बिल्ली क्यों चली हज को?

मुकेश कुमार: जग बौराना : इन दिनों ये कहावत बहुत चल रही है…. सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली….. इस कहावत को सुनकर जिज्ञासुओं के मन में ये सवाल उठना लाज़िमी है कि आख़िर बिल्ली को हज जाने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या उसमें भक्ति भाव जाग गया कि उसने आव देखा न ताव और हज पर जाने का फैसला कर लिया…..

या फिर उसे अपने किए पर पश्चाताप हो रहा था और वह हज करके प्रायश्चित करना चाहती थी? अगर कहावत की अंतर्ध्वनि सुनें तो ऐसा नहीं लगता……उससे तो यही प्रतीत होता है कि बिल्ली का मक़सद हज करना नहीं कुछ और था…..ये इस बात से भी ज़ाहिर होता है कि वह चुपचाप हज करने नहीं जा रही, उसने इसका पूरा प्रचार किया है……सारे प्राणी जगत को मालूम है कि बिल्ली हज को जा रही है और वह भी सौ चूहे खाने के बाद….. इस कहावत से ये बात भी साफ़ है कि इसे  बनाने वाला बिल्ली को अच्छी तरह से जानता था। वह उसके चाल-चरित्र-चेहरा से भली-भाँति वाकिफ़ था इसलिए उसने एक कहावत गढ़ी और बिल्ली की नीयत और इरादे से सबको वाकिफ़ भी करवा दिया।

ये भी स्पष्ट है कि कहावतकार बिल्ली-पक्ष का नहीं था……वह बिल्ली विरोधी था और उसे बिल्ली की नीयत में खोट नज़र आ रहा था…..शायद उसका ताल्लुक चूहा-समाज से हो और वह इस बात से दुखी हो कि बिल्ली ने उसके कई मित्रों, परिचितों, परिजनों को हजम कर लिया। ये भी हो सकता है कि इस तज़ुर्बे ने उसकी आँखें खोल दी हों और उसने अपनी चूहा बिरादरी को बिल्ली से बचाने के लिए ये कहावत गढ़ डाली हो। वैसे इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कहावत रचने वाला चूहा न हो मगर चूहों का हमदर्द हो, उनका खैरख्वाह हो।

एक संभावना  ये है कि बिल्ली चूहा-भक्षण  की वजह से कुख्यात हो गई हो और चूहों ने उसके आसपास  फटकना ही बंद कर दिया हो।  ऐसा भी हो सकता है कि अति चूहा भक्षण से बिल्ली के मुखमंडल और आंगिक भाषा में एक तरह की आक्रामकता और खूंख्वारपन आ गया हो जो कि चूहों को डराता हो। ज़ाहिर सी बात है कि इससे बिल्ली को चूहों के लाले पड़ने लगे हों, उसके भूखे मरने की नौबत आने लगी हो। लिहाज़ा उसने अपने सखी-बिल्लियों से सलाह की हो और फिर अपनी इमेज बदलने के लिए हज पर जाने की घोषणा कर दी हो। उसे लगा हो कि इससे चूहों को लगेगा कि बिल्ली का ह्रदय परिवर्तन हो गया है और अब उसके पास जाने में कोई ख़तरा नहीं है। इस तरह वह संत के चोले में चूहा-भक्षण करती रहेगी।

उसकी सखी बिल्लियों  ने उसे बताया कि यही तरकीब एक बार एक बगुला ने भी लगाई थी……मछलियाँ जब उससे डरकर भागने लगीं और भूखों मरने की नौबत आ गई तो उसने भगत का रूप धर लिया……वह बगुलाभगत ध्यान की मुद्रा में रहता था और जैसे ही मछलियाँ उस पर भरोसा करके करीब आती थीं वह उन्हें अपना शिकार बना लेता था।

लेकिन जिज्ञासुओं को ये बात समझ में नहीं आई कि इमेज बिल्डिंग के लिए बिल्ली ने हज यात्रा के बारे में ही क्यों सोचा…..वह तीन दिन का उपवास भी तो कर सकती थी…..? इसके लिए मीलों की यात्रा करने की मशक्कत करने की क्या ज़रूरत थी। आराम से एक जगह बैठती, लेमन जूस वगैरा पीती रहती। इससे बिल्ली समाज में उसकी धाक भी बन जाती…..बड़ी-बड़ी बिल्लियाँ और बिल्ले आकर उससे मिलते और हो सकता है कि वह उनकी मुखिया भी बन जाती।

अगर किसी को इसका जवाब सूझे तो हमें भी बताए।

व्‍यंग्‍य लेखक मुकेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. वे इन दिनों नए लांच हिंदी के राष्ट्रीय न्यूज चैनल ‘न्यूज एक्सप्रेस’ के हेड के रूप में कार्यरत हैं. मुकेश कुमार से संपर्क mukeshkabir@gmail.com या mukeshkumar@newsexpress.tv के जरिए किया जा सकता है.

Comments on “बिल्ली क्यों चली हज को?

  • श्रीकांत सौरभ says:

    बहुत बढ़िया मुकेश भाई ! आपका व्यंग्य गुजरात के सीएम नरेन्द्र मोदी पर काफी सटीक लगता है .

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  • ऋतुपर्ण दवे says:

    दरअसल दौर ही कुछ ऐसा चल रहा है जिसमें बिल्ली, चूहों और बगुलों की नीयत पर शक हो ही जाता है। जमाना हाईब्रिड का भी है। एक से एक एक्सपेरीमेंट हो रहे हैं। वैज्ञानिक युग में अगर राजनीतिज्ञ भी एक्सपेरीमेंट कर रहे हैं तो क्या बुरा ??? रही बात सौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली उपवास क्यों नहीं मुझे लगता है हज के बहाने मीलों की यात्रा में खाए गए चूहें हजम करने की मंशा रही हो। रही बात उपवास की तो ज्यादा खा लेने के बाद इन्डाइजेशन से बचा जा सके। आप तो बहुत सीनियर हैं। आप ही बताएं उत्तर हमारा उत्तर देना सूरज को दिया दिखाना ही होगा।

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  • sir bhut badiya likhe hai
    apne ko famous karne ke liye 6 carod kharch kiya berojgaron ko koi rojgar nahi khul sakta tha abhi to cm hai agar pm ban gaye to kiya hoga greeb janta ke paise ka

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  • अशोक गुप्ता says:

    लेख विचारों को उत्तेजना देने वाला है .
    हज जाना आसान है , बगुला भगत होना आसान है , पर भूखा रहना आसान नहीं है , कभी भूखे रहने पर कोई कहावत सुनी .

    कमियां , लालच तो हरेक में होती हैं. पर इस बात को भी नहीं झुटलाया जा सकता कि गुजरात ने उन्नति बहुत की है.

    दासानुदास

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  • अगर ये व्यंग्य मुकेश कुमार ने अपने ऊपर लिखा है तो वाकई बेहतरीन है। बिल्ली की बात चल ही निकली है तो एक कहावत और याद आ रही है….आखिर बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन।

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  • Jasbir chawla says:

    Billi ko Haj par jaane ki jarurat hi nahee hai.Suna nahee -“Dag achen hain.Daaman par lage dag kabhee bhee dhul naheen sakenge.yeh dag nahee-Tamga hai,goodwill hai.Teen dino ka drama Dag ko aur ubharega,aur ham chahte bhe yahin hain.Dag mite nahee,dag mitenge bhee nahee,par charchaa dag mitane ki hoti rahe.Dag achen hain?

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  • अरे आपने उस बिल्ली के बारे मे एक शब्द नही लिखा जो काश्मीर मे पंजाब मे लाखो आदमियो को खा गई .. आदमखोर बिल्ली को छोडकर चूहे खाने वाली बिल्ली की कहानी बताना .. बचकानी बात है न .. ?

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  • Deepak Tiwari says:

    गांधी जी और ठरकी नेहरु ने १९४७ में कुछ चूहों को भारत में रहने की आजादी दी थी, आज यही चूहे हमारी कब्र खोद रहे है तो कोई तो बिल्ली चाहिए न चूहों से बचने के लिए! और वैसे भी आप में से कोई भी chuha नहीं पलेगा सो बिल्ली पालने में क्या बुराई है

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  • SHERBAHADUR SINGH says:

    apach ke bad upavas hi eak matra rasta shes tha dusara koyi vikalp hi nahi . dusare shabdo me kahi nigahe kahi pe nishana. aapki soch sahi hai.

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  • अगर कुछ घटनाओं को छोड़ दे तो नरेन्द्र मोदी ने अपने राज्य के विकास के लिए इतना कुछ किया है की उसकी मिसाल दी जा सकती है. लेकिन इस समय उनका उपवास करना महज एक नौटंकी ही लगा. उनकी लोकप्रियता उनके प्रदेश में और देश में भी इतनी है कि इसके लिए उन्हें इस सस्ते और घटिया उपवास कि आवश्यकता नहीं थी. अब ये अलग बात है कि सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने कि उनकी ये नौटंकी प्रदेश को कितनी महंगी पड़ी.

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  • Mukesh ji,
    aaj ke jamane main chuha billi ka khel badal gaya hai….kahawat hai sau chuha kha ker billi chali haj per…..mudda sau chuhon ka hai…..ab aap haj karne walon se puchen ki haj per jaana kyun jaroori hai….kya jo Haj per /ya mandir jaate hain dudh ke dhule hote hain…..kyua unhone chuhe naheen khaye hote hain…..ye alag baat hai ki jiski jaisi kismat wasi uski chuhon ki ginti…aise ya kahawat se ye maloom chalta hai ki ..jab aap sau chuhon ko kha jaaye /paaye tab hi aapko haj per jane ke baare main soanchna chahiye….aapke liye sau chuhe khana ek basic requirement hai haj per jaane ke liye….tabhi aaj bhi haj per jaane walon ki sankhya pratishat ke hisaab se dekha jaaye to kaafi kam hai……yah ye batlata hai ki sau chuhon ko khana sabke bute ki baat naheen hai…..apni jindgi main log lage rahte hain…chuhon ko khane main …kinhi kinhi ka pura jiwan sirf isme beet jata hai ki …chuhon ko pakra kaise jaaye….khane ki baat to dur unhen chuhe dikhte bhi naheen hain……sharad yadav ji ke anusaar 80 % logono ko chuhon ko dekha bhi naseeeb naheen…..
    haj per jaane ki baat wo kaise kar sakte hain……aajkal chuhon ki aabadi bahut badh gayee hai ….chuhon kaa kaam hai ..anaj kha jaana…cheejon ko barbaad kar dena……fasal ko bhi barbaad karte hain..ye ….are desh ko bhi kha jaaye agar inka bas chale to……kisi chuhe ki maut agar bam dhamake main ho jaaye to sab mil ker ek ninda prastaw parit kar dena apna farj samajhte hain…….garrbi mitana inhe aata naheen ….inka naara hai …ki itni gareebee badhao ki gareeb mar jaaye…aur na rahenge gareeb na rahegi gareebi….tabhi anna jaise logon ko hajper jaane ki sujhti hai….kyun ki un jaise logon ke bute ke hi hai…sau chuhe khana…..
    SHUKRIYA……….

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