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दुख-दर्द

बहराइच में पत्रकारों के साथ धक्‍कामुक्‍की एवं बदसलूकी

मंदिर तुड़वाने के आरोप पर पीडब्ल्‍यूडी के अधिशासी अभियंता का पक्ष जानने पहुंचे पत्रकारों से अधिशासी अभियंता के स्टाफ और उनके पाले चम्‍मचों ने बदसलूकी और डराने की कोशिश की. बहराइच के एल.आर.पी. कालोनी में स्थित शिव मंदिर को तोड़ने की जानकारी से इलाके में तनाव की आशंका फ़ैल गयी थी. इस मामले में यह बात भी खुलकर आ रही थी कि इस शिव मंदिर को तोड़ने का आदेश बहराइच पीडब्ल्‍यूडी के अधिशासी अभियंता ने दिया था.

मंदिर तुड़वाने के आरोप पर पीडब्ल्‍यूडी के अधिशासी अभियंता का पक्ष जानने पहुंचे पत्रकारों से अधिशासी अभियंता के स्टाफ और उनके पाले चम्‍मचों ने बदसलूकी और डराने की कोशिश की. बहराइच के एल.आर.पी. कालोनी में स्थित शिव मंदिर को तोड़ने की जानकारी से इलाके में तनाव की आशंका फ़ैल गयी थी. इस मामले में यह बात भी खुलकर आ रही थी कि इस शिव मंदिर को तोड़ने का आदेश बहराइच पीडब्ल्‍यूडी के अधिशासी अभियंता ने दिया था.

यह शिव मंदिर इस कालोनी में कई वर्षों से स्थित था और आस पास के लोगो के श्रद्धा का केन्द्र था. जब इस मंदिर के टूटने की सूचना शहर में फैली तो बीजेपी और कई हिन्दुवादी पार्टियों के नेता तथा प्रशासनिक अमला मौके पर पहुंचने लगा. लोगों अच्छी भीड़ भी वहां मौके पर जुट गयी. इस बात की खबर जब मीडिया को लगी तो प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार भी हालात का जायजा लेने वहां पहुँच गए.

वहां के तथ्यों और नेताओं के अनुसार जब यह जानकारी मीडिया में आई की इस मंदिर को तोड़ने का आदेश बहराइच पीडब्ल्‍यूडी के अधिशासी अभियंता ने दिया है,  जो स्वयं एक अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं,  तो इस घटना की संवेदनशीलता बहुत अहम हो गई. इस अहम मुद्दे पर गर्म होती राजनीति से जिले की शान्ति व्यवस्था भी बिगड़ सकती थी. बीजेपी के विधायक और अन्य संगठनों के नेताओं ने पत्रकारों के सामने पीडब्ल्‍यूडी के अधिशासी अभियंता के ऊपर सीधे आरोप लगाने शुरू कर दिए कि उन्होंने जानबूझकर अल्पसंख्यक समुदाय के होने के नाते इस मंदिर को ईष्‍यावश तुड़वाया है. इस मामले पर बीजेपी की ओर से जिलाधिकारी को एक पत्र भी दिया गया है,  जिस में अधिशासी अभियंता पर आरोप लगाए गए हैं. इसके अलावा विश्व हिंदू परिषद की ओर से संबंधित थाने को एक प्रार्थनापत्र भी दिया गया है. जिसमे अधिशासी अभियंता की नियत पर संदेह करते हुए उन पर कार्रवाई करने की बात की गयी है.

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कुछ पत्रकारों ने जब बहराइच कलक्ट्रेट के समीप स्थित पीडब्ल्‍यूडी के अधिशासी अभियंता के ऑफिस में जाकर उनसे जब इस बारे में जानना चाहा तो वहां बताया गया कि साहब लखनऊ गए हुए हैं. इस पर जब प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों ने अधिशासी अभियंता के बंद कमरे की फोटो और विजुअल लेने लगे तभी अधिशासी अभियंता के स्टाफ के लोगों और ऑफिस के बाहर के चम्‍मचों ने पत्रकारों को घेर लिया साथ ही बदतमीजी तथा धक्का मुक्की करने लगे,  इसी के साथ ही उन लोगों ने पत्रकारों को डराने की भी कोशिश की. उनकी इस कोशिश के पीछे मंतव्य यही था कि इन लोगों को बंधक बनाकर डरा दिया जाए और इस घटना पर पर्दा डाल दिया जाए. पत्रकारों को धमकाने में यह लोग इतना ज्यादा जुट गए कि करीब पूरे ऑफिस ने पत्रकारों को ऐसे घेर लिया जैसे यह पत्रकार ना होकर बकरी हैं और यह लोग कसाई.

पीडब्ल्‍यूडी जैसे मालदार विभाग के पास ठेकेदारों के रूप कई सारे प्रभावशाली लोग होते हैं जो इस विभाग से मिलने वाले लाभ के लिए अपने दायित्वों को भूलकर उनकी जी हजूरी करने लगते हैं. इन्ही स्थानीय लोगों की शह पर यह विभाग मीडिया की आवाज़ दबाने की पूरी कोशिश में जुट गया है. जहां एक ओर मुख्यमंत्री मीडिया से मधुर सम्बन्ध की बात कहती हैं वहीं बहराइच पीडब्ल्‍यूडी विभाग ने मीडिया को एक तरह से बंधक बनाने की कोशिश की है. पत्रकारों ने बहराइच पीडब्ल्‍यूडी के अधिशासी अभियंता के स्टाफ की बदसलूकी की इस घटना की जानकारी प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया को भी देने की बात कही है. अब देखना है प्रेस कौंसिल मीडिया की स्वतंत्रता पर हुए हमले पर बहराइच पीडब्ल्‍यूडी के अधिशासी अभियंता और उनके बिगडै़ल स्टाफ पर क्या कार्रवाई करता है.

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0 Comments

  1. Abhishek Sharma

    August 1, 2011 at 12:00 pm

    पत्रकारों के साथ लगातार हो रहे हमले से साफ जाहिर होता है कि स्वतंत्र कही जाने वाली मीडिया अब सुरक्षित नहीं है/ अब वक्त है कुछ ठोस कदम उठाने का……….

  2. Anil Tiwari

    August 2, 2011 at 5:27 pm

    पत्रकारों के साथ इस प्रकार का व्यवहार करने के हिम्मत तभी होती है. जब जिले के पत्रकारों में अपने पेशे के प्रति को एकजुटता नहीं दिखती है. बहराइच में पत्रकारिता के नाम पर सबके अपने अहम है, जिसके चलते एक दुसरे के साथ कुछ होने पर सहानुभूति तो दूर उलटे ऐसे मामलों अपने को बड़ा साबित करने की होड मच जाती है. हर पत्रकार अपने नफे नुक्सान को तौलकर ही आगे आता है. जिससे पत्रकारिता भी कई बार धूमिल हो जाती है.

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