ज्ञानरंजन ने किया समीर लाल के उपन्‍यास का विमोचन

इंटरनेट तथा ब्‍लॉग जगत के चर्चित नाम समीर लाल समीर की लघु उपन्‍यासिका ’देख लूँ तो चलूँ’ का विमोचन जबलुपर में देश के शीर्ष कहानीकार ज्ञानरंजन ने किया. इस अवसर पर वरिष्‍ठ साहित्‍यकार हरिशंकर दुबे भी उपस्थित थे. ब्‍लॉग जगत में उड़नतश्‍तरी के नाम से अपना बहुचर्चित ब्‍लाग चलाने वाले समीर लाल की ये पुस्‍तक शिवना प्रकाशन से प्रका‍शित होकर आई है. यात्रा वृतांत की शैली में लिखी गई इस उपन्‍यासिका में कई रोचक संस्‍मरण समीर ने जोड़े हैं.

जबलपुर के सत्‍य अशोका होटल के सभागार में आयोजित विमोचन समारोह में मुख्‍य अतिथि के रूप में पहल के संपादक तथा देश के शीर्ष कथाकार ज्ञानरंजन उपस्थित थे, जबकि कार्यक्रम की अध्‍यक्षता वरिष्‍ठ स‍ाहित्‍यकार हरिशंकर दुबे ने की. पुस्‍तक विमोचन के पश्‍चात बोलते हुए ज्ञानरंजन ने कहा कि छोटे उपन्यासों की एक जबरदस्त दुनिया है. द ओल्ड मैन एण्ड द सी, कैचर ऑन द राईड, सेटिंग सन, नो लांगर ह्यूमन, त्यागपत्र, निर्मला, सूरज का सातवां घोड़ा आदि. हिन्दी में गोदान, कब तक पुकारुँ, शेखर एक जीवनी, बूँद और समुद्र, मुझे चाँद चाहिये के बाद पिछले एक दशक में 50 से अधिक असफल बड़े उपन्यास लिखे गये. और अब छोटे उपन्यासों की रचने की पृष्टभूमि बन गई है.

उन्‍होंने कहा कि छोटा हो या बड़ा, सच यह है कि वर्तमान दुनिया में उपन्यासों का वैभव लगातार बढ़ रहा है. यह एक अनिवार्य और जबरदस्त विधा बन गई है. पहले इसे महाकाव्य कहा जाता था. अब उपन्यास जातीय जीवन का एक गंभीर आख्यान बन चुका है. समीर लाल ने इसी उपन्यास का प्रथम स्पर्श किया है, उनकी यात्रा को देखना दिलचस्प होगा. ब्लॉग और पुस्तक के बीच कोई टकराहट नहीं है. दोनों भिन्न मार्ग हैं, दोनों एक दूसरे को निगल नहीं सकते. मुझे लगता है कि ब्लॉग एक नया अखबार है, जो अखबारों की पतनशील चुप्पी, उसकी विचारहीनता, उसकी स्थानीयता, सनसनी और बाजारु तालमेल के खिलाफ हमारी क्षतिपूर्ति करता है, या कर सकता है. ब्लॉग इसके अलावा तेज है, तत्पर है, नूतन है, सूचनापरक है, निजी तरफदारियों का परिचय देता है पर वह भी कंज्यूम होता है. उसमें लिपि का अंत है, उसको स्पर्श नहीं किया जा सकता.

उन्‍होंने कहा कि किताबों में एक भार है- मेरा च्वायस एक किताब है, इसलिए मैंने देख लूँ तो चलूँ को उम्मीदों से उठा लिया है. किताब में अमूर्तता नहीं है, उसका कागज बोलता है, फड़फड़ाता है, उसमें चित्रकार का आमुख है, उसमें मशीन है, स्याही है, लेखक का ऐसा श्रम है जो यांत्रिक नहीं है. पुस्‍तक की चर्चा करते हुए ज्ञानरंजन ने कहा कि  देख लूँ तो चलूँ में नायक ऊबा हुआ है. हमारे आधुनिक कवि रघुबीर सहाय ने इसे मुहावरा दिया है, ऊबे हुए सुखी का. इस चलते चलते पन में आगे के भेद, जो बड़े सारे भेद हैं, खोजने का प्रयास होना है. धरती का आधा चन्द्रमा तो सुन्दर है, उसकी तरफ प्रवासी नहीं जाता. देख लूँ तो चलूँ का मतलब ही है चलते-चलते. इस ट्रेवलॉग रुपी उपन्यासिका में हमें आधुनिक संसार की कदम कदम पर झलक मिलती है.

उन्‍होंने कहा कि समीर लाल ने अपनी यात्रा में एक जगह लिखा है- हमसफरों का रिश्ता! भारत में भी अब रिश्ता हमसफरों के रिश्ते में बदल रहा है. फर्क इतना ही है कि कोई आगे है कोई पीछे. मेरा अनुमान है कि प्रवासी भारतीय विदेश में जिन चीजों को बचाते हैं वो दकियानूस और सतही हैं. वो जो सीखते है वो मात्र मेनरिज़्म है, बलात सीखी हुई दैनिक चीजें. वो संस्कृति प्यार का स्थायी तत्व नहीं है. निर्मल वर्मा जो स्वयं कभी काफी समय यूरोप में रहे कहते हैं कि प्रवासी कई बार लम्बा जीवन टूरिस्ट की तरह बिताते हैं. वे दो देशों, अपने और प्रवासित की मुख्यधारा के बीच जबरदस्त द्वंद्व में तो रहते हैं पर निर्णायक भूमिका अदा नहीं कर पाते. इसलिए अपनी अधेड़ा अवस्था तक आते आते अपने देश प्रेम, परिवार प्रेम और व्यस्क बच्चों के बीच उखड़े हुए लगते हैं. स्वयं उपन्यास में समीर लाल ने लिखा है कि बहुत जिगरा लगता है जड़ों से जुड़ने में. समीर लाल सत्य के साथ हैं, उन्होंने प्रवास में रहते हुए भी इस सत्य की खोज की है.

ज्ञानरंजन ने समीर लाल के बारे में कहा कि समीर लाल का स्वागत होना चाहिए. उन्होंने मुख्य बिंदु पकड़ लिया है. उनके नैरेशन में एक बेचैनी है जो कला की जरुरी शर्त है. समीर लाल का उपन्यास पठनीय है, उसमें गंभीर बिंदु हैं और वास्तविक बिंदु हैं. मैं उन्हें अच्छा शैलीकार मानता हूँ. यह शैली भविष्य में बड़ी रचना को जन्म देगी. उन्हें मेरी हार्दिक बधाई एवं शुभकामना. समीर लाल को दोबारा मैं कोट करना चाहूँगा कि ’बड़ा जिगरा चाहिए जड़ से जुड़े रहने में’.

अपने  अध्यक्षीय उदबोधन में शिक्षाविद मनीषी एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य डॉ. हरि शंकर दुबे ने कहा कि ये पुस्तक इस बात का प्रमाण है कि कितनी सच्चाई के साथ और कितनी जीवंतता के साथ और कितनी आत्मीयता के साथ समीर लाल ने अपने समय को, अपने समाज को, अपनी जड़ों को, जिगरा के साथ देखने का साहस संजोया है. ये कृति कनाडा से भारत को देख रही है या भारत की दृष्टि से कनाडा को देख रही है, चाहे कुछ भी हो बहुत बेबाकी से और बहुत ईमानदारी के साथ जिसमें कल्पना भी है, जिसमें विचार भी है, और जैसा अभी संकेत किया माननीय ज्ञानरंजन जी ने कि ये केवल एक उपन्यासिका भर नहीं है, कभी कभी लेखक जो सोच कर लिखता है जैसा कि भाई गुलुश जी ने कहा था कि 5 घंटे साढ़े 5 घंटे में, लेकिन ये साढ़े 5 घंटे नहीं हैं साढ़े 5 घंटे में जो मंथन हुआ है, उसमें पूरा का पूरा उनके बाल्य काल से लेकर अब तक का और बल्कि कहें आगे वाले समय में भी, आने वाले समय को वर्तमान में अवस्थित होकर देखने की चेष्टा की है कि आने वाले समय में समाज का क्या रुप बन सकता है, उसकी ओर भी उन्होंने संकेत दिया है तो वो समय की सीमा का अतिक्रमण भी है, और उसी तरीके से विधागत संक्रमण भी है, जिसमें आप देखते हैं कि वह संस्मरणीय है, वह उपन्यास भी है, वह कहीं यात्रा वृतांत भी है और कहीं रिपोर्ताज जैसा भी है कि रिपोर्टिंग वो कर रहे हैं.

उन्‍होंने कहा कि एक-एक घटना की तो ये सारी चीजें बिल्कुल वो दिखाई देती हैं और आरंभ में ही जब वो कहते हैं कि (प्रमोद तिवारी जी की पंक्तियाँ)-  राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं / ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं / आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं. तो जब वो बात कहते हैं तो उनके पगों के द्वारा वो नाप लेते हैं जैसे कभी बामन ने तीन डग में नापा था ऐसा कभी लगता है कि एक डग इनका भारत में है, और एक चरण उनका कनाडा में है और तीसरा चरण जो विचार का चरण है उस तीसरे चरण में… इन तीन चरणों से वो नाप लेते हैं निश्चित रुप से जब वो बूढ़े बरगद की याद करते हैं जब वो मिट्टी के घरोंदों की याद करते हैं, जब वो जलते हुए चूल्हे की याद करते हैं और उन चूल्हों पर बनने वाले सौंधे महक से भरे हुए पराठों की याद करते हैं.

उन्‍होंने कहा कि क्यूँकि मूलतः वो कवि भी हैं तो जब परदेश पर वो लिखते हैं दो लाईन पढ़ना चाहता हूँ – परदेस, देखता हूँ तुम्हारी हालत, / पढ़ता हूँ कागज पर, / उड़ेली हुई तुम्हारी वेदना, / जड़ से दूर जाने की… तो जड़ से दूर हो जाने की जो वेदना है परदेश में जाकर बराबर वो देखते हैं मार्मिकता के साथ, इसके अंदर केवल व्यंग्य भर नहीं है जो अन्तर्वेदना है और जो त्रासदी की बात उन्होंने की थी वो त्रासदी कम से कम आगे जाकर के वो प्रकट होना चाहिये- त्रासदी की बात वो बहुत बड़ी बात है.

कवि-लेखक एवं ब्लॉगर डा. विजय तिवारी ’किसलय’ ने पुस्‍तक पर बोलते हुए कहा कि कार ड्राईव करते वक्त हाईवे पर घटित घटनाओं, कल्पनाओं एवं चिन्तन श्रृंखला ही ’देख लूँ तो चलूँ’ है. यह महज यात्रा वृतांत न होकर समीर जी के अन्दर की उथल पुथल, समाज के प्रति एक साहित्यकार के उत्तरदायित्व का भी सबूत है. अवमूल्यित समाज के प्रति चिन्ता भाव हैं.
युवा विचारक एवम सृजन धर्मी पंकज स्वामी ’गुलुश’ ने पुस्‍तक पर चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ब्लाग और किताबों में फ़र्क है. किताबें कहीं न कहीं पढ़ने में सहज एवं संदर्भ देने वाली होती हैं, जबकि ब्लॉग को पढ़ना सहज नहीं है. ये तथ्य अलग है कि ब्लॉग दूर देशों तक आसानी से पहुंच जाता है.

समीक्षक इंजीनियर ब्लॉगर विवेकरंजन श्रीवास्तव ने पुस्‍तक के बारे में कहा कि एक ऐसा संस्मरण जो कहीं कहीं ट्रेवेलाग है, कहीं डायरी के पृष्ठ, कहीं कविता और कहीं उसमें कहानी के तत्व है। कहीं वह एक शिक्षाप्रद लेख है, दरअसल समीर लाल की नई कृति ‘‘देख लूं तो चलूं‘‘ उपन्यासिका टाइप का संस्मरण है।

लेखक समीर लाल के पिता पीके लाल ने अपने संक्षिप्‍त उदबोधन में कहा कि हां पूत के पांव पालने में नज़र आ गये थे, जब बालपन में समीर ने इंजीनियर्स पर एक तंज लिखा था. लेखक समीर लाल ने अपनी बात रखते हुए कहा कि किसी रचनाकार के लिये उसकी कृति का विमोचन रोमांचित कर देने वाला अवसर होता है, जब ज्ञानरंजन जी, डा. हरिशंकर दुबे सहित विद्वजन उपस्थित हों, तब वे क्या कहें और कैसे कहें और कितना कहें? कार्यक्रम के अंत में श्रीमती साधना लाल ने आभार प्रदर्शन कर सभी के प्रति कृतज्ञता अंत:करण से व्यक्त की. कार्यक्रम का संचालन गिरीश बिल्‍लोरे मुकुल ने किया।

बिलासपुर से गिरीश बिल्‍लोरे मुकुल की रिपोर्ट.

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