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दुख-दर्द

देहदान से मृत्यु भी छोटी हुई

[caption id="attachment_18289" align="alignnone" width="505"]सुरेश अंबेकरसुरेश अंबेकर[/caption]

: लोकमत के सुरेश अंबेकर का निधन : नागपुर। वो हमेशा कहते थे, एक दिन यह शरीर मिट्टी में मिल जाएगा। इसका सदुपयोग होना ही चाहिए। देहदान करना ही चाहिए। वो इस प्रकार देहदान का महत्व बताते रहते थे। लोकमत समाचार के सुरेश अंबेकर का देवलोकगमन 9 अक्टूबर को नागपुर में हुआ।

सुरेश अंबेकर

सुरेश अंबेकर

: लोकमत के सुरेश अंबेकर का निधन : नागपुर। वो हमेशा कहते थे, एक दिन यह शरीर मिट्टी में मिल जाएगा। इसका सदुपयोग होना ही चाहिए। देहदान करना ही चाहिए। वो इस प्रकार देहदान का महत्व बताते रहते थे। लोकमत समाचार के सुरेश अंबेकर का देवलोकगमन 9 अक्टूबर को नागपुर में हुआ।

वे लंबे समय से स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे। वे कहते थे कि नेत्रदान, रक्तदान और देहदान समाज में सबसे श्रेष्ठ दान समझे जाते है। ऐसे अनेक लोग है कि जो इस प्रकार निर्णय लेकर समाज के सामने आदर्श बनते है एवं दूसरों को प्रेरणा देते है। इन्हीं में से एक सुरेश भास्कर अंबेकर थे। मरणोपरांत देहदान करने की उनकी अंतिम इच्छा थी। उनके देहदान करने से मृत्यु भी छोटी हो गई।

उनका पार्थिव शरीर जब दर्शनार्थ उनके निवास चिंचभवन नागपुर में रखा गया तब लोकमत समूह आला से अदना कर्मी मौजूद थे और सभी ने उनकी इस अंतिम इच्छा की सराहना करते हुए कहा कि यह जीवन का सबसे श्रेष्ठ दान है। उनके छोटे भाई गजानन अंबेकर और उनके मित्र पीपुल्स समाचार के संपादक गीत दीक्षित ने इस संबंध में बताया कि वह शुरू से ही कहते थे कि मेरे शरीर को मेडिकल के छात्रों के लिए दान करना। क्योंकि इस देश में रिसर्च करने वालों को मानव शरीर उपलब्ध नहीं हो पाता। इस कारण असुविधाओं का सामना होता है।

सुरेश अंबेकर का जन्म जबलपुर (म.प्र.) में सन् 1962 में हुआ था। शिक्षा दीक्षा जबलपुर में ही करने के उपरांत उन्होंने जबलपुर से नागपुर की ओर रूख किया। महाराष्ट्र के सर्वाधिक लोकप्रीय अखबार लोकमत में सहायक प्रबंधक के रूप में यात्रा शुरू की थी। 20 वर्षों के अपने सेवाकाल में सुरेश ने प्रबंधन के साथ अपने मित्रों का दिल जीत लिया था। तीन भाईयों में मंझले सुरेश की देहदान की इस अमृतवाणी पर मित्रों के अलावा परिवार ने मिसाल पेश की है।

इसे भी पढ़ सकते हैं- देहदान कर प्रेरणास्रोत बने आंबेकर

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