बाजार-बिजनेस के घनचक्कर में नपुंसक हुए अखबार और पत्रकार

उनका नाम जाहिर करना उचित नहीं है क्योंकि मामला उनके बच्चे के भविष्य का है। इतना जान लीजिए कि वे मीडिया मैनेजमेंट से जुडे़ हैं और दैनिक भास्कर तथा राजस्थान पत्रिका प्रबंधन में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। कुछ और भी अखबारों को पटरी पर दौड़ाने में मददगार रहे हैं। भ्रष्टाचार उन्हें भी वैसे ही बेचैन किए रहता है जैसे कई भड़ासियों को करता है। पिछले दिनों वे मीडिया की उपेक्षा के कड़े अनुभव से गुजरे। व्यथित दिल से उन्होंने अपने को यह सारा किस्सा सुना डाला।

मीडिया मैनेजमेंट की नौकरी छोड़ने के बाद अब वे इवेंट और मीडिया कन्सलटेंसी का अपना काम करते हैं। उनका बेटा जयपुर की एक अच्छी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ता है। स्कूल वालों ने पिछले दिनों लागू एक नियम से बच्चों को एक बड़ी कंपनी के महंगे जूते खरीदना अनिवार्य कर दिया। जूतों की कीमत करीब सत्रह सौ रूपए थी। कंपनी वालों ने स्कूल में ही जूते बेचने का काउंटर लगा दिया ताकि और किसी दूसरे डीलर के यहां बच्चे ना पहुंच जाएं। गौरतलब बात यह कि जूते सिर्फ सप्ताह में एक दिन शनिवार को ही होने वाली शिक्षेत्तर गतिविधियों के लिए थे।

स्कूलों के इस मौखिक फरमान पर अपने मित्र जा पहुंचे अखबारों के दफ्तर। राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, पंजाब केसरी आदि-आदि में अपने संपर्क टटोलकर उन्होंने सारा माजरा समझाया और स्कूलों के इस भ्रष्टाचार को उजागर करने की गुहार लगाई। कुछ ने कहा लिखकर दे दो, अभी छाप देंगे। जब उन्हें बताया गया कि अगर लिखकर दे दिया तो वे बच्चे का भविष्य चौपट कर देंगे। परंतु यह सीधी-सादी दलील कई संपादकों के गले बड़े ही अनमने तरीके से उतरी। खैर, पंजाब केसरी ने मामले को अच्छी तरह से खबर बनाकर पेश कर दिया। तेजी से बढ़ते अखबार से खबर गायब थी।  ‘आप तो सब जानते हो,’ ‘मेरी मजबूरी समझो प्लीज,’ ‘वास्तव में खबर तो बहुत अच्छी है परंतु’ जैसे रस्मी अंदाजों के साथ इशारा कर दिया गया कि नहीं छप सकती। राजस्थान के बाद अब दूसरे राज्य में नंबर वन तो एक कदम आगे निकल गया। इशारा कर दिया मार्केटिंग टीम को कि भइया आपका मामला है, देख लो जरा। और अगले दिन उस कंपनी का एक विज्ञापन छप गया।

व्यथित के साथ अब गुस्से और खीझ से भरे मित्र वापस जा पहुंचे अखबार के दफ्तर, यह क्या किया। जवाब वही रटा रटाया। सर, आप भी तो पहले यहीं थे। सारा सिस्टम आपको पता है। आप जानते हैं, हमारे हाथ में क्या है। क्या लेंगे, कॉफी या कुछ ठंडा। मायूस मन के साथ वे लौट आए। परंतु उन्होंने ठान रखा था कि कुछ तो करना है। स्कूल वालों की इस मनमानी को रोकना है। उन्होंने संपर्क किया राजस्थान के सेल्स टैक्स कमिशनर को। अपना परिचय दिया और मामला बताया। अगले दिन जूता कंपनी के डीलर की स्कूल स्थित दुकान पर छापा पड़ गया। बिक्री कर चोरी के आरोप में उस पर अच्छा खासा जुर्माना लगा दिया गया। जूता कंपनी ने जुर्माना अदा कर दिया।

परंतु स्कूल का कुछ नहीं बिगड़ा। उसकी दादागिरी चलती रही और आज भी जारी है। मित्र बेचारे परेशान है कि वे करें तो क्या करें। अगर खुलकर सामने आते हैं तो बच्चे का भविष्य आड़े आ जाता है। बच्चा तो बच्चा, बच्चे की मां भी उनसे गुस्सा हो जाएगी। कहानी घर-घर की से बचा है कोई। ईमानदारी है कि मन को चैन नहीं मिल पा रहा है, पारिवारिक मजबूरी यह कि कुछ कर नहीं पा रहे।

मित्रों, यह एक असली व्यथा है, कोई फर्जी पारिवारिक उलझनों या कालमों.. अब मैं क्या करूं या दुखवा मैं कासे कहूं जैसी कॉलम की कहानी नहीं। जब एक पूर्व मीडिया मैनेजर के साथ ही मीडिया ऐसे उपेक्षित बर्ताव पर उतर आए तो उन्हें क्या करना चाहिए। कृप्या अपनी सलाह जरूर दें क्योंकि सलाह किसी की बपौती नहीं होती और हो सकता है यह सलाह भविष्य में उनके ही क्यों, उन जैसे कई के काम आ जाए।

राजेंद्र हाड़ाराजेंद्र हाड़ा राजस्थान के अजमेर के निवासी हैं. करीब दो दशक तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे. अब पूर्णकालिक वकील हैं. यदा-कदा लेखन भी करते हैं. लॉ और जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स को पढ़ा भी रहे हैं.

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Comments on “बाजार-बिजनेस के घनचक्कर में नपुंसक हुए अखबार और पत्रकार

  • Rajiv Jetly says:

    U r right Mr. Hada. This is quite old information now School goes to 1 nxt step to promot shoe co. Many school doing this. In jaipur Seedling Modern High School Maharani Farm, Seedling School Jawahar Nagar & DPS doing these activities. Even they clearly mentioned in school diary for ” Nike” Brand. IN the next step School management palnning to inviting celebrity of IPL & convenving student that only those student who wear nike shoes can meet eith the player. State govt. Education minister sleeping with blind eyes. Many parents are now thinkig to opose & go to concern govt. authority as well as court etc.

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  • Y.K. Gupta says:

    What a joke. These r school or Multi brand stores. Is these shoes will help in stydy or upgrade brain of student or their intellegency. Where is Mr. Kapol Sibbal. 25% poor student who will get admisson in the shool as per govt. policy is they will be able to wear these shoes?

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  • govind goyal says:

    ये तो हर शहर मे होता है। ये तो व्यापार की बात है। हम तो कलेक्टर ,एसपी तक की आलोचना नहीं करते ।

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