चले गए जीडी गोयल

जीडीब्लिट्ज फेम, इंटरनेशनल मीडिया फाउन्डेशन के अध्यक्ष जीडी गोयल ने एक लम्बी बीमारी के बाद महाराष्ट्र के औरंगाबाद के एक अस्पताल में अंतिम साँसें ली. बीमारी की अवस्था में उनके औरंगाबाद में रहने वाले पुत्र उन्हें अपने साथ ले गए थे. पत्रकारिता का उनका अपना एक अंदाज़ था, जिसकी वजह से वो काफी चर्चित रहे. मध्यप्रदेश निवासी गोयल, दिल्लीवासी हो गए थे. लेकिन हिन्दुस्तान का शायद ही ऐसा कोई प्रान्त होगा जहां उनको जानने वाला कोई न हो? वो जहां जाते अपना एक नेटवर्क खड़ा कर लेते थे.

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद जब वो रायपुर आये तो वहीं कैम्प बना लिया और अजय शर्मा के साथ मिलकर द कोल टाइम्स निकालने लगे. इसी दौरान मेरा भी उनसे मिलना हुआ और इस कदर मिलना हुआ कि वो जब भी बिलासपुर संभाग के दौरे पर निकलते तो बिलासपुर से मुझे साथ में ले लेते. सुबह पूड़ी-सब्जी खा कर निकलने का मेरी पत्नी मीनू का आग्रह वो सहर्ष स्वीकारते और फिर दौरों का अनथक सिलसिला शुरू हो जाता. 60 के ऊपर होने के बाद भी अपनी फिएट में वो दिल्ली से अकेले ही छत्तीसगढ़ आ जाते थे.

पुंगी बजाना उनका तकियाकलाम था. कोल टाइम्स के दौरान उनके साथ काम करने का एक अलग ही अनुभव रहा, एक बार उनके सामने एक बड़ी कंपनी के अधिकारियों से मेरी जम कर कहासुनी हो गयी तो उन्होंने सबके सामने मुझे फटकार लगाई, कहा मुंह से क्यों हल्ला मचा रहे हो, तुम्हारे पास कलम है उससे हल्ला मचाओ, मुझे लिख कर दो और देखो मैं इनकी कैसे पुंगी बजाता हूँ? उन्होंने पुंगी बजाई भी. पुंगी बजाने का ये शगल अनेक अर्थों में हमेशा उनके साथ रहा.

रायपुर में अजय शर्मा जी की संगत का असर उन पर कुछ ऐसा पड़ा कि उनका झुकाव इलेक्ट्रानिक मीडिया की ओर हो गया. छत्तीसगढ़ के बाद वो उत्तराखंड में भी रहे वहाँ से उनके बुलावे हमेशा आते रहे.  दिल्ली में उन्होंने इंटरनेशनल मीडिया फाउन्डेशन की स्थापना की और किसी न किसी कार्यक्रम के बहाने दिल्ली के इंटरनेशनल सेंटर में वो देश भर के पत्रकारों को हर साल बुलाते रहते. कुछ समय पहले तक वो जैन टीवी में रविवार दोपहर 12 बजे का सेगमेंट लेकर अर्थशास्त्रियों के साथ चिंतन करते नज़र आते थे.

पिछले दिनों जब अजय भैया ने उनके निधन का समाचार दिया तो उनके साथ बिताये कई लम्हे एक साथ याद आ गए. अफ़सोस इस बात का कि अपने पिछले दिल्ली प्रवास में मैं उनसे नहीं मिल पाया. भगवान् उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे.

लेखक कमल दुबे पत्रकार हैं तथा जीडी गोयल जी के सहयोगी रह चुके हैं.

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