जागरण को देर से क्यों आई अपने पुराने कर्मियों की याद!

: बिखरते अरमानों पर बुलंद इमारत : दैनिक जागरण, मेरठ का 25 साला कार्यक्रम अच्छा लगा (हालांकि यह कार्यक्रम एक साल पहले मनाया जाना चाहिए था, क्योंकि 25वें साल को जागरण मेरठ पिछले साल ही मना चुका है)। अच्छा इसलिये नहीं कि जागरण के उन कर्मचारियों को सम्मानित करने का मालिकान को ध्यान आया, जिन्होंने ईंट और पत्थर चुनकर इस इमारत को बुलंद किया, बल्कि इसलिये कि मेरठ जागरण के प्रबंधतंत्र को अपनी गलती का अहसास होने लगा है।

यह वही जागरण है जिसने दो साल पहले मंदी का बहाना बनाकर अपने अधिकांश पुराने स्टाफ को बाहर का दरवाजा दिखा दिया और बाकी बचे स्टाफ का या तो बिल्कुल ही वेतन नहीं बढ़ाया या मामूली वृद्धि की। इतना ही नहीं रिपोर्टरों को पेट्रोल और मोबाइल के मद में मिलने वाले पैसों में भी कटौती कर दी गयी। लगभग दो दर्जन कर्मचारियों की छंटनी के बाद मालिकान जहां आराम से अपने वातानुकूलित कमरे में चैन की नींद सो रहे थे, वहीं हटाये गये कर्मचारियों के बीवी-बच्चे जागरण के दफ्तर में रो-बिलखकर नौकरी सलामत रखने की भीख मांग रहे थे। हटाये गये कुछ कर्मचारी तो ऐसे भी रहे कि वे अपने घर जाने की हिम्मत तक नहीं जुटा सके। रात भर वह जागरण दफ्तर के बाहर इस आस में पड़े रहे कि शायद मालिकों को दया आ जाये और वे अंदर बुला लें। पर यह करिश्मा नहीं हुआ। हटाये गये कर्मचारियों को साफ कह दिया गया कि अब कुछ नहीं हो सकता।

मंदी की मार आखिर किसी को तो झेलने ही पडे़गी। सबसे हैरत करने वाली बात यह थी कि जिस मंदी के बहाने कर्मचारियों को नौकरी से निकाला गया, उसी मंदी के समय में जागरण के निदेशकों ने अपने लिये बीएमडब्लू सरीखी विदेशी कार की खरीददारी की। खैर शर्मिंदगी की सीमा पार करने के बाद जागरण ने यदि अपने उन कर्मचारियों को याद किया और सम्मानित किया, जिन्होंने 25 साल की नौकरी पूरी कर ली है तो इसके लिये जागरण प्रबंधन बधाई का हकदार तो बनता ही है। भले ही यह किसी दूसरे संस्थान की नकल हो या अपनी डूबती नैया को बचाने की आखिरी कोशिश। हालांकि यह भी बता दें कि सम्मानित होने वाले कुछ कर्मचारी तो ऐसे हैं, जिनकी स्थायी नौकरी छीन ली गयी है और उन्हें चार या पांच हजार रुपये मासिक देकर ठेके पर रखा गया है। किसी मजबूरी के चलते वे खून का घूंट पीकर काम कर रहे हैं। इनमें से कुछ कर्मचारी तो ऐसे हैं जिन्होंने कभी दैनिक जागरण के कार्यालय पर ध्वजारोहण जैसे कार्यक्रमों में झंडा फहराने का सम्मान भी पाया था।

मेरठ से भेजे गए दैनिक जागरण के पूर्व कर्मचारी की पोस्‍ट पर आधारित.

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Comments on “जागरण को देर से क्यों आई अपने पुराने कर्मियों की याद!

  • ek journalist says:

    Ye jagran ka poorane logo ke liye prem nahi hai. Balki ye bhi ek dhakhonsla hai. Kyonki kuch naye news paper ne jagran ko kafi jhatke diye hai aur jagran is bahane logo ko rokne ki kavayat kar raha hai. Kyon rajat jayanti toh ek saal pehle mani thi. Toh phir ek sal baad aisa jhoota samman kyon.

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  • jagran ke malikan drama kar rahe hain. Yeh sab Janwani akhbar ka pratap hai jo yeh malikan itne bhale ban rahe hain. Waise bhi jagran meerut mien toh peon ko bhi sampadak bana diya ja sakta hai.

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  • जिस किसी भी भाई ने यह मेल लिखा है उसका धन्यवाद. दैनिक जागरण मेरठ में पुराने कारिंदों की बड़ी दुर्गति होती आई है. कभी संपादक का काम देखने वाले राजवीर सिंह का बट्टे खाते में डाल दिया गया था आज फिर वोही राजवीर सिंह सबको धमकाते फिर रहे हैं. यहाँ के संपादक बनाकर लाये गए विजय त्रिपाठी को आज लोग नमस्ते भी नहीं कर रहे. दरअसल इन लोगों को सस्ते लोग चाहिएं जो २४ घंटे इनकी मुफ्त सेवा करते रहे.

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  • ramesh kumar singh says:

    Diainik Jagran ke malikan aur prabandhan apne staf ko Dalit se jayada kuchh nahi samajhata hai. iss group me Emandar sttaf ke ki koe wakat nahi hai.malikan sttaf se bat karne mei apne tauhin samjhte hai.

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  • yah koi naee bat nahi, patrkar ek shosit pranee hai, shosan ke khilaf logo ka awaz buland karne wala patrkar sabse jayada shosan ka shikar hai. bawjud eske koi aandolan nahi hota

    dharmendra

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  • skdwivedi says:

    yashwant ji devesh ji aur tarun unit kor achhi chala rake ha company groth kar rahi kuchh karmachari ki khuchh vishesh se dikkat ho sakti ha lakin kul milakar director ase nahi ha jasa bataya gaya ha.
    satish dwivedi
    kanpur

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  • Rajeev Sharma says:

    yahan kabhi kaam karne valo ko increment mangne per resign dene ki baat kahi jaati thi & chaplooso ko increment bageer mange milta raha

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