बिहार चुनाव का अनोखा हाल : अजय की ‘ चुनाव अथ बेताल कथा’

अजयपत्रकार अजय कुमार अपने सद्यः प्रकाशित पुस्तक “चुनाव : अथ बेताल कथा’’ को लेकर खासे चर्चे में है। बिहार की पत्रकारिता में लम्बे समय  से सक्रिय भूमिका सार्थकता के साथ निभाते आ रहे अजय की यह पहली पुस्तक है। प्रभात खबर से अपनी पत्रकारिता की शुरूआत करने वाले अजय, प्रभात खबर, पटना के स्थानीय संपादक भी बने। इसके बाद दैनिक हिन्दुस्तान, जमशेदपुर में स्थानीय संपादक का दायित्व निभाया। इन दिनों दैनिक हिन्दुस्तान, पटना में समन्वय संपादक के तौर पर कार्य करते हुए पत्रकारिता के मुकामों को सार्थक बनाने की पहल में जुटे हैं।

इसी कड़ी में उन्होंने बिहार विधान सभा चुनाव 2010 के दौरान संपादन कार्य का निवार्हन करते हुए रोजाना चुनावी सरगर्मी को लेकर ‘‘फिर बेतलवा डाल पर’’ कॉलम लिखना शुरू किया। पौराणिक पात्र विक्रम और बेताल के माध्यम से राजनीतिक मुद्दों के अलावा सामयिक व जनता के मुद्दों को उन्होंने अपने कॉलम में सहजता और सरलता के साथ शब्दों में पिरोराना शुरू किया। अजय ने ‘‘फिर बेतलवा डाल पर’’ के अस्सी कॉलम लिखे, जो ‘‘चुनाव : अथ बेताल कथा’’ के नाम से पुस्तक के रूप में आ गयी है।

‘‘चुनाव : अथ बेताल कथा’’ पुस्तक को वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। विशिष्ट शैली में अजय ने ‘‘फिर बेतलवा डाल पर’’ के एक-एक किस्से लिखे जो पुस्तक, ‘‘चुनावी : अथ बेताल कथा’’ में संजोया गया है। इस बार का बिहार विधान सभा चुनाव 2010 काफी लम्बा चला। राजनीतिक गलियारे में चुनावी उठा-पटक के साथ-साथ चुनावी प्रसंग की बहार रही। ऐसे में अजय ने बिहार विधानसभा चुनाव के खट्टे-मीठे प्रसंगों पर पैनी नजर रखी और विक्रम तथा बेताल के माध्यम से एक सूत्रधार की भूमिका में आते हुए, सहज व सरल आम जनों की भाषा में चुनावी प्रसंग को समेटा। हालांकि, यह काम रोज-रोज, इतना सरल नहीं था।

बतौर लेखक अपनी बात में ‘‘ फिर बेतलवा डाल पर ’’ कॉलम लिखे जाने के बारे में अजय कहते हैं कि चुनाव के दौरान चुनाव पेज पर लिखने का असाइनमेंट मिलने पर पत्रकार मन में कुछ अलग हट कर करने का द्वंद्व आया। जेहन में विक्रम और बेताल का पात्र के जरिये चुनावी प्रसंग को परोसने का ख्याल आया। कार्यकारी संपादक की स्वीकृति ने सवाल भी खड़े किये कि इसे रोज-रोज कैसे लिखा जायेगा। खैर ‘‘शर्म वाला केमिकल देह से निकल गया’’ शीर्षक से ‘‘फिर बेतलवा डाल पर’’ की शुरूआत हुई। एक के बाद एक बेताल के किस्से अखबार के पन्ने पर आने लगा। ‘‘फिर बेतलवा डाल पर’’ सिर्फ विक्रम-बेताल की कहानी नहीं बनी बल्कि आज के समय और लोकतंत्र के तार-तार होते राजनीतिक पहलुओं को रेखांकित किया गया है।

बेताल का चुनावी घोषण पत्र, टिकट के इंटव्यू में फेल हो गये एमके गांधी, विक्रम बन गया नत्था, चाप संस्कृति और चारण स्पर्श, अब बनेगी प्रायश्चित पार्टी सहित सभी कॉलम रोचक अंदाज में हैं। ‘‘फिर बेतलवा डाल पर’’ का किस्सा चुनाव समाप्ति के बाद लिखे गये अंतिम किस्त ‘‘काउंटिंग हो तो देहखुजौनी से बचियो’’ से किया गया, जिसमें लेखक ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को समझाया है।  यों तो ‘‘अथ बेताल कथा’’ कॉलम संग्रह है, लेकिन लेखन शैली व पुस्तक प्रस्तुति में एहसास नहीं होता। पुस्तक राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृकि सहित अन्य पहलुओं को समेटे हुए हैं।

पटना से संजय कुमार की रिपोर्ट.

अपने मोबाइल पर भड़ास की खबरें पाएं. इसके लिए Telegram एप्प इंस्टाल कर यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *