चुनाव हुए नहीं थे और भास्कर ने रलावता को बना दिया छात्र संघ अध्यक्ष

पत्रकारिता के नैतिक कर्त्तव्य कहें या आचरणों में से एक है गलत खबर छप जाने पर उसका खंडन छापकर खेद जताना। गलती मानने को कई अपने आत्म सम्मान से जोड़ बैठते हैं और इसी के चलते खंडन छापना भी अपने सम्मान को ठेस पहुंचना मान लेते हैं, भले ही इससे अखबार की प्रतिष्ठा पर दांव पर लग जाए। दैनिक भास्कर, अजमेर भी शायद इसी भावना का शिकार हो चला है।

छात्र संघ चुनावों के चलते भास्कर ने एक कॉलम शुरू किया है, ‘यादों में छात्रसंघ, पहले छात्रसंघ से अब तक’  इसमें अजमेर के कॉलेजों के छात्रसंघों के पूर्व अध्यक्षों के चुनावी संस्मरण, कोई यादगार घटना और उस समय का कोई ऐतिहासिक फोटो छापा जा रहा है। जीसीए के नाम अपनी पहचान बना चुका अजमेर का राजकीय महाविद्यालय एक ऐतिहासिक संस्था है। गरिमामय, उच्च शैक्षणिक माहौल और कई कीर्तिमानों का ही असर था कि सन 1973 में दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित देश भर के विश्वविद्यालयों के छात्र संघ अध्यक्षों के सम्मेलन में विश्वविद्यालय ना होते हुए भी जीसीए छात्रसंघ को आमंत्रित किया गया था। 1972 में लोकसभा के नेता प्रतिप़क्ष अटल बिहारी वाजपेयी इसके शानदार सभागार में अपना ऐसा ऐतिहासिक संबोधन दे चुके हैं, जिस में राजनीति की कोई चर्चा नहीं थी। जीसीए की चर्चा के बिना भास्कर का स्तंभ ‘यादों में छात्रसंघ’  नामुमकिन होना ही था।

8 अगस्त 2011 को ‘यादों में छात्रसंघ’  में छपा ‘एनएसयूआई ने जीसीए में रलावता के जरिए पहली बार किया कब्जा’,  साथ में एक फोटो भी छपा जिसका कैप्सन था, ‘ तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर, वन मंत्री गोविंद सिंह गुर्जर, छात्रसंघ अध्यक्ष महेंद्र सिंह रलावता।’  खबर में बताया गया कि सन 1981-82 के चुनाव में रलावता को पान की दुकान पर खड़े कांग्रेस नेता केसरीचंद चौधरी ने बुलाया और एनएसयूआई का टिकट दे दिया। रलावता को 185 में से 158 मत मिले और इस ऐतिहासिक जीत के बाद उन्हें मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर, शिक्षामंत्री हनुप्रसाद प्रभाकर, वन मंत्री गोविंद सिंह गुर्जर, केसरीचंद चौधरी ने शपथ दिलाई।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि रलावता पिछले दिनों ही अजमेर शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष नियुक्त किए गए हैं और यह खबर राजनीतिक हलकों में खासी चर्चित है। वास्तविकता यह है कि रलावता कभी जीसीए छात्रसंघ के अध्यक्ष ही नहीं रहे। जिस सन 1981-82 में वे चुनाव होने का दावा कर रहे हैं, उस साल जीसीए में चुनाव ही नहीं हुए। उन्हीं दिनों जीसीए परिसर में एक छात्र प्रदीप चौधरी की हत्या हो गई थी। इसके बाद वहां छात्र संघ चुनावों पर रोक लग गई और जीसीए का पुरूष छात्रावास भी उसी साल से बंद कर दिया गया। सन 1980-81 में सुनील लोढ़ा अध्यक्ष बने और उसके दस साल बाद 1990-91 में चुनाव हुए जिसमें ज्योति तंवर एक नए संगठन के बैनर तले चुनाव जीती।

अपन ने 8 अगस्त को ही फोन कर यह गलत खबर छप जाने की जानकारी भास्कर को दी। यह भी बताया कि उस समय एनएसयूआई के जिलाध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह चौधरी थे,  जिन्हों ने किसी को टिकट ही नहीं दिया क्योंकि चुनाव ही नहीं हुए थे। तर्क-वितर्क के जरिए भास्कर को बताया कि उस बदनसीब का नाम क्या था, जिसे रलावता ने हराया और उसे मात्र 27 मत ही मिल पाए। रलावता ने अपना महासचिव किसे मनोनीत किया। शपथ ग्रहण समारोह किस दिनांक को हुआ और उस समय जीसीए के प्राचार्य, डीन ऑफ स्टूडेंट कौन थे। जीसीए छात्र संघ के दो अंग होते हैं। अगर रलावता कलचरल फोरम जिसे छात्र संघ कहा जाता है के अध्यक्ष बने थे तो उस साल लिटरेरी फोरम और प्लानिंग फोरम का अध्यक्ष किस-किस को मनोनीत किया गया। रलावता का उस समय कॉलेज रिकॉर्ड में नाम महेंद्र सिंह रलावता था या महेंद्र सिंह राठौड़। जीसीए में उपलब्ध रिकॉर्ड क्या कहता है, आदि-आदि परंतु भास्कर ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि जानकारी रलावता ने खुद दी थी और अविश्वास का कोई कारण नहीं था।

किसी के कह देने भर से ही खबर छाप देना, खबर के तथ्यों की जानकारी और पुष्टि नहीं करना और खबर गलत होने की जानकारी मिल जाए फिर भी वास्तविकता को छिपाने की यह कैसी पत्रकारिता भास्कर कर रहा है? अपनी राय में यह एक गंभीर चिंतन का विषय है। आज की यह उपेक्षा कल आदत बन जाएगी और आदत से पिंड छुड़ाना हरेक के लिए मुमकिन नहीं होता।

राजेंद्र हाड़ा राजस्थान के अजमेर के निवासी हैं. करीब दो दशक तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे. अब पूर्णकालिक वकील हैं. यदा-कदा लेखन भी करते हैं. लॉ और जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स को पढ़ा भी रहे हैं. उनसे संपर्क 09549155160 के जरिए किया जा सकता है.

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