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दिल्ली से एक और उर्दू अखबार

जदीदभारत में उर्दू के समाचार-पत्रों की हालत कभी भी अच्छी नहीं रही। इस के बावजूद देश के विभिन्न हिस्सों खास तौर पर दिल्ली से उर्दू अखबारों के निकलने का सिलसिला हर दौर में जारी रहा। अखबार निकलते रहे और साल दो साल या फिर चार साल के बाद बंद होते रहे। हाल ही में दिल्ली से उर्दू का एक और अखबार ‘जदीद मेल’ के नाम से निकला है। वैसे तो शुक्रवार को यह अखबार पहली बार मार्केट में आया मगर उस पर अंक नंबर 61 लिखा हुआ है। इसके चीफ एडिटर जाने माने पत्रकार जफर आग़ा हैं जबकि एडिटर हाजी अब्दुल मलिक हैं, जो इस अखबार के मालिक भी हैं।

जदीदभारत में उर्दू के समाचार-पत्रों की हालत कभी भी अच्छी नहीं रही। इस के बावजूद देश के विभिन्न हिस्सों खास तौर पर दिल्ली से उर्दू अखबारों के निकलने का सिलसिला हर दौर में जारी रहा। अखबार निकलते रहे और साल दो साल या फिर चार साल के बाद बंद होते रहे। हाल ही में दिल्ली से उर्दू का एक और अखबार ‘जदीद मेल’ के नाम से निकला है। वैसे तो शुक्रवार को यह अखबार पहली बार मार्केट में आया मगर उस पर अंक नंबर 61 लिखा हुआ है। इसके चीफ एडिटर जाने माने पत्रकार जफर आग़ा हैं जबकि एडिटर हाजी अब्दुल मलिक हैं, जो इस अखबार के मालिक भी हैं।

अखबार के प्रिंटर और पब्लिशर आली हैदर रिजवी हैं। रिजवी पहले सहाफ़त अखबार में थे। किसी विवाद के बाद रिजवी सहाफ़त से अलग हो गए और उन्‍होंने एक दूसरा अखबार उर्दू नेट निकाला। बाद में कुछ ही दिनों चलने के बाद उर्दू नेट भी बंद हो गया। उर्दू का यह नया अखबार कितने दिन चलेगा यह तो एक अलग सवाल है, मगर एक मुख्य प्रश्न यह है कि जब राष्ट्रीय सहारा के अलावा दिल्ली से निकलने वाले उर्दू के सभी अखबार आर्थिक तंगी की वजह से रोते रहते हैं, किसी ने खर्च में कमी लाने की नीयत से दिल्ली से बाहर अखबार भेजना बंद कर दिया है तो कोई अखबार बेचने के लिए खरीदार तलाश रहा है। ऐसे में एक नए उर्दू अखबार की शुरूआत बड़े आश्चर्य की बात है।

उर्दू अखबार के साथ एक बड़ा मसला यह है कि उन्हें विज्ञापन बहुत कम मिलते हैं। कम सर्कुलेशन की वजह से प्राइवेट विज्ञापन तो मुश्किल से मिलता ही है, अब डीएवीपी के विज्ञापन में कमी के कारण भी उर्दू अखबार की हालत खराब हो गयी है। पिछले दिनों जब उर्दू वालों को डीएवीपी के विज्ञापन बहुत कम मिलने लगे तो उर्दू अखबार के मालिक और संपादकों ने इस समस्या को लेकर कई नेताओं समेत प्रधानमंत्री से भी मुलाकात की। उन्हें उनकी समस्याओं के हल का आश्वासन भी दिया गया मगर अब तक यह समस्या हल नहीं हुई है। इस संबंध में मेरा लेख डीएवीपी के लिए एकजुट हुये उर्दू अखबार भड़ास पर प्रकाशित हो चुका है।

लगभग एक साल बीत चुके है तब से लेकर अब तक उर्दू वालों का नेताओं और अफसरों से मिलने का सिलसिला जारी है। इस सिलसिले में एक बात यह देखने में आ रही है कि अपनी आदत के अनुसार उर्दू का हर अखबार एक दूसरे की काट करने में लगा है। हर संपादक या मालिक की यही कोशिश है कि नेता से उसकी पहचान ज़्यादा बने और अगर सरकार उर्दू अखबार के लिए कुछ खास ऐलान करे तो उसका लाभ उसे हो। फिलहाल दिल्ली से 47 उर्दू के ऐसे अखबार प्रकाशित हो रहें हैं जिनको डीएवीपी से विज्ञापन मिलता है। इन 47 में से अधिकतर ऐसे हैं, जो सिर्फ उसी दिन प्रकाशित होते हैं जिस दिन उनको विज्ञापन मिलता है, उसके अलावा यह अखबार कहाँ से प्रकाशित होते हैं और कहाँ जाते है यह किसी को पता नहीं है।

दिल्ली में फिलहाल मार्केट में उर्दू के जो अखबार नज़र आते हैं वो हैं राष्ट्रीय सहारा, हिंदुस्तान एक्सप्रेस, सहाफ़त और हमारा समाज। इन के अलावा जो अखबार निकलते हैं वो सिर्फ सरकारी दफ्तरों में जाते हैं। इनमें कॉर्पोरेट का अखबार होने की वजह से सिर्फ सहारा ही ऐसा है जिसकी आर्थिक हालत अच्छी है, बाक़ी के अखबार जैसे तैसे कर के चल रहें हैं। जिस अखबार के मालिक तेज़ और चालाक हैं वो तो कहीं न कहीं से अखबार चलाने के लिए पैसा निकाल ही लेते हैं, जिनको यह फन नहीं आता वो अपनी हिम्मत से अखबार निकाल तो रहें हैं, मगर कब तक निकालते रहेंगे यह कहना मुश्किल है। उर्दू अखबारों की आर्थिक तंगी के बावजूद एक नए अखबार ने दिल्ली में दस्तक दी है। अखबार के मालिक ने ऐसी हिम्मत कैसे कर ली और यह अखबार कितने दिनों तक चलेगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा।एएन

लेखक ए एन शिबली हिन्‍दुस्‍तान एक्‍सप्रेस के ब्‍यूरो चीफ हैं.

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0 Comments

  1. Alamullah

    January 16, 2011 at 1:06 pm

    آپ نے ایک بہت اہم مسئلے کی جانب نشاندہی کی ہے۔
    میرے خیال میں سب سے بنیادی مسئلہ یہ ہے کہ ہمارے ہاں اخبارات یا تو کاروباری شخصیات کی ملکیت ہیں یا ان صحافیوں کی،جو کاروباری بن گئے ہیں۔ اب ان کا بنیادی مقصد صرف اور صرف پیسہ کمانا ہے۔

  2. Alamullah

    January 16, 2011 at 1:07 pm

    [b]آپ نے اخباروں کے حوالے سے ایک بہت اہم مسئلے کی جانب نشاندہی کی ہے۔
    میرے خیال میں سب سے بنیادی مسئلہ یہ ہے کہ ہمارے ہاں اخبارات یا تو کاروباری شخصیات کی ملکیت ہیں یا ان صحافیوں کی،جو کاروباری بن گئے ہیں۔ اب ان کا بنیادی مقصد صرف اور صرف پیسہ کمانا ہے۔[/b]

  3. raman

    January 10, 2011 at 3:49 pm

    अखबार के मालिक ने ऐसी हिम्मत कैसे कर ली !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
    kamaaal karte hain Shibli saaahab aaap bhi!!! himmat agar krli hai to aaaap ko koi problem hai kya??? agar hai to kyon bhai????
    aur aaaapka tone to bdaaa ajeeb sa hai…as if aaap ye keh rehey hon ki arrre Himmat karney ki himaat kyon ki!!!!!!!!!!!
    hahahahahahahahaha
    aji shibli ji ab to sudhr jaaaaao…
    Hindi ke bhi na jaaane aise kitney akhbaar hain jo kb cchaptey hain aur kahaaan jaaaatey hain kisi ko pta nahi, bas DAVP ka add lene ke liye ye akhbaar nikltey hain… aur naaaaam bhi gajab gajb ke hotey hain….. khair…
    aur kai saaari regional language ke akhbaaaro ka bhi aisa he haaal hai..
    koi comparative study kro aur tb btaaaao ki sthiti kya hai…
    anyways Urdu akhbaar nikaaal sach me himmat ka kaaaam kia hain in logon ne.. i wish them good luck and best wishes

  4. anil nakra

    January 10, 2011 at 7:47 am

    reason is clear for advertisemt and for black mail purpose if possible ,try to creat relations for political purpose

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