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फांकाकशी के शिकार सहारा के ब्यूरो आफिस

वाराणसी। राष्ट्रीय सहारा का प्रकाशन पूर्वांचल की सरजमीं वाराणसी से शुरू हुए एक माह से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है लेकिन सहारा से जुड़े इसके ब्यूरो आफिसों और आफिस से जुड़े एक्जीक्यूटिवों की आर्थिक हालत बद से बदतर हो चली है। सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि ब्यूरो आफिस में काम करने वाले एक्जीक्यूटिवों को वेतन तो दूर उनके आफिस खर्च भी नहीं भेजे जा रहे हैं। परिणास्वरुप अब सहारा कर्मी ही सहारा की आलोचना शुरू करने में पीछे नहीं हैं। पहले सहारा का प्रकाशन अगस्त महीने में होना था।

वाराणसी। राष्ट्रीय सहारा का प्रकाशन पूर्वांचल की सरजमीं वाराणसी से शुरू हुए एक माह से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है लेकिन सहारा से जुड़े इसके ब्यूरो आफिसों और आफिस से जुड़े एक्जीक्यूटिवों की आर्थिक हालत बद से बदतर हो चली है। सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि ब्यूरो आफिस में काम करने वाले एक्जीक्यूटिवों को वेतन तो दूर उनके आफिस खर्च भी नहीं भेजे जा रहे हैं। परिणास्वरुप अब सहारा कर्मी ही सहारा की आलोचना शुरू करने में पीछे नहीं हैं। पहले सहारा का प्रकाशन अगस्त महीने में होना था।

इसे दृष्टिगत करते हुए पूर्वांचल के तमाम जिलों में कार्यरत संवाददाताओं को अघोषित रूप से ब्यूरो इंचार्ज की जिम्मेदारी सौंपते हुए उन्हें ब्यूरो की व्यवस्था करने का निर्देश अप्रैल-मई में ही दे दिया गया था। इस निर्देश के बाद उत्साहित संवाददाताओं ने अपने बल पर विभिन्न जिलों में जहां वे कार्यरत रहे वहां अपनी जिम्मेदारी पर आफिस के लिए कमरा लेकर सहारा का बोर्ड लगाकर औपचारिक रूप से आफिस खोल दिया। कम्प्यूटर से लगायत फर्नीचर तक के आर्डर दे दिए गए। और, इन सामानों की सप्लाई भी ले ली गयी। सामानों के बिल-वाउचर पहले के संवाददाता और अब के ब्यूरो चीफों ने वाराणसी यूनिट को भेज दिया। लेकिन अभीतक अधिकांश लोगों का न तो बिल-वाउचर पास हो सका है और न किसी को वेतन भेजा गया है।

मऊ, गाजीपुर, बलिया, मिर्जापुर में सहारा से जुड़े एक्जीक्यूटिव या ब्यूरो चीफ परेशान हैं और स्थानीय स्तर पर उन्हें रोजाना तगादगीरों का सामना करना पड़ता है. सबसे बदतर स्थिति मिर्जापुर के ब्यूरो की है जहां का सबसे ज्यादा एमाउंट फंसा है और वहां का ब्यूरो चीफ वाराणसी आकर अपनी व्यथा कथा सुनाने के बाद भी खाली हाथ लौट जाता है। यह स्थिति तब है जब सहारा में किसी भी जिले में कोई स्टाफर नहीं भेजा है बल्कि पहले से कार्यरत संवाददाताओं को ही ब्यूरो इंचार्ज की जिम्मेदारी देकर उनसे स्थानीय स्तर पर ही सारी व्यवस्थाओं को बनाने का निर्देश दिया था।

अब सहारा से जुड़े लोग पत्रकार का धौंस देकर फिलहाल काम चला रहे हैं लेकिन उनकी अंतरात्मा सहारा के रवैये से बेहद दुखी है। ये तो रही बात सहारा के ब्यूरो आफिसों की। यहां वाराणसी में सहारा के प्रकाशन से पूर्व उसके प्रचार के लिए घूम रहे वाहनों पर लदकर प्रचार करने वालों का भी कुछ यही हाल है। बैनर, पोस्टर तथा पीसीसी करने वाली लड़कियों के अलावा वाउचर पेयी लोग भी पैसे की प्रतीक्षा में हैं। धीरे धीरे सहारा के मायाजाल से लोग किनारा करना शुरू कर चुके हैं।   (साभार : पूर्वांचलदीप डॉट कॉम)

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0 Comments

  1. Rohitash sain

    December 20, 2010 at 5:18 am

    logo ko topi pehna ker bane kaeodpti subrtoray ka real face kab karenge ujagar

  2. बिल्‍लू

    December 20, 2010 at 6:36 am

    यह सहारा सब भी बेसहारा करके छोड़ेगा। भाग लो सभी।

  3. GHANSHYAM RAI

    December 20, 2010 at 10:13 am

    sahara khel ko hi sahara deta rhega ya hamare prtkar bheyan ko bhi . waise ganga ka ghat naaaaaan bahalane k liye kafi h bhukhe pet bhe log sahara se besahara ho jahoge. mera bhe bhi usk lanch hone ka entjar kr rha tha ab rajx… me h

  4. anamisharanbabal

    December 20, 2010 at 11:53 am

    kamal hai sahara india pariwar me aisa to nahi hona chahiye fir sahara sri to pani ki tarah paisa bahate lutate h aisi fakakasti ti sahara me ni posiable but kuchh aisa hi hai to ye sharamnak hai jise subrat roy bhi vvvv galat hi manege

  5. patrakar

    December 21, 2010 at 6:31 am

    MP men sahara samay me kya ho raha hai? do teen news mahine me lagati hai. 3000 bhi milate nahi.

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