीं गहरे तोड़ता है। बताइए भाई लोग कोई गाना सुनते हैं, अच्छा लगता है तो उस का वीडियो अपलोड कर देते हैं कि लीजिए आप भी सुनिए। गाना जाना पहचाना है, हर कहीं सुलभ है। फिर भी लोग यहां देख-सुन कर बाग-बाग हो जाते हैं। कमेंट पर कमेंट, खोखले ही सही, भर देते हैं। नाइस, ब्यूटीफुल, वाह, वाव, गज़ब! अब इस सड़न को, इस मूर्छा को, इस झुलसन को राम सिंगार भाई किस हरसिंगार की छांह में ले जा कर पुलकाएं कि लोगों का अकेलापन टूटे, संत्रास और तनाव छंटे। राम सिंगार भाई क्या करें?

ऐसे ही जब एफ़ एम टाइप रेडियो चैनलों पर कुछ लोग एनाउंसरों के झांसे में आ कर अपने घर की पूरी कुंडली बांच डालते हैं, ख़ास कर महिलाएं तो राम सिंगार भाई को बहुत कोफ़्त होती है। बहुएं अपनी सास की शिकायत, लड़कियां अपने ब्वाय फ्रेंड के ब्यौरे और लड़के अपनी गर्ल फ्रेंड की बेवकूफियां झोंकते रहते हैं तो कुछ लड़के भी अपनी मम्मी की अंधविश्वास टाइप शिकायतें छांटते मिलते हैं। कार ड्राइव करते यह सब सुनते राम सिंगार भाई हंस पड़ते हैं। तो कभी खीझ पड़ते हैं। अब देखिए राम सिंगार भाई फिर फ़ेसबुक पर है। एक जोशी जी हैं जो किसी रेडियो पर ब्राडकास्टर हैं। रेडियो पर हिंदी बोलते हैं पर फ़ेसबुक पर अंग्रेजी बूकते हैं और अपने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़े होने का दम भी भरते रहते हैं जब-तब। पूरे दंभ के साथ। अंगरेजी बूकते हुए। कभी किसी कामेडियन की क्लिप पोस्ट करते, कभी अपने ब्राडकास्टर की क्लिप पोस्ट करते जो होती हिंदी में ही हैं,  पर वह उन का नैरेशन अंगरेजी में ही छौंकते-बघारते मिलते हैं। किसी ने उन की इस अंगरेजी टेंडेंसी पर तल्ख़ कमेंट लिखा तो उन्हों ने सफाई भी दी कि वह हिंदी में टाइप नहीं कर पाते और कि रोमन में हिंदी लिखना उन्हें बेवकूफी लगती है। हालांकि यह बात उन्हों ने रोमन में ही लिखी।

अपने इन जोशी जी की एक और अदा है कि अगर कोई महापुरुष टाइप व्यक्ति दिवंगत होता है तो वह फट उस से अपने ब्राडकास्टर का रिश्ता जोड़ते हैं और अपना रूप सुरसा की तरह बढ़ा लेते हैं और संबंधित व्यक्ति की एक फ़ोटो अपलोड करते हुए अंगरेजी में बता देते हैं कि कैसे उन्हों ने फलां का इंटरव्यू लिया था। जैसे कि अभी-अभी जब हुसैन का निधन लंदन में हुआ तब उन्हों ने हुसैन की एक फ़ोटो अपलोड की और बताया कि उन दिनों वह अपनी शादी की तैयारियों में थे। पर जब उन्हें फोन पर बताया गया कि हुसैन शहर में हैं तो वह छुट्टी रद्द कर उन का इंटरव्यू कर आए। अब इंटरव्यू में हुसैन ने उन से क्या कहा यह उन्हों ने बताने की ज़रूरत नहीं समझी। बताना भी उन को सिर्फ़ यही था कि वह हुसैन से मिले थे। ऐसे गोया हुसैन से नहीं, वह फ़िराक़ से मिले थे। बरक्स आने वाली नस्लें तुम पर फख्र करेंगी हमअसरो कि तुमने फ़िराक़ को देखा था। आत्म विज्ञापन की इस बीमारी को अपने मनोवैज्ञानिक लोग किस कैटेगिरी में रखते होंगे राम सिंगार भाई नहीं जानते। नहीं कमेंट में लिखते ज़रूर। अब देखिए एक पत्रकार भी हैं फ़ेसबुक पर। उन की एक पोस्ट जोशी जी पर भी भारी है। उन की एक पोस्ट बताती है कि वह ओबामा से मिलने वाशिंगटन गए। कि उन्हें ख़ास तौर पर बुलाया गया। गो कि वह हिंदी अखबार में थे। इस बारे में उन्हों ने विस्तार से कहीं इंटरव्यू भी दिया है और उस का लिंक भी पोस्ट किया है। पर पूरे इंटरव्यू में ओबामा के साथ उन की फ़ोटो तो है पर अपने इंटरव्यू में ओबामा ने उन से क्या कहा, या ओबामा से इन्हों ने क्या पूछा, इसका कहीं ज़िक्र नहीं है।

एक हिंदी के लेखक हैं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय टाइप का लेखक होने का गुमान है। उन के इस गुमान के ट्यूब मैं कुछ संपादक-आलोचक लोग हवा भी भरते रहते हैं। वह भी अक्‍सर अंगरेजी में सांस लेते फ़ेसबुक पर उपस्थित रहते हैं। जैसे कुछ अभिनेता अभिनेत्री काम हिंदी फ़िल्म में करते हैं पर उसके बारे में बात अंगरेजी में करते हैं। एक आलोचक हैं, समाजशास्त्री भी हैं। कबीर के लिए जाने जाते हैं। वह फ़ेसबुक पर भी कबीर को नहीं छोड़ते। कबीर ही भाखते हैं पर अंगरेजी में ही। एक और पोस्ट है। एक महिला हैं जो अपनी कंपनी के चेयरमैन से लिपट कर खड़ी है। यह बताती हुई कि आज ही उन का भी बर्थ डे है और कंपनी के चेयरमैन का भी। कमेंट्स भी नाइस, ब्यूटीफुल वाले हैं। यह कौन सा अकेलापन है? इस की कोई तफ़सील जाने किसी समाजशास्त्री, किसी मनोवैज्ञानिक या किसी और जानकार के पास है क्या? जो आदमी अपनी पहचान किसी अंगरेजी या किसी बड़े से जुड़ कर ही ढूंढना चाहता है? भले ही वह कोई अपराधी, माफिया या धूर्त या ठग ही क्यों न हो? क्या पृथ्वी आकाश से मिल कर बड़ी होती है? या कि फिर कोई नदी किसी सागर से मिलने के बाद नदी रह जाती है क्या? राम सिंगार भाई के मन में उठा यह सवाल जैसे सुलग सा जाता है।

ऐसे लगता है जैसे लोग अपना विज्ञापन खुद तैयार कर रहे हों? तो क्या यह सारे लोग विज्ञापनी उपभोक्ता संस्कृति के शिकार हो चले हैं। लोग यह बात आख़िर क्यों नहीं समझना चाहते कि इस विज्ञापनी संस्कृति ने लोगों के जीवन में फूल नहीं, कांटे बिछाए हैं। यह विज्ञापनी संस्कृति जैसे आप के सोचने के लिए कुछ छोड़ती ही नहीं। वह जताना चाहती है कि आप कुछ मत सोचिए, आप के लिए सारा कुछ हम ने सोच लिया है। आप कहां रहेंगे, क्या खाएंगे, क्या पहनेंगे, कहां सोएंगे, क्या सोचेंगे, क्या बतियाएंगे और कि क्या सपने देखेंगे, यह भी हम बताएंगे। यह सब आप हम पर छोड़िए। आदमी के सपनों के दुःस्वप्न में बदलते जाने की यह कौन सी यातना है भला? जो विज्ञापनी उपभोक्ता संस्कृति हमारे लिए किसी दुर्निवार रेशमी धागे से हमारे यातना शिविर बुन कर तैयार कर रही है? कि आदमी या तो फ़ेसबुक पर फूट पड़ता है या रिरियाता हुआ अपना विज्ञापन रच कर किसी कुम्हार की तरह अपने ही को रूंध देता है? किसी कबीर की तरह अपनी यातना की चदरिया बुन लेता है?

‘तह के ऊपर हाल वही जो तह के नीचे हाल / मछली बच कर जाए कहां जब जल ही सारा जाल’  की तर्ज पर ही यही हाल बहुतेरे ब्लागधारियों का है। क्या विवेकानंद, क्या गांधी, लोहिया, टालस्टाय, टैगोर, अरस्तु, प्लेटो, मैक्समूलर सब के जनक जैसे यही लोग हैं। लगता है इन्हीं ब्लागों को पढ़ कर ही यह लोग पैदा हुए थे। कालिदास, भवभूति, बाणभट्ट, शेक्सपीयर, बायरन, कीट्स, काफ्का इन के ही चरण पखार कर खड़े हुए थे। अद्भुत घालमेल है। दो ब्लागिए भिड़े हुए हैं कुत्तों के मानिंद कि यह कविता मेरी है। तीसरा ब्लागर बताता है कि दोनों की ही नहीं अज्ञेय की है। एक मार्कसिस्‍ट घोषणा कर रहे हैं अज्ञेय की भी नहीं यह तो फलां जापानी की है। फ़ेसबुक पर भी यह मार काट जब तब मच जाती है। एक शायरा हैं; उन्होंने अपनी जो फ़ोटो लगा रखी है, हूबहू अभिनेत्री रेखा से मिलती है। राम सिंगार भाई उन की सुंदरता का बखान करते हुए उन्हें एक दिन संदेश लिख बैठे और धीरे से यह भी दर्ज कर दिया कि आप की फ़ोटो रेखा से बहुत मिलती है। उन का ताव भरा जवाब आ गया कि मैं फ़ोटो और शेर किसी और के नहीं अपने ही इस्तेमाल करती हूं। अब क्या करें राम सिंगार भाई तब, जब बहुतेरी महिलाओं ने अपनी फ़ोटो की जगह अभिनेत्रियों या माडलों की फ़ोटो पेस्ट कर रखी है। सुंदर दिखने का यह एक नया कौशल है कि आंख में धूल झोंकने की कोई फुस्स तरक़ीब? राम सिंगार भाई समझ नहीं पाते और बुदबुदाते हैं कि कल को मां की फीगर ठीक नहीं रहेगी तो लोग मां भी बदल लेंगे?

राम सिंगार भाई के आफ़िस में एक शुक्ला जी हैं। वह फ़ेसबुक से अतिशय प्रसन्न हैं कि उन की बेटी की ज़िंदगी नष्ट होने से बच गई। हुआ यह कि वह अपनी एक बेटी की शादी एक एन.आर.आई. लड़के से तय करने के लिए बात चला रहे थे। बात फ़ाइनल स्टेज में थी कि तभी किसी की सलाह पर वह एन.आर.आई. लड़के का फ़ेसबुक पर फ़ाइल उस की प्रोफ़ाइल देख बैठे। प्रोफ़ाइल में पार्टी में ड्रिंक, लड़कियों से लिपटने-चिपटने के कई फ़ोटो पोस्ट कर रखे थे उस के दोस्तों ने। शुक्ला जी का मोहभंग हो गया। एन.आर.आई. लड़के से भी इस बारे में पूछा। वह कोई साफ जवाब नहीं दे सका। बात ख़त्म हो गई। फ़ेसबुक पर वैसे हजारे, स्वामी की चर्चा भी है और उन के प्रशंसक भी खूब हैं। पर सतही और भेड़िया धसान में लिप्त। अब देखिए कि किसी ने जूते-चप्पलों के एक ढेर की फ़ोटो पोस्ट कर दी है। शायद किसी मंदिर के बाहर का दृश्य है। और जूते भी कूड़े के ढेर की शक्ल में हैं। अब हर कोई अपने कमेंट्स में इन जूतों को नेताओं पर दे मारने की तजबीज देने में लग गया है। कोई पत्रकारों के हवाले इन जूतों को करने के भी पक्ष में है। तो कोई अपने फटे पुराने जूते भी देने की पेशकश कर रहा है।

कमेंट्स की जैसे बरसात है। बताइए जूते के ढेर पर ढेर सारे कमेंट्स। राम सिंगार भाई एक मित्र से इस की निरर्थकता पर चर्चा करते हैं तो मित्र उन्हें ही डपट बैठता है, ‘तो काहें फ़ेसबुक-वेसबुक पर जा कर अपना समय नष्ट करते हो मेरे भाई!’  वह चुप रह जाते हैं। ऐसे ही एक दफ़ा जब वह न्यूज चैनलों पर भूत-प्रेत, सास-बहू, लाफ्टर चैलेंज जैसे कार्यक्रमों की तफ़सील में जा कर एक मित्र से कहने लगे, ‘बताइए ये भला न्यूज चैनल हैं? खबर के नाम पर चार ठो खबर में दिन रात पार कर देते हैं और न्यूज के नाम पर अंधविश्वास परोसते हैं, मनोरंजन परोसते हैं। वह भी घटिया।’  तो उस मित्र ने भी जैसे बिच्छू की तरह डंक मारते हुए कहा, ‘देखते ही क्यों हैं आप यह न्यूज चैनल? क्यों अपना टाइम नष्ट करते हैं?’  राम सिंगार भाई ने तब से उन न्यूज चैनलों को देखना बिलकुल तो नहीं बंद कर दिया पर कम बहुत कर दिया। उन का समय बचने लगा। वह यह बचा समय बच्चों के साथ शेयर करने लगे, माता-पिता के साथ बैठने लगे। पड़ोसियों से फिर मिलने-जुलने लगे। कि तभी यह इंटरनेट पर सर्फिंग की बीमारी ने उन्हें घेर लिया। वह सर्फिंग करने लगे। फिर समय उन का नष्ट होने लगा। तो क्या वह यह सर्फिंग भी बंद कर दें? छोड़ दें फ़ेसबुक-वेसबुक?

राम सिंगार भाई सचमुच सब कुछ छोड़-छाड़ कर अपने गांव आ गए हैं। यहां इंटरनेट नहीं है। टी.वी. तो है, टाटा स्काई भी है कि सभी चैनल देख सकें। पर बिजली नहीं है। बिजली तो शहरों से भी ग़ायब होती है पर इनवर्टर थोड़ा साथ दे जाता है। लेकिन गांव में तो इनवर्टर बेचारा चार्ज़ भी नहीं हो पाता। हां लेकिन गांव में सड़क हो गई है। डामर वाली। सड़क के किनारे पाकड़ के पेड़ के नीचे कुछ सीनियर सिटीज़न की दुपहरिया-संझवरिया कटती है। राम सिंगार भाई भी पहुंच जाते हैं वहीं दुपहरिया शेयर करने। तरह-तरह की बतकही है। आरोप-प्रत्यारोप है। चुहुल है, चंठई है। ताश का खेल है। खैनी का गदोरी पर मलना, ठोंकना, फूंकना, खाना-थूकना है। और दुनिया भर की बातें हैं। नाली, मेड़ का झगड़ा, शादी, ब्याह, गौना, तीज, चौथ का ब्योरा है। किस का लड़का, किस का नाती कहां तक पहुंचा इस सब की तफ़सील है, कौन किस से फंसा, कौन किस से फंसी के बारीक़ ब्यौरे भी। मंहगाई डायन को लानतें हैं। और इस सब पर भी भारी है कुछ रिटायर्ड लोगों की पेंशन में डी.ए. की बढ़ोत्तरी।

एक रेलवे के बड़े बाबू हैं जिन को रिटायर हुए भी बीस बरस से ज़्यादा हो गए हैं। वह दो बार अपनी आधी पेंशन बेच चुके हैं। एक बार तब जब रिटायर हुए थे। बड़े बेटे को घर बनवाना था तो उस ने ‘कुछ मदद’  कर दीजिए के नाम पर पी.एफ. ग्रेच्युटी सहित पेंशन भी उन की आधी बिकवा दी। दस साल बाद छोटे बेटे का नंबर आ गया। बेटा तो नहीं पर छोटी बहू उन की आधी पेंशन भी खींचती रही और रिटायर होने के दस साल बाद फिर उनकी आधी पेंशन बिकवा दी कि आख़िर मेरा भी कुछ हक़ होता है। और अब बीस बरस बाद वह फिर फुल पेंशन के हक़दार हो गए हैं। अब और पेंशन बिक नहीं सकती। सो गांव के सीनियर सिटीज़ंस में सर्वाधिक पेंशन बड़े बाबू की ही हो चली है। यह जान कर सेना से रिटायर एक कंपाउंडर हैं, बड़े बाबू की खिंचाई करते हुए चुहुल करते हुए कहते हैं, ‘तो बड़े बाबू अब आप रेलवे पर फुल बोझ हैं।’  और चुहुल वश जोड़ते हैं, ‘ अब तो आप को मर जाना चाहिए!’ ‘क्या?’  बड़े बाबू चौंके।

‘अरे बारी-बारी पेंशन दो बार बेंचने के बाद भी पूरी पेंशन ले रहे हैं आप। रेलवे का ए.सी. पास भी भोग रहे हैं और अस्पताल का मजा भी मुफ़्त में। तो और क्या हैं रेलवे पर जो आप बोझ नहीं हैं तो?’  वह बोलते ऐसे हैं जैसे बड़े बाबू यह सब रेलवे खर्च पर नहीं उन के खर्च पर भोग रहे हैं। और वह जैसे फिर जोड़ते हैं, ‘अब तो आप को फुल एंड फ़ाइनल मर जाना चाहिए।’ ‘भगवान कहां पूछ रहे हैं।’ बड़े बाबू की आंखों की कोरें भींग जाती हैं, ‘कोई पाप किया था जो इतने साल जी गया हूं।’  वह धोती की कोर से आंखें पोंछते हुए बोलते हैं, ‘ मर तो मैं गया ही हूं। बस देह बाक़ी है।’  दरअसल बड़े बाबू के बेटे उन्हें सिर्फ पेंशन दुहने की मशीन माने बैठे हैं। और जब-तब आपस में रार ठाने रहते हैं। सो बड़े बाबू दुखी हैं। पेंशन वैसे भी उन के हाथ आती कहां है? छह-छह महीने की पेंशन दोनों बेटों में बंट जाती है। उन के हाथ आती है तो सिर्फ तकरार। सो जो बड़े बाबू अभी डी.ए. जोड़ कर बताते हुए छलक रहे थे कि, ‘मेरी पेंशन तो इतनी!’  वही बड़े बाबू रुआंसे हो कर उदास हो गए हैं।

भरी दुपहरिया एक सन्नाटा सा पसर गया है इस पाकड़ के पेड़ के नीचे कि तभी एक नौजवान अपनी जगह से उठ कर बड़े बाबू के पास आता है। उन के पांव छूते हुए कहता है, ‘बड़े बाबू बाबा बुरा मत मानिएगा कंपाउंडर बाबा का! उन की बात का!’  वह जैसे जोड़ता है, ‘रेलवे पर आप जो होंगे, होंगे मैं नहीं जानता। मैं तो बस इतना जानता हूं कि इस गांव के लिए आप भगवान हैं! नहीं जो आप न होते तो इस गांव में यह सड़क न होती, स्कूल न होता, बिजली न आई होती? तो आप का जीवन इस गांव के लिए बहुत ज़रूरी है। आप और लंबा जीएं! शत-शत जिएं!’  नौजवान की यह बात सुन कर सब लोग बड़े बाबू को हौंसला देते हैं। कंपाउंडर भी आ कर उन के पैर छूते हुए उन से माफी मांगते हुए कहता है, ‘भइया माफ कीजिए! मज़ाक-मज़ाक में आप से हम थोड़ा कड़ा बोल गए! अप्रिय बोल गए!’

‘अरे कोई बात नहीं।’  बड़े बाबू सहज होते हुए बोले, ‘यह तो मैं भी समझता हूं। हमारे आपस की बात है।’ पाकड़ के पेड़ के नीचे बैठी सभा अब सहज हो चली है। पर राम सिंगार भाई सहज नहीं हो पाते। उन के मन में सवाल सुलगता है कि बड़े बाबू आख़िर कैसे गांव के भगवान बन गए। आखिर किस जादू की छड़ी से बड़े बाबू ने गांव में सड़क, स्कूल और बिजली की व्यवस्था करवा दी? राम सिंगार भाई के मन में उठा यह सवाल जैसे उनके चेहरे पर भी चस्पा हो जाता है। वह नौजवान राम सिंगार भाई की शंका को समझ गया। बोला, ‘चाचा आप तो रहते हैं, शहर में। गांव-गाड़ा के बारे में कुछ जानते तो हैं नहीं।’  वह ज़रा रुका और बोला, ‘असल में कुछ साल पहले हमारा गांव अंबेडकर गांव घोषित हुआ। अलक्टर, कलक्टर, सी.डी.ओ. फी.डी.ओ., ई.डी.ओ. बी.डी.ओ. सब अफसरान आने लगे। गांव को विकसित करने के लिए। विकास करने के लिए। यहां-वहां नाप जोख करते, मीटिंग करते चले जाते। हरदम आपस में इंगलिश में बतियाते। हम लोग कुछ समझ ही नहीं पाते थे। मीटिंग होती, इंगलिश होती पर विकास नहीं होता गांव का और अफसर चले जाते।’

‘फिर?’  राम सिंगार भाई ने जिज्ञासा में मुंह बाया। ‘फिर क्या था एक बार अफसरान अंगरेजी में गिट-पिट कर रहे थे इसी पाकड़ के पेड़ के नीचे। कुर्सी पर बैठ कर। ई हमारे बड़े बाबू बाबा भी यहीं खड़े धोती खुंटियाए उन की गिट-पिट सुनते-सुनते अचानक भड़क गए। बोले, ‘ तो सारा काम आप लोग कागज पर ही करेंगे।’  ‘क्या कागज पर करेंगे?’  एक अफसर ने बड़े बाबू को डपटते हुए पूछा। ‘इस अंबेडकर गांव का निर्माण। इस गांव का विकास! इस गांव की सड़क, स्कूल और बिजली। और क्या!’  बड़े बाबू ने उस अफसर की उसी को टोन में डपटा। ‘तुम को कैसे मालूम! कि यह सब कागज पर होगा?’ ‘आप लोग इंगलिश में यही तो तब से बतिया रहे हैं।’  यह बात थोड़ा अदब से लेकिन इंगलिश में बड़े बाबू ने कही। तो अफसरों की इस पूरी टीम के माथे पर पसीना आ गया। एक अफसर कंधे उचकाते हुए, बुदबुदाते हुए बोला, ‘ओह यू देहाती भुच्च! डू यू नो इंगलिश?’

‘वेरी वेल सर!’ बड़े बाबू ने मुस्‍करा कर कहा। तो अफसरों की टीम आनन-फानन सिर पर पांव रख कर भाग गई।’ ‘अच्छा!’  राम सिंगार भाई ने मुसकुरा कर पूछा। ‘इतना ही नहीं चाचा जी!’  वह नौजवान बोला, ‘बड़े बाबू ने फिर जन सूचना अधिकार के तहत गांव के विकास के बारे में पूरी सूचना मांगी। योजना, बजट, समय सीमा वग़ैरह। फिर तो वही अफसर बड़े बाबू बाबा के आगे पीछे घूम कर सारे काम करवाने लगे और देखिए न! बड़े बाबू के एक इंगलिश जानने भर से समूचा गांव विकास में नहा गया। कहीं कोई घपला नहीं हो पाया!’  नौजवान बोला, ‘आज भले देश अन्ना हजारे को जानता हो पर हमारे गांव में तो बड़े बाबू पहले ही उन का काम अपने गांव में कर बैठे हैं।’ ‘अरे तो वइसे ही थोड़े न!’  कंपाउंडर बोला, ‘बड़े बाबू अंगरेजों के जमाने के मैट्रिक पास हैं। फुल इंगलिश जानते हैं। इन के इंगलिश के आगे बड़े-बड़े हाकिम-अफसर पानी भरें!’

राम सिंगार भाई यह सब सुन कर मुदित हुए। फिर दूसरे ही क्षण वह सोचने लगे कि, वह अब इस बड़े बाबू के फ़ेस का, इस गांव के फ़ेस का, इस गांव के लोगों के फ़ेस का क्या करें? और खुद से ही बुदबुदा बैठे, ‘हां लेकिन यह फ़ेस फ़ेसबुक पर नहीं हैं!’ ‘कुछ कहा चाचा जी आप ने?’  नौजवान ने भी बुदबुदा कर ही पूछा। ‘अरे नहीं, कुछ नहीं।’ शहर वापस आ कर कुछ दिन अनमने रहे राम सिंगार भाई। नहीं बैठे नेट पर सर्फिंग करने। नहीं खोला अपना फ़ेसबुक एकाउंट! पर एक दिन अचानक वह फ़ेसबुक एकाउंट खोल बैठे। अपने गांव का यह पूरा क़िस्सा संक्षेप में बयान किया। टुकड़े-टुकड़े में बयान किया। और पूछा कि हमारे फ़ेसबुक के साथियों में यह सरोकार, यह जन सरोकार क्यों नहीं दीखता? बड़े बाबू वाले फ़ेस या गांव वाले फ़ेस हमारे फ़ेसबुक से नदारद क्यों हैं? साथ में उन्हों ने अपने गांव की कुछ फ़ोटो भी पोस्ट की। राम सिंगार भाई की इस पोस्ट पर फ़ेसबुक में कोई खास हलचल नहीं हुई। कोई कमेंट नहीं आया। जब कि उन्हों ने दूसरे दिन देखा कि एक जनाब ने एक माडल की फ़ोटो पोस्ट की थी। उस माडल की नंगी पीठ पर कुछ लिखा था। अंगरेजी में लिखा था। उस नंगी पीठ के बहाने साइड से उस का नंगा वक्ष भी दिख रहा था। देखते ही देखते सौ से अधिक कमेंट एक घंटे के भीतर ही आ गए थे। एक से एक मोहक, छिछले, मारक और कामुक कमेंट्स!

हां, तीसरे दिन राम सिंगार भाई ने देखा कि उन के गांव वाली पोस्ट पर भी एक-एक कर दो कमेंट आए थे। एक ने लिखा था इतनी कठिन हिंदी मत लिखा कीजिए कि डिक्शनरी देखनी पड़े। दूसरे ने लिखा था कि देहाती बात लिख कर बोर मत किया करो! राम सिंगार भाई ने अपना कमेंट लिख कर पूछा दोनों फ़ेसबुक मित्रों से कि आख़िर कौन सी बात समझ में नहीं आई और कि किस बात ने बोर किया? जवाब के नाम पर फिर एक सवाल उसी दिन आ गया था एक कमेंट में। सवाल अंगरेजी में ही था कि यह सरोकार क्या होता है? हां, यह भी बताएं कि जन सरोकार भी क्या होता है? आखिर यह है क्या? हां, कमेंट में सरोकार और जन सरोकार रोमन में लिखा था। यह पढ़ कर राम सिंगार भाई ने माथा पीट लिया। और तय किया कि अब वह फिर कभी फ़ेसबुक पर नहीं बैठेंगे। फ़ेसबुक में फंसे इन चेहरों से बात करना दीवार में सिर मारना है, कुछ और नहीं। यह बात भी उन्हों ने अपने पोस्ट में लिखी और फ़ेसबुक एकाउंट लॉग-ऑफ़ कर दिया। कुछ दिनों तक फ़ेसबुक से अनुपस्थित रहने के बाद राम सिंगार भाई फ़ेसबुक पर अब फिर से उपस्थित रहने लगे हैं। यह सोच कर कि एक सिर्फ़ उन के अनुपस्थित रहने से तो फ़ेसबुक बदलेगा नहीं, उपस्थित रहने से शायद कोई फ़र्क़ पड़े।

तो क्या राम सिंगार भाई फ़ेसबुक के नशे के आदी हो गए हैं ?

अपनी कहानियों और उपन्यासों के मार्फ़त लगातार चर्चा में रहने वाले दयानंद पांडेय का जन्म 30 जनवरी, 1958 को गोरखपुर ज़िले के एक गांव बैदौली में हुआ। हिंदी में एमए करने के पहले ही से वह पत्रकारिता में आ गए। 33 साल हो गए हैं पत्राकारिता करते हुए। उन के उपन्यास और कहानियों आदि की कोई डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। लोक कवि अब गाते नही पर प्रेमचंद सम्मान तथा कहानी संग्रह ‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ पर यशपाल सम्मान। बांसगांव की मुनमुन, वे जो हारे हुए, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाज़े, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास), प्रतिनिधि कहानियां, फेसबुक में फंसे चेहरे, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह), हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण), सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां), प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित) तथा सुनील गावस्कर की प्रसिद्ध किताब ‘माई आइडल्स’ का हिंदी अनुवाद ‘मेरे प्रिय खिलाड़ी’  नाम से प्रकाशित। दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

कन्हैयालाल नंदन मतलब धारा के विरुद्ध उल्‍टी तैराकी

: जयंती पर विशेष : किसी नागवार गुज़रती चीज़ पर/ मेरा तड़प कर चौंक जाना/ उबल कर फट पड़ना/ या दर्द से छ्टपटाना/ कमजोरी नहीं है/ मैं ज़िंदा हूं/  इस का घोषणापत्र है/ लक्षण है इस अक्षय सत्य का कि आदमी के अंदर बंद है एक शाश्वत ज्वालामुखी/ये चिंगारियां हैं उसी की जो यदा कदा बाहर आती हैं/ और ज़िंदगी अपनी पूरे ज़ोर से अंदर/ धड़क रही है-/ यह सारे संसार को बताती है/  शायद इसी लिए जब दर्द उठता है/ तो मैं शरमाता नहीं, खुल कर रोता हूं/भरपूर चिलाता हूं/ और इस तरह निष्पंदता की मौत से बच कर निकल जाता हूं।

कन्हैयालाल नंदन होना दरअसल धारा के विरुद्ध उल्‍टी तैराकी करना है. सिस्टम में हो कर भी सिस्टम से लड़ना किसी को सीखना हो तो नंदन जी से सीखे. और वह भी बडे़ सलीके से. अपनी एक कविता में वह सीधे ईश्वर से टकराते मिलते हैं. वह साफ कहते हैं कि, ‘लोग तुम्हारे पास प्रार्थना ले कर आते हैं/मैं ऐतराज़ ले कर आ रहा हूं.’ इतना ही नहीं वह एक दूसरी कविता में चार कदम और आगे जाते हुए कहते हैं;  ‘तुमने कहा मारो/और मैं मारने लगा/ तुम चक्र सुदर्शन लिए बैठे ही रहे और मैं हारने लगा/ माना कि तुम मेरे योग और क्षेम का/ भरपूर वहन करोगे/ लेकिन ऐसा परलोक सुधार कर मैं क्या पाऊंगा/ मैं तो तुम्हारे इस बेहूदा संसार में/ हारा हुआ ही कहलाऊंगा/ तुम्हें नहीं मालूम/ कि जब आमने सामने खड़ी कर दी जाती हैं सेनाएं/ तो योग और क्षेम नापने का तराजू/ सिर्फ़ एक होता है/ कि कौन हुआ धराशायी/ और कौन है/ जिसकी पताका ऊपर फहराई/ योग और क्षेम के/ ये पारलौकिक कवच मुझे मत पहनाओ/ अगर हिम्मत है तो खुल कर सामने आओ/ और जैसे हमारी ज़िंदगी दांव पर लगी है/ वैसे ही तुम भी लगाओ.’

सचमुच वह विजेता की ही तरह हम से विदा हुए. सोचिए कि भला कोई डायलिसिस पर भी दस बरस से अधिक समय जी कर दिखा सकता है? नंदन जी ने दिखाया. और वह भी बिना किसी प्रचार के. नहीं लोगों को तो आज ज़रा सी कहीं फुंसी भी होती है, खांसी-जुकाम भी होता है तो समूची दुनिया को बताते फिरते, सहानुभूति और चंदा भी बटोरते फिरते हैं. पर नंदन जी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया. करना तो दूर किसी को बताते भी नहीं फिरते थे कि वह डायलिसिस पर चल रहे हैं. अपने कवि मित्र रमानाथ अवस्थी की उस गीत पंक्ति की तरह कि, ‘किसी से कुछ कहना क्या/ किसी से कुछ सुनना क्या / अभी तो और जलना है.’ वह चलते रहे. और तो और इस डायलिसिस की भयानक यातना में भी वह ज्ञानपीठ के लिए अज्ञेय संचयन पर काम करते रहे. अपनी आत्म-कथा के तीन खंड पूरे किए. और कि तमाम कवियों की प्रतिनिधि कविताओं का संपादन भी. अपनी रूटीन यात्राएं, काम-काज भी.

डाक्टर हैरान थे उन की इस जिजीविषा पर. हालां कि अपनी मौत को साक्षात देख पाना आसान नहीं होता. और नंदन जी देख रहे थे. डाक्टरों की तमाम घोषणाओं को तो वह भले धता बता रहे थे लेकिन लिख भी रहे थे, ‘बांची तो थी मैं ने/ खंडहरों में लिखी इबारत/ लेकिन मुमकिन कहां था उतना/ उस वक्त ज्यों का त्यों याद रख पाना /और अब लगता है/ कि बच नहीं सकता मेरा भी इतिहास बन पाना/ बांचा तो जाऊंगा/ लेकिन जी नहीं पाऊंगा.’ नंदन जी की यह यातना कि ‘बांचा तो जाऊंगा/ लेकिन जी नहीं पाऊंगा’ को बांचना भी कितना यातनादायक है तो वह तो इस यातना को जी ही रहे थे, सोच कर मन हिल जाता है. नंदन जी यह कोई पहली बार यातना नहीं बांच रहे थे. यातना-शिविर तो उन के जीवन में लगातार लगे रहे. लोगबाग बाहर से उन्हें देखते थे तो पाते थे कि वह कितने तो सफल हैं. उन की विदेश यात्राएं. उन का पद्मश्री पाना, बरसों-बरस संपादक बने रहना सफलता के ही तो सारे मानक थे. और क्या चाहिए था. तिस पर कवि सम्मेलनों में भी वह हमेशा छाए रहते थे. बतौर कवि भी और बतौर संचालक भी. उन का संचालन बरबस लोगों को मोह लेता था.

एक पत्रकार मित्र हैं जिन का कविता से कोई सरोकार दूर-दूर तक नहीं है, एक बार नंदन जी को सुनने के बाद बोले, ‘पद्य के नाम पर यह आदमी खड़ा-खड़ा गद्य पढ़ जाता है, पर फिर भी अच्छा लगता है.’ तो सचमुच जो लोग नंदन जी को नहीं भी पसंद करते थे वह भी उन का विरोध कम से कम खुल कर तो नहीं ही करते थे. वह फ़तेहपुर में जन्मे, कानपुर और इलाहाबाद में रह कर पढे़, मुंबई में पढ़ाए और धर्मयुग की नौकरी किए, फिर लंबा समय दिल्ली में रहे और वहीं से महाप्रयाण भी किया. पर सच यह है कि उन का दिल तो हरदम कानपुर में धड़कता था. हालां कि वह मानते थे कि दिल्ली उन के लिए बहुत भाग्यशाली रही. सब कुछ उन्हें दिल्ली में ही मिला. खास कर सुकून और सम्मान. ऐसा कुछ अपनी आत्मकथा में भी उन्हों ने लिखा है. पर बावजूद इस सब के दिल तो उन का कानपुर में ही धड़कता था. तिस में भी कानपुर का कलक्टरगंज. वह जब-तब उच्चारते ही रहते थे, ‘झाडे़ रहो कलक्टरगंज!’ या फिर, ‘कलेक्टरगंज जीत लिया.’

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कन्हैयालाल नंदन से लोक कवि अब गाते नहीं उपन्यास पर पुरस्कार लेते दयानंद पांडेय. इस मौके पर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के तत्कालीन उपाध्यक्ष और सुपरिचित गीतकार सोम ठाकुर तथा पूर्व सांसद व कवि उदयप्रताप सिंह

बहुत कम लोग जानते हैं कि नंदन जी ने प्रेम विवाह किया था. वह भी अंतरजातीय. न सिर्फ़ अंतरजातीय बल्कि एक विधवा से. कन्हैयालाल नंदन असल में कन्हैयालाल तिवारी हैं. अब सोचिए कि अपने उम्र के जिस मोड़ पर नंदन जी ने यह प्रेम विवाह किया, पिछड़ी जाति की विधवा महिला से उस समय कितनी चुनौतियों से उन्हें दो-चार होना पड़ा होगा? एक ऊच्च कुल का ब्राह्मण और वह भी पिछड़ी जाति की विधवा महिला से विवाह करे, सो भी अपने गांव में ही, विरोध की पराकाष्ठा न झेलेगा तो क्या फूल बरसेगा उस के ऊपर? आज भी यही हालात हैं. पर नंदन जी ने तब के समय में यह किया. और न सिर्फ़ किया बल्कि डंके की चोट पर किया. हां, इस को भुनाते-बताते नहीं फिरे यह सब. सब कुछ भुगत लिया पर उफ़्फ़ नहीं किया. भगवान ने उन को जाने कितना धैर्य दे रखा था.

वह तो जब वह दिनमान-सारिका-पराग क्या दस दरियागंज के संपादक थे तब के दिनों की बात है. वह बार-बार भाग-भाग कानपुर जाते रहते थे. हफ़्ते में दो-दो बार. अंतत: सहयोगियों ने पूछा कि, ‘आखिर बात क्या है?’ तो नंदन जी के चेहरे पर संकोच और पीड़ा एक साथ उभर आई. बोले, ‘असल में पिता जी बहुत बीमार हैं. उन का इलाज चल रहा है.’ तो माहेश्वर्रदयालु गंगवार ने छूटते ही कहा, ‘तो पिता जी को दिल्ली ले आइए. यहां ज़्यादा बेहतर इलाज हो सकेगा. और कि आप को भाग-भाग कर कानपुर नहीं जाना पडेगा.’ वहां उपस्थित सभी ने गंगवार जी के स्वर में स्वर मिलाया. ‘अरे कहां कि बात कर रहे हैं आप लोग?’ नंदन जी धीरे से भींगे स्वर में बोले, ‘कैसे लाऊ? मेरे हाथ का पानी तक तो वह पीते नहीं.’ कह कर वह सर्र से अपनी केबिन में चले गए. फिर बाद में उन्हों ने बताया कि इस वज़ह से पिता उन के हाथ का पानी नहीं पीते. आज जब नंदन जी की याद आती है तो उन का वह कहा भी याद आता है, ‘अरे कहां कि बात कर रहे हैं आप लोग?’  ऐसे जैसे वह कोई तमाचा मार रहे हों अपने आप को ही. फिर उन्हीं की एक कविता याद आ जाती है;

अंगारे को तुम ने छुआ
और हाथ में फफोला भी नहीं हुआ
इतनी सी बात पर
अंगारे पर तो तोहमत मत लगाओ
ज़रा तह तक जाओ
आग भी कभी-कभी आपद धर्म निभाती है
और जलने वाले की क्षमता देख कर जलाती है

सचमुच नंदन जी की क्षमता ज़बर्दस्त थी. हाथ में जो जल कर फफोला पड़ भी जाए तो वह किसी को बताने वाले जल्दी नहीं थे. हां, यह ज़रूर था कि अगर किसी और के हाथ में फफोला पड़ जाए तो वह उसे सुखाने में ज़रूर लग जाते थे. युवाओं पर हमेशा मेहरबान रहते. मैं खुद जब उन से मिला तो युवा क्या बिलकुल लड़का ही था. बल्कि पहली बार जब उन से चिट्ठी-पत्री हुई तब तो मैं बी.ए. का छात्र ही था. गोरखपुर में. यह 1978  की बात है. गोरखपुर में प्रेमचंद ने लंबा समय गुज़ारा है. वह वहां विद्यार्थी भी थे और नौकरी भी किए. बल्कि वहीं बाले मियां के मैदान में गांधी जी का भाषण सुन कर शिक्षा विभाग के डिप्टी डायरेक्टर की नौकरी छोड़ दी. अंगरेजों के खिलाफ लड़ाई में कूद गए. दरअसल उसी गोरखपुर में प्रेमचंद ने जीवन के न सिर्फ़ कई रंग देखे, कई स्वाद चखे बल्कि कई रचनाएं भी रचीं. ईदगाह, पंच परमेश्वर से लगायत रंगभूमि तक की रचना की. अगर चीनी-रोटी खाने के लिए वह तरसे तो इसी गोरखपुर में, अफ़सरी भी की उन्हों ने इसी गोरखपुर में और नौकरी छोड़ कर खादी के लट्ठर कंधे पर लाद कर वह बेंचते भी फिरे इसी गोरखपुर में. लेकिन उन की याद में बने प्रेमचंद पार्क की बदहाली, उन की मूर्ति की फज़ीहत और कुल मिला कर प्रेमचंद की उपेक्षा को ले कर एक छोटी सी टिप्प्णी भेजी थी,  तब सारिका को.

नंदन जी तब इस के संपादक थे. भेजते ही पहले उन का टेलीग्राम आया फिर चिट्ठी. वह वहां प्रेमचंद से जुड़ी फोटो भी चाहते थे. फोटो किसी तरह खिंचवा कर भेजी. किसी तरह इस लिए कि मेरे पास फ़ोटोग्राफ़र को एडवांस देने के लिए पैसे नहीं थे. और कोई फ़ोटोग्राफ़र बिना पैसे लिए फ़ोटो खींचने को तैयार नहीं था. सब कहते स्टूडेंट का क्या भरोसा? और मैग्ज़ीन से बाद में पैसा आए न आए? पिता से पैसे मांगने कि हिम्मत नहीं थी.खैर, किसी तरह एक फ़ोटोग्राफ़र, एक सज्जन की ज़मानत पर तैयार हुआ. भेज दी फ़ोटो. जुलाई में प्रेमचंद जयंती पर रिपोर्ट भेजी थी, अगस्त में फ़ोटो भेजी. अक्टूबर में मय फ़ोटो के रिपोर्ट छप गई. प्रेमचंद की मूर्ति की बगल में खडे़ हो कर मैं ने अपनी भी एक फ़ोटो खिचवाई थी.वह भी छप गई. शीर्षक छपा था जहां प्रेमचंद ने रंगभूमि की रचना की. मुझे यह सब कुछ इतना अच्छा लगा कि सारिका का वह पेज जिस में मेरी फ़ोटो भी छपी थी प्रेमचंद की मूर्ति के साथ, शीशे में फ़्रेम कर के घर की कच्ची दीवार पर टांग दिया.

एक बार रामेश्वर पांडेय घर पर आए. जाडे़ की रात थी. शायद दिसंबर का महीना था. लालटेन की रोशनी में भी उन्हों ने वह चित्र देख लिया. बड़ी देर तक देखते रहे. मैं ने पूछा क्या देख रहे हैं

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कन्हैयालाल नंदन के साथ दयानंद पांडेय
इतनी देर तक? वह बोले, ‘ यह सारिका में छपी फ़ोटो.’ वह ज़रा रूके और धीरे से बोले, ‘ बस एक गड़बड़ हो गई सारिका वालों से.’ मैं ने पूछा, ‘वह क्या?’  वह बड़ा सा मुंह बनाते हुए बोले, ‘शीर्षक गलत लग गया है.’ उन्हों ने फ़ोटो पर फिर एक भरपूर नज़र डाली और बोले, ‘ शीर्षक होना चाहिए था कि जहां दयानंद पांडेय ने प्रेमचंद की खोज की.’ मैं चुप रहा. क्या बोलता इस के बाद भला?पर समझ गया कि रामेश्वर तब क्या कहना चाहते हैं? मैं उन दिनों पढ़ता तो था ही. कविताएं भी लिखता था. रामेश्वर पांडेय भी तब कविता लिखते थे. वही मित्रता थी. हालां कि मेरे गांव में उन के गांव की एक रिश्तेदारी भी है. इस नाते मैं उन्हें फूफा कह कर चिढ़ाता भी खूब था. और वह चिढ़ते भी तब भरपूर थे. उन दिनों वह एक गीत पढ़ते थे, हम ने तो सिर्फ़ अंधेरे और रोशनी की बात की/ और हमें सज़ा मिली हवालात की.’ और खूब वाहवाही लूटते थे. शायद उसी का नशा था या क्या था पता नहीं. पर दूसरे दिन रामेश्वर के जाने के बाद मैं ने वह चित्र दीवार पर से उतार कर किताबों में छुपा दिया. पर शाम को मेरे एक चचेरे बडे़ भाई ने उसे यह कहते हुए दीवार पर फिर से लगा दिया कि, ‘उस लड़के की बात पर मत जाओ. वह तुम्हारी फ़ोटो छपने से जल गया है.’

खैर बात आई गई हो गई. बाद में डाक्टर कमल किशोर गोयनका की चिट्ठी पर चिट्ठी आने लगी. वह उन दिनों प्रेमचंद विश्वकोश पर काम कर रहे थे. वह प्रेमचंद के बारे में गोरखपुर से जुडी बातें जानना चाहते थे. लंबी-लंबी चिट्ठियों कई-कई सवाल होते. और हर बार वह एक सवाल ज़रूर पूछते कि आप क्या करते हैं? मैं हर बार इस सवाल को पी जाता था. अंतत: उन्हों ने लिखा कि दिल्ली विश्वविद्यालय के फला कालेज में 14 सालों से मैं हिंदी पढ़ाता हूं, आप क्या करते हैं? मैं ने जवाब में थोड़ी बेवकूफी बघार दी, खिलंदडी कर दी और लिखा कि आप 14  सालों से हिंदी पढ़ाते हैं और मुझे अभी १४ साल पढ़ते हुए भी नहीं हुआ. बात आई गई हो गई. पर उन की चिट्ठियां फिर भी आती रहीं. पर एक बार क्या हुआ कि मैं पिता जी के साथ दिल्ली घूमने गया. तो बहुत सारे लेखकों से भी मिला. जैनेंद्र कुमार, विष्‍णु प्रभाकर से लगायत श्रीकांत वर्मा तक. कमल किशोर गोयनका से भी मिला. अद्भुत व्यक्ति थे वह. मेरी हर चिट्ठी उन्हों ने बहुत संभाल कर न सिर्फ़ रखी थी बल्कि फाइल बना रखी थी. ला कर वह सारी चिट्ठी पिता जी को दिखाने लगे. मेरा यह लिखना उन को बहुत बुरा लगा था कि आप 14 साल से हिंदी पढ़ा रहे हैं और मुझे अभी 14 साल पढ़ते हुए भी नहीं हुआ. पिता जी को उन्हों ने यह भी दिखाया. अब मुझे काटो तो खून नहीं. पिता जी ने मुझे बस पीटा भर नहीं, बाकी मेरे सारे करम हो गए. बाद में यह बात गोयनका जी ने नंदन जी को भी बताई. आखिर अध्यापक थे वह और किसी विद्यार्थी को बिगड़ते हुए वह देखना नहीं चाहते थे.

हुआ यह कि जब मैं दिल्ली बाकायदा रहने लगा था, नौकरी करने लगा था सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट में, तब की बात है. सर्वोत्तम में लिखने की कुछ गुंजाइश तो होती नहीं थी तो मैं पत्रिकाओं के दफ़्तर के चक्कर मारा करता था. साप्ताहिक हिंदुस्तान से लगायत दिनमान तक. नंदन जी की वैसे भी मुझ पर विशेष कृपा रहती थी. नंदन जी ने मुझ से क्या – क्या नहीं लिखवाया. आज सोचता हूं तो अपने आप से भी रश्क हो आता है. सोचिए कि उस नादान उम्र में भी नंदन जी ने मुझ से चौधरी चरण सिंह के बागपत चुनाव क्षेत्र का बागपत भेज कर कवरेज करवाया बल्कि चरण सिंह का इंटरव्यू भी करवाया और खूब फैला कर छापा भी. उन दिनों क्या था कि नंदन जी एक साथ सारिका, पराग और दिनमान तीनों पत्रिकाओं के संपादक थे. और हर महीने इन में से किसी एक पत्रिका में क्या कई बार तो दो-दो में मैं छपता ही छपता था. आप कह सकते हैं कि मुझे तब छपास की बीमारी ने घेर रखा था. नंदन जी इन तीन पत्रिकाओं के तो संपादक थे ही बाद में निकली वामा और खेल भारती में भी वह पूरा हस्तक्षेप रखते थे. सो लोग उन्हें 10  दरियागंज का संपादक कहने लगे थे. उन की तूती बोलती थी उन दिनों. उन से मिलना उन दिनों बहुत दूभर था. एक तो वह बिल्कुल एरिस्टोक्रेटिक स्टाइल से रहते थे. दूसरे दफ़्तर आते ही कहीं जाने की तैयारी में होते थे. उन के पीए नेगी जी सब कुछ कैसे संभालते थे, देखते बनता था.

काम में नंदन जी हर किसी पर विश्वास करते थे. एक संपादक का सहयोगियों पर कैसे भरोसा होना चाहिए यह नंदन जी से सीखा जा सकता था. खास कर इस लिए भी कि वह जिस संपादक के साथ काम कर के आए थे धर्मयुग से, उस के संपादक धर्मवीर भारती थे तो विद्वान और सफल संपादक. पर परम अविश्वासी. इस बात की चुगली एक नहीं अनेक लोग कर गए हैं. और नंदन जी ने यह पीड़ा अपनी आत्म-कथा में बार-बार पिरोई है. नंदन जी ने हालां कि थोड़ी मुलायमियत बरती है पर रवींद्र कालिया ने गालिब छुटी शराब में नंदन जी की पीड़ा को जो स्वर दिया है, भारती जी द्वारा उन्हें सताए जाने का जो तल्ख व्यौरा परोसा है, वह भारती जी के लिए खीझ ही उपजाता है. ऐसे ही रघुवीर सहाय जब दिनमान के संपादक थे तो वह भले लोहियावादी थे, पर व्यवहार अपने सहयोगियों के साथ उन का घोर सामंती था. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जैसों तक से वह पूरी अभद्रता से पेश आते थे. बाकियों की तो बिसात ही क्या थी. तो ऐसे में नंदन जी का सहयोगियों से संजीदगी से पेश आना, उन पर विश्वास करना सब को भा जाता. लोग अपनी पूरी क्षमता से काम करते.

खैर हुआ यह कि नेशनल स्कूल आफ़ ड्रामा पर एक विशेष रिपोर्ट लिखने के लिए नंदन जी ने मुझ से कहा. उन दिनों वहां भारी अराजकता फैली हुई थी. लड़के आत्महत्या करने लगे थे. डा. लक्ष्मीमल सिंधवी जो सुप्रीम कोर्ट के तब बडे़ वकीलों में शुमार थे. नेशनल स्कूल आफ़ ड्रामा के ट्रस्टी भी थे. उन से फ़ोन कर बात करने के लिए मिलने का समय मांगा. बड़ी मुश्किल से वह तैयार हुए. दस मिनट का समय दिया. पर जब साऊथ एक्स्टेंसन वाले उन के घर पहुंचा, बात शुरू हुई तो आधा घंटा लग गया. बाद में उन्हों ने नंदन जी से शिकायत करते हुए कहा कि बिल भेज दूं क्या? तुम्हारे उस बालक ने दस मिनट का समय मांग कर आधा घंटा का समय ले लिया. नंदन जी ने मुझे यह बात बताई और पूछा कि उन की आधे घंटे की फीस मालूम है? उतनी मेरी तनख्वाह भी नहीं है. फिर उन्हों ने हिदायत दी कि जो जितना समय दे उस का उतना ही समय लेना चाहिए. और गोयनका जी की चिट्ठी का ज़िक्र किया और कहा लिखते अच्छा हो इस लिए तुम्हें छापता हूं. पर यह लौंडपना और नादानी भी तो छोड़ो.

लेकिन गलतियां तो होती रहती थीं. कभी -कभी अनजाने भी. एक बार क्या हुआ कि अमृतलाल नागर का एक इंटरव्यू नंदन जी को दिया. सारिका के लिए. उन दिनों दिल्ली से एक सांध्य दैनिक सांध्य समाचार छपता था. उस का फ़ीचर पेज प्रताप सिंह देखते थे. नागर जी के उस इंटरव्यू का ज़िक्र किया तो उन्हों ने पढ़ने को मांगा. दे दिया. गलती यह हुई कि उन से यह नहीं बताया कि यह इंटरव्यू सारिका में छपने वाला है. उन को इंटरव्यू अच्छा लगा और सांध्य समाचार में झट छाप दिया. संयोग देखिए कि उसी दिन सारिका बाज़ार में आई और उस में नागर जी के उसी इंटरव्यू को अगले अंक में छापने की घोषणा भी. अब मुझे काटो तो खून नहीं. नंदन जी बहुत खफ़ा हुए. बोले, ‘इस दो कौड़ी के अखबार के चलते मेरी सारी इज़्ज़त उतार दी तुम ने.’ उन के कुछ सहयोगियों ने मुझे अंतत: ब्लैक लिस्ट करने की सलाह दी. नंदन जी इस पर भी भड़क गए. बोले, ‘ऐसे तो एक लिखने वाले आदमी को हम मार डालेंगे!’ और उन्हों ने मुझे ब्लैक लिस्ट नहीं किया. कुछ दिन खफ़ा- खफ़ा रहे फिर सामान्य हो गए. मैं फिर छ्पने लगा 10, दरियागंज में. पहले ही की तरह. बरबस उन के एक गीत की याद आ गई. जो वह सस्वर पढ़ते थे.

खंड-खंड अपनापन
टुकडों में जीना
फटे हुए कुर्ते-सा
रोज-रोज सीना
संबंधों के सूनेपन की अरगनियों में
जगह-जगह
अपना ही बौनापन
टांग गए

उन दिनों वह खुद फ़िएट चलाते थे. एक दिन मैं आईटीओ के बस स्टाप पर खड़ा था. दोपहर का समय था. अचानक बस स्टाप पर उन की फ़िएट रूकी. फाटक खोल कर मुझे बुला कर बैठा लिया. उन की बगल की सीट पर तमाम किताबें, कागज अटा पड़ा था. कार स्टार्ट करते हुए बोले, ‘कहां जाओगे?’ मैं ने बताया,  ‘बाराखंबा रोड.’ पूछा,  ‘वहां क्या काम है?’ बताया कि, ‘सोवियत एंबेसी में रमाकांत जी से मिलना है.’ बोले, ‘अच्छा है. सब से मिलना चाहिए. पर इस सब से पढ़ने लिखने का समय बहुत नष्‍ट होता है. इस से बचो. जल्दी ही बाराखंबा रोड आ गया. मुझे उतार कर वह चले गए. जब रवींद्र कालिया ने वागर्थ का संपादन संभाला तो मैं ने देखा कि वह हर किसी छोटे-बडे़, इस खेमे, उस खेमे गरज यह कि बिना खेमेबाज़ी के सब को छापने लगे थे. एक बार वह मिले तो मैं ने उन से कहा कि यह अच्छा कर रहे हैं आप और उन्हें बताया कि नंदन जी भी सारिका में यही करते थे. सब को छापते थे. वह चुप रहे. तो मैं ने यह बात फिर दुहराई. तो कालिया जी बोले, ‘ वो तो ठीक है यार पर नंदन जी कहानीकार नहीं थे न?’

रवींद्र कालिया की पीड़ा समझ में आ गई. बाद के दिनों में जब वह नया ज्ञानोदय में आए तो उन की पीड़ा का विस्तार सामने था. नंदन जी अपने संपादक के गोल्डेन पीरियड में व्यस्त बहुत रहते थे. उन से न मिल पाने की शिकायत बडे़-बड़ों को थी. मैं ने उपेंद्रनाथ अश्क जैसे लेखक को भी उन का इंतज़ार करते देखा है. पर वह जब मिलते थे तब खुल कर मिलते थे. उन की व्यस्तता अपनी जगह थी और उन की जवाबदेही अपनी जगह. अब तो खैर किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री से मिलना फिर भी आसान है पर ज़्यादातर संपादकों से मिलना मुश्किल है. हिमालयी अहंकार के बोझ से लदे- फदे यह संपादक लोग लोगों की चिट्ठी का जवाब देना तो जैसे गाली ही समझते हैं. लेकिन नंदन जी या उन के समय के संपादकों के साथ ऐसा नहीं था. वह अगर कोई रचना अस्वीकृत भी करते थे तो मुकम्मल जवाब के साथ. मुझे याद है कि जब नंदन जी ने सारिका में प्रेमचंद वाला फ़ीचर छापा था तो लगभग उसी के बाद मैं ने पराग के लिए एक कविता भेजी. नंदन जी की एक चिट्ठी के साथ वह कविता लौटी थी.

उन्हों ने लिखा था कि बच्चों के लिए कुछ लिखने में बहुत सतर्कता बरतनी होती है. खास कर कविता में तो बहुत. और अगर बच्चों के लिए कविता लिखनी है तो छंदबद्ध लिखें. बिना छंद की कविता बच्चों के लिए ठीक नहीं है. सो अभी छंद का अभ्यास करें. फिर कुछ पराग के लिए भेजें. और उन दिनों नंदन जी ही क्या आप किसी को भी चिट्ठी लिखें, लोग जवाब तो देते ही थे. मेरे पास बनारसीदास चतुर्वेदी, मन्मथनाथ गुप्त, अमृतलाल नागर से लगायत शरद जोशी तक के पत्र हैं. और नंदन जी तो और तमाम मामलों में भी लोगों से और आगे रहे. जाने कितनों का करियर उन्हों ने बनाया. वायस आफ़ अमरीका, रेडियो जापान से लगायत बी.बी.सी तक में लोगों को रखवाया. टाइम्स ग्रुप में भी. लेकिन बाद के दिनों में वह राजनीति कहिए या और कुछ नवभारत टाइम्स भेज दिए गए. 10  दरियागंज का संपादक अब 4 पेज का रविवारी परिशिष्‍ट देखने लगा. इंतिहा यही नहीं थी जब वह धर्मयुग में संयुक्त संपादक ही नहीं नेक्स्ट टू धर्मवीर भारती थे तब सुरेंद्र प्रताप सिंह उन के साथ बतौर अप्रेंटिश रहे, उन सुरेंद्र प्रताप सिंह के अधीन कर दिया गया नंदन जी को. और बिना परदे की एक केबिन बीचोबीच दी गई. अद्भुत था यह. शायद ऐसी स्थितियों में ही उन्हों ने लिखा होगा:

सब पी गए पूजा नमाज़ बोल प्यार के
और नखरे तो ज़रा देखिए परवरदिगार के
लुटने में कोई उज्र नहीं आज लूट ले
लेकिन उसूल कुछ तो होंगे लूट मार के

अब यह संयोग कहिए या कुछ और. जिस प्रेमचंद की वज़ह से मैं नंदन जी से जुड़ा था वही प्रेमचंद ही नंदन जी से अंतिम मुलाकात के भी सबब बने. हुआ यह कि उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने मेरे उपन्यास लोक कवि अब गाते नहीं को प्रेमचंद सम्मान से नवाज़ा. अब तो यह सारे सम्मान समाप्त हो चुके हैं पर पहले परंपरा सी थी कि यह सम्मान मुख्यमंत्री दिया करते थे. पर उस बार मुख्यमंत्री विधानसभा में अपनी सरकार बचाने में मशगूल रहे. नहीं आए. तो पुरस्कार समिति में शामिल नंदन जी के हाथों मुझे यह सम्मान मिला. यह मेरा सौभाग्य ही था कुछ और नहीं. और दुर्भाग्य देखिए कि यही मुलाकात हमारी अंतिम मुलाकात साबित हुई. उन का एक क्या दो शेर याद आते है:

मुहब्बत का अंजाम हरदम यही था
भंवर देखना, कूदना, डूब जाना
ये तनहाइयां, याद भी, चांदनी भी
गज़ब का वज़न है संभल कर उठाना

सचमुच नंदन जी की यादों का वज़न उठाना अपने आप को भी उठाना लगता है मुझे. नंदन जी के बिना उन की पहली जयंती पर और क्या कह सकता हूं. उन की ही कविता पंक्ति में फिर कहूं

दयानंद पाण्‍डेय
दयानंद पाण्‍डेय
कि, ‘ कि बच नहीं सकता/ मेरा भी इतिहास बन पाना/ बांचा तो जाऊंगा/ लेकिन बच नहीं पाऊंगा.’ सचमुच नंदन जी अब इतिहास बन चुके हैं यह कई बार यकीन नहीं होता.

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

अरविंद कुमार हिंदी अकादमी श्‍लाका सम्‍मा‍न से सम्‍मानित

: बाल श्रमिक से शब्‍दाचार्य तक की यात्रा :  हम नींव के पत्थर हैं तराशे नहीं जाते। सचमुच अरविंद कुमार नाम की धूम हिंदी जगत में उस तरह नहीं है जिस तरह होनी चाहिए। लेकिन काम उन्होंने कई बड़े-बड़े किए हैं। हिंदी जगत के लोगों को उन का कृतज्ञ होना चाहिए। दरअसल अरविंद कुमार ने हिंदी थिसारस की रचना कर हिंदी को जो मान दिलाया है, विश्व की श्रेष्ठ भाषाओं के समकक्ष ला कर खड़ा किया है, वह न सिर्फ़ अद्भुत है बल्कि स्तुत्य भी है।

कमलेश्वर उन्हें शब्दाचार्य कहते थे। हिंदी अकादमी, दिल्ली ने हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान के लिए वर्ष 2010-2011 की हिंदी अकादमी शलाका सम्मान से सम्मानित करने का जो निर्णय आज लिया है, वास्तव में यह बहुत पहले ले लिया जाना चाहिए था। अरविंद कुमार ने 81 वर्ष की उम्र के इस पड़ाव पर भी खामोशी अख्तियार नहीं की है। वह लगातार काम पर काम किए जा रहे हैं। नया काम उनका अरविंद लैक्सिकन है। आजकल हर कोई कंप्यूटर पर काम कर रहा है। किसी के पास न तो इतना समय है न धैर्य कि कोश या थिसारस के भारी भरकम पोथों के पन्ने पलटे। आज चाहिए कुछ ऐसा जो कंप्यूटर पर हो या इंटरनेट पर। अभी तक उनकी सहायता के लिए कंप्यूटर पर कोई हैंडी और तात्कालिक भाषाई उपकरण या टूल नहीं था। अरविंद कुमार ने यह दुविधा भी दूर कर दी है। अरविंद लैक्सिकन दे कर। यह ई-कोश हर किसी का समय बचाने के काम आएगा।

अरविंद लैक्सिकन पर 6 लाख से ज्यादा अंगरेज़ी और हिंदी अभिव्यक्तियां हैं। माउस से क्लिक कीजिए – पूरा रत्नभंडार खुल जाएगा। किसी भी एक शब्द के लिए अरविंद लैक्सिकन इंग्लिश और हिंदी पर्याय, सपर्याय और विपर्याय देता है, साथ ही देता है परिभाषा, उदाहरण, संबद्ध और विपरीतार्थी कोटियों के लिंक। उदाहरण के लिए सुंदर शब्द के इंग्लिश में 200 और हिंदी में 500 से ज्यादा पर्याय हैं। किसी एकल इंग्लिश ई-कोश के पास भी इतना विशाल डाटाबेस नहीं है। लेकिन अरविंद लैक्सिकन का सॉफ्टवेयर बड़ी आसानी से शब्द कोश, थिसारस और मिनी ऐनसाइक्लोपीडिया बन जाता है। इसका पूरा डाटाबेस अंतर्सांस्कृतिक है, अनेक सभ्यताओं के सामान्य ज्ञान की रचना करता है। शब्दों की खोज इंग्लिश, हिंदी और रोमन हिंदी के माध्यम से की जा सकती है। रोमन लिपि उन सब को हिंदी सुलभ करा देती है जो देवनागरी नहीं पढ़ सकते या टाइप नहीं कर सकते।

अरविंद लैक्सिकन को माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस के साथ-साथ ओपन ऑफ़िस में पिरोया गया है। इसका मतलब है कि आप इनमें से किसी भी एप्लीकेशन में अपने डॉक्यूमेंट पर काम कर सकते हैं। सुखद यह है कि दिल्ली सरकार के सचिवालय ने अरविंद लैक्सिकन को पूरी तरह उपयोग में ले लिया है। अरविंद कहते हैं कि शब्द मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है, प्रगति के साधन और ज्ञान-विज्ञान के भंडार हैं, शब्दों की शक्ति अनंत है। वह संस्कृत के महान व्याकरणिक महर्षि पतंजलि को कोट करते हैं, ‘सही तरह समझे और इस्तेमाल किए गए शब्द इच्छाओं की पूर्ति का साधन हैं।’  वह मार्क ट्वेन को भी कोट करते हैं, ‘सही शब्द और लगभग सही शब्द में वही अंतर है जो बिजली की चकाचौंध और जुगनू की टिमटिमाहट में होता है।’ वह बताते हैं, ‘यह जो सही शब्द है और इस सही शब्द की ही हमें अकसर तलाश रहती है।’

दरअसल इसके लिए भाषाई उपकरण बनाने का काम भारत में हजारों साल पहले ही शुरू हो गया था। जब प्रजापति कश्यप ने वैदिक शब्दों का संकलन ‘निघंटु’  बनाया और बाद में महर्षि यास्क ने संसार का सब से पहला ऐनसाइक्यलोपीडिक कोश ‘निरुक्त’ बनाया। इसे पराकाष्ठा पर पहुंचाया छठी-सातवीं शताब्दी में अमर सिंह ने ‘अमर कोश’  के द्वारा। और 1996 में जब

अरविंद कुमार
अरविंद कुमार अपनी पत्‍नी कुसुम कुमार के साथ
समांतर कोश नाम से हिंदी थिसारस नेशनल बुक ट्रस्ट ने प्रकाशित किया तो हिंदी में बहुतेरे लोगों की आंखें फैल गईं। क्यों कि हिंदी में बहुत सारे लोग थिसारस के कंसेप्ट से ही वाकिफ़ नहीं थे। और अरविंद कुमार चर्चा में आ गए थे। वह फिर चर्चा में आए हिंदी-अंगरेज़ी थिसारस तथा अंगरेज़ी-हिंदी थिसारस और भारत के लिए बिलकुल अपना अंगरेज़ी थिसारस के लिए। इसे पेंग्विन ने छापा था। अब वह फिर चर्चा में हैं अरविंद लैक्सिन तथा हिंदी अकादमी शलाका सम्मान से सम्मानित हो कर।

उम्र के 81वें वसंत में अरविंद कुमार इन दिनों कभी अपने बेटे डॉक्टर सुमीत के साथ पांडिचेरी में रहते हैं तो कभी गाज़ियाबाद में। इन दिनों वह गाज़ियाबाद में हैं। अरविंद कुमार को कड़ी मेहनत करते देखना हैरतअंगेज ही है। सुबह 5 बजे वह कंप्यूटर पर बैठ जाते हैं। बीच में नाश्ता, खाना और दोपहर में थोड़ी देर आराम के अलावा वह रात तक कंप्यूटर पर जमे रहते हैं। उम्र के इस मोड़ पर इतनी कड़ी मेहनत लगभग दुश्वार है। लेकिन अरविंद कुमार पत्नी कुसुम कुमार के साथ यह काम कर रहे हैं। समांतर कोश पर तो वह पिछले 35-36 सालों से लगे हुए थे। अरविंद हमेशा कुछ श्रेष्ठ करने की फ़िराक़ में रहते हैं।

एक समय टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप से प्रकाशित फ़िल्म पत्रिका माधुरी के न सिर्फ़ वह संस्थापक संपादक बने, उसे श्रेष्ठ फ़िल्मी पत्रिका भी बनाया। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप से ही प्रकाशित अंगरेज़ी फ़िल्म पत्रिका फ़िल्म फेयर से कहीं ज़्यादा पूछ तब माधुरी की हुआ करती थी। माया नगरी मुंबई में तब शैलेंद्र और गुलज़ार जैसे गीतकार, किशोर साहू जैसे अभिनेताओं से उन की दोस्ती थी और राज कपूर सरीखे निर्माता-निर्देशकों के दरवाजे़ उन के लिए हमेशा खुले रहते थे। कमलेश्वर खुद मानते थे कि उन का फ़िल्मी दुनिया से परिचय अरविंद कुमार ने कराया। और वह मशहूर पटकथा लेखक हुए। ढेरों फ़िल्में लिखीं। बहुत कम लोग जानते हैं कि अमिताभ बच्चन को फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार के लिए अरविंद कुमार ने ही नामित किया था। न सिर्फ़ इतना बल्कि ख्वाज़ा अहमद अब्बास की फ़िल्म सात हिंदुस्तानी के लिए स्क्रीन टेस्ट में अरविंद कुमार ने ही अमिताभ बच्चन को चुना था।

तो ऐसी माया नगरी और ग्लैमर की ऊभ-चूभ में डूबे अरविंद कुमार ने हिंदी थिसारस तैयार करने के लिए 1978 में 16 साल की माधुरी की संपादकी की नौकरी छोड़ दी। मुंबई छोड़ दी। चले आए दिल्ली। लेकिन जल्दी ही आर्थिक तंगी ने मजबूर किया और खुशवंत सिंह की सलाह पर अंतरराष्ट्रीय पत्रिका रीडर्स डाइजेस्ट के हिंदी संस्करण सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट के संस्थापक संपादक हुए। जब सर्वोत्तम निकलती थी तब अंगरेज़ी के रीडर्स डाइजेस्ट से ज़्यादा धूम उस की थी।  लेकिन थिसारस के काम में फिर बाधा आ गई। अंततः सर्वोत्तम छोड़ दिया। अब आर्थिक तंगी की भी दिक्कत नहीं थी। डॉक्टर बेटा सुमीत अपने पांव पर खड़ा था और बेटी मीता लाल दिल्ली के इरविन कॉलेज में पढ़ाने लगी थी।

अरविंद कुमार कहते हैं कि थिसारस हमारे कंधे पर बैताल की तरह सवार था, पूरा तो इसे करना ही था। बाधाएं बहुत आईं। एक बार दिल्ली के मॉडल टाउन में बाढ़ आई। पानी घर में घुस आया। थिसारस के लिए संग्रहित शब्दों के कार्डों को टांड़ पर रख कर बचाया गया। बाद में बेटे सुमीत ने अरविंद कुमार के लिए न सिर्फ़ कंप्यूटर ख़रीदा बल्कि एक कंप्यूटर ऑपरेटर भी नौकरी पर रख दिया। डाटा इंट्री के लिए। थिसारस का काम निकल पड़ा। काम फ़ाइनल होने को ही था कि ठीक छपने के पहले कंप्यूटर की हार्ड डिस्क ख़राब हो गई। लेकिन गनीमत कि डाटा बेस फ्लापी में कॉपी कर लिए गए थे। मेहनत बच गई। और अब न सिर्फ़ थिसारस के रूप में समांतर कोश बल्कि शब्द कोश और थिसारस दोनों ही के रूप में अरविंद सहज समांतर कोश भी हमारे सामने आ गया। हिंदी-अंगरेज़ी थिसारस भी आ गया।

अरविंद न सिर्फ़ श्रेष्ठ रचते हैं बल्कि विविध भी रचते हैं। विभिन्न देवी-देवताओं के नामों वाली किताब शब्देश्वरी की चर्चा अगर यहां न करें तो ग़लत होगा। गीता का सहज संस्कृत पाठ और सहज अनुवाद भी सहज गीता नाम से अरविंद कुमार ने किया और छपा। शेक्सपियर के जूलियस सीजर का भारतीय काव्य रूपांतरण विक्रम सैंधव नाम से किया। जिसे इब्राहिम अल्काज़ी जैसे निर्देशक ने निर्देशित किया। गरज यह कि अरविंद कुमार निरंतर विविध और श्रेष्ठ रचते रहे हैं। एक समय जब उन्होंने सीता निष्कासन कविता लिखी थी तो पूरे देश में आग लग गई थी। सरिता पत्रिका जिस में यह कविता छपी थी देश भर में जलाई गई। भारी विरोध हुआ। सरिता के संपादक विश्वनाथ और अरविंद कुमार दसियों दिन तक सरिता दफ़्तर से बाहर नहीं निकले। क्यों कि दंगाई बाहर तेजाब लिए खड़े थे। सीता निष्कासन को ले कर मुकदमे भी हुए और आंदोलन भी। लेकिन अरविंद कुमार ने अपने लिखे पर माफी नहीं मांगी। न अदालत से, न समाज से। क्यों कि उन्होंने कुछ ग़लत नहीं लिखा था। एक पुरुष अपनी पत्नी पर कितना संदेह कर सकता है, सीता निष्कासन में राम का सीता के प्रति वही संदेह वर्णित था। तो इस में ग़लत क्या था? फिर इस के सूत्र बाल्मीकी रामायण में पहले से मौजूद थे।

अरविंद कुमार जितना जटिल काम अपने हाथ में लेते हैं, निजी जीवन में वह उतने ही सरल, उतने ही सहज और उतने ही व्यावहारिक हैं। तो शायद इस लिए भी कि उन का जीवन इतना संघर्षशील रहा है कि कल्पना करना भी मुश्किल होता है कि कैसे यह आदमी इस मुकाम पर पहुंचा। कमलेश्वर अरविंद कुमार को शब्दाचार्य ज़रूर कह गए हैं। और लोग सुन चुके हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि अमरीका सहित लगभग आधी दुनिया घूम चुके यह अरविंद कुमार जो आज शब्दाचार्य हैं, एक समय बाल श्रमिक भी रहे हैं। हैरत में डालती है उन की यह यात्रा कि जिस दिल्ली प्रेस की पत्रिका सरिता में छपी सीता निष्कासन कविता से वह चर्चा के शिखर पर आए उसी दिल्ली प्रेस में वह बाल श्रमिक रहे।

वह जब बताते हैं कि लेबर इंस्पेक्टर जांच करने आते थे तो पिछले दरवाज़े से अन्य बाल मज़दूरों के साथ उन्हें कैसे बाहर कर दिया जाता था तो उन की यह यातना समझी जा सकती है। अरविंद उन लोगों को कभी नहीं समझ पाते जो मानवता की रक्षा की ख़ातिर बाल श्रमिकों पर पाबंदी लगाना चाहते हैं। वह पूछते हैं कि अगर बच्चे काम नहीं करेंगे तो वे और उन के घर वाले खाएंगे क्या?वह कहते हैं कि बाल श्रम की समस्या का निदान बच्चों को काम करने से रोकने में नहीं है, बल्कि उन के मां बाप को इतना समर्थ बनाने में है कि वे उन से काम कराने के लिए विवश न हों। तो भी वह बाल मजदूरी करते हुए पढ़ाई भी करते रहे। दिल्ली यूनिवर्सिटी से अंगरेज़ी में एम. ए. किया। और इसी दिल्ली प्रेस में डिस्ट्रीब्यूटर, कंपोजिटर, प्रूफ रीडर, उप संपादक, मुख्य उप संपादक और फिर सहायक संपादक तक की यात्रा अरविंद कुमार ने पूरी की। और कैरवां जैसी अंगरेज़ी पत्रिका भी निकाली। सरिता, मुक्ता, चंपक तो वह देखते ही थे। सचमुच अरविंद कुमार की जीवन यात्रा देख कर मन में न सिर्फ़ रोमांच उपजता है बल्कि आदर भी। तिस पर उन की सरलता, निश्छलता और बच्चों सी अबोधता उन की विद्वता में समुंदर सा

दयानंद
दयानंद पांडेय
इज़ाफा भरती है। यह एक विरल संयोग ही है कि अरविंद उसी मेरठ में जन्मे हैं जहां खड़ी बोली यानी हिंदी जन्मी। अरविंद कुमार से सम्‍पर्क मोबाइल नम्‍बर  09716116106 या मेल आईडी samantarkosh@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com  के जरिए किया जा सकता है.

भोजपुरी की आन-बान और शान बेच डाला मनोज तिवारी ने

दयानंद पांडेय
दयानंद पांडेय
: भोजपुरी गायकी अपनों से ही हार गई है : मिठास की जगह अश्‍लीलता ने ले लिया : ‘तोहरे बर्फी ले मीठ मोर लबाही मितवा’ जयश्री यादव के इस गीत की तरह में ही कहें तो भोजपुरी गीतों में मिठास की यही परंपरा उसे बाकी लोकगीतों से न सिर्फ़ अलग करती है बल्कि यही मिठास उसे अनूठा भी बनाती है.

पर आज की तारीख में भोजपुरी के मसीहा बने बैठे गायकों और ठेकेदारों ने बाज़ार की भेंट चढ़ा कर भोजपुरी गायकी को न सिर्फ़ बदनाम कर दिया है बल्कि कहूं कि इसे बर्बाद कर दिया है. भोजपुरी का लोक अब बाज़ार के हवाले हो कर अश्लीलता, फूहड़पन और अभद्रता की छौंक में शेखी बघार रहा है. और बाज़ार के रथ पर सवार इस व्यभिचार में कोई एक दो लोग नहीं वरन समूचा गायकों- गायिकाओं का संसार जुटा पड़ा है. इक्का-दुक्का को छोड़ कर. भोजपुरी गानों का चलन हालां कि बहुत पहले से है फिर भी आधारबिंदु घूम फिर कर भिखारी ठाकुर ही बनते हैं. भिखारी ठाकुर और उन की बिदेसिया शैली की गूंज अब इस सदी में भले मद्धिम ही नहीं विलुप्त होने की कगार पर खडी है तो भी भोजपुरी गानों की बात बिना भिखारी ठाकुर के आज भी नहीं हो पाती. ‘एक गो चुम्मा देहले जइह हो करेजऊ’ , या ‘अब त चली छुरी गड़ासा, लोगवा नज़र लड़ावेला’ या फिर ‘आरा हिले, बलिया हिले छपरा हिलेला, हमरी लचके जब कमरिया सारा ज़िला हिलेला’ सरीखे भोजपुरी गानों के लिए भिखारी ठाकुर का लोग आज भी दम भरते हैं. लेकिन भिखारी ठाकुर ने ‘अपने लइकवा के भेजें स्कूलवा/हमरे लइकवा से भंइसिया चरवावें’ जैसे गाने भी लिखे और गाए भिखारी ठाकुर ने यह कम लोग जानते हैं.

ठीक वैसे ही जैसे आरा हिले, बलिया हिले गीत का मर्म बहुत कम लोग जानते हैं. ज़्यादातर लोग इस गीत को भोजपुरी गानों में अश्लीलता की पहली सीढ़ी मान बैठते हैं और मन ही मन मज़ा

भिखारी ठाकुर
भिखारी ठाकुर
लेते हैं. ऐसे लोगों को अपनी आखों से मोतियाबिंद को उतार कर बुद्धि को पखार कर जान लेना चाहिए कि भिखारी ठाकुर का यह गीत आरा हिले, बलिया हिले कोई मामूली गीत नहीं है. व्यवस्था को चुनौती देने वाला गीत है. जहां मुंशी, दारोगा, कोतवाल ही नहीं वरन ज़िला भी हिल जाता है एक कमरिया भर हिल जाने से. सोचिए कि एक कमर हिलने भर से समूची व्यवस्था हिल जाती है तो आगे का क्या- क्या होगा? और अब तो हमारे सामने घोटालों का अंबार लगा पडा है. और लोग खामोश हैं. अन्ना हज़ारे की हिलोर के बावजूद. जाने क्यों लोग कुछ गानों की तासीर और उस का अर्थ विन्यास लोप कर दूसरा अर्थ पकड़ लेते हैं. ऐसे ही एक गाना पाकीज़ा फ़िल्म का है, ‘इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा.’ इस में क्या सिपहिया, क्या रंगरेजवा सभी दुपट्टा ले लेते हैं. दरअसल यह दुपट्टा उस की इज़्ज़त है जो सभी बारी-बारी तार-तार करते हैं. पर इस गाने का मर्म भी ज़्यादातर लोग भुला बैठते हैं और इस गाने की तासीर डूब जाती है.

वैसे कई गाने हैं. जैसे एक गाना देखिए और याद आ गया. अभी हाल ही मशहूर हुआ था. ‘जब से सिपाही से भइलैं हवलदार हो, नथुनिए पे गोली मारें.’ यह भी पद के मद का व्यौरा बांचता गाना है. पर अश्लीलता के कुएं में उतरा कर अजब सनसनी फैला गया. यह मूल गाना बालेश्वर का था. बाद में मुन्ना सिंह ने इसे थाम लिया और बाज़ार पर सवार कर दिया. फ़ास्ट म्यूज़िक में गूंथ कर. फिर एक हिंदी फ़िल्म में रही सही कसर उतर गई. गोविंदा रवीना पर फ़िल्माया गया, ‘अंखियों से गोली मारे.’ कई भोजपुरी निर्गुन के साथ भी यही है.लोग उस की तासीर नहीं समझते, मर्म नहीं समझते और कौव्वा कान ले गया कि तर्ज़ पर गाना ले उड़ते हैं. भोजपुरी को बदनाम, बरबाद जो कहिए, कर बैठते हैं. तो क्या कीजिएगा? ‘सुधि बिसरवले बा हमार पिया निर्मोहिया बनि के’ जैसा मादक और मीठा गीत गाने वाले मुहम्मद खलील जैसे गायक भी हुए है, आज के दौर में कम लोग जानते हैं. क्यों कि बाज़ार में उन के गानों की सीडी, कैसेट कहीं नहीं हैं. हैं तो सिर्फ़ आकाशवाणी के कुछ केंद्रों के आर्काइब्स में. लेकिन जो टिंच और मिठास भोजपुरी गीतों में मुहम्मद खलील परोस गए है, बो गए हैं, जो रस घोल गए हैं वह अविरल ही नहीं, दुर्लभ भी है. ‘अंगुरी में डसले बिया नगिनिया हो, हे ननदो दियना जरा द. दियना जरा द, अपने भैया के जगा द. रसे-रसे चढतिया लहरिया हो, हे ननदो भइया के जगा द.’ गीत में जो मादकता, जो मनुहार, जो प्यार वह अपनी गायकी के रस में डुबो कर छलकाते हैं कि मन मुदित हो जाता है. लहक जाता है मन, जब वह इस गीत में एक कंट्रास्ट बोते हुए गाते हैं, ‘ एक त मरत बानी, नागिन के डसला से, दूसरे सतावति आ सेजरिया हे, हे ननदो भइया के जगा द.’ भोजपुरी गीत की यह अदभुत संरचना है. ‘छलकल गगरिया मोर निर्मोहिया’ मुहम्मद खलील के गाए मशहूर गीतों में से एक है.

और सच यही है कि भोजपुरी की मिसरी जैसी मिठास मुहम्मद खलील की आवाज़ में घुलती हुई उन के गाए गानों में गूंजती है. भोलानाथ गहमरी के लिखे गीत, ‘कवने खोंतवा में लुकइलू आहि हो बालम चिरई’ में खलील ‘टीन-एज़’ के विरह को जिस ललक और सुरूर और सुकुमारता से बोते मिलते हैं, जो औचक सौंदर्य वह निर्मित करते हैं, वह एक नए किसिम का नशा घोलता है. ‘मन में ढूंढलीं, तन में ढूंढलीं, ढूंढलीं बीच बज़ारे/हिया-हिया में पइठ के ढूंढलीं, ढूंढली विरह के मारे/ कवने सुगना पर लोभइलू, आहिहो बालम चिरई.’ गा कर वह गहमरी जी के गीत के बहाने आकुलता का एक नया ही रस परोसते हैं. इस रस को उन के गाए एक दूसरे गीत, ‘खेतवा में नाचे अरहरिया संवरिया मोरे हो गइलैं गूलरी के फूल’ में भी हेरा जा सकता है. ‘बलमा बहुते गवैया मैं का करूं/ झिर-झिर बहै पुरवइया मैं का करूं’ या फिर, ‘गंवई में लागल बा अगहन क मेला, खेतियै भइल भगवान, हो गोरी झुकि-झुकि काटेलीं धान’ जैसे दादरा में भी वह अलग ही ध्वनि बोते हैं. पर लय उन की वही मिठास वाली है. मुहम्मद खलील की खूबी कहिए कि खामी, गायकी को तो उन्हों ने खूब साधा लेकिन बाज़ार को साधना तो दूर उन्हों ने झांका भी नहीं और दुनिया से कूच कर गए. नतीज़ा सामने है. मुहम्मद खलील के गाए गानों को सुनने के लिए तरसना पडता है. भूले भटके, कभी -कभार कोई आकाशवाणी केंद्र उन्हें बजा देता है. पर अब आकाशवाणी भी भला अब कौन सुनता है?

सुनते हैं कि बहुत समय पहले नौशाद मुहम्मद खलील को मुंबई ले गए थे, फ़िल्मों मे गवाने के लिए. लेकिन जल्दी ही वह वापस लौट आए. क्यों कि वह फ़िल्मों के लिए अपनी गायकी में बदलाव के

बालेश्‍वर
बालेश्‍वर
लिए तैयार नहीं हुई. बोले कि ऐसे तो भोजपुरी बरबाद हो जाएगी और मेरी गायकी भी. मैं बिला जाऊंगा, पर भोजपुरी को बरबाद नहीं करूंगा. ठीक अपनी गायकी की तरह, ‘प्रीत में न धोखा धडी, प्यार में न झांसा, प्रीत करीं ऐसे जैसे कटहर क लासा !’ सचमुच अब यह कटहर क लासा जैसा प्रीत करने वाले गायक भोजपुरी के पास नहीं हैं, जैसे कुछ लोग अपनी मां-बहन की कीमत पर भी तरक्की कबूल कर लेते हैं, ठीक वैसे ही हमारे भोजपुरी गायकों ने अपनी मातृभाषा को दांव पर लगा दिया है, बाज़ार के रथ पर सवार होने के लिए. कोई कुछ भी कहे सुने उन्हें उस से कोई सरोकार नहीं. उन का सरोकार सिर्फ़ और सिर्फ़ पैसे से है. अपनी मां बेच कर भी उन्हें सिर्फ़ पैसा और शोहरत चाहिए. चाहे जो-जो करना पडे़. वह तो तैयार हैं. पर मुहम्मद खलील ने ऐसा नहीं किया. हां, अपवाद के तौर पर अभी एक और गायक हैं- भरत शर्मा. एक से एक नायाब गीत उन के खाते में भी दर्ज हैं. हालां कि मुहम्मद खलील की तासीर उन की गायकी में नहीं है पर एक चीज़ तो उन्हों ने मुहम्मद खलील से सीखी ही है कि बाज़ार के रथ पर चढ़ने के लिए अपनी गायकी में समझौता अभी तक तो करते नहीं ही दिखे हैं.

तारकेश्वर मिश्र का लिखा गीत,’हम के साड़ी चाही में उन की गायकी की गमक में डूबना बहुत आसान है, ‘चोरी करिह, पपियो चाहे/ खींच ठेला गाड़ी/ हम के साड़ी चाही’ या फिर ‘गोरिया चांद के अंजोरिया नियर गोर बाडू हो/ तोहार जोर कौनो नइखै बेजोड़ बाडू हो’ में उन की गायकी का अंजोर साफ पढ़ा जा सकता है, निहारा जा सकता है. और फिर जो कोई संदेह हो तो सुनिए, ‘धन गइल धनबाद कमाए/ कटलीं बड़ा कलेश/ अंगनवा लागेला परदेस.’ बाज़ार के घटाटोप धुंध में भी भरत शर्मा अपनी गायकी को बाज़ारूपन से बचाए बैठे हैं, इस के लिए उन को जितना सलाम किया जाए कम है. लेकिन बालेश्वर के साथ ऐसा नहीं था. वह जब जीवित थे तब भी और अब भी उन के कैसेटों और सीडी से बाज़ार अटा पड़ा था. बालेश्वर ने गायकी को भी साधा और बाज़ार को भी. भरपूर. आर्केस्ट्रा का भी बाज़ार. कोई डेढ़ सौ कैसेट उन के हैं. वह हमेशा बुक भी रहते थे. वह भोजपुरी की सरहदें लांघ कर कार्यक्रम करने वाले पहले भोजपुरी गायक थे. भोजपुरी गायकी को अंतरराष्‍ट्रीय पहचान और मंच बलेश्वर ने ही पहले-पहल दी. भोजपुरी में गाने वाला स्टार भी हो सकता है यह भी बालेश्वर ने बताया. भोजपुरी गायकी के वह पहले स्टार हैं. गाने भी उन के खाते में एक से एक नायाब हैं. मुहम्मद खलील दूसरों के लिखे गाए गाते थे पर बालेश्वर अपने ही लिखे गाने गाते थे. जब कि वह कुछ खास पढे़-लिखे नहीं थे. बालेश्वर के यहां प्रेम भी है, समाज भी और राजनीति भी. मतलब बाज़ार में रहने के सारे टोटके. और हां, ढेरों समझौते भी.

नतीज़तन बालेश्वर तो बहुतों को पीछे छोड़ अपनी सफलता की गाड़ी सरपट दौड़ा ले गए पर भोजपुरी गायकी को समझौता एक्सप्रेस में भी बैठा गए. अब उस की जो फसल सामने आ रही है, भोजपुरी गायकी को लजवा रही है. बहरहाल इस बिना पर बालेश्वर को खारिज तो नहीं किया जा सकता. बालेश्वर की गायकी और उन की आवाज़ का जादू आज भी सिर चढ़ कर बोलता है. बालेश्वर असल में पहले भिखारी ठाकुर और कबीर की राह चले. बिकाई ए बाबू बीए पास घोडा. जैसे गीत इसी की बुनियाद में हैं. दुश्‍मन मिले सवेरे लेकिन मतलबी यार ना मिले/ मूरख मिले बलेस्सर पर पढ़ा-लिखा गद्दार ना मिले.या फिर नाचे न नचावे केहू पैसा नचावेला. जैसे गीत उन की इसी राह को आगे बढ़ाते थे. हां, बालेश्वर के यहां जो प्रेम है उस में मुहम्मद खलील वाला ‘डेप्थ’ या ‘ टिंच’ नदारद है. वह ‘पन’ गायब है. बल्कि कई बार वह प्रेम ‘श्रृंगार’ की आड़ में डबल मीनिंग की डगर थाम लेता है. जैसे उन का एक गाना है, ‘लागता जे फाटि जाई जवानी में झूल्ला/ आलू केला खइलीं त एतना मोटइलीं/ दिनवा में खा लेहलीं दू-दू रसगुल्ला!’ या फिर ‘ खिलल कली से तू खेलल त लटकल अनरवा का होई/

मनोज तिवारी
मनोज तिवारी
कटहर क तू खइलू त हई मोटका मुअवड़वा का होई.’ मुहम्मद खलील के गीतों में विरह भी एक सुख की अनुभूति देता है लेकिन बालेश्वर के यहां यह अनुपस्थित है. उन के यहां प्रेम में अनुभूति की जगह तंज और तकरार ज़्यादा है.

जैसे उन के कुछ युगल गीत हैं, ‘हम कोइलरी चलि जाइब ए ललमुनिया क माई’ या ‘अंखिया बता रही है लूटी कहीं गई है’ या ‘ अपने त भइल पुजारी ए राजा, हमार कजरा के निहारी ए राजा.’ या फिर आव चलीं ए धनिया ददरी क मेला.’ एक समय ददरी के मेला को ले कर ‘हमार बलिया बीचे बलमा हेराइल सजनी गा कर बालेश्वर ने उस औरत की व्यथा को बांचा था जो मेले में पति से बिछड़ जाती है. और उस में भी जब वह टेक ले-ले कर गाते, ‘धई-धई रोईं चरनियां तो गाने का भाव द्विगणित हो जाता था. और जब जोड़ते थे, ‘लिख के कहें बलेस्सर देख नयन भरि आइल सजनी !’ तो सचमुच सब के नयन भर जाते थे. एक गाना वह और गाते थे शादी में जयमाल के मौके पर, ‘केकरे गले में डारूं हार सिया बऊरहिया बनि के.’ कई बार मैं ने देखा दुल्हने सचमुच भ्रम में पड़ जाती थीं. असमंजस में आ जाती थीं. तो यह बालेश्वर की गायकी का प्रताप था. पर जल्दी ही वह ‘नीक लागे तिकुलिया गोरखपुर क’ पर आ गए. और फिर जब से लइकी लोग साइकिल चलावे लगलीं तब से लइकन क रफ़्तार कम हो गइल’ या ‘चुनरी में लागता हवा, बलम बेलबाटम सिया द.’ जैसे गीत भी उन के खाते में दर्ज हैं. ‘फगुनवा में रंग रसे-रसे बरसे’ ‘ सेज लगौला , सेजिया बिछौला हम के तकिया बिना तरसवला, बलमुआ तोंहसे राजी ना/ बाग लगौला, बगैचा लगौला, हम के नेबुआ बिना तरसवला, बलमुआ तोंहसे राजी ना !’ जैसे कोमल गीत भी बालेश्वर ने गाए हैं. पर बाद में उन से ऐसे गीत बिसरने लगे और कहरवा जैसी धुन को उन्हों ने पंजाबी गानों की तर्ज़ पर फास्ट म्यूजिक में रंग दिया. बाज़ार उन पर हावी हो गया.

‘बाबू क मुंह जैसे फ़ैज़ाबादी बंडा, दहेज में मांगेलें हीरो होंडा’ जैसे गीत गाने वाले बालेश्वर मंडल-कमंडल की राजनीति भी गाने लगे. ‘मोर पिया एमपी, एमएलए से बड़का/ दिल्ली लखनऊआ में वोही क डंका/ अरे वोट में बदली देला वोटर क बक्सा !’ जैसे गाने भी वह ललकार कर गाने लगे. बात यहीं तक नहीं रूकी. वह तो गाने लगे, ‘बिगड़ल काम बनि जाई, जोगाड़ चाही.’ बालेश्वर कई बार समस्याओं को उठा कर उन पर भिखारी ठाकुर की तर्ज़ पर प्रहार भी करते हैं. लेकिन मनोज तिवारी सम्स्याओं का जो मार्मिक व्यौरा अपने गानों में बुनते हैं वह कई बार दिल दहला देने वाला होता है. अकादमिक पढाई-लिखाई और शास्त्रीय रियाज़ तथा मीठी आवाज़ से लैस मनोज तिवारी भोजपुरी गायकी में दरअसल खुशबू भरा झोंका ले कर आए. भोजपुरी की माटी की सोंधी महक वाला झोंका. जो कि भोजपुरी समाज के बहाने पूरा का पूरा चित्र ले कर आता है.कहूं कि मनोज तिवारी गीत नहीं दृश्य रचते और गाते हैं.तिस पर उन की आवाज़ में मिठास भी है और बोल में पैनापन भी. ‘बीए का कै लेहलीं/ समस्या भारी धै लेहलीं/ समस्या भारी धै लेहलीं/कि देहियां तुरे लगलीं हो/ अरे कलेक्टरे से शादी करिहैं उडे़ लगलीं हो.’ खुद के लिखे इस गीत में मनोज तिवारी ने कस्बों, गांवों के मध्यवर्गीय परिवारों में लड़की के पढ़-लिख लेने के बाद उपजी शादी की समस्या और दूसरी तरफ़ लड़की के सपनों का इस विकलता से ब्‍यौरा परोसा है कि मन हिल जाता है. लड़की की शादी जाहिर है कलक्टर से नहीं हो पाती. बात डाक्टर, इंजीनियर से होते हुए मास्टर तक जाती है और बात फिर भी नहीं बनती तो, ‘कइसे बीती ई उमरिया अंगुरिया पर जोडे़ लगलीं हो.’ पर आ जाती है.

इसी तरह, ‘असीये से कइ के बीए बचवा हमार कंपटीशन देता’ गीत में मनोज तिवारी ने बेरोजगारी की मुश्किल भरी सीवनों को ऐसा जोड़ा है कि वह मील का पथर वाला गाना बन जाता है. बेरोजगारी का ऐसा सजीव खाका कहानियों में तो मिलता है लेकिन किसी भी लोक भाषा के गाने में संभवत:

निरहुआ
दिनेश लाल यादव
पहली बार मिला है और अपनी पूरी कोमलता और टटकेपन के साथ. इसी तरह मनोज तिवारी ने ‘मंगरूआ बेराम बा’ में चुटकी ले – ले कर जो दारूण गाथा परोसी है वह गांव से महानगर के बीच पनप रहे संत्रास का संलाप भर नहीं है, यह एक निरंतर दुरूह होते जा रहे समाज की महागाथा भी है. ‘चलल कर ए बबुनी ओढ़नी संभाल/ केकर-केकर मुंह रोकबू सैंडिल उतारि के.’ जैसे गानों में मनोज छींटाकशी भी छूते हैं और विसंगति भी, यह गीत उन के पुराने गीत, ‘हटत नइखे भसुरा, दुअरिये पर ठाड़ बा’ की भी याद दिलाता है. ‘का मिलबू रहरिया में/ आव ले चलीं तोहके शहरिया में’ या फिर, ‘जवन बाति बा संवरको में ऊ गोर का करी/ जवन कै दिही अन्हार ऊ अंजोर का करी’ और ‘नीमक पर मारि हो गइल’  या फिर मैटर बदलि गइल’ जैसे गाने भी मनोज तिवारी के खाते में हैं. आरोप बालेश्वर की तरह मनोज तिवारी पर भी डबल मीनिंग गानों के गाने का है. और सच यह भी है कि मनोज तिवारी के बाज़ार का रथ बालेश्वर से बड़ा हो गया.

जितना नुकसान भोजपुरी गानों का मनोज तिवारी ने अपने इधर के गाए गानों से किया है उतना शायद किसी और ने नहीं. समझौते बालेश्वर ने भी बाज़ार में जमने के लिए किए थे पर मनोज तिवारी तो जैसे गंगा में नाला और फ़ैक्टरी का कचरा दोनों ही ढकेल दिया. बताइए कि देवी गीत गाने वाले मनोज तिवारी पैरोडी गाने लगे, बात यहीं नहीं रूकी वह तो,’बगल वाली जान मारेली’ गाते-गाते ‘केहू न केहू से लगवइबू, हम से लगवा ल ना’ भी गाने लगे? कौन कहेगा कि बीएचयू के पढे़-लिखे मनोज तिवारी राजन-साजन मिश्र के भी शिष्‍य हैं? और बाद के दिनों में तो पतन की जैसे पराकाष्‍ठा ही हो गई. खास कर भोजपुरी फ़िल्मों में बतौर अभिनेता उन का क्या योगदान है यह तो वह ही जानें पर हम तो यही जानते हैं कि उन की भोजपुरी फ़िल्में भारी बोझ हैं भोजपुरी समाज पर और कि उस में उन के गाए भोजपुरी गाने कोढ़ हैं. पर हां, बाज़ार के तो वह सिरमौर हैं चाहे भोजपुरी की आन- शान बेच कर ही सही. तिस पर उन का दंभ भरा आचरण उन्हें कहां ले जाएगा, कहा नहीं जा सकता. बिग बास में उन का घमंड तो डाली बिंद्रा को झेलने से भी ज़्यादा असहनीय था.

पता नहीं उन के इर्द-गिर्द डटे सलाहकार उन्हें क्यों नहीं बताते कि गायकी खास कर भोजपुरी गायकी घर की वह लाज है जो सड़क पर नहीं इतराती फिरती. न ही नेताओं, अधिकारियों के पैर छू कर संभलती-संवरती है. उस का दर्प, उस का गुरूर अपनी मर्यादा, अपनी लाज, अपना संस्कार ही है. और भोजपुरी ही क्यों किसी भी भाषा का यही मिज़ाज़ है. एक वाकया देखिए याद आ गया. जो कभी सपन जगमोहन सुनाते थे. कि वह लखनऊ में भातखंडे में पढ़ते थे. अचानक एक दिन एक व्यक्ति आया. लगा गाना सीखने. कोई पंद्रह दिन में ही सीख कर वह जाने लगा और आचार्य ने उस की बड़ी तारीफ की और कहा कि बहुत अच्छा सीख लिया. वह चले गए तो हम कुछ विद्यार्थियों ने ऐतराज़ जताया कि, ‘ वाह साहब हम लोग इतने समय से सीख रहे हैं और नहीं सीख पाए. और यह जनाब पंद्रह दिन मे सीख गए?’ आचार्य ने संयम बनाए रखा. नाराज नहीं हुए. सिर्फ़ इतना भर पूछा कि, ‘पता है कि वह कौन थे?’  सब लोग बोले कि, ‘नहीं.’ आचार्य ने बताया कि, ‘कुंदन लाल सहगल थे.’ और जोड़ा,’बाबुल मोरा नइहर छूटो ही जाए में अवधी का टच सीखना था. और रियाज़ करना था.’ सब के मुंह सिल गए थे. कि इतना बड़ा कलाकार हम लोगों के बीच रहा और पता भी नहीं चला? पर मनोज तिवारी? जब तक रहे बिग बास में आग मूतते रहे. जाने कैसे वह घर में रहते होंगे. इतना अहंकार? अहंकार तो बडे़-बडे़ लोगों को लील जाता है.  क्या वह यह नहीं जानते?

खैर बात भोजपुरी गायकी की हो रही थी. माफ़ करें थोड़ा विषयांतर हो गया. जो भी हो भिखारी ठाकुर की गाई गई बहुतेरी धुनों और उन के गानों का इस्तेमाल फ़िल्मों में हुआ है, बालेश्वर के भी कुछ गाने फ़िल्मों में चोरी-चोरी गए. शारदा सिन्‍हा ने भी फ़िल्मों के लिए गाया है. मनोज तिवारी ने भी. पर किसी पर ऐसे आरोप नहीं लगे. मनोज पर ही लगे. किसिम-किसिम के आरोप. यहीं पर मुहम्मद खलील याद आ जाते हैं. याद आती है उन की गायकी, ‘कवने अतरे में समइलू आहिहो बालम चिरई!’

पवन सिंह
पवन सिंह
दरअसल किसिम-किसिम के दबाव झेलती भोजपुरी गायकी अब जाने किस अतरे में समाती जा रही है, जहां से उसे गहमरी जी की नायिका की तरह खोज पाना दुरूह होता जा रहा है. विंध्यवासिनी देवी के वो गाए गाने, ‘हे संवरो बहि गै पीपर तरे नदिया!’ या ‘ चाहे भइया रहैं, चाहे जायं हो, सवनवा में ना जइबों ननदी ‘ जैसा टटकापन अब भोजपुरी गीतों से बिसरता जा रहा है. यहां तक कि कभी मज़रूह सुलतानपुरी ने एक भोजपुरी फ़िल्मी गाना लिखा था जिसे लता मंगेशकर ने चित्रगुप्त के संगीत निर्देशन में गाया था, ‘लाले-लाले ओठवा से बरसे ला ललइया हो कि रस चुवेला, जइसे अमवा के मोजरा से रस चुवेला !’ की मिठास आज भी मन लहका देती है. पर अफ़सोस कि यह मिठास भी अब भोजपुरी गानों में नहीं चूती! तो इस नई सदी के डाटकाम युग में भोजपुरी गानों का आगे क्या हाल होगा यह तो समय बताएगा.

फ़िलहाल तो मनोज तिवारी की गाई एक भोजपुरी गज़ल यहां मौजू है: अपने से केहू आपन विनाश कै रहल बा पंछी शिकारियन पर विश्वास कै रहल बा.’ सचमुच सोच कर कई बार डर लगता है कि भोजपुरी गानों के साथ कहीं यही तो नहीं हो रहा? बाज़ार के दबाव की आड़ में. मज़रूह के शब्दों में भोजपुरी गानों का दर्द कहूं तो, ‘लागे वाली बतिया न बोल मोरे राजा हो करेजा छुएला! ‘फेंक देहलैं थरिया, बलम गइलैं झरिया, पहुंचलैं कि ना! उठे मन में लहरिया, पहुंचलें कि ना!’ जैसे मार्मिक गाने या फिर ‘आधी-आधी रतिया में बोले कोयलिया, चिहुंकि उठे गोरिया सेजरिया पर ठाढी.’ जैसे गानों से चर्चा में आए मदन राय भी जल्दी ही बाज़ार के हवाले हो गए. डबल मीनिंग की राह से तो बचे पर मुहम्मद खलील के मशहूर गाने कौने खोंतवा में लुकइलू, आहिहो बालम चिरई को गाया. इस गाने में गायकी का वह रस तो सुखाया ही जो खलील बरसाते हैं,  अंतिम अंतरे में गाने के बोल ही बदल कर अर्थ का अनर्थ कर देते हैं. भोलानाथ गहमरी ने जैसा लिखा है, और खलील ने गाया है कि, ‘सगरी उमिरिया धकनक जियरा, कबले तोंहके पाईं’ पर मदन राय गाते हैं,’सगरी उमिरिया धक्नक जियरा कइसे तोंहके पाईं.’  तो कोई क्या कर लेगा? ऐसे ही और गानों में भी सुर का मिठास जिसे कहते हैं, वह नहीं भर पाते. जैसे कि शंकर यादव हैं. उन के सुर में मिठास जैसे ठाठ मारता है. ‘ससुरे से आइल बा सगुनवा हो, ए भौजी गुनवा बता द.’ जैसे गाने जब वह चहक कर गाते हैं तो मन लहक जाता है.

पर दिक्कत यह है कि बालेश्वर की तरह शंकर भी आरकेस्ट्रा के रंग-ढंग में स्ज-संवर कर अपने को बिलवा देते हैं, अपनी गायकी की भ्रूण हत्या जैसे करने लगते हैं तो तकलीफ होती है. यही हाल सुरेश कुशवाहा का है. वह गाते तो हैं कि, ‘आ जइह संवरिया/ बंसवरिया मोकाम बा.’ पर वह भी आर्केस्ट्रा के मारे हुए हैं. हालां कि गोपाल राय इन सब चीज़ों से बचते हैं. और अपने गानों में सुकुमार भाव भी भरते हैं, ‘चलेलू डहरिया त नदी जी क नैया हिलोर मारे, करिअहियां ए गोरिया हिलोर मारे’ जैसे गीतों में वह बहकाते भी हैं और चहकाते भी हैं. तो आनंद द्विगुणित हो जाता है. जैसे कभी बालेश्वर से उन का स्टारडम आहिस्ता-आहिस्ता मनोज तिवारी ने छीन लिया था, वैसे ही मनोज तिवारी का स्टारडम इन दिनों दिनेश लाल यादव निरहुआ लगभग छीन चले हैं. पर उन की डगर की शुरुआत ही डबल मीनिंग गाने से हुई है, ‘दुलहिन रहै बीमार निरहुआ सटल रहै/ मंगल हो या इतवार, घर में घुसल रहै.’ या फिर मलाई खाए बुढ़वा जैसे गानों से ‘शोहरत’ कमा कर बाज़ार पर सवार हुए निरहुआ की भी बीमारी पैसा ही है. भोजपुरी की हदें लांघ कर तमिल- तेलुगू तक पहुंच गए हैं, लेकिन स्टारडम में भले आगे हों गायकी की गलाकाट लड़ाई में इस वक्त निरहुआ के भी कान काटने वाले लोग आ गए हैं.

पवन सिंह गा रहे हैं, ‘तू लगावेलू जब लिपिस्टिक/ हिलेला आरा डिस्टिक/ लालीपाप लागेलू/ कमरिया करे लपालप/ज़िला टाप लागेलू’ या फिर नाहीं मांगे सोना चांदी/ नाहीं मांगे कंगना/ रहत हमरे आंखि

भरत
भरत शर्मा
के सोझा परदेसी मोरे सजना.’ एक खेसारी लाल यादव हैं. वह भी गा रहे हैं, ‘ सइयां अरब गइलैं ना/ देवरा चूसत ओठवा क ललिया हमार/ देवरा चूसत बा.’ गुड्डू रंगीला को आप सुन ही रहे हैं, ‘गोरिया हो रसलीला कर/ तनी सा जींस ढीला कर !’या फिर, ‘हाय रे होठलाली, हाय रे कजरा/ जान मारे तोहरी टू पीस घघरा.’मनोज तिवारी की तरह दिवाकर दुबे भी कभी देवी गीत गाते थे. फिर वह मनोज तिवारी की ही तरह पैरोडी पर आ गए. ‘बहुत प्यार करते हैं पतोहिया से हम’ या मजा मारे बुढ़वा पतोहिया पटा के’ और कि, ‘उठा ले जाऊंगा रहरिया में/देखती रह जाएंगी अम्मा तुम्हारी.’ राधेश्याम रसिया गा रहे हैं, ‘बंहियां में कसि के सईयां मारे लैं हचाहच’ तो सानिया को सुनिए, ‘मुर्गा मोबाइल बोले चोली में कुकुहू कू/ दाना खइबे रे मुर्गवा कुकुहू कू’ या फिर, ‘चुभुर-चुभुर गडेला ओनचनवा ए भौजी.’ कलुआ को सुनिए,’ लगाई देईं/ चोलिया में हुक राजा जी/ कई दीं एक गो पीछवा से चूक राजा जी! ‘ साथ ही सकेत होता राजा जी, दूसर ले आ दीं.’  विनोद राठौर तो, ‘ तोहार लंहंगा उठा देब रीमोट से’ तक आ गए हैं. संपत हरामी जैसे लोगों की गायकी तो हम यहां कोट भी नहीं कर सकते.

गरज यह कि भोजपुरी गानों की मान-मर्यादा, मिठास और सांस इस कदर पतित हो गए हैं कि वह समय दूर नहीं जब भोजपुरी गाने भी लांग-लांग एगो की शब्दावली में आ जाएंगे. लोग कहेंगे कि हां, भोजपुरी भी एक भाषा थी जिस में लोग अश्लील गाना गाते थे. सत्तर-अस्सी के दशक में जब बालेश्वर भोजपुरी का बिगुल फूंक रहे थे या मुहम्मद खलील भोजपुरी गीतों में रस भर रहे थे, उन की प्राण-प्रतिष्‍ठा कर रहे थे तब भी अश्लील और बेतुके गीतों का दौर था. पर छुपछुपा के.’तनी धीरे-धीरे धंसाव कि दुखाला रजऊ’या या फिर मोट बाटें सइयां, पतर बाटी खटिया’ या फिर तोरे बहिनिया क दुत्तल्ला मकान मोरी भौजी जैसे गाने थे चलन में. जिस के चलते बालेश्वर ने तो सम्झौते किए पर खलील जैसे गायकों ने नहीं. आज भी एक गायक हैं रामचंद्र दुबे. आज की तारीख में भोजपुरी गायकी के सर्वश्रेष्‍ठ गायक. ईश्वर ने उन्हें सुर भी दिया है और गाने भी. और वह जब ललकार कर गाते हैं तो मन मगन हो जाता है. पर जो एक चीज़ है समझौता. वह उन्हों ने नहीं किया अपनी गायकी में. एक समय ईटीवी पर फोक जलवा में बतौर जज जब वह आते थे तब महफ़िल लूट ले जाते थे. अब महुआ पर रामायण बांचते हैं और कि कानपुर में भी प्रवचन से गुज़ारा करते हैं. पर बाज़ार की ताकत देखिए कि रामचंद्र दुबे की एक भी सीडी या कैसेट बाज़ार में नहीं हैं. बताइए मुहम्मसद खलील या रामचंद्र दुबे जैसे श्रेष्‍ठ गायकों की सीडी या कैसेट बाज़ार में नहीं है. पर संपत हरामी या कलुआ या इन-उन जैसे गायकों की सीडी से बाज़ार अटा पड़ा है. हर चीज़ की हद होती है. भोजपुरी गायकी का बाज़ार भी अब अपनी हदें पार कर रहा है. नतीज़ा सामने है. टी सीरिज़ या वेब जैसी कंपनियां जो भोजपुरी गानों का व्यवसाय करती हैं आज बाज़ार में भारी सांसत में हैं. अब की होली में अश्लील गानों की सीडी पिट जाने से भारी नुकसान में आ गई हैं. हालत यह है कि कलाकारों की सीडी जारी करने के लिए यह कंपनियां सीडी और एक लाख रूपए मांग रही हैं, कलाकारों से. और बिलकुल नए कलाकारों को तो फिर भी एंट्री नहीं है.

अब कुछ गायिकाओं का भी ज़िक्र ज़रूरी है. शारदा सिन्‍हा, कल्पना, मालिनी अवस्थी और विजया भारती पहली पंक्ति में हैं. शारदा सिन्‍हा के पास एक से एक बेजोड़ गाने है. एक समय जब पॉप गीतों का दौर आया था तो शारदा सिन्‍हा ने समझौता करने से इनकार करते हुए कहा था, ‘ई पाप भोजपुरी में कहां समाई? ई त पाप हो जाई!’ दुर्भाग्य से पुरुष गायकों ने इस तथ्य को नज़रअंदाज़ किया,

शारदा
शारदा सिन्‍हा
नतीज़ा सामने है.शारदा सिन्‍हा ने अभी भी और जोड़-तोड़ भले किया हो, अपनी गायकी में अपनी गमक बाकी रखी है. अपनी रौनक बचा रखी है.’हम त मंगलीं आजन-बाजन सिंहा काहें लवले रे/ फूंकब तोहार दाढी में बंदूक काहें लवले रे’  इस का सब से बड़ा उदाहरण है. हर्ष की बात है कि मालिनी अवस्थी और विजया भारती ने भी तमाम दबाव के बावजूद अपनी गायकी में लोच तो बरकरार रखा है पर लोचा नहीं आने दिया है. पर एक बड़ी दिक्कत यह है कि सीडी के बाज़ार में इन दोनों की भी धूम नहीं है. विजया भारती एक अच्छी गायिका तो हैं ही कवयित्री भी हैं और अपने ही गाने गाती हैं. लाख फ़रमाइश हो पर दूसरों के गाए गाने नहीं गाती हैं. पर ले दे कर स्टेज शो और महुआ पर बिहाने-बिहाने और भौजी नंबर एक में ही सिमट कर वह रह गई हैं.

यही हाल मालिनी अवस्थी का है. वह भी महोत्सवों और स्टेज शो तक सीमित हैं. मालिनी दूसरों के गाए गाने गाने में गुरेज नहीं करतीं पर अपनी गायकी में मर्यादा की एक बड़ी सी रेखा भी खींचे ज़रूर रहती हैं. हालां कि कई बार वह इला अरूण की तर्ज़ पर स्टेज परफ़ार्मर बनने की दीवानगी तक चली जाती हैं और ‘काहे को व्याही विदेश’ की आकुलता भी बोती हैं पर ‘सैयां मिले लरिकइयां मैं का करूं’ के मोह से आगे नहीं निकल पातीं. कभी राहत अली की शिष्‍या रही मालिनी बाद के दिनों में गिरिजा देवी की शिष्‍या हो गईं. राहत अली गज़ल के आदमी थे और गिरिजा देवी शास्त्रीय गायिका. कजरी, ठुमरी, दादरा, चैता गाने वाली. मालिनी खुद भातखंडे की पढ़ी हैं. पर यह सब भूल-भुला कर, मालिनी अपनी लोक गायकी में दोनों गुरूओं की शिक्षा को परे रख शो वुमेन बन चली हैं क्या शो बाज़ी को ही पहला काम बना बैठी हैं. वह भूल गई हैं कि एक किशोरी अमोनकर भी हुई हैं जो प्लेबैक भी फ़िल्मों में इस लिए छोड़ बैठीं कि इस से उन के गुरु को ऐतराज था. हृदयनाथ मंगेशकर कहते हैं कि अगर पिता जी जीवित रहे होते तो मेरे घर में कोई प्लेबैक नहीं गाता. लता मंगेशकर भी नहीं. यह बात मुझ से एक इंटरव्यू में उन्हों ने खुद कही. पर भातखंडे की पढ़ी-लिखी मालिनी इन सब चीज़ों को भूल-भाल कर बाज़ार के साथ समझौता कर बैठी हैं. स्टेज और पब्लिसिटी की जैसे गुलाम हो चली हैं. उन की गायकी और निखरे न निखरे उन की फ़ोटो अखबारों में छपनी ज़रूरी है. महोत्सवों में उन का पहुंचना ज़रूरी है. मालिनी को कोई यह

मालिनी
मालिनी अवस्‍थी
समझाने वाला नहीं है कि उन की पहचान उन की गायकी से याद की जाएगी, सिर्फ़ मंचीय सक्रियता, चैनलों पर बैठने या शो बाज़ी से नहीं. खास कर तब और जब रोटी-दाल का संघर्ष भी उन के साथ नहीं है. वह सब कुछ भूल कर संगीत साधना कर सकती हैं. और कोई बड़ी गायकी का समय रच सकती हैं.

खैर, कल्पना बेजोड़ गायिका हैं. ‘उतरल किरिनीया चांद से नीनिया के धीरे-धीरे हो’ या नींदिया डसे रे सेजिया, कवनो करे चैना’ या फिर ‘जिनगी में सब कुछ करिह/ प्यार केकरो से न करिह.’ जैसे अविस्मरणीय गीत कल्‍पना के खाते में दर्ज़ हैं. सीडी के बाज़ार में भी वह भारी हैं. पर शारदा सिन्‍हा, विजया भारती या मालिनी अवस्थी की तरह वह गायकी की मान मर्यादा का गुमान बचा कर नहीं रखतीं. अकसर तोड़ बैठती हैं.’ गवनवा ले जा राजा जी!’ तक ही बात रहती तो गनीमत रहती पर बात जब,’ सुन परदेसी बालम/ हम के नाहीं ढीली/ देवरा तूरी किल्ली/ आ जा घरे छोड़ के तू दिल्ली’ या फिर, ‘मिसिर जी तू त बाड़ बड़ा ठंडा’ या फिर ‘जादव जी’ जैसे गीत उन्हें बाज़ार में भले टिका देते हों पर उन की बेजोड़ गायकी में पैबंद बन कर उन्हें धूमिल करते हैं. उन की गायकी की जो साधना है, उन की जो यात्रा है वह खंडित ही नहीं, कहीं ध्वस्त होती भी दीखती है. ऐसे में भले थोडे़ ही समय के लिए गायकी में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने वाली ऊषा टंडन, पद्मा गिडवानी और आरती पांडेय की भी याद आनी स्वाभाविक है. खास कर उन का गाया, ‘का दे के शिव के मनाईं हो शिव मानत नाहीं’ या फिर ‘भूसा बेंचि मोहिं लाइ देव लटकन’ या फिर, ‘पिया मेंहदी ले आ द मोती झील से जा के साइकिल से ना!’ और कि, मोंहिं सैयां मिले छोटे से’ जैसे गानों की याद भी बरबस आ ही जाती है. भले ही इन गायिकाओं का सिक्का बाज़ार में न उछला हो पर गायकी में समझौते नहीं किए इन गायिकाओं ने.

एक बात भी यहां याद दिलाना मौजू है कि लता मंगेशकर ने राज कपूर के कहे से संगम में ‘मैं का करूं राम मुझे बुड्ढा मिल गया’ गा ज़रूर दिया पर उस गाने का मलाल उन्हें आज तलक है कि ऐसा गाना उन्हों ने क्यों गा दिया? ऐसे ही आशा भोंसले को भी मलाल है अपने कुछ गानों को ले कर. खास कर ‘मेरी बेरी के बेर मत तोड़ो, नहीं कांटा चुभ जाएगा.’ पर आज के गायकों को यह एहसास पता नहीं कब आएगा? अभी महुआ पर सुर-संग्राम के दौरान दिखे-सुने कुछ कलाकारों का ज़िक्र भी ज़रूरी है. भोजपुरी गायकी का यह पड़ाव भी दर्ज़ किए बिना आगे की भोजपुरी गायकी की बात बेमानी लगती है. अभी इस का दूसरा सत्र भी अपने मुकाम पर है. पर पहले सत्र में कुछ बहुत अच्छे गायक- गायिका सामने आए हैं. जो भोजपुरी गायकी के बचे रह जाने का विश्वास भी दिलाते हैं. पहले सत्र में

कल्‍पना
कल्‍पना
हालां कि विजेता मोहन राठौर और आलोक कुमार घोषित हुए पर इन में सब से सधा स्वर और रियाज़ दिखा आलोक पांडेय का. अदभुत कह सकते हैं. हालां कि गायकी का आकलन एसएमएस से होना भी गायकी की पराजय ही है फिर भी जो हमारे सामने है उस में से छांट-बीन तो कर ही सकते हैं.

अनामिका सिंह और प्रियंका सिंह जैसी गायिकाओं भी अगर समय ने इंसाफ किया तो श्रेया घोषाल की तरह आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता. अब की के सत्र में रघुवीर शरन श्रीवास्‍तव और ममता राऊत भी हैं ही मैदान में. आगे और भी प्रतिभाएं आएंगी और भोजपुरी गायकी के नए कीर्तिमान रचती हुई भोजपुरी को अश्लीलता और फूहड़ गानों की खोह से बाहर निकालेंगी ऐसी उम्मीद तो है. मुहम्मद खलील एक पचरा गाते थे, ‘विनयी ले शरदा भवानी/ सुनी ले तू हऊ बड़ी दानी !’ आगे वह जोड़ते थे, ‘माई मोरे गीतिया में अस रस भरि द जगवा के झूमे जवानी !’ हमारी भी यही कामना है कि भोजपुरी गीतों की लहक और चहक में जगवा की जवानी झूमे और कि यह जो बाज़ार का घटाटोप अंधेरा है वह टूटे.   याद दिलाना ज़रूरी है कि भले कुछ फ़िल्मों ही में सही लता मंगेशकर, मुहम्मद रफ़ी, मन्ना डे, मुकेश,  तलत महमूद, हेमलता, अलका याग्यनिक और उदित नारायन ने जो भोजपुरी गाने गाए हैं उन में किसी भी तरह का कोई खोट आज तक कोई नहीं ढूंढ पाया है. वह गाने आज भी अपनी मेलोडी में अप्रतिम हैं, बेजोड़ हैं. उन का कोई सानी नहीं है.

लता और तलत का गाया लाले-लाले ओठवा से बरसे ला ललइया हो कि रस चुएला हो या फिर हे गंगा

विजया
विजया भारती
मैया तोंहें पियरी चढइबों हों या मन्ना डे का गाया हंसि-हंसि पनवा खियवले बेइमनवा हो या रफ़ी का चीरई क जीयरा उदास हो, या फिर मुकेश का हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा हो, हेमलता का पहुना हो पहुना या फिर अभी अलका याग्यनिक और उदित का गाया सोहर जुग-जुग जीयेसु ललनवा हो. ऐसे बहुतेरे गीत हों इन गीतों में आज भी उन की गायकी का टटकापन किसी महुआ की तरह ही टपकता है, चूता है तो चित्रगुप्त की याद आ जाती है, रवींद्र जैन की याद आ जाती है. इस लिए भी कि आज के भोजपुरी गानों का संगीत भी इस कदर बेसुरा हो चला है कि मत पूछिए. शादी-बारात में पी-पा कर कुछ लड़के उस के शोर में डांस तो कर सकते हैं पर आंख बंद कर सुनने का सुख तो हरगिज़ नहीं ले सकते. बालेश्वर के एक पुराना गाना याद आता है, ‘ जे केहू से नाईं हारल ते हारि गइल अपने से. सचमुच भोजपुरी गायकी अपनों से ही हार गई है.

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

रेखा : शोख हसीना के विरह गीत

दयानंद  पांडेयपहले शोख फिर सेक्स बम से अभिनय की बढ़त बनाने वाली रेखा की शोहरत एक संजीदा अभिनेत्री के सफ़र में बदल जाएगी यह भला किसे मालूम था? सावन भादो से शुरुआत करने वाली रेखा ने जब चार दशक पहले सेल्यूलाइड की दुनिया में सर्राटा भरा था तो लोग कहते थे कि उसे शऊर नहीं. न अभिनय का न जीने का. लेकिन वह तब की तारीख थी. अब की तारीख में रेखा की कैफ़ियत बदल गई है. अभिनय का शऊर और अपने जादू का जलवा तो वह कई बरसों से जता ही रही थीं, जीने की ललक और उसे करीने से कलफ़ देने का शऊर भी उन्हें अब आ ही गया है.

वह जब तब इस की कैफ़ियत और उस की तफ़सील देती, बांचती और परोसती ही रहती हैं. कई बार तो मुझे लगता है कि काश कि मैं औरत होता. और कि औरत हो कर भी मैं रेखा होता. सचमुच उन से बड़ा रश्क होता है. रश्क होता है उन के जीवन जीने के ढंग से, उन के प्यार करने और उस पर कुर्बान हो जाने के रंग से. उन के उस ज़ज़्बात और खयालात और उन के अंदाज़ से. इतना कि आज भी, ‘रेखा ओ रेखा, जब से तुम्हें देखा, खाना-पीना, सोना दुश्वार हो गया, मैं आदमी था काम का बेकार हो गया.’ टूट कर गाने को दिल करता है. मैं ने बहुतेरी कहानियां और उपन्यास लिखे हैं. पर दो चीज़ों पर लिखने की हसरत बार-बार बेकरार करती है. एक तो बुद्ध को ले कर एक उपन्यास लिखने की. दूसरे रेखा की बायोग्राफी या उन के जीवन पर एक वृहद उपन्यास लिखने की. आप कहेंगे कि क्या तुक है? बुद्ध और रेखा? दोनों दो द्वीप. कोई ओर छोर नहीं.

पर सच मानिए जितना मैं ने बुद्ध और रेखा को जाना है, दोनों मुझे बहुत पास-पास दिखते हैं. दोनों की यातना में काफी साम्य है. यह प्यार भी एक तपस्या है. बतर्ज़ ये भोग भी एक तपस्या है तुम त्याग के मारे क्या जानो!  दोनों की दृष्टि आनंद की ओर है. दोनों ही जो घर फूंके आपना, चले हमारे साथ वाले हैं. खैर यह द्वैत-अद्वैत, दुविधा-असुविधा मेरी अपनी है. मुझे ही भोगने-भुगतने दीजिए. आप तो यहां रेखा, हमारी-अपनी रेखा पर गौर कीजिए. सोचिए और देखिए कि वह इस सदी के सो काल्ड महानायक से कैसे तो टूट कर प्यार करती हैं. टूट कर चूर-चूर हो जाती हैं पर शायद टूटती नहीं. और कि जुड़ी रहती हैं. प्यार के उस अटूट डोर से बंधी जुडी सिहरती- सकुचाती- ललचाती और कि अपने प्यार को जताती मुस्कुराती रहती हैं. उस अकेली, प्यार करती महिला का दुख और सुख निहारने में जाने कितनी आंखें बिछ-बिछ जाती हैं. बहुत सारे सिने समारोह इस के गवाह हैं. चैनलों के कैमरे सायास अमिताभ बच्चन और रेखा पर डोलते ही रहते है. अमिताभ तो अभिनेता बन जाते हैं और ऐसे रेखा-अमिताभ व्यवहार करते हैं, ऐसे पेश आते हैं गोया रेखा वहां अनुपस्थित हैं या फिर वह उन्हें जानते ही नहीं. बतर्ज़ मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं. वो जा रहे हैं ऐसे हमें जानते नहीं.

पर रेखा? वह तो अंग-अंग से, रोम-रोम से अपनी उपस्थिति जताती, अपना प्यार छलकाती अपने पूरे वज़ूद, अपने पूरे रौ में रहती हैं. एक सिने समारोह का वह नज़ारा भूले नहीं भूलता कि ऐश्वर्या, अभिषेक बच्चन और अमिताभ बच्चन एक साथ आगे की पंक्ति में बैठे हुए थे. रेखा अचानक आईं और उन की ओर बढ़ चलीं. किसी दुस्साहसी प्रेमिका की तरह. गोया वह कोई वास्तविक दृश्य न हो कर फ़िल्मी दृश्य हो. वह आ कर ऐश्वर्या से गले लगीं, अभिषेक से गले लगीं और अभी अमिताभ की बारी आने ही वाली थी कि वह उठ कर ऐसे भाग चले जैसे वहां कोई सुनामी आ चली हो. कैमरों ने एक-एक स्टेप उन का कैद किया.चैनलों ने बार-बार इस दृश्य को दिखाया, पत्रिकाओं ने छापा. अब रेखा के प्यार के इस चटक रंग को आप किसी टेसू के फूल में वैसे ही तो घोल कर भूल नहीं ही जाएंगे? शोखियों मे तो घोलेंगे ही प्यार के फूल के इस शबाब को. जो हो रेखा के इस प्यार की इबारत को बांचना अभिभूत करता है.

याद कीजिए उन दिनों को. जब दो अनजाने फ़िल्म रिलीज़ हुई थी और अमिताभ जया को भुला कर रेखा के रंग में रंग गए थे. इतना कि तब चर्चा चली थी कि अमिताभ रेखा की शादी हो गई. खैर शादी हुई ऋषि कपूर और नीतू सिंह की. रेखा-अमिताभ भी आए. रेखा के माथे पर सिंदूर, पांव में बिछिया पर लोगों ने न सिर्फ़ गौर किया बल्कि अखबारों में ऋषि- नीतू की शादी की जगह रेखा-अमिताभ की फोटो छपी. जिस में रेखा के माथे पर लगे सिंदूर की शोखी कुछ ज़्यादा ही शुरूर में थी. खैर रेखा ने इस के पहले भी प्यार किए थे. अच्छे-बुरे. बाद में भी किए. पर वो सौतन की बेटी में उन्हीं पर फ़िल्माया एक गाना है – हम भूल गए रे हर बात मगर तेरा प्‍यार नहीं भूले. झूले तो कई बाहों में मगर तेरा साथ नहीं भूले. के शब्दों का ही जो सहारा लें तो कहें कि वह अमिताभ बच्चन को, उन के साथ को अभी तक नहीं भूली है, आगे भी खैर क्या भूलेंगी? और अब तो उड़ती सी खबर आए भी कुछ दिन हो चले हैं कि वह अमिताभ बच्चन के साथ किसी फ़िल्म में उन की पत्नी की भूमिका में आ रही हैं. खुदा खैर करे. और कि वह फ़िल्म आए ही आए.

अब लगभग विधवा जीवन [हालां कि उन के जीवन व्यवहार में यह वैधव्य कहीं दीखता नहीं, माथे पर चटक सिंदूर मय मंगलसूत्र के अभी भी खिलता है.] जी रही रेखा, हालां कि मुकेश अग्रवाल से उन के ही फ़ार्म हाऊस में हुए प्रेम फिर शादी और फिर मुकेश की आत्म हत्या प्रसंग को एक क्षणिक सुनामी मान भूल जाया जाए तो भी रेखा ने दरअसल जैसे ढेरों रद्दी फ़िल्मों में काम किया, कमोवेश उसी अनुपात में इधर-उधर मुंह भी खूब मारा. जिस की कोई मुकम्मल फ़ेहरिस्त नहीं बनती. ठीक वैसे ही जैसे उन्हों ने गिनती की कुछ श्रेष्‍ठ फ़िल्में कीं कुछेक फ़िल्मों में सर्वश्रेष्‍ठ अभिनय किया. कमोबेश इसी अनुपात में सर्वश्रेष्‍ठ प्रेम भी उन्हों ने किया और डंके की चोट पर किया. किरन कुमार, विनोद मेहरा, राज बब्बर, जितेंद्र, राजेश खन्ना, विनोद खन्ना, धर्मेंद्र, शैलेंद्र सिंह, अमिताभ बच्चन और संजय दत्त, फ़ारूख अब्दुल्ला जैसे उन के प्रेम प्रसंग के तमाम बेहतरीन पड़ाव हैं. ठीक वैसे ही दो अंजाने, खूबसूरत, घर, उमराव जान, उत्सव और इज़ाज़त उन की बुलंद अभिनय यात्रा के उतने ही महत्वपूर्ण बिंदु हैं. बहुत ही महत्वपूर्ण.

दरअसल 1975 से 1985  तक का समय रेखा के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है. इसी बीच वह अपने प्रेम प्रसंग के सब से महत्वपूर्ण पड़ाव अमिताभ बच्चन से जुड़ीं और लगभग उन की हमसफ़र बन गईं. इन्हीं दस सालों में उन्हों ने खूबसूरत, उमराव जान, उत्सव जैसी फ़िल्मों में काम किया और अपनी चुलबुली छवि को चूर किया. चूर उन के सपने भी हुए. सिलसिला आई और अमित जिन्हें वह बाद में ‘वो’ तक कहने लगी थीं, पहनने मंगलसूत्र भी लगी थीं, का संग साथ छूट गया. सहारा बने संजय दत्त. इन्हीं दिनों मुजफ़्फ़र अली की उमराव जान आ कर उन्हें जान दे गई थी. क्यों कि तब तक व्यावसायिक सिनेमा में नंबर वन की पोज़ीशन उन से पंगा लेने लगी थी. लेकिन उमराव जान की सादगी ने उन की शान बढ़ा दी थी. तभी एक रोज़ उन की संजय दत्त से शादी की खबर आ गई. दिल्ली के एक सांध्य दैनिक ने सब से पहले यह खबर न सिर्फ़ उछाल कर छापी बल्कि पहले पेज़ पर बैनर बना कर छापी थी मय फोटो के.

मुझे याद है तब प्रसिद्ध फ़िल्म पत्रकार अरविंद कुमार [फ़िल्मी पत्रिका माधुरी के संस्थापक संपादक जो तब सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट के संस्थापक संपादक थे और मैं उन का सहयोगी था तब.] इस खबर से बड़ा उदास हो गए थे. इस लिए नहीं कि रेखा ने अपने से 12-14 बरस छोटे संजय दत्त से शादी कर ली थी. बल्कि इस लिए कि एक अभिनेत्री जो अब अभिनय के शिखर को छू रही थी, शादी के बाद से सेल्यूलाइड की दुनिया को सैल्यूट कर जाएगी. हुआ भी यही. खैर तब की ठुकराई रेखा को फिर व्यापारी मुकेश अग्रवाल की छांव मिली. जो अंतत: मृगतृष्‍णा ही साबित हुई. हालां कि उन्हीं दिनों सारिका जब बिन व्याह के ही कमल हासन के बच्ची की मां बनीं तब रेखा को कुछ लोगों ने कुरेदा तो वह अपने को रोक नहीं पाईं और धैर्य खो रहे लोगों को धीरज बंधाया,’ घबराइए नहीं बिन ब्याही मां नहीं बनूंगी.’ और अपना कहा वह दुर्भाग्य से ब्याह के बाद भी निभा नहीं सकीं. शायद मातृत्व सुख उन के नसीब में नहीं था. वह रेखा जो अपनी ही खिंची-गढ़ी रेखाओं से आडे़- तिरछे, तिर्यक, समानांतर-वक्र करती काटती रही हैं.

खैर, आप सत्तर के दशक की शुरुआत वाली उन की उन फ़िल्मों की याद कीजिए जिन में वह नवीन निश्चल, विश्वजीत, किरन कुमार, रणधीर कपूर, विनोद मेहरा, और फिर जितेंद्र और धर्मेंद्र के साथ हीरोइन रही हैं. जिन में वह महज़ शो-पीस वाली, हीरो के गले से लिपट कर नाच कूद बस गाने गाती होती हैं. खिलंदडी, शोखी और चुलबुलाहट में तर, अभिनय की ऐसी-तैसी करती होती हैं. सावन भादो से ले कर अनोखी अदा, किस्मत तक की उन की फ़िल्मी यात्रा [अभिनय यात्रा नहीं] भी दरअसल दूसरे, तीसरे दर्ज़े की फ़िल्मों में देह दिखाऊ यात्रा भी है. भले ही वह मैक्सी ही क्यों न पहने हों, या साडी ही सही उन के कुल्हे मटकने ही होते थे. भारी-भारी नितंब और स्तन ‘दिखने’  ही ‘दिखने’ होते थे. तब रेखा थुलथुल होती जा रही थीं. बाद में वह न सिर्फ़ वज़न कम करने में लग गईं बल्कि योगा पर भाषण भी भाखने लगीं.

वही रेखा इस के बाद के दौर में अमिताभ बच्चन, जितेंद्र, विनोद खन्ना, शशि कपूर आदि की फ़ेवरिट हिरोइन होते-होते हेमा मालिनी से नंबर वन की पोज़ीशन छीन बैठती हैं. तो लोगों को अचरज होने लगता है. कि अरे ये तो वही रेखा हैं. वह जब जुदाई में जीतेंद्र के साथ बारिश में भीग कर जादू चलाती हुई गाती हैं, ‘मार गई मुझे तेरी जुदाई, डस गई ये तनहाई’ तो सीटियां बजवाती हैं और उसी फ़िल्म में फिर वृद्धा की भूमिका कर वह लोगों से आंसू भी बहवा लेती हैं. बाद में तो जीतेंद्र के साथ ढेरों फ़िल्मों में वह जवानी और बुढ़ापे दोनों की भूमिका में आईं. अमिताभ बच्चन जब नंबर वन हुए तो उन की लगभग हर तीसरी फ़िल्म की हिरोइन रेखा ही हुईं. मुकद्दर का सिकंदर बनीं, वह ही सलामे इश्क मेरी जां ज़रा कुबूल कर ले गाती रहीं. नटवरलाल में परदेसिया ये सच है पिया, सब कहते हैं मैं रेखा ने तेरा दिल ले लिया भी वही गा रही थीं. लेकिन सच यह भी है कि अगर सिलसिला जो इन दोनों की अब तक की अंतिम फ़िल्म है, को छोड़ दें तो अमिताभ के साथ की गई रेखा की फ़िल्मों में रेखा की कोई यादगार या महत्‍वपूर्ण भूमिका याद नहीं आती.

हां, आलाप की याद आती है. शायद इस लिए भी कि अमिताभ की फ़िल्मों में हिरोइन के हिस्से कुछ बचता ही नहीं रहा है. [हालां कि अमिताभ अभिनीत ज़ंज़ीर, अभिमान, शोले और की एक नज़र भी जोड लें में, जया उन की हिरोइन हैं और अपनी उपस्थिति भी दर्ज़ कराती हैं, तो शायद इस लिए भी कि वह पहले से स्थापित और कि बड़ी हिरोइन हैं] तो सिलसिला में अमिताभ के बावजूद रेखा ने अभिनय की रेखाएं गढ़ीं तो सिर्फ़ इस लिए कि यहां विरह उन के हिस्से न था तो भी विरहिणी की सी आकुलता को उन्हें जीना था. जया और संजीव कुमार की उपस्थिति ने उसे और सघन बनाया. ‘नीला आसमां खो गया’ गा के उसे हेर लेना चाहती हैं. ‘कुडी फंसे ना लंबुआ’ के दिनों को फिर से फिरा लेना चाहती हैं. क्यों कि वह विरहिणी हैं पर हिरनियों सी कुलांच भी भरना जानती है. तो यह त्रासद संयोग और उस चरित्र की बुनावट को रेखा से भी सुंदर कोई बीन भी सकता था भला?

दरअसल मुझे लगता है कि रेखा विरह की ही नायिका हैं. जहां-जहां और जब-जब विरह उन के हिस्से आया है, विरहिणी को जिस कोमलता से वह ‘बेस’  देती हैं उन के समय की नायिकाओं में उन के मानिंद कोई और नहीं दीखती. विरहिणी की अकुलाहट की सघनता को घनत्व देने वाली नायिकाएं तो हैं.पर उसे सहजता भरी सादगी भी देने वाली? और उस सहजता में भी चुलबुलापन चुआने वाली? मेरी मंशा यहां त्रषिकेश मुखर्जी की दो फ़िल्मों ‘खूबसूरत’ और ‘आलाप’ की याद दिलाने की है. ‘खूबसूरत’ जब आई तो लोग यकायक चकित हो चले कि क्या यह वही खिलंदड़, थुलथुल [नमक हराम में भी यह रूप था रेखा का.] देह दिखाती, इतराती फिरने वाली रेखा है? ‘खूबसूरत’ तो समूची फ़िल्म ही खूबसूरत थी. पर रेखा? रेखा के तो कैरियर का बदलाव ही इसी फ़िल्म से हुआ जो बाद में कलयुग, उत्सव, उमराव जान और इज़ाज़त में जा पहुंचा.

फिर आई मुज़फ़्फ़र अली की उमराव जान. उमराव जान में उन के हीरो थे फ़ारूख शेख और राज बब्बर. पर जैसे खूबसूरत फ़िल्म रेखा के ही इर्द-गिर्द घूमती थी, उमराव जान में केंद्रीय भूमिका ही उन्हीं की थी. पर जिस लयबद्धता में उमराव जान को उन्हों ने अपने आप में उतारा, जिया और जीवन दिया कोई दूसरी अभिनेत्री उसे वह रंग शायद न दे पाती. उन की विरहिणी का यही शोला ‘उत्सव’ में आ कर भड़क जाता है.  मन क्यों बहका रे बहका आधी रात को गीत में तो  जैसे वह कलेजा काढ़ लेती हैं.शशि कपूर की गिरीश कर्नाड निर्देशित उत्सव हालां कि अपने कुछ उत्तेजक दृश्यों के लिए ज़्यादा जानी गई. और रेखा के बोल्ड सीन के आगे उन का अभिनय लोगों की आंखों में कम ही समा पाया. पर दरअसल रेखा के अभिनय का बारीक रेशा हमें उत्सव में ही मिलता है. अभिनय की जो बेला रेखा ने उत्सव में महकाई है वह हिंदी फ़िल्मों में विरल ही है.

इस के कुछ ही समय बाद आई खून भरी मांग भी तहलका मचा गई थी. और लोगों ने रेखा में बदले की आग ढूंढने की कोशिश की और उस में सफलता भी पा ली. पर अगर आंख भर जो आप ‘खून भरी मांग’ की रेखा को देखें, रेखा की आंखों को देखें तो वहां विरहिणी की ही आंखें, हिरनी ही की आंखें आप को दिखेंगी. मुझे तो रेखा की आंखें दरअसल विरह में डूबी नहीं, बल्कि विरह में बऊराई, विरह में नहाई दीखती हैं. अब यह तो निर्देशक पर मुनसर करता है कि वह उन से क्या करवाता है? आप याद कीजिए मल्टीस्टारर फ़िल्म नागिन की. जिस में रेखा भी हैं. नागिन के दंश में डूबी उन की आंखों में मादकता का महुआ और विरह का विरवा एक साथ वेधता है. तो लोग घायल भी होते हैं और पागल भी. फिर तेरे इश्क का मुझ पे हुआ ये असर है गाना सोने पर सुहागा का काम कर जाता है. होने को इस फ़िल्म में रीना राय, योगिता बाली आदि अभिनेत्रियां भी हैं पर वह, वह कमाल नहीं दिखा पातीं जो रेखा कर गुज़रती हैं.

नहीं, करने को तो उन्हों ने विनोद पांडेय की एक घटिया सी फ़िल्म एक नया रिश्ता राजकिरण के साथ की. पर विनोद पांडेय उन की विरहिणी आंखों को न तो बांच पाए, न व्यौरा दे पाए. जब कि रेखा अपनी शुरुआती फ़िल्म धर्मा तक में- जिस में नवीन निश्चल हीरो हैं, अपनी आंखों का खूब इस्तेमाल किया है. इस फ़िल्म में एक कौव्वाली है, ‘इशारों को अगर समझो, राज़ को राज़ रहने दो. है तो प्राण और बिंदू के हिस्से पर विषय रेखा ही हैं और तिस पर इस में उन की आंखों का ब्‍यौरा बांचना व्याकुल कर जाता है. यहां तक कि कई फिसड्डी फ़िल्मों जैसे कि ‘माटी मांगे खून’ जिस में कि शत्रुघ्‍न सिन्‍हा उन के हीरो हैं या फिर ‘किला’ जिस में दिलीप कुमार उन के हीरो हैं, जैसी बहुतेरी फ़िल्में हैं, जहां उन की आंखों, बौराई आंखों का अच्छा ट्रीटमेंट है. खास कर गुलाम अली द्वारा गाए गीत ‘ये दिल, ये पागल दिल मेरा’ फ़िल्माया भले शत्रु पर गया है पर फ़ोकस रेखा और उन की आंखों पर ही है.

मैं जो बार-बार रेखा की आंखों में विरह की लौ बार-बार जला-जला दिखा रहा हूं तो आप कतई संभ्रम में न पड़ें कि रेखा की आंखें विरह का ही विरवा बांधे रहती हैं हमेशा. ऐसा भी नहीं है. उन की आंखों में मस्ती भी है और मादकता भी भरपूर. तभी तो मुज़फ़्फ़र अली को उमराव जान में शहरयार से रेखा की आंखों की खातिर एक पूरी गज़ल ही कहलवानी पड़ी, ‘इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं.’ बात भी सच है. और यह शम्मअ-ए फ़रोज़ा किसी आंधी से डरने वाली भी नहीं है. यकीन न हो तो किसी अमिताभ बच्चन-वच्चन से नहीं,  शहरयार से पूछ लीजिए. आमीन!

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

बब्बन यादव की पिंकी बनाम लोक कवि की भोजपुरी

दयानंद पांडेयउपन्यास – लोक कवि अब गाते नहीं (11 और अंतिम) :  जाने यह टूटना उनका भोजपुरी भाषा की बढ़ती दुर्दशा को लेकर था या एलबम, सी.डी. के बाजार में अपनी अनुपस्थिति को लेकर था यह समझ पाना खुद लोक कवि के भी वश का नहीं था। उनके वश में तो अब अपने कैंप रेजींडेंस में बढ़ती चोरी को रोक पाना भी नहीं था। बात अब पैसा, कपड़ा-लत्ता और मोबाइल तक ही नहीं रह गई थी।

अब तो गैस सिलिंडर तक उनके यहां से चोरी होने लगे थे। इस चोरी को रोकने के लिए वह कोई प्रभावी कदम नहीं उठा पा रहे थे। इसलिए भी कि लड़कियां उनकी बड़ी कमजोरी बन चली थीं। और कमजोर क्षणों में कोई भी लड़की उनका कुछ भी ले सकती थी, मांग सकती थी। कभी सीधे-सीध तो कभी चोरी छुपे, तो कभी-कभार सीनाजोरी से भी। कई बार तो वह पी कर टुन्न रहते और कोई लड़की मौका देख कर उन की कमजोर नस छूते हुए पूछ लेती,’ गुरु जी, यह चीज हमको दे दीजिए।’ या ‘गुरु जी दस हजार रुपया हमको दे दीजिए!’’ या ‘गुरु जी हम तो फला चीज ले जा रहे हैं।’ जैसे जुमलों को बोल कर कभी धीरे से, कभी फुसफुसा कर ले लेती और लोक कवि कभी ना नुकुर नहीं करते, फराख़ दिल बन बैठते और अंततः मामला चोरी के खाते में दर्ज हो जाता। कई बार यह भी होता कि लोक कवि टुन्नावस्था में सो रहे होते, या अधजगे या अधलेटे होते तो लड़कियां या चेले भी ‘प्रणाम गुरु जी!’ बोल कर कमरे में घुसते। इधर-उधर ताकते झांकते। गुरु जी का कोई प्रति उत्तर न पा कर भी उनका पैर छूते। लोक कवि फिर भी टुन्न पड़े रहते और बोलते नहीं तो चेले या लड़कियां जो भी होते बोलते, ‘लगता है गुरु जी सो गए हैं का?’ फिर भी वह नहीं बोलते तो अपनी सुविधा से वांछित चीज उठा लेते और लेकर निकल लेते यह बोलते हुए, ‘गुरु जी सो गए हैं!’ ‘यह सारे तथ्य, संवाद मय अभिनय के लोक कवि बाकायदा छटक-छटक कर चलते हुए सदृश्य बताते भी। लेकिन किस दिन कौन था, क्या ले गया यह बात वह अमूमन गोल कर जाते। कोई बहुत कुरेदता भी तो वह बात टाल जाते। कहते, ‘जाने दीजिए! अरे, यही सब तो मेहनत करते हैं।’ लड़कियों के लिए कहते, ‘अरे यही सब तो गांड़ हिला-हिला कर नाचती हैं। इन्हीं सबों के बूते तो हमारे पास पोरोगरामों की इतनी बाढ़ लगी रहती है!’

‘क्यों? आप नहीं गाते हैं?’ एक दिन उस ठाकुर पत्रकार ने सवालिया निगाह दौड़ाते हुए कहा, ‘टीम भी आप के नाम से है। आप ही बुक होते हैं। आप ही के नाम से यह सब खाती कमाती हैं।’

‘का बोल रहे हैं बाऊ साहब!’

‘क्यों?’ बाबू साहब गिलास की शराब देह में ढकेलते हुए बोले, ‘मैं तो तथ्य बता रहा हूं।’

‘अइसेहीं अख़बार में रिपोर्टिंग करते हैं आप?’ लोक कवि ने थोड़ा मुसकुराते, हलका सा तरेरते और मीठी मार बोलते हुए अपना सवाल दुहराया, ‘अइसेहीं अख़बार में रिपोर्टिंग करते हैं आप?’

‘क्या मतलब?’ बाबू साहब अचकचाए।

‘मतलब ई कि आप कुछ नहीं जानते हैं।’ लोक कवि बोले तो मिठास घोल कर पर ऐसे जैसे तमाचा मार रहे हों।

‘क्या मतलब?’

‘अब जाने भी दीजिए।’ लोक कवि बोले, ‘कुछ और बात कीजिए।’

‘और क्या बात करें?’

‘कुछ विकास की बात करिए, कुछ राजनीति का बात करिए।’

‘क्यों?’

‘कुछ भी करिए बकिर ई गाना और लड़कियों की बात छोड़ दीजिए!’

‘गाने और लड़कियों की बात तो मैं कर भी नहीं रहा। मैं तो कह रहा था कि आप ही के नाम से सब कुछ होता है। आपका नाम बिकता है। बस! यही तो मैं कह रहा था!’ बाबू साहब अपने को जस्टीफाई करते हुए बोले, ‘और आप मेरी अख़बार में रिपोर्टिंग की बात करने लगे।’ वह बोले, ‘अख़बार में तो मैं दोगलई वाली रिपोर्टिंग करता ही हूं। थोड़े से सच में ज्यादा गप्प और ज्यादा गप्प में थोड़ा सा सच। और कई बार सारे झूठ को सारा सच बता कर। पर यह तो अख़बारी नौकरी की विवशता है। कई बार अनचाहे करता हूं तो एकाध बार अपने मन से भी।’ वह बोले, ‘पर लोक कवि आप का नाम बिकता है यह तो पूरा सच बोल रहा हूं। और कोई नौकरी में नहीं, किसी दबाव में नहीं बल्कि पूरे मन से बोल रहा हूं।’

‘बोल चुके आप?’ लोक कवि संक्षिप्त सा बोले।

‘बिलकुल!’ बाबू साहब बोले, ‘पर आगे भी बोलूंगा और यही बात बोलूंगा। क्योंकि यही सच है। वास्तविकता है!’

‘सच यह नहीं है!’ लोक कवि बुदबुदाए, ‘आप को तीन पेग में ही आज चढ़ गई है।’

‘नहीं बिलकुल नहीं चढ़ी। चढ़ गई हो शराब तो हराम है शराब मेरे लिए।’ वह बोले, ‘लोक कवि! आफ्टर आल आप मेरी मातृभाषा गाते हैं। और लखनऊ में मेरी मातृभाषा को परवान चढ़ाए हुए हैं।’

‘सब गलत।’

‘तो आप का नाम नहीं बिकता?’ बाबू साहब लोक कवि से बोले, ‘मुझे नहीं आप को चढ़ गई है।’

‘मैंने तो अभी छुई भी नहीं।’ लोक कवि बोले, ‘अभी नहाऊंगा। नहाने के बाद पिऊंगा।’

‘तो फिर क्यों बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं?’

‘बहकी-बहकी बातें मैं नहीं, आप कर रहे हैं।’ लोक कवि बोले, ‘आप की मातृभाषा भोजपुरी को मैं गाता हूं सही है। पर मुझे सुनता कौन है?’

‘क्या?’

‘हां!’ लोक कवि बोले, ‘जानते हैं लोग पोरोगराम बुक करने मेरे पास आते जरूर हैं पर सट्टा करने के पहले पूछते हैं कि लड़कियां कितनी होंगी? यह नहीं पूछते कि आप कितना गाना गाएंगे? फिर लड़कियों की संख्या पर ही सट्टा और रेट तय होता है।’ लोक कवि बोले, ‘जैसे रैलियों में बड़का नेता लोग लोकल नेताओं से पूछते हैं कि भीड़ कितनी होगी ? वैसे ही पोरोगराम बुक करने वाले पूछते हैं लड़कियां कितनी होंगी? पोरोगराम के लिए पहुंचिए तो छूटते ही पूछते हैं लड़कियां कितनी आई हैं? वह चाहे होली, दीवाली का पोरोगराम हो, चाहे नए साल का या जन्माष्टमी, शादी बियाह का! और अब तो सरकारी पोरोगरामों में भी दबी जबान, फुसफुसा कर ही सही लोग लड़कियों के बारे में दरियाफ्त करते हैं।’ लोक कवि बोले, ‘और जानेंगे? पोरोगराम में जनता भी लड़कियों का डांस ज्यादा देखना चाहती है वह भी धक्का मार सेक्सी डांस। मैं तो कभी कभार तब गाता हूं जब लड़कियां कपड़े चेंज कर रही होती हैं या सुस्ता रही होती हैं। तो वोही में एहर वोहर करके दूइ चार गाने मैं भी ठोंक देता हूं।’ वह बोले, ‘और इनाम मेरे गाना गाने पर नहीं, मेरे ही गाने के कैसेट पर डांस करती लड़कियों के डांस पर आते हैं। और कई बार तो सट्टे के तय रुपए से ज्यादा रुपए इनाम के आ जाते हैं।’ लोक कवि आंखें तरेर कर बोले, ‘तो का ई इनाम आप समझते हैं आप की मातृभाषा के गानों को मिलते हैं? कि लड़कियों के सेक्सी डांस को?’ वह बोले, ‘आप ही तय कर लीजिए मैं कुछ नहीं बोलूंगा।’

‘क्या कह रहे हैं लोक कवि आप?’

‘यही कि अब मैं नहीं गाता हूं।’

‘तो क्या करते हैं आप?’

‘पोरोगराम करता हूं।’ वह बोले ऐसे जैसे अपने ही को परास्त कर चुके हों।

‘यह तो बड़ा दुखद है लोक कवि!’

‘अब बात दुख का रहे चाहे सुख का बकिर है यही!’ लोक कवि बोले ऐसे जैसे वह लुट गए हों।

‘तो आप अपने प्रोगामों में से लड़कियों को हटा क्यों नहीं देते?’

‘हटा दें?’ लोक कवि अर्थभरी लेकिन धीमी मुसकान फेंकते हुए बोले।

‘बिलकुल।’ बाबू साहब ठनक कर बोले।

‘मनो हमको बिलवा देंगे?’

‘क्या मतलब?’

‘मतलब ई कि अगर लड़कियों को मैं अपने पोरोगरामों में से हटा दूंगा तो हमारा काम तो ठप समझिए!’

‘क्यों?’

‘क्यों क्या?’ लोक कवि बोले, ‘अरे बाऊ साहब लड़कियां नहीं रहेंगी तो हमको फिर पूछेगा कौन? कौन सुनेगा आप की मातृभाषा? आप की मरी हुई मातृभाषा?’

‘क्या बक रहे हैं आप?’ बाबू साहब अब चौथा पेग ख़त्म करते हुए बोले, ‘और बार-बार आप की मातृभाषा, आप की मातृभाषा कह-कह कर मेरा उपहास उड़ा रहे हैं यह बंद कीजिए।’ वह बोले, ‘भोजपुरी मेरी ही नहीं आप की भी मातृभाषा है!’

‘मेरी तो रोजी रोटी भी है भोजपुरी!’ लोक कवि बोले, ‘मेरा नाम, सम्मान इसी भाषा के नाते है! मैं क्यों उपहास उड़ाऊंगा बाऊ साहब। मैं तो बस आप को जश्मीनी हकष्ीकष्त बता रहा था कि आप समझ जाएं  बकिर….’

‘बकिर क्या?’

‘बकिर दोगली रिपोर्टिंग करते-करते आप की आंख अन्हरा गई है। सच नहीं देखती, सो वही बता रहा था।’ वह बोले, ‘जानते हैं जो आज लड़कियों का डांस हटा दूं और ख़ाली बिरहा गाऊं तो जो आज महीने में पंद्रह से बीस दिन बुक होता हूं साल में भी शायद एतनी बुकिंग नहीं मिलेगी। जो मिलेगी भी वह भी सिर्फ सरकारी।’ वह बोले, ‘बाऊ साहब एक मजेदार बात और बताऊं आप को?’

‘क्या?’

‘जानते हैं लड़कियां जब डांस करते-करते थक जाती हैं, रात के तीन चार बज जाते हैं, पब्लिक फिर भी नहीं छोड़ती तो क्या करता हूं?’

‘क्या?’

‘मैं मंच पर आ के कान में अंगुली डाल के बिरहा गाने लगता हूं। पब्लिक उकता जाती है। धीरे-धीरे खदबदाने लगती है। फिर भी उम्मीद लगाए रहती है कि अभी अगला आइटम फिर डांस का या डुवेट का होगा। लेकिन मैं अगले आइटम में किसी लौंडे से भजन गवाने लगता हूं। वह दो तीन भजन ताबड़ तोड़ ठोंक देता है। तब कहीं जा के पब्लिक से छुट्टी मिलती है।’ वह बोले, ‘भोजपुरी और भजन की स्थिति यह है हमारे समाज में। आप भी जान लीजिए, आप पहरूआ हैं समाज के इसलिए बता दिया।’

‘यह तो सचमुच बड़ी मुश्किल स्थिति है।’

‘इस मुश्किल स्थिति से आखि़र कैसे निपटा जाए?’ लोक कवि बोले, ‘इस तरह मरती हुई भोजपुरी में कैसे जान फूंकी जाए?’ वह बोले, ‘आप बुद्धिजीवी हैं, विद्वान हैं, अख़बार में हैं। आप ही लोग कुछ सोचिए।’ कह कर लोक कवि अपनी छत पर रखे बाथ टब में नहाने चले गए। बाबू साहब की दारू थम गई। वह सकते में आ गए। लोक कवि की त्रासदी और अपनी मातृभाषा की दुर्दशा को ले कर। उन्हें अपनी मातृभाषा पर बड़ा गुमान था। भोजपुरी की मिठास, इसका लालित्य और इसकी रेंज का बखान वह करते नहीं अघाते थे। दो दिन पहले ही तो प्रेस क्लब में उन्होंने अपनी मातृभाषा का झंडा ऊंचा किया था। पंजाबी साथियों से उन्होंने बीयर पीते हुए बघारा था कि तुम्हारे यहां क्या है सिवाए बल्ले-बल्ले और भांगड़ा के? हमारी भोजपुरी में आओ, सब कुछ है यहां। जितने संस्कार गीत भोजपुरी में हैं किसी भाषा में नहीं हैं और आदमी बनता है संस्कार से। बात ज्यादा जब बढ़ी तो वह बोले चइता, कजरी, सोहर, लचारी तो छोड़ो भोजपुरी में श्रम गीत ही इतने हैं कि तुम लोग सुनते-सुनते थक जाओ। कहा था कि एक मरने को छोड़ दो तो भोजपुरी में हर समय, हर काम के लिए गीत हैं। चाहे जांत का गीत हो, फसल का हो, मेला बाजार जाने का हो हरदम गीत गाओ। शादी का उदाहरण देते हुए हांका था कि तुम्हारे यहां तो सिर्फ लेडीज संगीत से छुट्टी पा ली जाती है लेकिन भोजपुरी में एक-एक कस्टम के लिए गीत हैं जो भोर में भोरहरी से शुरू हो संझवाती से होते हुए सोने तक चलते हैं। और एक दो दिन नहीं, कई-कई दिन तक। यहां तक कि बारातियों के खाना खाने के समय भी गारी गीत गाए जाते हैं। शादी ख़त्म होने के बाद भी पांच दिन तक गीतों का कार्यक्रम चलता है। उसने उदाहरण दे-दे कर बताया था। तब वह सब लाचार हो गए थे और कहने लगे कि, ‘हो सकता है पंजाब के गांवों में हमारी पंजाबी में भी यह सब चलता हो पर हमें मालूम नहीं।’ तो एक बुंदेलखंडी पत्रकार उछलता हुआ बोला, ‘हमारे बुंदेलखंड में भी है!’

‘क्या है?’ कह कर बाबू साहब ने उस बुंदेलखंडी को मजाक में दौड़ाया था और पूछा था और जरा ऊंची आवाज में पूछा था कि, ‘सिवाय आल्हा गायन के अलावा क्या है बुंदेलखंड में?’ वह भी निरुत्तर हो गया था। पर जिस भोजपुरी की वीरगाथा उस रोज प्रेस क्लब में उन्होंने गाई थी क्या वह गाथा गलत थी? या कि लोक कवि के सवाल गलत हैं? उनके द्वारा बताए गए ब्यौरे गलत हैं?

गलत हैं या सही? कौन सही और कौन गलत में अभी बाऊ साहब सुलग ही रहे थे कि लोक कवि अंगोछा लपेट आ कर कुर्सी में धप्प से बैठ गए। बोले, ‘का बाऊ साहब आप ले क्यों नहीं रहे?’ उन्होंने ह्विस्की की ओर इशारा करते हुए कहा और अपना पेग बनाने लगे। बोले, ‘आप भी लीजिए।’

‘क्या लें आपने तो सारा नशा ही उतार दिया!’

‘क्या?’

‘क्या-क्या बताऊं?’ वह बोले, ‘मैं ऐसे कई लोगों के बारे में जानता हूं जो या तो अंगरेजी बोलते हैं या भोजपुरी। हिंदी नहीं जानते पर भोजपुरी जानते हैं। और आज आपने जो भोजपुरी का नक्शा खींचा है, मैं तो दहल गया हूं।’

‘इसमें दहलने की क्या बात है?’ वह बोले, ‘स्थिति ख़राब है तो इसे सुधारिए। सुधारने का माहौल बनाइए।’ लोक कवि बोले, ‘पर छोड़िए यह सब ई बताइए कि ऊ लोग कौन हैं जो अंगरेजी और भोजपुरी जानते हैं पर हिंदी नहीं।’

‘यहीं लखनऊ में भी दो चार लोग हैं। दिल्ली में हैं, विदेशों में भी हैं।’

‘अच्छा चहकते हुए लोक कवि बोले, ‘लखनऊ में कौन लोग हैं?’

‘साइंटिस्ट लोग हैं।’ वह बोला, ‘हिंदी टूटी फूटी बोलते हैं पर भोजपुरी सही-सही। ऐसे ही दिल्ली में जे.एन.यू. में बहुत लोग ऐसे मिलते हैं जो या तो अंगरेजी बोलते हैं या भोजपुरी। हिंदी नहीं।’

‘ई दिल्ली में जे.एन.यू. का है?’

‘यूनिवर्सिटी है।’

‘अच्छा-अच्छा।’ वह बोले, ‘हमारा पोरोगराम वहां हो सकता है?’

‘डांस वाला?’ बाबू साहब ने मजाकिया लहजे में आंख घुमा कर पूछा।

‘नहीं-नहीं। ख़ाली बिरहा वाला। शुद्ध भोजपुरी वाला पोरोगराम।’

‘आप भी लोक कवि हर बात में पोरोगराम सूंघने लगते हैं।’

‘का करें रोजी रोटी है।’ वह बोले, ‘फिर विद्वान लोगों के बीच गाने का सुख ही और है। और एहले अच्छी बात है कि ऊ लोग हिंदी नहीं जानते तो फिल्मी गाना का फरमाइश नहीं करेंगे। तो डांस वइसे ही कट हो जाएगा।’ वह बोले, ‘बात चलाइए।’

‘यह तो हमसे संभव नहीं है।’

‘तब छोड़िए जाने दीजिए।’ वह बोले, ‘कोई और बात कीजिए।’

‘क्या और बात करूं?’ वह बोला, ‘बताइए एक बहुत बड़े लेखक हैं एस.वी. नायपाल। इंगलैंड में रहते हैं और अंगरेजी में लिखते हैं।’

‘त का इहो भोजपुरी बोलते हैं?’

‘हां।’

‘अंगरेज हो कर भी?’

‘अंगरेज नहीं हैं।’

‘तो?’

‘इनके पुरखे गोरखपुर से गए थे त्रिनिदाद मजूरी करने। बताते हैं कि इनके बाबा गए थे।’

‘तो गोरखपुर में नायपाल कौन जाति होता है?’

‘नायपाल जाति नहीं है उनके बाबा दुबे थे। त्रिनिदाद से घूमते-घामते इंगलैंड पहुंच गए। पुरखे मजूरी करने गए थे पर यह लेखक हो गए। और ऐसे लेखक कि जिनकी अंगरेजी से बड़े-बड़े अंगरेज घबराएं।’

‘बहुत अशुद्ध लिखते हैं का?’ लोक कवि ने मुंह बिगाड़ कर पूछा।

‘अरे नहीं, इतनी अच्छी लिखते हैं कि उस से लोग घबराते हैं।’

‘जैसे हमारे गाने से लोग घबराते हैं?’

‘क्या? बाबू साहब लोक कवि की ही तरह मुंह बिगाड़ कर बोले, ‘बहुत ख़राब गाते हैं का?’

‘का बाऊ साहब?’ कह कर लोक कवि हो-हो कर हंसने लगे।

‘तो इन एस.वी. नायपाल की कई किताबें मशहूर हो चुकी हैं। वह ज्यादातर भारत के बारे में लिखते हैं। कई विदेशी पुरस्कार पा चुके हैं। नोबल पुरस्कार भी अभी-अभी मिला है। कुछ दिन पहले। और वह नायपाल हिंदी नहीं जानते पर भोजपुरी जानते हैं?’

‘आप को कैसे पता चला?’ चकित होते हुए लोक कवि ने पूछा।

‘अरे, अख़बारों मैंग्जीनों में पढ़ा है। क्यों?’

‘नहीं, हम सोचे कि कहूं आप मिले होंगे?’ वह बोले, ‘कब्बो भारत आए हैं?’

‘हां, आए हैं दो तीन बार। पर मैं नहीं मिला हूं। बहुत पहले आए थे। तो तब जानता भी नहीं रहा होऊंगा उन्हें।’

‘लेकिन ऊ भोजपुरी जानते हैं?’

‘हां, भई!’

‘भोजपुरी में भी एक्को किताब लिखे हैं का?’

‘नहीं, मेरी जानकारी में तो नहीं लिखे हैं।’

‘तब का ?’

‘क्या मतलब?’

‘मतलब ई कि ऊ भोजपुरी जानते हैं ख़ाली फैशन के लिए। अपना घाव देखाने के लिए। कि देखिए मजूर का बेटा केतना महान लेखक बन गया।’ लोक कवि बोले, ‘मजा तो तब था कि जब ऊ भोजपुरी में भी लिखते भोजपुरिहों के बारे में लिखते, उनका कुछ विकास करते।’ वह बोले, ‘ऐसे भोजपुरिहों से हम भी बिदेसों में मिला हूं। ऐसे ही लोग, हाई फाई लोग भोजपुरी का विनाश कर रहे हैं। का देस, का बिदेस। भोजपुरी के लिए कुछ करेंगे नहीं। ख़ाली मूड़ी गिना देंगे कि हमहूं भोजपुरिहा हूं। हूं ह, सजनी हमहूं राजकुमार! जाने दीजिए अइसे लोगों की बात मत करिए!’

लोक कवि तीसरा पेग ख़त्म कर रहे थे और साथ ही टुन्नावस्था की ओर भी उन के चरण बढ़ रहे थे। बाबू साहब की भी ज्यादा हो गई थी सो अचानक उठते हुए वह बोले, ‘चलते हैं लोक कवि जी!’

‘अच्छा तो प्रणाम!’ कह कर लोक कवि ने भी जाने का सिगनल दे दिया। फिर बोले, ‘कल दुपहरिया में चेयरमैन साहब के साथ बैठकी है। आप भी आइएगा।’

‘ठीक है।’ कह कर बाबू साहब चले गए। इस के बाद खा पीकर वह भी अकेले ही सो गए। हालांकि अकेले वह कम ही सोते थे।

अभी ठीक से सुबह भी नहीं हुई थी कि उनके फोन की घंटी बजी। फोन लोक कवि ने ही उठाया। पर उधर की बातें सुनते ही सन्न रह गए। रात का नशा उतर गया। चेयरमैन साहब को हार्ट अटैक हुआ था। भागे-भागे लोक कवि उन के घर पहुंचे तब तक चेयरमैन साहब सांस छोड़ चुके थे।

चेयरमैन साहब की अंत्येष्टि में भारी भीड़ थी। कमोवेश सभी राजनीतिक पार्टियों के लोग, हर तबके के लोग थे। अमीर, गरीब, अफसर, चपरासी, नेता, कलाकार, पत्रकार कौन नहीं था। दूसरे दिन हुई श्रद्धांजलि सभा में भी सब लोग आए। ज्यादातर लोग औपचारिक नहीं हो पाए। कमोवेश सभी ने कोई न कोई संस्मरण सुनाया जिसमें चेयरमैन साहब झांकते थे। लोक कवि ने कोई संस्मरण नहीं सुनाया। सिर्फ इतना भर बोले, ‘लखनऊ में विधायक जी हमको लाए और उनके बाद हम चेयरमैन साहब की ही शरण में रहे। गरीबी में हमको कुरता पायजामा पहनाते थे। खाना खिलाते थे। बड़ा प्यार से। ऊ हमारे अइसे गार्जियन थे जो जब चाहे हम को डांट सकते थे, दुत्कार और दुलार सकते थे। कुछ भी कह सकते थे, किसी भी समय, कहीं भी हमको बेइज्जत कर सकते थे। कहीं भी, कभी भी हमको अपने कपार पर बैठा सकते थे। हम को मान, सम्मान दे दुलरा सकते थे। उनके लिए हमारी जिंदगी में पूरी छूट थी। हमारे कई दुख बांटे, हमारे कई सुख छीने, कई सुख दिए। हरदम हर मोर्चे पर हमारी मदद करते। काहें से कि ऊ हमारे गार्जियन थे।’ कहते-कहते लोक कवि फफक कर रो पड़े। आगे नहीं बोल पाए जब कि वह बहुत कुछ बोलना चाहते थे। पर उनकी रुलाई रुक नहीं पा रही थी, वह करते भी तो क्या करते?

कुछ दिन उनके बड़े उदासी में गुजरे। रिहर्सल वगैरह भी बंद कर दिया था उन्होंने। पर जल्दी ही वह चेयरमैन साहब के गम से उबर गए। प्रोग्राम रिहर्सल सब शुरू हो गया। वह फिर से गाने लगे, ‘साड़ी बता रही है, खींची कहीं गई है / लाली बता रही है, लूटी कहीं गई है।’

हां, लेकिन वह चेयरमैन साहब को नहीं भूले। वह उनकी चर्चा जब तब चलाते रहते। खा़स कर जब कोई गलत फैसला उनसे हो जाता और कोई टोकता तो वह लगभग आह भर कर कहते, ‘का करें गलत-सही बताने वाले चेयरमैन साहब तो अब रहे नहीं। का करूं हो गया गलती!’ पर धीरे-धीरे चेयरमैन साहब की सलाहकार वाली भूमिका उस ठाकुर पत्रकार ने ले ली। लेकिन दिक्कत यह थी कि चेयरमैन साहब की तरह वह अनुभवी नहीं था। धैर्य नहीं था उसमें। कई बार रौ में बह जाता तो कई बार जिद में अड़ जाता। दूसरे, जैसे चेयरमैन साहब कलाकार लड़कियों को देखते ही बहने लगते थे उससे कहीं ज्यादा यह ठाकुर पत्रकार बहने लगता। चेयरमैन साहब लड़कियों के साथ नोचा-नोची, पकड़ा-पकड़ी, बतियाने वतियाने तक ही सीमित रहते पर यह पत्रकार हर वक्त लड़कियों को सुला लेने की जिद पर अड़ जाता। और वह निशा तिवारी की टीस में बलबलाने लगता। कहता, ‘क्या-क्या नहीं किया मैंने आप के लिए पर आप एक निशा नहीं कर सके मेरे लिए?’ इशू बना लेता। इन सब बातों को ले कर लोक कवि और उसमें अकसर ठन जाती। क्योंकि लोक कवि इस बात को पसंद नहीं करते थे। पत्रकार प्रतिवाद करता, ‘का सब सती सावित्री हैं?’

‘मैं नहीं जानता कि सब सती सावित्री हैं कि रंडी पर यहां यह सब नहीं हो पाएगा बाऊ साहब।’ लोक कवि कहते, ‘वइसे ही पीठ पीछे लोग हम को लवड़िया सप्लायर कहते रहते हैं। लेकिन मैं ई सब आंख के सामने नहीं होने दूंगा।’

‘क्या आप खुद नहीं इन लड़कियों को सुलाते हैं?’

‘सुलाता हूं।’ लोक कवि बिफरे, ‘पर जबरदस्ती नहीं जैसा कि आप चाहते हैं।’ वह जोड़ते, ‘अब जमींदारी नहीं रही बाऊ साहब। और फिर ई शहर है। बदनामी होती है!’

‘अच्छा आप सुलाएं तो बदनामी नहीं होती और हम सिर्फ सुलाने की बात करें तो बदनामी होती है?’

‘हां होती है।’ लोक कवि कहते, ‘आप में भसोट है तो जाइए लड़की को सड़क पर पटाइए फिर वह जाए तो जहां चाहिए ले जा कर सुलाइए। पर हमारे यहां बैठ कर न पटाइए, न सुलाने वुलाने की बात करिए। बतियाना है तो हमसे बतियाइए, दारू पीजिए, खाइए पीजिए मौज कीजिए पर लड़कियों वाला खेल मत करिए। दुनिया भरी पड़ी है छिनार लड़कियों से जाइए कहीं और जोर आजमाइश करिए। बकिर इहां नहीं।’

खूबसूरत डांसर्स सचमुच लोक कवि के जी का जंजाल बन चली थीं। उनके पास आने वाले अफसर, नेता या धनाढ्य किस्म के लोग आते और अक्सर बात ही बात में घुमा फिरा कर लड़कियों की चर्चा चला देते। ऐन लड़कियों के सामने लोक कवि बड़ी बेरहमी से उनके इशारों भरी बातों को दबोच लेते। कहते, ‘अब आप यहां से चलिए।’ लेकिन दारू चढ़ाए लोग लड़कियों के फेर में लगे ही रहते। एक बार हालैंड से एक आयोजक आए थे इंडिया घूमने। लखनऊ लोक कवि के पास भी आए। बात ही बात में अमरीकन लड़कियों की चर्चा चला दिए। बोले कि, ‘वहां तो पांच लाख लेती हैं।’ लोक कवि बात समझते हुए भी लगातार टालते रहे। पर हालैंड निवासी की सुई बार-बार, ‘पांच लाख लेती हैं!’ पर अटक जाती। और अंततः उन्होंने दारू की मेज पर एक लाख रुपए यों ही निकाल कर रख दिए। लोक कवि भड़के, ‘ई का है?’

‘कुछ नहीं रख लीजिए!’

‘क्यों कोई पोरोगराम का बयाना है क्या?’

‘नहीं वइसे ही रख लीजिए।’

‘का समझते हैं भाई आप?’ लोक कवि बिगड़ गए। बोले, ‘जाइए यहां से और अपना रुपया उठाइए। डालर में बदलवाइए और अमरीका चले जाइए।’

‘आप नाराज क्यों हो रहे हैं सर ?’ हालैंड निवासी बुदबुदाए।

‘बस, अब आप चले जाइए!’

‘मैंने आप को इतने प्रोग्राम दिलाए हैं और आप….!’

‘मत दिलाइए पोरोगराम अब और बस।’ लोक कवि गरजे, ‘निकल जाइए यहां से!’

ऐसे ही एक बार एक ब्लाक प्रमुख आए। ठेकेदारी करते थे। लोक कवि के जिले के थे। पैसा बहुत कमा लिए थे। लोक कवि का प्रोग्राम भी जब तब करवाते रहते थे। लखनऊ आए थे विधायकी का टिकट जुगाड़ने। लोक कवि की सिफारिश चाहते थे। लोक कवि ने सिफारिश कर भी दी और उम्मीद क्या लगभग आश्वासन मिल गया टिकट का कि चुनाव का ऐलान होने दीजिए टिकट आप का पक्का है। वह मारे खुशी के लोक कवि के घर मिठाई, फल और शराब की बोतलें लिए आ धमके। लोक कवि रिहर्सल में थे। डांसर्स थीं। पर ब्लाक प्रमुख के आते ही लोक कवि ने रिहर्सल रोक दिया। जिले के थे सो उनको अपना यह कैंप रेजीडेंस ऊपर से नीचे तक दिखाया। ख़ातिर बातिर की। फिर उनकी इच्छा पर उन की ही शराब की बोतल खोल दी। आदमी भेज कर होटल से मुर्गा, मछरी मंगवाया। लड़कियों ने परोसा। अब ब्लाक प्रमुख दो तीन पेग बाद स्टार्ट हो गए। सीधे-सीधे नहीं, जरा क्या पूरा-पूरा घुमा कर। वह चर्चा लोक कवि के इस कैंप रेजीडेंस की कर रहे थे पर आंखें लड़कियों पर गड़ी थीं। कहने लगे, ‘लगता है इस मकान को तुड़वाना पड़ेगा!’ पर लोक कवि उनकी बात अनसुनी कर गए। लेकिन वह स्टार्ट रहे, ‘लगता है इस मकान को तुड़वाना पड़ेगा!’ और जब हद हो गई, ‘तुड़वाना पड़ेगा!’ की तो लोक कवि पूछ ही बैठे, ‘क्यों तोड़वाना पड़ेगा?’

‘बड़ा बेढंगा बना है। फिर से बनवाने के लिए तुड़वाना पड़ेगा।’

‘कौन तुड़वाएगा? कौन बनवाएगा?’

‘अरे भाई मैं जिंदा हूं।’ वह एक लड़की को लगभग भर आंख ऊपर से नीचे तक घूरते हुए बोले, ‘मैं ही तुड़वाऊंगा, मैं ही बनवाऊंगा।’ वह बहके, ‘इतनी हैसियत तो है हमारी।’

‘पर कौने खुशी में?’ लोक कवि जरा मिठास घोल कर लेकिन बिफर कर बोले।

‘बस मेरा मन है।’

‘पता है केतना पइसा खर्च होगा?’

‘अरे जो भी पचीस-पचास लाख खर्च होगा मैं करूंगा।’

‘ऐसे-ऐसे जाने कितने बेढंगे मकान हैं इस मुहल्ले में किस-किस को तोड़ कर बनवाएंगे?’

‘हम तो बस आप का मकान तोड़ेंगे और आप का मकान बनवाएंगे।’ ब्लाक प्रमुख बहकते हुए एक लड़की को लगभग आंखों-आंखों में बुलाते हुए बोले।

‘तुम लोग यहां क्या कर रही हो? चलो यहां से।’ लोक कवि लड़कियों से बोले, ‘अब कल आना।’ ‘आप बहुत अच्छा गाते हैं।’ ब्लाक प्रमुख लड़कियों के जाने के बाद भी बात को लाइन पर लाते हुए पर बुझे स्वर में लोक कवि से बोले, ‘जान निकाल लेते हैं।’

‘जान मैं नहीं ये लड़कियां निकालती हैं।’ लोक कवि उन्हें टालते हुए बोले।

‘नहीं सचमुच आप बहुत सुंदर गाते हैं।’ वह बहक कर बोले, ‘कलेजा काढ़ लेते हैं।’

‘तो गाऊं अभी मैं?’ लोक कवि तंज करते हुए बोले, ‘जान निकलेगी अभी आप की?’

‘बिलकुल!’ ब्लाक प्रमुख बोले, ‘पर एक शर्त के साथ कि साथ में डांस भी हो।’

‘हां, हां डांस भी होगा।’ लोक कवि ने दो लड़कों को आवाज दे कर बुलाया और कहा कि ‘ये नाचेंगे मैं गाऊंगा। शुरू करूं?’

‘क्या लोक कवि जी आप भी मजाक करते हैं।’ वह बोले, ‘अरे सोनपरियों को नचाइए!’

‘ऊ सब तो चली गईं।’

‘चली गईं?’ ब्लाक प्रमुख ऐसे बोले जैसे उनका सब कुछ लुट गया हो, ‘सभी चली गईं सचमुच ?’

‘त और का?’ लोक कवि बोले, ‘हम गाना सुनाएं आप को?’

‘अब आपका सुनाएंगे।’ ब्लाक प्रमुख बोले, ‘सोनपरियों के डांस के साथ ही गाना सुनने का तुक था। अब तो हम आपका गाना आप के कैसेट से सुन लेंगे।’ कह कर वह उठ खड़े हुए। बिल्डिंग तुड़वा कर बनवाने की बात भी भूल गए। लोक कवि ने उन्हें आग्नेय नेत्रों से देखा और बड़े खिन्न भाव से विदा किया।

यह और ऐसे तमाम प्रसंगों को देखते झेलते लोक कवि का दिन हंसी खुशी से गुजर ही रहा था कि एक रोड ऐक्सीडेंट में वह ठाकुर पत्रकार भी चल बसा। अभी चेयरमैन साहब का गम वह भुला ही रहे थे कि यह एक और गम नत्थी हो गया। लेकिन चेयरमैन साहब जितना बड़ा गम यह नहीं था, फिर भी टीस तो थी ही। जो भी हो इधर-उधर संपर्क का एक मजबूत सूत्र उनका उनसे छिन गया। अख़बारों में पब्लिसिटी का भी वाहक था वह पत्रकार जो एक साथ कई अख़बारों में लोक कवि की ख़बरें छपवा देता था। कार्यक्रमों में भी वह मददगार होता था। लेकिन इसको भी नियति मान कर लोक कवि ख़ामोश हो गए। पर जब उनकी ख़ास मिसिराइन भी चल बसीं तो वह बिलकुल टूट गए। मिसिराइन जो उनके एक सहकर्मी की पत्नी थीं पर कहने के लिए। वास्तव में तो वह लोक कवि की जीवन संगिनी थीं। मिसिराइन ने उनके लखनऊ के शुरुआती जीवन में मिठास घोली थी। उनके संघर्ष के दिनों में वह मिसरी सी बनके उनके मन में फूटी थीं। ठीक वैसे ही जैसे गांव में किशोर उम्र में धाना ने उनके जीवन में मिठास घोली थी। पर वह तात्कालिक मिठास थी। बचपना था। लेकिन मिसिराइन की मिठास स्थाई थी। थीं तो वह चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की पत्नी लेकिन लोक कवि कहते कि वह विचारवान थीं, पढ़ी लिखी किसी बुद्धिजीवी की तरह। पर नियति ने उन्हें चपरासी की बीवी बना दिया और भाग्य ने मुझे उनका साथ दे दिया। वह कहते कि मिसिराइन ने हमें सजाया-संवारा, बिखरने से बचाया। भूखे नहीं सोने दिया। अपना परिवार तो मैं बाद में लखनऊ ले आया पर पहला परिवार लखनऊ में मेरा मिसिराइन का ही परिवार बना। आगे की बातों पर लोक कवि ख़ामोश हो जाते। पर चेयरमैन साहब जैसे लोग कभी मजाक में तो कभी आरोप लगा कर कहते कि मिसिराइन के सभी बच्चे लोक कवि के ही हैं, मिसरा के नहीं। इनमें भी दो बेटियां थीं। इनकी शादी ब्याह का खर्चा बर्चा जब लोक कवि ने खुले आम उठाया तो यह बात जो दबी ढंकी थी सबके सामने आ गई। यहां तक कि मिसरा के लड़के की शादी भी धूम धाम से लोक कवि ने करवाई। इस शादी में भी लोक कवि आगे-आगे थे और मिसिर जी पीछे-पीछे। एक बार चेयरमैन साहब से बात ही बात में किसी ने पूछा, ‘मिसरा कैसे जान समझ कर ई सब बरदाश्त करता है ?’ चेयरमैन साहब जैसा मुंहफट आदमी भी इस सवाल पर चुप रह गया। बहुत कुरेदने पर वह बोले, ‘लोक कविया का यह प्राइवेट भी नहीं पारिवारिक मामला है सो मैं कुछ नहीं बोलूंगा।’ उन्होंने एक पुराना जुमला भी ठोंका, ‘पर्सनल इज पॉलिटिक्स।’ पर सवाल पूछने वाला इस जुमले को समझ नहीं पाया। और यह सवाल बार-बार दुहराता रहा। तो चेयरमैन साहब बऊरा कर बोले, ‘तो हे गांडू ई बात बार-बार हमसे काहें पूछ रहा है? गांड़ में दम है तो जा के लोक कवि या मिसरा या मिसिराइन से पूछ। हमसे जाल बट्टा फैला रहा है।’ वह आदमी तब चुप लगा गया था।

पर मिसिराइन के निधन के बाद भी लोक कवि ने मिसिराइन के यहां आना जाना नहीं छोड़ा। जब वह लखनऊ में होते तो बिना नागा सुबह शाम मिसिराइन के बच्चों के बीच ही होते। मिसिराइन के बच्चों नातियों पोतों से भी वह उसी दुलार और प्यार से पेश आते जैसे मिसिराइन से पेश आते थे।

और मिसरा जी?

मिसरा जी को न मिसिराइन के जीते जी कोई ऐतराज था न मरने के बाद ही कोई ऐतराज हुआ। अजीब ही माटी के बने थे मिसरा जी। लोग फुसफुसाते भी पर मिसरा जी के कान पर जूं नहीं रेंगती। तो लोक कवि ने भी उनके बच्चों को पढ़ाने लिखाने, पालने पोसने, बियाहने गवनने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मिसिराइन की लड़कियों तक को उन्होंने सरकारी नौकरी दिलवा दी थी। एक दामाद को भी। मिसिराइन की एक लड़की की भी दिलचस्पी गाने बजाने में थी। नौकरी लगने से पहले एक बार दबी जबान उसने भी कलाकार बनने की बात कही तो लोक कवि आग बबूला हो गए। उससे तो वह कुछ नहीं बोले पर मिसिराइन से आहिस्ता से बोले, ‘रंडी बनाना चाहती हैं क्या बिटिया को?’

तो फिर मिसिराइन ने प्रतिवाद किया, ‘सभी कलाकार तो ऐसे नहीं होते?’ वह लता मंगेशकर तक का नाम ले बैठीं। बोलीं, ‘यह लोग तो सम्मान प्राप्त हैं।’

‘कोई नहीं है सम्मान प्राप्त।’ वह बोले, ‘और फिर लता मंगेशकर तो तपस्विनी हैं। कर पाएगी तपस्या बिटिया भला ?’ लोक कवि की मंशा देख मिसिराइन चुप लगा गईं। फिर बिटिया ने भी कभी कलाकार बनने की बात नहीं उठाई।

लेकिन लोक कवि अपनी बीवी के एक बेटे को कलाकार बनने से नहीं रोक पाए। हालांकि उन्होंने अपनी बीवी के तीनों बेटों को जो जहां तक पढ़ा पढ़ाया। दो की नौकरी भी लगवा दी क्लर्क वाली। और तीसरे को वह इंजीनियर बनवाना चाहते थे। वह बी.एस.सी. तक तो पढ़ा लेकिन कलाकार बनने की धुन उसमें बीच पढ़ाई में समा गई। बहुत रोका, बहुत समझाया लोक कवि ने उसे पर वह नहीं माना। लोक कवि ने कहा भी कि, ‘बी.एस.सी. पढ़ कर भी मेरी तरह नचनिया गवैया मत बनो। केतनो आगे बढ़ जाओगे तब भी लोग तुम्हें नचनिया पदनिया से बेसी नहीं समझेंगे!’ फिर भी वह नहीं माना। पहले चोरी छुपे, फिर खुल कर सामने आ गया।

लोक कवि हार गए।

वह अपना ही गाना कोट करते और कहते, ‘जे केहू से नाईं हारल ते हारि गइल अपने से।’ फिर वह कहते, ‘तो हमहूं हार गया हूं।’ एहतियातन उन्होंने इतना जरूर कर दिया कि इस छोटे बेटे को भी सचिवालय में चपरासी की नौकरी दिलवा दी। कि अगर गाने बजाने से इसका पेट न भरे तो नौकरिया तो रहेगी। एक आदमी ने पूछा भी कि, ‘बी.एस.सी. पास था तो चपरासी की नौकरी क्यों दिलवाई?’

‘तो का कलक्टर की नौकरी दिलवाता?’ लोक कवि बोले, ‘एह बेरोजगारी में इहो नौकरी एह नचनिया गवैया को मिल गई ई का कम है। नहीं हमारे मर जाने के बाद साला भूखों मरेगा ई चिंता तो नहीं रहेगी। इसका परिवार तो कष्ट में नहीं रहेगा!’

लोक कवि का लड़का पहले लोक कवि के ही चेलों की टीम में जब तब गाता। पर बाद में जब सब कर धर कर वह हार गए और लड़का फिर भी नहीं माना तो वह बोले, ‘हमारे चेलों की नौकरी बजाता है? चलो अपनी टीम में गाओ बजाओ।’ तो वह लोक कवि की ही टीम में गाने बजाने लगा। पर बाद में गाने बजाने में कम टीम की मैनेजरी के काम में उसका मन ज्यादा लगने लगा। लड़कियों की छांट बीन में भी वह लगा। कई बार तो क्या होने लगा कि एक ही लड़की पर बाप बेटे दोनों रियाज मारने लगते। पर दोनों एक दूसरे से छुप-छुपा कर। लड़की भी बाप से पैसे ऐंठती और बेटे की जवानी भोगती। यह चर्चा भी अब कलाकारों के बीच आम हो गई थी। पर लोक कवि और उनका बेटा इन बातों पर कान नहीं देते या जान बूझ कर शुतुरमुर्ग बन रेत में सिर छुपा लेते।

कोई भी लोक कवि या उनके बेटे पर लगाम लगाने की बात करते भी डरता था। बात करे तो टीम से बाहर। इसलिए सब चुप-चुप रहते और चेयरमैन साहब की याद करते और कहते, ‘चेयरमैन साहब जो जीते होते तो वह यह अनीति रोक सकते थे।’

अब के दिनों में होने यह भी लगा कि टीम की मैनेजरी के रुतबे में लोक कवि का लड़का कलाकारों के साथ मनमानी और बदसुलूकष्ी पर भी आ गया था। धीरे-धीरे बात इतनी विस्फोटक स्थिति में आ पहुंची कि कलाकारों ने लगभग बगशवत कर एक यूनियन बना ली। घंटे और किष्लोमीटर के हिसाब से वह मेहनताना मांगने लगे। लोक कवि का दिमाग घूम गया। वह समझ गए कि असंतोष को अगर तुरंत नहीं दबाया किसी तरकष्ीब से तो धंधा तो चौपट! ऐसे समय पर उन्हें चेयरमैन साहब की याद बहुत आई कि वह होते तो कुछ तरकष्ीब जश्रूर भिंड़ाते और कुछ नहीं होता। फिर भी लोक कवि ने हार नहीं मानी। बातचीत के लिए दो तीन कलाकारों को बुलाया। पूछा कि, ‘मेरी टीम में रह कर महीने में नहीं-नहीं तो पांच सात हजशर रुपए औसत तो कमा ही लेते हो?’

‘हां, यह तो है।’’ तीनों एक साथ बोले।

‘अभी दो महीने बाद बिदेसी दौरे पर निकलना है। वहां पोरोगराम करने, आने जाने में दस बारह दिन लगेंगे। और रुपए मिलेंगे सिर्फ बीस-बीस, पचीस-पचीस हजशर तब भी चलोगे तुम लोग?’

‘बिलकुल गुरु जी!’

‘चुप्प भोसड़ी वालों।’

‘का हुआ गुरु जी?’

‘अरे जो तुम लोगों ने किष्लोमीटर, घंटे वाला रेट लगाया है उसके हिसाब से तो एक लाख से भी ज्श्यादा रुपए तुम लोगों को मुझे देना चाहिए। और एतना तो हम दे नहीं पाऊंगा।’ वह बोले कि, ‘जहाज का टिकट भी कटाऊं, वहां रहने, खाने, घूमने का बंदोबस्त भी करूं। तब तो डेढ़ लाख दो लाख में भी एक कलाकार मैं वहां नहीं ले जा पाऊंगा!’ वह बिगड़े, ‘मतलब पोरोगराम बंद कर दूं और तुम लोगों की गांड़ पर लात मार कर भगा दूं यहां से।’

‘नहीं गुरु जी!’

‘तो?’

‘अब आप ही बताइए!’

‘मैं कुछ नहीं बताऊंगा।’ वह बोले, ‘तुम लोग खुद सोच लो! मेरा क्या मैं तो ढपली बजा कर अकेले ही बिरहा गा लूंगा। तुम लोग अपनी रोजी रोटी की सोच लो!’

‘गश्लती हो गई गुरु जी! कह कर सब लोक कवि के चरणों में गिर पड़े। लोक कवि ने तीनों की पीठ थपथपाई। बोले, ‘चलो भगवान सद्बुद्धि दे तुम लोगों को। और तुम लोगों की तरह औरों को भी!’

‘जी गुरु जी!’ वह सब विनयवत बोले।

‘तुम्हीं लोग सोचो कि मैंने कितना संघर्ष और जोड़ जोगाड़ के बाद थोड़ा सा नाम दाम कमाया है, टीम खड़ी की है।’ वह बोले, ‘हम लोग कलाकार हैं, सूदखोर नहीं कि दिन के हिसाब से, घंटा और किष्लोमीटर के हिसाब से पैसा तय करें।’ वह बोले, ‘यह तो किसी भी कला में संभव नहीं है। बड़े-बड़े भी भले पैसा ज्श्यादा लेते हैं। पर खुल्लमखुल्ला ऐसा नहीं करते !’ लोक कवि पलटते हुए बोले, ‘ई कौन तुम लोगों की बुद्धि ख़राब कर रहा है? तुम लोगों के कलाकार को मार रहा है?’ तीनों इस पर कुछ नहीं बोले। एक चुप तो हजशर चुप। अंततः लोक कवि ने ही ख़ामोशी तोड़ी। बोले, ‘घर जाओ। ठंडे दिमाग से सोचो। फिर बताओ!’

तीनों चले गए।

लोक कवि यह तो जान गए कि यूनियन की नींव में यही तीनों हैं पर चुपचाप नहीं बैठे। साम-दाम, दंड, भेद सभी उपाय लगाए और चार दिन में ही यूनियन को चित्त कर इन तीनों को टीम से बाहर कर दिया।

बात ख़त्म हो गई थी। पर लोक कवि निश्चिंत नहीं हुए। और चौकन्ने हो गए। बेटे को हालां कि टीम मैनेजरी से तुरंत नहीं हटाया। बोले, ‘गश्लत संदेश हो जाएगा। सब समझेंगे कि उन की खुराफात से डर गया हूं।’ पर धीरे-धीरे बेटे को टीम मैनेजरी से यह कहते हुए अलग किया कि, ‘नौजवान हो, कलाकारी चमकाओ अपनी। रिहर्सल रियाजश् करो। स्टेज पर आओ, गाओ बजाओ!’ लड़का बेमन से ही सही पर मान गया। उसकी बादशाही धीरे-धीरे लद गई। हालांकि लोक कवि डरे हुए थे कि कहीं बेटा ही न बगशवत कर दे। जैसे अकबर के साथ सलीम ने किया था। यह बात वह खुद कहते अपने संगी साथियों से।

बाद के दिनों में उन्हों ने साथी कलाकारों को मेढकों की तरह ऐसे तौला, ऐसे चढ़ाया उतारा, ऊपर नीचे किया, पेमेंट से ले कर प्रोग्राम तक ऐसे काटा छांटा कि सभी सामान्य बन कर रह गए। कोई स्टार कलाकार, स्टार डांसर नहीं रह गया। एकाध पुराने ‘स्टार’ लोक कवि से बुदबुदाते भी कि, ‘गुरु जी अब टीम में कोई स्टार नहीं, कोई स्टार होना चाहिए!’

‘क्यों मैं स्टार नहीं हूं?’ वह कहते, ‘अब टीम में एक ही स्टार रहेगा और वह मैं रहूंगा।’ वह जोड़ते कि, ‘क्या चाहते हो कि आज स्टार बना दूं, कल को ये यूनियन बना लंे और परसों टीम को में गोमती में बहा दूं? आखि़र सब की रोजी चलानी है, अपना नाम चलाना है। ई सब कुछ डुबोना थोड़े ही है!’

‘तो अब गुरु जी आप पहले की तरह फिर से गाना गाना शुरू कर दीजिए।’ कोई पुराना चेला यह कह कर लोक कवि को आइना दिखाते, चिकोटी काटते हुए उन्हें जैसे उन की औकात बताने की कोशिश करता।

‘हे साले मैं नहीं गाता तो तुम पैदा कैसे हुए?’ उसके तंजश् को मजशक में घोलते हुए जैसे उसे जूता मारते, ‘क्या तुम्हारे बाप ने तुम्हें पैदा किया?’ वह जश्रा रुकते उसके चेहरे का भाव पढ़ते कि जूता पूरा पड़ा है कि नहीं? फिर आहिस्ता से बोलते, ‘गायकी में किसने पैदा किया है तुम्हें?’

‘आप ने गुरु जी।’ चेला हार कर अपमान पीता हुआ बोलता।

‘तो अब हम को गाना गाना चाहिए तुम बताओगे ?’

‘नहीं, गुरु जी!’

‘अरे, अब पोरोगराम में सब भड़ुवे लौंडियों की कुल्हा मटकाई और छातियों के उभार को देखने आते हैं तो वहां मैं का गाना गाऊं? कोई सुनेगा भला?’ वह बोलते, ‘लेकिन साल मंे चार-छ ठो कैसेट आते हैं उनमें तो गाता हूं। उन्हीं गानों को किसी और से हिंदी में लिखवा कर गोविंदा जैसा हीरो सुन कर नाचता है तो ई का है? अरे ससुरे समझो कि मैं ही गाता हूं। पर तुम लोग साले शोर मचा दिए हो कि गुरु जी अब नहीं गाते!’ वह दहाड़े, ‘कैसे नहीं गाता हूं!’

‘तो गुरु जी आप का वीडियो एलबम या सीडी क्यों नहीं है मार्केट में?’ सुन कर क्षण भर के लिए निरुत्तर हो जाते लोक कवि। लेकिन दूसरे ही क्षण बोलते, ‘इस लिए कि हम अमीरों के लिए नहीं, गश्रीबों के लिए गाता हूं। क्यों कि भोजपुरी गश्रीबों की भाषा है। और गश्रीब सी.डी., वीडियो नहीं देखता, सुनता।’ फिर वह धीरे से कहते, ‘लेकिन घबराओ नहीं अनुपवा लगा है। कुछ करेगा।’

‘लेकिन कब?’

‘अब देखो कब करता है?’ कहते हुए लोक कवि लगभग हताश हो जाते।

‘ऊ  अनुपवा चार सौ बीस के चक्कर से छुट्टी ले लीजिए गुरु जी!’

‘काहें?’

‘आप को बिकवा देगा।’ कोई चेला बोलता, ‘ऊ आप को बेच रहा है।’

‘बहुत लोग बेच चुके हम को। लेकिन हम नहीं बिके।’ वह कहते, ‘थोड़ा उसको भी बेच लेने दो।’ कह कर वह बइठकी बर्खास्त कर देते।

पर उन की चिंताएं बर्खास्त नहीं होतीं। सच यही था कि उन का नाम भोजपुरी गायकी में अभी भी शिखर पर था। आस पास तो छोड़िए कोई दूर दराज तक उन की लोकप्रियता को छूता दिखाई नहीं देता था। तो भी उन की गायकी पर अब पूर्ण विराम न सही, विराम तो लग ही गया था। यह सचाई वह भी महसूस करने लगे थे। फिर बिहार में पैदा हुआ बनारस में पढ़ा लिखा एक ब्राह्मण गायक बड़ी तेजश्ी से भोजपुरी गायकी में बढ़त ले रहा था। वह लड़कियों को अपने कार्यक्रम में नहीं नचाता था और अकेले ही गाता था, उसकी आवाजश् में भी भोजपुरी वाली मिठास बसी थी, पर वह देवी गीतों, फिष्ल्मी पैरोडियों पर जश्रा ज्श्यादा ही आश्रित था सो लोक कवि उस से ज्श्यादा ¯चतित नहीं रहते पर निश्चिंत भी नहीं थे। कोई इस बात को छेड़ता  तो लोक कवि कहते, ‘बहुत भंवर हमारी राह में आए और देखते-देखते नदी में विलीन हो गए। कुछ नहीं हुआ हमारा।’ वह कहते, ‘ई नहीं कि भोजपुरी गाना हम से अच्छा गाने वाले लोग नहीं हैं, हम से बहुत अच्छा गाने वाले भी थे, अभी भी कुछ जिंश्दा हैं, पर मार्केट ने उन को रिजश्ेक्ट कर दिया। पर हम बरसों से मार्केट में हूं। तो ई भगवान की बड़ी कृपा है। बाकी भोजपुरिहों का प्रेम है। जो हमारा गाया गाना सुनते हैं।’ वह ‘नथुनिया पे गोली मारे’ गीत का जिश्क्र करते। कहते, ‘जवानी में हमने ई गाना गाया था, हमारे एक पुराने कैसेट में मिल भी जाएगा। लेकिन पटना के एक गायक ने कुछ साल पहले यही गाना चोरी करके ‘फास्ट’ करके गा दिया। मार्केट में उठ गया ई गाना। हमारी तो नींद हराम हो गई। एतना उठा ई गाना कि हमरै गाना, हमारी नींद उड़ा गया। लगा कि अब मैं मार्केट से आउट हो गया। पर लाज बच गई ऐसा नहीं हुआ। भगवान की कृपा। पर एही गाना ‘अंखियों से गोली मारे’ बनि के गोविंदा पर नाच गया। अब कहां है ऊ पटना वाला गायक कोई जानता है?’ लोक कवि कहते, ‘पर मैं तो कहीं नहीं गया। खड़ा हूं आप के सामने।’ हां, लोक कवि को इस बात पर मलाल जश्रूर बना रहता कि वह मार्केट में तो हैं पर गाने में नहीं।

दिल्ली में एक पत्राकार उन से पूछ भी रहा है कि, ‘आप अब गाते क्यों नहीं?’

‘गाता तो हूं?’ लोक कवि जवाब देते हैं, ‘अभी इसी रात आप के सामने गाया हूं।’

‘वह तो पुराना गाना गाया आप ने। और आप ने कम आप की टीम के लोगों ने ज्श्यादा गाया।’

‘तो आप इंटरव्यू हम से क्यों ले रहे हैं ? टीम से लीजिए न।’

‘इस लिए इंटरव्यू ले रहा हूं कि आप अपनी टीम में भी बड़े गायक हैं।’

‘मानते हैं आप बड़ा गायक?’ लोक कवि हाथ जोड़ कर प्रति प्रश्न करते हुए कहते हैं, ‘चलिए आप की बड़ी कृपा!’

‘हां, तो आप से मैं पूछ रहा था कि अब आप गाते क्यों नहीं हैं?’

‘गाता हूं!’ लोक कवि गंभीर हुए हैं और बोले हैं, ‘गाता हूं पर वहां जहां हमें ठीक से सुना जाता है।’

‘कहां ठीक से सुना जाता है आप को?’

‘बिदेस में, कैसेटों में, आकाशवाणी, दूरदर्शन और सरकारी पोरोगरामों में। जहां दो चार गाने ही गाने होते हैं।’ लोक कवि हताश मन से लेकिन उत्साहित स्वर में कहते हैं। फिर थोड़ी तल्ख़ी घोलते हुए कहते हैं, ‘लेकिन वीडियो अलबम और सीडी में नहीं गाता!’ और जैसे जोड़ते हैं, ‘गरीब मजूर की भाषा का गायक हूं न!’

‘ख़ैर बात मैं मंचों की कर रहा था कि पहले तो आप ऐसे मंचों पर भी बहुत गाते थे। जनता जनार्दन के गायक आप हैं ही। शायद इसीलिए आपको लोक कवि नाम भी दिया गया।’

‘ठीक कह रहे हैं।’ लोक कवि बोले, ‘आप विद्वान आदमी हैं, सब जानते हैं।’

‘लेकिन यह मैं नहीं जान पा रहा हूं कि आप अब जनता जनार्दन के मंचों पर क्यों नहीं गाते ? आप खुद बताएंगे ?’

‘जवाब बहुत मुश्किल है।’ लोक कवि कहते हैं, ‘जवाब दे सकता हूं पर माफ कीजिए मेरा जवाब देना इस मसले पर ठीक नहीं होगा!’ वह कहने लगे, ‘भोजपुरी समाज को ही यह जवाब ढूंढ़ने दीजिए।’ फिर वह जोड़ते हैं, ‘हालांकि इसकी भी किसे फुर्सत है?’

इंटरव्यू ख़त्म कर लखनऊ वापस जाने के लिए लोक कवि मय अपनी टीम के नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हैं। वह सोच रहे हैं कि लड़कियों का डांस कितना भारी पड़ रहा है उनको? पहले तो पोरोगरामों में लड़कियों का डांस दो वजहों से रखते थे। एक तो खुद को सुस्ताने के लिए दूसरे, पोरोगराम को थोड़ा ग्लैमर देने के लिए। पर अब? अब तो लड़कियां जब सुस्ताती हैं तो लोक कवि को गा लेने का मौका मिलता है। पहले लड़कियां फिलर थीं, अब वह खुद फिलर हो गए हैं। उनका मन होता है कि गाएं, ‘आव चलीं, ददरी क मेला आ हो धाना!’ और उन्हें बरबस धाना की याद आ जाती है। पर आयोजक बब्बन यादव जो लोक कवि के जनपद के ही हैं दिल्ली में ठेकेदारी और लीडरी दोनों करते हैं साथ ही खड़े हैं। कार्यक्रम की सफलता से पागल हैं। स्टेशन पर वह भी हैं। उनकी खुशी का ठिकाना नहीं है। चार छ पेग दारू भी उनकी देह में है। सो सफलता का उत्साह पूरे ज्वार में है। वह भीड़ भरे स्टेशन  पर अकेले चिल्ला कर अचानक उदघोष करते हैं, ‘लोक कवि जिंदाबाद !’ वह दो चार बार ऐसे ही जिदाबाद चिल्लाने के तुरंत बाद लोक कवि के कान में फुसफुसाते हैं, ‘लेकिन पिंकी कहां है?’ लोक कवि बब्बन यादव का फुसफुसाना पी जाते हैं और साथी कलाकारों को आंखों-आंखों में इशारा करते हैं कि पिंकी को ट्रेन में कहीं, या भीड़ में कहीं छुपा दिया जाए। ट्रेन प्लेटफार्म पर आ कर लग भी गई है। लेकिन लोक कवि विचलित से प्लेटफार्म पर खड़े हैं कि कहीं कोई अनहोनी न हो जाए। पिंकी को ले कर।

पिंकी लोक कवि के टीम की नई डांसर है। युवा है, कमसिन है और सेक्सी डांस में निपुण। उसकी इसी निपुणता से बब्बन यादव घायल हैं और बउराए हुए हैं। वह एक साथ दहाड़ और फुसफुसा दोनों रहे हैं, ‘लोक कवि की जय हो ! लेकिन पिंकी कहां है?’

लोक कवि स्तब्ध हैं, क्षुब्ध भी। साथ ही शर्म में डुबे हुए भी। सोचते हैं कि जो वह पत्रकार यहां इस नई दिल्ली स्टेशन पर मिल जाता तो उसे बुला कर वह यह मंजर दिखाते कि, ‘लोक कवि जिंदाबाद ! लेकिन पिंकी कहां है ?’ और बताते कि वह अब क्यों नहीं गाते हैं?

बब्बन यादव जैसे लोग उन्हें गाने देते हैं कहीं ?

यह सोच कर वह शर्म से सिर और नीचे कर लेते हैं। लेकिन बब्बन यादव का नारा और फुसफुसाना चालू है, ‘लोक कवि जिंश्दाबाद! लेकिन पिंकी कहां है?’

लोग आते जाते चौंक कर बब्बन यादव और लोक कवि को देख भी लेते हैं। लेकिन लोक कवि खुद से ही यह सवाल करते हैं कि भोजपुरी बिरहा में यह लड़कियों की फसल मैंने ही बोई है तो काटेगा कौन? वह जवाब भी देते हैं खुद ही को कि, मैं ही काटूंगा। हालां कि बब्बन यादव रह-रह फिर भी चिल्लाए जा रहे हैं, ‘लोक कवि की जय!’ और पलट कर लोक कवि के कान में फुसफुसा रहे हैं, ‘लेकिन पिंकी कहां है?’

तो क्या यह सिर्फ बब्बन यादव का शराब पी कर बहकने का अंदाज भर है? या लोक कवि के येन-केन-प्रकारेण मार्केट में बने रहने का दंश है?

लोक कवि अपनी सफलता की, इस मार्केट रूपी द्रौपदी को जीत कर भी हारा हुआ सा, ठगा हुआ सा महसूस करते हैं। प्लेटफार्म पर खड़े हैं ऐसे गोया उन्हें काठ मार गया हो। यह विचारते हुए कि क्या वह सचमुच ही अब नहीं गाते? मार्केट की द्रौपदी ने उनकी गायकी को दूह लिया है? नई दिल्ली स्टेशन के इस प्लेटफार्म पर खड़े-खड़े लोक कवि को लगता है कि अब वह द्रौपदी को जीतने वाले अर्जुन की भूमिका छोड़ द्रौपदी को जुए में हार जाने वाले युधिष्ठिर की भूमिका में आ गए हैं। लोक कवि यह सब अभी सोच ही रहे हैं कि उनका एक चेला उन्हें लगभग झिंझोड़ते हुए कहता है, ‘गुरु जी डब्बे में चलिए, ट्रेन अब खुलने ही वाली है!’

वह चिहुंकते हुए ट्रेन में चढ़ जाते हैं। ट्रेन सचमुच खुल गई है।

वह अपनी बर्थ पर जा कर लेटे हैं। ऊपर की बर्थ पर पिंकी उन्हें सुरक्षित दिख गई है। वह लगभग निश्चिंत हो गए हैं। क्योंकि बब्बन यादव तो प्लेटफार्म पर ही खड़े थे, जब ट्रेन चलने लगी थी।

लोक कवि ने आंखें बंद कर लीं हैं और निष्चेष्ट लेटे अपने ही से भीतर-भीतर पूछ रहे हैं, ‘भोजपुरी कहां है?’ ठीक वैसे ही जैसे बब्बन यादव पूछ रहे थे, ‘पिंकी कहां है?’ वह अपने आप से ही पूछ रहे हैं, ‘भोजपुरी कहां है?’ वह देख रहे हैं कि पिंकी तो सुरक्षित है पर क्या भोजपुरी भी सुरक्षित है? वह अपने आप से ही फिर पूछते हैं। पर तुरंत कोई जवाब नहीं दे पाते अपने आप को भी। वह बर्थ पर लेटे-लेटे ही करवट बदल लेते हैं। और अपने ही पुराने गाने को लगभग बुदबुदाते हैं, ‘जे केहू से नाई हारल, ते हारि गइल अपने से।’

लोक कवि सचमुच अपने आप से ही हार गए हैं।

लेकिन ट्रेन है कि चलती जा रही है बिना किसी से हारे धड़धड़–धड़धड़!

….समाप्त….

उपन्यासकार दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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पर सट्टा करने के पहले पूछते हैं कि लड़कियां कितनी होंगी

दयानंद पांडेय: असंपादित : उपन्यास – लोक कवि अब गाते नहीं (10) : मुख़्तसर में यह कि एक गांव की एक ठकुराइन भरी जवानी में विधवा हो गईं। बाल बच्चे भी नहीं थे। लेकिन जायदाद ज्यादा थी और सुंदरता भी भरपूर। उनकी पढ़ाई लिखाई हालांकि हाई स्कूल तक ही थी तो भी ससुराल और मायके में उनके बराबर पढ़ी कोई औरत उनके घर में नहीं थी। औरत तो औरत कोई पुरुष भी हाई स्कूल पास नहीं था।

सो ठकुराइन में अपने ज्यादा पढ़े लिखे होने का गुमान भी सिर चढ़ कर बोलता था। इस तरह सुंदर तो वह थीं ही तिस पर ‘पढ़ी लिखी’ भी। सो नाक पर मक्खी भी नहीं बैठने देतीं। लेकिन उनका दुर्भाग्य था कि पति की दुर्घटना में मृत्यु हो जाने से वह जल्दी ही विधवा हो गईं। मातृत्व सुख भी उन्हें नहीं मिल पाया। शुरू में तो वह सुन्न पड़ी गुमसुम बनी रहीं। पर धीरे-धीरे उन का सुन्न टूटा तो उन्हें लगा कि उनके जेठ और देवर दोनों की नजर उनकी देह पर है। देवर तो मजाक ही मजाक में उन्हें कई बार धर दबोचता। उन्हें यह सब अच्छा नहीं लगता। वह अपनी मर्यादा में ही सही इसका विरोध करतीं। लेकिन मुखर नहीं होतीं। फिर एक दुपहरिया जब अचानक उनके कमरे में जेठ भी आ धमके तो वह खौल पड़ीं। हार कर वह चिल्ला पड़ीं और जेठानी को आवाज दी। जेठ पर घड़ों पानी पड़ गया था और वह ‘दुलहिन-दुलहिन’ बुदबुदाते हुए सरक लिए। जेठ तो मारे शर्म के सुधर गए पर देवर नहीं सुधरा। हार कर उन्होंने सास और जेठानी को यह समस्या बताई। जेठानी तो समझ गईं और अपने पति पर लगाम लगाई लेकिन सास ने घुड़प दिया और उल्टे उन्हीं पर चरित्राहीनता का लांछन लगा दिया। सास बोली, ‘एक बेटे को डायन बनके खा गई और बाकी दोनों को परी बन के मोह रही है। कुलटा, कुलच्छनी!’

ठकुराइन सकते में आ गईं। बात लेकिन थमी नहीं। बढ़ती गई। बाद के दिनों में खाने, पहनने, बोलने बतियाने में भी बेशऊरी और चरित्राहीनता छलकने के आरोप गाढ़े होने लगे। हार मान कर ठकुराइन ने अपने पिता और भाई को बुलवाया। बीच-बचाव रिश्तेदारों, पट्टीदारों ने भी किया-कराया। लेकिन वह जो कहते हैं कि, ‘मर्ज बढ़ता गया, ज्यों ज्यों दवा की।’ और आखि़रकार ठकुराइन ने एक बार फिर अपने पिता और भाई को बुलवाया। फिर जमीन जायदाद और मकान पर अपना कानूनी दावा ठोंक दिया।

अंततः पूरी जायदाद में तीसरा हिस्सा अपने नाम करवा कर वह अलग रहने लगीं। अब जेठ और देवर उनके खि़लाफ खुल करके सामने आ गए। उनको तरह-तरह से परेशान करते, अपमानित करते। लेकिन वह ख़ामोश रह कर सब कुछ पी जातीं। लेकिन एक दिन उन्हों ने ख़ामोशी तोड़ी और ऐसे तोड़ी की पूरा गांव हैरान रह गया।

उन्होंने सारा शील-संकोच, परदा-लिहाज तोड़ा और अपने पति का कुर्ता पायजामा पहन लिया। अपने पति की लाइसेंसी दोनाली बंदूक जो अब उनके नाम स्थानांतरित हो चुकी थी, उठाई और घर से बाहर आ कर अपने जेठ और देवर को ललकार दिया। लेकिन जेठ, देवर घर से बाहर नहीं निकले घर में ही दुबके रहे। ठकुराइन का चीख़ना चिल्लाना सुन कर एक बार देवर तमतमा कर उठा भी पर मां ने उसे हाथ जोड़ कर रोक लिया। बोलीं, ‘ऊ तो हाथी नीयर पगला गई है, कहीं गोली, वोली दाग देगी तो का होगा?’ देवर अफना कर रह गया। रह गया घर में ही।

ठकुराइन थोड़ी देर तक चीख़ती चिल्लाती रहीं, हाथ में दोनाली बंदूक लिए लहराती रहीं। पूरा गांव इकट्ठा हो गया। अवाक देखता रहा। पर जेठ-देवर, सास-जेठानी घर से बाहर नहीं निकले। घूंघट काढ़े कुछ बूढ़ी अधेड़ औरतों ने ठकुराइन को किसी तरह समझा बुझा कर घर के भीतर किया। कुर्ता पायजामा उतरवा कर फिर से साड़ी ब्लाउज पहनाया। शील-संकोच, मान-मर्यादा जैसी कुछ हिदायतें दीं। और यह हिदायतें जब ज्यादा हो गईं तो ठकुराइन बोलीं, ‘ई सब कुछ हमारे लिए ही है, उन लोगों के लिए कुछ नहीं?’ यह कह कर एक औरत के कंधे पर सिर रख कर वह फफक कर रो पड़ीं।

बाहर भीड़ छटने लगी। अंदर भले ठकुराइन रो पड़ी थीं पर बाहर एक बूढ़ा व्यक्ति लोगों से कह रहा था, ‘दुलहिन पर दुर्गा सवार हो गई हैं।’ जो भी हो अब ठकुराइन गांव में ही नहीं जवार में भी ख़बर थीं। उनके कुर्ते पायजामे और बंदूक लहराने की चर्चा चहुंओर थी। मिर्च-मसाले के साथ।

दिन फिर धीरे-धीरे गुजरने लगे। अब ठकुराइन के जेठ देवर भी उनसे घबराते। और कहीं कोई मोर्चा नहीं बांधते। तो भी उनके दिल का दर्द अभी बाकी था। सास तो खुले आम कहती, ‘हमारे कलेजे पर लिट्टी ठोंक रही है।’ जेठ, देवर भी इस मर्म को समझते। फिर धीरे-धीरे ठकुराइन के खि़लाफ व्यूह रचने में वह लग गए। इस बार सीधे कुछ करने-करवाने के बजाय वाया-वाया खुराफात शुरू हुई। किसी छोटी जाति के व्यक्ति को ठकुराइन के खि़लाफ लगा देना, किसी पट्टीदार को भड़का देना आदि। ठकुराइन सब समझतीं पर पहले ही की तरह फिर बड़ी ख़ामोशी से सब कुछ टाल जातीं। लेकिन जब उनके हलवाहे को जेठ, देवर ने भड़काया तो वह एक बार फिर खौल गईं। लेकिन अब की पति का कुरता पायजामा नहीं पहना उन्होंने। न ही दोनाली बंदूक उठाई। अबकी वह कुछ ठोस कार्यवाई करना चाहती थीं।

लेकिन तभी उनके दुर्भाग्य ने उन्हें एक बार फिर घेर लिया।

घरके आंगन में धोया हुआ गेहूं सुखवाने के लिए उन्होंने पसार रखा था। बाहर का दरवाजा किसी काम से खुला पड़ा रह गया था। कि तभी दो तीन बकरियां दौड़ती-उछलती घर में आ गईं। आंगन में पड़ा गेहूं चबाने लगीं। ठकुराइन वैसे ही खौली हुई थीं, बकरियों को गेहूं में मुंह डाले देखा तो भड़क गईं। घर में रखा एक डंडा उठाया बकरियों को मारने के लिए। बाकी बकरियां तो डंडा उठाते ही फुदक कर भाग गईं। लेकिन एक बकरी फंस गई। ठकुराइन ने सारा गुस्सा, सारा उबाल उसी बकरी पर उतार दिया। डंडे का प्रहार इतना जबरदस्त था कि वह बकरी बेचारी वहीं छटपटा कर छितरा गई। कुछ ही क्षणों में उसने सांस से भी छुट्टी ली और वहीं आंगन में दम तोड़ बैठी।

ठकुराइन डर गईं। माथा पकड़ कर बैठ गईं। पहली चिंता जीव हत्या की थी, इस अपराध बोध में इस पाप बोध में तो वह थीं ही दूसरी और कहीं बड़ी चिंता यह थी कि जाने किस की बकरी थी यह। और जिस भी किसी की बकरी होगी उसे जेठ, देवर चढ़ा भड़का कर जाने क्या-क्या करवाएंगे ?

और उन का यह डर सचमुच सच साबित हुआ। यह बकरी एक खटिक की थी। उसने आसमान सिर पर उठा लिया। ठकुराइन समझ नहीं पा रही थीं कि क्या करें वह। क्योंकि वह खटिक अब छिटपुट गालियों पर भी उतर आया था। वह अपने जेठ और देवर से न तो हार मानना चाहती थीं न ही उन के सामने झुकने को तैयार थीं। मायके में भी बार-बार वह आंसू बहाते, शिकायत करते तंग हो गई थीं। सो हार मान कर उन्होंने घर में ताला लगाया और चुपचाप शहर का रास्ता पकड़ा। शहर पहुंच कर पता किया कि सबसे बड़ा वकील कौन है? फिर उस वकील के घर का पता लगा कर उसके घर पहुंची। सुंदर थीं ही सो घर में एंट्री पाने में मुश्किल नहीं हुई, न ही वकील से मिलने में। वकील के चैंबर में गईं तो कुछ लोग वहां और भी बैठे थे। सो वह थोड़ा संकोच घोलती हुई बोलीं, ‘माफ कीजिए मैं जरा प्राइवेट में बात करना चाहती हूं।’ सुंदर और जवान स्त्री खुद ही प्राइवेट बात करना चाहते तो भला कौन पुरुष इंकार कर पाएगा ? वकील साहब भी इंकार नहीं कर पाए। वहां बैठे बाकी लोगों को यथासंभव जल्दी-जल्दी निपटाया और जब सब लोग चैंबर से बाहर निकल गए तो उन्होंने मुंशी को बुला कर बता दिया कि, ‘थोड़ी देर तक किसी को भी अंदर नहीं आने देना।’ फिर ठकुराइन से वह बोले, ‘हां, बताइए मैडम!’ फिर मैडम ने बकरी वाली मुश्किल मय पट्टीदारी के लोगों द्वारा खटिक को चढ़ाने भड़काने के विस्तार से बताई और बोलीं, ‘जो भी पैसा खर्च होगा, मैं करूंगी।’ फिर वह हाथ जोड़ कर विनती करती हुई बोलीं, ‘लेकिन मुझे बचा लीजिए वकील साहब!’ फिर अपनी जगह से उठ कर वह उनके पास तक गईं और उनके पैर छूती हुई बोलीं, ‘मुझे बचा लीजिए।’ फिर जोड़ा, ‘किसी भी कीमत पर।’ वकील साहब ने मौका देख कर उनकी पीठ पर हाथ फेरा, सांत्वना दी और कहा, ‘घबराइए नहीं बैठिए, कुछ सोचता हूं।’

फिर थोड़ी देर तक वह चिंतित मुद्रा में मौन रहे। माथे पर दो-चार बार हाथ फेरा। कानून की दो चार किताबें अलटीं-पलटीं और लगभग परेशान हो गए।

उन की परेशानी देख कर ठकुराइन बेकल हो गईं। बोलीं, ‘का नहीं बच पाऊंगी?’

‘आप जरा शांत बैठिए।’ कह कर वकील साहब ने अपनी पेशानी पर परेशानी की कुछ और रेखाएं गढ़ीं। फिर कुछ और कानूनी किताबें अलटीं-पलटीं। और जब उन्हें सामने बैठी मैडम की मूर्खता भरी गंभीरता पर पूरी तरह यकीन हो गया और यह भी कि अब चूकना नहीं चाहिए। माथे पर हाथ फेरते हुए बोले, ‘दरअसल आपने किसी आदमी की हत्या की होती तो आसान था, बचा लेता। क्यों कि तब सिर्फ धारा 302 ही लगती। लेकिन आपने तो जीव हत्या कर दी है। सो मामला डबल हो गया है और 302 की बजाय मामला दफा 604 का हो गया है।’ वकील साहब थोड़ा और गंभीर हुए, ‘दिक्कत यही हो रही है तिस पर यह बकरी खटिक की है। और आप शायद नहीं जानतीं खटिक अनुसूचित जाति में आता है। सो एक पेंच यह भी पड़ेगा।’

ठकुराइन थोड़ा और घबराईं। बोलीं, ‘लेकिन हम तो आपका बड़ा नाम सुनी हूं। तभी आप के पास आई हूं।’ वह थोड़ा और खुलीं, ‘जो भी कीमत देनी होगी मैं दूंगी। खर्चा-बर्चा का आप फिकिर मत करिए, मैं सब करूंगी। चाहिए तो आप जज-वज सब सहेज लीजिए।’ वह लगभग घिघियाईं, ‘बस आप कइसो हमको बचा लीजिए। गांव में हमारी बेइज्जती न हो, पट्टीदारों के आगे सिर न झुके।’

‘घबराइए नहीं।’ वकील साहब ने भरपूर सांत्वना देते हुए कहा, ‘अब आप हमारे पास इतने विश्वास से आई हैं तो कुछ तो करना ही पड़ेगा।’ वह निशाना और दुरुस्त करते हुए बोले, ‘अब समझिए कि अगर आप को नहीं बचा पाया तो हमारी वकालत तो बेकार हो गई। मेरी थू-थू होगी और मैं वकालत छोड़ दूंगा।’ वह बोले, ‘तो आप निश्चिंत रहिए मैं जी जान लगा दूंगा। आप को कुछ नहीं होगा। उलटे उस खटिक को ही फंसवा दूंगा। कि आखि़र उसकी बकरी आप के घर में घुसी कैसे? उसकी हिम्मत कैसे हुई एक शरीफ और इज्जतदार अकेली औरत के घर में बकरी घुसाने की।’

ठकुराइन वकील साहब के इस कहे पर बड़ी आश्वस्त हुईं। उनके चेहरे पर खुशी की कुछ रेखाएं खिलीं। वह बुदबुदाईं ‘आपकी बड़ी कृपा।’ फिर वकील साहब ने कुछ वाटर मार्क और वकालतनामा पर उनसे दस्तख़त करवाए। खटिक का और उनका पूरा पता लिखा। एक हजार रुपए फीस के वसूले। और बोले, ‘मैडम आप निश्चिंत हो जाइए। आप की इज्जत को संभालना अब हमारा काम है।’ उन्होंने एहतियात के तौर पर उनसे यह भी कह दिया, ‘आप इज्जतदार और प्रतिष्ठित औरत हैं सो आप को कचहरी, इजलास दौड़ने धूपने से भी छुट्टी दिलवा दूंगा जज साहब को दरख्वास्त दे कर। नाहक वहां आने से बेइज्जती होगी। आप बस यहां आ कर सीधे हमसे ही मिलती रहिएगा।’ फिर वकील साहब ने आगाह किया कि, ‘हमारे मुंशी या किसी जूनियर वकील से भी इस केस की चर्चा मत करिएगा। भूल कर भी नहीं। नहीं एक मुंह से दो मुंह, दो से चार, चार से चालीस मुंह बात फैलेगी। ख़ामख़ा जगहंसाई होगी और केस में भी नुकसान हो सकता है, हो जाए। सो ध्यान रखिएगा यह बात हमारे आप के बीच प्राइवेट ही रहे।’

ठकुराइन बिलकुल किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह वकील साहब की सारी बातें मान गईं। और निश्चिंत भाव से खुशी-खुशी गांव लौट गईं। गांव पहुंचने पर खटिक ने फिर हल्ला दंगा किया। पर दूसरे दिन पुलिस आई और उस खटिक को पकड़ ले गई। हुआ यह था कि वकील साहब ने ठकुराइन की ओर से पुलिस में खटिक के खि़लाफ एक अप्लीकेशन दे कर जान माल का ख़तरा बता दिया। और पुलिस वालों को पटा कर धारा 107 और 151 में खटिक को बंद करवा दिया। अपना ही एक जूनियर लगा कर उसे दूसरे दिन जमानत पर छुड़वा भी दिया। उसे कचहरी में अपने तख्ते पर बुलवाया। दो सौ रुपए दिए और अपनी बात समझाई।

खटिक गांव में वापस गया और ठकुराइन से माफी मांगने की बात कही। ठकुराइन ने उलटे उसे झाड़ दिया। बोली, ‘जाओ कचहरी में नाक रगड़ो। माफी वहीं मांगो।’ ठकुराइन बिलकुल वीर रस में थीं। खटिक चला गया। लेकिन कुछ दिन बाद ही खटिक फिर भाव खाने लगा। ठकुराइन भाग कर शहर गईं। वकील से मिलीं उन्होंने फिर सांत्वना दी, फीस ली। बाद के दिनों में तो जैसे यह क्रम ही बन गया। खटिक ठकुराइन से कभी गिड़गिड़ाता, कभी भाव खा जाता। ठकुराइन फिर शहर जातीं और बात ख़त्म हो जाती। लेकिन कुछ दिनों में फिर उभर जाती। क्योंकि होता यह था कि ठकुराइन के खि़लाफ कोई मुकदमा तो वास्तव में था नहीं लेकिन खटिक के खि़लाफ 107 व 151 का मुकदमा तो था ही। सो वह पेशी पर शहर जाता, वकील से मिलता, सौ पचास रुपए लेता और वकील के कहे मुताबिक गांव में ‘ऐक्ट’ करता। कभी कहता कि, ‘अब कि तो मैं फंस गया। लगता है मुकदमा हमारे उलटा जाएगा।’ तो कभी कहता, ‘अब तो ठकुराइन बच नहीं पाएंगी। सजा इन्हीं को होगी।’ क्योंकि वकील साहब के यहां से ऐसा ही कुछ कहने का निर्देश होता। जब जैसा निर्देश होता खटिक वैसा ही गांव में आ कर ऐक्ट करता। ठकुराइन के जेठ, देवर, सास भी मामले की तह में गए बिना ठकुराइन की दुर्दशा का आनंद लेते।

ठकुराइन का अब शहर जाना भी बढ़ने लगा था। वकील साहब उनसे फीस तो ले ही रहे थे। डोरे भी डाल रहे थे। ठकुराइन को यह सब ठीक नहीं लगता। लेकिन गांव में उनकी इज्जत वकील साहब बचाए हुए थे सो वह इसे अनचाहे ही सही शुरू-शुरू में बर्दाश्त करती रहीं। लेकिन बाद में उन्हें भी यह सब ठीक लगने लगा। वकील साहब की पुरुष गंध में भी वह बहकने लगीं। शुरू-शुरू में तो वकील साहब के चैम्बर में ही प्राइवेट बातचीत के दौरान नैन मटक्का करतीं, उनके घर में ही ठहरतीं। लेकिन बाद में वकील साहब के ही घर में महाभारत मचने लगी। वो कहते हैं न कि लहसुन का खाना और पर नारी की सोहबत छुपाए नहीं छुपती सो बात धीरे-धीरे खुलने लगी  थी। क्योंकि ठकुराइन पहले तो सिर्फ मुवक्किल थीं, बाद में ख़ास मुवक्किल बनीं और फिर अचानक एकदम ख़ास बन गईं वकील साहब की। हालांकि देह की सांकल ठकुराइन ने वकील साहब के लिए नहीं खोली थी पर आंखों से होते हुए मन की सांकल तक तो वकील साहब आ ही गए थे, यह बात ठकुराइन भी जान गई थीं। वकील साहब के साथ सिनेमा-विनेमा, चाट, पकौड़ी भी वह करने लगी थीं। लेकिन बाद में वकील साहब के घर में झंझट जब ज्यादा शुरू हो गई तो वकील साहब उन्हें एक होटल में ठहराने लगे। कभी-कभार होटल पहुंच कर हाल चाल भी वह ले लेते। लेकिन जल्दी ही मुख्य हाल चाल पर आ गए और ठकुराइन की मीठी-मीठी ना नुकुर के बावजूद उन्होंने उनकी देहबंध को आखि़र लांघ लिया। अब कई बार वकील साहब होटल में ही ठकुराइन के साथ दिन रंगीन कर लेते। लेकिन होटल में कई बार असुविधा होती सो उन्होंने ठकुराइन को शहर में ही घर ख़रीदने की राय दी। ठकुराइन ने घर ख़रीदा तो नहीं पर एक इंडिपेंडेंट घर किराए पर ले लिया। यह कह कर कि बाद में ख़रीद भी लूंगी। बाद में उन्होंने आवास विकास परिषद का एक एम.आई.जी. मकान ख़रीदा भी। इस बीच दो तीन बार एबॉर्शन की भी दिक्कत उठानी पड़ी ठकुराइन को। अंततः वकील साहब ने एक प्राइवेट डाक्टर से उन्हें कापर टी लगवा दिया। अब कोई दिक्कत नहीं थी। वकील साहब गांव में ठकुराइन की इज्जत बचाने की फीस धन और देह दोनों में वसूल रहे थे। सिलसिला चलता रहा। खटिक का 107 और 151 का मुकदमा कब का ख़त्म हो गया था लेकिन ठकुराइन के खि़लाफ दफा 604 का मुकदमा ख़त्म नहीं हो रहा था।

लेकिन ठकुराइन को इसकी फिकर नहीं थी।

वह तो आकंठ वकील साहब को जी रही थीं। हां, वकील साहब उन्हें जरूर नहीं जी रहे थे, वह तो भोग रहे थे। कभी-कभी किसी बात पर दोनों के बीच खटपट भी होती। लेकिन कुछ ही दिनों की तनातनी के बाद वकील साहब उन्हें ‘मना’ लेते। हालांकि तनातनी के दिनों ठकुराइन गांव चली जातीं। खेती बारी बटाई पर दे रखी थी। हिस्से में जो अनाज मिलता उसको बेच बाच कर खर्च चलातीं। कुछ भविष्य के लिए बैंक में भी जमा करती रहतीं। धीरे-धीरे समय बीतता गया। ठकुराइन भले देह सुख में डूब कुछ देखती सुनती नहीं थीं। पर लोग सब कुछ देख सुन रहे थे। गांव में जिस इज्जत बचाने के फेर में वह इस फांस में फंसी थीं वहां भी लोग दबी जबान और छुपे कान से ही सही जान चले थे कि जेठ, देवर को धूल चटाने वाली ठकुराइन शहर में एक वकील की रखैल बन गई हैं। बात ठकुराइन के मायके तक भी पहुंची। उनके भाई ने एकाध बार ऐतराज भी जताया पर बाद के दिनों में वह सिंगापुर चला गया कमाने। पिता का निधन हो गया। देवर, जेठ को वह मक्खी-मच्छर बराबर भी नहीं समझती थीं। गांव में ज्यादातर रहती नहीं थीं कि ताना सुनें। दूसरे, घर में कामधाम करने वाले, देखभाल करने वालों को पैसा, अनाज की मदद दे कर इतना उपकृत किए रहतीं कि वह होठ खोलना तो दूर डट कर आंख मूंद जाते। और जो कोई ठकुराइन की अनुपस्थिति में कभी कभार इन आदमियों से चर्चा चलाता भी तो ये सब तरेर देते। कहते, ‘ठकुराइन मलकिन पर अइसन लांछन की बात हमारे सामने करना भर मत। नहीं, जीभ खींच लूंगा।’

लोग प्रतिवाद करते, ‘तो शहर में रहती काहें हैं?’

‘इहां के नरक से ऊब कर।’ आदमी जोड़ते, ‘फिर यहां मलकिन को सुविधा भी कहां है ? शहर में बड़ी सुविधा है। सड़क है, बिजली है, दुकान हैं, सनीमा है। और एहले बड़ी बात वहां फटीचर नहीं हैं। इहां की तरह छोटी-टुच्ची बात करने के लिए।’

‘हां भई, जिसका खाओ, उसका बजाना भी पड़ता है।’ कह कर लोग बात ख़त्म कर देते।

लेकिन बात ख़त्म कहां होती थी भला?

दिन गुजश्रते गए। अब ठकुराइन के चेहरे से लावण्य छुट्टी लेने लगा था। विधवा जीवन का फ्रस्ट्रेशन और अनैतिक जीवन जीने का तनाव उनके चेहरे पर साफ दीखने लगा था। हालांकि शहर में वह पड़ोसियों से कोई ख़ास संपर्क नहीं रखती थीं और पूरी शिष्टता, भद्रता के साथ सिर पर सलीके से पल्लू रख कर ही घर से बाहर निकलती थीं तो भी तड़ने वाली आंखें तड़ लेती थीं। हालांकि घर में काम करने के लिए एक बूढ़ी औरत और एक छोटा लड़का भी वह अपने मायके से लाई थीं। तो भी अकेली औरत के पास जब तब एक पुरुष आता जाता रहे तो कोई सवाल न भी उठाए फिर भी सुलग जाता है। फिर उनकी अकेली औरत का ठप्पा! लोग कहते बिना पतवार की नाव है जो चाहे, जिधर चाहे बहा ले जाए। पर अब दिक्कत  यह थी कि बढ़ती उम्र के साथ-साथ उनका अकेलापन अब उन्हें सालने लगा था। इस अकेलेपन से ऊब कर दो एक बार वकील साहब से दबी जबान शादी कर लेने को भी उन्होंने कहा। पर वकील साहब टाल गए। उनकी दलील थी कि, वह बाल बच्चेदार हैं, शहर में उनकी हैसियत और रुतबा है सो लोग क्या कहेंगे? दूसरी दलील उम्र के गैप की थी, तीसरी दलील उनकी यह थी कि आप क्षत्रिय जाति की हैं और मैं कुर्मी। इस पर भी समाज में विवाद खड़ा हो सकता है। इसलिए यह संबंध जैसे चल रहा है वैसे ही चलने दें। इसी में हम दोनों की भलाई है और समाज की भी। ठकुराइन जबान पर तो लगाम लगा गईं पर मन ही मन कसमसाने भी लगीं। उन्होंने सोचा कि अब वकील साहब से पूरी तरह किनारा कर लें। पर वह यह सब अभी सोच ही रही थीं कि उन्होंने पाया कि अब वकील साहब खुद ही उनसे किनारा करने लगे हैं। अब उनका उन के घर में आना जाना भी कम से कम हो गया था। वह सब कुछ छोड़ कर अब गांव वापस जा कर रहने की सोचने लगी थीं। लेकिन उन का दफा 604 वाला बकरी की हत्या वाला केस भी फंसा पड़ा था। लेकिन उन्होंने गौर किया कि अब वकील साहब उनके केस पर भी बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे थे। न उन पर, न उन के केस पर।

ठकुराइन की चिंताओं का अब कोई पार नहीं था।

बाद में उन्होंने जब इसकी तह में जा कर पता लगाया तो एक बात तो साफ हो गई कि एक लड़की वकील साहब की जूनियर बन कर आ गई थी, वकील साहब की दिलचस्पी अब उस जूनियर वकील में बढ़ गई थी। यह तो वह समझीं। पर उनके केस में वह क्यों दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं यह वह समझ नहीं पा रही थीं। उन्होंने सोचा कि किसी दूसरे वकील से इस बारे में दरियाफ्त करें लेकिन उन्हें याद आई वकील साहब की हिदायत कि, ‘किसी भी से जिक्र नहीं करिएगा वरना केस बिगड़ जाएगा।’

सो वह चुप लगा गईं।

लेकिन कब तक चुप लगातीं भला? वकील साहब के चैंबर में उनका आना जाना बढ़ गया। वकिलाइन भी अब उनको देख कर नाराज नहीं होती थीं न ही कुढ़ती थीं। अब तो उनको कुढ़ने के लिए वह जूनियर वकील मिल गई थी। अब वकील साहब चैम्बर में प्राइवेट में उस जूनियर वकील से मिलते। इस फेर में कई बार ठकुराइन को भी बाहर बैठना पड़ जाता। उनको यह सब बहुत बुरा लगता लेकिन मन मसोस कर रह जातीं।

अब जब वह चैम्बर के बाहर बैठतीं तो चाहे अनचाहे किसी न किसी से बातचीत भी शुरू हो जाती। इस तरह आते जाते लोगों से परिचय भी बढ़ने लगा। हालांकि विधवा होने के नाते वह सादी साड़ी पहनतीं। मेकअप भी नहीं करतीं। वह सिर पर पल्लू रख कर बड़े अदब से, सलीके और शऊर से बतियातीं, गंभीर भी रहतीं, आंखों में शील संकोच सहेजे ज्यादा किसी से हंसती मुसकुराती नहीं थीं तो भी अब पहले की तरह सबको वह अनदेखा भी नहीं करतीं। पहले अपनी सुंदरता और जवानी का गुरूर भी था। सो सबको अनदेखा करते चलतीं। पर अब सुंदरता का वह गुरूर भी उतार पर था। वह चालीस की उम्र छू रहीं थीं तो भी जब वह रिक्शे से या पैदल जैसे भी चलतीं लोग मुड़-मुड़ कर उन्हें देखते जरूर। तो उन्हें लगता कि अभी जवानी बाकी है। अभी भी उन की देहयष्टि में दम है। उन्हें अपने पर गुरूर आ जाता।

इसी गुरूर में वह एक रोज एक सड़क पर खड़ी रिक्शा ढूंढ़ रही थीं। कि तभी वकील साहब का एक पुराना जूनियर वकील मोटर साइकिल से उधर से ही गुजरा। ठकुराइन को देख कर ठिठका, नमस्कार किया। रुका और हाल चाल पूछा। कहा कि, ‘जहां जाना हो चलिए मैं पहुंचा देता हूं।’ पर ठकुराइन ने बड़ी शालीनता से पल्लू ठीक करती हुई इंकार कर दिया। बोलीं, ‘जी बहुत मेहरबानी पर मैं रिक्शे से चली जाऊंगी। आप काहें तकलीफ करेंगे?’ कह कर वह वकील को टाल गईं। पर वकील गया नहीं रुका रहा। बोला, ‘अच्छा रिक्शा मिलने तक तो आप का साथ दे सकता हूं।’

‘हां, हां क्यों नहीं?’ हलका सा मुसकुरा कर ठकुराइन बोलीं। वकील इधर-उधर की बात करते हुए अनायास ही उनके केस के बारे में बात करने लगा। पूछते-पूछते जिरह करने लगा। हालांकि ठकुराइन उसकी हर जिरह टालती रहीं। पर जूनियर वकील जैसे ढिठाई पर उतर आया, ‘आखि़र कैसा केस है आपका जो इतने बरसों से ख़त्म नहीं हो रहा है। एक्कै कोर्ट में अटका पड़ा है।’

ठकुराइन फिर भी चुप रहीं।

‘अब तक तो केस हाई कोर्ट में पहुंच जाता है अपील में इतने सालों में और आपका केस अभी डिस्ट्रिक्ट जज के पास भी नहीं पहुंचा ? आखि़र है क्या?’

‘आप नहीं जानेंगे वकील साहब! बहुत बड़ा मामला है। वह तो वर्मा जी वकील साहब हैं कि बचाए हुए हैं नहीं तो हम तो फंस ही गई थीं।’

‘लेकिन केस है क्या?’ वह जूनियर वकील बोला, ‘आपकी कोई फाइल भी नहीं है चैम्बर में कि हम लोग देखते।’

‘केस बड़ा है इस लिए वकील साहब खुद देखते हैं।’

‘अरे तब भी फाइल कभी तो कोर्ट जाएगी-आएगी। तारीख़ लगेगी।’ वह माथे का पसीना पोंछते हुए बोला, ‘आखि़र केस है क्या ?’

‘दफा 604 का।’ ठकुराइन आहिस्ता से बोल पड़ीं।

‘दफा 604 ?’ वकील भड़का, ‘यही बताया न आपने कि दफा 604!’

‘जी।’ ठकुराइन ऐसे बोलीं जैसे यह बता कर कोई पाप कर बैठी हों। बोलीं, ‘जाने दीजिए। आप जाइए।’

‘हम तो चले जाते हैं मैडम पर दस बारह साल से हम भी इस कचहरी में प्रैक्टिस कर रहे हैं। थाना, एस.पी. भी देख रहे हैं। और आई.पी.सी. भी। तो भारतीय कानून में ऐसी कोई दफा तो है नहीं अभी तक। वह जूनियर वकील बोला, ‘बल्कि आई.पी.सी. में जो अंतिम दफा है वह है दफा 511 बस ! तो 604 कहां से आ जाएगी?’

‘लेकिन वर्मा जी तो हम को यही बताए थे कि दफा 604 हो गया।’’ ठकुराइन हकबकाती हुई बोलीं।

‘हो सकता है आप के सुनने में गलती हो गई हो।’ जूनियर वकील बोला, ‘ख़ैर, छोड़िए मामला क्या था ? हुआ क्या था आप से?’

‘मतलब?’ असमंजस में पड़ती हुई ठकुराइन बोलीं।

‘मतलब यह कि आप से अपराध क्या हुआ था?’

‘बकरी मर गई थी हमारे मारने से। एक खटिक की थी।’

‘ओ हो!’ ताली बजाते हुए जूनियर वकील बोला, ‘मुलेसर खटिक की तो नहीं?’

‘हां, लेकिन आप कैसे जानते हैं?’ ठकुराइन फिर अफनाईं।

‘जानता हूं? अरे पूरी कुंडली जानता हूं।’

‘कैसे?’

‘कचहरी में तख्ते पर बराबर आता है।’ वह बोला, ‘‘मैडम माफ कीजिए वर्मा साहब ने आप को डंस लिया।’

‘का कह रहे हैं आप?’

‘बताइए चैंबर में आपसे फीस लेते हैं तख्ते पर उस मुलेसर खटिक को फीस देते हैं तो का मुफ्त में? वह बोला, ‘फिर आप भी मैडम इतनी भोली हैं? घर में आगा पीछा कोई नहीं है का?’

‘काहें नाहीं सब कोई है।’

‘तो फिर कोई ये नहीं बताया कि बकरी मारना कोई अपराध नहीं।’

‘पर खटिक की थी।’ वह बोलीं, ‘ऐसा ही वकील साहब बोले थे।’

‘अरे लाखों बकरियां देश में हर घंटे कटती हैं। खटिक की हो या जुलाहा की। कोई दफा किसी पर लगती है क्या ?’ वह बोला, ‘चलिए गलती से किसी का नुकसान हो गया तो उसको उसका खर्चा-मुआवजा और अधिक से अधिक बकरी का दाम दे दीजिए। ई का कि फर्जी दफा 604 जो कहीं हइयै नहीं है, उसको सालों साल वकील के चैंबर में लड़िए।’ वह बोला, ‘आप तो मैडम फंस गईं?’

‘का बोल रहे हैं आप। सही-सही बोलिए।’ ठकुराइन जैसे अधमरी हो गईं। बोलीं, ‘‘वकील साहब तो बोले थे कि आदमी मारते हैं तो दफा 302 लगता है, आदमी की बकरी मार दिए तो डबल दफा लगती है दफा 604 और हमको अब तक बचाए भी हैं वो।’

‘आप बड़ी भोली हैं मैडम। आप को बचाए नहीं बेचे हैं। आप को बरगलाए हैं ऊ कानून के बाजार में। जो दफा कहीं भारतीय कानून में है ही नहीं।’ वह बोला, ‘हम पर विश्वास न हो तो आइए कचहरी किसी वकील, किसी जज से दरियाफ्त कर लीजिए!’

‘अब हम का बताएं, कहां आएं ?’ बोल कर ठकुराइन फफक कर रो पड़ीं। रोते-रोते वहीं सड़क पर सिर पकड़ कर बैठ गईं।

‘आप को हम पर यकीन न हो तो चैंबर में आ कर वर्मा साहब से ही पूछ लीजिए कि यह दफा 604 आई.पी.सी. में कहां है? और कि आपका केस किस कोर्ट में चल रहा है? सब कुछ दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा।’ जूनियर वकील बोला, ‘बस भगवान के लिए हमारा नाम मत बोलिएगा। मत बताइएगा कि हमने ई सब बताया है।’ वह बोला, ‘हां, जो हम झूठ साबित हो जाएं तो वहीं हमको अपने इस सैंडिल से मारिएगा, हम कुछ नहीं बोलूंगा।’ कह कर वह चलने लगा। बोला, ‘मैडम माफ कीजिए आप के साथ बड़ा भारी अन्याय कर दिया वर्मा साहब ने।’ पर ठकुराइन कुछ नहीं बोलीं। उनके मुंह में शब्द ही नहीं रह गया था। लोग आसमान से जमीन पर ऐसे में आ जाते हैं पर उनको लगता था कि वह आसमान से सीधे पाताल में जा कर डूब गई हैं। उनको गुमसुम देख कर वह वकील बोला, ‘हमारे साथ तो आप मोटर साइकिल पर बैठेंगी नहीं। रुकिए मैं आप के लिए रिक्शा बुलाता हूं।’ कह कर वह एक रिक्शा बुला कर लाया। ठकुराइन सड़क पर से उठीं, धूल झाड़ती हुई रिक्शे पर बैठीं। उन्होंने गौर किया कि कलफ लगी उनकी क्रीम कलर की साड़ी जगह-जगह काली पड़ गई थी, सड़क पर बैठ जाने से। उस वकील ने जाते-जाते उन्हें फिर नमस्कार किया। बोल कर, ‘मैडम नमस्कार!’ पर मैडम के मुंह से शब्द गायब थे। वह भौंचक थीं। उन्होंने धीरे से दोनों हाथ जोड़ दिए।

‘वर्मा जी ने इतना बड़ा धोखा दिया।’ रिक्शा जब चलने लगा तो वह अपने आप से ही बुदबुदाईं। वह निकली थीं बाजार जाने को पर वापस घर आ गईं। बुढ़िया महरी से पानी मांगा, पानी पी कर लेट गईं। दो दिन तक वह घर में ही पड़ी रहीं। बेसुध!

तीसरे दिन उन्होंने अपने पति का वह पुराना कुर्ता पायजामा फिर से ढूंढा। मिला तो वह जगह-जगह से कट पिट गया था। गईं बाजार, एक नया कुर्ता पायजामा और अंगोछा ख़रीदा। घर आईं पहना। अंगोछा गले में लपेटा, दोनाली बंदूक उठाई और रिक्शा ले कर पहुंच गईं सीधे वर्मा वकील के चैंबर पर। वह धड़घड़ाती हुई घुसीं। मुंशी ने उन का वेश देख कर उन्हें रोका भी कि, ‘साहब प्राइवेट बात कर रहे हैं।’ पर वह मानी नहीं बिन कुछ बोले चैंबर में घुस गईं। जब वह चैंबर में घुसीं तो सोफे पर बैठे वर्मा वकील की गोद में उनकी जूनियर वकील बाल खोले लेटी पड़ी थी और वह उसके स्तनों, कपोलों से खेल रहे थे। ठकुराइन को एक बारगी देख कर पहले तो वह पहचान भी नहीं पाए। दूर छिटक कर हड़बड़ाते हुए बोले, ‘कौन-कौन?’

‘दफा 604 हूं। पहचाने नहीं?’ ठकुराइन बिलबिलाईं।

‘अरे मैडम आप?’ ठकुराइन के हाथों में बंदूक देख कर घबराए वकील साहब की हलक सूख गई। सूखे गले से बोले, ‘बैठिए-बैठिए! बैठिए तो पहले।’

‘बैठने नहीं आई हूं। दफा 604 क्या होता है, कहां होता है जानने आई हूं।’ वह घुड़क कर बोलीं।

‘बैठिए तो।’ वकील साहब बोले, ‘शरीफ इज्जतदार महिला हैं आप। बैठिए तो।’

‘शरीफ और इज्जतदार ? मैं हूं ?’ वह बोलीं, ‘यह आप बोल रहे हैं?’

‘अरे बैठिए तो!’ वह बोले तब तक जूनियर वकील लड़की अपने कपड़े लत्ते ठीक-ठाक कर धीरे से सरक कर चैंबर से बाहर निकल गई। फिर चैंबर में मुंशी और जूनियर वकील भी आ पहुंचे। शोरगुल सुन कर घर के लोग भी आ गए। वकिलाइन भी। ठकुराइन का यह नया रूप देख कर वह भी ठक हो गईं। बड़ी मुश्किल से घर की औरतों और मुंशी ने मिल कर ठकुराइन को काबू किया। पर ठकुराइन लगातार दफा 604 की किताब मांगती रहीं, किस कोर्ट में उनका केस चल रहा है उस कोर्ट और जज का नाम पूछती रहीं। पर ठकुराइन के किसी भी सवाल का जवाब वकील साहब के पास नहीं था। वह कहने लगे, ‘मैडम इस समय आप अशांत हैं। जाइए घर पर आराम कीजिए। शांत हो कर आइएगा तब बात करेंगे।’

‘अच्छा छोड़िए।’ ठकुराइन वकिलाइन को खींचती हुई बोलीं, ‘आप ही इनसे पूछिए और जरा शांति से पूछिए कि बकरी मारने का जुर्म क्या होता है दफा 604? और नहीं तो फिर क्या होता है।’

‘हम कानून नहीं जानतीं।’ वकिलाइन डरी सहमी बोलीं।

‘अच्छा झूठे ही बहला फुसला कर किसी शरीफ औरत को रंडी बना दिया जाए, रखैल बना लिया जाए, इस अपराध का क्या कानून होता है। यह तो जानती होंगी?’ ठकुराइन सिसकते हुए दहाड़ीं। पर वकिलाइन सब कुछ समझते हुए भी चुप रहीं।

‘मैं हूं इस वर्मा वकील की रखैल!’ ठकुराइन बोलीं, ‘दफा 604 की मुजरिम जो इस वर्मा ने बनाया और मुझे इस दफा से बचाते-बचाते मुझ बेवा औरत को रंडी बना दिया, रखैल बना लिया। मेरे ही खर्चे पर। और अपनी फीस भी लेता रहा दफा 604 से बचाने के लिए।’ वह बिफरीं, ‘बताइए इतने सालों तक यह दोखी मुझे लूटता रहा। मैं क्या करूं? हे भगवान।’ कह कर वह फफक कर रो पड़ीं। फिर बंदूक उठाई। ट्रिगर दबाया वर्मा वकील को निशाना बना कर। सब लोग मारे डर के एक तरफ हो गए। पर गोली नहीं चली। इस अफरा तफरी में किसी ने धीरे से गोलियां बंदूक से निकाल दी थीं। ठकुराइन हैरान थीं। गोली निकल गई है वह फौरन  समझ गईं। उन्होंने आव देखा न ताव बंदूक पलटी और उसकी बट से ही वर्मा वकील पर धड़ाधड़ प्रहार किए। उस बकरी से भी ज्यादा प्रेशर का प्रहार! वर्मा जी का सिर फूट गया और मुंह भी। दौड़ कर लोगों ने ठकुराइन को पकड़ा। वकील साहब को बचा कर चैंबर से बाहर ले गए। ठकुराइन को समझाया बुझाया। उन्हें उनके घर भेजा। और वकील साहब को अस्पताल।

डाक्टरों ने बताया कि वकील साहब को हेड इंजरी हो गई है और वह कोमा में चल गए हैं। अब वकिलाइन दहाड़ मार कर रो पड़ीं। डाक्टरों ने उन्हें सांत्वना दी। दो दिन बाद वकील साहब होश में आ गए।

पर उधर पता चला कि ठकुराइन पागल हो गई हैं वह काला कोट पहने गले में फीता बांधे देख किसी को भी देखतीं, पत्थर, डंडा जो भी मिलता चला देतीं। दस पंद्रह वकील इस तरह घायल हो चुके थे। यह भी पता चला कि यह पता चलते ही ठकुराइन के जेठ, देवर फौरन शहर आ गए। उन्हें मानसिक चिकित्सालय में भरती करा दिया। और उनके इलाज पर तो उतना ध्यान नहीं दिया जितना इस बात पर कि वह लोग उनकी जायदाद के वारिस हैं। और ठकुराइन के जेठ, देवर के इस कानूनी दांव पेंच में भी ठकुराइन के खि़लाफ खड़े हुए यही वर्मा वकील।

बाद के दिनों में पागलपन के बिना पर ठकुराइन की जमीन जायदाद उनके जेठ, देवर ने अपने नाम करवा ली। और ठकुराइन फिर पागलखाने से बाहर आ गईं। कभी कुर्ता-पायजामा तो कभी पैंट कमीज पहने वह शहर की सड़कों पर नजर आतीं जिस तिस वकील को पत्थर ईटें मारती हुई। लोग उन्हें देखते ही कहते, ‘भागो भइया दफा 604 आ गई।’ और वह भी ईटें, पत्थर किसी पर भी चलाती हुई चिल्लातीं, ‘लो दफा  604 हो गया!’

और अब इन्हीं वर्मा वकील का बेटा अनूप लोक कवि को वीडियो अलबम बनाने का झांसा दे कर उन्हें फंसा रहा था। और फिलहाल मोबाइल फोन ख़रीदने की जुगत उन्हें बता रहा था। चेयरमैन साहब ने लोक कवि को आगाह भी किया कि, ‘जैसे बाप ने दफा 302 को डबल कर 604 में तब्दील कर उस ठकुराइन को पागल बना दिया वैसे ही उस चार सौ बीस वकील का यह बेटा भी उसका डबल यानी आठ सौ चालीस है तुम्हें खा जाएगा!’ लेकिन चेयरमैन साहब की हर अच्छी बुरी बात मान लेने वाले लोक कवि ने उन की इस बात पर जाने क्यों कान नहीं दिया।

अनूप ने अंततः लोक कवि को ऊषा का एक सेलुलर फोन ख़रीदवा दिया। सिम कार्ड डलवा कर लोक कवि सेलुलर फोन ऐसे इस्तेमाल करते गोया हाथ में फोन नहीं रिवाल्वर हो। बात भी वह बहुत संक्षिप्त करते और बात कई बार पूरी भी नहीं हो पाती तो भी वह खट से काट देते। लेकिन एक बार बंबई में कोई प्रोग्राम करने के बाद लोक कवि वापस आ रहे थे तो उन का यह सेलुलर फोन गायब हो गया। लोग पूछते भी कि, ‘कैसे गायब हो गया?’ तो लोक कवि बताते, ‘पी के टुन्न हो गया था, ट्रेन में कौनो मार लिया।’

‘कौन मार लिया?’ सवाल का जवाब अमूमन लोक कवि टाल जाते। लेकिन ग्रुप के अधिकतर कलाकारों का मानना था कि मोबाइल अनूप ने ही चुराया। दिक्कत यह थी कि लोक कवि का इस बार सिर्फ मोबाइल ही नहीं दस हजार रुपया भी साथ ही गायब हुआ। लेकिन रुपए के लिए लोग अनूप का नहीं मीनू का नाम बताते।

जो भी हो लोक कवि ने न तो अनूप से कुछ कहा न ही मीनू से। अनूप से तो उन्हें उतनी तकलीफ नहीं हुई जितनी कि मीनू से हुई। मीनू जिसके लिए उन्होंने क्या कुछ नहीं किया था? दो कमरे का छोटा ही सही एल.डी.ए. का एक मकान ख़रीद कर न सिर्फ दिया था बल्कि उसकी पूरी गिरस्ती बसाई थी। प्रोग्रामों के फेर में हांलैंड, इंगलैंड, बैंकाक, अमरीका, मारीशस, सूरीनाम जैसे कई देश घुमाया। मर्द ने छोड़ दिया तो उसको पूरा आसरा दिया। और तो और एक बार न जाने किसका गर्भ पेट में उसके आ गया तो उसने जाने कहां गुप चुप एबॉर्शन करवाया जो ठीक से हुआ नहीं और भ्रूण पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ, कोई कण बच्चेदानी में ही रह गया। उसकी जान सांसत में फंस गई। लगा कि बच नहीं पाएगी। ऐसे में भी लोक कवि ने दिल्ली ले जा कर उसका इलाज एक एक्सपर्ट डाक्टर से करवाया तब कहीं जा कर वह बची थी। लोक कवि ने पानी की तरह पैसा बहा कर उसकी जान बचाई थी, लगभग उसे नया जीवन दिया था। इस तरह जिसे जीवन दिया, आसरा दिया, अपने ग्रुप में स्टार कलाकार की हैसियत दी, कई विदेश यात्राएं कराईं। वह मीनू धोखे से उनका रुपया चुरा ले? वह मीनू जिसे वह अपना मन भी देते थे। वह मीनू? तकलीफ उन्हें बहुत हुई पर मन ही मन पी गए वह सारी तकलीफ। किसी से कुछ कहा नहीं। कहते भी तो क्या कहते? चुप ही रहे। लेकिन मन ही मन टीसते रहे।

उन्होंने अब नया मोबाइल फोन ख़रीद लिया था। चोरी न जाए इस लिए चौकन्ना बहुत हो गए थे। लेकिन जल्दी ही यह नया मोबाइल भी उनके कैंप रेजीडेंस से ही एक रात गायब हो गया। फिर उन्होंने तीसरा मोबाइल फोन ख़रीदा। लेकिन सेकेंड हैंड। अनूप ने ही ख़रीदवाया। लोक कवि जानते थे कि यह भी चोरी हो जाएगा। फिर भी ख़रीदा। हालांकि मोबाइल फोन की बहुत उपयोगिता उनके पास थी नहीं। क्योंकि ज्यादातर वह कार्यक्रमों में व्यस्त रहते जहां वह मोबाइल सुन नहीं पाते। डिस्टर्ब होते वह फोन से। ध्यान टूट जाता। दूसरे, संगीत के शोर में ठीक से सुनाई नहीं देता। और जब कार्यक्रम नहीं होता तब वह अमूमन अपने कैंप रेजीडेंस पर ही होते और यहां उनके पास टेलीफोन था ही। तो भी स्टेटस सिंबल मान कर वह मोबाइल फोन रखते। सोचते कि अगर लोग उनके हाथ में मोबाइल फोन नहीं देखेंगे तो मान लेंगे कि आमदनी कम हो गई है, मार्केट ठंडा पड़ गई है इसलिए मोबाइल फोन बिका गया। हैसियत नहीं रही। अमूमन जमीनी हकीकत पर रहने वाले और जिंदगी की हकीकत को अपने गानों में ढालने वाले लोक कवि दिखावे की नाक मेनटेन करने लगे थे। यह उन को खुद भी बुरा लगता था, लेकिन फिलहाल तो वह फंस गए थे। हालांकि उन्होंने यह भी ऐलान कर दिया था कि, ‘अबकी जो मोबाइल चोरी हुआ तो फेर नहीं ख़रीदूंगा!’ फिर वह जैसे खुद को तसल्ली देते, ‘फिर ई सेकेंड हैंड मोबाइल कोई चोरी करेगा क्या?’ लेकिन यह भ्रम भी उनका टूटा और जल्दी ही टूटा। यह सेकेंड हैंड मोबाइल भी चोरी हो गया।

लेकिन अपने ऐलान के मुताबिक उन्होंने फिर चौथा मोबाइल नहीं ख़रीदा।

फिर भी वह परेशान थे चोरियों से। अब उनके यहां तरह-तरह की चोरियां होने लगी थीं। इस कैंप रेजीडेंस में उनका जांघिया अंगोछा तक सुरक्षित नहीं रह गया था। कई-कई जोड़े वह रखते जांघिया, अंगोछे के फिर भी कई बार उन के लिए जांघिया अंगोछे का अकाल पड़ जाता। एक बार एक लड़की को उन्होंने पकड़ा भी रंगे हाथ तो वह बोली, ‘मासिक आ गया है गुरु जी, बांधना है!’ तो वह डपटे भी, ‘तो हमारा ही जांघिया, अंगोछा बांधोगी?’ वह बोली, ‘आखि़र का बांधें गुरु जी, कुर्ता पायजामा तो आपका बांध नहीं सकती!’ लोक कवि यह सुन कर निरुत्तर हो गए। उसे पैसे देते हुए बोले, ‘केयर फ्री टाइप कुछ मंगवा लो। वही बांधो!’

तो भी वह आए दिन की चोरियों से परेशान हो गए थे। पैसा, कुरता, पायजामा कुछ भी नहीं बचता। बिस्तर की चद्दर तक गायब होने लगी थी। वह कहते भी कि, ‘असल में ई लड़कियां गरीब परिवार से आती हैं तो अपने बाप भाई के लिए अंगोछा, जांघिया उठा ले जाती हैं, बिस्तर की चद्दर भी ले जाती हैं। पइसा कौड़ी भी ले जाती हैं तो चलिए बरदाश्त कर लेता हूं। पर इसका का करूं कि सम्मान में मिली शाल भी मंचवे पर से गायब हो जाती है!’ वह बिफरते, ‘बताइए सम्मान की शाल भोंसड़ी की सब चुरा लेती हैं! यही बात खटकती है।’ वह जैसे जोड़ते, ‘गरीबी का मतलब ई थोड़े है कि जिससे रोजी रोटी मिले उसी के घर चोरी करो!’ वह बोलते, ‘ई तो पाप है पाप। अरे, हम भी गरीबी देखा हूं, भयंकर गरीबी। चूहा मार के खाते थे, बकिर चोरी नहीं किया कभी।’ वह कहते, ‘आज भी जब कभी हवाई जहाज पर चढ़ता हूं उड़ते हुए नीचे देखता हूं तो रोता हूं। काहें से कि अपनी गरीबी याद आ जाती है। पर हम कबो चोरी नहीं किए!’

लेकिन लोक कवि चाहे जो कहें उनके यहां चोरी चौतरफा चालू थी। और अब तो उनके कुछ शिष्य कलाकार जो अलग ग्रुप बना लिए थे, लोक कवि का ही गाना गाते थे और गाने के आखि़र में तखल्लुस के तौर पर जहां लोक कवि का नाम आता था वहां से लोक कवि का नाम हटा कर अपना नाम जोड़ कर गा देते थे। पहले भी कुछ शिष्य ऐसा करते थे पर कभी कभार और चोरी छुपे। पर अब तो अकसर और खुल्लमखुल्ला। लोक कवि से इस बात की कोई शिकायत करता तो वह दुखी तो होते पर कहते, ‘जाने दीजिए सब कइसो कमा खा रहे हैं, जीने खाने दीजिए!’ पर जब कोई फिर भी प्रतिवाद करता तो वह कहते, ‘हमारे गाने में कोई अपना नाम खोंस लेता है तो गाना तो उसका नहीं न हो जाता है ? एह गाना का कैसेट है बाजशर में हमारे नाम से। लोग जानते सुनते हैं गानों को हमारे नाम से।’

‘तो भी!’ कहने वाला फिर भी प्रतिवाद करता।

‘तो भी?’ कह कर वह बिगड़ जाते, ‘चलिए इस कलाकार को तो हम बुला कर डांट दूंगा। बकिर किस-किस को डांटता फिरूंगा?’

‘का मतलब?’

‘मतलब ई कि बंबई से ले कर पटना तक हमारे गानों की चोरी हो रही है। हमारे ही गानों की धुन, हमारे ही गाने को भोजपुरी से बदल कर हिंदी में केहू से लिखवा-गवा कर फिल्मों में गोविंदा हीरो बने नाच रहे हैं तो हम का करूं? कई लोग भोजपुरियै में एने वोने बदल कर गा रहे हैं तो हम का करूं? केसे-केसे झगड़ा-लड़ाई करूं?’ उनकी तकलीफ जैसे उन की जबान पर आ जाती, ‘अब जब गाना सुनने वालों को ही फिकिर नहीं है तो अकेले हम का करूंगा?’ फिर वह अपने गानों की एक लंबी फेहरिस्त गिना जाते  कि कौन-कौन से गाने फिल्मों में चुरा लिए गए। तब जब कि इन गानों के कैसेट पहले ही से बाजार में थे। फिर वह बड़ी तकलीफ से बताते, ‘बकिर क्या कीजिएगा भोजपुरी गरीब गंवार की भाषा है। कोई इस के साथ कुछ भी कर ले भोजपुरिहा लोग चुप लगा जाते हैं। जइसे गरीब की लुगाई है भोजपुरी सो सबकी भौजाई है।’ वह रुकते नहीं बोलते जाते, ‘लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री हुए। पाकिस्तान को हरा दिए, देश को जिता दिए लेकिन भोजपुरी को जिताने की फिकिर नहीं की। चंद्रशेखर जी अपने बलिया वाले, अमरीका के जहाज को तेल दे दिए इराक की लड़ाई में बकिर भोजपुरी को सांस नहीं दे पाए। कुछ हजार लोगों की बोली डोगरी को, नेपाली को संविधान में बुला लिए लेकिन भोजपुरी को भुला गए। तो केहू कुछ बोला का?’

उनका इशारा संविधान की आठवीं अनुसूची में भोजपुरी को शामिल नहीं करने की ओर होता। वह कहते, ‘राष्ट्रपति थे बाबू राजेंदर प्रसाद। पटना के थे, भोजपुरी में ही खाते-पीते, बतियाते थे, उहो कुछ नहीं किए। एक से एक बड़े-बड़े नेता भोजपुरिहा हैं बकिर भोजपुरी ख़ातिर सब मरे हुए हैं। तब जब कि करोड़ों लोग भोजपुरी बोलते हैं, गाते हैं, सुनते हैं। हालैंड, मारीशस, सूरीनाम में भोजपुरी जिंदा है, ऊ लोग जिंदा रखे हैं जो लोग इहां से बंधुआ मजूर बन के गए थे बकिर इहां लोग भुला गए हैं।’ वह कहते, ‘आज कल एतना टी.वी. चैनल खुले हैं, पंजाबी, कन्नड़, बंगाली, मद्रासी, यहां तक कि उर्दू में भी पर एक्कौ चैनल भोजपुरी में काहे नहीं खुला?’ वह जैसे पूछते, ‘भोजपुरी में प्रतिभा नहीं है ? कि गाना नहीं है? कि नेता नहीं हैं? कि पइसा वाला लोग नहीं हैं? फिर भी नहीं खुला है भोजपुरी में चैनल। दूरदर्शन, आकाशवाणी वाले भी जेतना समय और भाषाओं को देते हैं भोजपुरी को कहां देते हैं?’ कहते-कहते लोककवि बिलबिला जाते। अफना जाते। कहने लगते, ‘बताइए अब पंजाबी गानों में दलेर मेंहदी आरा हिले, बलिया हिले, छपरा हिलेला दू लाइन गा देते हैं तो लोगों को नीक लगता है। मोसल्लम भोजपुरी में फिर काहे नाहीं सुनते हैं लोग? जानते हैं क्यों? वह जैसे पूछते और खुद ही जवाब भी देते, ‘एह नाते कि भोजपुरिहा लोगों में अपनी भाषा के प्रति भावना नहीं है। एही लिए भोजपुरी भाषा मर रही है।’

फिर वह बात ले दे कर भोजपुरी एलबम और सी.डी. पर ला कर पटक देते। कहते कि, ‘पंजाबी गानों के एतने अलबम टी.वी. पर दिखाए जाते हैं लेकिन भोजपुरी के नहीं। क्योंकि भोजपुरी में अलबम बने ही नहीं। एकाध छिटपुट बने भी होंगे तो हमको पता नहीं।’ कह कर वह पूरी तरह निराश हो जाते। और उनकी इसी निराशा को विश्राम देता अनूप कि, ‘घबराइए नहीं गुरु जी’ हम आप का वीडियो शूटिंग कर एलबम बनाएंगे।’’ और लोक कवि यह जानते हुए कि यह साला ठगी बतिया रहा है, उसकी ठगी में समा कर चहकने लगते। वह जैसे उसके वशीभूत हो जाते।

कई बार कुछ गंवा कर भी पाने की तरकीब आजमा कर सफल हो जाने वाले लोक कवि को बार-बार लगता कि अनूप उन्हें सिवाय लूटने के कुछ नहीं कर रहा। पर वह होता है न कि कुछ सपने किसी भी कीमत पर आदमी जोड़ता है भले ही उस सपने के सांचों में फिट न बैठे और निरंतर टूटता ही जाए फिर भी सपना न तोड़ना चाहे ! लोक कवि यही कर रहे थे और टूटते जा रहे थे। हंसते-हंसते। बाखुशी।

यह टूटना भी अजीब था उन का।

….जारी….

उपन्यासकार दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.comT के जरिए किया जा सकता है.

मीनू मध्य प्रदेश से चल कर लखनऊ आई थी

: उपन्यास – लोक कवि अब गाते नहीं (9) : कैसेट बजने लगा और लड़कियां नाचने लगीं। साथ-साथ लोक कवि भी इस डांस में छटकने-फुदकने लगे। वैसे तो लोक कवि मंचों पर भी छटकते, फुदकते, थिरकते थे, नाचते थे। यहां फष्कषर्् सिर्फ इतना भर था कि मंच पर वह खुद के गाए गाने में ही छटकते फुदकते नाचते थे। पर यहां वह दिदलेर मेंहदी के गाए ‘बोल तररर’ गाने वाले बज रहे कैसेट पर छटकते फुदकते थिरक रहे थे।

न सिर्फष् थिरक रहे थे, लड़कियों को कूल्हे, हिप, चेहरे और छातियों के मूवमेंट भी ‘पकड़-पकड़’ कर बताते जा रहे थे। हां, एक फष्कषर्् यह भी था कि मंच पर थिरकने में माइक के अलावा उन के एक हाथ में तुलसी की माला भी होती थी। पर यहां उन के हाथ में न माइक था, न माला। यहां उन के हाथ में शराब की गिलास थी जिसको कभी-कभी वह आस पास की किसी कुर्सी या किसी जगह पर रख देते थे, लड़कियों को कूल्हे, छातियों और हिप्स की मूवमेंट बताने ख़ातिर। आंखों, चेहरे और बालों की शिफष्त बताने ख़ातिर। लड़कियां तो कई थीं इस डांस रिहर्सल में और लोक कवि लगभग सभी पर ‘मेहरबान’ थे। पर मीनू नाम की लड़की पर वह ख़ास मेहरबान थे। जब तब वह मूवमेंट्स सिखाते-सिखाते उसे चिपटा लेते, चूम लेते, उसके बालों, गालों सहित उसकी ‘36’ वाली हिप ख़ास तौर पर सहला देते। तो वह मादक सी मुसकान भी रह-रह फेंक देती। बिलकुल कृतज्ञता के भाव में। गोया लोक कवि उसके बाल, गाल या हिप सहला कर उस पर ख़ास एहसान कर रहे हों। और जब वह मादक सी, मीठी सी मुसकान फेंकती तो उसमें सिर्फ लोक कवि ही नहीं, वहां उपस्थित सभी नहा जाते। मीनू दरअसल थी ही इस कष्दर मादक कि वह मुसकुराए तो भी, न मुसकुराए तो भी लोग उसकी मादकता में उभ-चूभ डूब ही जाते। मंचों पर तो कई बार उसकी इस मादकता से मार खाए बाऊ साहब टाइप लोगों या बाकों और शोहदों में गोली चलने की नौबत आ जाती और जब वह कुछ मादक फिष्ल्मी गानों पर नाचती तो सिर फुटव्वल मच जाती। ‘झूमेंगे गश्जश्ल गाएंगे लहरा के पिएंगे, तुम हमको पिलाओ तो बल खा केे पिएंगे….’ अर्शी हैदराबादी की गाई गश्जश्ल पर जब वह पानी से भरी बोतल को ‘डबल मीनिंग’ में हाथों में ले कर मंच से नीचे बैठे लोगों पर पानी उछालती तो ज्श्यादातर लोग उस पानी में भींगने के लिए पगला जाते। भले ही सर्दी उन्हें सनकाए हो तो भी वह पगलाए आगे कूद कर भागते आते। कभी-कभार कुछ लोग इस तरह की हरकत का बुरा भी मानते पर जवानी के जोश में आए लोग तो ‘बल खा के पिएंगे’ में बह जाते। बह जाते मीनू की बल खाती, धकियाती ‘हिप मूवमेंट्स’ के हिलकोरों मे। बढ़ियाई नदी की तरह उफनाई छातियों के हिमालय में खो जाते। खो जाते उस के अलस अलकों के जाल में। और जो इस पर कोई टू-टपर करे तो बाहों की आस्तीनें मुड़ जातीं। छूरे, कट्टे निकल आते। पिस्तौलें, राइफलें तन जातीं। फिर दौड़ कर आते पुलिस वाले, दौड़ कर आते कुछ ‘सभ्य, शरीफष् और जिश्म्मेदार लोग’ तब जा के यह जवानी का ज्वार बमुश्किल थमता। पर ‘झूमेंगे गश्जश्ल गाएंगे लहरा के पिएंगे, तुम हमको पिलाओ तो बल खा के पिएंगे….।’ का बुखार नहीं उतरता।

एक बार तो अजश्ब ही हो गया। कुछ बांके इतने बऊरा गए कि मीनू के मादक डांस पर ऐसे हवाई फषयरिंग करने लगे गोया फषयरिंग नहीं संगत कर रहे हों। फषयरिंग करते-करते वह बांके मंच पर चढ़ने लगे तो पुलिस ने ‘हस्तक्षेप’ किया। पुलिस भी मंच पर चढ़ गई। सबके हथियार कब्जश्े में कर लिए और बांकों को मंच से नीचे उतार दिया। तो भी अफरा तफरी मची रही। डांसर मीनू को मंच पर एक दारोगा ने भीड़ से बचाया। बचाते-बचाते वह अंततः मीनू पर खुद ही स्टार्ट हो गया। हिप, ब्रेस्ट, गाल, बाल सब पर रियाजश् मारने लगा। और जब एक बार मीनू को लगा कि भीड़ कुछ करे न करे, यह दारोगा इसी मंच पर जहां वह अभी-अभी नाची थी उसे जश्रूर नंगा कर देगा। तो वह अफनाई उकताई अचानक जशेर से चिल्लाई, ‘भाइयों इस दारोगा से मुझे बचाओ!’ फिर तो बौखलाई भीड़ उस दारोगा पर पिल पड़ी। मीनू तो बच गई उस सार्वजनिक अपमान से पर दारोगा की बड़ी दुर्गति हो गई। पहले राउंड में उसके बिल्ले, बैज, टोपी गई। फिर रिवाल्वर गया और अंततः उसकी देह से वर्दी से लगायत बनियान तक नुच-चुथ कर गशयब हो गई। अब वह था और उसका कच्छा था जो उसकी देह को ढंके हुए था। फिर भी वह मुसकुरा रहा था। ऐसे गोया सिकंदर हो। इस लिए कि वह खूब पिए हुए भी था। उसको वर्दी, रिवाल्वर, बैज, बिल्ला, टोपी आदि की याद नहीं थी। क्यों कि वह तो मीनू के मादक देह स्पर्श में जहां तहां नहाया हुआ मुसकुराता ऐसे खड़ा था, गोया वह जीता जागता आदमी नहीं, स्टैच्यू हो।

यहां रिहर्सल में मीनू के साथ लोक कवि भी लगभग वही कर रहे थे जो मंच पर तब दारोगा ने किया था। पर मीनू न तो यहां अफनाई दिख रही थी, न उकताई। खीझ और खुशी की मिली जुली रेखाएं उसके चेहरे पर तारी थीं। इसमें भी खीझ कम थी और खुशी ज्श्यादा।

खुशी ग्लैमर और पैसे की। जो लोक कवि की कृपा से ही उसे मयस्सर हुई थी। हालां कि यह खुशी, पैसा और ग्लैमर उसे उसकी कला की बदौलत नहीं, कला के दुरुपयोग के बल पर मिली थी। लोक कवि की टीम की यह ‘स्टार’ अश्लील और कामुक डांस के नित नए कीर्तिमान रचती जा रही थी। इतना कि वह अब औरत से डांसर, डांसर से सेक्स बम में तब्दील हो चली थी। इस स्थिति में वह खुद को घुटन में घसीटती हुई बाहर-बाहर चहचहाती रहती। चहचहाती और जब तब चिहुंक पड़ती। चिहुंकती तब जब उसे अपने बेटे की याद आ जाती। बेटे की याद में कभी-कभी तो वह बिलबिला कर रोने लगती। लोग बहुत समझाते, चुप कराते पर वह तो किसी बढ़ियाई नदी की तरह बहती जाती। वह पति, परिवार सब कुछ भूल भुला जाती लेकिन बेटे को ले कर बेबस थी। भूल नहीं पाती।

यह खुशी, पैसा और ग्लैमर मीनू ने बेटे से बिछड़ने की कष्ीमत पर बटोरा था।

बिछड़ी तो वह पति से भी थी। लेकिन पति की कमी ख़ास कर देह के स्तर पर पूरी करने वाले मीनू के पास ढेरों पुरुष थे। हालां कि पति वाली भावनात्मक सुरक्षा की कमी भी उसे अखरती थी, इतना कि कभी-कभी तो वह विक्षिप्त सी हो जाती। तो भी देह में शराब भर कर वह उस गैप को पूरा करने की कोशिश करती। किसी-किसी कार्यक्रम के दौरान कभी-कभार यह तनाव ज्श्यादा हो जाता, शराब ज्श्यादा हो जाती, ज्श्यादा चढ़ जाती तो वह होटल के अपने कमरे से छटपटाती बाहर आ जाती और डारमेट्री में जा कर खुले आम किसी ‘भुखाए’ साथी कलाकार को पकड़ बैठती। कहती, ‘मुझे कस के रगड़ दो, जो चाहे कर लो, जैसे चाहो कर लो लेकिन मेरे कमरे में चलो!’

तो भी उसकी देह संतुष्ट नहीं होती। वह दूसरा, तीसरा साथी ढूंढ़ती। भावनात्मक सुरक्षा का सुख फिर भी नहीं मिलता। वह तलाशती रहती निरंतर। पर न तो देह का नेह पाती, न मन का मेह। एक डिप्रेशन का दंश उसे डाहता रहता।

मीनू मध्य प्रदेश से चल कर लखनऊ आई थी। पिता उसके बरसों से लापता थे। बड़ा भाई पहले लुक्कड़ हुआ, फिर पियक्कड़ हो गया। हार कर मां ने सब्जी बेचनी शुरू की पर मीनू की कलाकार बनने की धुन नहीं गई। वह रेडियो, टी.वी. में कार्यक्रमों ख़ातिर चक्कर काटते-काटते एक ‘कल्चरल ग्रुप’ के हत्थे चढ़ गई। यह कल्चरल ग्रुप भी अजब था। सरकारी आयोजनों में एक साथ डांडिया, कुमायंूनी, गढ़वाली, मणिपुरी, संथाली नृत्य के साथ-साथ भजन, गश्जश्ल कौव्वाली जैसे किसी कार्यक्रम की डिमांड तुरंत परोस देता था।

तो उस संस्था ने मीनू को भी अपने ‘मीनू’ में शुमार कर लिया। वह जब-तब इस संस्था के कार्यक्रमों में बुक होने लगी। बुक होते-होते वह उमेश के फेरे में आते-आते उसकी बांहों में दुबकने लगी। बाहों में दुबकते-दुबकते उसके साथ कब सोने भी लगी यह वह खुद भी नहीं नोट कर पाई। पर यह जश्रूर था कि उमेश जो उस संस्था में गिटार बजाता था, वह अब गिटार के साथ-साथ मीनू को भी साधने लगा। मीनू की यह फिसलन कोई पहली फिसलन नहीं थी। उमेश उसकी जिश्ंदगी में तीसरा या चौथा था। तीसरा कि चौथा वह इस नाते तय नहीं कर पाती थी कि पहली बार जिसके मोहपाश में वह बंधी वह सचमुच उसका प्यार था। पहले आंखें मिलीं फिर वह दोनों भी मिलने लगे पर कभी संभोग के स्तर पर नहीं मिले। चूमा चाटी तक ही रह गए दोनों। ऐसा नहीं कि संभोग मीनू के लिए कोई टैबू था या वह चाहती नहीं थी। बल्कि वह तो आतुर थी। पर स्त्राी सुलभ संकोच में कुछ कह नहीं पाई और वह भी संकोची था। फिर कोई जगह भी उपलब्ध नहीं हुई तब दोनों को इस लिए वह देह के स्तर पर नहीं मिल पाए। मन के स्तर पर ही मिलते रहे फिर वह ‘नौकरी’ करने मुंबई चला गया और मीनू बिछुड़ कर लखनऊ रह गई। सो उसे भी वह अपनी जिंश्दगी में आया पुरुष मानती थी और नहीं भी। दूसरा पुरुष उसकी जिंश्दगी में आकाशवाणी का एक पैक्स था जिसने उसे वहां ऑडीशन में पास कर गाने को मौकष दिया था। बाद में वह उसकी आर्थिक मदद पर भी उतर आया और बदले में उसका शारीरिक दोहन करता। नियमित। इसी बीच वह दो बार गर्भवती भी हुई। दोनों बार उसे एबॉर्शन करवाना पड़ा और तकलीफष्, ताने भी भुगतने पड़े सो अलग। बाद में उस पैक्स ने ही उसे कापर टी लगवा लेने की तजवीजश् दी। शुरू में तो वह ना नुकुर करती रही पर बाद में वह मान गई।

कापर टी लगवा लिया।

शुरू में कुछ दिक्कष्त हुई। पर बाद में उसे इस सुविधा की नि¯श्चतता ने उन्मुक्त बना दिया। और दूरदर्शन में भी उसने इसी ‘दरवाजश्े’ से बतौर गायिका एंट्री ले ली। यहां एक असिस्टेंट डायरेक्टर उसका शोषक-पोषक बना। लेकिन दूरदर्शन पर दो कार्यक्रमों के बाद उसका मार्केट रेट ठीक हो गया कार्यक्रमों में। और वह टीवी. अर्टिस्ट कहलाने लगी सो अलग। बाद में इस असिस्टेंट डायरेक्टर का तबादला हो गया तो वह दूरदर्शन में अनाथ हो गई। आकाशवाणी का क्रेजश् पहले ही ख़त्म हो चुका था सो वह इस कल्चरल ग्रुप के हत्थे चढ़ गई। और इस कल्चरल ग्रुप में भी अब उमेश से दिल और देह दोनों निभा रही थी। कापर टी का संयोग कभी दिक्कष्त नहीं होने देता था। तो भी वह सपने नहीं जोड़ती थी। देह सुख से तीव्रतर सुख के आगे सपने जोड़ना उसे सूझा भी नहीं। उमेश हमउम्र था सुख भी भरपूर देता था। देह सुख में वह गोते पहले भी लगा चुकी थी पर आकाशवाणी का वह पैक्स और दूरदर्शन का वह असिस्टेंट डायरेक्टर उसकी देह में नेह नहीं भर पाते थे, दूसरे उसे हरदम यही लगता कि यह दोनों उसका शोषण कर रहे हैं। तीसरे, वह दोनों उसकी उम्र से ड्योढ़े दुगुने बड़े थे, अघाए हुए थे, सो उनमें खुद भी देह की वह ललक या भूख नहीं थी, तो वह मीनू की भूख कहां से मिटाते? वह तो उन के लिए खाने में सलाद, अचार का कोई एक टुकड़ा सरीखी थी। बस! फिर वह दोनों उसे भोगने में समय भी बहुत जाया करते थे। मूड बनाने और स्तंभन में ही वह ज्श्यादा समय खर्च डालते जब कि मीनू को जल्दी होती। पर प्रोग्राम और पैसे की ललक में वह उन्हें बर्दाश्त करती। लेकिन उमेश के साथ ऐसा नहीं था। उसके साथ वह कोई स्वार्थ या विवशता नहीं जी रही थी। हमउम्र तो वह था ही सो उसे न मूड बनना पड़ता था, न स्तंभन की फष्जश्ीहत थी। चांदी ही चांदी थी मीनू की। लेकिन हो यह गया था कि मीनू का उमेश के साथ रपटना देख कई और भी उसके फेरे मारने लगे थे। उमेश को यह नागवार गुजश्रता। लेकिन उमेश को सिर्फ नागवार गुजश्रने भर से तो कोई मानने वाला था नहीं। दो चार लोगों से इस फेर में उसकी कहा सुनी भी हो गई। तो भी बात थमी नहीं। वह हार गया और मीनू को कोई और भी चाहे यह उसे मंजश्ूर नहीं था। तब वह गाना भी गाता था, ‘तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं, गश्ैर के दिल को सराहोगी तो मुश्किल होगी।’ लेकिन मीनू तो थी ही खिलंदड़ और दिलफेंक। तिस पर उसका हुस्न, उसकी नजशकत, उसकी उम्र किसी को भी उसके पास खींच लाती। उसकी कटोरे जैसी कजरारी मादक आंखें किसी भी को दीवाना बना देतीं। और वह भी हर किसी दीवाने को लिफ्श्ट दे देती। साथ बैठ जाती, हंसने-बतियाने लगती। ‘गैश्र के दिल को सराहोगी तो मुश्किल होगी।’ उमेश का गाया उसके कानों में नहीं समाता।

तो उमेश पगला जाता।

अंततः एक दिन उसने मीनू से शादी करने का प्रस्ताव रख दिया। प्रस्ताव सुनते ही मीनू हकबका गई। बात मम्मी पर डाल कर टालना चाहा। पर उमेश मीनू को ले कर उसकी मां से भी मिला। और मिलते-मिलते बात आखि़र बन गई। मीनू भी उमेश को चाहती थी पर शादी तुरंत इस लिए नहीं चाहती थी कि वह अभी बंधन में बंधना नहीं चाहती थी। थोड़ी आजशदी के दिन वह और जीना चाहती थी। वह जानती थी कि आज चाहे जितना दीवाना हो उमेश उसका शादी के बाद तो यह खुमारी टूटेगी। और जश्रूर टूटेगी। अभी यह प्रेमी है तो आसमान के तारे तोड़ता है कल पति होते ही वह ढेरों बंधनों में बांध यह आसमान भी छीन लेगा। तारे कहीं तड़प-तड़प कर दम तोड़ देंगे।

लेकिन यह सोचना उसका सिर्फ वेग में था।

जश्मीनी सचाई यह थी कि उसे शादी करनी थी। उसकी मां राजी थी। और जल्दी भी दो वजश्हों से थी। कि एक तो यह शादी बिना लेन देन की थी दूसरे, मीनू से तीन साल छोटी उसकी एक बहन और थी बीनू, उसकी भी शादी की ¯चता उसकी मां को करनी थी। मीनू तो कलाकार हो गई थी, चार पैसे जैसे भी सही कमा रही थी, पर बीनू न तो कमा रही थी, न कलाकार थी सो मीनू से ज्श्यादा ¯चता उसकी मां को बीनू की थी।

सो आनन फानन मीनू और उमेश की शादी हो गई। उमेश का छोटा भाई दिनेश भी शादी में आया और बीनू पर लट्टू हो गया। जल्दी ही बीनू और दिनेश की भी शादी हो गई।

शादी के बाद दिनेश भी उमेश और मीनू के साथ प्रोग्राम में जाने लगा। उमेश गिटार बजाता था, दिनेश भी धीरे-धीरे बैंजो बजाने लगा। माइक, साउंड बाक्स की साज संभाल, साउंड कंट्रोल वगश्ैरह भी समय बेसमय वह कर लेता था। कुछ समय बाद उसने बीनू को भी प्रोग्राम में ले जाना शुरू किया। बीनू भी कोरस में गाने लगी, समूह में नाचने लगी। लेकिन मीनू वाली लय, ललक, लोच और लौ बीनू में नदारद थी। सुर भी वह ठीक से नहीं लगा पाती थी। तो भी कुछ पैसे मिल जाते थे सो वह प्रोग्रामों में जा कर कुल्हा मटका कर ठुमके लगा आती थी। यह भी अजब इत्तफषक था कि मीनू और बीनू की शक्लें न सिर्फष् जश्रूरत से ज्श्यादा मिलती थीं, बल्कि उमेश और दिनेश की शक्लें भी आपस में बुरी तरह मिलती थीं। इतनी कि जश्रा दूर से यह दोनों भाई भी इन दोनों बहनों को देख तय करना कठिन पाते थे कि कौन वाली उन की है। यही हाल मीनू और बीनू उमेश, दिनेश को जश्रा दूर से देखतीं तो हो जाता। इस सब से सब से ज्श्यादा नुकसान मीनू का होता। क्यों कि कई बार बीनू द्वारा पेश लचर डांस मीनू के खाते में दर्ज हो जाता। मीनू को इससे अपनी इमेज की ¯चता तो होती पर वह कुढ़ती जश्रा भी नहीं थी।

अभी यह सब चल ही रहा था कि मीनू के दिन चढ़ गए।

ऐसे समय पर अमूमन औरतें खुश होती हैं। पर मीनू उदास हो गई। उसे अपना ग्लैमर समेत कैरियर डूबता नजश्र आया। उसने उमेश को ताने भी दिए कि क्यों उसने कापर टी निकलवा दिया? फिर सीधे एबॉर्शन करवाने के लिए साथ चलने के लिए कहने लगी। लेकिन उमेश ने एबॉर्शन करवाने पर सख़्त ऐतराजश् किया। लगभग फष्रमान जारी करते हुए कहा कि, ‘बहुत हो चुका नाचना गाना। अब घर गृहस्थी संभालो!’ तो भी मीनू ने बड़ा बबाल किया। पर मुद्दा ऐसा था कि उसकी मां से ले कर सास तक ने इस पर उसकी खि़लाफत की। बेबस 
मीनू को चुप लगाना पड़ा। फिर भी उसने प्रोग्रामों में जाना नहीं छोड़ा। उलटियां वगश्ैरह बंद होते ही वह जाने लगी। अब झूम कर नाचना उसने छोड़ दिया था। एहतियातन। वह हलके से दो चार ठुमके लगाती और बाकी काम ब्रेस्ट की अदाओं और आंखों के इसरार से चलाती और ‘मोरा बलमा आइल नैनीताल से’ जैसे गाने झूम कर गाती।

वह मां बनने वाली है यह बात वह जानती थी, उसका परिवार जानता था। बाकी बाहर कोई नहीं।

लेकिन जब पेट थोड़ा बाहर दिखने लगा तो वह चोली घाघरा पहनने लगी और पेट पर ओढ़नी डाल लेती। पर यह तरकष्ीब भी ज्श्यादा दिनों तक नहीं चली। फिर वह बैठ कर गाने लगी। और अंततः घर बैठ गई।

उसके बेटा पैदा हुआ।

अब वह खुश नहीं, बेहद खुश थी। बेटा जनमना उसे गुरूर दे गया। अब वह उमेश को भी डांटने-डपटने लगी। जब-तब। बेटे के साथ वह अपना ग्लैमर, प्रोग्राम सब कुछ भूल भाल गई। बेसुध उसी में खोई रहती। उसका टट्टी-पेशाब, दूध पिलाना, मालिश, उसको खिलाना, उस से बतियाना, दुलराना ही उसकी दुनिया थी। गाना उसका अब भी नहीं छूटा था। अब वह बेटे के लिए लोरी गाती।

अब वह संपूर्ण मां थी। दिलफेंक और ग्लैमरस औरत नहीं।

कोई देख कर यकष्ीन ही नहीं करता था कि यह वही मीनू है। पर यह भ्रम भी जल्दी ही टूटा। बेटा ज्यों साल भर का हुआ उसने प्रोग्रामों में पेंग मारना शुरू कर दिया। अब ऐतराज सास की ओर से शुरू हुआ। पर उमेश ने इस पर गशैर नहीं किया। इस बीच मीनू की देह पर जश्रा चर्बी आ गई थी पर चेहरे पर लावण्य और लाली निखार पर थी। नाचते गाते देह की चर्बी भी छंटने लगी थी। पर बेटे को दूध पिलाने से स्तन ढीले पड़ गए थे। इस का इलाज उसने ब्यूटी क्लीनिक जा कर इक्सरसाइजश् करने और रबर पैड वाले ब्रा से कर लिया था। गरज यह थी कि धीरे-धीरे वह फषर्म पर आ रही थी। इसी बीच उसकी ‘कल्चरल ग्रुप’ चलाने वाले कर्ता धर्ता से ठन गई।

वह पहली बार सड़क पर थी। बिना प्रोग्राम के।

वह फिर से दूरदर्शन और आकाशवाणी के फेरे मारने लगी। एक दिन दूरदर्शन गई तो लोक कवि अपना प्रोग्राम रिकार्ड करवा कर स्टूडियो से निकल रहे थे। मीनू ने जब जाना कि यही लोक कवि हैं तो वह लपक कर उन से मिली और अपना परिचय दे कर उन से उन का ग्रुप ज्वाइन करने का इरादा जताया। लोक कवि ने उसे टालते हुए कहा, ‘बाहर ई सब बात नहीं करता हूं। हमारे अड्डे पर आओ। फुर्सत से बात करूंगा। अभी जल्दी में हूं।’

लोक कवि के अड्डे पर वह उसी शाम पहुंच गई। लोक कवि ने पहले बातचीत मंे ‘आजश्माया’ फिर उसका नाचना गाना भी देखा। महीना भर फिर भी दौड़ाया। और अंततः एक दिन लोक कवि उस पर न सिर्फ पसीज गए बल्कि उस पर न्यौछावर हो गए। उसे लिटाया, चूमा-चाटा और संभोग सुख लूटने के बाद उस से कहा, ‘आती रहो, मिलती रहो!’ फिर उसे बांहों में भरते हुए चूमा और उसके कानों में फुसफुसाए, ‘तुमको स्टार बना दूंगा।’ फिर जोड़ा, ‘बहुत सुख देती हो। ऐसे ही देती रहो।’ फिर तो लोक कवि के यहां आते-जाते मीनू उन की म्यूजिकष्ल पार्टी में भी आ गई। और धीरे-धीरे सचमुच वह उन की टीम की स्टार कलाकार बन गई। टीम की बाकी औरतें, लड़कियां उस से जलने लगीं। लेकिन लोक कवि का चूंकि उसे ‘आशीर्वाद’ प्राप्त था सो सबकी जलन भीतर ही भीतर रहती, मुखरित नहीं होती। सिलसिला चलता रहा। इस बीच लोक कवि ने उसे शराबी भी बना दिया। शुरू-शुरू में जब लोक कवि ने एक रात सुरूर में उसे शराब पिलाई तो पहले तो वह नहीं, नहीं करती रही। कहती रही, ‘मैं औरत हूं। मेरा शराब पीना शोभा नहीं देगा।’

‘क्या बेवकूफष्ी की बात करती हो?’ लोक कवि मनुहार करते हुए बोले, ‘अब तुम औरत नहीं आर्टिस्ट हो। स्टार आर्टिस्ट।’ उन्हों ने उसे चूमते हुए जोड़ा, ‘और फिर शराब नहीं पियोगी तो आर्टिस्ट कैसे बनोगी?’ कह कर उस रात उसे जश्बरदस्ती दो पेग पिला दिया। जिसे बाद में मीनू ने उलटियां करके बाहर निकाल दिया। उस रात वह घर नहीं गई। लोक कवि की बांहों में बेसुध पड़ी रही। उस रात लोक कवि ने उसकी योनि को जब अपनी जीभों से नवाजश तो वह एक नए सुखलोक में पहुंच गई।

दूसरी सुबह जब वह घर पहुंची तो उमेश ने रात लोक कवि के अड्डे पर रुकने पर बड़ा ऐतराजश् जताया। पर मीनू ने उस ऐतराजश् की कुछ बहुत नोटिस नहीं ली। बोली, ‘तबीयत ख़राब हो गई तो क्या करती?’

फिर रात भर की जगी वह सो गई।

अब तक मीनू न सिर्फ लोक कवि की म्यूजिश्क पार्टी की स्टार थी बल्कि लोक कवि के आडियो कैसेटों के जाकेटों पर भी उसकी फषेटो प्रमुखता से छपने लगी थी। अब वह स्टेज और कैसेट दोनों बाजशर में थी और जशहिर है कि बाजशर में थी तो पैसे की भी कमी नहीं रह गई थी उसके पास। रात-बिरात कभी भी लोक कवि उसे रोक लेते और वह बिना ना नुकुर किए मुसकुरा कर रुक जाती। कई बार लोक कवि मीनू के साथ-साथ किसी और लड़की को भी साथ सुलाते तो भी वह बुरा नहीं मानती। उलटे ‘कोआपेरट’ करती। उसके इस ‘कोआपरेट’ का जिश्क्र लोक कवि खुद भी कभी कभार मूड में कर जाते। इस तरह किसी न किसी बहाने मीनू पर लोक कवि के ‘उपकार’ बढ़ते जाते। लोक कवि के इन उपकारों से मीनू के घर में समृद्धि आ गई थी पर साथ ही उसके दांपत्य में न सिर्फ खटास आ गई थी, बल्कि उसकी चूलें भी हिल गई थीं। हार कर उमेश ने सोचा कि एक और बच्चा पैदा करके ही मीनू के पांव बांधे जा सकते हैं। सो एक और बच्चे की इच्छा जताते हुए मीनू से कापर टी निकलवाने की बात किसी भावुक क्षण में उमेश ने कह दी तो मीनू भड़क गई। बोली, ‘एक बेटा तो है।’

‘पर अब वह पांच छः साल का हो गया है।’

‘तो?’

‘अम्मा भी चाहती हैं कि एक और बच्चा हो जाए जैसे दिनेश के दो बच्चे हैं, वैसे ही।’

‘तो अपनी अम्मा से कहो कि अपने साथ तुमको सुला लें फिर एक बच्चा और पैदा कर लें?’

‘क्या बकती हो?’ कहते हुए उमेश ने उसे एक जशेर का थप्पड़ मारा। बोला, ‘इतनी बत्तमीजश् हो गई हो!’

‘इसमें बत्तमीजश्ी की क्या बात है?’ पासा पलटती हुई मीनू नरम और भावुक हो कर बोली, ‘तुम अपनी अम्मा के बच्चे नहीं हो ? और उन के साथ सो जाओगे तो बच्चे नहीं रहोगे?’

‘तुम तब यही कह रही थी?’ उमेश बौखलाहट पर कषबू करते हुए बोला।

‘और नहीं तो क्या?’ वह बोली, ‘बात समझे नहीं और झापड़ मार दिया। आइंदा कभी हम पर हाथ मत उठाना। बताए देती हूं।’ आंखें तरेर कर वह बोली। और बैग उठा कर चलते-चलते बोली, ‘रिहर्सल में जा रही हूं।’

लेकिन उमेश ने उस दिन किसी घायल शेर की तरह गांठ बांध ली कि मीनू को एक न एक दिन लोक कवि की टीम से निकाल कर ही वह दम लेगा। चाहे जैसे। कई तरकष्ीबें, शिकायतें उसने भिड़ाई पर वह कामयाब नहीं हुआ। कामयाब होता भी भला कैसे ? लोक कवि के यहां मीनू की गोट इतनी पक्की थी कि कोई शिकायत, कोई राजनीति, उसका कोई खोट भी लोक कवि को नहीं दीखता। दीखता भी भला कैसे ?

वह तो इन दिनों लोक कवि की पटरानी बनी इतराती फिरती रहती।

वह तो घर भी नहीं जाती। पर हार कर जाती तो सिर्फष् बेटे के मोह में। बेटे की ख़ातिर। और इसी लिए वह दूसरा बच्चा नहीं चाहती थी कि फिर फंसना पड़ेगा, फिर बंधना पड़ेगा। यह ग्लैमर, यह पैसा फिर लौट कर मिले न मिले क्या पता ? वह सोचती और दूसरे बच्चे के ख़याल को टाल जाती। पर उमेश ने यह ख़याल नहीं टाला था। एक रात चरम सुख लूटने के बाद उसने आखि़र फिर यह बात धीरे-धीरे ही सही फिर चला दी। पहले तो मीनू ने इस बात को बिन बोले अनसुना कर दिया। पर उमेश फिर भी लगातार, ‘सुनती हो, सुन रही हो’ के संपुट के साथ बच्चे का पहाड़ा रटने लगा तो वह आजिश्जश् आ गई। फिर भी बात को टालती हुई धीरे से बुदबुदाई, ‘सो जाओ, नींद आ रही है।’

‘जब कोई जश्रूरी बात करता हूं तो तुम्हें नींद आने लगती है।’

‘चलो सुबह बात करेंगे।’ वह अलसाती हुई बुदबुदाई।

‘सुबह नहीं, अभी बात करनी है।’ वह लगभग फैष्सला देते हुए बोला, ‘सुबह तो डाक्टर के यहां चलना है।’

‘सुबह हमें हावड़ा पकड़नी है प्रोग्राम में जाना है।’ वह फिर बुदबुदाई।

‘हावड़ा नहीं पकड़नी है, कोई प्रोग्राम में नहीं जाना है।’

‘क्यों?’

‘डाक्टर के यहां चलना है।’

‘डाक्टर के यहां तुम अकेले हो आना।’

‘अकेले क्यों? काम तो तुम्हारा है।’

‘हमें कोई बीमारी नहीं है। हम का करेंगे डाक्टर के यहां जा कर।’ अब की वह जश्रा जशेर से बोली।

‘बीमारी है तुम्हें।’ उमेश पूरी कड़ाई से बोला।

‘कौन सी बीमारी?’ अब तक मीनू की आवाजश् भी कड़ी हो गई थी।

‘कापर टी की बीमारी।’

‘क्या?’

‘हां!’ उमेश बोला, ‘यही कल सुबह डाक्टर के यहां निकलवाना है।’

‘क्यों?’ वह तड़कती हुई बोली, ‘क्या फिर दूसरे बच्चे का सपना दीख गया?’

‘हां, और हमें यह सपना पूरा करना है।’

‘क्यों?’ वह बोली, ‘किस दम पर?’

‘तुम्हारा पति होने के दम पर!’

‘किस बात के पति?’ वह गरजी, ‘कमा के न लाऊं तो तुम्हारे घर में दोनों टाइम चूल्हा न जले, और यह कूलर, फ्रिज, कालीन, सोफा, डबल बेड यहां तक की तुम्हारी मोटर साइकिल भी नहीं दिखे!’

‘क्यों मैं भी कमाता हूं।’

‘जितना कमाते हो उतना तुम भी जानते हो।’

‘इधर-उधर जाने से तुम्हारी बोली और आदतें ज्श्यादा ही बिगड़ गई हैं।’

‘क्यों न जाऊं?’ वह चमक कर बोली, ‘तुम्हारे वश की तो अब मैं भी नहीं रही। महीने में दो चार बार आ जाते हो कांखते-पादते तो समझते हो बड़े भारी मर्द हो। और बोलते हो कि पति हो।’ वह रुकी नहीं बोलती रही, ‘सुख हमको दे नहीं सकते, चूल्हा चौका चला नहीं सकते और कहते हो कि पति हो! किस बात के पति हो जी तुम?’ वह बोली, ‘शराब भी तुम्हारी मेरी कमाई से चलती है। और क्या-क्या कहूं? क्या-क्या उलटू-उघाडं़ई?

‘लोक कवि ने तुमको छिनार बना दिया है। कल से तुम्हारा उसके यहां जाना बंद!’

‘क्यों बंद? किस बात के लिए बंद? फिर तुम होते कौन हो मेरा कहीं जाना बंद करने वाले?’

‘तुम्हारा पति!’

‘तुम मेरे कितने पति हो, जश्रा  अपने दिल पर हाथ रख कर पूछो।’

‘क्या कहना चाहती हो आखि़र तुम?’ उमेश बिगड़ता हुआ बोला।

‘यही कि अपना गिटार बजाओ। कहो तो गुरु जी से कह कर उन की टीम मेें फिर रखवा दूं। चार पैसा मिलेगा ही। और जश्रा अपनी शराब पर कषबू कर लो!’

‘मुझे नहीं जाना तुम्हारे उस भड़घवे गुरु जी के यहां जो अफष्सरों, नेताओं को लौड़िया सप्लाई करता है। जिस साले ने हमारी जिंश्दगी नरक कर दी। तुम्हें हमसे छीन लिया है।’

‘हमारी जिंश्दगी नरक नहीं की है गुरु जी ने। हमारी जिंश्दगी बनाई है। ये कहो।’

‘यह तुम्हीं कहो!’

‘क्यों नहीं कहूंगी।’ वह भावुक होती हुई बोली, ‘हमको तो ये शोहरत, ये पैसा उन्हीं की बदौलत मिली है। गुरु जी ने हमको कलाकार से स्टार कलाकार बनाया है।’

‘स्टार कलाकार नहीं, स्टार रंडी बनाया है।’ उमेश गरजा, ‘ये कहो ना! कहो ना कि स्टार रखैल बनाया है तुमको!’

‘अपनी जबान पर कंट्रोल करो!’ मीनू भी गरजी, ‘क्या-क्या अनाप शनाप बके जा रहे हो?’

‘बक नहीं रहा हूं, ठीक कह रहा हूं।’

‘तो तुम हमको रंडी, रखैल कहोगे?’

‘हां, रंडी, रखैल हो तो कहूंगा।’

‘मैं तुम्हारी बीवी हूं।’ वह आहत भाव से बोली, ‘तुम्हें ऐसा कहते हुए शर्म नहीं आती?’

‘आती है। तभी कह रहा हूं।’ वह बोला, ‘और फिर किस-किस को शर्म दिलाओगी? किस-किस के मुंह बंद कराओगी?’

‘तुम बहुत गिरे हुए आदमी हो।’

‘हां, हूं।’ वह बोला, ‘गिर तो उसी दिन गया था जिस दिन तुमसे शादी की।’

‘तो तुम्हें मुझसे शादी करने का पछतावा है?’

‘बिलकुल है।’

‘तो छोड़ क्यों नहीं देते?’

‘बेटा रोक लेता है, नहीं छोड़ देता।’

‘फिर कोई पूछेगी भी?’

‘हजशरों है पूछने वालियां?’

‘अच्छा?’

‘तो?’

‘तो भी हमें रंडी कहते हो।’

‘कहता हूं।’

‘कुत्ते हो।’

‘तू कुतिया है।’ वह बोला, ‘बेटे की ¯चता न होती तो इसी दम छोड़ देता तुझे।’

‘बेटे की बड़ी ¯चता है?’

‘आखि़र मेरा बेटा है?’

‘यह किस कुत्ते ने कह दिया कि ये तेरा बेटा है?’

‘दुनिया जानती है कि मेरा बेटा है।’

‘बेटा तूने जना है कि मैंने?’ वह बोली, ‘तो मैं जानती हूं कि इस का बाप कौन हैµकि तू?’

‘क्या बक रही है?’

‘ठीक बक रही हूं।’

‘क्या?’

‘हां, ये तेरा बेटा नहीं है।’ वह बोली, ‘तू इस का बाप नहीं है।’

‘हे माधरचोद, तो यह किसका पाप है, जो मेरे मत्थे मढ़ दिया?’ कह कर उमेश उस पर किसी गिद्ध की तरह टूट पड़ा। उसके बाल पकड़ कर खींचते हुए उसे लातों, जूतों मारने लगा। जवाब में मीनू ने भी हाथ पांव चलाए लेकिन उमेश के आगे वह पासंग भी नहीं ठहरी और बुरी तरह पिट गई। पति से तू-तू, मैं-मैं करना मीनू को बड़ा भारी पड़ गया। मार पीट से उसका मुंह सूज गया, होठों से खून बहने लगा। हाथ पैर भी छिल गए। और तो और उसी रात उसे घर भी छोड़ना पड़ा। अपने थोड़े बहुत कपड़े लत्ते बटोरे, ब्रीफकेस में भरा रिक्शा लिया। मेन रोड पर आ कर रिक्शा छोड़ टेंपो लिया और पहुंच गई लोक कवि के कैंप रेजश्ीडेंस पर। कई बार काल बेल बजाने पर लोक कवि के नौकर बहादुर ने दरवाजश खोला। मीनू को देखते ही वह चौंक पड़ा। बोला, ‘अरे आप भी आ गईं?’

‘क्यों?’ पति का सारा गुस्सा बहादुर पर उतारती हुई मीनू गरजी।

‘अरे नहीं, हम तो इश लिए बोला कि दो मेमशाब लोग पहले ही से भीतर हैं।’ मीनू की गरज से सहमते हुए बहादुर बोला।

‘तो क्या हुआ?’ थोड़ी ढीली पड़ती हुई मीनू ने बहादुर से धीरे से पूछा, ‘कौन-कौन हैं?’

‘शबनम मेमशाब और कपूर मेमशाब।’ बहादुर खुसफुसा कर बोला।

‘कोई बात नहीं।’ ब्रीफकेस बरामदे में पटकती हुई मीनू बोली।

‘कौन है रे बहादुर!’ अपने कमरे से लोक कवि ने चिल्ला कर पूछा, ‘बड़ा खड़बड़ मचाए हो?’

‘हम हैं गुरु जी!’ मीनू कमरे के दरवाजेश् के पास जा कर धीरे से बोली।

‘कौन?’ महिला स्वर सुन कर लोक कवि अचकचाए। यह सोच कर कि कहीं उन की धर्मपत्नी तो नहीं आ गईं? फिर सोचा कि उसकी आवाजश् तो बड़ी कर्कश है। और यह आवाजश् तो कर्कश नहीं है। वह अभी असमंजस में पड़े यही सब सोच रहे थे कि तभी वह फिर धीरे से बोली, ‘मैं हूं मीनू गुरु जी!’

‘मीनू?’ लोक कवि फिर अचकचाए और बोले, ‘तुम और इतनी रात को?’

‘हां, गुरु जी।’ वह अपराधी भाव से बोली, ‘माफष् कीजिए गुरु जी।’

‘अकेली हो कि कोई और भी है ?’

‘अकेली हूं गुरु जी।’

‘अच्छा रुको अभी आता हूं।’ कह कर लोक कवि ने जांघिया ढूंढ़ना शुरू किया। अंधेरे में। नहीं मिला तो वह बड़बड़ाए, ‘हे शबनम! लाइट जला!’

पर शबनम मुख मैथुन के बाद उन के पैरों के पास लेटी पड़ी थी। लेटे-लेटे ही सिर हिलाया। पर उठी नहीं। लोक कवि फिर भुनभुनाए, ‘सुन नहीं रही हो का? अरे, उठो शबनम! देखो मीनू आई है। बाहर खड़ी है। लगता है उस पर कोई आफष्त आई है!’ शबनम लेकिन ज्श्यादा नशे में भी थी सो वह उठी नहीं। कुनमुना कर रह गई। अंततः लोक कवि उसे एक तरफ हटाते हुए उठे कि उन का एक पैर नीता कपूर पर पड़ गया। वह चीख़ी, ‘हाय राम !’ लेकिन धीरे से। लोक कवि फिर बड़बड़ाए, ‘तुम भी अभी यहीं हो ? तुम तो कह रही थी चली जाऊंगी।’

‘नहीं गुरु जी का करें आलस लग गया। नहीं गई। अब सुबह जाऊंगी। वह अलसाई हुई बोली।

‘अच्छा चलो उठो!’ लोक कवि बोले, ‘लाइट जलाओ!’

‘क्यों?’

‘मीनू आई है। बाहर खड़ी है!’

‘मीनू को भी बुलाया था?’ नीता बोली, ‘अब आप कुछ कर भी पाएंगे?’

‘क्या जद-बद बकती रहती हो।’ वह बोले, ‘बुलाया नहीं था, अपने आप आई है। लगता है कुछ समस्या में है!’

‘तो इसी बिस्तर पर वह भी सोएंगी?’ नीता कपूर भुनभुनाई, ‘जगह कहां है?’

‘लाइट नहीं जला रही है रंडी तभी से बकबक-बकबक बहस कर रही है!’ कहते हुए लोक कवि भड़भड़ा कर उठे और लाइट जला दिया। लाइट जलाते ही दोनों लड़कियां कुनमुनाईं पर नंग धडंग पड़ी रहीं।

लोक कवि ने दोनों की देह पर चादर डाला, जांघिया नहीं मिला तो अंगोछा लपेटा, कुरता पहना और कमरे का दरवाजश खोला। मीनू को देखते ही वह सन्न हो गए। बोले, ‘ई चेहरा कइसे सूज गया? कहीं चोट लगा है कि कहीं गिर गई?’

‘नहीं गुरु जी!’ कहते हुए मीनू रुआंसी हो गई।

‘तो कोई मारा है का?’

लोक कवि ने पूछा तो मीनू बोली नहीं पर सिर हिला कर स्वीकृति दी। तो लोक कवि बोले, ‘किसने? का तेरे मरद ने?’ मीनू अबकी फिर नहीं बोली, सिर भी नहीं हिलाया और फफक कर रोने लगी। रोेते-रोते लोक कवि से लिपट गई। रोते-रोते बताया, ‘बहुत मारा।’

‘कौने बात पर?’

‘मुझे रंडी कहता है।’ वह बोली, ‘कहता है आप की रखैल हूं।’ बोलते-बोलते उसका गला रूंध गया और वह फिर फफक कर रोने लगी।

‘बड़ा लंठ है।’ लोक कवि बिदकते हुए बोले। फिर उसके घावों को देखा, उसके बाल सहलाए, सांत्वना दी और कहा कि, ‘अब कोई दवा तो यहां है नहीं। घाव को शराब से धो देता हंू और तुम दू तीन पेग पी लो, दर्द कुछ कम हो जाएगा, नींद आ जाएगी। कल दिन में डाक्टर को दिखा देना। बहादुर को साथ ले लेना।’ वह बोले, ‘हम लोग तो सुबह गाड़ी पकड़ कर पोरोगराम में चले जाएंगे।’

‘मैं भी आप के साथ चलूंगी।’

‘अब ई सूजा हुआ यह फुटहा मुंह ले कर कहां चलोगी?’ लोक कवि बोले, ‘भद्द पिटेगी। यहीं आराम करो। पोरोगराम से वापिस आऊंगा तब बात करेंगे।’ कह कर वह शराब की बोतल उठा लाए और मीनू के घाव शराब से धोने लगे।

‘गुरु जी, अब मैं कुछ दिन यहीं रहूंगी, जब तक कोई और इंतजशम नहीं हो जाता।’ वह जश्रा दबी जश्बान बोली।

लोक कवि कुछ नहीं बोले। उसकी बात लगभग पी गए।

‘आप को कोई ऐतराजश् तो नहीं है गुरु जी।’

‘हम को काहें ऐतराजश् होगा?’ लोक कवि बोले, ‘ऐतराजश् तुम्हारे मर्द को होगा।’

‘ऊ  तो हम को आप की रखैल कह ही रहा है।’

‘क्या बेवकूफी की बात कर रही हो?’

‘मैं कहती हूं कि आप मुझ को अपनी रखैल बना लीजिए।’

‘दिमाग तुम्हारा ख़राब हो गया है।’

‘क्यों?’

‘क्यों क्या ऐसे हम किस-किस को रखैल बनाता फिरूंगा।’ वह बोले, ‘लखनऊ में रहता हूं तो इस का का मतलब हम वाजिद अली शाह हूं?’ वह बोले, ‘हरम थोड़े बनाना है। ऐसे आती-जाती रहो यही ठीक है। आज तुम को रख लूं कल को यह दोनों जो लेटी हैं इन को रख लूं परसों और रख लूं फिर तो मैं बरबाद हो जाऊंगा। हम नवाब नहीं हूं। मजूर हूं। गा बजा के मजूरी करता हूं। अपना पेट चलाता हूं और तुम लोगों का भी। हां, थोड़ा मौज मजश भी कर लेता हूं तो इस का मतलब ई थोड़े है कि….?’ सवाल अधूरा सुना कर लोक कवि चुप हो गए।

‘तो यहां नहीं रहने देंगे हम को?’ मीनू लगभग गिड़गिड़ाई।

‘रहने को कौन मना किया?’ वह बोले, ‘तुम तो रखैल बनने को कह रही थी।’

‘मैं नहीं गुरु जी मेरा मरद कहता है तो मैंने कहा कि रखैल बन ही जाऊं।’

‘फालतू बात छोड़ो।’ लोक कवि बोले, ‘कुछ रोजश् यहां रह लो। फिर हो सके तो अपने मरद से पटरी बैठा लो नहीं कहीं और किराए पर कोठरी दिला दूंगा। सामान, बिस्तर करा दूंगा। पर यहां परमामिंट नहीं रहना है।’

‘ठीक है गुरु जी! जैसा आप कहें।’ मीनू बोली, ‘पर अब उस हरामी के पास मैं नहीं जाऊंगी।’

‘चलो सो जाओ! सुबह टेªन पकड़नी है।’ कह कर लोक कवि खुद बिस्तर पर लेट गए। बोले, ‘तुम भी यहीं कहीं लेट जाओ और बिजली बंद कर दो।’

लाइट बुझ गई लोक कवि के इस कैंप रेजीडेंस की।

यह कैंप रेजश्ीडेंस लोक कवि ने अभी नया-नया बनाया था। क्यों कि वह गैराज अब उन के रहने और रिहर्सल दोनों काम के लायकष् नहीं रह गया था और घर पर जिस ‘स्टाइल’ और ‘शौक’ से वह रहते थे, रह नहीं सकते थे। और रिहर्सल तो बिलकुल ही संभव नहीं था सो उन्हों ने यह तिमंजिश्ला कैंप रेजश्ीडेंस बनाया। नीचे का एक हिस्सा लोगों के आने-जाने, मिलने जुलने के लिए रखा। पहली मंजिश्ल रिहर्सल वगश्ैरह के लिए और दूसरी मंजिश्ल पर अपने रहने का इंतजशम किया। जब यह कैंप रेजश्ीडेंस उन्हों ने बनवाया तब मुस्तकिल देख रेख नहीं कर पाए। उन के लड़कों और चेलों ने इंतजशम देखा। कोई आर्किटेक्ट, इंजीनियर वगश्ैरह भी नहीं रखा। बस जैसे-जैसे राज मिस्त्राी बताता-बनाता गया वैसे-वैसे ही बना यह कैंप रेजश्ीडेंस। सौंदर्यबोध तो छोड़िए, कमरों और बाथरूम के साइजश् भी बिगड़ गए। ज्श्यादा से ज्श्यादा कमरा बनाने-निकालने के फेर में। सो सारा कुछ पहला तल्ला, दूसरा तल्ला में बिखर-बटुर कर रह गया। नक्शा बिगड़ गया मकान का। लोक कवि कहते भी कि, ‘इन बेवकूफषें के चलते पैसा माटी में मिल गया।’ पर अब जो था, सो था और इसी में काम चलाना था। लोक कवि बाहर आते जाते बहुत कुछ देख चुके थे। उसमें से बहुत कुछ वह अपने इस नए रेजश्ीडेंस में देखना चाहते थे। जैसे कई होटलों में वह बाथटब का आनंद ले चुके थे, लेते ही रहते थे। चाहते थे कि यह बाथटब का आनंद वह अपने इस नए घर में भी लें। पर यह सपना उन का खंडित इस लिए हुआ कि बाथरूम इतने छोटे बने कि उसमें बाथटब की फिटिंग ही नहीं हो सकती थी। तो भी यह सपना उन का खंडित भले हुआ हो पर टूटा नहीं। अंततः वह बाथटब लाए और बाथरूम के बजाय उसे छत पर ही खुले में रखवा दिया। वह उसमंे पहले पानी भरवाते पाइप से, फिर लेट जाते। लड़कियां या चेले या बहादुर या जो भी सुविधा से मिल जाए वह उसी में लेटे-लेटे उस से अपनी देह मलवाते। लड़कियां होतीं तो कई बार वह लड़कियों को भी उसमें खींच लेते और जल क्रीड़ा का आनंद लेते। कई बार रात में भी। इस ख़ातिर परदेदारी की गरजश् से उन्हों ने छत पर रंग बिरंगे परदे टंगवा दिए। लाल, हरे, नीले, पीले। ठीक वैसे ही जैसे कुछ होटलों के सामने विभिन्न रंग के झंडे टंगे होते हैं। पर यह सुरूर ज्श्यादा दिनों तक नहीं चला। वह जल्दी ही अपने देसीपन पर आ गए। और भरे बाथटब में भी बैठ कर लोटा-लोटा ऐसे नहाते गोया पानी बाथटब से नहीं बाल्टी से निकाल-निकाल नहा रहे हों। लेकिन यह सुरूर उतरते-उतरते उन्हें एक नया शौकष् चर्रायाµधूप में छतरी के नीचे बैठने का। साल दो साल वह सिर्फष् इस की चर्चा करते रहे और अंततः छतरी मय प्लास्टिक की मेजश् सहित ले आए। यह शौकष् भी अभी उतरा नहीं था कि पेजश्र का दौर आ गया। तो वह पेजश्र उन के कुछ बहुत काम का नहीं निकला। पर वह सबको बताते कि, ‘मेरे पास पेजश्र है। मेरा पेजश्र नंबर नोट कीजिए।’ पर अभी पेजश्र की खुमारी ठीक से चढ़ी भी नहीं थी कि मोबाइल फषेन आ धमके। जहां-तहां वह इस की चर्चा सुनते। कहीं-कहीं देखते भी। अंततः एक रोजश् अपनी महफिष्ल में इस का जिश्क्र वह छेड़ बैठे। बोले, ‘इ मोबाइल-फोबाइल का क्या चक्कर है?’ महफिष्ल में दो तीन कलाकार भी बैठे थे। बोले, ‘गुरु जी ले लीजिए। बड़ा मजश रहेगा। जहां से चाहिए वहां से बात करिए। टेªन में, कार में। और जेश्ब में धरे रहिए। जब चाहिए बतियाइए, जब चाहिए काट दीजिए।’ इस महफिष्ल में चेयरमैन साहब और वह ठाकुर पत्राकार भी जमे हुए थे। पर जितनी मुह उतनी बातें थीं। चेयरमैन साहब ‘मोबाइल-मोबाइल’ सुनते-सुनते उकता गए। लोक कवि से वह मुख़ातिब हुए। घूरते हुए बोले, ‘अब तुम मोबाइल लोगे? का यूज है तुम्हारे पास?’ वह बोले, ‘पइसा बहुत काटने लगा है का?’ पर लोक कवि चेयरमैन साहब की बात को सुन कर भी अनसुना कर गए। कुछ बोले नहीं। तो चेयरमैन साहब भी चुप लगा गए। ह्विस्की की चुस्की और सिगरेट के कश में गुम हो गए। लेकिन तरह-तरह के बखान, टिप्पणियां और मोबाइल के खर्चे की चर्चा चलती रही। पत्राकार ने एक सूचना दी कि, ‘बाकी खर्चे तो अपनी जगह। इसमें सबसे बड़ी आफत है कि जो फषेन काल आते हैं उसका भी प्रति काल, प्रति मिनट के हिसाब से पैसा लगता है।’ सभी ने हां में हां मिलाई और इस इनकमिंग काल के खर्चे को सबने ऐसे व्याख्यायित किया गोया हिमालय सा बोझ हो। लोक कवि सबकी बात बड़े गशैर से सुन रहे थे। सुनते-सुनते अचानक वह उछल कर खड़े हो गए। हाथ कान पर ऐसे लगाया गोया हाथ में फषेन हो और बच्चों का सा सुरूर और ललक भर कर बोले, ‘तो मैं न कुछ कहूंगा, न कुछ सुनूंगा। बस मोबाइल फषेन पास धरे रहूंगा। फिर तो खर्चा नहीं बढ़ेगा न?’

‘मतलब न काल करोगे न काल सुनोगे?’ चेयरमैन साहब भड़क कर बोले, ‘तब का करने के लिए मोबाइल फषेन रखोगे जी?’

‘सिर्फ एह मारे कि लोग जानें कि हमारे पास भी मोबाइल है। हमारा भी स्टेटस बना रहेगा। बस !’

‘धत चूतिए कहीं के।’ चेयरमैन साहब के इस संबोधन के साथ ही यह महफिष्ल उखड़ गई थी। क्यों कि चेयरमैन साहब सिगरेट झाड़ते हुए उठ खड़े हुए थे और पत्राकार भी।

तो भी लोक कवि माने नहीं। मोबाइल फषेन की उधेड़बुन में लगे रहे।

एक वकील का बिगड़ैल लड़का था अनूप। लड़कियों के फेर में वह लोक कवि के फेरे मारता रहता। बाहर की लड़कियों को वह लालच देता कि लोक कवि के यहां आर्टिस्ट बनवा देंगे और लोक कवि के यहां की लड़कियों को लालच देता कि टी.वी.आर्टिस्ट बनवा देंगे। इस ख़ातिर वह कुछ टेली फिष्ल्म, टेली सीरियल बनाने का भी ढांेग फैलाए रहता। किराए पर कैमरा ले कर वह शूटिंग वगश्ैरह का भी ताम-झाम जब तब फैलाए रहता। लोक कवि भी उसके इस ताम-झाम में फंसे हुए थे। दरअसल अनूप ने लोक कवि की एक नस पकड़ ली थी। लोक कवि जैसे शुरुआती दिनों में कैसेट मार्केट में आने के लिए परेशान, बेकष्रार, और तबाह थे ठीक वैसे ही अब के दिनों में उन की परेशानी सी.डी. और वीडियो एलबम की थी। इस बहाने वह विभिन्न टी.वी. चैनलों पर छा जाना चाहते थे। जैसे कि मान और दलेर मेंहदी सरीखे पंजाबी गायक उन दिनों विभिन्न एलबमों के माफषर््त विभिन्न चैनलों पर छाए हुए थे। पर भोजपुरी की सीमा, उन का जुगाड़ और किष्स्मत तीनों ही उन का साथ नहीं दे रहे थे और वह मन ही मन छटपटाते और शांत नहीं हो पाते। क्यों कि सी.डी. और एलबम की द्रौपदी को वह हासिल नहीं कर पा रहे थे। खुल कर सार्वजनिक रूप से अपनी छटपटाहट भी दर्जश् नहीं कर पा रहे थे। लोक कवि की इसी छटपटाहट को छांह दी थी अनूप ने।

अनूप जिसका बाप एडवोकेट पी.सी. वर्मा अपने जिश्ले का मशहूर वकील था। और उसकी वकालत के एक नहीं कइयों किष्स्से थे। लेकिन एक ठकुराइन पर दफष 604 वाला किष्स्सा सभी किष्स्सों पर भारी था।

….जारी….

उपन्यासकार दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.comT के जरिए किया जा सकता है.

तिवारी ने ‘ठांय’ से हवा में फायर किया तो सब लड़कियां भागने लगीं

दयानंद पांडेयउपन्यास – लोक कवि अब गाते नहीं (8) : पोलादन चला तो आया गणेश तिवारी के घर से। पर रास्ते भर उनकी नीयत थाहता रहा। सोचता रहा कि कहीं ऐसा न हो कि पइसा भी चला जाए और खेत भी न मिले। ‘माया मिली न राम’ वाला मामला न हो जाए। वह इस बात पर भी बारहा सोचता रहा कि आखि़र गणेश बाबा फौजी का जोता बोया खेत जो उसने खुद बैनामा किया है, पांच लाख रुपया नकद ले कर, कैसे उसे वापिस मिल जाएगा भला?

वह इस बिंदु पर बार-बार सोचता रहा। सोचता रहा पर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। अंततः हार मान कर उसने सीधे-सीधे यही मान लिया कि गणेश बाबा की तिकड़मी बुद्धि ही कुछ कर सकती हो तो खेत मिलेगा बिना पइसा वापिस दिए। बाकी तो कवनो रास्ता नइखै दिखाई देता। इसी उधेड़बुन में वह घर पहुंचा।

तीन चार दिन इसी उधेड़बुन में रहा। रातों में भी उसकी आंखों में नींद नहीं उतरती। यही सब वह सोचता रहता। उसे लगा वह पागल हो जाएगा। वह बार-बार सोचता कि गणेश तिवारी कहीं उसको ठग तो नहीं रहे हैं? कि पइसा भी ले लें और कि खेतवो न मिलै? काहे से कि उनकी ठगी विद्या का कोई पार नहीं था। इस विद्या की आड़ में कब वह किसको डंस लें इसका थाह नहीं मिलता था। फिर वह यह भी सोचता और बार-बार सोचता कि आखि़र कौन कानून से गणेश बाबा पइसा बिना वापिस दिए फौजी बाबा द्वारा जोता बोया खेत काटने के लिए वापिस दिया देंगे? तब जब कि वह बाकायदा रंगीन फोटो लगा कर रजिस्ट्री करवा चुका है। फिर उसने सोचा कि का पता गणेश बाबा उसकी आड़ में फौजी बाबा को ठगी विद्या से डंस रहे हों? पट्टीदारी का कवनो हिसाब किताब बराबर कर रहे हों? हो न हो यही बात हो! यह ध्यान आते ही वह उठ खड़ा हुआ। आधी रात हो चुकी थी फिर भी उसने आधी रात का ख़याल नहीं किया। सोई बीवी को जगाया। बक्से का ताला खुलवाया बीस हजार रुपया निकलवाया और लेकर पहुंच गया गणेश तिवारी के घर।

पहुंच कर कुंडा खटखटाया। धीरे-धीरे।

‘कौन है रे?’ आधी जागी, आधी निंदियायी तिवराइन ने जम्हाई लेते हुए पूछा।

‘पालागी पंडिताइन! पोलादन हईं।’

‘का रहे पोलदना! ई आधी रात क का बात परि गईल?’

‘बाबा से कुछ जरूरी बाति बा!’ उसने जोड़ा, ‘बहुत जरूरी। जगा देईं।’

‘अइसन कवन जरूरी बाति बा जे भिनहीं नाहीं हो सकत। आधिए रात कै होई?’ पल्लू और आंचल ठीक करती हुई वह बोलीं।

‘काम अइसनै बा पंडिताइन!’

‘त रुक जगावत हईं।’

कह कर पंडिताइन अपने पति को जगाने चली गईं। नींद टूटते ही गणेश तिवारी बउराए, ‘कवन अभागा आधी रात को आया है?’

‘पोलदना है।’ सकुचाते हुए पंडिताइन बोलीं, ‘चिल्लात काहें हईं ?’

‘अच्छा-अच्छा बैठाव सारे के बइठका में और बत्ती जरा द।’ कह कर वह धोती ठीक करने लगे। फिर मारकीन की बनियाइन पहनी, कुर्ता कंधे पर रखा और खांसते खंखारते बाहर आए। बोली में किंचित मिठास घोली। बोले, ‘का रे पोलदना सारे, तोंके नींद नाहीं आवेले का?’ तखत पर बैठते हुए खंखारते हुए धीरे से बोले, ‘हां, बोल कवन पहाड़ टूट गइल जवन तें आधी रात आ के जगा देहले?’

‘कुछऊ  नाहीं बाबा!’ गणेश तिवारी के दोनों पांव छू कर ऊंकड़ई बैठते हुए वह बोला, ‘वोही कमवा बदे आइल हईं बाबा।’

‘अइसै फोकट में?’ गणेश तिवारी की बोली थोड़ी तल्ख़ हुई।

‘नाई बाबा हई पइसा ले आइल हईं।’ धोती के फेंट से रुपयों की गड्डी निकालता हुआ वह बोला।

‘है केतना?’ कुछ-कुछ टटोलते, कुछ-कुछ गुरेरते हुए वह बोले।

‘बीस हजार रुपया!’ वह खुसफुसाया।

‘बस!’

‘बस धीरे-धीरे औरो देब।’ वह आंखें मिचमिचाता हुआ बोला, ‘जइसे-जइसे कमवा बढ़ी, तइसे-तइसे।’

‘बनिया का दुकान बूझा है का?’

‘नाहीं बाबा! राम-राम!’

‘त कवनो कर्जा खोज के देना है का?’

‘नाहीं बाबा।’

‘त हमारे पर विश्वास नइखै का?’

‘राम-राम! अपनहू से जियादा!’

‘तब्बो नौटंकी फइला रहा है!’ वह आंखें तरेर कर बोले, ‘फौजी पंडित का पांच लाख घोंटेगा और तीसो चालीस हजार खर्चने में फाट रहा है!’

‘बाबा जइसन हुकुम देईं।’

‘सबेरे दस हजार और दे जो!’ वह बोले, ‘फेर हम बताएंगे। बकिर बाकी पइसा भी तैयार रखना!’

‘ठीक बा बाबा!’ वह मन मार कर बोला।

‘और बात इधर-उधर मत करना।’

‘नाहीं-नाहीं। बिलकुल नाहीं।’

‘ठीक है त जो!’

‘बकिर बाबा काम हो जाई भला?’

‘काहें ना होई?’

‘मनो होई कइसे?’ वह थोड़ी थाह लेने की गरज से बोला।

‘इहै जान जाते घोड़न त पोलादन पासी काहें होते?’ वह थोड़ा मुसकुरा कर, थोड़ा इतरा कर बोले, ‘गणेश तिवारी हो जाते!’

‘राम-राम आप के हम कहां पाइब भला।’ वह उनके पांव पकड़ता हुआ बोला।

‘जो अब घरे!’ वह हंसते हुए बोले, ‘बुद्धि जेतना है, वोतने में ही रहो। जादा बुद्धि का घोड़ा मत दौड़ाओ!’ वह बोले, ‘आखि़र हम काहें ख़ातिर हैं?’

‘पालागी बाबा!’ कह कर वह गणेश तिवारी के पांव छूता हुआ चला गया।

दूसरे दिन सुबह फिर दस हजार रुपए ले कर वह आया तो गणेश तिवारी ने तीन चार सादे कागज पर उसके अंगूठे का निशान लगवा लिया।

वह फिर घर चला गया। धकधकाता दिल लिए। कि जाने का होगा। पैसा डूबेगा कि बचेगा।

हफ्ता, दो हफ्ता बीता। कुछ हुआ ही नहीं। वह गणेश तिवारी के पास जाता और आंखों-आंखों में प्रश्न फेंकता। तो उधर से गणेश तिवारी भी उसे आंखों-आंखों में ही जैसे तसल्ली देते। बोलते दोनों ही नहीं थे। गणेश तिवारी का तो नहीं पता पोलादन को, पर वह ख़ुद सुलगता रहता। मसोसता रहता कि काहें एतना पइसा दे दिया? काहें गणेश तिवारी जैसे ठग आदमी के फेर में पड़ गया? वह इसी उधेड़बुन में था कि एक रात गणेश तिवारी उसके घर आए। खुसुर-फुसुर किए और गांव छोड़ कर कहीं चले गए। एही रात फौजी तिवारी के घर पुलिस ने छापा डाला और उनके दोनों बेटों सहित उन्हें थाने उठा ले गई दूसरे दिन ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने वह और उनके दोनों बेटे पेश किए गए। बड़ी दौड़ धूप की उनके नाते रिश्तेदारों, पट्टीदारों और शुभचिंतकों ने पर जमानत नहीं मिली। क्योंकि उन पर हरिजन ऐक्ट लग गया था। बड़े से बड़ा वकील कुछ नहीं कर पाया! कहा गया कि अब तो हाइकोर्ट से ही जमानत मिलेगी। और जाने जमानत मिलेगी कि सजा?

जेल जाते-जाते फौजी तिवारी रो पड़े। रोते-रोते बोले, ‘ई गणेश तिवारी गोहुवन सांप है। डंसा इसी ने है। पोलदना तो इस्तेमाल हुआ है औजार की तरह।’ फिर उन्होंने एक भद्दी सी गाली दी गणेश तिवारी को! बोले, ‘भोसड़ी वाले को पचीस हजार की दलाली नहीं दी तो इस कमीनगी पर उतर आया!’

‘त दे दिए होते दलाली!’ फौजी तिवारी का साला बोला, ‘हई दिन तो नहीं देखना पड़ता!’

‘अब का बताएं?’ कह कर फौजी तिवारी पहले मूछों में फिर फफक कर रो पड़े।

शाम हो गई थी सो उन्हें और उनके बेटों को पुलिस वाले पुलिस ट्रक में बिठा कर जेल की ओर चल दिए। इस पूरे प्रसंग में फौजी तिवारी टूटे हुए, रुआंसे और असहाय कुछ न कुछ बुदबुदाते रहे थे और उनके बेटे निःशब्द थे। लेकिन उनके चेहरों पर आग खौल रही थी और आंखों में शोला समाया हुआ था।

जो भी हो गांव भर क्या पूरे जवार को जानते देर नहीं लगी कि यह सब गणेश तिवारी का किया धरा है। और इस बहाने गांव जवार में एक बार फिर गणेश तिवारी का आतंक बरपा हो गया। किसी गुंडे या किसी आतंकवादी का आतंक क्या होता होगा जो गणेश तिवारी का आतंक होता था। जो आतंक वह खादी पहन कर, बिना अहिंसा के और ख़ूब मीठा बोल कर बरपाते थे।

इस या उस तरह लोग आतंक में जीते और गणेश तिवारी की विलेज बैरिस्टरी चलती रहती।

कई-कई बार वह इस सबके बावजूद निठल्ले हो जाते। लगन नहीं होती तो गाने का सट्टा भी नहीं होता। मुकदमे नहीं होते तो कचहरी भी क्या करते जा कर? या मुकदमे कभी-कभार कम भी पड़ जाते। तो वह एक ख़ास तकनीक अपनाते। पहले वह तड़ते कि किस-किस के बीच तनातनी चल रही है या तनातनी के आसार हैं या आसार हो सकते हैं। इसमें से किसी एक पक्ष से कई-कई बैठकी में मीठा-मीठा बोल कर, उसकी एक-एक नस तोल कर वह उसके मन की पूरी थाह लेते। कुछ ‘उत्प्रेरक’ शब्द उसके कान में अनायास भेजते। प्रतिक्रिया में वह दूसरे पक्ष के लिए अप्रिय शब्दों का जखीरा खोल बैठता, कुछ राज अपने विरोधी पक्ष का बता जाता और अंततः उसकी ऐसी तैसी करने लगता। फिर गणेश तिवारी जब देखते कि चिंगारी शोला बन गई है तब उसे बड़े ‘शांत’ ढंग से चुप कराते और उसे बड़े धीरज और ढाढ़स के साथ समझाते, ‘ऊ साला कुकुर है तो उससे कुकुर बन कर लड़ोगे का?’ वह उसे बिना मौका दिए कहते, ‘आदमी हो आदमी की तरह रहो। कुत्ते के साथ कुत्ता बनना ठीक है का?’

‘तो करें का?’ अगला खीझ कर कहता।

‘कुछ नहीं आदमी बने रहो। और आदमी के पास बुद्धि होती है, सो बुद्धि से काम लो!’

‘का करेंगे बुद्धि ले कर ?’ अगला और बउराता।

‘बुद्धि का इस्तेमाल करो!’ वह उसे बड़े शांत ढंग से समझाते, ‘खुद लड़ने की क्या जरूरत है? तुम खुद क्यों लड़ते हो?’

‘तो का चूड़ी पहन कर बैठ जाएं?’

‘नाहीं भाई, चूड़ी पहनने को कौन कह रहा है?’

‘तो?’

‘तो क्या!’ वह धीरे से बोलते, ‘ख़ुद लड़ने से अच्छा है कि उसी को लड़ा देते हैं।’

‘कैसे?’

‘कैसे का?’ वह पूछते, ‘एकदम बुरबक हो क्या?’ वह जोड़ते, ‘अरे कचहरी काहें बनी है ! कर देते हैं एक ठो नालिश, दू ठो इस्तगासा!’

‘हो जाएगा!’ अगला खुशी से उछलता हुआ पूछता।

‘बिलकुल हो जाएगा।’ कह कर गणेश तिवारी दूसरे पक्ष को टोहते और उसके ख़िलाफ पहले पक्ष द्वारा की गई अप्रिय टिप्पणियों, खोले गए राज को बताते और जब दूसरा पक्ष भी आग बबूला होता तो उसे भी धीरज बंधाते। धीरज बंधाते-बंधाते उसे भी बताते कि, ‘खुद लड़ने की क्या जरूरत है?’ वह कहते, ‘ऐसा करते हैं कि उसी को लड़ा देते हैं।’

अंततः दोनों पक्ष  कचहरी जा कर भिड़ जाते बरास्ता गणेश तिवारी। कचहरी में उनका ‘ताव’ देखने लायक होता। सूट फाइल होने, काउंटर, रिज्वाइंडर में ही छ-आठ महीने गुजर जाते। साथ ही साथ दोनों पक्षों का जोश खरोश और ‘ताव’ भी उतर जाता। नौबत तारीख़ की आ जाती। और जैसा कि हमेशा कचहरियों में होता है न्याय कहिए, फैसला कहिए मिलता नहीं, तारीख़ ही मिलती है। और यह तारीख़ भी पाने के लिए पैसा खर्चना पड़ता। इस पर पक्ष या प्रतिपक्ष प्रतिवाद करता तो गणेश तिवारी बड़ी सफाई से उसे ‘राज’ की बात बताते कि, ‘अबकी की तारीख़ तुम्हारी तारीख़ है। तुम्हें मिली है। और तुम्हारी ही तारीख़ पर उसको भी आना पड़ेगा!’

‘और जो ऊ नहीं आया तो?’ अगला असमंजस में पड़ा पूछता।

‘आएगा न!’ वह बताते, ‘आख़िर गवर्मेंट की कचहरी की तारीख़  है। कैसे नहीं आएगा। और जो ऊ नहीं आएगा तो गवर्मेंट बंधवा कर बुलवाएगी। और नहीं कुछ तो उसका वकिलवा तो आएगा ही।’

‘आएगा न!’

‘बिलकुल आएगा!’ कह कर गणेश तिवारी उसे निश्चिंत करते। और भले ही जनरल डेट लगी हो तो भी गणेश तिवारी उसे उसकी तारीख़ बताते और उससे अपनी फीस वसूल लेते। यही काम और संवाद वह दूसरे पक्ष पर भी गांठते और उससे भी फीस वसूलते। दोनों पक्षों के वकीलों से कमीशन अलग वसूलते। कई बार मुवक्किल उनकी मौजूदगी में ही वकील को पैसा देता तो वह हालांकि अंगरेजी नहीं जानते थे तो भी मुवक्किल के सामने ट्वेंटी फाइव फिफ्टी, हंडरेड, टू हंडरेड, फाइव हंडरेड, थाउजेंड वगैरह जैसे उनकी जरूरत या रेशियो जो भी बनता बोल कर अपना कमीशन सुनिश्चित कर लेते। बाद में अगला पूछता कि, ‘वकील साहब से अऊर का बात हुई?’ तो वह बताते, ‘अरे कचहरी का ख़ास भाषा है, तू नहीं समझेगा।’ और हालत यह हो जाती कि जैसे-जैसे मुका्दमा पुराना पड़ता जाता दोनों पक्षों का ‘ताव’ टूटता जाता और वह ढीले पड़ते जाते। फिर एक दिन ऐसा आता कि कचहरी जाने के बजाय कचहरी का खर्चा लोग गणेश तिवारी के घर दे जाते। मुकदमा और पुराना होता तो दोनों पक्ष खुल्लमखुल्ला गणेश तिवारी को ‘खर्चा-बर्चा’ देने लगते और अंततः कचहरी में सिवाय तारीख़ों के कुछ मिलता नहीं सो दोनों पक्ष सुलह सफाई पर आ जाते और आखि़रकार एक सुलहनामा पर दोनों पक्ष दस्तखत करके मुकदमा उठा लेते। बहुत कम मुकदमे होते जो एक कोर्ट से दूसरी कोर्ट,  दूसरी कोर्ट से तीसरी कोर्ट तक पहुंच पाते। अमूमन तो तहसील में ही मामला ‘निपट’ जाता।

सौ दो सौ मुकदमों में से दस पांच ही जिला जज तक पहुंचते बरास्ता अपील वगैरह। और यहां से भी दो चार सौ मुकदमों में से दस पांच ही हाइकोर्ट का रुख़ कर पाते। अमूमन तो यहीं दफन हो जाते। फिर गणेश तिवारी जैसे लोग नए क्लाइंट की तलाश में निकल पड़ते। यह कहते हुए कि, ‘खुद लड़ने की क्या जरूरत है, उसी को लड़ा देते हैं।’ और ‘उसी को’ लड़ाने के फेर में आदमी खुद लड़ने लगता।

लेकिन गणेश तिवारी का यह नया शिकार पोलादन इस का अपवाद था। फौजी तिवारी को उसने सचमुच लड़ा दिया था क्योंकि गणेश तिवारी ने उसे हरिजन ऐक्ट का हथियार थमा दिया था। हरिजन ऐक्ट अब उनका नया अस्त्र था। और सचमुच वही हुआ जैसा कि गणेश तिवारी ने पोलादन से कहा था, ‘खेत बोए जरूर फौजी पंडित ने हैं पर काटोगे तुम।’ तो पोलादन ने वह खेत काटा, बाकायदा पुलिस की मौजूदगी में। खेत कटने तक फौजी तिवारी और उनके दोनों बेटे जमानत पर छूट कर आ गए थे पर मारे दहशत के वह खेत की ओर झांकने भी नहीं गए। खेत कटता रहा। काटता रहा पोलादन खुद। दो चार लोगों ने फौजी तिवारी से आ कर खुसफुसा कर बताया भी कि, ‘खेतवा काटता बा!’ पर फौजी तिवारी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, न ही उन के बेटों ने।

इस पूरे प्रसंग पर लोक कवि ने एक गाना भी लिखा। गाना तो नहीं चला पर लोक कवि की पिटाई जरूर हो गई इस बुढ़ौती में। फौजी तिवारी के छोटे बेटे ने की पिटाई। वह भी फौज में था और गणेश तिवारी, पोलादन के हथियार हरिजन एक्ट ने उसकी फौजी नौकरी दांव पर लगा दी थी।

बहरहाल, जब खेत वगैरह कट कटा गया, पोलादन पासी का बाकायदा कब्जा हो हवा गया खेतों पर तो एक रात गणेश तिवारी खांसते-खंखारते पोलादन पासी के घर खुद पहुंचे। क्यों कि वह तो बुलाने पर भी उनके घर नहीं आता था। ख़ैर, वह पहुंचे और बात ही बात में दबी जबान से फौजी तिवारी मद में बाकी पैसों का जिक्र कर बैठे। तिस पर पोलादन ने दबी जबान नहीं, खुली जबान गणेश तिवारी से प्रतिवाद किया। बोला, ‘कइसन पइसा ?’ उसने आंख तरेरी और जोड़ा, ‘बाबा चुपचाप बइठीं। नाई अब कानून हमहूं जानि गइल हईं।  कहीं आप के खि़लाफ भी कलक्टर साहब के अंगूठा लगा के दरखास दे देब त मारल फिरल जाई।’

सुन कर गणेश तिवारी का दिल धक् हो गया। आवाज मद्धिम हो गई। बोले, ‘राम-राम! ते त हमार चेला हऊवे! का बात करते हो। भुला जाओ पैसा वैसा!’ कह कर वह सिर पर पांव रख कर वहां से सरक लिए।

रास्ते भर वह सिर धुनते रहे। कि वह क्या करें ? पर कुछ समझ नहीं आ रहा था उन्हें। घर आए। ठीक से खाए भी नहीं। सोने गए तो पंडिताइन पैर दबाने लगीं। वह धीरे से बोले, ‘पैर नहीं, सिर में दर्द है।’ पंडिताइन सिर दबाने लगीं। सिर दबाते-दबाते दबी जबान पूछ बैठीं, ‘आखि़र का बात हो गइल?’

‘बात नाई बड़ा बात हो गइल!’ गणेश तिवारी बोले, ‘एक ठो भस्मासुर पैदा हो गइल हमसे!’

‘का कहत हईं ?’

‘कुछ नाहीं। तू ना समझबू। दिक् मत करो। चुपचाप सुति जा!’

पंडिताइन मन मार कर सो गईं। लेकिन गणेश तिवारी की आंखों में नींद नहीं थी। वह लगातार सोचते रहे कि भस्मासुर बने पोलादन से कैसे निपटा जाए! भगवान शंकर जैसी मति या क्षमता तो नहीं थी उनमें पर विलेज बैरिस्टर तो वह थे ही। लेकिन अभी तो यही विलेज बैरिस्टरी उनकी दांव पर थी। उधर फौजी तिवारी के छोटे बेटे की फौज की नौकरी दांव पर थी। पोलादन पासी के हरिजन ऐक्ट के हथियार से। सो उन्होंने उसी को साधने की ठानी। गए उसके पास मौका देख कर। पर उसने गणेश तिवारी के मुंह पर थूक दिया और भद्दी-भद्दी गालियां दी। कहा कि नरक में भी ठिकाना नहीं मिलेगा। पर गणेश तिवारी ने उसकी किसी भी बात का बुरा नहीं माना। उसका थूका थूक पोंछ लिया। बोले, ‘अब गलती हुई है तो प्रायश्चित भी करुंगा। और गलती करने पर छोटा भी बड़े को दंड दे सकता है। मैं दंड का भागी हूं।’ वह बोली में और मिठास घोलते हुए बोले, ‘मैं अधम नीच हूं ही इसी लायक ! फिर भी तुम लोगों के साथ भारी अन्याय हुआ है। इंसाफ भी कराऊंगा मैं ही। आखि़र हमारा ख़ून हो तुम लोग। हम लोगों की नसों में आखि़र एक ही ख़ून दौड़ रहा है। अब यह थोड़ा मतिभ्रम होने से बदल तो जाएगा नहीं। और न ई चमारों-सियारों और पासियों-घासियों की कुटिलता से बदल जाएगा। रहेंगे तो हम एक ही ख़ून। वह बोले, ‘तो ख़ून तो बोलेगा न नाती!’ इस तरह अंततः फौजी तिवारी का छोटा बेटा भी गणेश तिवारी के इस ‘एक ही ख़ून’ के पैंतरे में फंस गया। भावुक हो गया। फिर गणेश तिवारी और उसकी छनने लगी। उम्र की दीवार तोड़ कर साथ-साथ घूमने लगे दोनों। गलबहियां डाले। पूरा गांव अवाक था कि यह क्या हो रहा है ? विचलित पोलादन पासी भी हुआ यह सब देख सुन कर। वह थोड़ा सतर्क भी हुआ यह सोच कर कि गणेश तिवारी कहीं पलट कर उसे डंस न लें। पर उसे फिर से हरिजन ऐक्ट, कलक्टर और पुलिस की याद आई। तो इस तरह हरिजन ऐक्ट के हथियार के गुमान में वह बेख़बर हो गया कि, ‘हमार का बिगाड़ लिहैं गणेश तिवारी !’

दिन कटते रहे। एक मौसम बदल कर दूसरा आ गया पर पोलादन पासी का गुमान नहीं गया। उन दिनों उसका बेटा बंबई से कमा कर लौटा था। बिटिया की शादी बदे। शादी की तैयारी चल रही थी। पोलादन की नतिनी अपनी सखियों के साथ फौजी तिवारी वाले उसी खेत की मेड़ पर गन्ना चूस रही थी कि फौजी तिवारी का छोटा बेटा उधर से गुजरा। उसे देख कर पोलादन की नतिनी ने ताना कसा, ‘रस्सी जरि गइल, अईंठ ना गइल!’

‘का बोलली?’ फौजी का बेटा कमर में बंधी लाइसेंसी रिवाल्वर निकाल कर हाथ में लेता हुआ भड़क कर बोला।

‘जवन तू सुनलऽ ए बाबा!’ पोलादन की नातिन ने उसी तंज में कहा और खिलखिला कर हंस पड़ी। साथ की उसकी सखियां भी हंसने लगीं।

‘तनी एक बार फिर से त कहु!’ फौजी तिवारी का बेटा फिर भड़कता हुआ उसी ऐंठ से बोला।

‘ई बंदूकिया में गोलियो बा कि बस खालिए भांजत हऊव ए बाबा!’

इतना सुनना था कि फौजी ने दौड़ कर पोलादन की नातिन को कस कर पकड़ लिया, ‘भागती काहें है? आव बताईं कि बंदूक में केतना गोली है!’ कह कर उसने वहीं खेत में लड़की को लिटा कर निर्वस्त्र कर दिया। बाकी लड़कियां भाग चलीं। पोलादन की नातिन बड़ा चीख़ी चिल्लाई, हाथ पैर फेंक कर बहुत बचाव किया पर बच नहीं पाई बेचारी। अंततः उसकी लाज लुट गई। फौजी तिवारी का बेटा उस की देह पर झुका अभी निढाल ही हुआ था कि पोलादन पासी, उसका बेटा और नाती लाठी, भाला ले कर चिल्लाते आते दिखे। उसने आव देखा न ताव बगल में पड़ी रिवाल्वर उठाई। रिवाल्वर उठाते ही लड़की सन्न हो गई। बुदबदाई ‘नाई बाबा, नाई, गोली नाहीं।’

‘चुप भोंसड़ी!’ कह कर फौजी के बेटे ने रिवाल्वर उसके सिर पर दे मारी, साथ ही निशाना साधा और नजदीक आते पोलादन, उसके बेटे, उसकी नाती पर बारी-बारी गोलियां दाग दीं। फौजी तिवारी का बेटा भी फौजी था सो निशाना अचूक था। तीनों वहीं ढेर हो गए।

अब तीनों की लहुलुहान लाश और निर्वस्त्र लड़की खेत में पड़ी थी। इन्हें कोई ढंक रहा था तो सिर्फ सूरज की रोशनी!

पूरे गांव में सन्नाटा पसर गया। गाय, बैल, भैंस, बकरी सब के सब ख़ामोश थे। पेड़ों के पत्तों ने भी खड़खड़ाना बंद कर दिया था। हवा जैसे ठहर गई थी।

ख़ामोशी टूटी फौजी तिवारी की जीप की गड़गड़ाहट से। फौजी तिवारी उनके दोनों बेटे तथा परिवार की औरतों, बच्चों को ले कर घर में ताला लगा कर जीप में बैठ कर गांव से बाहर निकल गए। साथ में पैसा, रुपया, जेवर-कपड़ा-लत्ता भी ले लिया। फौजी तिवारी के बेटे ने जैसे सब कुछ सोच लिया था। शहर पहुंच कर उसने अपने वकील से संपर्क किया। पूरा वाकया सही-सही बताया और वकील की राय पर दूसरे दिन कोर्ट में सरेंडर कर दिया।

उधर गांव में पसरा सन्नाटा फिर पुलिस ने तोड़ा। फौजी तिवारी का घर तो भाग चुका था। पुलिस ने फिर भी ‘सुरागरशी’ की और गणेश तिवारी को धर लिया। लेकिन ‘हजूर-हजूर, माई-बाप’ बोल-बोल कर वह पुलिसिया मार पीट से अपने को बचाए रहे। और कुछ बोले नहीं। जानते थे कि थाने की पुलिस कुछ सुनने वाली नहीं है। हां, जब एस.एस.पी. आए तब वह उसके पैरों पर लोट गए। बोले, ‘हजूर आप तो जानते ही हैं कि हम गरीब गुरबा के साथी हैं।’ वह बोले, ‘ई पोलादन जी के साथ जब फौजी ने अन्याय किया था तब हम ही तो दरखास ले-ले आप हाकिमों के पास दौड़ रहे थे। और देखिए कि आज बेचारा ख़ानदान सहित मार दिया गया!’ कह कर वह रोने लगे। वह बोले, ‘हम तो उसके मददगार थे हजूर और दारोगा साहब हमहीं के बांध लिए हैं।’ कह कर वह फिर एस.एस.पी. के पैरों पर टोपी रख कर लेट गए।

‘क्या बात है यादव?’ एस.एस.पी. ने दारोगा से पूछा।

‘कुछ नहीं सर ड्रामेबाज है।’ दारोगा बोला, ‘सारी आग इसी की लगाई हुई है।’

‘कोई गवाह, कोई बयान वगैरह है इसके खि़लाफ?’

‘नो सर!’ दारोगा बोला, ‘गांव में इसकी बड़ी दहशत है। बताते भी हैं इसके खि़लाफ तो चुपके-चुपके, खुसुर-फुसुर। सामने आने को कोई तैयार नहीं है।’ वह बोला, ‘पर मेरी पक्की इंफार्मेशन है कि सारी आग, सारा जहर इस बुढ्ढे का ही फैलाया हुआ है।’

‘हजूर आप हाकिम हैं जो चाहें करें पर कलंक नहीं लगाएं।’ गणेश तिवारी फफक कर रोते हुए बोले, ‘गांव का एक बच्चा भी हमारे खि़लाफ कुछ नहीं कह सकता। राम कसम हजूर हमने आज तक एक चींटी भी नहीं मारी। हम तो अहिंसा के पुजारी हैं सर, गांधी जी के अनुयायी हैं सर!’

‘यादव तुम्हारे पास सिर्फ इंफषर्मेशन ही है कि कोई फैक्ट भी है।’

‘अभी तो इंफार्मेशन ही है सर। पर फैक्ट भी मिल ही जाएगा।’ दारोगा बोला, ‘थाने पहुंच कर सब कुछ खुद ही बक देगा सर!’

‘शट अप, क्या बकते हो!’ एस.एस.पी. बोला, ‘इसे फौरन छोड़ दो।’

‘किरिपा हजूर, बड़ी किरिपा!’ कह कर गणेश तिवारी एस.एस.पी. के पैरों से फिर लिपट गए।

‘चलो छोड़ो, हटो यहां से !’ एस.एस.पी. गणेश तिवारी से पैर छुड़ाता बोला, ‘पर जब तक यह केस निपट नहीं जाता, गांव छोड़ कर कहीं जाना नहीं।’

‘जैसा हुकुम हजूर!’ कह कर गणेश तिवारी वहां से फौरन दफा हो गए।

पर गांव में सन्नाटा और तनाव जारी था। गणेश तिवारी समझ गए कि केस लंबा खिंच गया और देर सबेर वह भी फंस सकते हैं। सो उन्होंने बड़ी चतुराई से पोलादन पासी, उसके बेटे और नाती की लाशों के पास से लाठी, भाला की बरामदगी दर्ज करवा दी। और फौजी तिवारी के वकील से मिल कर पेशबंदी कर ली। और वही हुआ जो वह चाहते थे। कोर्ट में उन्होंने साबित करवा लिया कि हरिजन ऐक्ट के नाम पर पोलादन पासी वगैरह फौजी तिवारी और उसके परिवार का उत्पीड़न कर रहे थे। यह पूरा मामला सवर्ण उत्पीड़न का है। पर सवर्ण उत्पीड़न पर कोई कानून नहीं है। सो वह इसका ठीक से प्रतिरोध नहीं कर पाए और हरिजन ऐक्ट के तहत पूर्व में जेल गए। तब जब कि बाकायदा नकद पांच लाख रुपए दे कर होशोहवास में खेत की रजिस्ट्री करवाई थी। पोलादन को यह पांच लाख रुपया देने का प्रमाण भी गणेश तिवारी ने पेश करवा दिया और खुद गवाह बन गए। बात हत्या की आई तो फौजी तिवारी के वकील ने इसे हत्या नहीं, आत्मरक्षार्थ कार्रवाई स्टैब्लिश किया। बताया कि तीन-तीन लोग लाठी भालों से लैस उसे मारने आ रहे थे तो उसके मुवक्किल को अपनी रक्षा ख़ातिर गोली चलानी पड़ी। कई पेशियों, तारीख़ों के बाद जिला जज भी वकील की इस बात से ‘कनविंस’ हो गया। रही बात पोलादन की नातिन के साथ बलात्कार की तो जांच और परीक्षण में वह भी ‘हैबीचुअल’ पाई गई। और यह मामला भी ले दे कर रफा दफा हो गया। पोलादन की नातिन भी चुपचाप ‘मुआवजा’ पा कर ‘ख़ामोश’ हो गई थी।’

बेचारी करती भी तो क्या?

सब कुछ निपट जाने पर एक दिन फौजी तिवारी के घर गणेश तिवारी पहुंचे। खांसते-खखारते। बात ही बात में गांधी टोपी ठीक कर के जाकेट में हाथ डालते हुए वह बोले, ‘आखि़र अपना ख़ून अपना, ख़ून है।’

‘चुप्प माधरचोद!’ फौजी तिवारी का छोटा बेटा बोला, ‘जिंदगी जहन्नुम बना दी पचीस हजार रूपए की दलाली ख़ातिर और अपना ख़ून, अपना ख़ून की रट लगाए बैठा है।’ वह खौलते हुए बोला, ‘भाग जा बुढ्ढे माधरचोद नहीं तुमको भी गोली मार दूंगा। तुम्हें मारने पर हरिजन ऐक्ट भी नहीं लगेगा।’

‘राम-राम! बच्चा बऊरा गया है। नादान है।’ कह कर गणेश तिवारी ने मनुहार भरी आंखों से फौजी तिवारी की ओर देखा। तो फौजी तिवारी की आंखें भी गणेश तिवारी को तरेर रही थीं। सो ‘नारायन-नारायन!’ करते हुए गणेश तिवारी ने बेआबरू हो कर ही सही वहां से खिसक लेने में ही भलाई सोची।

तो यह और ऐसी तमाम कथाओं और किंवदंतियों के केंद्र में रहने वाले यही गणेश तिवारी भुल्लन तिवारी की नतिनी की शादी में रोड़ा बनने की भूमिका बांध रहे थे। कारण दो थे। एक तो यह कि भुल्लन तिवारी की नतिनी की शादी ख़ातिर पट्टीदारी के लोगों में नामित ‘संभ्रांत’ में लोक कवि ने उनका नाम क्यों नहीं रखा। नाम रखना तो दूर मिलना भी जरूरी नहीं समझा। तब जब कि वह उन का ‘शिष्य’ है। दूसरा कारण यह था कि उन की जेब इस शादी में कैसे किनारे रह गई? तो इस तरह अहं और पैसा दोनों की भूख उनकी तुष्ट नहीं हो रही थी। सो ऐसे में वह चैन से कैसे बैठे रहते भला? ख़ास कर तब और जब लड़की का ख़ानदान ऐबी हो। बाप एड्स से मरा था और आजा जेल में था! फिर भी उन्हें नहीं पूछा गया। तो क्या उनकी ‘प्रासंगिकता’ गांव जवार में ख़तरे में पड़ गई थी? क्या होगा उनकी विलेज बैरिस्टरी का ? क्या होगा उनकी बियहकटवा वाली कलाकारी का?

वैसे तो हर गांव, हर जवार की हवा में शादी काटने वाले बियहकटवा बिचरते ही हैं। कोई नए रूप में, कोई पुराने रूप में तो कोई बहुरुपिया रूप में। लेकिन इस सब कुछ के बावजूद गणेश तिवारी का कोई सानी नहीं था। जिस सफाई, जिस सलीके, जिस सादगी से वह बियाह काटते थे उस पर अच्छे-अच्छे न्यौछावर हो जाएं। लड़की हो या लड़का सबके ऐब वह इस चतुराई से उघाड़ते और लगभग तारीफ के पुल बांधते हुए कि लोग लाजवाब हो जाते। और उनका ‘काम’ अनायास ही हो जाता। अब कि जैसे किसी लड़की का मसला हो तो वह बताते, ‘बड़ी सुंदर, बड़ी सुशील। पढ़ने लिखने में अव्वल। हर काम में ‘निपुण’। ऐसी सुशील लड़की आप को हजार वाट का बल्ब बार कर खोजिए तो नहीं मिलेगी। और सुंदर इतनी कि बाप रे बाप पांच छ लौंडे तक पगला चुके हैं।’

‘का मतलब?’

‘अरे, दू ठो तो अभिए मेंटल अस्पताल से वापिस आए हैं।’

‘इ काहें?’

‘अरे उन बेचारों का का दोष। ऊ लड़की हई है एतनी सुंदर।’ वह बताते, ‘बड़े-बड़े विश्वामित्र पगला जाएं।’

‘उसकी सुंदरता से इनके पागलपन का क्या मतलब ?

‘ए भाई, चार दिन आप से बतियाए और पांचवें दिन दूसरे से बोलने-बतियाने लगे, फिर तीसरे, चौथे से। तो बकिया तो पगला ही जाएंगे न!’

‘ई का कह रहे हैं आप?’ पूछने वाले का इशारा होता कि, ‘आवारा है क्या?’

‘बाकी लड़की गुणों की खान है।’ गणेश तिवारी अगले का सवाल और संकेत जानबूझ कर पी जाते और तारीफ के पुल बांधते जाते। उनका काम हो जाता।

कहीं-कहीं वह लड़की की ‘हाई हील’ की तारीफ कर बैठते पर संकेत साफ होता कि नाटी है। तो कहीं वह लड़की के मेकअप कला की तारीफ करते हुए संकेत देते कि लड़की सांवली है। बात और बढ़ानी होती तो वह डाक्टर, चमाइन, दाई, नर्स वगैरह शब्द भी हवा में बेवजह उछाल देते किसी न किसी हवाले से और संकेत एबार्सन का होता। भैंगी आंख, टेढ़ी चाल, मगरूर, घुंईस, गोहुवन जैसे पुराने टोटके भी वह सुरती ठोंकते खाते आजमा जाते। उनकी युक्तियों और उक्तियों की कोई एक चौहद्दी, कोई एक फ्रेम, कोई एक स्टाइल नहीं होती। वह तो नित नई होती रहती। मां का झगड़ालू होना, मामा का गुंडा होना, बाप का शराबी होना, भाई का लुक्कड़ या लखैरा होना वगैरह भी वह ‘अनजाने’ ही सुरती थूकते-खांसते परोस देते। लेकिन साथ-साथ यह संपुट भी जोड़ते जाते कि, ‘लेकिन लड़की है गुणों की खान।’ फिर अति सुशील, अति सुंदर सहित हर कार्य में निपुण, पढ़ाई-लिखाई में अव्वल, गृह कार्य में दक्ष वगैरह।’

यही-यही और ऐसी-ऐसी तरकीबें वह लड़कों के साथ भी आजमाते। ‘बड़ा होनहार, बड़ा वीर’ कहते हुए उसकी ‘संगत’ का भी बखान बघार जाते और काम हो जाता।

एक बार तो गजब हो गया। एक लड़के के पिता ने बड़े जतन से उस रोज बेटे की तिलक का मुहुर्त निकलवाया जिस दिन क्या उस दिन के आगे-पीछे भी गांव में गणेश तिवारी की उपस्थिति संभव नहीं थी। पर जाने कहां से ऐन तिलक चढ़ने के कुछ समय पहले वह न सिर्फ गांव में प्रगट हो गए बल्कि उसके घर उपस्थित हो गए। न सिर्फ उपस्थित हुए जाकेट से हाथ निकाल कर गांधी टोपी ठीक करते-करते तिलक चढ़ाने आए तिलकहरुवों के बीच जा कर बैठ गए। उन के वहां बैठते ही घर भर के लोगों के हाथ पांव फूल गए। दिल धकधकाने लगे। लोगों ने तिलकहरुवों की आवभगत छोड़ कर गणेश तिवारी की आवभगत शुरू कर दी। लड़के के पिता और बड़े भाई ने गणेश तिवारी के आजू-बाजू अपनी ड्यूटी लगा ली। ताकि उनके सम्मान में कोई कमी न आए दूसरे, उनके मुंह से कहीं लड़के की तारीफ न शुरू हो जाए। गणेश तिवारी का नाश्ता अभी चल रहा था और वह पूरी तरह ठीक वैसे ही काबू में थे जैसे अख़बारों में दंगों आदि के बाद ख़बरों का शीर्षक छपता है ‘स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्राण में।’ तो ‘तनावपूर्ण लेकिन नियंत्राण में’ वाली स्थिति में ही लड़के के पिता को एक उपाय यह सूझा कि क्यों न बेटे को बुला कर गणेश तिवारी के पांव छुलवा कर इनका आशीर्वाद दिला दिया जाए। ताकि गणेश तिवारी का अहं तुष्ट हो जाए और तिलक तथा विवाह बिना विघ्न-बाधा के संपन्न हो जाएं। और उन्होंने ऐसा ही किया। तेजी से घर में गए और उसी फुर्ती से बेटे को लिए चेहरे पर अतिरिक्त उत्साह और मुसकान टांके गणेश तिवारी के पास ले गए जो बीच तिलकहरुओं के स्पेशल नाश्ता पर जुटे हुए थे। लड़के को देखते ही गणेश तिवारी ने धोती की एक कोर उठाई और मुंह पोंछते हुए लड़के के पिता से भी ज्यादा मुसकान और उत्साह अपने चेहरे पर टांक लिया और आंखों का कैमरा ‘क्लोज शाट’ में लड़के पर ही टिका दिया। पिता के इशारे पर लड़का झुक कर दोनों हाथों से गणेश तिवारी के दोनों पांव दो-दो बार एक ही क्रम में कुछ छू कर चरण-स्पर्श कर ही रहा था कि गणेश तिवारी ने आशीर्वादों की झड़ी लगा दी। सारे विशेषण, सारे आशीर्वाद दे कर उन्होंने आखि़र अपना ब्रह्ममास्त्र फेंक दिया, ‘जियो बेटा! पढ़ाई लिखाई में तुम अव्वल थे ही, नौकरी भी तुम्हें अव्वल मिली है। वह बोले, ‘अब भगवान के आशीर्वाद से तुम्हारा विवाह भी हो ही रहा है। बस भगवान की कृपा से तुम्हारी मिर्गी भी ठीक हो जाए तो क्या कहना!’ वह बोले, ‘चलो हमारा पूरा-पूरा आशीर्वाद है!’ कह कर उन्होंने लड़के की पीठ थपथपाई। तिलकहरुओं की ओर मुसकुराते हुए मुखातिब हुए और लगभग वीर रस में बोले, ‘हमारे गांव, हमारे कुल की शान हैं ये।’ उन्होंने जोड़ा, ‘रतन है रतन। आप लोग बड़े खुशनसीब हैं जो ऐसे योग्य और होनहार युवक को अपना दामाद चुना है।’ कह कर वह उठ खड़े हुए बोले, ‘लंबी यात्रा से लौटा हूं। थका हुआ हूं। विश्राम जरूरी है। क्षमा करें चल रहा हूं। आज्ञा दें।’ कह कर दोनों हाथ उन्होंने जोड़े और वहां से चल दिए।

गणेश तिवारी तो वहां से चल दिए पर तिलकहरुओं की आंखों और मन में सवालों का सागर छोड़ गए। पहले तो आंखों-आंखों में यह सवाल सुलगा। फिर जल्दी ही जबान पर बदकने लगा यह सवाल कि, ‘लड़के को मिर्गी आती है?’ कि, ‘लड़का तो मिर्गी का रोगी है?’ कि, ‘मिर्गी के रोगी लड़के से शादी कैसे हो सकती है?’ कि, ‘लड़की की जिंदगी नष्ट करनी है क्या?’ और अंततः इन सवालों की आग शोलों में तब्दील हो गई। लड़के के पिता, भाई, नाते-रिश्तेदार और गांव के लोग भी सफाई देते रहे, कसमें खाते रहे कि, ‘लड़के को मिर्गी नहीं आती, ‘कि ‘लड़के को मिर्गी आती तो नौकरी कैसे मिलती ?’ कि ‘अगर शक हो ही गया है तो डाक्टर से जांच करवा लें!’ आदि-आदि। पर इन सफाइयों और कसमों का असर तिलकहरुओं पर जरा भी नहीं पड़ा। और वह लोग जो कहते हैं थारा-परात, फल-मिठाई, कपड़ा-लत्ता, पैसा वगैरह ले कर वहां से उठ खड़े हुए। फिर बिना तिलक चढ़ाए ही चले गए। यह कहते हुए, कि ‘लड़की की जिंदगी नष्ट होने से बच गई।’ साथ ही गणेश तिवारी की ओर भी इंगित करते हुए कि, ‘भला हो उस शरीफ आदमी का जिसने समय रहते आंखें खोल दीं। नहीं हम लोग तो फंस ही गए थे। लड़की की जिंदगी नष्ट हो जाती!’

अनायास ही जैसे आशीर्वाद दे कर गणेश तिवारी ने इस लड़के को निपटाया था वैसे ही भुल्लन तिवारी की नतिनी की शादी में भी वह अनायास ही के भाव में सायास निपटाने ख़ातिर जुट गए थे। भुल्लन तिवारी की नातिन को कम लोक कवि की जेब के बहाने अपनी गांठ की चिंता उन्हें कहीं ज्यादा सक्रिय किए थी। बात वैसे ही बिगड़ी हुई थी, गणेश तिवारी की सक्रियता ने आग में घी का काम किया। अंततः बात लोक कवि तक पहुंची। पहुंचाई भुल्लन तिवारी के बेटे के साले ने लखनऊ में और कहा कि, ‘बहिन के भाग में अभाग लिखा ही था लगता है भांजी के भाग में एहसे बड़ा अभाग लिखा है।’’

‘घबराइए मत।’ लोक कवि ने उन्हें सांत्वना दी। कहा कि, ‘सब ठीक हो जाएगा।’

‘कइसे ठीक हो जाएगा?’ साला बोला, ‘जब गणेश तिवारी का जिन्न उसके बियाह के पीछे लग गया है। जहां जाइए आप के पहले गणेश तिवारी चोखा चटनी लगा के सब मामिला पहिले ही बिगाड़ चुके होते हैं!’

‘देखिए अब का कहूं मैं, आप भी ब्राह्मण हैं। हमारे देवता तुल्य हैं बकिर बुरा मत मानिएगा।’ लोक कवि बोले, ‘गणेश तिवारी भी ब्राह्मण हैं। हमारे आदरणीय हैं। बकिर हैं कुत्ता। कुत्ते से भी बदतर!’ लोक कवि ने जोड़ा, ‘कुत्ते का इलाज हम जानता हूं। दू चार हजार मुंह पर मार दूंगा तो ई गुर्राने, भूंकने वाला कुत्ता दुम हिलाने लगेगा।’

‘लेकिन कब? जब सबहर जवार जान जाएगा तब? जब सब लोग थू-थू करने लगेंगे तब?’

‘नाहीं जल्दिए।’ लोक कवि बोले, ‘अब इहै गणेश तिवारिए आप के भांजी का तारीफ करेगा।’

‘तारीफ त करी रहा है।’ साला बोला, ‘तारीफ कर के ही तो ऊ काम बिगाड़ रहा है। कि लड़की सुंदर है, सुशील है। बकिर बाप अघोड़ी था। एड्स से मर गया और आजा खूनी है। जेल में बंद है।’

‘त ई बतिया कहां से छुपा लेंगे आप और हम?’

‘नाहीं बाति एहीं तक थोड़े ही है।’ वह बोला, ‘गणेश तिवारी प्रचारित कर रहे हैं कि भुल्लन तिवारी के पूरे परिवार को एड्स हो गया है। साथ ही भांजी का भी नाम वह नत्थी कर रहे हैं।’

‘भांजी को कैसे नत्थी कर लेंगे?’ लोक कवि भड़के।

‘ऊ  अइसे कि….। साला बोला, ‘जाने दीजिए ऊ बहुत गिरी हुई बात कहते हैं।’

‘का कहते हैं?’ धीरे से बुदबुदाए लोक कवि, ‘अब हमसे छुपाने से का फषयदा? आखि़र ऊ तो कहि रहे हैं न?’

‘ऊ  कह रहे हैं जीजा जी के लिए कि अघोड़ी था बेटी तक को नहीं छोड़ा। सो बेटी को भी एड्स हो गया है।’

‘बड़ा कमीना है!’ कह कर लोक कवि ने पुच्च से मुंह में दबी सुरती थूकी। बोले, ‘आप चलिए। हम जल्दिए गणेश तिवारी को लाइन पर लाता हूं।’ वह बोले, ‘ई बात था तो पहिलवैं बताए होते एह कमीना कुत्ता का इलाज हम कर दिए होते।’

‘ठीक है तो जइसे एतना देखें हैं आप तनी एतना और देख लीजिए।’ कह कर साला उठ खड़ा हुआ।

‘ठीक है, त फिर प्रणाम!’ कह कर लोक कवि ने दोनों हाथ जोड़ लिए।

भुल्लन तिवारी के बेटे के साले के जाते ही लोक कवि ने चेयरमैन साहब को फोन मिलाया और पूरी रामकहानी बताई। चेयरमैन साहब छूटते ही बोले, ‘जो पइसा तुम उसको देने को सोच रहे हो वही पइसा किसी लठैत या गुंडा को दे कर उसकी कुट्टम्मस करवा दो। भर हीक कुटवा दो, हाथ पैर तोड़वा दो सारा नारदपना भूल जाएगा।’

‘ई ठीक पड़ेगा भला?’ लोक कवि ने पूछा।

‘काहें बुरा का होगा? चेयरमैन साहब ने भी पूछा। वह बोले, ‘ऐसे कमीनों के साथ यही करना चाहिए।’

‘आप नहीं जानते ऊ दलाल है। हाथ पैर टूट जाने के बाद भी ऊ कवनो अइसन डरामा रच लेगा कि लेना का देना पड़ जाएगा।’ लोक कवि बोले, ‘जो अइसे मारपीट से ऊ सुधरने वाला होता तो अबले कई राउंड वह पिट-पिटा चुका होता। बड़ा तिकड़मी है सो आज तक कब्बो नाहीं पिटा।’ वह बोले, ‘खादी वादी पहन कर अहिंसा-पहिंसा वइसै बोलता रहता है। कहीं पुलिस-फुलिस का फेर पड़ गया तो बदनामी हो जाएगी।’

‘त का किया जाए? तुम्हीं बोलो !’

‘बोलना का है चल के कुछ पैसा उसके मुंह पर मारि आना है!’

‘त इसमें हम का करें?’

‘तनी सथवां चलि चलिए। और का!’

‘तुम्हारा शैडो तो हूं नहीं कि हरदम चला चलूं तुम्हारे साथ!’

‘का कहि रहे हैं चेयरमैन साहब!’ लोक कवि बोले, ‘आप तो हमारे गार्जियन हैं।’

‘ई बात है?’ फोन पर ही ठहाका मारते हुए चेयरमैन साहब बोले, ‘तो चलो कब चलना है ?’

‘नहीं, दू चार ठो पोरोगराम इधर लगे हैं, निपटा दूं तो बताता हूं।’ लोक कवि बोले, ‘असल में का है कि एह तर के बातचीत में आप के साथ होने से मामला बैलेंस रहता है और बिगड़ा काम बन जाता है।’

‘ठीक है, ठीक है ज्यादा चंपी मत करो। जब चलना तो बताना।’ वह रुके और बोले, ‘अरे हां, दुपहरिया में आज का कर रहे हो?’

‘कुछ नाईं, तनी रिहर्सल करेंगे कलाकारों के साथ।’

‘तो ठीक है जश्रा बीयर-सीयर ठंडी-ठंडी मंगवा लेना मैं आऊंगा।’ वह बोले, ‘तुमको और तुम्हारे रिहर्सल को डिस्टर्ब नहीं करुंगा। मैं चुपचाप पीता रहूंगा और तुम्हारा रिहर्सल देखता रहूंगा।’

‘हां, बकिर लड़कियों के साथ नोचा-नोची मत करिएगा।’

‘का बेवकूफी का बात करते हो।’ वह बोले, ‘तुम बस बीयर मंगाए रखना।’

‘ठीक है आइए!’ लोक कवि बेमन से बोले।

चेयरमैन साहब बीच दोपहर लोक कवि के पास पहुंच गए। रिहर्सल अभी शुरू भी नहीं हुआ था लेकिन चेयरमैन साहब की बीयर शुरू हो गई। बीयर के साथ के लिए लइया चना, मूंगफली और पनीर के कुछ टुकड़े कटवा कर मंगवा लिए थे। एक बोतल बीयर जब वह पी चुके और दूसरी बोतल खोलने लगे तो बोतल खोलते-खोलते वह लोक कवि से बेलाग हो कर बोले, ‘कुछ मटन-चिकन मंगवाओ और ह्विस्की भी!’ उन्हों ने जोड़ा, ‘अब ख़ाली बीयर-शीयर से दुपहरिया नहीं गुजरने वाली।’

‘अरे, लेकिन रिहर्सल होना है अभी।’ लोक कवि हिचकते हुए संकोच घोलते हुए बोले।

‘रिहर्सल को कौन रोक रहा है?’ चेयरमैन साहब बोले, ‘तुम रिहर्सल करते-करवाते रहो। मैं खलल नहीं डालूंगा। किचबिच-किचबिच मत करो, चुपचाप मंगवा लो।’ कह कर उन्हों ने जेब से कुछ रुपए निकाल कर लोक कवि की ओर फेंक दिए।

मन मार कर लोक कवि ने रुपए उठाए, एक चेले को बुलाया और सब चीजें लाने के लिए बाजार भेज दिया। इसी बीच रिहर्सल भी शुरू हो गया। तीन लड़कियों ने मिल कर नाचना और गाना शुरू कर दिया। हारमोनियम, ढोलक, बैंजो, गिटार, झाल, ड्रम बजने लगे। लड़कियां नाचती हुई गा रही थीं, ‘लागता जे फाटि जाई जवानी में झुल्ला / आलू, केला खइलीं त एतना मोटइलीं / दिनवा में खा लेहलीं, दू-दू रसगुल्ला!’ और बाकायदा झुल्ला दिखा-दिखा कर, आंखों को मटका-मटका कर, कुल्हों और छातियों के स्पेशल मूवमेंट्स के साथ वह गा रही थीं। और इधर ह्विस्की की चुस्की ले-ले कर चेयरमैन साहब भर-भर आंख ‘यह सब’ देख रहे थे। देख क्या रहे थे पूरा-पूरा मजा ले रहे थे। गाने की रिहर्सल ख़त्म हुई तो चेयरमैन साहब ने दो लड़कियों को अपनी तरफ बुलाया। दोनों सकुचाती हुई पहुंचीं तो उन्हें आजू-बाजू कुर्सियों पर बिठाया। उन दोनों की गायकी की तारीफ की। फिर इधर उधर की बातें करते हुए वह एक लड़की का गाल सहलाने लगे। गाल सहलाते-सहलाते बोले, ‘इसको थोड़ा चिकना और सुंदर बनाओ!’ लड़की लजाई। सकुचाती हुई बोली, ‘प्रोग्राम में मेकअप कर लेती हूं। सब ठीक हो जाता है।’

‘कुछ नहीं!’ चेयरमैन साहब बोले, ‘मेकअप से कब तक काम चलेगा? जवानी में ही मेकअप कर रही हो तो बुढ़ापे में का करोगी?’ वह बोले, ‘कुछ जूस वगैरह पियो, फल फ्रूट खाओ!’ कहते हुए वह अचानक उसकी ब्रेस्ट दबाने लगे, ‘यह भी बहुत ढीला है। इसको भी टाइट करो!’ लड़की अफना कर उठ खड़ी हुई तो वह उसकी हिप को लगभग दबाते और थपथपाते हुए बोले, ‘यह भी ढीला है, इसे भी टाइट करो। कुछ एक्सरसाइज वगैरह किया करो। अभी जवान हो, अभी से यह सब ढीला हो जाएगा तो कैसे काम चलेगा।’ वह सिगरेट का एक लंबा कश भरते हुए बोले, ‘सब टाइट रखो। जमाना टाइट का है। और अफना के भाग कहां रही हो? बैठो यहां अभी तुम्हें कुछ और भी बताना है।’ लेकिन वह लड़की ‘अभी आई!’ कह कर बाहर निकल गई। तो चेयरमैन साहब दूसरी लड़की की ओर मुखातिब हो गए जो बैठी-बैठी अर्थपूर्ण ढंग से मुसकुरा रही थी। तो उसे मुसकुराते देख चेयरमैन साहब भी मुसकुराते हुए बोले, ‘का रे तुम काहें बड़ा मुसकुरा रही है?’

‘ऊ लड़की अभी नई है चेयरमैन साहब!’ इठलाती हुई वह बोली, ‘अभी रंग नहीं चढ़ा है उस पर!’

‘बकिर तुम तो रंगा गई है!’ उसके दोनों गाल मीजते हुए चेयरमैन साहब बहकते हुए बोले।

‘ई सब हमरहू साथे मत करिए चेयरमैन साहब।’ वह किंचित सकुचाती, लजाती और लगभग प्रतिरोध दर्ज कराती हुई बोली, ‘हमारा भाई अभी आने वाला है। कहीं देख लेगा तो मुश्किल हो जाएगी।’

‘का मुश्किल हो जाएगी?’ वह उसके स्तनों की ओर एक हाथ बढ़ाते हुए बोले, ‘का गोली मार देगा?’

‘हां, मार देगा गोली!’ वह चेयरमैन साहब का हाथ बीच में ही दोनों हाथ रोकती हुई बोली, ‘झाड़ई, जूता, गोली जो भी पाएगा मार देगा?’

यह सुनते ही चेयरमैन साहब ठिठक गए। बोले, ‘का गुंडा, मवाली है का?’

‘है तो नहीं गुंडा मवाली पर जो आप लोग अइसेही करिएगा तो बन जाएगा!’ वह बोली, ‘वह तो हमारे गाने-नाचने पर भी बड़ा ऐतराज मचाता है। ऊ नहीं चाहता है कि हम प्रोग्राम करें।’

‘क्यों?’ चेयरमैन साहब की सनक अब तक सुन्न हो चुकी थी। सो वह दुबारा बड़े सर्द ढंग से बोले, ‘क्यों?’

‘ऊ  कहता है रेडियो, टी.वी. तक तो ठीक है। ज्यादा से ज्यादा सरकारी कार्यक्रम कर लो बस। बाकी प्राइवेट कार्यक्रम से ऊ भड़कता है।’

‘काहें?’

‘ऊ कहता है भजन, गीत, गजल तक तो ठीक है पर ई फिल्मी उल्मी गाना, छपरा हिले बलिया हिले टाइप गाना मत गाया करो।’ यह रुकी और बोली, ‘ऊ तो हमीं को कहता है कि नहीं मानोगी तो एक दिन ऐन कार्यक्रम में गोली मार दूंगा और जेल चला जाऊंगा!’

‘बड़ा डैंजर है साला!’ सिगरेट झाड़ते हुए चेयरमैन साहब उठ खड़े हुए। खंखारते हुए उन्होंने लोक कवि को आवाज दी और बोले, ‘तुम्हारा ई अड्डा बड़ा ख़तरनाक हो रहा है। मैं तो जा रहा हूं।’ कह कर वह सचमुच वहां से चल दिए। लोक कवि उनके पीछे-पीछे लगे भी कि, ‘खाना मंगवा रहा हूं खा-पी कर जाइए।’ फिर भी वह नहीं माने तो लोक कवि बोले, ‘एक आध पेग दारू और हो जाए!’ पर चेयरमैन साहब बिन बोले हाथ हिला कर मना करते हुए बाहर आ कर अपनी एंबेसडर में बैठ गए और ड्राइवर को इशारा किया कि बिना कोई देरी किए अब यहां से निकल चलो।

उनकी एंबेसडर स्टार्ट हो गई। चेयरमैन साहब चले गए।

भीतर वापस आ कर लोक कवि उस लड़की से हंसते हुए बोले, ‘मीनू तुमने तो आज चेयरमैन साहब की हवा टाइट कर दी!’

‘का करते गुरु जी आखि़र!’ वह किंचित संकोच में खुशी घोलती हुई बोली, ‘ऊ तो जब आप ने आंख मारी तभी हम समझ गई कि अब चेयरमैन साहब को फुटाना है।’

‘वो तो ठीक है पर वह तुम्हारा कौन भाई है जो इतना बवाली है?’ लोक कवि बोले, ‘उसको यहां मत लाया करो। डेंजर लोगों की यहां कलाकारों में जरूरत नहीं है।’

‘का गुरु जी आप भी चेयरमैन साहब की तरह फोकट में घबरा गए।’ मीनू बोली, ‘कहीं कवनो ऐसा भाई हमारा है? अरे, हमारा भाई तो एक ठो है जो भारी पियक्कड़ है। पी के हरदम मरा रहता है। उसको अपने बीवी बच्चों की ही फिकर नहीं रहती है तो हमारी फिकर कहां से करेगा?’ वह बोली, ‘और जो अइसे ही फिकर करता तो म्यूजिक पार्टियों में घूम-घूम कर प्रोग्राम ही क्यों करती?’

‘तुम तो बड़ी भारी कलाकार हो।’ मीनू की हिप पर हलकी सी चिकोटी काटते, सहलाते लोक कवि बोले, ‘बिलकुल डरामा वाली।’

‘अब कहां गुरु जी हम कलाकार रह गए। हां, पहले थे। दो तीन नाटक रेडियो पर भी हमारे आए थे।’

‘तो अब काहें नह