टाइम्स नाऊ पर सौ करोड़ के जुर्माने की खबर पढ़कर दिल दहल गया

: मीडिया बेअंदाज है तो न्‍यायपालिका भी कम नहीं : गलती और अपराध में फर्क को समझे न्‍यायपालिका : योर ऑनर, आप ईश्‍वर नहीं है : लखनऊ : सौ करोड़ रुपयों का जुर्माना। सुन कर ही दिल दहल गया। पुणे की एक अदालत ने न्‍यूज चैनल टाइम्‍स नाऊ के खिलाफ दायर एक याचिका पर फैसला देते हुए इस चैनल को सौ करोड़ रुपये रुपये मानहानि का जुर्माना लगाया है।

जब चैनल ने बाम्‍बे हाई कोर्ट में अपील की तो वहां 20 करोड़ नकद और अस्‍सी करोड़ रुपयों की बैंक गारंटी जमा करने का आदेश दिया गया है। इंडियन एक्‍सप्रेस में छपी एक खबर के मुताबिक अदालत ने न्‍यापालिका में भविष्‍य निधि घोटाले पर चलायी गयी एक खबर के मामले में सुनाया। खबरों के मुताबिक यह मामला सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज पीबी सावंत ने दायर किया था। सावंत का कहना था कि इस घोटाले पर टाइम्‍स नाउ ने 10 सितम्‍बर-08 की एक खबर में कलकत्‍ता हाईकोर्ट के एक जज पीके सामंता के बजाय उनकी फोटो चला दी गयी, जो कि एक शरारतपूर्ण कृत्‍य था। इस मामले में टाइम्‍स नाउ ने तर्क दिया था कि उसने अपनी गलती सुधारने और सावंत से क्षमायाचना करने के लिए लगातार पांच दिनों तक स्‍क्रोल चलाकर बाकायदा क्षमायाचना की है। लेकिन इसके बावजूद अदालत ने यह फैसला सुना दिया।

इस घटना ने समाचार संस्‍थानों में खबरों के स्‍तर पर चल रही लापरवाही का खुलासा तो किया ही है, साथ ही न्‍यायपालिका की अतिरंजना को भी बेपर्दा किया है। क्‍योंकि मेरी नजर में इस पूरे कर्मकांड में जितनी गलती टाइम्‍स नाउ की है, न्‍यायपालिका की उससे कम हर्गिज नहीं। बल्कि शायद टाइम्‍स नाउ से कुछ ज्‍यादा ही। वह यूं कि टाइम्‍स नाउ ने तो यह खबर साफ तौर पर न्‍यायपालिका में चंद लोगों द्वारा किये गये भ्रष्‍टाचार से जनमानस को अवगत कराने के लिए चलायी थी, लेकिन पुणे की अदालत ने तो एक व्‍यक्ति विशेष के पक्ष में यह फैसला सुना दिया। भले ही वह व्‍यक्ति सुप्रीम कोर्ट का पूर्व जज ही क्‍यों न हो।

गंगा को निर्मल करने के लिए हमेशा ऊपर के स्‍तर पर साफ-सफाई की जरूरत पड़ती है। न्‍यायपालिका भी संविधान का तीसरा पाया होने के चलते अपने आप में ही गंगा की हैसियत रखती है। इसलिए वहां की साफ-सफाई के लिए ऐसी खबरें लोगों तक पहुंचाना समाचार संस्‍थानों का दायित्‍व बन जाता है। इस प्रकरण की गंभीरता का अंदाजा केवल इसी तथ्‍य से लगाया जा सकता है कि अदालतों में भविष्‍य निधि घोटाले के मामले में एक पूर्व जज सौमित्र सेन पर इम्‍पीचमेंट का मामला राज्‍यसभा से पारित हो चुका था, लेकिन इसके पहले कि लोकसभा में उस पर बहस होती, सौमित्र सेन ने इस्‍तीफा दे दिया और बच निकले थे।

अब अपने इस दायित्‍व को निभाने के लिए अगर टाइम्‍स नाउ कोई खबर चलायी तो इसमें गलत क्‍या है। क्‍या किसी खबर अथवा उसके किसी पक्ष को केवल इसी तर्क के आधार पर शरारतपूर्ण करार दिया जा सकता है कि उसमें आरोपित के बजाय किसी दूसरे की फोटो लगा दी गयी। हर्गिज नहीं। इस पर बात शुरू करने के पहले हमें टाइम्‍स नाउ या ऐसे ही किसी संस्‍थान की नीयत खंगालनी होगी। देखना होगा कि यह शरारतपूर्ण कृत्‍य आखिर किस स्‍वार्थ से किया गया। और इसके पीछे उसका क्‍या स्‍वार्थ छिपा हुआ था।

हां, चलिए मान लिया कि टाइम्‍स नाऊ ने इस मामले में हर पक्ष पर पूरी सतर्कता न बरतने की गलती की है। समाचार संस्‍थानों में गलतियां होना आम बात होती है। रोजमर्रा का मामला। यह होना बहुत आसान भी है। कारण यह कि जहां सैकड़ों लोगों की सहभागिता हो, वहां छोटी-मोटी त्रुटियों का बने रहना सामान्‍य सी बात है। हर तथ्‍य की पुष्टि किया जा पाना मुमकिन भी नहीं होता। कई बातें ऐसी होती हैं जिन्‍हें प्रथमदृष्‍टया सही दिखने पर पास कर दिया जाता है। हम मानते हैं कि ऐसा भी हर्गिज नहीं होना चाहिए, क्‍योंकि किसी भी व्‍यक्ति पर झूठा लांछन लगाने का कोई भी अधिकार किसी को भी नहीं है। और इस मामले में टाइम्‍स नाउ ने ऐसा कर डाला।

लेकिन क्‍या अदालतों को यह नहीं समझना चाहिए कि अपराध और गलती में फर्क होता है। हमें देखना होगा कि टाइम्‍स नाउ ने यह गलती की है या अपराध। गलतियों को रोकने के लिए कानून बनते हैं जबकि अपराधों और अपराधियों से निपटने के लिए कानूनों का इस्‍तेमाल किया जाता है। स्‍पष्‍ट है कि गलती तो अनजाने में हो जाती है जबकि अपराध सुविचारित होता है। लेकिन दोनों ही कृत्‍यों में एक मौलिक और नीयत का फर्क तो होता ही है। जहां तक मैं समझता हूं कि टाइम्‍स नाउ ने यह गलती किसी साजिश के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं की होगी।
मैं यह भी मानता हूं कि ऐसी गलती जो किसी की छवि धूमिल कर दे, निंदनीय ही होती है। लेकिन इस स्‍तर पर भी मैं यह मानने को तैयार नहीं कि इस आर्थिक दंड के स्‍तर तक ले आया जाए। जहां नीयत में खोट नहीं दिखायी देता हो, वहां तो ऐसी गलतियों पर चेतवनियां ही पर्याप्‍त होती हैं। खासकर तब, जब कोई संस्‍थान पूरी ईमानदारी से अपनी गलती स्‍वीकार करते हुए लगातार पांच दिनों तक स्‍क्रोल चला कर क्षमायाचना कर रहा हो। ऐसे में आप यह कैसे कह सकते हैं कि उस संस्‍थान ने शरारतपूर्ण तरीके से मानहानि पहुंचाने के मकसद से यह कृत्‍य किया है।

वैसे इस घटना ने इतना तो स्‍पष्‍ट कर ही दिया है कि कम खर्च में ज्‍यादा कमाई करने में जुटे टाइम्‍स नाउ जैसे समाचार संस्‍थान और खासकर इलेक्‍ट्रानिक मीडिया का स्‍तर लगातार और तेजी से गिरता जा रहा है। दक्ष और योग्‍य लोगों की सेवाएं लेने और खुद के खुदा होने का भरम पाले इन संस्‍थानों को केवल अपनी कमाई की ही चिंता है, अपने सामाजिक दायित्‍वों की तो हर्गिज नहीं। कई संस्‍थानों में ऐसे लोगों से काम चलाया जा रहा है जो वहां खबर का ककहरा सीखने के लिए प्रशिक्षु के तौर पर पहुंचे हैं। ऐसे में बिना आगा-पीछा सोचे हुए ऐसी खबरों को बे-तरतीबवार चला देना वास्‍तव में शर्मनाक और मीडिया के लिए आत्‍मघाती भी है। पुणे की अदालत का फैसला तो कम से कम यह संकेत तो कर ही देता है। कम से कम उन मीडिया संस्‍थानों से तो यह अपेक्षा नहीं ही की जाती है जो खुद को बड़ा समाचार घराना कहलाने का दावा करते हैं।

कहने की जरूरत नहीं कि आम आदमी तक सीधी और प्रभावी पहुंच रखने वाले मीडिया की ताकत का बेजा इस्‍तेमाल भी खूब जमकर हो रहा है। वे जब चाहें, जो चाहें, जैसा चाहें और जब तक चाहें, किसी भी खबर को चला सकते हैं। मीडिया की इसी ताकत को जमकर बेचा जा रहा है। कई मीडिया संस्‍थान तो ऐसे हैं जो अपना ब्‍यूरो या रिपोर्टर रखने के लिए धेला भर भी खर्च नहीं करते। यह काम उनका ब्‍यूरो और रिपोर्टर खुद ही कर लेता है। वह अपने खर्च निकालता तो है ही, उस समाचार संस्‍थान को भी भारी रकम कमा कर देता है। हर चीज बिकाऊ बनायी जा रही है।

हाल ही नौकरी हासिल करने के लिए एक साक्षात्‍कार के दौरान एक इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के मालिक ने तो मुझसे साफ शब्‍दों में यह पूछ कर स्‍तब्‍ध कर दिया था कि कई बड़ी हस्तियों को जेल तक भिजवा देने की ताकत रखने वाली किसी बड़ी खबर को आखिर बेचा कैसे जा सकता है। जब मैंने कहा कि उसे पूरे धमाके के साथ चलाया जाएगा, तो उनका कहना था कि तब उससे संस्‍थान का खर्च कैसे चलेगा। उस मालिक का तो यहां तक कहना था कि अकेले लखनऊ में ही कई लोग ऐसे हैं जो पूरे ब्‍यूरो का खर्च खुद ही करके संस्‍थान को भी हर महीने बड़ी रकम देने को तैयार हैं।

तो यह है हमारे सद्य-स्‍तनपायी समाचार संस्‍थानों का बदलता चरित्र। जाहिर है कि यह मीडिया के मिशन पर बनियागिरी का घटिया हमला ही है। हर बड़े पदों पर अब पत्रकार नहीं, बड़े लाइजर्स जमा होते जा रहे हैं, जिनका सारा ध्‍यान अब मैनेज करने से बचे खाली समय में केवल बकवादी और जुगत भिड़ाकर कैसे भी पुरस्‍कार हासिल करने का है ताकि वे खुद को पत्रकार के तौर पर सार्वजनिक रूप से प्रतिष्‍ठापित कर सकें। लगभग हर मीडिया संस्‍थान में बड़े पदों पर काबिज ऐसे बड़बोले दलाल आपको खूब मिल ही जाएंगे जो केवल लन्‍तरानियां ही हांका करते हैं और इस तरह यह जाहिर करने में शर्म भी महसूस नहीं करते कि केवल और केवल दलाल हैं। ज्‍यादातर संस्‍थानों में संवादसूत्र और स्ट्रिंगर जैसे दुधमुंहे बच्‍चे-नुमा पत्रकारों को उनका मेहनताना देने के बजाय उनसे दलाली के स्‍तर तक का काम कराया जा रहा है।

ऐसी हालत में अगर हम अब भी नहीं चेते तो अण्‍णा के आंदोलन के बाद अगला आंदोलन मीडिया के खिलाफ ही होगा। यही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब मीडिया के लोगों से जनता सड़क पर ही निपटना शुरू कर देगी। यानी हम संक्रमणकाल से गुजर रहे हैं। और इसके लिए मीडिया को अपनी दायित्‍वपूर्ण विश्‍वसनीयता पर सबसे ज्‍यादा ध्‍यान देना चाहिए। टाइम्‍स नाउ जैसे बड़े समूहों की यह सबसे बड़ी जिम्‍मेदारियों में से एक है। यह जरूरत वैसे तो हर स्‍तम्‍भ पर लागू होती है, लेकिन मैं यह वकालत इस बदहाली के खिलाफ कर रहा हूं और जाहिर है कि इस बदहाली के जारी रहने पर हर सामान टके सेर ही समझा जाएगा। खैर। रही बात गलती की, तो सर्वमान्‍य बात यह है कि ऐसी गलतियां भी नहीं होनी चाहिए।

तो योर ऑनर। मैं क्‍या, देश के किसी भी नागरिक को आपके या किसी भी देशवासी के सम्‍मान को ठेस पहुंचाने जैसे शरारतपूर्ण कृत्‍य करने का अधिकार नहीं है। हर व्‍यक्ति सम्‍मानित है। ठीक उतना ही, जितना आप, वह, यह या मैं। ऐसे में, जाहिर है, हर इकाई को अपने दायरे का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए। टाइम्‍स नाउ ने गलती की है। और यह एक तकनीकी गलती है, शरारत नहीं। केवल गलत फोटो लगा देने से ही उस खबर को शरारपूर्ण करार नहीं दिया जा सकता है। खासकर तब जबकि टाइम्‍स नाउ ने अपनी गलती स्‍वीकार करते हुए महज 15 सेकेंड तक चली इस फोटो पर खेद व्‍यक्‍त करते हुए लगातार पांच दिनों तक स्‍क्रोल चला कर सार्वजनिक तौर पर क्षमायाचना कर ली हो।

योर आनर। गलतियां हर शख्‍स से होती हैं। लेकिन उसकी ईमानदारी इसमें है कि वह गलती महसूस कर क्षमायाचना कर ले। टाइम्‍स नाउ ने भी यही किया है। ऐसा अक्‍सर होता है कि एक जज के तर्कों को गलत ठहराते हुए उसके फैसले को ऊपरी अदालत खारिज कर देती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाता कि उस जज ने अपने फैसले में किसी के खिलाफ शरारतपूर्ण कृत्‍य किया होगा। योर आनर। हमें समझना होगा कि हममें से कोई भी ईश्‍वर नहीं हैं। और फिर गलतियां तो खुद ईश्‍वर से भी हो जाती हैं।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के जाने-माने और बेबाक पत्रकार हैं. कई अखबारों और न्यूज चैनलों में काम करने के बाद इन दिनों एस टीवी में यूपी ब्‍यूरो प्रमुख के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. उनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

Comments on “टाइम्स नाऊ पर सौ करोड़ के जुर्माने की खबर पढ़कर दिल दहल गया

  • ye sazza jaroori tha do char chote channel ko bhi sazza honi cahiye.din bhar me 400 aisi galti hoti hai……you tube channel ke liye nai library hai …..begair copy right ke……abhi kuch din pahle murderer pratibha ki jagah pratibha patil ke visual, jagjit singh ki maut……..roj ka kaam hai ……..pahli baar laga ki ise roka ja sakta hai…….or channel me relative ko jab ki jagah jimmedar logo ko jagah milegi.

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  • सौवीर साहब ये इसलिए ठीक है ताकि मीडिया में गैरजिम्मेदाराना हरकतें और फर्जीवाड़ा बंद हो. आपका लेख पढ़ा तो आपके पुराने लेख सर्च करने लगा…….

    करीब एक साल पहले आप एक लेख लिखे थे ‘रोटी चुराने पर बच्चे को अपाहिज बनाया’ http://www.bhadas4media.com/dukh-dard/6443-roti-chori.html ……याद आ गया होगा आपको, किसी ने उसपे कमेन्ट किया के आपका लेख फर्जी है, और आप मिमियाते रह गए.

    तो साहब ऐसी हरकतों को रोकने के लिए कुछ सख्त कदम ज़रूरी हैं……चूंकि आप भी गैरजिम्मेदार हैं थोड़ा बहुत फार्ज़ी भी लिख मारते हैं इसलिए टाइम्स नाऊ की वकालत कर रहे हैं. ये ना कहियेगा के आप एक ही बार किये हैं. अरे भाई चोर कहलाने के लिए एक बार ही पकड़ा जाना काफी है.

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  • आयुष कुमार says:

    टाइम्स नाऊ पर लगाया गया जमाना बेहद ही गलत और शर्मनाक हैं.

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