: ‘इलेक्ट्रानिक मीडिया – वस्तुनिष्ठ प्रसारण की जिम्मेदारी’ पर विमर्श : सुपसिद्ध टीवी पत्रकार और स्तंभकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने पत्रकार को अपना कैनवास बड़ा करने की बात कही। वे रविवार को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के जनसंचार विभाग की ओर से पत्रकारिता के भीष्म पितामह कहे जाने वाले संपादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराडकर की स्मृति पर्व पर ‘मिशनरी पत्रकारिता : संदर्भ और प्रासंगिकता’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के तृतीय अकादमिक सत्र के दौरान ‘इलेक्ट्रानिक मीडिया : वस्तुनिष्ठ प्रसारण की जिम्मेदारी’ सत्र के दौरान बतौर मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे।
श्री वाजपेयी ने कहा कि पराडकरजी के समक्ष राष्ट्रवाद का लक्ष्य था, उस दौर में एक हिंदुस्तान और एक भारत था आज कई हिंदुस्तान और कई भारत हैं। पत्रकारिता की पहली इकाई विश्वनीयता है। आज जो घोटाले हो रहे हैं ये लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमला है। हम जानते हैं कि अंतर्वस्तु समाचार की आत्मा होती है और ये अंतर्वस्तु गूगल से तय नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने गूगल को पत्रकारिता का पर्याय न मानने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि पूरे समाज को संवादहीनता की स्थिति में ला दिया है। मीडिया उसे जोड़ने की कोशिश में जुटा है। पी. साईनाथ पत्रकारिता में प्रतिष्ठित हुए हैं क्योंकि उन्होंने समाज के बीच जाकर कार्य किया है।
हबीब तनवीर सभागार में खचाखच भरे समारोह की अध्यक्षता करते हुए कोलकाता विश्वविद्यालय की जनसंचार की विभागाध्यक्ष प्रो. ताप्ती बसु ने कहा कि आज मीडिया द्वारा आरूषि हत्याकांड सहित निठारी कांड का उजागर किया जाना निश्चित ही इलेक्ट्रानिक मीडिया के वस्तुनिष्ठ होने का प्रमाण है।
साध्ाना चैनल प्रमुख व ब्रॉडकास्टिंग एडीटर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी एनके सिंह ने कहा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया की उम्र मात्र 16 साल है, इन 16 वर्षों में इनसे बहुत सारी अपेक्षाएं नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि आज मूल्य सब में गिरा है चाहे राजनीति हो या न्यायपालिका, सिर्फ पत्रकारिता पर यह आरोप मढ़ा जाना उचित नहीं है, दरअसल समस्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में है। आज टीवी चैनलों में राखी सावंत के डांस या फिर सचिन के छक्के से बौद्धिकता को बंद कर दिया जा रहा है। पहले पब्लिक स्पेयर पर जन को संवादों के माध्यम से शिक्षित किया जाता था पर आज टेक्नॉलॉजी ने उसे भी कुंद कर दिया है। उन्होंने कहा कि फोर्ब्स पत्रिका में शामिल 200 अमीरों में 44 भारतीय भी हैं, हालांकि यह अलग बात है कि 77 प्रतिशत भारतीय 20 रूपये में ही गुजारा करने को विवश हैं। उन्होंने भारत की भूखमरी का जिक्र करते हुए कहा कि 1600 कैलोरी में मजदूर कठिन परिश्रम करते हैं, कम कैलोरी मिलने से वे रोग से ग्रसित होते हैं, सरकार कहती है कि ये मौतें बीमारी की वजह से हुई है, यहां यह कहना समीचीन होगा कि हर 28 मिनट पर देश में एक किसान आत्महत्या कर लेता है, इसप्रकार की मौतें खबर नहीं बन पाती है। उन्होंने राबर्ट पुकवम की सोशल कैपीटल थ्योरी के हवाले से कहा कि पहले हम 30 मिनट सामाजिक रूप से जुड़े रहते थे, पर आज यह घटकर मात्र 12 मिनट ही रह गया है। पूरे विश्व में 9 मीडिया घरानों का मीडिया पर कब्जा है, इनकी कोशिश रहती है कैसे बौद्धिक प्रक्रिया को बाधित कर दिया जाय ताकि सिर्फ ये खरीददार बनकर रह जाएं।
आगरा विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभागाध्यक्ष गिरिजा शंकर शर्मा ने सामुदायिक रेडियो को अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बताते हुए कहा कि सुनामी में जब मुख्यधारा की मीडिया काम नहीं आयी तो सामुदायिक रेडियो ने लोगों को सूचित कर कई लोगों की जान बचाई। आईबीएन के वरिष्ठ संवाददाता अनन्त विजय ने कहा कि समाज में नैतिक मूल्यों में गिरावट के लिए सिर्फ टेलीविजन पर जो हमले हो रहे हैं, यह गलत है। 26/11 के हमले के बाद समाचार चैनलों पर हमला भी कम नहीं हुआ है।
जनसंचार के विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल के.राय ‘अंकित’ ने स्वागत वक्तव्य दिया। जनसंचार के असिस्टेंट प्रोफेसर धरवेश कठेरिया ने मंच का संचालन किया तथा असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अख्तर आलम ने आभार माना। इस दौरान प्रो. अनिल के.राय अंकित ने अंगवस्त्र, चरखा व सूतमाला प्रदान कर मंचस्थ अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम के दौरान विश्वविद्यालय के जनसंचार के विद्यार्थियों ने मिशनरी पत्रकारिता के संदर्भ में गंभीर सवाल कर चर्चा को जीवंत बनाया। इस अवसर पर कुलपति विभूति नारयण राय, प्रतिकुलपति प्रो. ए. अरविंदाक्षन, प्रो. प्रदीप माथुर, प्रो. इलीना सेन, पत्रकार राजकिशोर, प्रो. सूरज पालीवाल, डॉ. कृपा शंकर चौबे, प्रो. राम मोहन पाठक, हिंदुस्तान के पत्रकार प्रदीप सौरव, जनमोर्चा के पूर्व संपादक शीतला प्रसाद सिंह, लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक गिरीश मिश्र, दैनिक भास्कर के समूह संपादक प्रकाश दूबे सहित चीन, थाईलैण्ड, मॉरीशस के हिंदी प्राध्यापक, पत्रकार, हिंदी विश्वविद्यालय के अध्यापक, कर्मी, शोधार्थी, विद्यार्थी, शिवाजी महाविद्यालय, अमरावती तथा चिंतामणि महाविद्यालय, वर्धा के पत्रकारिता के विद्यार्थी व वर्धा के गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।












Vivek Vishvas
January 13, 2011 at 11:27 am
वाजपेयी जी अगर कोई गूगल को पत्रकारिता का पर्याय मानता है तो यह सरासर बेवकुफी और उसकी स्तरहीन जानकारी का नतीजा है.
[url]www.yuvapost.blogspot.com[/url]
मदन कुमार तिवारी
January 10, 2011 at 4:43 pm
वाजपेयी मैं २००१ से नेट की दुनिया में हूं। मैं जब लोगों को कहता था कि ब्लांगिंग नई पत्रकारिता है तब लोगों को विश्वास नही होता था। क्षमा के साथ कहना चाहूंगा की आज ब्लांगिंग ने आप जैसे मीडिया के बडे गुंडों से छुटकारा दिला दिया है। ब्लांगिंग का श्रेय गुगल को हीं जाता है। यह लंदन के उस पार्क की तरह है जहां आप आराम से कुछ भी कह सकते हैं बिना यह सोचे की कोई सरकारी गुंडा किसी कानुन के नाम पर आप्को नवलेश पाठक की तरह जेल भेजने के लिये खडा है। वहा मोदी और नीतीश की तरह कोई तााशाह नही है। अब तुम अपना उपदेश बंद करो , दारु पी रहा हूं , जब पिता हूं तब तुम्हारे जैसों की ही खबर लेता हूं जिनकी आवाज अपनी बीबी की ओढनी में दब जाती है जब नवलेश पाठक को जेल भेजता है , हसनान जैसा कमीना एस पी।