कैंसर से जो जूझे, वो कैंसर के पीछे की गणित बूझे

आलोक तोमर: मौत की भी एक सीमा रेखा होती है : कैंसर एक ऐसा नाम हैं जिसे अब भी जीवन का पूर्ण विराम माना जाता है। होने को कुछ नया नहीं होता। शरीर के कुछ अंगो की कोशिकाएं बहुत तेजी से विभाजन शुरू कर देती है। विभाजन पहले भी होता था लेकिन पुरानी कोशिकाओ के मरने और नई बनने के बीच एक संतुलन रहता है जिसके बिगड़ जाने का नाम ही कैंसर है। क्या आपको आश्चर्य नहीं होता कि जहां एचआईवी को खत्म करने वाली वैक्सीन पर अंतिम प्रयोग हो रहे हैं और एचआईवी के निषेध के लिए बहुत सार उपाय हो चुके हैं, वहां आयुर्वेद के जमाने से कर्कट रोग के नाम से परिचित इस बीमारी का आज तक कोई पक्का निदान नहीं तैयार हो पाया।

हर साल बहुत सारी प्रयोगशालाएं दुनिया के कोने कोने में करोड़ों डॉलर खर्च कर के कैसर से निपटने के उपाय खोजती रहती है और उपाय है कि मिलता नहीं। मानव चंद्रमा तक पहुंच गया मगर अपनी काया के रहस्य पकड़ में नहीं आए। यह मानवीय मजबूरी नहीं बल्कि आपराधिक लालच का गणित है जिसकी वजह से यह अमानवीय भूल हो रही है।  तमाम कहानियां हैं और उन पर बड़े महंगे महंगे सेमिनार दुनिया भर में होते रहते है। कैंसर के नाम पर दुकान चलाने वाले भी कम नहीं है। बल्कि कहना चाहिए कि दुकान चलाने वाले ही ज्यादा है। दुनिया की पता नहीं पर हमारे देश में तो एक डॉक्टर बाकायदा कीमत ले कर कैंसर के एक मरीज को दूसरे डॉक्टर को बाकायदा बेचता है। यही एक बीमारी है जिसमें मुनाफा ही मुनाफा है और कतई हर्षद मेहता, अब्दुल करीम तेलगी और केतन पारिख बनने की जरूरत नहीं है। बस मौत का डर बेचते रहिए।

बगैर कैसर के अस्पतालों से गुजरे आप नहीं जान सकते कि आफत असल में कितनी बड़ी है। मैं अक्सर अपने लिए ही यात्राएं करता रहता हूं और मित्र डॉक्टरो की वजह से यथासंभव शोषण से बचा रहता हूं फिर भी कैंसर ने मेरी नजर नहीं छीन ली है। इसलिए साफ दिखाई पड़ता है कि इंसान के जीवन के नाम पर किस तरह का बेशर्म कारोबार किया जा रहा है।  कीमोथैरेपी कैंसर का एक और शायद एक मात्र दवाई वाला उपाय है। दवाईयां आम तौर पर पारे से ले कर विभिन्न खनिजों और तौर पर जहरीली मानी जाने वाली दवाईयों का समुच्चय होती हैं और डॉक्टर जानते हैं कि कौन सी दवाई किस तरह के और किस चरण के कैंसर में काम करेगी। शरीर पर विलोम असर पड़ते जरूर हैं मगर उन पर भी काबू किया जा सकता है। जहां तक चिकित्सा शास्त्र की बात हैं तो यह सबसे बड़ा उपाय उपलब्ध है।

मगर आप कैंसर का इलाज कर सकते हैं, लालच का नहीं। किसी भी अस्पताल के कैंसर वार्ड के आस पास टहल कर आइए, आपको अपने होने पर संकोच होने लगेगा। एक औसत दवाई का दाम है 25 हजार रुपए जो आम तौर पर हरेक इक्कीसवें दिन लेनी पड़ती है। अपने देश में कितने लोग हैं जो यह खर्चा छाती पर बोझ लिए कर सकते है। लोग घर बेचते हैं, खेती बेचते हैं, धर्मशालाओं में बारी बारी से दस और पंद्रह दिन काटते हैं, आधा पेट खाते हैं और अपनों के इलाज में सब कुछ लगा देते हैं। सिर्फ खाने वाली टेबलेट साढ़े तीन सौ रुपए की एक आती है और कीमोथैरेपी से जो श्वेत रक्त कोशिकाएं मरती हैं उन्हें बचाने वाला इंजेक्शन पांच हजार रुपए का है और एक कीमोथेरेपी पर दो इंजेक्शन लगाने पड़ते है। इलाज के दौरान खुराक भी पक्की रखनी पड़ती है और वह सस्ती नहीं होती।

कैंसर की दवा बनाने वाली कंपनियों से ज्यादा मुनाफा तो शायद सोना या हीरा पन्ना निकालने वाली कंपनियां भी नहीं कमाती होगी। जिस दवा का छपा हुआ मुल्य दस हजार रुपए होता है उसकी असली लागत 400 रुपए से ज्यादा नहीं होती। ढाई लाख रुपए में कीमोथैरेपी की जो खुराक मिलती हैं और जिसे कल्याण के नाम पर बने अस्पताल भी बेचते हैं उसकी असली कीमत पांच हजार रुपए होती है। इसीलिए कैंसर की दवा बनाने वाली कंपनियां कैंसर के डॉक्टरों को दुनिया के हवाई टिकट दे कर निहाल करते रहते है।

हमारे देश में गरीबी की सीमा रेखा के नीचे लगभग आधे से ज्यादा लोग रहते है। गरीबी मिटाने के लिए बहुत उपाय किए जा रहे हैं लेकिन जो लोग गरीबी की वजह से मौत की रेखा के भी नीचे चले जाते हैं, जिनके पास मर रहे अपने लोगों को बचाने का कोई उपाय नहीं होता, उनकी तरफ क्या किसी की नजर जाती है। दवा माफिया दुनिया का सबसे संगठित, सबसे मजबूर करने वाला और सबसे घृणित माफिया है। हमारे देश में साहबों की बिजली और उनकी कारों के पेट्रोल सबसिडी मिल जाती है लेकिन जान बचाने की दवाएं पहुंच से बाहर ही रहती है। आप किस किस का क्या क्या बिगाड़ेंगे?

दुनिया मे कैंसर का इलाज खोजने के लिए उसी आमनवीय कारोबार में से पैसा खर्च किया जाता है, जिसमें इलाज को दुर्लभ बना दिया गया है। इस साल के औसत अंदाजे के अनुसार बाकी बीमारियों को छोड़ दिया जाए, हालांकि गड़बड़ वहां भी कम नहीं हैं, तो भी सिर्फ कैंसर की दवाईयों का सालाना धंधा आठ खरब डॉलर का है। आप आठ पर शून्य लगाते लगाते थक जाएंगे। यह हमारे और आपके जीवन को शून्य कर देने की कीमत है।

सीधी कहानी यह है कि जिन कोशिकाओ में अचानक तेजी से विभाजन होने लगता है वह डीएनए के उत्प्रेरक के बगैर नहीं हो सकता। जब डीएनए को नियंत्रित कर के हम समानांतर जीवन बनाने का सपना देख रहे हैं तो जाहिर है कि डीएनए के रहस्य और पहेलिया हमारी पकड़ में आ चुकी है। अपनी मुंबई के एक वैज्ञानिक ने तो डीएनए का कैंसर वाला कोड भी तोड़ लिया है। मगर जब इस वैज्ञानिक को भारत की चिकित्सा अनुसंधान परिषद मदद देने को राजी नहीं है तो लोगों की मौत पर मुनाफा वसूल करने वालों से मदद की क्या उम्मीद की जाए?

कुछ संस्थाएं हैं जो गरीब कैंसर पीड़ितों की मदद करती हैं। इनमें कुछ एनजीओ हैं और कुछ जनता से चंदा ले कर काम चलाती है। जाहिर है कि इनके पास साधन सीमित हैं और आठ खरब डॉलर के विश्वव्यापी बाजार का सामना करने की तो इनमें कतई हिम्मत नहीं है। ज्यादा से ज्यादा ये दवाईयां दे सकती हैं लेकिन कैंसर से जुड़ी दूसरी भव बाधाओं का निदान तो इनके पास भी कहां है? मैं फिर कह रहा हूं कि कैंसर का शिकार होने के बावजूद लड़ने के लिए मैं तैयार हूं लेकिन जब सवाल अपनो के अंत का आता है तो लोग सारी लड़ाईयां भूल जाते हैं और परमात्मा से ले कर लोभी आत्माओं तक से समझौता कर लेते हैं। यह मेडीकल आतंकवाद खत्म करना जरूरी है और इसके पहले इसके सारे आयामों को पहचानना जरूरी है।

लेखक आलोक तोमर देश के जाने-माने पत्रकार हैं. इन दिनों कैंसर की बीमारी से जूझ रहे हैं. उनका यह लिखा समाचार एजेंसी डेटलाइन इंडिया से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

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Comments on “कैंसर से जो जूझे, वो कैंसर के पीछे की गणित बूझे

  • kshama sharma says:

    well done alok.medical mafia is so strong that they can tear apart the government. cancer and diabetes are the best examples. pharma companies never wants to cure the disease. otherwise what will happen to their profit.
    best
    kshama sharma

    Reply
  • Dear Alok Ji,
    Its sad to know that you are suffering from Cancer but great to know that you have got this fighting spirit against Cancer. I have been a big fan of your writing and requesting you to write your story to motivate people against fight with the cancer.

    Rgds-
    Alok Vani

    Reply
  • Alok ji… AApke Hosale ko salam.. Bahut Jinda Dil dekhe.. Aap ki baat hi kuch aur hai.. Chahe Jindagi me ho ya journalism me…

    जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है
    तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है
    जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है
    जो रवि के रथ का घोड़ा है
    वह जन मारे नहीं मरेगा
    नहीं मरेगा

    जो जीवन की आग जला कर आग बना है
    फौलादी पंजे फैलाए नाग बना है
    जिसने शोषण को तोड़ा शासन मोड़ा है
    जो युग के रथ का घोड़ा है
    वह जन मारे नहीं मरेगा
    नहीं मरेगा

    Reply
  • saleem akhter siddiqui says:

    aalok ji, ek aise subject par aapne qalam chali hai, jis ka koi zikr karna nahin chahta. meine apne father ko cancer se ladte dekha tha. aaj apne jija ko dekh raha hoon. aapki takleef ko mein bakhubi samjh sakta hoon.

    Reply
  • तोमर जी आप योग की शरण ले लीजिये और पूरी निष्ठां के साथ जुट जाइए मैं विश्वास दिलाता हूँ की आपको किसी भी अलोपथिक दवाई के मुकाबले ज्यादा आराम और राहत महसूस होगी! आप ऐसे ही लेख लिखते रहे और अपने स्वस्थ भविष्य की कामना करें! धन्यवाद !!

    Reply
  • alok jee bilkul sahi kaha hai aapne. kisi jamane me doctor ko bhagawan kaha gaya ho lekin es vyabsayil duniya me doctor daku ban gaya hai.

    Reply
  • Ek jazba ! us jazbe ko salaam ! Aaj jitne sammanit kahe jaane waale peshe hain, wahan loot aur sirf loot ka aalam hai . Jitna padha-likha insaan , utni zyaada buddhi aur paisa kammane ke utne hi saare raaston ka srijan. Neaaton ko gaali dena aur mauka milne par apni jeb bharne se na chukna hi HINDUSTANI HONE KA DUSRA NAAM HAI. Insaaniyat ki khoj jaari hai. 100 mein….. BE-IMAAN, PHIR BHI MERA BHARAT MAHAAN . Kaise ? Pata nahi !

    Reply
  • चैतन्‍य भट़ट says:

    प्रिय आलोक भाई
    कैसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझने के बाद भी आपके भीतर की असीम उर्जा आज भी वैसी ही है जैसी जनसत्‍ता के वक्‍त हुआ करती थी बीमारियां भी उन्‍हे ही लीलती है जो बीमारियो से डर जातें है यिद मन मे आत्‍मविश्‍वास हो और जीवन को जीने की लालसा तो कितनी भी भयानक बीमारी हो वह उस इंसान से हार जाती है आप बहुत लम्‍बी उम्र पायेगे इसमें कोई संदेह नहीं है जहां तक दवाईयों के गोरखधंधे का सवाल है तो कैसर तो खैर बहुत बडी बीमारी है साधारण दवाईयां िजनकी लागत पचास पैसे और एक रूपये आती है वे पचास और साठ रूपये में बिकती है चूंकि इंसान को अपनी जान बचाना मजबूरी है इसलिये इस शोषण से दो चार होना ही पडता है दवाईयों के निर्माताओं डाक्‍टरों को एक गिरोह है जो किसी बीमार का खुन चूसने से भी परहेज नहीं करता लोग बीमारियों से जूझने में अपना घर द्वार बेच देते है उसके बाद भी उन्‍हे आराम नहीं लगता बडी बडी कंपनियां डाक्‍टरों को विदेश घुमाती है उन्‍हे बडी बडी गिफट देती है उसके बदले में डाक्‍टर उन्‍ही कंपिनयों की मंहगी दवाईयो मरीजो के लिये लिखतें है चूंकि मरीज के लिये डाक्‍टर भगवान का दूसरा रूप होता है इसलिये वो आंख मूंचकर उसकी हर बात मान लेता है यह होता आरहा है और होता रहेगा जरूरत है इसके खिलाफ आवाज बुलंद करने की मेडीकल रूपी आतंकवाद के खिलाफ आपकी आवाज में मैं अपनी आवाज मिलाने के लिये तैयार हूं
    आपका दोस्‍त
    चैतन्‍य भट़ट

    Reply
  • पंकज झा. says:

    बारंबार नमन आलोक जी को. इनके लिए किसी प्रार्थना की कोई सहानुभूति जताने की ज़रूरत नहीं है. वास्तव में समाज में फैले विभिन्न तरह के केंसर से कैरियर भर तोमर जी ने जैसा सामना किया है यह केंसर उसके आगे कुछ भी नहीं है. खुद न केवल इस बीमारी से अपितु इसकी आर में फैले मेडिकल आतंकवाद से जिस तरह से इन्होने सामना किया है और कर रहे हैं वह निश्चय ही वन्दनीय है. आँखे फाड देने वाला विवरण…….!

    Reply
  • Arvind K.Pandey says:

    It’s a great piece of writing that exposes the misdeeds of bad elements present in the medical world.The pharmaceutical industry is indeed in grip of people who have made diseases a mean to satiate their greed.It’s height of tragedy !!!

    Anyway,I expect that better sense will prevail among the people involved in making of the medicine.

    I appreciate the spirit of Tomarji.Keep it up.Your ability to keep moving ahead is indeed laudable.

    Yours truly,
    Arvind K.Pandey

    http://indowaves.instablogs.com/
    http://indowaves.wordpress.com/

    Reply
  • Arvind K.Pandey says:

    It’s a great piece of writing that exposes the misdeeds of bad elements present in the medical world.The pharmaceutical industry is indeed in grip of people who have made diseases a mean to satiate their greed.It’s height of tragedy !!!

    Anyway,I expect that better sense will prevail among the people involved in making of the medicine.

    I appreciate the spirit of Tomarji.Keep it up.Your ability to keep moving ahead is indeed laudable.

    Yours truly,
    Arvind K.Pandey

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  • yashovardhan nayak tikamgarh. says:

    तोमर साहब, आपकी जिन्दादिली को सलाम मैंने अपनी सगी चाची जी ,को कैसर से जूझते हुए ,और मरते देखा है. उन्हें एक दिन छाती में दर्द हुआ ,उनकी तकलीफ देखकर चाचा जी उन्हें झाँसी ले गए ,जहाँ डाक्टर ने उनका आपरेशन कर दिया ,और मुंबई ले जाने की सलाह दी ,चाची जिंदादिल थी ,वे मौत को करीब देखकर घबराई नहीं उन्होंने एकदम सहजता से आखरी लम्हे तक अपने चेहरे पर मुस्कराहट बनाये रखी . उन्हें स्तन कैंसर था . आज भी हम लोग झाँसी के उस सर्जन को कोसते है ,जिसने कुछ हजार रूपये की लालच में उनका तत्काल आपरेशन कर दिया ,यही आपरेशन मुंबई में होता तो शायद वे कुछ साल और जीती .उन्हें गए दस बरस बीत गये .अब तो इस रोग के उपचार हेतु बहुत रिसर्च हो चुका है.आप इस रोग से जीते और लम्बी उम्र जिए ,परमेश्वर से आपके स्वस्थ होने की कामना करूँगा .

    Reply
  • Abul bashar khan says:

    Tomar ji kafi dukh hua lekin behad kushi bhi huyi aapke hausle ko deskkar..jab baat apni ya apno ki aati hai to zyadatar log samjhauta kar lete hain..lekin aapne jo kiya uske liye salaam …aur haan ab waqt aa gaya hai..halaat badlenge ,din badlenge,aur ye sab benakaab honge..kyonki ab Hindustan jaag gaya hai..Aapka lekh hi iska udahran hai..

    Reply
  • jayanti jain says:

    Alok ji,
    great, medical mafia is there, but alternative therapy is there. u can follow the Dr Bujwid’s protocol in taking diet, use of flaxseed oil and paneer with apricot and other fruits.

    Reply

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