बड़ी मेहरबानी की ए राजा ने कि उन्होंने मंत्री पद खुद छोड़ दिया. अगर इतना हंगामा न मचता तो शान के साथ तैनात रहते कुछ और गुल खिलाने को. इससे बड़ा बेशर्मी का उदाहरण भला और क्या हो सकता है? घोटाला भी कोई मामूली नहीं. इतने रुपए से चार साल तक मनरेगा जैसी योजना चलाई जा सकती थी. दो साल तक गरीबों को पूरा राशन दिया जा सकता था. मगर राजा की अपनी जरूरतें इससे कहीं ज्यादा थी. इसे कहते हैं आम आदमी की सरकार. और दंड सिर्फ इतना कि मंत्री पद से हटा दिया. यह इस देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ राजा जैसे नेता और उन्हें संरक्षण देने वालों की कमी नहीं है. यह सिलसिला पहले भी चलता रहा है और शायद आगे भी चलता रहेगा.
इस देश का आम जनमानस पहले से ही उदास है. उसे राजनीति में अपना और अपने देश का कोई भविष्य नजर नहीं आता. उसे पता है चाहे यह हो या फिर वो ..यह सिलसिला रुकेगा नहीं. पैसे की भूख ने नेताओं की आत्मा ही मानों खत्म कर दी है. उन्हें देश के सरोकारों से कोई मतलब नहीं रहा. आम आदमी की समस्या, उसकी गरीबी, उसकी बेचारगी इनको नहीं दिखती. सब एक ही दौड़ में शामिल हैं कि किसी भी तरह से ज्यादा से ज्यादा पैसा बटोरो. उसे सब कुछ दांव पर लगा कर हासिल करो और जब हासिल हो जाये तो उसे स्विस बैंक में रख आओ. पूरा देश खोखला कर दिया इन भ्रष्ट नेताओ ने. रुपयों की हवस ने उनकी आँखों पर पट्टी बांध दी है. भूल गए हैं यह लोग कि इस देश के लोगों ने उन्हें किन आशाओं के साथ चुना है. कितने सपने होते है सरकार बनते समय कि अब उनकी जिंदगी में बदलाव आएगा, मगर हर बार राजा जैसा कोई नाम सामने आता है और सारे सपने एक साथ टूट जाते हैं.
सवाल यह भी है कि आखिर ऐसा क्यों होता है. क्यों आम आदमी ठगा जाता है. उसके सपनों के साथ खिलवाड़ किया जाता है. उसकी बात, उसके सपने सुनने वाला नेतृतव आखिर क्यों नहीं बन पाता. हर बार सत्ता ऐसे ही लोगों के हाथ में क्यों चली जाती है जो देश को बेचने को तैयार रहते हैं? लम्बा अरसा हो गया इस देश को देखे हुए कि किसी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया हो और उसका दामन पाक साफ़ रहा हो, तो क्या हम सब अभिशप्त है ऐसे लोगो को चुनने को? कही बदलाव की कोई आशा कभी हमारा दामन नहीं छुएगी? यह देश क्या इसी तरह के नाकारा लोगों के हाथों अपनी अस्मिता के साथ खिलवाड़ होने देगा? यह वो सवाल है जो किसी भी आम आदमी के मन में हमेशा हलचल मचाये रहते हैं. वो जानता है कि इन सवालों का जवाब उसे कहीं भी नहीं मिलेगा. वो सोचता है कि जब चुनाव होगा तो सबक सिखाएगा ऐसे लोगो को, मगर जब चुनाव आता है तो बड़ी सफाई से यह लोग आम आदमी को दूसरी चीजों में उलझा देते हैं. उसे समझाते हैं कि धरम और जाति का सवाल ज्यादा बड़ा होता है. सच भी यही होता है. जहा धरम और जाति का सवाल आता है वहीं बाकी सवाल पीछे छूट जाते हैं.
इस देश के लोगों ने तमाम दलों को और उनके नेताओं को देखा है. जो लोग देश भक्ति की अलख जगाते नहीं थकते थे, उनकी पार्टी के अध्यक्ष को सिर्फ एक लाख रुपए की रिश्वत लेते हुए देखा है. उनके रक्षा मंत्री को शहीदों के कफ़न के लिए मंगाए ताबूतों में कमीशन खाते देखा है. वो सोचते थे कि सिर्फ इंडिया शाइनिंग की बाते करके इस देश के लोगों को गुमराह किया जा सकता है सो लोगो ने भी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया. यह रास्ता तभी दिखाया जब कांग्रेस ने पूरे देश में घूम-घूम कर कहा कि कांग्रेस का साथ -आम आदमी के हाथ. तब इस देश के आम आदमी की आँखों में सपना जगा. उसे लगा कि उसके हाथ को थामने वाला कोई है. कोई है जो उसके साथ की बात सोचता है. इसी ख्याल ने कांग्रेस को सत्ता सौंपी. कांग्रेस ने भी देश के लोगों से वादा किया कि वह पारदर्शी सरकार देगी. जोर-शोर से सूचना का अधिकार कानून लागू किया. पूरे देश में उसका घूम-घूम कर प्रचार किया. मतलब साफ़ था. किसी भी तरह यह साबित करो कि कांग्रेस की सरकार ज्यादा इमानदार है. वो हर काम में पारदर्शिता चाहती है, मगर लगातार खुलते घोटालों ने देश को शर्मसार कर दिया है.
कांग्रेस नेतृत्व को यह समझ नहीं आ रहा कि यह गरीब जनता, जिसे दो वक़्त की रोटी नसीब नहीं होती, ऐसे घोटाले पर क्या सोचती होगी? आखिर वो कैसे सब्र करे जब उसकी आँखों के सामने उसका हक़ मारा जा रहा हो. दुःख की बात तो यह है कि हमाम में सब नंगे है. चाहे वो सरकार चलने वाले लोग हो या फिर विपक्ष में बैठ कर सरकार की गलती निकालने वाले लोग. सब लूट के इस खेल में शामिल हैं. जिस समय देश के सब लोग दूरसंचार मंत्री राजा की कहानी सुन कर दुखी हो रहे थे उसी समय भाजपा के कर्नाटक के मुख्यमंत्री का जमीन घोटाला सब के सामने आ गया. उन्होंने भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की तरह अपने घर वालों को जमीन देने में कोई कोताही नहीं बरती. मतलब साफ़ था कि चाहे यह हो या वो, भ्रष्टाचार का खेल बड़े आराम से मिल कर खेल सकते हैं. अब जनता किसकी तरफ देखे.
इसी समय रतन टाटा और योग गुरू रामदेव ने भी कह दिया कि उनसे भी घूस मांगी गई थी. सरकार इस मामले में कितनी बेशरम हो गई है इसका उदहारण भी एटार्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति के मामले में दे दिया. उनके हिसाब से किसी भी व्यक्ति का बेदाग चरित्र होना उसकी नियुक्ति के लिए जरुरी नहीं हैं. तो फिर हम सब यह मान ले कि आने वाले दिनों में हम सबका वास्ता उस व्यवस्था से पड़ने जा रहा है, जहां सारी नैतिकता इसी बात से तय होगी कि कौन कितना भ्रष्ट है. जिसके पास दौलत की अकूत सम्पदा होगी वही व्यक्ति शासन संभालेगा. ऐसा तंत्र हम सब को कहा ले जायेगा?
पूरा देश एक निराशा के वातावरण से गुजर रहा हैं. शासक तंत्र आम आदमी के सब्र की परीक्षा ले रहा हैं. मगर सत्ता चलाने वाले लोग यह भूल रहे हैं कि जब आम आदमी का आक्रोश भड़कता है तो उसे कोई भी ताकत नहीं रोक सकती. जब आम आदमी के हितों को ऐसे भ्रष्ट लोग हथियायेंगे तो इस बात की कल्पना करना भी बेमानी है कि नक्सलवाद जैसी समस्याएं खत्म हो जाएंगी. उस गरीब के पास दो ही हथियार है या तो वो खामोश रह कर इन बेइमानों की जमात को सहन करता रहे या फिर बन्दूक उठा कर अपने हक की लड़ाई शुरू कर दे. पहला काम अभी तक करते रहे हैं आम लोग. दुआ करें कि इन नेताओं को सदबुद्धि आये ताकि लोग दूसरा काम करने पर विवश न हो जायें.
लेखक संजय शर्मा कई वर्षों तक पत्रकारिता में संघर्ष करने के बाद अब लखनऊ से प्रकाशित वीकेंड टाइम्स के संपादक व प्रकाशक हैं. संजय उद्यमिता और पत्रकारिता में संतुलन बनाकर रखते हुए गंभीर मुद्दों पर जनपक्षधर पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं.












shishu sharma
February 4, 2011 at 8:13 am
really this is **hud ho chuki hae**aapko thanx