
मुकेश कुमार
अमेरिका इंग्लैंड भी आँखें गड़ाए हुए थे कि खुदा न खास्ता प्रधानमंत्री को कुछ हो गया तो वे अपना एजेंडा कैसे लागू करेंगे। हालाँकि ख़तरे को देखते हुए उन्होंने एक स्वामीभक्त नेता का नाम तय कर लिया था ताकि अनहोनी की स्थिति में उसे प्रधानमंत्री बनवाया जा सके। मगर प्रधानमंत्री के सकुशल लौटने पर उनके कलेजों को भी ठंडक पहुँची थी और उन्होंने तुरंत बेहतर स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना करते हुए पैग़ाम भेज दिए। बहुत सारे अफसर-बाबुओं ने भी मिठाई बाँटकर खुशी मनाई, जबकि कुछ ने उस दिन गुपचुप शोक सभाएं करते हुए मौन रखा। मुद्रा कोष में जाने को उतावला एक नौकरशाह फौरन प्रधानमंत्री के दर्शन के लिए जा पहुँचा।
कार्य भार सँभालने के बाद कुछ ही घंटे बीते होंगे कि साउथ ब्लाँक में हड़कम्प मच गया। पता चला कि प्रधानमंत्री ने दस्तखत के लिए रखी सबसे पहली फाइल लौटा दी है। यही नहीं, उन्होंने कैबिनेट सेक्रेटरी को बुलाकर जमकर हड़काया है और कहा है कि आदिवासी इलाकों में कोई भी ज़मीन उद्योगपतियों को नहीं दी जाएगी और जिनके भी ख़िलाफ़ पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन की शिकायतें हैं उन्हें तुरंत बोरिया-बिस्तर समेटना होगा। सेक्रेटरी ने जब उन्हें ऐसा न करने की सलाह देने की कोशिश की तो उन्होंने उससे शाम तक अपना इस्तीफ़ा भेजने के लिए कह दिया।
इन ख़बरों से पैदा हुई हलचलें अभी थम भी नहीं पाई थीं कि सूचना मिली कि उन्होंने कई फाइलें मेज़ से उठाकर फेंक दी हैं। इनमें विदेशी निवेश, निजीकरण, मज़दूर कानूनों में परिवर्तन, ठेके की खेती, खुदरा व्यापार में विदेशी कंपिनयों की आमद आदि से संबंधित फाइलें थीं। प्रधानमंत्री का कहना था कि ये सारी की सारी जन विरोधी हैं और इन्हें नए सिरे से तैयार करना होगा। खाद्य सुरक्षा और लोकपाल बिल में तो बदलाव करने वे खुद ही बैठ गए। उन्होंने खाद्य सुरक्षा के तहत आने वालों की न्यूनतम आय की सीमा को सौ गुना बढ़ा दिया और लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को भी रखने के लिए कहा।
ज़ाहिर है कि प्रधानमंत्री की ये हरकतें सीआईआईआई और फिक्की जैसे संगठनों को नागवार गुज़रीं और उन्होंने तुरंत एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री से मिलने भेज दिया। थोड़ी देर बाद पता चला कि उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय में घुसने ही नहीं दिया गया। उनसे कहा गया कि समय लेकर आएँ। कुछ मुँह लगे उद्योगपतियों ने प्रधानमंत्री को समझाने के लिए फोन किए मगर प्रधानमंत्री ने बात करने से ही इनकार कर दिया। वे सकते में आ गए, क्योंकि उनके साथ ऐसा पहली बार हुआ था।
न्यूज़ चैनलों पर दनादन ब्रेकिंग न्यूज़ चलने लगीं। एंकर इतनी ज़ोर से चीख चीखकर ख़बरें देने लगे कि उनके मुँह से झाग निकलने लगा। जाने माने लोगों के बयान दिखाए जाने लगे, जो कि ज़ाहिर है प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ ही थे। इक्का-दुक्का बयान समर्थन में भी थे मगर उन्हें कम और काट-छाँटकर दिखाया गया। कुल मिलाकर मीडिया यही कह रहा था कि प्रधानमंत्री पगला गए हैं और वे जो भी कदम उठा रहे हैं उससे आर्थिक सुधारों को धक्का लगेगा, विकास की दर घटेगी, देश पीछे चला जाएगा वगैरा वगैरा।
देर रात प्रधानमंत्री के घर जाने से पहले उनके कार्यालय ने एक प्रेस रिलीज़ जारी करके फिर सनसनी फैला दी। प्रेस रिलीज़ में कुछ मंत्रियों और नौकरशाहों को हटाने की घोषणा की गई थी। ये मंत्री और अफसर सरकार में सबसे पॉवरफुल लोग थे, बल्कि कहा जाए तो प्रधानमंत्री की बीमारी के दौरान यही लोग सरकार चला रहे थे। उनके हटने का मतलब था पूरे सत्तातंत्र का हिलना और इसकी धमक पार्टी अध्यक्ष के घर तक सुनाई दी। रात में ही वहाँ बैठकों का दौर शुरू हो गया। प्रधानमंत्री को भी बैठक में आने के आदेश हुए, मगर उन्होंने आराम करने की बात करके आने से इनकार कर दिया।
बैठक में किसी को समझ में ही नहीं आ रहा था कि प्रधानमंत्री को हो क्या गया है। पहले तो सब ठीक था। वे पार्टी और पार्टी अध्यक्ष के कहने पर ही चलते थे। पार्टी की मदद करने वालों का भी पूरा खयाल रखते थे, मगर अचानक क्या हो गया जो उन्होंने उल्टी राह पकड़ ली। प्रधानमंत्री के विरोधियों को मौका मिला तो उन्होंने उन्हें तत्काल हटाने की माँग बुलंद कर दी। मगर सबको पता था कि प्रधानमंत्री स्वस्थ होकर अभी अभी लौटे हैं और उनके साथ लोगों की सहानुभूति भी होगी। इसके अलावा उन्होंने जो काम आज किए हैं उससे वे आम अवाम में हीरो भी बन गए हैं और ऐसे समय उनको हटाने की कोशिश की गई तो पार्टी को लेने के देने पड़ेंगे। चुनाँचे ये तय किया गया कि अव्वल तो ये पता लगाया जाना चाहिए कि प्रधानंत्री में ये परिवर्तन हुआ कैसे। इसके लिए एक तीन सदस्यीय टीम बनाई गई और उससे चौबीस घंटों में रिपोर्ट देने को कहा गया। जाँच कमेटी फौरन काम पर जुट गई।
उधर, अगले दिन भी प्रधानमंत्री ने चीज़ों को पलटना जारी रखा। सबसे पहले तो उन्होंने उन लोगों के नाम तीन दिनों के भीतर सार्वजनिक करने के लिए कह दिया जिन्होंने स्विस बैंक में धन जमा किया है। ये नाम विकीलीक्स के ज़रिए सरकार को पहले ही मिल चुके थे। ये ख़बर न्यूज़ चैनलों को किसी आतंकवादी हमले से कम नहीं लगी और इन्होंने इसमें टीआरपी की संभावनाएं जाँचने के बाद खेलना शुरू कर दिया। इसके बाद उन्होंने धर्म और जाति की राजनीति करने वाली कुछ पार्टियों पर शिकंजा कसने के लिए कड़े नियम-कानून बनाने की घोषणा भी कर डाली। मुख्य चुनाव आयुक्त को बुलाकर चुनाव सुधार लागू करने के आदेश दे दिए।
इस बीच कमेटी ने असाधारण तत्परता दिखाते हुए चौबीस के बजाय चार घंटों में ही रिपोर्ट तैयार कर ली। घंटे भर में हाईकमान समेत पार्टी के तमाम नेता कार्यालय में जमा हो गए। कमेटी ने निष्कर्ष निकाला था कि प्रधानमंत्री की बीमारी के दौरान दो कम्युनिस्ट नेता, एक नक्सली, सिविल सोसायटी के कुछ लोग और कुछ सामाजिक कार्यकर्ता मिले थे और आशंका यही है कि इन्होंने ही प्रधानमंत्री को बरगला दिया है जिसकी वजह से वे ऊटपटाँग हरकतें किए जा रहे हैं। लेकिन विचार-विमर्श के बाद पाया गया कि विश्वबैंक और मुद्रा कोष की नीतियों के प्रति इतना समर्पित और कटिबद्ध प्रधानमंत्री इन लोगों के बहकावे में नहीं आ सकता। किसी ने सुझाव दिया कि ये किसी ज्योतिषी या तांत्रिक की कारस्तानी भी हो सकती है, क्योंकि वशीकरण मंत्रों या आधी रात को कपाल क्रिया के ज़रिए ऐसा संभव है। मगर लंबी बहस के बाद इसे भी खारिज़ कर दिया गया।
मीटिंग चल रही रही थी कि हॉट लाइन पर व्हाइट हाऊस से फोन आया कि उनके पास एक ऐसी शोध रिपोर्ट है जिसमें कहा गया है कि यदि ह्रदय परिवर्तन के समय कोई चूक हो जाए तो रोगी की मानसिक दशा में स्थायी परिवर्तन आ सकता है। लिहाज़ा डॉक्टर से इस बाबत पूछताछ की जानी चाहिए। अब अमेरिका के कहने को टाला तो जा नहीं सकता था इसलिए फौरन एक दल ड़ॉक्टर से मिलने निकल पड़ा।
डॉक्टर ने नेताओं को बताया कि ट्रांसप्लांटेशन के दौरान किसी भी तरह की चूक नहीं हुई है। सब कुछ मेडिकल के नियमों के मुताबिक ही हुआ है और पूरी सावधानी के साथ किया गया है। वह नेताओं को उसे आपरेशन कक्ष में भी ले गया जहाँ हृदय बदला गया था। शीशे का वह जार भी वहाँ अभी तक रखा हुआ था, जिससे निकालकर हृदय प्रधानमंत्री को लगाया गया था। एक अँग्रेजीदाँ नेता ने जिज्ञासावश उसे हाथ में ले लिया और उसमें चिपकी स्लिप को पढ़ना शुरू किया। एक अजीबोगरीब नाम लिखा था। उसने प्रश्न भरी निगाहों से डॉक्टर की ओर देखा। डॉक्टर ने बताया- मँगरू बैगा। बस्तर के एक आदिवासी का दिल था इसमें और वही इस समय प्रधानमंत्री के सीने में धड़क रहा है।
डॉक्टर का इतना कहना था कि नेताओं की आँखें आपस में चार हुईं और सबके सब मुस्कराने लगे। उन्हें प्रधानमंत्री में आए परिवर्तनों का पता चल गया था। लौटकर उन्होंने पार्टी अध्यक्ष और दूसरे नेताओं को बताया। तुरंत अमेरिका से संपर्क किया गया। वहाँ से जवाब आया कि प्रधानमंत्री का फिर से दिल बदलना होगा। इस बार आदिवासी के दिल की जगह किसी बड़े उद्योगपति या अमेरिकापरस्त नेता या नौकरशाह का दिल लगाया जाए। जब तक ये नहीं होता तब तक प्रधानमंत्री को दफ़्तर आने से रोका जाए।
अमेरिकी सलाह मिलने के बाद से पार्टी ने व्यापार एवं उद्योग जगत के बहुत सारे लोगों से बात की मगर कोई भी अपना दिल देने को तैयार नहीं हुआ। कोई अफसर या नेता भी राज़ी नहीं हो रहा है। सबके सब दूसरों का नाम सुझाने में लगे हुए हैं। इस काम में विश्व बैंक और मुद्रा कोष की मदद भी ली जा रही है और बड़े मुल्कों ने भी हर संभव सहायता का वादा किया है। संभावना यही है कि एक अदद दिल का इंतज़ाम हो जाएगा और मुल्क को फिर से पुराने रास्ते पर लाने में कामयाबी हासिल हो जाएगी।
उधर प्रधानमंत्री आवास में क़ैद एक आदिवासी दिल कुछ अच्छा काम करने को तड़प रहा है। उसका दर्द एक पुकार बनकर अवाम तक पहुँच पाएगा या नहीं, ये देखना है।
आमीन।
इस व्यंग्य के लेखक मुकेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों हिंदी राष्ट्रीय न्यूज चैनल ‘न्यूज एक्सप्रेस’ के हेड के रूप में काम कर रहे हैं.












Adbhut
June 6, 2011 at 8:09 am
Bahut Accha Vyang hai ek Tele-Film banane ke laayak… ya ek comedy episode ke laayak… Good
Manish
June 6, 2011 at 8:50 am
रोचक, मारक तथा संवेदना को झकझोरने वाला ख़ूबसूरत व्यंग्य. यूं भी मुकेश जी कि लेखनी बड़ी प्रवाहमयी है… इसे निर्निमेष पढ़ गया.
अंकुर विजयवर्गीय
June 6, 2011 at 8:55 am
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति। बधाई आपको।
avinash jha
June 6, 2011 at 10:08 am
bahut Umdaa sir ……
sanjat tiwari
June 6, 2011 at 10:59 am
Bahut Khub………….
KANISHAK
June 6, 2011 at 11:05 am
वाह मुकेश जी. शुरु में बढकर तो फिल्म नायक की याद आ गई ..काश..ये व्यंग पीएम भी पढें तो उनकी मननशील चेतना सही दिशा में जाग्रत हो..
कनिष्क
PUNEER
June 6, 2011 at 11:10 am
लघु उपन्यास
सृजन शिल्पी
June 6, 2011 at 11:37 am
बढ़िया।
बबिता अस्थाना
June 6, 2011 at 1:46 pm
सर आपके संवेदनशील लेख काफी पढ़े हैं लेकिन….व्यंग के रूप में ये लेख बेहद प्रभावशाली है, व्यंग के रूप में आपने बहुत बड़ी बात कही है…पढ़कर काफी अच्छा लगा……
TP PANDEY
June 6, 2011 at 3:39 pm
वाह..मज़ा आ गया।सामयिक विषयों पर लेख तो पढ़ता ही रहा हूं..व्यंग्य पहली बार पढ़ा।व्यवस्था का खोखलापन उजागर करने के लिए बधाई..इसी तरह लिखते रहिए और हम पढ़ते रहें
धीरेन्द्र
June 6, 2011 at 5:04 pm
बेहद शानदार व्यंग्य है..
राजकुमार साहू, जांजगीर छत्तीसगढ़
June 6, 2011 at 6:04 pm
श्री मुकेश कुमार सर,
बेहतरीन व्यंग्य आपके माध्यम से पढ़ने को मिला। वैसे व्यंग्य को भड़ास पर स्थान नहीं मिलता, मगर जिस तरह से आपने अपनी लेखनी में धार दी है, वह काबिले तारीफ है। पढ़कर मजा आ गया। आपको बधाई…
अविनाश
June 8, 2011 at 8:45 am
मुकेश जी ने कमाल का लिखा है… लगता है, न्यूज एक्सप्रेस में जान आ जाएगी।