ब्‍लैकमेलर तो वीर, बरखा और प्रभु जैसे लोग हैं

: इंटरव्‍यू – जगदीश नारायण शुक्‍ला (वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ) : जगदीश नारायण शुक्ला अपने ही ढंग के आदमी हैं और कुछ विचित्र किस्म के पत्रकार भी. जो सोचते हैं सो करते हैं, जो सही लगता है, वह लिखते और छापते हैं, दिन भर सरकार और व्यवस्था से लोहा लेते रहते हैं लेकिन इस प्रक्रिया में कभी थकान नहीं महसूस करते. सफ़ेद लहराते बाल और दुबले-पतले शरीर वाले शुक्ला जी वास्तव में अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं. निर्भीक पत्रकारिता की धारणा, जो पहले हम लोगों के मन में रहा करती थी, ये उसके जीते-जागते प्रतीक हैं. सबसे विचित्र बात ये है कि उम्र के साथ भी उनकी आक्रामकता और उनके तेवरों में कोई कमी नहीं आई है. शुक्ला जी का हिंदी दैनिक ”निष्पक्ष प्रतिदिन” लखनऊ में धमाके करता रहता है. हाल ही में उन्होंने इसे सांध्य से सुबह का बनाया.

जगदीश नारायण शुक्ला से पीपुल्स फोरम, लखनऊ की संपादक नूतन ठाकुर ने कई मुद्दों पर बातचीत की. पेश है कुछ अंश-

-आपने पत्रकारिता की शुरुआत कहां से की?

मैंने अपनी पत्रकारिता 1970 में सीतापुर से शुरू की. मैंने लगभग इसी समय सीतापुर से साप्ताहिक अखबार शांतिदूत शुरू किया. इसके पीछे मुख्य कारण यह था कि उस समय ग्रामीण क्षेत्रों की खबरें अखबारों में लगभग नहीं के बराबर प्रकाशित होती थीं. मैंने इसी उद्देश्य से यह अखबार शुरू किया. इससे पहले मैंने अवधेश अवस्थी के साथ भी कुछ समय तक काम किया था. वे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे और राष्ट्र सन्देश नाम से एक साप्ताहिक अखबार निकाला करते थे. मैंने कुछ दिन उनके साथ काम किया- फिर उन्होंने कहा कि तुम नौजवान हो, कुछ अपना काम करो, अपना अखबार निकालो. उन्हीं की प्रेरणा से मैंने अपना साप्ताहिक निकालना शुरू किया.

-कुछ उन दिनों की बात बताएंगे?

शुरुआत में हम अपने आप से अखबार प्रेस में छपवा कर के खुद ही लोगों को देने जाते थे,  कम्पोजिंग खुद करते फिर छपवाया करते. इमरजेंसी में मेरा अखबार बंद कर दिया गया और मुझे जेल भेज दिया गया. डेढ़ साल जेल में रहा. इमरजेंसी खत्म होने के बाद जेल से बाहर आ गया. फिर जनता पार्टी की सरकार बनी पर अफसर तो कुल मिला कर वही थे इसीलिए मदद नहीं हो पायी. मैं भी इससे तंग आ कर 1979 में दुबारा लखनऊ शिफ्ट हो गया. लेकिन इससे पहले मेरी पढाई-लिखी लखनऊ में ही हुई थी. अबकी लखनऊ में आ कर सरकारी नौकरी शुरु की पर उस समय तक भ्रष्टाचार का रूप शुरू हो गया.

-उस समय का भ्रष्टाचार आज की तुलना में कैसा पाते हैं?

आज की तुलना में तो बहुत कम था. लेकिन शुरु हो गया था- इसके खिलाफ मैं आगे बढ़ा. मैं सिविल डिफेंस विभाग में था. लेकिन जब मैं इन भ्रष्टाचारों के खिलाफ आगे बढ़ा तो मेरे खिलाफ भी भयानक षडयंत्र शुरू हो गया और मजबूरन मुझे हटना पड़ गया. वे होम गार्डों के मस्टर रोल फर्जी बनाते थे. उस समय दैनिक भत्ता पचहत्तर पैसे मिलता था और ये उसमे भी कुछ फर्जी बनाते थे. मैंने उसका प्रतिवाद करना शुरू किया. लिखा-पढ़ी मैंने शुरू कर दी. उस समय एक एडीएम हुआ करते थे- मिस्टर सच्चिदानंद पांडे, बाद में आईएएस अफसर भी हुए पर उस वक्त जगदीशएडीएम थे. और एक डिस्ट्रिक्ट लेवल अफसर हुआ करते थे- छत्रपाल सिंह. ये कई अधिकारी थे जो इस मामले में फंसे और इन के खिलाफ मुकदमे भी चले- फर्जी मस्टर रोल बनाने के. ये सब दुश्मन हो गए और इन्हीं के मारे मैंने सोचा कि यह ठीक नहीं रहेगा, नौकरी छोड़ दी और अपनी खेती-बाड़ी गाँव जा कर करने लगा था. इसी बीच एक बार फिर अखबारों से जुड़ना शुरू हो गया था और एक बार फिर मैं लखनऊ में था. मैंने लगभग इसी समय लखनऊ में डेढ़ साल तक एक साप्ताहिक निकाला और फिर 30 जनवरी 1982 को निष्पक्ष प्रतिदिन का प्रकाशन शुरू किया और तब से हमारा अखबार निरंतर चलता रहा. सरकारें जो भी आयीं- कांग्रेस सरकार के खिलाफ लिखा, मुलायम सिंह के खिलाफ लिखा, कल्याण सिंह, मायावती जब भी मुझे जो बात मालूम हुई मैंने जरूर उसके खिलाफ खुल कर लिखा. राजनाथ सिंह आये, उस सरकार से भी झगडा हुआ. इस तरह मामला इतना बढ़ गया कि 2002 में मुझे अखबार बंद करना पड़ गया. और 2007 अप्रैल तक बंद रखा. फिर 2007 में ही अखबार दुबारा शुरू किया. जो लिखने की बात थी वो मैंने लिखा. वैसे कहने को तो लोग कहते हैं कि अखबारों को सही लिखना चाहिए पर सच तो यही है कि ये जितने पूंजीपतियों के अखबार हैं वे अपना धंधा और अपना हित बढाने के चक्कर में लगे रहते हैं. छोटे अखबार जो हैं, वे बेचारे कुछ लिखते-पढते हैं पर उन्हें तरह-तरह की तकलीफे उठानी पड़ती हैं.

-अपना अखबार निकालना और वह भी बिना पूंजी के, आपको कैसा अनुभव हुआ?

मैंने जब साप्ताहिक निकाला तो मेरे खिलाफ लगभग 30 या 35 मुकदमे चलाये गए. और हिंदी दैनिक अखबार जब से शुरू हुआ है तब से सहारा ने ही लगभग 25 मुकदमे मानहानि के किये हुए हैं. और कई अफसरों ने चलाये कि साहब इन पर मानहानि चले. जबकि खबरें सही हैं पर मुक़दमा डाल देते हैं क्योंकि इसको ले कर कोई ठोस कानून तो है नहीं. अब मुक़दमा डाल दिया, आप लड़ते रहिये.

-क्या आपको ऐसा लगता है कि जो नए अखबार शुरू होते हैं या जैसा आपने शुरू किया, बड़े अखबार नहीं चाहते हैं कि ये आगे आयें?

ये बात बिलकुल सही है. अव्वल तो ये चाहते नहीं कि कोई नया आये और उनकी कोशिश ये होती है कि इन को हर तरह से दबा दिया जाए और अपना काम चले. अभी आपने जो बात दिल्ली की सुनी है कि दिल्ली में जो सो-कॉल्ड जर्नलिस्ट हैं, वो बरखा दत्त हों या वीर संघवी  हों, ये लोग पैसा केवल कमाने का धंधा करते हैं. आपके जो प्रभु चावला हैं उनके लड़के की सीबीआई जांच हो रही है, उनके खिलाफ भी तमाम आरोप हैं. ये एक जरिया बना हुआ है और पैसा कमाने का उपाय है. ब्लैकमेलिंग का काम जो वास्तव में कर रहे हैं, वे बड़े अखबार के और बड़े संस्थान के लोग हैं. प्रचार ये होता है कि छोटे अखबार वाले तो ब्लैकमेलर हैं. छोटे अखबार वाले किसको ब्लैकमेल करेंगे भाई? ये ब्लैकमेलर तो साबित हुए हैं बरखा दत्त, प्रभु चावला, वीर संघवी. इनके बारे में कोई कुछ नहीं कहता. हाँ, ये लड़ाई तो चल ही रही है.

-आपकी पत्रकारिता जो रहती है, आपका अखबार ‘निष्पक्ष प्रतिदिन’ आक्रामक तेवर लिए रहता है तो उससे परेशानी भी आती है?

परेशानी बराबर आती है- मतलब धमकियां आती हैं, तमाम चीज़ें होती हैं पर इस मामले में मेरे जो गुरु थे पंडित अवधेश अवस्थी,  जिनके सानिध्य में मैंने अखबार शुरु किया था, उनका कहना था कि यदि अखबार निकालिए तो अखबार होना चाहिए, पढ़ के लगे कि कोई अखबार है. अखबार में आप सही लिखिए- राग-द्वेष से हट कर. और इसीलिए मैंने अपने अखबार में एक स्लोगन दिया है- ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर. जो कहा गया था न कि कबीरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर. अब हम उसी परिपाटी पर चल रहे हैं और उसी पर चलते रहेंगे. बाकी आप देख रहे हैं कि हमारे अखबार का उत्तर प्रदेश शासन ने विज्ञापन बंद कर रखा है पिछले दो साल से. क्योंकि अधिकारी नहीं चाहते. सभी चीज़ें हैं, सभी नियमों के अंतर्गत हमारा अखबार है पर उन अखबारों को विज्ञापन मिल जाता है जो ब्लैकलिस्टेड हैं और छापते ही नहीं, महीने में एक बार केवल ऑफिस कॉपी बन जाती है और अपने को अखबार वाला बता कर अफसरों के साथ लगे हुए हैं.

-इसमें कमीशन का भी चक्कर होगा?

फिफ्टी परसेंट. यहाँ कमीशन फिफ्टी परसेंट चल रहा है. मैंने तो एक से कहा कि यदि मुझे कमीशन देना होगा तो अपने गाँव नहीं चला जाऊंगा, मेरे पास तो पर्याप्त जमीन है- मैं खेती करूँगा. जब मैंने यहाँ मकान बनाया तो तीन हज़ार की ज़मीन खरीदी थी 1964 में. ट्यूशन पढाता था, यहीं रहता था- उसी पैसे से ज़मीन खरीदी अब यहाँ धीरे-धीरे बड़ा घर बना लिया. मेरे खिलाफ लोगों ने कहा कि बहुत बड़े नेता बनते हैं, स्वनामधन्य पत्रकार हैं- इनका इन्कम टैक्स देखा जाए, तो मेरे इन्कम टैक्स की जांच करा दी गयी. पिछले बीस साल से जब से डेली अखबार है, मैं बराबर इन्कम टैक्स देता रहा हूँ. टैक्स जो बनता है हमेशा देता हूँ. यहाँ तो ऐसे ऐसे लोग हैं जो टैक्स नहीं देते और चलते हैं पन्द्रह लाख की गाड़ी से.

-क्या इसमें बड़े अखबारों की साजिश होती है?

यही तो साजिश है. लखनऊ में जो बड़े अखबार हैं उनके ऊपर कीमत लिखा है चार रुपया. और ये अखबार बेचते हैं साठ पैसे में. नाम नहीं लेना चाहता. वे ऐसा इसीलिए करते हैं ताकि छोटे अखबार बिक नहीं पायें.

-उस दौर और आज के दौर में क्या अंतर आया है?

उस दौर में कई पत्रकार दूसरे ढंग के थे. 1986-87 में मैं सचिवालय की प्रेस कमिटी का चेयरमैन था. उस समय के सीनियर-मोस्ट जर्नलिस्ट थे पीटीआई के मिस्टर नकवी, मिस्टर नय्यर, पंडित एसके त्रिपाठी इंडियन एक्सप्रेस के थे, आकाशवाणी में आरके टंडन थे, विधान सभा अध्यक्ष रह चुके पुरुषोत्तम दास टंडन के लड़के, ये लोग स्कूटर या रिक्शे से चलते थे. आज सभी अखबारों में दो-पहिया वाहन ही दिखेंगे. और इन पत्रकारों की रिहायिश इनकी तनख्वाह से तीन गुणा ज्यादा है. लेकिन आज भी दूसरे तरह के लोग हैं. लखनऊ में ही प्रदीप कपूर हैं जो अब ब्लिट्ज में है, उनके पिता ने कभी उन्हें स्कूटर दिया था, उसी स्कूटर पर वह गरीब चल रहा है- नया नहीं खरीद पाए- जबकी बीवी नौकरी करती है- खुद भी लिखते-पढ़ते हैं और अच्छा पैसा पाते हैं. यहाँ ऐसे भी हैं जो कहीं नहीं हैं पर बीस करोड़ की सम्पति के मालिक हैं. मैं एक ऐसे पत्रकार को जानता हूँ जो अपने घर के बिजली का किराया नहीं देते पर बीस लाख की गाड़ी में चलते हैं. यह सब नैतिक मूल्य में गिरावट का परिणाम है. हर समाज की तरह पत्रकारिता में भी, प्रयास करना चाहिये, सुधार की कोशिश होनी चाहिए, यहाँ कई अच्छे लोग भी हैं.

-क्या इसके पीछे पत्रकार की कम तनख्वाह भी है?

तनख्वाह से सुधार नहीं होगा, चरित्र में सुधार की जरूरत है. तनख्वाह पहले से बीस गुणा ज्यादा हो गयी है. पहले 200- 250  रुपये मिला करते थे, अब पचीस-तीस-पचास हज़ार की तनख्वाह मिल रही है. जरूरी है अपने सेंस को सुधारे, अपनी ओर उंगली ना उठने दें.

-क्या स्ट्रिंगर की तनख्वाह में कमी इसका कारण है?

ये कोई कारण नहीं है. जो ठीक हैं वो अपना जीवन बीता लेते हैं- इसी रकम में. यहीं लखनऊ में गिरिधारी लाल पाहवा थे, अब इस दुनिया में नहीं रहे. वो स्ट्रिंगर थे, कम तनख्वाह थी पर इसी में अपना जीवन जिया करते थे, कोई गलत काम नहीं करते थे. हम लोगों को इस बारे में खुद सोचना पड़ेगा.

Comments on “ब्‍लैकमेलर तो वीर, बरखा और प्रभु जैसे लोग हैं

  • Abhinav Sharma says:

    YAAR INKA CAREER KHATAM HOGA TABHI TABHI TO FRESHERS KO MOKA MILEGA AB CHOICE INKI HAI KI YE IZZAT SE SEVANIVRITT HONA CHAHTE HAIN YA BEIZZATTI KI LAAT OR DEOTION CHAHTE HAIN YA FIR NIKAL JANA YA NIKAL DIYE JANA. JIS DIN BHADAS MAIN KHABAR AAYI THI KI PRABHU CHAVLA GAYE RESIGN KIYA OR AISA SMS BHADAS SE SAMBANDHIT LOGON KO MILA HOGA TO MAIN POORE VISHVAAS SE KEH SAKTA HOOH KI 90% LOGON MAIN KHUSHI KI LEHER DOUD GAYI HOGI.

    MAINE SCHOOL MAIN PADHA THA KI JAB TAK KOI PURANA HAT NAHIN JAATA NAYE KO JAGAH NAHIN MILTI BAS ANTAR ITNA HOTA HAI KI PURANA IZZAT SE HATNA CHAHTA HAI YA APNI GADDI CHEEN LIYA JAAN APASAND KARTA HAI.

    ABHINAV SHARMA
    +919827486228

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  • AAP APNE KARYE ME LAGE RAHEN,KAHWAT HAI: KUTEY BHONKTEY HAI AUR KAFILE CHALTEY HAIN,AAP JAISE IMANDAR AADMD ISWAR HAI…I KE SAATH HAR SECON….

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  • ruchir bajpai says:

    yes we could only say something when we behave as a reference group…..my best wishes and prayers are with you people and regards to you.

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  • sharad saxena says:

    aankho par yakin nahi hota ki loktantr ka chautha stambh hone ka dambh bharne wali patrkaarita andar se itni sadaandh maarti niklegi?? agar isi dimak lage khokhle stambh ke sahare ham loktantr ki ummid karte he to bhavishy me patrkaaro par bharosa karne se pahle loktantr ki arthi nikaal kar “sena (army)” ke haath me desh ki baagdor de deni chaahiye…. vahi shaayad ekmaatr sahara ho sakta he … vaise aadarsh ghotale ke baad bharosa to us ka bhi nahi … “veer ke teer” “barkha ka charkha” “prabhu ki maya” …. sab bikaau maal….??? aaj se me apne desh ki khabre videshi media channels par dekhunga….

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  • Naseem Ansari says:

    Shabash Nutan Ji

    Kya aap bhool gai ki ye wahi Jagdish Narayan Shukla hain, jinki patrika AAKHIR KAB TAK me aaj se kareeb 7 saal pehle aapke pati Sri Amitabh Thakur ke khilaf ek report chapi thi aur jisme unke dwara Gonda ka SP rehte tamam Shastra Licence apradhi tatwo ko bakayda beche jane ka khulasa kiya gaya tha. Uss report me Amitabh Thakur ki Lucknow se lekar Bihar tak legal-illegal properties ka bhi khulasa kiya gaya tha. Main wo report nahi bhool sakti kyonki wo report maine likhi thi. Koi shak nahi ki uss report per Jagdish Narayan Shukla ne Amitabh Sahab se Saude bazi ki ho, jaisi ki unki fitrat hai. Unke baare me ek nai jankari aur de dun. Haal hi me Neera Yadav ki giraftari ke baad jab unhe Ghaziyabad ki jail me bhej gaya to Jagdish Narain Shukla apni patni Gunjan Shukla ke saath Delhi ke UP Bhawan me 8 December 2010 aur 9 December 2010 ko thehre the, aur Neera Yadav se milne car se Ghaziyabad jail gaye the. Ashcharyajanak baat hai ki UP Bhawan ke register me unke rukne ka koi byora darj nahi hai aur Ghaziyabad jail ke andar jaane ke liye jo parchi lagai gai wo unhone apni patni Gunjan Shukla ke naam se banwai. Ab Neera Yadav se Jagdish Narayan Shukla ke kitne nazdeeki sambandh hain ye to aap aur Amitabh ji dono bahut achchi tarah jante hain aur unn sambandho ka kitna zyada aur kis kis tarah laabh unhone uthaya hai iska bhi khulasa waqt aane per karungi.
    Abhi to bas itna isliye likh diya ki Jadish Narayan Shukla jaise Blackmailer aapko ACHCHE PATRAKAR nazar aate hain to aapko apni aankhain test karwane ki zarurat hai.
    Aap likhti achcha hain, behtar hoga ki jo sachmuch achche log hain unke liye apni kalam chalayain.
    Dhanyawad

    Naseem Ansari
    Special Correspondent
    INDIA NEWS
    Delhi

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  • Dr. Dilip Kumar Singh says:

    आदरणीया नूतन जी, मेरे बारे में आपके सदविचार वाकई आपकी मनोदशा बताने के लिए काफी हैं। इस देश को दरअसल छद्मवेशियों, नकाबपोशों से ही खतरा है। तमाम किस्म के एनजीओ की संरचना कर जिस तरह लोग कंबल ओढ़ कर घी पी रहे हैं और दुनिया को घी से परहेज करने की सीख दे रहे हैं, वह आपके, आपके पतिदेव और ऐसे दोयम दर्जे के संपादक, जिनके लिए आपने कलम-तोड़ लेख लिख डाला, उससे जाहिर होता है। देश को ऐसे ही आडंबरियों से असली खतरा है। आपने सही लिखा मेरे जैसे न्यायाधीश। अगर ऐसा हो जाए तो आप जैसे लोग समाज को घोखे में नहीं रख पाएंगे!
    आपके प्रति मेरी शुभेच्छा है कि स्वतः नकाब हटा कर समाज को असली चेहरा दिखाने की आपको ईश्वर शक्ति प्रदान करे।
    डॉ. दिलीप

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  • Dilip Kr. Singh says:

    स्वनामधन्य जगदीश नारायण शुक्ला जैसे गंदे धंधेबाज पत्रकार पर थू थू। ऐसे पत्रकार की प्रशंसा में कलम तोड़ने वाली तथाकथित ईमानदार नूतन ठाकुर पर छिः छिः और ऐसे निम्नस्तरीय लोगों के बारे में खबरें और लेख प्रकाशित करने वाले भड़ास4मीडिया को धिक्कार।
    डॉ. दिलीप

    Reply
  • नूतन ठाकुर says:

    नसीम जी,

    आपका बहुत धन्यवाद जो आपने मुझे हमारे जीवन का वह काला अध्याय याद दिला दिया जिसने हमें यह बात हमेशा के लिए समझा दी कि ‘बिना आग के धुँआ नहीं हो सकता’ वाली कहावत कितनी गलत है. मैंने कहीं पढ़ा था कि ब्रिटिश पार्लिआमेंट पुरुष को स्त्री और स्त्री को पुरुष बनाने के अलावा सब कुछ कर सकती है. मुझे अब लगने लगा है कि आज के अखबार और मैगेजीन शायद यह काम भी कर सकते हैं.

    मैं अपने पति अमिताभ जी का बचाव नहीं कर रही हूँ और उन्हें हरिश्चंद्र की परंपरा में नहीं बता रही पर इतना जरूर जानती हूँ कि आप लोगों की कृपा से उन्हें एक ऐसे पाप का जिम्मेदार बना दिया गया जिससे उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था. ईश्वर की कृपा रही कि बाद में जो जांच हुई उसमे सारी सही बातें सामने आ गयीं. पर यह तो है कि अपनी बेवकूफी (जी हाँ, वे अपनी बेवकूफी के कारण ही ऐसी स्थिति में आ गए थे) के कारण मेरे पति एक समय शस्त्रों के सौदागर से लेकर आर्म्स रैकेट के संचालक तक कहलाने लगे थे.

    मैं जगदीश नारायण जी के बारे में बहुत नहीं जानती, पर एक चीज़ तो मैं अपनी आँखों से देखती हूँ कि कम से कम उनके अखबार में वे ख़बरें निकलती हैं जो आज के समय में दूसरे अखबारों में भी होनी चाहिए, पर पता नहीं क्यों, उस हद तक दिख नहीं पातीं. वे इन ख़बरों का कैसा इस्तेमाल करते हैं यह तो वही जानते होंगे पर उनकी इन ख़बरों से उनके एक हिम्मती और योद्धा प्रकृति के व्यक्ति होने के विषय में कोई शंका नहीं रह जाती, कम से कम मुझे तो किसी प्रकार से कोई शंका नहीं है. खास लखनऊ में रह कर यहाँ के बड़े नेताओं और तमाम ऊँचे हुकुमरानों के खिलाफ मोर्चा खोले रखना आसान बात तो नहीं दिखती. और साथ ही यह बात भी मैं जानती हूँ कि कम से कम हमें तो जगदीश नारायण जी ने उस खबर के छपने के बाद कभी फोन नहीं किया था और ना ही हम लोग उस दौरान उनसे कभी मिले. हाँ, उन पर मुझे नाराजगी जरूर थी, गुस्सा था जो आप पर भी था पर वह भी धीरे-धीरे शांत हो गया क्योंकि मैंने महसूस किया कि जब मेरे पति के विभाग के लोग ही घूम-घूम कर इनको बर्बाद करने के लिए कृत-संकल्प हैं तो इसमें आप या जगदीश जी क्या कर सकते हैं. हाँ, लेकिन आज मैं जगदीश नारायण जी कि इस बात के लिए व्यक्तिगत प्रशंसिका जरूर हूँ कि इन कठिन युगों में सर्वोच्च पदों पर आसीन अत्यंत प्रभावशाली और ताकतवर लोगों की गलत-सही बातों को सामने तो लाते हैं.

    मैं आपके विषय में अधिक नहीं जानती पर आपको अपने पेशे के प्रति ईमानदार और निष्ठावान जरूर मानती हूँ क्योंकि जब मैंने आपका मेरे पति से सम्बंधित आर्टिकल पढ़ा था तो उससे यह अवश्य जाहिर हुआ था कि आपने इस कार्य के लिए पूरी मेहनत की थी. चूँकि आप को आर्म्स लाइसेंस सम्बंधित जो दस्तावेज़ उपलब्ध कराये गए थे, आपकी कहानी को उसी पर आधारित होना था. आपकी लेखनी में धार भी दिखी थी. हाँ, एक निवेदन अवश्य करुँगी कि चूँकि आप अपने पेशे के प्रति ईमानदार दिखती है, अतः अब सच्चाई सामने आने पर इन नए अभिलेखों के आधार पर भी यदि इस लगभग भुलाए जा चुके प्रकरण पर अपना कलम चलाएंगी तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा और आपके प्रति सम्मान का भाव जागेगा. वैसे यह आपकी मर्ज़ी है. मैं तो मात्र निवेदन ही कर सकती हूँ. मैं इस बारे में आवश्यक अभिलेख आपको उपलब्ध कराने को हमेशा तैयार हूँ. मेरा संपर्क नंबर 94155-34525 है और मुझे आपके फोन का इन्तेज़ार रहेगा.

    आपकी जगदीश नारायण जी के प्रति कुछ नाराजगी के भाव आपके कमेन्ट में नज़र आते हैं. मैं इसकी गहराई में नहीं जाना चाहती क्योंकि यह मेरे अधिकार-क्षेत्र में भी नहीं है और न ही मुझे ऐसी बातों में अभिरुचि ही होती है. पर यदि आप विश्वास कर सकें (क्योंकि कई बार इंसान में अविश्वास की भावना अत्यंत बलवती होती है) तो सच यही है कि मुझे (और मेरे पति को भी) यह बात आपके कमेन्ट से मालुम हुई कि जगदीश नारायण जी के कथित तौर पर नीरा यादव जी से बहुत अच्छे रिश्ते हैं.

    अंत में मैं आपका एक और बात के लिए धन्यवाद दूंगी. आपने हमारे विराम खंड वाले मकान की ऐसी तस्वीर खींची थी जो इसे एक विशाल भवन दर्शा रही थी. वह तस्वीर मैंने संजो कर रखी है. यशवंत जी इस घर में आ चुके हैं और इसको देख चुके हैं. मैं समझती हूँ वे बता सकते हैं कि यह घर कितना बड़ा और कितना आकर्षक है. आप भी हमेशा आमंत्रित हैं.

    आपकी नूतन
    लखनऊ
    94155-34525

    Reply
  • नूतन ठाकुर says:

    डॉ दिलीप कुमार सिंह ने कहा- “स्वनामधन्य जगदीश नारायण शुक्ला जैसे गंदे धंधेबाज पत्रकार पर थू थू। ऐसे पत्रकार की प्रशंसा में कलम तोड़ने वाली तथाकथित ईमानदार नूतन ठाकुर पर छिः छिः और ऐसे निम्नस्तरीय लोगों के बारे में खबरें और लेख प्रकाशित करने वाले भड़ास4मीडिया को धिक्कार।”

    मैं इसके आगे जोड़ती हूँ- “इस देश के वास्तविक सपूत स्वनाम-धन्य डॉ दिलीप कुमार सिंह को कोटिश नमन, ईमानदार डॉ दिलीप कुमार सिंह की बारम्बार प्रशंसा और ऐसे उच्च-स्तरीय
    डॉ. दिलीप कुमार सिंह का विविध प्रकार से गुणगान.”

    खासकर इस कारण से भी कि डॉ दिलीप में अद्भुत निर्णय और निर्णायक क्षमता दिखती है. यदि हमारे देश में उनके जैसे ही न्यायाधीश हुआ करें तो न्यायपालिका के तमाम विलम्ब पलक झपकते ही दूर किये जा सकेंगे, क्योंकि वे एक पल में गंदे, बेईमान और निम्नस्तरीय लोगों और कृत्यों को चयनित कर के दूध का दूध, पानी का पानी कर सकने में समर्थ होंगे.

    डॉ नूतन ठाकुर,
    लखनऊ
    94155-34525

    Reply
  • नूतन ठाकुर says:

    दिलीप जी,
    मैं अपने पहले के शब्द वापस लेती हूँ और अकारण काबिल बनने के लिए माफ़ी भी चाहती हूँ. मैं आपसे पूर्णतया सहमत हूँ कि इस देश को दरअसल छद्मवेशियों, नकाबपोशों से ही खतरा है.
    वैसे मैं अपनी सच्चाई आपके सामने खोल कर नहीं दिखा सकती पर इतना अवश्य जानती हूँ कि मैं और मेरे पति तमाम किस्म के एनजीओ की संरचना कंबल ओढ़ कर घी पीने के लिए नहीं कर रहे हैं.
    हाँ, यदि मेरी बात आप सही नहीं मान रहे तो इसमें कमी और गलती मेरी और मेरे पति की है क्योंकि अपने मुंह मिया मिट्ठू बन जाने से क्या फायदा. जिस दिन मेरे और मेरे पति के काम की तारीफ़ आप भी करेंगे और दूसरे लोग भी तभी तो इसका मतलब होगा, अन्यथा यह व्यर्थ माना जाएगा.
    यदि आप लेश मात्र विश्वास कर सकें तो हम इसी दिशा में प्रयासरत हैं. शायद कभी आप को भी मेरे कहे पर विश्वास हो जाए, यदि हमारी कोशिश सच्ची होगी.
    बाकी आप जगदीश जी के बारे में जो भी कहें पर मेरे मन में उनकी हिम्मत के प्रति पूरी श्रद्धा है जो आगे भी इतनी जरूर रहेगी क्योंकि इसे मैं अपनी आँखों से रोज उनके अखबार में देख रही हूँ. जो आँख से दिखती है, उतना भर तो विश्वास करना ही पड़ता है.
    मैं पुनः अपने शब्दों के लिए क्षमाप्राथिनी हूँ. यदि आप लखनऊ के हैं तो सादर आमंत्रित हैं, क्योंकि कई बार आदमी सुनी-सुनाई बातों पर गलत विश्वास लेता है और परिचय होने पर तमाम धारणाएं नए सिरे से बनती हैं.
    आपका स्वागत है. फोन पर वार्ता हेतु मेरा नंबर है 94155-34525
    मुझे आपसे और कुछ नहीं, आपकी सदिच्छा चाहिए. अगर मैं गलत होउंगी तो उसे जरूर ठीक करुँगी.

    नूतन

    Reply
  • Dr. Dilip Kumar Singh says:

    आदरणीया नूतन जी, नमस्कार।
    आपने तो ढेर ही कर दिया। मैं पत्रकारिता जगत के कुछ महत्वपूर्ण लोगों को जानता हूं। कुछ तो मेरे खास मित्र हैं। ऐसे भी हैं जिनका जीवन ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया जैसा है। आप जैसे लोगों की समाज में प्रतिष्ठा है। अगर आप भी किसी पर लेख लिखने के पहले व्यापक दृष्टिकोण से विचार नहीं करें, तो कौन करेगा। जिस अखबार या उसके मालिक-संपादक के बारे में आपने इतना लिखा, उसके अखबार का साहस भी चालाकीपूर्ण नियोजन है। इसके बारे में आप तो पता कर ही सकती हैं। सत्ता के सर्वोच्च दरबार के एक महामात्य के इशारे पर/ धन पर और षडयंत्र पर यह अखबार साहस दिखा रहा है। यह साहस स्वाभाविक नहीं है, बिकाऊ है।
    भारतवर्ष में आप जैसे कुछ लोग तो हैं जो अपनी गलतियों को सार्वजनिक रूप से मान भी लेते हैं।
    आपके प्रति शुभेच्छा जताते हुए,
    डॉ. दिलीप

    Reply
  • Manish Kumar says:

    Media (News) ki Duniya m ek or badta kadam, ab ek or news channel markeet me aa gaya hai khabar24 News (khabar24news.com) ke naam se, abhi to kuch achha lag raha hai, isme sub ke liye masala hai, aap sub bhi isse jud sakte hain or apne reviews channel ke dwara de sakte hain, khabar24 news markt me tehlka machane aa gaya hai, khabar24 news ke pass bhe kuch aise chij hain jo achha khulasa ker sakte hain isme kuch achhe Senior Reporter bhi jude hue hain, or ye ek achha online news t.v ke sath apne aap ko serve karne ki tayari ker rahe hain, aap sub bhi isse judker khabar24 News ki help kare

    Regards

    Manish Kumar

    Reply
  • anand tripathi says:

    इसमें तो कोई शक नहीं की श्री जगदीश नारायण शुक्‍ला (वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ) की पत्रकारिता का कोई जबाब नहीं है अक्सर वे शासन प्रशासन से लोहा लेते नजर आते है और इसमें भी कोई शक नहीं की उनकी कलम उतनी ही प्रभावशाली है जितनी उनकी सोच जो समाज और लोंगो के प्रति जागरूकता का जीता जगता मिशाल है

    Reply
  • Rajan Pandey says:

    अरे मेरे पढ़े लिखो सज्जनो, क्यों शुक्ला जी को इतना भाव दे रहे हैं आप लोग? टिकटार्थी हैं कांग्रेस के इसलिए रोज कुंवर फ़तेह बहादुर को अपने ही अखबार में गालियाँ लिखते हैं. फ्रंट पेज पे अपनी फोटो के साथ सम्पादकीय छपवाते हैं. खुद विधायकी के टिकट के चक्कर में दिल्ली पड़े रहते है, सम्पादकीय कोई लिखता है.

    और नूतन जी, आप तो पढ़ी लिखी संभ्रांत महिला हैं. मैं खुद आपका और आपके पति श्री अमिताभ जी का बहुत सम्मान करता हूँ. आप लोग सचमुच समाज के लिए कुछ अच्छा काम कर रहे हैं. आप कहाँ इन ब्लैकमेलरों में फंस गयी हैं? इनका धंधा कुछ और है.

    पत्रकार सारी सारी गन्दी हरकतें के बाद भी चाहता है लोग उसे साफ़ सुथरा और इज्ज़त की नज़र से देखें. दिन भर दलाली के काम से घुमते हैं और चाहते हैं कि लोग उसे संकट मोचन समझें, ना कि दलाल. खुद वही काम करता है लेकिन दूसरे पत्रकार को गाली देते हैं कि साला दलाल है.

    मैं सबको तो नहीं कहता लेकिन ज़्यादातर की हालत यही है. अपने आप को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और सजग नागरिक कहने वाली यह स्वयंभू जात, बहुत ही घटिया और मूर्ख किस्म की है.

    चूँकि मैंने अपने इस फीडबैक में पत्रकारों को गालियाँ लिखी हैं और यशवंत जी भी उसी समुदाय से हैं तो शायद वो इसे अपने वेबसाइट पे अपेंड ही ना करें.

    This was my “bhadas for media”.

    धन्यवाद,
    राजन

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