‘पत्रकारों को जो पूरा वेतन नहीं देते, उन अखबारों का विज्ञापन बंद करें’

‘पत्रकारों को जो पूरा वेतन नहीं देते, उन अखबारों का विज्ञापन बंद करें।’  तकरीबन बारह साल पहले राज्यसभा में सांसद ओंकार सिंह लखावत ने सरकार के सामने यह मुद्दा उठाया था। सांसद संजय निरूपम ने इसका पुरजोर समर्थन किया परंतु हालात आज भी जस के तस हैं। उस समय मनिसाना आयोग की सिफारिशों को लागू करने को लेकर बहस जारी थी। इसके बाद और नए वेतन बोर्ड आ गए।

पत्रकारों को पूरे वेतन पर ना तब कोई कार्रवाई हुई और ना ही आज होती नजर आ रही है। संसद में होने वाली चर्चाओं के प्रति भी सरकारें कितनी बेरूखी अपनाती हैं, यह इसका एक उदाहरण मात्र है। सांसद ओंकार सिंह लखावत ने अपने कार्यकाल में राज्यसभा में उठाए गए मुद्दों पर एक पुस्तक ‘बोल सांसद बोल, युग चारण बनकर बोल’  प्रकाशित की है। इसी पुस्तक से अंश यहां दिया जा रहा है। मार्च 1999 में उठाया गया यह मुद्दा हूबहू इस तरह है-

SPECIAL MENTIONS

DELAY IN IMPLEMENTATION OF MENISANA AYOG REPORT AND SUBSEQUENT DELAY IN INCREASE IN WAGES OF JOURNALISTS AND MEDIA PROFESSIONALS.

श्री ओंकार सिंह लखावत : सभापति महोदय, एक विशेष उल्लेख के द्वारा मैं एक महत्वपूर्ण विषय की ओर सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। सभापति महोदय, इस देश में समाचार-पत्रों से जुडे़ हुए पत्रकार, दृश्य-श्रव्य मीडिया से जुड़े हुए पत्रकार, समाचार पत्रिकाओं से जुडे़ हुए पत्रकार हैं, जिनके वेतनमान में पिछले दस वर्षों से किसी तरह का कोई रिवीजन नहीं हुआ है। जो अंतरिम सहायता दी गई थी, वह भी बहुत कम थी। आज उनकी स्थिति यह है कि उनके लिए घर-गृहस्थी चलाना मुश्किल हो रहा है, आर्थिक तंगी इतनी है कि एक स्वतंत्र पत्रकार के नाते वे अपनी भूमिका निभाने के लिए अनेक कष्ट भुगत रहे हैं। इसीलिए मणिसाना आयोग की बात की गई थी। उसने इतना अधिक समय ले लिया तथा उसकी रिपोर्ट का क्या हुआ, इस पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही है।

सभापति महोदय, मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूं कि बच्छावत आयोग को जब लागू किया गया तो इस देश के 90 प्रतिशत अखबारों ने उसकी रिपोर्ट को लागू नहीं किया। आज भी पत्रकारों को उसके अनुसार वेतन नहीं मिल रहा है। इस संदर्भ में मैं आपको एक सुझाव देना चाहूंगा कि यदि कोई पत्रकारों को उनके वेतनमान के अनुसार वेतन न दे तो उन अखबार के मालिकों के उपर केवल दो सौ, तीन सौ, चार सौ रुपए का जुर्माना होता है, यह भी प्रभावी रूप से लागू नहीं हो रहा है। मेरा इस बारे में सुझाव है कि बच्छावत आयोग की रिपोर्ट या भविष्य में जितने भी रिपोर्ट्स आएं, उनके अनुसार यदि समाचार-पत्रों के मालिक अपने पत्रकारों को वेतन न दें तो उन समाचार-पत्रों के लिए भारत सरकार से संबंधित और राज्य सरकार या और जितने उपक्रम हैं, उनके विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। मेरा दूसरा सुझाव है कि वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट में संशोधन करके सुचारू रूप से कठोर दंड की व्यवस्था की जानी चाहिए, यही आपसे निवेदन है।

श्री संजय निरूपम : सभापति महोदय, श्री ओंकार सिंह लखावत ने जो विषय रखा है पत्रकारों के वेतन के संदर्भ में मैं स्वयं को उससे संबद्ध करते हुए माननीय श्रम मंत्री महोदय का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि 22 फरवरी 1999 को उन्होंने बयान दिया था, जो अखबार में भी आया था और जिसकी एक कटिंग मेरे पास है-

‘Wage Board Report by March 31st % The Menisana Singh Wage Board for working journalist and non-working journalists will submit its final report by March 31st’, Union Labour Minister Satyanarayan Jatia said on Sunday.’

राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट.

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Comments on “‘पत्रकारों को जो पूरा वेतन नहीं देते, उन अखबारों का विज्ञापन बंद करें’

  • गणेश प्रसाद झा says:

    मैं अपने साथी संजय निरूपम जी को एक पत्र लिखकर उनसे निवेदन करने जा रहा हूं कि इस बार फिर से सक्रिय हुआ जाए और वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन न देनेवाले अखबारों का विज्ञापन बंद कराने की बात को फिर से संसद में उठाया जाए. इसके लिए प्रधानमंत्री, श्रम मंत्री और सूचना प्रसारण मंत्री को लिखा जाए और इस पत्र की एक-एक प्रति राज्यों को मुख्यमंत्रियों को भी भेजी जाए. इस मुद्दे में एक बात यह भी जोड़ देना चाहता हूं कि टेलीविजन पत्रकारों को भी श्रमजीवी पत्रकारों की श्रेणी में लाने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं और वे भी वेजबोर्ड के दायरे में ले लिए जाएं ताकि जब भी कोई नया वेजबोर्ड आए तो टेलीविजन पत्रकार उसमें शामिल रहें और वेजबोर्ड की सिफारिशें टेलीविजन पत्रकारों पर भी लागू हो जाया करें. इसके साथ ही टेलीविजन पत्रकारों के काम के घंटे भी निर्धारित हों. अभी टेलीविजन पत्रकारों से 9 घंटे काम लिया जाता है, यहां तक कि रात और देर रात की पालियों में भी टेलीविजन पत्रकारों को 9 घंटे काम करना पड़ता है जो पूरी तरह अनैतिक है. टेलीविजन पत्रकार पूरी रात काम पर होते हैं तो भी उन्हें 9 घंटे की अपनी ड्यूटी पूरी करनी पड़ती है. इसपर श्रम मंत्री को खास तौर पर लिखा जाए और जरूरी कदम उठाने को कहा जाए. टेलीविजन पत्रकारों को भी श्रमजीवी पत्रकार माना जाए और उनके काम के घंटे भी वहीं हों जो श्रमजीवी पत्रकार कानून के मुताबिक अखबारों में नियमानुसार 6 घंटे की है. जो अखबार दबाव डालकर और डरा-धमका कर श्रमजीवी पत्रकारों से आज 8 घंटे काम करवा रहे हैं उनपर सरकार कार्रवाई करे और इस गलत परंपरा को फौरन बंद कराए. पत्रकार संगठनों को इसपर भी गंभीरता से सोचना चाहिए. कायदे से तो सरकार को पत्रकारों पर ठेके पर नौकरी पर रखने की इस चल रही गलत परंपरा को बंद कराने के लिए जरूरी कदम उठाना चाहिए. हम इसे भी अपने मुद्दों में जोड़ कर चलें तो अच्छा. संसद में जो भी पत्रकार हैं उनसे इन मुद्दों को नए सिरे से उठाकर सरकार के पास रखने में खास सहयोग लिया जाए. मैं पत्रकारों से इन मुद्दों पर उनकी राय और इसे हम किस तरह मजबूत ढंग से सरकार के पास पहुंचा सकते हैं इन सभी बाकों पर उनकी महत्वपूर्ण राय एवं सुझाव लेना चाहता हूं. वे मुझे इमेल पर बताकर मेरी सहायता करें.
    गणेश प्रसाद झा
    ganeshprasadjha@gmail.com

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  • roshan sahu says:

    sab logon ka aapko is par smarthan milega….is baar bhee wage board lagoo karne men rukavaten dali ja rahi hain….kuchh kiya jana zaroori hai….

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  • UMESH KUMAR says:

    Media me sbke explotation ki baat hoti hai lekin media me kaam krne walon ka kitan shoshan hota hai yh koi nahi janta hai. patrakar kisi gou ke saman hai jo apne baare me apne paper me kuch bhi nahi likh skta hai,

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  • prakashkajodia says:

    फिर निशाने पर नवभारत
    सीबीआई ने मामला ईडी को सौंपा
    इंदौर। प्रदेश के शीर्ष अखबारों में शुमार रहे नवभारत अखबार के मालिकों द्वारा बैेंक आॅफ महाराष्ट्र के साथ की गई 14 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी का मामला सीबीआई ने प्रर्वतन निर्देशालय ईडी को सौंप दिया है। उल्लेखनीय है कि नवभारत प्रबंधन ने मशीन लगाने की एवज में बैंक आॅफ महाराष्ट्र से 14.17 करोड़ रुपए का लोन लिया था और उसे चार लोगों के नाम से फर्जी अकाउंट खोलकर करोड़ों रुपए डकार लिए थे। फर्जीवाड़े के तहत नवभारत समूह के पूर्व कांग्रेस सांसद प्रफल्ल माहेश्वरी,संदीप माहेश्वरी,संजीव माहेश्वरी से सीबीआई ने पूछताछ की थी। इस मामले में इंदौर से प्रकाशित एक अखबार में नवभारत प्रबंधन की पोल खोलती एक बड़ी रिपोर्ट प्रकाशित की गई है।
    कर्मचारियों का रुपया भी हड़प कर किया ट्रांसफर- उल्लेखनीय है कि नवभारत प्रबंधन ने बैेंक आॅफ महाराष्ट्र को करोड़ों रुपए की चपत लगाने के अलावा प्रेस में कार्यरत लोगों का भी लाखों रुपया डकार रखा है,जिसके चलते नवभारत प्रबंधन के खिलाफ श्रम न्यायालय में कई केस दर्ज हो गए हैं। कुछ मामलों में नवभारत के मालिाकों के खिलाफ वारंट भी निकल गए हैं वहीं पीएफ विभाग के अलावा हैल्थ एंड सेप्टी की ओर से भी बड़ी कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। पिछले वर्ष नवभारत प्रबंधन ने जिन चार उपसंपादकों को उनकी मेहनत का वेतन का लाखों रुपया दिए बगैर स्थानांतरण कर दिया था उन्होंने भी प्रबंधन पर केस दर्ज कर दिया है। साथ ही सीबीआई को पत्र लिखकर कार्रवाई में तेजी लाने का आग्रह किया है।

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  • prakashkajodia says:

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