जैक ऑफ ऑल ट्रेड्स, मास्टर ऑफ सम

नौनिहाल: भाग-34 : दैनिक जागरण में कई लोग बाहर से आते थे। नरनारायण गोयल बागपत से। संतोष वर्मा मवाना से। श्रवण मुफ्फरनगर से। अनिल त्यागी और रामनिवास भारद्वाज कैली से। ओमवार चौधरी दबथुवा से। इन सबका सफर बहुत लंबा तो नहीं था, पर बाहर से आना आखिर बाहर से ही आना होता है। कई बार किसी को कुछ देर हो जाती, तो बाकी लोग इच्‍छातुर होने लगते।

इसकी वजह थी संपादकीय विभाग में कम लोगों का होना। हर डेस्क पर गिनती के ही लोग थे। किसी का वीकली ऑफ होता, या कोई छुट्टी पर होता, तो किसी और को उसका काम करना पड़ता। इनमें भी न्यूज डेस्क, प्रादेशिक डेस्क और लोकल डेस्क फिर भी जरा सहज रहती थीं। लेकिन खेल और बिजनेस पर काफी संकट रहता। खेल पर मैंने चार साल अकेले काम किया। मेरे ऑफ के दिन या बीए और एमए की परीक्षा के लिए छुट्टी लेने पर अशोक त्रिपाठी, ओपी सक्सेना, शाहिद ए चौधरी, संजय श्रीवास्तव या विवेक शुक्ल खेल पर काम करते।

कई बार तो एकदम किसी नये बंदे ने पलाश दा की देखरेख में खेल का पेज निकाला। पलाश दा और नन्नू भाई को खेल में काफी रुचि थी। कोई बड़ी खबर एजेंसी पर आती, तो वे दूर से ही चिल्लाकर बताते। रमेश गोयल कहते कि हॉकी और कुश्ती के अलावा खेल पर कुछ भी नहीं छपना चाहिए, क्योंकि यही हमारे असली खेल हैं। बिजनेस पेज अशोक त्रिपाठी और कपिल देखते। अक्सर किसी भी नये बंदे को इस पेज पर बैठा दिया जाता। इसलिए यही एकमात्र पेज था, जिसमें जागरण से अमर उजाला बाजी मार ले जाता। बरसों बाद जागरण इस पेज को उस स्तर तक ले जा सका।

खैर! बाहर से आने वालों के समय सब घड़ी देखते रहते। किसी के लेट हो जाने पर सबको आशंका होने लगती कि पता नहीं उसे ही उसके काम पर न लगा दिया जाये। और अगर कोई नहीं आता, तो फिर उसका काम तो किसी को संभालना ही पड़ता। चूंकि खेल और बिजनेस के लिए ज्यादा लोग नहीं थे, इसलिए इन्हीं दो डेस्कों पर ज्यादा समस्या रहती। एक बार नौनिहाल ने मंगलजी को इसका समाधान बताया।

‘अगर आप सबको एक-एक डेस्क पर बांधकर रखोगे, तो यह समस्या रहने ही वाली है। रोटेशन करो। इससे सबको हर डेस्क पर काम करने का मौका मिलेगा और विभाग में ऑलराउंडर बन जायेंगे।’

‘मने बात तो आपकी ठीक है, पर हमारे पास इतने लोग हैं कहां?’

‘जितने भी हैं, उन्हीं को अलग-अलग डेस्कों पर घुमाया जाये। इससे सबको हर डेस्क का अनुभव मिलेगा।’

‘मने आपका विचार एकदम ठीक है। पर इससे काम पर असर पड़ेगा ना। इसलिए अभी इसे स्थगित रखते हैं। कभी कुछ और नियुक्तियां हुईं, तो देखेंगे।’

और बात खत्म हो गयी। फिर शाम को गोल मार्केट में चाय पीते हुए नौनिहाल को छेड़ा गया।

‘क्या बात है? आज तो गुरू तुम्हारी कुछ चली नहीं मंगलजी के सामने।’

‘बात चलने या ना चलने की नहीं है। बात ये है कि अब पूरी जिंदगी एक डेस्क या बीट पर ही काम करते रहने का जमाना गया। अब तो हर चीज और पत्रकारिता की हर विधा का अनुभवी पत्रकार ही चलेगा।’

‘लेकिन एक डेस्क या एक बीट पर काम करके जो विशेषज्ञता मिलती है, उसका स्थानापन्न कुछ नहीं हो सकता।’

‘विशेषज्ञता तो होनी ही चाहिए। पर एक की नहीं कई चीजों की।’

‘यह सैद्धांतिक बात लगती है। किसी डेस्क या बीट की विशेषज्ञता हासिल करने में सालों लग जाते हैं। इतनी मेहनत के बाद कोई नये सिरे से किसी नयी चीज की विशेषज्ञता भला क्यों हासिल करना चाहेगा?’

‘क्योंकि भविष्य इसी का है। एक साथ कई चीजों में महारत होनी चाहिए।’

‘पर क्या ये बात व्यावहारिक है?’

‘है क्यों नहीं? जागरण में ही हमारे यहां क्या ऐसे पत्रकार नहीं हैं क्या, जो जब जहां जरूरत पड़े काम कर लेते है? लोकल पर, प्रादेशिक पर, खेल पर, मेन डेस्क पर? बस बिजनेस जरा शुष्क है, इसलिए वहां कोई नहीं जाना चाहता।’

‘पर ये जरा मुश्किल काम है।’

‘मुश्किल कुछ नहीं होता।’

‘कैसे नहीं होता?’

‘ये बात जरा गंभीर हो रही है। यहां सुलझने वाली नहीं है। इसे समझने के लिए तो तुझे भगत की चाय की दुकान पर चलना पड़ेगा। उसकी मलाई वाली चाय सुड़कते हुए ही ये बात तेरी समझ में आयेगी।’

यह नौनिहाल का भगत की चाय पीने का बहाना होता था। वहां चाय पीते हुए हम अखबार और पत्रकारिता के गंभीर मुद्दों और अन्य मुद्दों पर भी चर्चा कर लेते थे। साकेत के गोल मार्केट में जागरण के अन्य साथियों के साथ चाय की महफिल में होने वाली चर्चा अक्सर दफ्तर की उठापटक और राजनीति में उलझकर रह जाती थी। इससे नौनिहाल को बहुत कोफ्त होती थी। वे जिंदगी के हर पल को सार्थकता से बीतते देखना चाहते थे।

तो उस बातचीत के करीब एक हफ्ते बाद हम नाले के किनारे भगत की दुकान पर बैठे थे। नौनिहाल एनएएस कॉलेज की ओर कई मिनट तक देखते रहे। इसी कॉलेज में उनके बहनोई काम करते थे। इसी कॉलेज से नौनिहाल एमए कर रहे थे, जो वे पूरा नहीं कर सके। और इसी कॉलेज में अब मैं पढ़ रहा था। इसलिए भगत की चाय हमें अपनी ओर खींचती थी। उस चाय की चुस्कियां लेते हुए हम कॉलेज की ओर देखते हुए गुफ्तगू करते थे। नौनिहाल ने बात का सिलसिला शुरू किया।

‘उस दिन जो बात हो रही ऑलराउंडर बनने की, उस पर चर्चा हो जाये।’

‘हां गुरू। मेरा यही कहना था कि हमारे पास जितना स्टाफ है, उसमें ये योजना चल नहीं सकती।’

‘लेकिन हर पत्रकार को अपने विकास के लिए सभी काम जानने चाहिएं।’

‘पर ये हो कैसे?’

‘मैं अपनी बात एक उदाहरण से बताता हूं। एक कहावत सुनी होगी। जैक ऑफ ऑल ट्रेड्स, मास्टर ऑफ नन। अब इसे बदलकर ये करना चाहिए- जैक ऑफ ऑल ट्रेड्स, मास्टर ऑफ वन। और कुछ साल बाद ये हो जायेगा- जैक ऑफ ऑल ट्रेड्स, मास्टर ऑफ सम।’

‘लेकिन गुरू, कहावत में संपादन करने का मकसद?’

‘यही वक्त की जरूरत है। पहले एक बीट या डेस्क पर पूरी जिंदगी काम कर सकते थे। अब कुछ बीट या डेस्क पर काम करना आना चाहिए। मगर कुछ साल बाद हालत ये होगी कि हर बीट या डेस्क पर काम कर सकने वाले ही अखबारों में रखे जायेंगे। इतना ही नहीं, उन्हें खबरों की प्रस्तुति भी नये तरीके से करनी होगी।’

‘ऐसा क्यों?’

‘दरअसल संचार बहुत बदलेगा। दुनिया नजदीक आयेगी। आर्थिक प्रगति होगी। नयी चीजें सामने आयेंगी। उन्हें जनता के सामने अखबार ही लायेंगे। इसलिए पत्रकारों को ज्यादा ज्ञानवान, सचेत और सजग होना पड़ेगा। जो ऐसे नहीं होंगे, वे चल नहीं पायेंगे।’

‘लेकिन हर समय में हर तरह के लोग चलते हैं। चलते भी रहेंगे। पर सफलता हर तरह का काम करने वालों को ही मिलेगी। उन्हीं पर काम का बोझ रहेगा। और काम का बोझ ही आगे बढऩे का माद्दा मिलता है। इसलिए नये पत्रकारों को तो ज्यादा काम करने से कभी पीछे हटना ही नहीं चाहिए। वे अपने करियर की शुरूआत में जितनी मेहनत कर लेगा, वह आगे जाकर उतना ही सुखी रहेगा। उतना ही नाम कमायेगा।’

‘और प्रमोशन?’

‘प्रमोशन जरूरी नहीं कि प्रतिभा होने पर ही हो। उसमें कई चीजें, कई समीकरण मायने रखते हैं। लेकिन नाम जरूर होगा। प्रतिभाशाली की शोहरत को कोई रोक नहीं सकता।’

रात काफी हो गयी थी। हमने चर्चा को वहीं रोका और साइकिल पर सवार होकर अपने-अपने घर की ओर बढ़ गये…भुवेन्‍द्र

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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