प्रेमचंद की जयंती पर मरुभूमि में बही कथा-सरिता

प्रसिद्ध उपन्यासकार प्रेमचंद की जयंती के मौके पर देश भर में तरह-तरह के आयोजन किए गए। कहीं भाषणों का सिलसिला परवान चढ़ा, कहीं शोध-समीक्षा पत्रों और ताज़ा मुद्दों पर बहस हुई। इसी क्रम में राजस्थान की राजधानी जयपुर के झालाना सांस्थानिक क्षेत्र स्थित राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी सभागार में प्रगतिशील लेखक संघ की तरफ से एक विशिष्ट आयोजन किया गया। आयोजन को अनूठा इस मायने में कहा जा सकता है कि कथा सरिता शीर्षक से आयोजित इस कार्यक्रम में पांच कथाकारों ने अपनी कहानियों का पाठ किया।

केदारनाथ की कविताओं में प्रेम और जनमुक्ति का संघर्ष

: केदार जन्‍मशती पर कार्यक्रम आयोजित : नागार्जुन, केदार, त्रिलोचन, शमशेर और मुक्तिबोध हिन्दी में प्रगतिशील काव्य-सृष्टि के ‘पांच रत्न’  हैं। प्रगतिशील साहित्य का आन्दोलन भक्ति आन्दोलन के समान महाप्रतापी मान्य हुआ तो उसमें इन पाँच रत्नों की ऐतिहासिक भूमिका है। ये वस्तुतः इतिहास निर्माता कवि हैं। इनकी चौथे दशक की कविताएँ ही प्रगतिवाद की आधार-सामग्री थीं। इनमें केदारनाथ अग्रवाल, रामविलास शर्मा के सखा और कदाचित समकालीनों में सर्वाधिक प्रिय कवि थे।

ज्ञानरंजन ने किया समीर लाल के उपन्‍यास का विमोचन

इंटरनेट तथा ब्‍लॉग जगत के चर्चित नाम समीर लाल समीर की लघु उपन्‍यासिका ’देख लूँ तो चलूँ’ का विमोचन जबलुपर में देश के शीर्ष कहानीकार ज्ञानरंजन ने किया. इस अवसर पर वरिष्‍ठ साहित्‍यकार हरिशंकर दुबे भी उपस्थित थे. ब्‍लॉग जगत में उड़नतश्‍तरी के नाम से अपना बहुचर्चित ब्‍लाग चलाने वाले समीर लाल की ये पुस्‍तक शिवना प्रकाशन से प्रका‍शित होकर आई है. यात्रा वृतांत की शैली में लिखी गई इस उपन्‍यासिका में कई रोचक संस्‍मरण समीर ने जोड़े हैं.

नन्द चतुर्वेदी के गीत संग्रह का विमोचन

प्रसिद्ध सहित्यकार नंद चतुर्वेदी के नए गीत संग्रह “गा हमारी जिंदगी कुछ गा” का लोकार्पण उदयपुर के प्रबुद्धजनों की उपस्थिति में हुआ। इस लोकार्पण कार्यक्रम में प्रसिद्ध समीक्षक डॉ. नवल किशोर ने कहा कि आज जब समाजवाद का सपना देखना भी मुश्किल हो रहा हो, उसे देखते रहने के लिए नंद चतुर्वेदी को सलाम।

हिंदी को मांजो.. रगड़ो.. बदलो.. और चला दो

: ‘हिंदी बदलेगी तो चलेगी’ विषय पर परिचर्चा : 12 मार्च की शाम, इंडिया हैबिटेट सेंटर के एम्पीथियेटर में हिन्दी को बदलने और बदल कर चलाने की फिक्र में हिन्दी जगत के सुधी पाठक, लेखक और शुभचिंतकों की जमात जमा हुई। कार्यक्रम की शुरुआत वैशाली माथुर की चंद लाइनों से हुई। वैशाली ने हिन्दी के ‘महानुभावों’ का स्वागत करते हुए कार्यक्रम का संचालन पेंगुइन हिन्दी के संपादक सत्यानंद निरुपम को सौंप कर अपना ‘पिंड’ छुड़ाया।

जनकवि हूं मैं क्‍यों हकलाउं

चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा… चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा. जी हां, सपने में नहीं, अपितु यथार्थ में नागार्जुन के जन्‍मशती पर विमर्श के लिए महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा द्वारा पटना (ए.एन.सिन्‍हा समाज अध्‍ययन संस्‍थान) में ‘नागार्जुन एकाग्र’ पर आयोजित समारोह के दौरान साहित्‍यकारों ने उनको याद किया गया। नागार्जुन के साहित्‍य पर विमर्श का लब्‍बोलुआब था कि बाबा नागार्जुन जनकवि थे और वे अपनी कविताओं में आम लोगों के दर्द को बयां करते थे। वे मानते थे कि जनकवि हूं, मैं क्‍यों हकलाउं।

कवियों ने कविता के बनते-बिगड़ते स्‍वरूपों पर सवाल उठाया

: कविता समय -2011′ आयोजित : ‘कविता समय’ 2011 से आयोजन की जिस श्रृंखला की शुरुआत हुई, उसे आमतौर पर भागीदारी कर रहे मित्रों ने ऐतिहासिक कहा। हांलाकि अशोक वाजपेयी ने हिन्दी में अधीरतापूर्वक ऐतिहासिकता लाद दिये जाने की प्रवृति से इसे जोड़ा, लेकिन इस रूप में तो यह उन्हें भी ऐतिहासिक लगा कि लंबे समय बाद इतने कवि सहभागिता के आधार पर साथ बैठकर ‘कविता के संकटों’ पर बात कर रहे हैं।

हिंदी को क्यों नहीं मिलते होलटाइमर

अमिताभ मुझे वह लेखक बता दो हिंदी का, जो सिर्फ लिखता है और उसी पर खा-जी रहा है. मुझे उस हिंदी लेखक से मिला दो, जो आईएएस, आईपीएस, इनकम टैक्स अधिकारी या बैंक का अधिकारी या कर्मचारी, रेलवे विभाग, डाक विभाग, म्युनिसिपेलिटी में सेवा नहीं कर रहा है या किसी प्राइवेट सेक्टर में बड़े या छोटे ओहदे पर नहीं है. और इन सबसे पहले वह विश्वविद्यालय, कॉलेज, स्कूल या ऐसे ही किसी भी शिक्षण या अध्ययन संस्थान में नहीं है. जी हाँ साथियों, ये नहीं हुए तो महाशय या महाशया किसी बड़े या छोटे अखबार और मैगजीन में होंगे ही. नहीं कुछ तो वह ऐसा नेता तो जरूर ही होगा, जिसके अन्दर मेरी ही तरह हिंदी साहित्यकार बनने का कीड़ा नहीं काट रहा हो.