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नारियों का अनादर करना, ये कहां लिखा है!

[caption id="attachment_18349" align="alignleft" width="63"]भूपेंद्र सिंह गर्गवंशीभूपेंद्र सिंह गर्गवंशी[/caption]: ब्रिटिश काल की इस पुलिस का चरित्र बदलो : अंग्रेजों के राज में जब देश गुलाम था, तब 1861 में फिरंगी हुकूमत ने भारत देश की जनता के ऊपर दमन करने के लिए ‘पुलिस’ महकमें का गठन किया था। तत्समय की पुलिस हिन्दुस्तान के लोगों को जिस तरीके / ढंग से प्रताड़ित करती थी, वह रवैय्या आजादी के 63 वर्ष बाद भी नहीं बदला है।

भूपेंद्र सिंह गर्गवंशी

भूपेंद्र सिंह गर्गवंशी

भूपेंद्र सिंह गर्गवंशी

: ब्रिटिश काल की इस पुलिस का चरित्र बदलो : अंग्रेजों के राज में जब देश गुलाम था, तब 1861 में फिरंगी हुकूमत ने भारत देश की जनता के ऊपर दमन करने के लिए ‘पुलिस’ महकमें का गठन किया था। तत्समय की पुलिस हिन्दुस्तान के लोगों को जिस तरीके / ढंग से प्रताड़ित करती थी, वह रवैय्या आजादी के 63 वर्ष बाद भी नहीं बदला है।

कहने को भारतीय संविधान में कई संशोधन करके हर महकमें का अधिकार / दायित्व परिवर्तित कर दिया गया है साथ ही संविधान संशोधन अब भी बराबर किया जाता है, लेकिन शायद ही पुलिस महकमे के अधिकार और पुलिस कर्मियों के दायित्वों में परिवर्तन किया गया हो. भारत देश को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ लोकतान्त्रिक देश कहा जाता है। हो सकता है कि ऐसा कहने के लिए कुछ ऐसे ही मापदण्ड हों जिनमें अब भी फिरंगियों की हुकूमत की नीतियाँ तौर-तरीके शामिल हों। पुलिस महकमा एक दम से 15 अगस्त 1947 के पूर्व जैसा ही है। न्याय पालिका, कार्य पालिका और प्रचार माध्यम (पत्रकारिता) भले ही इस देश के लोकतन्त्र के चार स्तम्भ हों, लेकिन तीसरे स्तम्भ कार्यपालिका के तहत आने वाले पुलिस विभाग के चौकीदार से लेकर सर्वोच्च पदाधिकारी तक का रवैय्या आम अवाम के साथ ठीक वैसा ही है जैसा फिरंगी हुकूमत में हुआ करता था।

भारत देश में ‘नारी’ की पूजा होती है। नारी जो माँ है इसके गर्भ से जन्म लेने वाले लोग ही न्यायाधीश, जनप्रतिनिधि, पुलिस/प्रशासनिक अफसर तथा पत्रकार आदि बनते हैं। नारी शक्ति स्वरूपा है। आदि से वर्तमान तक इसकी ‘शक्ति’ का लोहा सभी ने माना है। सुर-नर-मुनि-असुर सब नारी उपासक रहे हैं। नारी और ‘माँ’ शब्द की व्याख्या करने की कोई आवश्यकता नहीं। इसे ‘पुलिस’ को भी तो अच्छी तरह समझना चाहिए।

इस मशीनरी युग (कलयुग) में भारत देश के लोगों ने राजतन्त्र से लोकतन्त्र की व्यवस्था को अच्छी तरह से भोगा और महसूस किया है। नारियों का ‘सम्मान’ न करने वाले लोग असुरों की श्रेणी में आते हैं। और तब- ‘‘यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानम् सृजाम्यहम्’’ यह श्लोक अपनी प्रासंगिकताओं को चरितार्थ करता है। यही नहीं प्रताड़ना की पराकाष्ठा ‘नारी’ के आदि शक्ति माँ दुर्गा बनने का कारक बनती है। विद्रोह पर उतारू लोग नक्सलवादी आदि बन जाते हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि मंगल पाण्डेय, शहीद-ए-आजम भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक उल्लाह खाँ आदि की भूमिका देश को फिरंगियों की दासता से मुक्ति दिलाने में अहम रहीं है, और इनकी भी उत्पत्ति एक नारी (माँ) के ही गर्भ से हुई थी।

आश्यर्च होता है कि इस लोकतन्त्र के चारो स्तम्भों में आपसी ताल-मेल क्यों नहीं है? क्या नन्दगंज की पुलिस को यह नहीं मालूम था या है कि श्रीमती जमुना सिंह एक होनहार पत्रकार की माँ हैं, जो हिन्दी और मीडिया से जुड़े लोगों में अपने कृत्यों से लोकप्रियता की अच्छी-खासी मिशाल कायम किए है। यह घटना पुलिस और मीडिया की कथित दोस्ती पर प्रश्न चिन्ह लगाती है।

यह अन्तहीन ‘भड़ास’ यहीं नहीं समाप्त होती है। पुलिस ही नहीं वरन सभी को ज्ञात होना चाहिए कि श्रीमती जमुना सिंह यशवन्त जैसे होनहार पत्रकार की माँ तो बाद में हैं, पहले वे एक नारी हैं, और नारी (नारियों) का अनादर करना इस लोकतन्त्र के संविधान में कहीं लिखा है, ऐसा कत्तई नहीं है। प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, मीराकुमार, सोनिया गाँधी, मायावती, ममता बनर्जी, सुषमा स्वराज, शीला दीक्षित जैसी माननीय नारियाँ जिन्हें हम राजनीति का स्तम्भ मानते हैं, के युग में ‘पुलिस’ वह भी नन्दगंज (गाजीपुर) उप्र पुलिस और सूबे में इस महकमें के उच्च ओहदेदारों के कृत्यों पर थू-थू करना ही चाहिए, साथ ही संविधान में संशोधन करके करके निरंकुश पुलिस अफिसरों को देश के लोकतन्त्रीय व्यवस्था का उल्लंघन करने के लिए दण्डित किए जाने का ‘प्रावधान’ बनाए जाने की भी आवश्यकता है। फिलहाल अभी इतना ही।

लेखक भूपेंद्र सिंह गर्गवंशी यूपी के अंबेडकरनगर जिले के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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