चला गया चंबल का शेर

आलोक जी अब इस दुनिया में नहीं हैं सुनकर विश्वास नहीं होता, लेकिन यह सत्य है जिसे स्वीकार करना ही होगा। आलोक  जी से मेरी तीन मुलाकातें थीं, पहली बार उन्हें ग्वालियर चैंबर ऑफ कॉमर्स में मिला, यंग जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा उनका और श्री राजेन्द्र शर्मा (स्वदेश) का सम्मान समारोह था। आलोक जी की हाल ही में शादी हुई थी और वह सुप्रिया जी के साथ आए थे।

दूसरी मुलाकात जयपुर के खाशाकोठी गेस्ट हाउस में हुई थी। बात है वर्ष 1998 की, हम अपने एक मित्र जो ग्वालियर के ही हैं, के साथ उनसे मिलने गए थे। काफी देर बात होती रही, ऐसा लगा ही नहीं कि हम उनसे पहली या दूसरी बार मिल रहे हैं। दो घंटे तक बात करते रहे और ग्वालियर, भिण्ड, मुरैना के संस्मरणों में खोए रहे। तीसरी बार भी जयपुर में ही उनसे मिला था, बात है वर्ष 2000 की, मैं जिस संस्थान में काम करता था, उसी संस्थान के पत्रकारों को रिपोर्टिंग की बारीकियां व भाषा का ज्ञान सिखाने के लिए उन्हें बुलाया गया था।

एक सप्ताह के प्रोग्राम में उनसे रोजाना मुलाकात होती थी। ऐसा लगता था कि कोई अपना मिल गया। एक दिन सुप्रिया जी और उनकी बेटी जयपुर आने वाली थीं तो उन्होंने बाटी बनाने वाला यंत्र मंगाने का आदेश दिया, बोले पत्नी को भेंट करना   है। किसी भी अखबार में उनका लेख छपा होता था तो बिना पढे़ चैन नहीं पड़ता, कई लेख तो मैं दो-दो बार पढ़ता था और मित्रों को फोन पर बताया करता था कि आज आलोक जी ने लिखा है, पढ़ लेना। मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।

वीपीएस भदौरिया भोपाल में पत्रकार हैं.

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Comments on “चला गया चंबल का शेर

  • Dear Yashwant Jee,

    Main Late Alok Tomar jee ko personally nahi janta tha lekin apke portal ke jariye hi unhe janne laga tha,main pichle kuch dino se bhadas nahi dekh pa raha tha,aaj portal kholne par alok tomar jee ke maut ki khaber padhkar lagta hai ki kisi bahut hi karibi ko miss kar raha hoon,mere aankhon me aanshu aa gaye hai aur mujhe aisa lag raha hai ki desh ne ek prakhar aur dashing patrkar ko kho diya hai,bhagwan unki patni ko iss apar dukh sehne ki shakti de.Bhagwan bara jalim hai……..

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