दलाल शिरोमणि बरखा और वीर ने फिर दी सफाई

एक मैग्जीन है ‘सोसायटी’.  हाई सोसायटी की बातें इसमें होती हैं. लाइफ स्टाइल मैग्जीन है यह. इस मैग्जीन में इस बार कवर स्टोरी बरखा दत्त और वीर सांघवी पर है. मीडिया के दोनों शीर्षतम दलालों ने एक बार फिर अपनी सफाई दी है. कहा है कि उन लोगों को जानबूझकर टारगेट बनाया गया है.

सोसायटी पत्रिका के जनवरी अंक में वीर सांघवी और बरखा दत्त के विस्तृत इंटरव्यू प्रकाशित हुए हैं. इनमें दोनों पत्रकारों ने अपन पक्ष को विस्तार से रखा है. हालांकि ये लोग अपने पक्ष को पहले भी कई जगहों पर रख चुके हैं और विस्तार से रख चुके हैं लेकिन इन दोनों की दलाली के किस्से आम होने के बाद जिस कदर इनकी मिट्टी पलीद हुई है, उस कारण ये बार बार सफाई देनें को मजबूर हैं और हर बार सफाई देते हुए ऐसा कुछ बोल जाते हैं जिससे इन पर शक बढ़ जाता है.

यह पहला मौका है जब दोनों ने एक साथ एक जगह अपनी बात रखी है. मतलब, दलालों ने एकजुट होकर अपने उपर लगे दाग (जो अब अच्छे माने जाते हैं) को धो (मीडिया छाप डिटरजेंट पावडर से) डालने का इरादा कर लिया है. सोसायटी मैग्जीन में छपे इन दोनों के इंटरव्यू में जोर इस बात पर है कि राडिया टेप का विवरण छापने के लिए जिन लोगों ने दिया उन्होंने हम (बरखा और वीर) दोनों से जुड़े विवरण को साफ-साफ अलग से अंकित किया था. यह लीक हम दोनों को टार्गेट करने के वास्ते थी.

अब इन दोनों को कौन बताए कि आप दोनों पत्रकारिता के चमकते सितारे थे, सो, आप लोगों का नाम ऐसी दलाली में आने पर सबका चौंकना लाजिमी था और आप लोगों के महान (कु)कृत्य को विस्तार से सबको बताना पत्रकारिता का धर्म था. वीर सांघवी ने सोसायटी मैग्जीन में अपने इंटरव्यू में कहा है कि- “I am told by one of the publications that received the tapes that they came neatly marked and sub-divided. Barkha Dutt’s conversations were first and mine were second. So, we were not collateral damage. The intention of the leaker was to target us.”

उधर बरखा दत्त ने कहा है कि “I can’t comment on why the leakage has been so selective. But clearly, the conversations have been cherry picked and, in the interests of transparency, I think all 5,000-plus conversations should now be made public.”

वीर सांघवी ने एक महत्वपूर्ण बात कही है कि हम कितने ही नामी हों, पर अपने पाठकों और दर्शकों का विश्वास खो दिया तो हम कुछ भी नहीं हैं…. “I think the important thing for all of us to realise is that no matter whether we are well-known or successful, the truth is that we are nothing without the faith of our readers and our viewers. At the end of the day, if we cannot explain our own actions, then we cannot expect them to take us seriously when we comment on the actions of others…. All of us in the media are what our readers and viewers have made us. Without them, we are nothing.”

बरखा दत्त साज़िश वाले पक्ष पर ज़ोर देतीं हैं. उनका कहना है कि मैं वही पत्रकार हूँ और वैसी ही रहूँगी… “My viewers don’t need to be disheartened. The way the story has been presented is so caricatured and distorted that it is made to look in a certain way. I am still the same journalist that I always was. I strongly object to the way these stories have been written.”

इस पूरे प्रकरण पर, इन दोनों पत्रकारों की सफाई पर वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी अपने ब्लाग पर लिखते हैं- ”मान लें कि उन्हें टार्गेट किया गया, फिर भी यह साबित नहीं हुआ कि टेप फर्जी हैं. फोन पर हुई बातें सबके सामने हैं. उनसे यह तो पता लगता ही है कि ऊपर के लेवल पर सरकार बनाने और सरकारों से काम निकालने की रीति-नीति क्या है. बरखा दत्त स्वयं को सही मानें इससे उन्हें कोई रोक नहीं सकता, पर उनके दर्शक या पाठक क्या मानते हैं इसका कोई अध्ययन अभी तक नहीं हुआ है. बेहतर हो कि ऐसा अध्ययन सामने आए. कहा जा सकता है कि सामान्य दर्शक जल्दी प्रचार की तेज़ हवा में बह जाता है. अलबत्ता बरखा दत्त के लेखन और प्रसारण में कभी ऐसा देखने, सुनने या पढ़ने का मौका नहीं मिला जिससे महसूस हो कि पब्लिक रिलेशनिंग के धंधे के बारे में उनकी राय क्या है. वास्तव में खुद को बचाने या किसी दूसरे पर आरोप लगाने के बजाय वे इस खेल के बारे में खुलकर लिखें तो उनके पास बेहतर जानकारी होगी. आमतौर पर अच्छी आत्मकथाओं में व्यक्ति अपनी गलतियों को भी ईमानदारी से लिखते हैं. गांधी की आत्मकथा एक सरल व्यक्ति की आत्मकथा है. पत्रकारिता से जुड़े लोग कहानी के अंतर्विरोधों को बेहतर समझते हैं. वे अनेक पक्षों और अनेक सच्चाइयों से प्रत्यक्ष परिचित होते हैं. उनके विवरण इसीलिए पाठक को पसंद आते हैं, क्योंकि उनमें प्रत्यक्षदर्शी और अपेक्षाकृत तटस्थ व्यक्ति का नज़रिया होता है. व्यक्ति की साख किसी एक बात से बनती या बिगड़ जाती है, पर जज्बा हो तो वह फिर से बन भी सकती है. राडिया टेप में केवल इन दो पत्रकारों की बातचीत ही नहीं थी. कुछ और पत्रकारों की बातें थीं. इन बातों से ऐसा लगता है कि इस कर्म का अपने पक्ष में इस्तेमाल करने वाली ताकतें सक्रिय हैं या थीं. मामला केवल सांघवी और बरखा दत्त का नहीं है. संकट तो पूरे प्रोफेशन पर है. सोचना यह चाहिए कि यह कर्म अपनी साख चाहता भी है या नहीं.”

Comments on “दलाल शिरोमणि बरखा और वीर ने फिर दी सफाई

  • [b]Bade logon ko sharm aati nahi- Aati bhi hai to badi der mein [/b]![b] Par Vir aur Barkha ko to sharm bilkul bhi nahi aati ![/b] Ab ye samajh mein nahi aa raha ki ye kitne bade log hain ? Vir to TV par kabhi-kabhi hi nazar aate hai , par Barkha to sharm bhul chuki lagti hain . Roz usi tarah apna chehra NDTV par lekar aati hai , wo bhi itni cheeche-leder ke baawjud !
    Aur to aur , NDTV ke chairman, Dr. Prannav Roy, ko dekhiye , unhe to bilkul sharm nahi aati . Wo wakayee bade aadmi hain , jo itni fajeehat ke baawjud, Barkha ko NDTV ki kamaan diye hue hai . Baat kuch to hao- jo gar nikali to door talaq jaayegi ! CBI waale dhyaan dein !

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  • madan kumar tiwary says:

    बरखा दत और संघवी जी, एक बात समझ में नही आती , अगर आप दोनो पुरी तरह पाक साफ़ थें, तो सारी गुफ़्तगु का उद्देश्य क्या था, आप दोनो को इतना तो पता था , लाबिंग हो रही है , मंत्रीपद के लिये , यह एक विस्फ़ोटक समाचार था , फ़िर आपने कभी इसे दिखाया क्यों नही , इसकी चर्चा तक नही की , वरना राजा तो जाता हीं, २जी भी नही होता । और हां बरखा जी आपकी वह कारगिल लाईव के बारे में तरह – तरह की चर्चा है , कौन था वह अफ़सर मिलटरी का जिसने सिर्फ़ आपको लाईव कवरेज की अनुमति दी। आजकल कहां हैं श्रीमान । वैसे लोग आ्प दोनो को दलाल कहते हैं तो मुझे एक दुसरे किस्म के दलाल का चेहरा याद आने लगता है , दलाल कहना आपके साथ ज्यादती है, आपलोग लाबिस्ट हैं लाबिस्ट । दोनो में बहुत फ़र्क होता है , जैसे वेश्या , कालगर्ल और एस्कार्ट में होता है ।

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  • NDTV ke chairman Dr. Prannav Roy ji ek achche Economist hain . Unhe maalum hai ki Barkha ka istemaal , NDTV ko fhaayada pahunchaane ke liye ,SATTA KE GALIYAARON MEIN, kaise kiya jata hai . Shaayad yahi kaaran hai ki , itni badnaami ke baawjood , wo Barkha Dutt jaise badnaam ho chuke chehre ko NDTV par aane dete hain . Kya Prannav Roy ji ke NDTV mein koi hataaya nahi jata hai ? Galat ! Zaroor hataaya jat hai , Par maamla jab satta tak pahunch aur Economics ke gyaan ki milibhagat se *[b][b]Fhaayada[/b][/b]* uthaane ka ho ,to Barkha zaroori ho jaati hain. Kyunki [b]Economics ki kamaan[/b] to khud Dr. Prannav Roy ji sambhaale hue hain aur [b][b]SATTA KE GALIYAARON MEIN[/b][/b] apne hoonar ka [b][b]JALWA[/b][/b], Barkha poori duniyaa ko dikha chuki hain . Jahan itne *[b]qaabi[/b]l* logon ki [b]jugalbandi [/b]kaam kar rahi ho, wahan [b]NAITIKATA SE JUDE[/b] sawaal puchna, be-imaani ho jata hai. Netaaon ki raah par chalne waale [b]Bade-Bade Patrakaaron ki jay ho . [/b]

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  • Barkha Dutt NAMAK “DALLI” is Samay Davos Me hai.

    Pata Nahi Use Economy Ki kitni Samajh Hai. Wahan Bhi Interviews Ki Aad Me Dalali Kar Rahi Hai.

    Kya NDTV Se World Economic Forum me Koi Business Journalist Ko Nahi Bheja Jaana Chahiye Tha?

    Yeh “DALLI” Har Baar Dusaron Ka Haque Maarti Hai.

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