पत्रकारिता की पेशागत चिंताएं दूर करे मीडिया : उपराष्‍ट्रपति

: खुद की आलोचना के समय खामोश हो जाता है यह उद्योग : मीडिया के विनियमन और पेशेवराना आचार नीति की जरूरत के मुद्दों को गहराई से रेखांकित करते हुए उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने शुक्रवार को कहा कि लोकतंत्र की चौथे स्तंभ को पत्रकारिता के पेशे के बारे में अलग- अलग चिंताओं को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए.

पत्रकारिता के शिखर पुरुष प्रभाष जोशी के 75वें जन्‍मदिन पर आयोजित दो दिवसीय भाषाई पत्रकारिता महोत्‍सव का उद्घाटन करते हुए उन्‍होंने कहा कि पत्रकारों की बिरादरी का फर्ज है कि वह पहल करे और इस पेशे के बारे में विभिन्न चिंताओं को दूर करने की कोशिश करे. उन्‍होंने कहा कि मीडिया के विनियमन पर होने वाली किसी भी चर्चा में पेड न्यूज से जुड़े विवादों की अनदेखी नहीं की जा सकती.

उपराष्‍ट्रपति ने मीडिया में पारदर्शिता की जरूरत पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि पेड न्यूज पर रिपोर्ट को सामने लाने में मीडिया उद्योग और भारतीय प्रेस परिषद की नाकामी इस तरफ इशारा करती है कि ‘जब खुद अपनी आलोचना का वक्त आता है तो पूरे उद्योग पर खामोशी छा जाती है.’

समारोह में प्रदेश के राज्‍यपाल रामेश्‍वर ठाकुर, मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्‍ल, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी, प्रदेश के मंत्री लक्ष्‍मीकांत शर्मा, महापौर कृष्‍ण मुरारी मोघे, न्‍याय के अध्‍यक्ष नामवर सिंह और इंदौर प्रेस क्‍लब के पदाधिकारी मौजूद थे. मुख्‍यमंत्री ने प्रदेश के श्रेष्‍ठ खिलाड़ी को हरेक साल एक लाख रुपये का प्रभाष जोशी पुरस्‍कार देने और इंदौर में उनके घर के सामने वाली सड़क का नाम उनके नाम पर किए जाने का एलान किया. समारोह में देश भर के पत्रकार और बड़ी संख्‍या में इंदौर के गणमान्‍य व्‍यक्ति मौजूद थे.

उपराष्‍ट्रपति ने कहा कि पत्रकारिता के सामने अनेक चुनौतियां हैं. पेड न्‍यूज, संपादकों की अखबार और चैनलों में घटती हैसियत, विश्‍वसनीयता और पारदर्शिता बहाल करने की चुनौती इनमें शामिल हैं. उन्‍होंने कहा कि असली खतरा पत्रकारों पर पड़ने वाले दबाव नहीं बल्कि मीडिया के लोगों का सत्‍ता के लोभ में फंसना है. उपराष्‍ट्रपति ने कहा कि देश में मीडिया को विनियमित करने वाली इकलौती सांविधिक और अर्द्घन्‍यायिक संस्‍था प्रेस परिषद के पास वे शक्तियां नहीं हैं,‍ जिनके बूते वह सजा दे सके या पेशेवराना व नैतिक उसूलों का उल्‍लंघन करने वालों से अपने निर्देशों का पालन करा सके. राज्‍यपाल रामेश्‍वर ठाकुर ने भाषाई पत्रकारिता की भूमिका की सराहना की.

मुख्‍यमत्री शिवराज सिंह चौहान ने पत्रकारों से प्रभाष जोशी  की निर्भीक परंपरा को आगे बढ़ाने की अपील करते हुए कहा कि पत्रकारों की जिम्‍मेदारी बहुत ज्‍यादा है. उन्‍हें भ्रष्‍टाचार का पर्दाफाश करने में बड़ी भूमिका अदा करनी चाहिए. इसी के साथ आतंकवाद पर खबर लिखते समय सयंमित रहना चाहिए. जनहित की नीतियों व योजनाओं का लाभ आम आदमी तक पहुंच रहा है या नहीं इस पर भी नजर रखना पत्रकारों की जिम्‍मेदारी होनी चाहिए.

समारोह में प्रभाष जोशी पर आधारित तीन पुस्‍तकों ‘प्रभाष पर्व- प्रभाष जोशी की जिंदगी और पत्रकारिता की दुनिया’, ‘शब्‍दों के दरवेश’  और ‘यादों में प्रभाष’ का लोकार्पण हुआ. इसके पूर्व भाषाई पत्रकारिता महोत्‍सव में ‘आज के संदर्भ में मीडिया’ सत्र में आलोचक नामवर सिंह ने कहा कि आजादी के समय पत्रकार जेल जाने के लिए तैयार रहते थे, लेकिन अब समय बदल चुका है. अखबारों में संपादक नाम की संस्‍था खत्‍म हो गई है. स्थिति यह है कि अखबारों की भाषा भी भ्रष्‍ट हो चुकी है. साहस और शक्ति के साथ इसका मुकाबला करना होगा. यही प्रभाष परंपरा की मांग है.

पत्रकार और सांसद एचके दुआ ने पत्रकारिता, राजनीति और नौकरशाही में गिरते हुए स्‍तर पर चिंता जताई. राहुल देव ने कहा कि आज से चालीस साल बाद भाषाई पत्रकारिता लुप्‍त हो जाएगी. भाषाएं अंग्रेजी का अनुसरण कर रही हैं.  ओम थानवी ने ‘नए दौर के संपादक’ विषय पर कहा कि संपादक अपनी भूमिका भूल गए हैं. उनमें प्रधानमंत्री के पास पहुंचने की होड़ लग गई है. संवाददाता को दरकिनार कर रहे हैं और मालिकों के ब्रांड अम्‍बेसडर बनना ज्‍यादा बेहतर समझ रहे हैं.

‘पेड न्‍यूज’ पर पत्रकार प्रणंजय गुहा ठाकुरता ने कहा कि व्‍यक्तिगत भ्रष्‍टाचार संस्‍थागत हो गया है. पत्रकार वॉच डॉग से लैप डॉग बन गया है. उन्‍होंने कहा कि प्रभाष जोशी की पेड न्यूज के खिलाफ लड़ाई का नतीजा यह निकला की चुनाव आयोग ने अपनी आचार संहिता में पेड न्‍यूज को चुनाव खर्च में शामिल किया. ‘प्रभात खबर’ के प्रधान संपादक हरिवंश ने ‘विश्‍वसनीय पत्रकारिता की चुनौती’ पर अखबारों के आर्थिक स्रोत के बारे में समान नीति निर्धारित किए जाने का सुझाव दिया. इसी के साथ पत्रकारिता में आए आधुनिक बदलावों से भाषाई पत्रकारों को प्रशिक्षित करने का आग्रह करते हुए सामाजिक सरोकार से पत्रकारों के जुड़ने की अपील की.

पत्रकार और शिक्षक रामशरण जोशी ने तीसरे प्रेस आयोग की आवश्‍यकता विषय पर अपना आलेख पढ़ा. उन्‍होंने कहा कि कारपोरेट सेक्‍टर ने पहले सरकार को अब मीडिया को हाइजैक कर लिया है. उन्‍होंने पेड न्‍यूज को मीडिया फिक्सिंग का नाम दिया. इसी विषय पर प्रभाष परंपरा के प्रबंध न्‍यायी और वरिष्‍ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने तीसरे प्रेस आयोग के गठन का प्रस्‍ताव रखा, जिस पर सदन में मौजूद सदस्‍यों ने हाथ उठाकर अपनी सहमति प्रकट की. इसके साथ तीसरे प्रेस आयोग के गठन की मांग के समर्थन में शनिवार को इंदौर में राजेंद्र माथुर की प्रतिमा से गणेश शंकर विद्यार्थी की प्रतिमा तक पैदल मार्च किए जाने का एलान किया गया.

उद्घाटन समारोह के बाद शुभा मुदगल का गायन हुआ. समारोह की शुरुआत कुमार गंधर्व के पोते भवनेश कोमल कलि के रौग भैरव के गायन से हुई. उन्‍होंने इस अवसर पर गुरु महिमा पर एक गीत प्रस्‍तुत किया. उत्‍सव का आयोजन प्रभाष परंपरा न्‍यास और इंदौर प्रेस क्‍लब ने किया है. शनिवार को इस आयोजन में ‘जल, जंगल, जमीन और जनांदोलन’ व ‘क्रिकेट का बदलता स्‍वरूप नायडू से धोनी तक’ पर चर्चा होगी. समापन समारोह में सुप्रीम कोर्ट के न्‍यायाधीश मार्कंडेय काटजू, पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी और पूर्व मुख्‍यमंत्री दिग्विजय सिंह शामिल होंगे. साभार : जनसत्‍ता

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Comments on “पत्रकारिता की पेशागत चिंताएं दूर करे मीडिया : उपराष्‍ट्रपति

  • anamisharanbabal says:

    उपराष्ट्रपति द्वारा मीडिया की लगातार खराब हालत पर चिंता करना स्वागत योग्य कदम है।मीडिया की खराब हालात को लेकर वे भी परेशान हैं और इसमें सुधार की अपेक्षा करते और रखते है। मगर लाख टके का यही सवाल है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन डाले?

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  • राजकुमार साहू, जांजगीर छत्तीसगढ़ says:

    मीडिया की बदहाली निश्चित ही दबाव के कारण नहीं है, बल्कि सत्ता के नजदीक रहने की ललक भी है। साथ ही मीडिया में संपादक न होकर, अब प्रबंध संपादक का नया पद अपने फायदे के लिए सृजन किया गया है। यह भी एक गंभीर बात है, जिसके कारण पत्रकारिता मिशन कहां रह जाएगी, जहां मैनेज व बजट की बात हो। ऐसे में बड़ा मुद्दा यह है कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों आई ? जाहिर सी बात है कि मीडिया में अर्थतंत्र पूरी तरह हावी हो गया है और यही कारण है कि मीडिया भी अब उद्योग बनता जा रहा है और बड़े-बड़े रईस यहीं अपना पैसा लगा रहे हैं। इसमें उनका दूसरा मकसद सरकार पर दबाव बनाना भी है और अपनी काली करतूत छुपाना भी है। अधिकांश शहरों में ऐसे लोग मीडिया हाउस खोल रखे हैं, जो धनपशु बनने की पूरी योग्यता रखते हैं और वही अपनी धौंस जमाने मीडिया को हथियार बना रहे हैं। वास्तव में साफ-सुथरी पत्रकारिता करने वाले तो आज भी वहीं हैं और उनका मिशन भी है, मगर ऐसे लोगों को उंगली में गिनी जा सकती है। कुछ लोग अर्थतंत्र के आगे झुकने मजबूर हैं। अभी जैसा हाल मीडिया में है, उससे तो लगता है, हालात और बिगड़ने वाले हैं ?

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  • भई, बबल साहब
    समय के साथ चलने वाला ही सिकंदर है। कहने को तो बहुत कुछ है पर हकीकत क्या है इससे तो आप वाकिफ है ही। जहां तक उपराष्ट्रपति महोदय की बात है तो उससे तो हम भी इत्तफाक रखते हैं पर मंच पर से चिंता व्यक्त कर भर देने से काम पूरा हो गया। उनके राज्यसभा चैनल की नियुक्ति प्रोसेस में क्या कुछ हुआ और उन्होंने उसके लिए अब तक क्या किया। भई, बात मानो, इन राजनेताओं को छोडो और अपने बारे में सोचो। ये तो ऐसे बरगलाएंगे कि आप और हम तो चकरघिन्नी खाते रह जाएंगे। :):);)

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