टीवी पर विज्ञापन : साल भर में 18 करोड़ से ज्‍यादा फूंक डाला माया सरकार ने

पिछले एक वर्ष अर्थात 20 सितम्बर 2010 से 20 सितम्बर 2011 के मध्य उत्तर प्रदेश सूचना एवं जन संपर्क निदेशालय द्वारा विभिन्न चैनलों तथा टेलीविजन पर कुल नौ बार विज्ञापन दिया गया, जिसमें कुल 18.45 करोड़ रुपये का व्यय हुआ था. यह सूचना मेरे द्वारा उत्तर प्रदेश शासन के सूचना और जनसंपर्क विभाग द्वारा आरटीआई के अंतर्गत इस अवधि में उत्तर प्रदेश सूचना एवं जन संपर्क निदेशालय द्वारा विभिन्न चैनलों तथा टेलीविजन पर प्रसारित कराये गए सरकारी एडवरटीजमेंट के सम्बन्ध में मांगी सूचनाओं के उत्तर में दी गयी है.

इस अवधि में 17 से 30 अक्टूबर 2010, 07 फरबरी से 16 अप्रैल 2011 एवं 12 मई से 14 सितम्बर 2011 तक की अवधि के मध्य प्रसारित किये गए. ये सभी विज्ञापन 40.0 सेकण्ड तथा 5.35 सेकेण्ड के थे, जो सभी न्यूज़ चैनलों पर प्रसारित किये गए थे. हम सबों को उत्तर प्रदेश जैसे गरीब राज्य में सरकार द्वारा मात्र स्व-प्रचार में इतनी बड़ी धनराशि व्यय किये जाने की कटु निंदा करनी चाहिए, जहां एक तरफ तो लोग भुखमरी से मर रहे हैं और दूसरी ओर सरकार करोड़ों रुपये अपनी शान में कसीदे गढ़ने में खर्च कर रही है. यह सचमुच एक ऐसी स्थिति है जिसे कदापि ठीक नहीं कहा जा सकता और यह आज के समय की सरकारों की मानसिकता की द्योतक है. अब समय आ गया है जब इन कार्यों के लिए आम जनता को सरकारों को जिम्मेदार बनाते हुए उनसे उनके कार्यों का हिसाब लेना चाहिए.

डॉ. नूतन ठाकुर

कन्‍वेनर

नेशनल आरटीआई फोरम

राजदीप सरदेसाई की करतूत जगजाहिर करने वाली तहलका टीम को बधाई

नूतन ठाकुर: आशीष खेतान को सच लिखने और सिद्धार्थ गौतम को सच बोलने के लिए विशेष तौर पर बधाई : तहलका ने सचमुच देश की पत्रकारिता की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया. एक से बढ़कर एक बड़ी खबरें ब्रेक की. कैमरे के सामने नोटों की गड्डियां लहराते भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण का चेहरा सभी को याद होगा.

पैसे का गुणगान करते उस समय के भाजपा नेता और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पद के लिए घोषित प्रत्याशी दिलीप सिंह जूदेव को सबने देखा. बंगारू और जूदेव की फजीहत पूरे देश के सामने हुई थी. वह पहला मौका था जब देश इस तरह की कोई बड़ी बात देख रहा था. यह तो सब जान रहे थे कि देश के कई नेता दोनों हाथों से पैसा लूट रहे हैं पर पकड़ में कोई नहीं आता था.

तरुण तेजपाल और अनिरुद्ध बहल की जोड़ी ने वह कर दिया जो अब तक केवल फिल्मों में ही दिखाया जाता रहा था. उस समय से अब तक बहुत समय बीत चुका है और इस दौरान बहुत कुछ ऐसा हुआ है जो अब से दस साल पहले एकदम नया-नया और अजूबा था. तहलका भी अब बहुत बदल चुका है- पहले वह पोर्टल था, अब एक प्रतिष्ठित पत्रिका है.  यद्यपि अब भी वह धमाकेदार खबरें लाते रहता है पर शायद अब हम उनके आदी हो गए हैं और कई बार उनका उतना अधिक शोर नहीं मच पाता जितने के वे संभवतः हक़दार होते हैं. इसके अलावा अब उन पर कई बार पक्षपात करने और कॉंग्रेस के पेड एजेंट के रूप में काम करने के आरोप भी यदा-कदा लगाए जाते हैं, चाहे इनमें जितनी सच्चाई हो.

इन्हीं बड़े मामलों में से एक मामला मैं आपके सामने रख रही हूँ. यद्यपि इस खबर को आये करीब पांच महीने बीत चुके हैं पर मैंने इसे हाल में ही देखा और पढ़ा. मैं इस खबर को पढ़ने के बाद इतना अभिभूत हो गयी कि अपने आप को रोक ना सकी और इस लेख का गुणगान करने को मजबूर हो गयी. यह लेख है 02 अप्रैल  2011के अंक में प्रकाशित Cash-for-Votes Scandal: A trap. And a cover-up (नोट के बदले वोट स्कैंडल- एक जाल और उसकी छिपा-छिपी). आशीष खेतान का लिखा यह आलेख सचमुच इतना जबरदस्त है कि मैं ह्रदय से आशीष को साधुवाद देती हूँ. किसी कहानी के तह तक जाना और उससे सच्चाई निकाल कर ला पाना ही किसी भी पत्रकार के लिए सबसे जरूरी काम है और मेरी निगाह में इस कहानी में आशीष खेतान इस मापदंड पर पूरी तरह खरे उतरते दिखाई देते हैं. उसके साथ जो दूसरी बात मुझे उनके इस आलेख में अच्छा लगा वह यह कि तहलका का कॉंग्रेस से चाहे कुछ भी सांठ-गाँठ हो पर कम से कम इस कहानी में तो आशीष और तहलका सिवाय सच्चाई के और किसी भी चीज़ के निकट नज़र नहीं आये.

आशीष ने इस आलेख में जहां इस पूरे घटनाक्रम को उसके प्रारम्भ से प्रस्तुत किया है वहीँ इस में उनकी जो सबसे बड़ी फतह रही है कि वह युवा पत्रकार सिद्धार्थ गौतम, जो इस घटना और स्टिंग ऑपरेशन के समय सीएनएन-आईबीएन चैनल में थे और आजकल हेडलाइंस टुडे में कार्यरत हैं, से लंबी और बेबाक बातचीत करने के सफल रहे जिसके कारण कई सारे रहस्यों से पर्दा उठ सका. इस तरह यह एक पत्रकार की मदद से दूसरे पत्रकार द्वारा पत्रकारिता को गरिमा प्रदान करने वाला लेख था, जिसमे दुर्भाग्यवश वह पत्रकार सबसे बुरी स्थिति में दिखा जिसके लिए मेरे तथा लाखों लोगों के दिलों में हमेशा से बहुत अधिक इज्जत रही थी. पत्रकारिता के सिरमौरों में एक और निष्पक्ष तथा साहसी पत्रकारिता का मिसाल कहे जाने वाले राजदीप सरदेसाई इस कहनी में एक ऐसे कमजोर और स्वकेंद्रित पात्र के रूप में सामने आये जिसके प्रति अंदर से कष्ट होता है.

इस कहानी से कई सारे साक्ष्यों और प्रमाणों के आधार पर यह बात काफी हद तक साफ़ हो जाती है कि “वोट के बदले नोट” का जो ड्रामा तीन सांसदों ने पार्लियामेंट में खेला और नोट लहरा कर पूरी दुनिया का  ध्यान अपनी ओर खींचा वह मूल रूप से एक ड्रामा ही था. इस कहानी को पढ़ने के बात साफ़ हो जाता है कि कैसे उस समय की स्थितियों में, जब अंदरूनी तौर पर सांसदों के खरीद-फरोख्त का “खुला खेल फरुक्खाबादी” चल रहा था, भारतीय जनता पार्टी के बड़े योद्धा भी इसका फायदा अपनी ही तरह से करने को बेताव थे. कहानी के अनुसार इसका तानाबाना बुना गया भाजपा के पुरोधा लाल कृष्ण आडवाणी के स्तर पर जिन्होंने इसकी कमान दी अरुण जेटली को.

अरुण जेटली ने सीएनएन-आईबीएन के राजदीप सरदेसाई से संपर्क पर बाकी काम सौंप दिया उस समय के भाजपा के एक रणनीतिकार सुधीन्द्र कुलकर्णी को. सुधीन्द्र कुलकर्णी को साथी मिले सोहेल हिन्दुस्तानी और इन लोगों ने आइबीएन के सिद्धार्थ गौतम के साथ यह सारा “स्टिंग” करने की योजना रची. लेकिन जैसा कई बार हास्य फिल्मों में हो जाता है, एक आदमी जब कुछ देना चाह रहा होता है, दूसरा लेने को तैयार नहीं होता और फिर पहले वाले को ही मिन्नतें करनी पड़ती हैं. यहाँ भी यही हुआ. लगता है जब तक सुधीन्द्र की टीम सक्रीय हुई थी तब तक कॉंग्रेस पार्टी का पेट पूरी तरह भर गया था और अब उन्हें अधिक सांसद पचाने की जरूरत ही नहीं थी.

सम्राट अमर सिंह भी अपने काम को अंजाम दे कर आश्वस्त भाव से आराम फरमा रहे थे. ऐसे में भाजपा के ये तीन सांसद किसी तरह कुंवर रेवती रमण सिंह को जबरदस्ती पकड़ कर उनके गले लग लिए और किसी भी तरह स्टिंग के लिए व्याकुल स्थिति में अमर सिंह के घर लगभग बिन-बुलाये पहुँच गए. अब पहुँच ही गए तो लगे हाथ अमर सिंह ने भी बोनस के तौर पर कुछ बचा-खुचा दे दिया.

आखिर इससे नुक्सान क्या था- सरकार को थोड़ी और सुरक्षा मिलती, उनकी कुछ और वाह-वाही होती. उन्हें क्या मालूम था कि जो असली खेल उन्होंने कॉंग्रेस के बड़े नेताओं (जिसमे विशेषकर अहमद पटेल का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है) के साथ मिल कर खेल लिया था उसमे तो वे साफ़ बच जायेंगे और यह बिन बुलाये मेहमान उनके गले की फांस बन जायेंगे. सच कहते हैं कि हाथी का निकलना आसान है, असली दिक्कत तो उसकी पूँछ के निकलने में होती है. इस बार अमर सिंह हाथी के पूछ में अटक गए, बाकी सब तो बड़ी आसानी से निपट गया था. शायद यह प्रकृति का नैसर्गिक न्याय भी है.

लेकिन जो असल बात मुझे भारी कष्ट देती है वह यह कि इस पूरे मामले में राजदीप सरदेसाई जैसे आदमी को पहले अमर सिंह और फिर सुधीन्द्र कुलकर्णी आदि को बचाने के लिए असत्य का साथ क्यों लेना पड़ा अथवा अपने एक पत्रकार को झूठा वक्तव्य देने के लिए क्यों मजबूर करना पड़ा? अपने देश में कुछ ही तो स्तंभ बचे-खुचे बताए जाते हैं जिनके लिए पत्रकारिता एक मिशन या एक सफ़ेद कारोबार के रूप में रह गया बताया जाता है. तहलका की इस स्टोरी को पढ़ने के बाद यह जान कर कि उन्होंने अपने एक युवा पत्रकार को गलतबयानी करने को कहा अथवा कई सारे महत्वपूर्ण साक्ष्य जैसे सांसद अशोक अर्गल के घर से अमर सिंह के घर जाने वाला वीडियो टेप तथा सुधीन्द्र कुलकर्णी को दिखाने वाला वीडियो टेप जानबूझ कर नहीं दिखाया ताकि इन लोगों की मदद हो, राजदीप सरदेसाई के प्रति मन में बैठे विश्वास को गहरा धक्का लगा.

पर यह भी अच्छा लगा कि तहलका की स्टोरी के लिखे जाने के करीब पांच महीने बाद दिल्ली पुलिस की विवेचना में लगभग वही सारे तथ्य आ रहे हैं जो आशीष खेतान ने अपने अकेले दम दुनिया के सामने रख दिया था. इसके साथ यह बात भी काबिलेतारीफ है कि तहलका ने आम भारतीय पत्रकारिता के चलन से हट कर जनता और सत्य के प्रति अपनी पहली प्राथमिकता दिखाते हुए अपने एक साथी चैनल की कमियों को भी उजागर करने में कोई हिचक नहीं दिखाई. यह नीति और यह नियम शेष मीडिया जगत को भी अपनाना चाहिए क्योंकि मीडिया की पहली जिम्मेदारी सच्चाई के प्रति है, ना कि अपने साथी मीडिया जगत के प्रति.

अंतिम बात यह कि इस पूरी कहनी से यह तो दिखता है कि भारतीय जनता पार्टी के बड़े लोगों द्वारा यह स्टिंग रचा गया था पर चूँकि अंत में जब अमर सिंह ने पैसा दे ही दिया तो उन तीनों भाजपा सांसदों, सुधीन्द्र कुलकर्णी आदि की कोई ऐसी गलत जिम्मेदारी मेरी समझ में नहीं आती क्योंकि उनका मुख्य उद्देश्य कॉंग्रेस सरकार को बदनाम करना तो था क्योंकि यह बात गलियों-कूचों तक पहुँच गयी थी कि इस समय सांसद महंगे बिक रहे हैं पर उनका उद्देश्य इस बहती गंगा में पैसे के रूप में कमाई करना तो नहीं ही था. फिर जैसा लाल कृष्ण आडवानी ने संसद में कहा, जब यह सारा उपक्रम उनके निर्देश और निर्देशन में हुआ तो घटना के सूत्रधार सुधीन्द्र कुलकर्णी हुए अथवा स्वयं आडवाणी और अरुण जेटली? यह प्रश्न भी अपने आप में विचारणीय होगा.

पीपल’स फोरम की संपादक डॉ नूतन ठाकुर का विश्लेषण

सुबोध यादव के बर्खास्‍तगी का आदेश सतही और दोषपूर्ण

: नेशनल आरटीआई फोरम इसकी भर्त्‍सना करती है : उत्तरदायी एवं पारदर्शी गवर्नेंस के क्षेत्र में कार्य कर रहे नेशनल आरटीआई फोरम उत्तर प्रदेश में आईपीएस अधिकारियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले जीआरपी गोरखपुर के सिपाही सुबोध यादव की जल्दीबाजी में एसपी जीआरपी गोरखपुर द्वारा की गयी बर्खास्तगी की कटु निंदा करती है.

हमने सुबोध यादव की 14(1) उत्तर प्रदेश अधीनस्थ पुलिस अधिकारी (आचरण एवं अपील) नियमावली 1991 के तहत बर्खास्तगी का आदेश देखा है और हम यह मानते हैं कि जिन आधारों पर उनकी बर्खास्तगी की गयी गई वह बहुत सतही और दोषपूर्ण हैं. हम सभी जानते हैं कि इस प्रदेश में सैकड़ों पुलिस कर्मी सालों से अनुपस्थित चल रहे हैं पर सुबोध मात्र 54 दिन और 14 घंटे की अनुपस्थिति के आधार पर बर्खास्त किये जा रहे हैं. वह भी तब जब आदेश के अनुसार सुबोध ने इस अवधि का चिकित्सकीय प्रमाणपत्र प्रेषित किया किन्तु एसपी जीआरपी ने इन अभिलेखों को स्वतः ही गलत मान लिया.

सुबोध की बर्खास्तगी का दूसरा कारण मु. अ. सन. 65 ऑफ 2011 धारा 353 आईपीसी व 3(2)(4) पुलिस बल (अधिकारों का प्रतिबन्ध) एक्ट 1966 थाना सिविल लाइन्स, इलाहबाद में उनका अभियुक्त होना बताया गया है. पर यह भी अपने आप में पर्याप्त कारण नहीं है क्योंकि सुबोध अभी इस अपराध में मात्र मुज्लिम बनाए गए हैं, अदालत द्वारा दोषसिद्ध नहीं हुए हैं. ऐसे में उन्हें दोषी मान कर कार्रवाई करना गलत और द्वेषपूर्ण जान पड़ता है. वे लगातार इस पूरे मुकदमे को बड़े अधिकारियों की साजिश बता रहे हैं.

यह बात अधिक महत्वपूर्ण इसीलिए हो जाती है क्योंकि सुबोध लगातार अधीनस्थ पुलिस कर्मचारियों के वाजिब हकों के लिए संघर्षरत रहे हैं और साथ ही वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के भ्रष्टाचार के विरुद्ध भी लड़ते रहे हैं. हाल में उन्होंने अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार-विरोधी मंच से सीधे-सीधे बृजलाल और एके जैन को महाभ्रष्ट बताया था. नेशनल आरटीआई फोरम का मत है कि सुबोध के साथ स्पष्टतया ज्यादती हुई है और घोर अन्याय हुआ है. फोरम सुबोध के साथ है और यह उम्मीद करती है कि उन्हें शीघ्र ही न्याय मिलेगा.

डॉ. नूतन ठाकुर

कन्वेनर, नेशनल आरटीआई फोरमम

मोबाइल – 94155-34525

”विवाहेतर संबंध क्‍या किसी को पीटने का अधिकार दे देता है?”

: दरोगा ने कहा – पत्‍नी बदचलन है इसलिए मैं तो उसे मारूंगा : मेरे पति अमिताभ जी के दफ्तर में मीनाक्षी नाम की एक महिला कॉन्स्टेबल काम करती है. कुछ दिनों पहले भड़ास पर मेरे पति ने उसकी कहानी पुलिस कांस्टेबल मीनाक्षी की संघर्ष यात्रा शीर्षक से आप लोगों को बतायी थी. मई में लिखे इस लेख के बाद करीब चार महीने बीत गए और मीनाक्षी की दशा बद से बदतर होती जा रही है.

मुझे यह उचित लगा कि मैं एक बार फिर आप लोगों के सामने उससे जुड़े कुछ महत्वपूर्ण बातें रखूं और इसके आधार पर मीनाक्षी की न्याय के लिए लगातार चल रही लड़ाई में अपना योगदान कर सकूँ. साथ ही मैं मीनाक्षी की कहानी के जरिये कुछ बुनियादी प्रश्न भी उठाना चाहती हूँ जो आप भी हमारे देश और समाज में बहुत प्रासंगिक है. मीनाक्षी का प्रेमविवाह हुआ था. उसकी शादी आज से छह साल पहले हुई थी. उस समय वह आगरा में तैनात थी और उसका होने वाले दरोगा पति अमित भी. मीनाक्षी खुद यह स्वीकार करती हैं कि उन दोनों के बीच प्रेम हो गया और फिर इसके बाद शादी.

इसी जगह हमारे पारंपरिक और पुरातनपंथी सोच की एक महत्वपूर्ण बानगी सामने आती है. चूँकि मीनाक्षी का प्रेम विवाह हुआ था, इसीलिए शायद उसके पति के घर वाले इस बात से आहत और प्रभावित रहे. आज भी हमारे देश में कई सारे परिवारों में यदि लड़के की शादी परिवार की मर्जी से नहीं हुई और लड़के ने अपनी मर्जी से ब्याह कर लिया तो उसे एक स्वाभाविक घटना नहीं मान कर एक बहुत गंभीर, अशोभनीय और नाक कटवा देने वाली घटना के तौर पर लिया जाता है. इस प्रकार जहां पश्चिम के देशों में स्वाभाविक तौर पर लड़के और लड़कियां अपनी पसंद के अनुसार ही अपना जीवन-साथी चुनते हैं वहीँ हम आज भी उसी पिछड़ी हुई सोच में उलझे हुए हैं जहां यदि लड़के ने प्रेम विवाह कर लिया तो खानदान की नाक कट गयी.

सच पूछिए, तो यह “खानदान” होता क्या है, मैं सही मायने में इसका मतलब तक नहीं समझ पायी हूँ. परिवार की बात तो समझ में आती है- माता, पिता, भाई, बहन, अन्य नजदीकी रिश्तेदार जो एक दूसरे के साथ रहते हैं या सुख-दुःख में मदद करते हैं. लेकिन जिस प्रकार से हम परिवार के लिए कम और “खानदान” के लिए ज्यादा परेशान घूमते दिखते हैं वह मेरी निगाह में तो मात्र हमारा आतंरिक अहम है जो “खानदान” जैसी कल्पित अवधारणा के नाम पर प्रस्फुटित होता रहता है और हम इसी के नाम पर सभी मानव मूल्यों को त्याग कर, सभी मानव अधिकारों को तिलांजलि दे कर हर प्रकार के जुल्म और अपराध करते रहते हैं. “खानदान की नाक” होती भी पता नहीं कैसी है कि किसी के किसी से प्रेम करने अथवा अपनी मर्जी से शादी करने से “कट” जाती है. मैं समझती हूँ कि अब समय आ गया है जब हम खुले ह्रदय और स्वच्छ मन से इस काल्पनिक अवधारणा के विषय में विचार करें और खानदान की नाक कटने के नाम पर जो दुनिया भर के अत्याचार और सितम ढाए जा रहे हैं, उससे पूरी तरह उबरें.

मीनाक्षी के कथन के अनुसार उसके मामले में भी ऐसा ही हुआ. वह बताती है- “मेरे पति के घर के लोग कभी भी मुझे पसंद नहीं करते थे, लिहाजा उन्होंने शुरू से ही मुझे प्रताडित करना शुरू कर दिया था. अमित के पिता, उसकी माँ और उसके भाई ना सिर्फ मुझे ताने देते थे बल्कि मेरे पति को भी इस तरह के आचरण के लिए भड़काते थे. आगे चल के मेरे पति को शराब पीने की आदत हो गयी और वे मुझे शराब के नशे में धुत्त हो कर काफी मारना पीटना शुरू कर दिए. कभी-कभी तो मेरी सास और मेरे देवर भी अकेले में मुझ पर हाथ छोड़ देते. मेरे पति मुझे हाथ-पाँव के अलावा बेल्ट, जूते या किसी भी अन्य सामन से मारते-पीटते.”

यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात गौर करने लायक है और हमारे समाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण भी. अकसर बहुत ठीक-ठाक और भले किस्म के लगने वाले लोग भी अपनी शरण में आई एक असहाय महिला के साथ इस कदर निर्मम और निष्ठुर हो जाते हैं जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती. मीनाक्षी की ही बात लें. वह कहती है- “वैसे तो मेरी सास श्रीमती महावीरी और ससुर राजवीर सिंह जो स्वयं भी पुलिस में आरक्षी थे, देखने और सुनने में बाहरी तौर पर काफी भले और सामाजिक व्यक्ति लगते थे किन्तु उसके पास रहने के बाद मुझे ज्ञात हुआ कि इन्सान की हैवानियत क्या होती है.”

किसी भी औरत पर अत्याचार खास कर इसीलिए भी अधिक गंभीर और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि हमारी परम्परा में एक महिला अपना सब कुछ छोड़कर ससुराल जाती है और वहॉं अपने ससुराल वालों के प्रेम और विश्वास के सहारे जीवन जीना चाहती है. इस तरह जब वह अपने ससुरालवालों की शरण में, उनकी कृपा पर रह रही होती है, तब यदि उस पर कोई जुल्म किया जाता है तो मेरी निगाह में इससे जघन्य कोई अन्य अपराध नहीं है. अपने घर में, अपनी शरण में आये व्यक्ति पर, उसकी असहायता के क्षणों में उस पर किसी भी प्रकार का अत्याचार अक्षम्य है. लेकिन यह भी सही है कि आज भी हमारे समाज में यह सब हो रहा है, कभी खुल पर तो कभी छिपे रूप में.

मीनाक्षी कहती है कि शुरू के दो साल तो वह यह मारपीट चुपचाप सहती रही किन्तु वर्ष 2008 के आते आते उसकी पीड़ा और प्रताड़ना इतनी बढ़ गयी कि वह बर्दाश्त करने लायक नहीं रही. पहली बार वह 11/02/2008 को एम0एम0सी0 अस्पताल गाजियाबाद गयी, जहॉं उसने मुख्य सी0एम0ओ0 को लिखित तौर पर कहा कि उसके पति ने उसे मारा-पीटा गया है और उसका डाक्टरी मुआयना किया जाये. इसके बाद भी उसके पति द्वारा मारने-पीटने का सिलसिला जारी रहा. जून 2008 में उसके पति ने इतनी बेरहमी से मारा कि उसके कान के पर्दे लगभग फट से गये थे और उसे नरेन्द्र मोहन अस्पताल गाजियाबाद में लंबा इलाज कराना पड़ा. इसके दो महीने बाद ही उसके पति ने उसे पुनः बहुत निर्ममता से मारा जिसके सम्बन्ध में उसने पुनः एम0एम0जी0 अस्पताल  में दिनांक-09/08/2008 को अपना मेडिकल कराया.

मीनाक्षी कहती है कि उसके पति अमित कुमार द्वारा अपने माता-पिता और भाई के साथ मिलकर उसे लगातार प्रताडित किया जाता रहा पर उसने उन्हीं अवसरों पर डाक्टरी करायी जब काफी गम्भीर रूप से चोट लगती थी. इसी क्रम में उसने  दिनांक-30/12/2008 को जिला चिकित्सालय मुरादाबाद में पुनः मेडिकल कराया था. लगभग 10 दिन बाद ही जब उसे एक बार पुनः बेहरमी से मारा गया तो उसने निश्चय किया कि अबकी डाक्टरी ही नहीं कराऊगी बल्कि प्रताडित करने वाले लोगो के खिलाफ एफ0आई0आर0 भी कराऊगी.

उसने 10/01/2009 को पति द्वारा मारे-पीटे जाने के बाद 12/01/2009  को प्यारे लाल शर्मा चिकित्सालय, मेरठ में अपना डाक्टरी मुआयना कराया, जिसमें कुल 9 चोट बतायी गयी. इन सभी चोटों के आकार इतने थे जिसे देखकर कोई भी यह कह सकता है कि उसे किस तरह से मारा-पीटा गया है. क्रम संख्या 5 पर उसके बांये हाथ के अग्र भाग में आयी चोट का आकार 10 सेंटीमीटर गुने 6 सेंटीमीटर था, जो यह साबित करता है कि उसका पूरा बायॅं हाथ ही कुचल सा दिया था. ऐसे ही क्रम संख्या- 7 पर बांये पॉंव पर चोट का आकार 7 सेंटीमीटर गुने 5 सेंटीमीटर था जो उस बर्बरता को दिखाता है. इस प्रकार यह सब हैवानियत सहने के बाद मीनाक्षी ने 12/01/2009  को अपना मेडिकल कराया और 14/01/2009 को एसएसपी के आदेश के बाद ही थाना दौराला पर मु0अ0सं0-21/09 धारा-323, 504, 506, 498 ए आईपीसी व 3/4 दहेज अधिनियम पंजीकृत हुआ. उस पर से तुर्रा यह कि मामले के विवेचक द्वारा 6/4/2009 को इस मामले में अन्य मुल्जिमों के नाम निकाल कर मात्र उसके पति के विरुद्ध सीमित धाराओं में ही आरोप पत्र प्रेषित कर दिया गया.

जब उसके पति अमित कुमार व परिवार वालो पर एफ0आई0आर0 हो गया तो उन्होंने मीनाक्षी से मिल कर उसे समझा लिया कि वह घर लौट आये, ऐसा आगे नहीं होगा. वह उस समय गर्भवती थी और उसे भी लगा था कि अपने होने वाले बच्चे के भविष्य के लिये अपने ससुराल लौट जाऊ. वापस आने के लगभग एक-दो महीने बाद वही बात दोहरानी शुरू हो गयी.  मीनाक्षी कहती है-“यह मेरा असीम दुर्भाग्य समझा जायेगा जिस दिन मेरी संतान ने जन्म लिया, उस दिन भी अस्पताल जाने से पूर्व मेरे पति ने मुझे बेहरमी से मारा.”  लडकी के पैदा होने के बाद वह मार-पीट चुपचाप सहन करती रही, लेकिन इस साल अप्रैल में एक बार मारपीट का सिलसिला बहुत बढ़ गया और दिनांक 28/04/11 को उन लोगों ने उसे बहुत ही बेहरमी से मारा. जब वह ये सारी चोट लेकर अपने कार्यालय आयी तो वहॉं सभी लोगों ने कहा कि इस अत्याचार का प्रतिरोध करना चाहिये.

इसके बाद 30/04/2011 को उसने अपना मेडिकल कराया. इस मेडिकल में भी 7 चोटें हैं, जिनके आकार यह बताने को सक्षम है कि उसे कितनी बेहरमी से मारा गया. एक चोट का आकार 12 गुने 7 सेंटीमीटर है तो अन्य चोट का आकार 7 गुने 6 सेंटीमीटर. इसके बाद मीनाक्षी ने थाना दौराला पर 03/05/2011 को एफ0आई0आर0 संख्या 327/11 दर्ज कराया. यह मुक़दमा भी पुलिस वाले नहीं लिख रहे थे, क्योंकि शायद उनकी निगाह में औरत का पति से पीटा जाना एक घरेलू और आतंरिक मामला है. मेरे पति अमिताभ जी ने इस मामले में थानाध्यक्ष को पत्र लिखा और फोन से वार्ता की. तब जा कर तो मुक़दमा लिखा गया और उसमे भी विवेचक प्रभाकर कैंथला ने मामला गलत बताते हुए अन्तिम रिपोर्ट लगाते हुये मामले को खत्म करने की कोशिश की थी. इस प्रकार मीनाक्षी के शरीर में जो गहरी चोटें थी जो उसे निर्ममता से मारे जाने की स्पष्ट निशानी थी, वे भी विवेचक को नहीं दिखाई दीं.

इस मामले में इसके अलावा भी छोटी-छोटी कहानियाँ हैं. जहां मीनाक्षी अपने तमाम अत्याचरों को लेकर लगातार संघर्षरत है, वहीं उसके पति इसे उसके चरित्र से जोड़े हुए हैं. उन्होंने तमाम स्थानों पर लिखित तौर से यह कहा है उनकी पत्नी का विवाह से पूर्व कई लोगों से सम्बन्ध था. मीनाक्षी खुद कहती है कि उसका एक सिपाही से विवाह से पूर्व स्नेह सम्बन्ध था.

वह बताती है कि यह सम्बन्ध शादी से पहले ही आज से करीब आठ साल पहले खत्म हो गया था पर साथ ही वह यह भी खुल कर कहती है- “एक स्वतन्त्र महिला के रूप में यह मेरा मौलिक अधिकार है कि मैं किसी पुरूष के साथ स्नेह पूर्ण सम्बन्ध रख सकूँ और मैं इसे किसी प्रकार से अनुचित नहीं मानती.” वह यह भी कहती है-“यदि कोई भी व्यक्ति इसे मेरी कमजोरी बनाने की कोशिश करता है अथवा इसे मेरी चरित्रहीनता के साथ जोड़ने की कोशिश करता है तो मैं इसे किसी भी कीमत पर सही नहीं मानती हूं और न ही इसे बर्दाश्त करूंगी. किसी भी स्वाभिमानी महिला की तरह मैं अपने चरित्र को लेकर सजग हूं और यद्यपि अपनी शादी के बाद मैंने किसी भी अन्य पुरुष से कोई सम्बन्ध नहीं बनाया पर एक बालिग महिला के रूप में मुझे प्रेम सम्बन्ध बनाने में पूरा अधिकार है.”

मैं समझती हूँ कि मीनाक्षी यहाँ एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न उठा रही है जिस पर हमारे समाज को गौर करना होगा. वैसे वह कह रही है कि उसके विवाह के बाद किसी भी अन्य पुरुष से सम्बन्ध नहीं रहे पर यदि एक पल को यह मान भी लें कि उसके इस तरह के सम्बन्ध बने तो क्या यह किसी भी प्रकार से उसके पति अथवा परिवार वालों को उसे प्रताडित करने अथवा मारने-पीटने का अधिकार देता है. क्या इस आधार पर कोई औरत निर्ममतापूर्वक मारी जाए कि उसके कथित तौर पर अन्य लोगों से सम्बन्ध हैं? मेरी निगाह में यह एक ऐसा महत्वपूर्ण प्रश्न है जिस पर ना सिर्फ खुल कर चर्चा होनी चाहिए बल्कि जिस पर समाज कि सोच को भी बदलने की जरूरत है.

सबसे कष्ट का विषय यह है कि पुलिस के बड़े-बड़े अधिकारी भी इन कथित संबंधों को मीनाक्षी की गलती और उसके साथ हो रहे अत्याचार का एक कारण बता देते हैं. मैं स्वयं उसे ले कर मेरठ के अपर पुलिस महानिदेशक गुरबचन लाल के पास गयी थी और उन्होंने छूटते ही मीनाक्षी को एक प्रकार से दोषारोपित सा कर दिया था कि तुम्हारे तो दूसरे लोगों से सम्बन्ध हैं. वे उसके पूर्व संबंधों पर अधिक बल दे रहे थे और उस बेचारी औरत के शरीर पर आई चोटों के प्रति बेपरवाह से दिख रहे थे. जब मैंने उन्हें कहा कि प्रेम सम्बन्ध अलग बात है और यह किसी भी प्रकार से किसी को पीटने का हक नहीं देता, जब वे थोड़ी सी हरकत में आये थे, यद्यपि इसके बाद भी मीनाक्षी के मामले में फाइनल रिपोर्ट लगा दी गयी थी.

मैं अपनी तरफ से मीनाक्षी की पूरी मदद करने की कोशिश कर रही हूँ और उससे भी खुशी की बात यह है कि तमाम परेशानियों और हर तरह की विपरीत स्थितियों के बाद भी मीनाक्षी ने लड़ने का हौसला नहीं खोया है. मैं समझती हूँ कि मीनाक्षी का यह संघर्ष का माद्दा ही अंत में उसके काम आएगा और मुझे पूर्ण विश्वास है कि आज नहीं तो कल वह अपनी इस लड़ाई में जरूर सफल होगी.

पर यह भी सही है कि मीनाक्षी की कहानी अकेले उसकी कहानी नहीं है. आज भी हमारे देश में ना जाने कितनी ही मीनाक्षी अपने ससुराल वालों से अलग-अलग कारणों से प्रताडित हो रही हैं- कभी दहेज के लिए, कभी प्रेम विवाह हो जाने और इसके कारण कई सारे लोभ के फलीभूत नहीं हो पाने के कारण, तो कभी सुंदरता के नाम पर तो कभी लड़का पैदा नहीं हो पाने पर. इसी तरह से आज भी तमाम मीनाक्षी विवाहेतर संबंधों के नाम पर मारी-पीटी जा रही हैं. “अस्तित्व” फिल्म ने इससे मिलती-जुलती समस्या बड़े करीने से उठायी थी जहाँ पति विवाह के बाद भी लगातार मनमर्जी से अन्य महिलाओं से सम्बन्ध बनाता रहा पर जब उसे अपनी पत्नी के विषय में ऐसी बात मालूम हो जाती है तो उसका पूरा रुख ही बदल जाता है. यहाँ तो स्थिति

डा. नूतन ठाकुर
उससे भी विकराल है जहाँ उसका पति कथित विवाहेतर संबंधों के नाम पर उसे लगातार क्रूरता से मार-पीट रहा है और थाना-पुलिस ने उसकी सुनवाई इस नाम पर नहीं कर रही है कि उसके तो बाहर सम्बन्ध हैं या रहे हैं. इस मामले में मुझे मीनाक्षी की यह बात बहुत पते की लगी जो उसने मुझे कहा था- “ बाकी सारी बातें जो मैं कह रही हूं, वे भले ही झूठ साबित हो जाये किन्तु एक चीज जिसे कोई नहीं झुठला सकता वे हैं मेरे शरीर पर आये तमात चोट जो आधा दर्जन मेडिकल रिपोर्ट में मौजूद हैं.”

डॉ. नूतन ठाकुर

सचिव

आईआरडीएस

क्या आईपीएस अफसर पर जीवन भर तलवार लटकाए रखेंगे?

मैं ने अपने पति अमिताभ जी से जुड़े कई मामले भड़ास पर रखे, जिन में उन्हें बिना किसी कारण के प्रदेश सरकार से प्रताडित और परेशान होना पड़ा पर उन्होंने बिना हार माने और बिना किसी के सामने झुके किस तरह अपने अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष किया और कई मामलों में विजय भी हासिल की.

यदि आपको स्मरण हो तो मैं ने सबसे पहले अमिताभ जी से जुड़ा लेख लिखा था उनके गोंडा जिले के एसपी के रूप में वह प्रकरण जिस में उन्हें बिना किसी भी आधार के उनकी दरियादिली को हथियार बना कर उनको बदनाम करने की साजिश की गयी थी- हथियारों की सौदागरी और मीडिया ट्रायल.  इसके बाद मैं ने उनके अध्ययन अवकाश से सम्बंधित कई खबरें भड़ास पर भेजी जिसे अत्यंत उदारता के साथ यशवंतजी ने यहाँ प्रकाशित किया.

यह भी सही है कि मेरी हर बात को हर आदमी ने स्वीकार नहीं किया और कुछ लोगों को यह सब मेरा और अमिताभ जी का झूठा और छिछला प्रयास लगा, जिसके लिए इन लोगों ने मेरी और अमिताभ जी की निंदा करने के साथ-साथ यशवंत जी को भी अच्छी तरह लपेटा और उन पर यह आरोप लगाया कि चूँकि हमने उन्हें एक पुरस्कार दे दिया इसीलिए वे हमारी सभी गलत-सही बातों को छापते रहते हैं. जबकि ना तो वह कोई इतना बड़ा पुरस्कार था ना उससे कोई धनराशि ही जुड़ी है पर हाँ, उस पुरस्कार में हमारा प्यार जरूर छिपा था और इसी के जरिये हमें एक बहुत नजदीकी साथी मिले थे.

मेरे पति को अध्ययन अवकाश, जो जानबूझ कर उन्हें परेशान करने की नियत से उत्तर प्रदेश के दो ताकतवर और रसूखदार अधिकारियों श्री कुंवर फ़तेह बहादुर और श्री विजय सिंह द्वारा न्याय का गला दबा कर रोका गया था, अंत में इसी साल के जून महीने में मिला और साथ ही करीब ग्यारह लाख रुपये भी, जो यहाँ अंततः मिली स्टडी लीव : पढ़ना उतना आसान नहीं रहा शीर्षक से छपा था.

लगभग इसी अवधि में मेरे पति अमिताभ जी ने एक और कानूनी लड़ाई हाई कोर्ट, इलाहाबाद के आदेशों के बाद तब जीती जब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री ने अपने सचिव श्री विजय सिंह, जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थो और नाराजगी के चलते गृह विभाग के प्रमुख सचिव श्री कुंवर फ़तेह बहादुर के साथ मिल कर उन्हें पिछले लगभग चार साल से लगातार परेशान करने की कोशिश कर रहे हैं, के दिये गए आदेश को गलत पाते हुए रद्द कर दिया.

यह वास्तव में एक बहुत बड़ी विजय थी जब यह बात अभिलेखों पर साबित हो गयी कि श्री विजय सिंह ने अपने अधिकार क्षेत्र से बढ़ कर गलत आदेश किया. मायावती ने सचिव विजय सिंह के गलत आदेश को किया रद्द शीर्षक इस लेख से मालूम हो सकता है कि कुछ अधिकारियों के निहित स्वार्थों के सामने घुटने नहीं टेकने और अपनी प्रतिष्ठा बचाए रखने में अमिताभ जी को किस-किस तरह से प्रताड़ना मिली और कैसे न्यायालय के हस्तक्षेप से ही उन्हें न्याय मिल सका.

कुछ लोगों ने मेरे द्वारा इन प्रकरणों को यहाँ रखने की निंदा की और इसे व्यक्तिगत मामला बताते हुए इससे किसी और का मतलब नहीं होने की बात कही और कहा कि भड़ास पर इसका कोई मतलब नहीं है. मैं इससे पूर्णतया असहमत हूँ क्योंकि मैं जानती हूँ और सभी जानने वाले जानते हैं कि सुश्री मायावती के निकटस्थ और विश्वस्त अधिकारियों के रूप में श्री कुंवर फ़तेह बहादुर और श्री विजय सिंह की उत्तर प्रदेश में क्या स्थिति है और इनके सामने खड़े होने का क्या मतलब है. मैं दावे से कह सकती हूँ कि इसके लिए बहुत कलेजे की जरूरत है और यदि कोई भी ऐसा करता है तो वह मामला स्वतः ही उस व्यक्ति का निजी मामला नहीं हो पर एक सार्वजनिक और सामाजिक सन्दर्भ का मामला बन जाता है.

इस श्रृंखला में एक और जीत अमिताभ जी ने कल कैट, लखनऊ में हासिल की जहां उनका मुक़दमा 177/2010 चल रहा था. इस मामले में पहले आठ अगस्त 2011 को एक बार पूरी बहस हो गयी थी और कैट द्वारा फैसला सुरक्षित कर लिया गया था. फिर इस पूरी बहस के दो दिन बाद उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से सरकारी वकील ने यह दरख्वास्त लगा दी थी, उन्होंने सरकार की तरफ से दाखिल करने के लिए एक एफिडेविट दिनांक 01/11/2010 (यानि करीब आठ महीने पहले) को बना कर सरकार को भेजा था, जो सरकार के अधिकारी की तरफ से साइन हो कर 17/06/2011 (करीब सात माह बाद) को उन्हें मिला, जो संयोग से उनकी फ़ाइल में कहीं खो गया. इसीलिए उस एफिडेविट को कैट के सामने रखने की अनुमति दी जाए. इस पर फिर 17 अगस्त को बहस हुई और फैसला एक बार फिर सुरक्षित हुआ जो अब कैट द्वारा सुनाया गया.

मैं फैसले पर आने के पहले थोड़ा इस मामले को बताना चाहूंगी. अमिताभ जी के विरुद्ध अखिल भारतीय सेवा (अनुशासन एवं अपील) नियमावली 1969 के नियम 10 के अंतर्गत उनके देवरिया जिले के पुलिस अधीक्षक पद से जुड़े कुछ प्रकरण में वर्ष 2000 में डीजीपी ऑफिस को शिकायतें मिली थीं. मूल रूप से ये दो शिकायतें थीं- एक तो यह कि उनके द्वारा एक सामाजिक संस्था पंजीकृत कराई गयी, उस संस्था की सचिव के रूप में मेरे नाम से 21 डिसिमल जमीन देवरिया के क़स्बा गौरीबाजार में खरीदी गयी पर उस भूमि के खरीदने और उक्त संस्था के अध्यक्ष पद ग्रहण करने की कोई सूचना उन्होंने उत्तर प्रदेश शासन को नहीं दी गयी. दूसरा आरोप यह लगा था कि देवरिया के थाना रामपुर कारखाना में एक मुकदमे में जमा एक मारुती कार को उनके द्वारा स्वयं ख़रीदे जाने के उद्देश्य से कम कीमत में नीलाम करा दिया गया और एक कथित रिश्तेदार के जरिये ख़रीदा गया.

इन शिकायतों पर गृह विभाग, उत्तर प्रदेश शासन ने उत्तर प्रदेश सतर्कता विभाग से जांच कराई और यह जांच उत्तर प्रदेश सतर्कता अधिष्ठान ने की, जिसने 02/01/2004 को अपनी जांच आख्या सतर्कता विभाग को सौंप दी. अपनी जांच में सतर्कता अधिष्ठान ने साफ़ लिखा- “उल्लिखित तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में शासन द्वारा श्री अमिताभ ठाकुर, तत्कालीन पुलिस अधीक्षक, देवरिया को भविष्य के लिए सचेत किये जाने की संस्तुति की जाती है.”

उस जांच में यह बात भी सामने आ गयी कि जिस भूमि को मेरे नाम की भूमि कही जा रही थी वह मूल रूप से दो संस्थाओं के नाम थी, ना कि मेरी निजी भूमि. इसी तरह मारुती कार के सम्बन्ध में यह बात सामने आई कि इसे नीलाम करने का कानूनी आदेश मुख्य न्यायिक मैजिस्ट्रेट, देवरिया ने दिया था, जिस पर जिला मजिस्ट्रेट देवरिया के आदेश पर उसकी नीलामी एसडीएम देवरिया ने परिवहन विभाग के आरआई गोरखपुर के इंस्पेक्शन में लगाईं गयी कीमत के अनुसार की. यह बात भी विजिलेंस की जांच में आई कि चंद्रभान राय, जिन पर हमारे रिश्तेदार के रूप में वह मारुति कार खरीदने का आरोप लगा था, से हमारी किसी भी प्रकार की रिश्तेदारी या सम्बन्ध की बात जांच के मध्य प्रकाश में नहीं आई.

बात वहीँ समाप्त हो जानी चाहिए थी पर चूँकि अमिताभ जी ने किसी से कोई व्यक्तिगत संपर्क नहीं किया, लिहाजा मामला खींचता ही रहा. पहले उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गयी जो 27/10/2004 को शुरू हुई, पर मामला लटकाया जाता रहा और अंत में जा कर 25/05/2007 को इन्हें चेतावनी देते हुए मामला समाप्त किया गया. लेकिन अभी इस मामले में और भी मजेदार बातें होनी थी.

अमिताभ जी गोंडा में 30/12/2004 को सस्पेंड हुए थे पर उनकी जांच जान-बूझ कर खींची जाती रही थी और अंत में जब इन्हों ने कैट, लखनऊ में कंटेम्प्ट केस किया तो यह जांच 22/05/2009 को अमिताभ जी को दोषमुक्त मानते हुए खत्म की गयी. यानी पांच साल बाद वे निर्दोष साबित हुए और सस्पेंशन के समय की पूरी तनख्वाह भी मिली. लेकिन इसके साथ उत्तर प्रदेश शासन के अधिकारियों, जैसे श्री कुंवर फ़तेह बहादुर और श्री विजय सिंह, को शायद यह दिक्कत हो गयी कि अब अमिताभ जी के खिलाफ कोई जांच नहीं बची थी और अब उन्हें नियम से डीआईजी पद पर प्रमोट करना बाध्य हो गया था. चूँकि वे किसी कीमत पर ऐसा नहीं चाहते थे, इसीलिए अपने पद और रसूख का बेजा इस्तेमाल करते हुए जिस दिन 22/05/2009 को अमिताभ जी की गोंडा वाली जांच समाप्त हुई, ठीक उसी दिन दो साल पहले 25/05/2007 को चेतावनी दे कर समाप्त की गयी देवरिया वाली जांच अचानक फिर से शुरू कर दी गयी. तर्क यह दिया गया कि इस मामले में जब राज्य सरकार ने 25/05/2007 को अमिताभ जी को चेतावनी दी थी तब गृह मंत्रालय, भारत सरकार के 13/07/2007 को राज्य सरकार को यह पत्र लिखा था कि चूँकि चेतावनी कोई सजा नहीं होती, अतः इस अधिकारी को या तो परिनिन्दा का दंड दिया जाए या फिर पूरी तरह माफ किया जाए. मजेदार बात यह रही कि राज्य सरकार में यह चिट्ठी दो साल तक यूँ ही दबी रही थी पर अमिताभ जी के गोंडा वाली जांच में उनके दोषमुक्त होने पर यह दो साल पहले की यह चिट्ठी अचानक सामने आ गयी.

अमिताभ जी ने इस जांच के खुलने के तुरंत बाद सरकार को यह लिखा था कि अखिल भारतीय सेवा (अनुशासन एवं अपील) नियमावली 1969 के नियम 24 के तहत कोई भी सरकार अपने पूर्व के फैसले को एक साल के अंदर ही पुनरीक्षित कर सकती है, अतः राज्य सरकार का दो साल बाद मामले का पुनरीक्षण करना प्रथम-दृष्टया ही गलत है. पर राज्य सरकार ने इनकी बात नहीं सुनी थी जिस पर अमिताभ जी कैट गए थे और इसमें सीधे-सीधे प्रमुख सचिव, गृह श्री कुंवर फ़तेह बहादुर पर यह आरोप लगाया था उन्होंने उनकी प्रोन्नति रोकने के लिए यह षडयंत्र किया.

अब जा कर कैट ने अमिताभ जी की बात को कानूनन सही मानते राज्य सरकार के आरोप पत्र को खारिज कर दिया है. अपने आदेश में कैट के न्यायाधीश अलोक सिंह तथा न्यायाधीश एस पी सिंह के दो-सदस्यीय बेंच ने कहा-“आखिर किसी भी बात का अंत होना चाहिए. यह एक अंतहीन प्रक्रिया नहीं हो सकती जिस में अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी के ऊपर बिना उसकी गलती के राज्य सरकार की मनमर्जी से नियमों को दरकिनार करके सालों तक लगातार तलवार लटकाया गया हो”.

कैट ने यह कहा कि यह मामला अमिताभ की किसी देरी या गलती के बगैर राज्य सरकार द्वारा सालों तक लंबित रखा गया जो गलत है. कैट ने इस बात का भी उल्लेख किया कि इस मामले की ड्राफ्टिंग और बहस अमिताभ ने खुद की. कैट ने राज्य सरकार को तीन आईपीएस अधिकारी अजय आनंद, राम कुमार तथा लव कुमार के मामलों में विभागीय कार्रवाई को चेतावनी दे कर समाप्त करने और इसी को आधार बना कर अमिताभ की विभागीय कार्रवाई दुबारा शुरू कर देने को भी गलत बताया. कैट ने अन्य कई स्थानों पर अपने इस निर्णय में राज्य सरकार के इस कृत्य को गलत बताते हुए उसकी निंदा की. कैट ने कहा- “इसका यह अर्थ है कि या तो राज्य सरकार इन मामलों में क़ानून का सही ढंग से पालन नहीं कर रही है अथवा वादी (अमितभ) के लिए अलग मानदंड के अनुसार कार्रवाई कर उनके साथ अन्याय कर रही है.”

इस प्रकार तकनीकी रूप से अमिताभ जी पर अब कोई भी जांच लंबित नहीं है. कानूनन ऐसी स्थिति मे अमिताभ जी को प्रोन्नति दिया जाना चाहिए, पर जैसा हम लोगों ने उनके स्टडी लीव मामले में देखा था, राज्य सरकार ने एडी-चोटी का जोर लगाने और सभी जगह से हारने के बाद ही स्टडी लीव दिया था. मैं यहाँ जो भी बात लिखी है, उन में से प्रत्येक बात को साबित करने के लिए मेरे पास अभिलेख हैं और यदि मेरी कोई बात गलत निकलती है तो मैं कोई भी सजा भुगतने को तैयार हूँ.

पर अमिताभ जी की इस कहानी को कहने का मुख्य उद्देश्य उनकी कोई तारीफ़ करना और उनकी व्यक्तिगत कहानी सुनाना नहीं है (यद्यपि ये दोनों बातें कहीं ना कहीं स्वतः ही हो जा रही हैं), इसका असल उद्देश्य यह बताना है कि कैसे व्यवस्था में कई बार ताकतवर और रसूखदार लोग अपनी ताकत और पहुंच का बेजा इस्तेमाल करके व्यवस्था से खेल रहे हैं. इसके साथ मैं यह भी कहना चाहती हूँ कि यदि हम इन स्थितियों से उबरना चाहते हैं तो हमें इसके लिए किसी बाहरी ताकत पर आधारित होने की नहीं, अपने अंदर शक्ति पैदा करने की जरूरत है. लेकिन इसके साथ ही विपरीत स्थितियों को झेलने और इस दौरान उत्पन्न हुई कठिनाईयों का भी सहर्ष सामना करने की नितांत जरूरत है. यदि हम में से अधिकाँश लोग ऐसे मनोभाव विकसित कर लें तो हम सत्ता और ताकत में मदांध लोगों का बिल्‍कुल मुकाबला कर सकते हैं. अन्यथा कोई भी संस्था हमारी मदद नहीं कर पाएगी.

डॉ. नूतन ठाकुर

स्वतंत्र पत्रकार

लखनऊ

यूपी के होते जूलियन असांजे तो बुरा हाल करती भ्रष्‍ट माया सरकार

डा. नूतनयह तो हम सभी जानते हैं कि विकिलीक्स पर हमारे देश की एक महाराज्ञी सरीखी नेता सुश्री मायावती के विषय में काफी-कुछ खरी-खरी बातें लिखी गयी थीं. इनमे जो महत्वपूर्ण बातें थीं वे यह कि मायावती आत्ममुग्ध नेत्री हैं जिनके अंदर प्रबल तानाशाही प्रवृत्ति है और वे अपनी महानता के दिवा-स्वपनों में खोयी रहती हैं.

उनके काम-काज के तरीकों के विषय में भी कई टिप्पणियाँ विकिलीक्स में प्रकाशित हुईं.  सुश्री मायावती के भ्रष्टाचार सम्बन्धी आचरण के विषय में भी काफी कुछ लिखा गया. ये सब खबरें विकिलीक्स अथवा मिस्टर जूलियन असान्जे के निजी विचार नहीं थे बल्कि ये सारी वे बातें थीं जो विभिन्न अमेरिकी राजनयिक ने अपने विचार लिखित रूप में आधिकारिक तौर पर प्रेषित किये थे और जो अब जा कर सार्वजनिक हो रहे हैं. इन केबलों में खास कर एक खबर जो काफी चर्चा में आई थी वह यह कि सुश्री मायावती कई बार अपने लिए पसंदीदा चप्पल/सैंडल मंगवाने के लिए अपना निजी खाली विमान मुंबई भेजा करती रही हैं, जो एक प्रकार से उस गरीब जनता के साथ भद्दा मजाक है जिसका वे अपने आप को प्रतिनिधि बता कर राज करती हैं.

वैसे जो भी आदमी उत्तर प्रदेश में रहता है और निष्पक्ष रूप से चीज़ों का आकलन करता है. वह जूलियन असान्जे के वेबसाईट पर लिखे गए इस बात से शब्दशः इत्तेफाक करेगा. यदि यह सत्य है कि मायावती दलित वर्ग की अघोषित देवी हैं और दलित वर्ग का उन पर अगाध विश्वास है जो यह मानता है कि मायावती ने उन्हें वह इज्जत और सामाजिक प्रतिष्ठा दी, जिसके वे हमेशा से मोहताज थे, तो यह भी उतना बड़ा ही सत्य है कि मायावती की सरकार के भ्रष्टाचार के बारे में लोग सडकों और गली-चौराहों पर चर्चा करते हैं. प्रदेश का बच्चा-बच्चा इस बात से अवगत है कि यहाँ कोई भी सरकारी काम कराने के लिए पैसा देने की जरूरत शायद पड़ ही जाती है. यद्यपि इस सम्बन्ध में अकसर बातें रिकॉर्ड पर नहीं आ पाती हैं क्योंकि हर आदमी मायावती की सरकार में भय खाता है और उसे यह भी डर होता है कि यदि इसका प्रतिवाद किया तो एक तो काम नहीं ही होगा, उलटे कोई अन्य मामले में ना फंसा दिये जाएँ. पर कभी-कभार इंजीनियर मनोज गुप्ता की जन्मदिवस पर हुई हत्या या आईएएस अधिकारी की आत्महत्या के बाद इस तरह की बातें लगभग सार्वजनिक हो ही जाती हैं.

यह बात भी सत्य है कि मायावती की सरकार एक व्यक्ति के एकछत्र राज्य वाली सरकार है, जिस में पुराने जमाने के तानाशाहों की तरह विरोध का सिर्फ एक नियम है- राजनैतिक रूप से सजा-ए-मौत. आवश्यकता पड़ने पर कई बार पुलिसिया तंत्र का भी भरपूर उपयोग करने में किसी को भी हिचक नहीं होती जैसा दिवंगत किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत द्वारा मायावती को कुछ अपशब्द कहने के मामले में हेलिकॉप्टर से ले कर पूरी बटालियन लगा कर उनकी गिरफ़्तारी कराने तथा उसी दौरान उत्तर प्रदेश की कॉंग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के घर को लगभग खुलेआम पुलिस के आला अधिकारियों के सामने जला देने की घटना में हुआ था.

मायावती के शाहखर्चे के विषय में भी किसी को अनभिज्ञता नहीं होगी क्योंकि सभी जानते हैं कि एक गरीब घर में पैदा होने और कोई भी ज्ञात व्यवसाय नहीं करने और पूरी तरह राजनैतिक जीवन जीने के बावजूद उनके पैसे ना जाने कैसे दिन-दूने रात-चौगुने बढ़ते ही जाते हैं और दिल्ली, नोयडा, अपने पैतृक गाँव, लखनऊ आदि में उनका निवास स्थान किसी राजघराने के मालिक से कम नहीं है. साथ ही उनका व्यक्तिगत जीवन, जो मीडिया के जरिये आम लोगों तक आता है, वह भी यही दिखलाता है कि अकूत ताकत और बेहिसाब दौलत की मालकिन मायावती बीते दिनों की एक मनमर्जी के तानाशाह की तरह आचरण करती हैं.

उन का यह सब कुछ उनके दल वाले इसीलिए बर्दाश्त करने को तैयार बैठे हैं क्योंकि उनके पास पन्द्रह से बीस प्रतिशत ऐसे मत हैं जो उनकी जेब में हैं और जिसे वे जिसको चाहें, एक इशारे में दान दे सकती हैं. एक लोकतंत्र में इससे बड़ी ताकत और कोई नहीं हो सकती और इसीलिए हर नेता बहुजन समाज पार्टी का टिकट पाने को सतत प्रयत्नशील रहता है. दूसरे दल भी इन्हीं कारणों से बहन मायावती को खुश रखने में लगे रहते है कि यदि उनकी नजरें इनायत हो गयीं तो सत्ता का रास्ता सीधे खुल जाएगा. यह अलग बात है कि मायावती से इतनी आसानी से कुछ पा सकना आसान नहीं है और आज तक जिसने भी उनसे कुछ पाने के चक्कर में हाथ बढ़ाया है उसने अपना हाथ जलाया ही है, पर फिर भी यह तय है कि आगे भी अन्य राजनैतिक दल इन अनुभवों को दरकिनार करते हुए बार-बार अपना हाथ जलाते रहेंगे और मायावती के सम्मुख सतत उनकी कृपा पाने को नतमस्तक रहेंगे. इस प्रक्रिया में उनके द्वारा किये गए सारे कार्य स्वीकार्य होंगे क्योंकि लोकतंत्र में शायद एक ही चीज़ का मतलब होता है- किसके पास कितने वोट हैं, और इस मामले में आज पूरे हिंदुस्तान में सुश्री मायावती का कोई जोर नहीं है.

जिस महिला के सामने देश के प्रधानमंत्री और देश की सबसे ताकतवर महिला सुश्री सोनिया गाँधी तक आदर से पेश आते हों और उनकी सभी इच्छाओं को शिरोधार्य करते हों यदि उन्हें एक कल का युवक जूलियन असान्जे अपनी वेबसाईट पर उनका चेहरा दिखाने की कोशिश करेगा तो सम्राज्ञी का तिलमिलाना निश्चित रूप से स्वाभाविक है. तत्काल उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने असांजे के लिए फरमान जारी कर के कहा था कि उन्‍हें उनके देश के पागलखाने में भर्ती कराना चाहिए. साथ ही यह भी कि अगर वहां जगह नहीं हो तो मैं अपने प्रदेश के आगरा में स्थित पागलखाने में उन्‍हें रखने के लिए तैयार हूं.

यह तो सही है कि यदि असान्जे उत्तर प्रदेश (या शायद हिंदुस्तान में कहीं के भी होते) तो मायावती उन्हें आगरे के पागलखाने में डाल देतीं और तब असान्जे को खबरी पत्रकारिता का असली मजा मिलता, पर चूँकि वे सात समुन्दर पार आराम से एक लोकतांत्रित देश में बैठे हुए हैं, तभी वे वहाँ से मायावती को अपना जवाब दे पा रहे हैं, और ये जवाब उसी अंदाज में दे रहे हैं जिस अंदाज में सुश्री मायावती ने असांजे पर खुलासे के बाद तिलमिलाते हुए कहा था. असांजे ने माया पर शब्‍दों से कड़े प्रहार करते हुए ये मांग की है कि माया अपनी गलती स्‍वीकार करते हुए उनसे माफी मांगें. उन्होंने एक टीवी चैनल से पत्राचार में कहा कि अगर मायावती उन्‍हें लेने के लिए इंग्‍लैंड जहाज भेज दें तो वे खुशी-खुशी चले आयेंगे, और साथ ही मायावती के लिए चुनिन्दा चप्पलों की जोड़ी भी ले आयेंगे.

सुनने में तो यह बहुत प्यारा और दिलेर लगता है पर मैं यह सोच रही हूँ कि यदि असान्जे भारत/ उत्तर प्रदेश के होते तब उत्तर प्रदेश की सम्राज्ञी उनका क्या हाल बनातीं, किस पागलखाने में भेजतीं या उनके पुलिसवाले असान्जे के खिलाफ किन धाराओं में मुक़दमा बना रहे होते?

डॉ. नूतन ठाकुर

स्वतंत्र पत्रकार

लखनऊ

अमिताभ एवं नूतन ने एडीजी से की अभद्र जीआरपी वालों की शिकायत

कल रात दिनांक 10/08/2011 को नौचंदी एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 14511) के सेकंड स्लीपर एस7 कोच में मैं और मेरे पति श्री अमिताभ, वर्तमान में एसपी, ईओडब्ल्यू, मेरठ के पद पर तैनात हैं, पीएनआर संख्या 2323939475 सीट संख्या 31, 32 पर लखनऊ से मेरठ यात्रा कर रहे थे. यहाँ हम लोगों के साथ एक अजीब और दुर्भाग्यपूर्ण हादसा हुआ. हमारे गाड़ी में बैठने के कुछ समय बाद जीआरपी के दो सिपाही आये और हम सभी लोगों से बहुत ही गंदे और अभद्र ढंग से कहने लगे कि हम अपने सामान आदि को चेन से बाँध लें.

यद्यपि वे बाह्य तौर पर हमारे भले की ही बात कह रहे थे पर यह बात वे इतने खराब ढंग से कह रहे थे कि हर किसी को बुरा लग रहा था. हम लोगों ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की. उन्हें स्वाभाविक रूप से यह जानकारी नहीं थी कि सेकण्ड स्लीपर कोच में कोई आईपीएस अधिकारी भी उपस्थित है.

पुनः रात में करीब तीन बजे जीआरपी के एक सब इन्स्पेक्टर आये और उन्होंने मुझे तथा अन्य सभी लोगों को जगा दिया. उन्होंने मुझे अपना सामान चेन से बाँधने को कहा पर वे जिस तरह से बात कर रहे थे और जैसी बातें बोल रहे थे वे अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण थी. मैं उन्हें कह रही थी मेरे पास चेन नहीं है पर वे बार-बार मुझे गैर-जिम्मेदार कह रहे थे और कह रहे थे इन्हीं लोगों के सामान चोरी हो जाया करते हैं. वे ऐसा ही दूसरे पैसेंजर से भी कर रहे थे.

वे जीआरपी वाले इतनी बार और ऐसे ढंग से सावधान रहने की बात कर रहे थे कि मुझे शक सा हो गया कि कहीं वे किसी गैंग से मिल कर सामानों की चोरी तो नहीं करा रहे हैं और यहाँ हम लोगों को झूठ-मूठ हड़का रहे हैं ताकि सामान चोरी होने पर हमी से उलटे कहें कि हमने आपसे पहले ही कहा था. मैं इस मारे रात भर नहीं सो सकी.

सुबह मेरठ पहुँच कर जब हमने जीआरपी थाने पर बात की तो थाना इंचार्ज और दूसरे लोगों ने बताया कि एडीजी एके जैन और एसपी जीआरपी मुरादाबाद के आदेश से यह हो रहा है. मैंने एडीजी एके जैन से बात की तो उन्होंने बताया कि उनके द्वारा ऐसा कोई आदेश नहीं दिया गया है. मैंने अब एडीजी जीआरपी को इस सम्बन्ध में एक लिखित शिकायत भेजी है. इसमें मेरा मुख्य उद्देश्य यह है कि भविष्य में इस तरह के दुर्व्यवहार नहीं होवें.

डा. नूतन ठाकुर

पत्रकार एवं समाज सेवी

प्रेस काउन्सिल ने दैनिक जागरण, लखनऊ के संपादक को नोटिस भेजा

डा. नूतन ठाकुर कुछ दिनों पहले दैनिक जागरण में मुझसे जुडी एक खबर प्रकाशित हुई थी, ‘असली राज’  शीर्षक से. इस सम्बन्ध में भड़ास पर एक खबर भी छपी थी- नाम से ‘ठाकुर’ शब्द हटाना जागरण वालों को नहीं पचा. बात यह हुई थी मेरे पति अमिताभ जी द्वारा अपना उपनाम हटाये जाने पर दैनिक जागरण के 10 अप्रैल 2011 के लखनऊ संस्करण के पृष्ठ संख्या 13 पर ‘सत्ता के गलियारे से’  शीर्षक अंतर्गत छपे एक खबर ‘असली राज’ छपी थी.

इस में अमिताभ जी द्वारा अपने नाम के साथ जुड़े जातिसूचक उपनाम को हटाने के पीछे कई सारे कारण बताए गए, जिन्हें पढ़ कर ऐसा आभास होता था कि अमिताभ जी द्वारा यह कार्य किसी अच्छे उद्देश्य से नहीं कर के तमाम मजबूरियों और छिपे कारणों से किया गया हो. उस में भी खास बात यह थी कि संवाददाता महोदय ने इस खबर में अपनी कही गयी बातों के लिए कोई कारण अथवा आधार नहीं दिया था जैसा कि पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों और नियमों के अनुसार आवश्यक है. उनकी बातें तथ्यपरक नहीं हो कर एक प्रकार से उनकी कपोलकल्पना ही दिख पड़ती थी.

अपनी इस खबर में संवाददाता महोदय ने मेरे पति के साथ मेरे विषय में भी ऐसी बातें लिखीं जो मेरे लिए हानिपरक, मिथ्या और सार्वजनिक रूप से अनुचित थीं. उन्होंने लिखा -”मेम साहब एक गैरसरकारी संस्थान से जुडी हैं. इस संस्था ने उस आईपीएस अधिकारी को पुरस्कार दिया तो अखबार में ख़बरें छप गयीं कि ‘मेम साहब’  ने घर का इनाम घर में ही रख लिया. मेम साहब को सफाई छपवाने में मेहनत करनी पड़ी.”  सत्यता यह थी कि ऐसी खबर दैनिक हिंदुस्तान के लखनऊ संस्करण में छपने के बाद मैंने जैसे ही उनके संपादक नवीन जोशी को पत्र प्रेषित कर सूचित किया, उनके द्वारा तत्काल इस सम्बन्ध में स्थिति स्पष्ट कर दी गयी थी.

इस पर हमारे द्वारा दैनिक जागरण के नोयडा स्थित संपादक को 13 अप्रैल 2011 को पत्र लिख कर उचित कार्रवाई किये जाने का निवेदन किया गया था,  लेकिन चूँकि इस सम्बन्ध में उस स्तर पर उचित कार्रवाई नहीं हो सकी, अतः हम लोगों द्वारा आगे चल कर प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया को पत्र प्रेषित किया गया.

हम लोगों ने अपने पत्र में दैनिक जागरण के संपादक से निवेदन किया था कि इस अखबार के लखनऊ संस्करण में कैसे सम्बंधित पत्रकार द्वारा पूर्णतया गलत और भ्रामक ढंग से बिना किसी आधार के, संभवतः अपनी स्वयं की कल्पनाओं और अपनी निजी धारणा के वशीभूत हो कर यह खबर छापी गयी है. हमने यह कहा था कि जिस तरह से पत्रकार महोदय बिना आधार के, बगैर साक्ष्यों के अपनी कल्पनाओं के आधार पर या पुलिस महकमे के किन्हीं कथित चर्चाओं के आधार पर हमारे कार्यों का गलत स्वरुप प्रकट कर रहे हैं, यह वाजिब नहीं दिख पड़ता और प्रेस के लिए स्थापित मानदंडों के सर्वथा विपरीत है. हमने इस सम्बन्ध में न्यायोचित कार्रवाई करते हुए इस खबर से गलत ढंग से पहुंचे नुकसान के विषय में उचित कार्रवाई करने का निवेदन किया था.

इस पर जब हमें किसी प्रकार से किसी कार्रवाई की जानकारी नहीं हुई तो हमने 09 मई 2011 को प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया को प्रेस काउन्सिल एक्ट 1978 की धारा 14(3) तथा प्रेस काउन्सिल (प्रोसीजर ऑफ इन्क्वायरी) रेगुलेशन 1979 के नियम 3(2) के अंतर्गत यह सूचित किया कि किस तरह से इस मामले में सम्बंधित समाचार के प्रकाशन में प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया के ‘नोर्म्स ऑफ जर्नलिस्टिक कंडक्ट’  (पत्रकारों के लिए आचार संहिता) 2010 संस्करण के बिंदु संख्या 1, 2 तथा 3(x) का विशेष रूप से उल्लंघन हुआ है.

हमारे पत्र के प्रेषण के पश्चात प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया की अनुभाग अधिकारी (शिकायत) सुश्री रीता पाल का पत्र दिनांक 23 जून 2011 अब हमें प्राप्त हुआ है जिसमे हमें यह अवगत कराया गया है कि हमारे प्रेषित पत्रों के आधार पर प्रतिवादी संपादक, दैनिक जागरण, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) को टिप्पणियों हेतु नोटिस जारी किया जा रहा है. यह भी बताया गया है कि जैसे ही प्रतिवादी से कोई टिप्पणी प्राप्त होगी उसकी प्रति मुझे प्रत्युत्तर टिप्पणी हेतु प्रेषित की जायेगी. अब मैं इस टिप्पणी की प्रतीक्षा कर रही हूँ.

डॉ. नूतन ठाकुर

स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्त्री

क्या पत्रकारों को कानून तोड़ने का हक है?

डा. नूतन किसी भी व्यक्ति की निजी जिंदगी और उसके क्रिया-कलापों के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के लिए उस व्यक्ति का फोन टेप करने की बात कोई नई नहीं है. पर यह बात भी उतनी ही सच है कि हरेक व्यक्ति की अपनी एक निजी जिंदगी होती है,  जिसे वह सबके सामने नहीं लाना चाहता. ऐसे में चोरी-छुपे फोन हैक कर किसी की बातें सुनना और फिर उसे सार्वजानिक कर देना न सिर्फ उस व्यक्ति के निजता के अधिकारों का हनन है बल्कि अपराध भी है.

इसी बात को ध्यान में रख कर लगभग सभी देशों में फोन टेपिंग को ले कर नियम बनाये गये है. आमतौर से किसी व्यक्ति के फोन को टेप करने का अधिकार सरकारी जांच एजेंसियों के पास होता है. वह भी सिर्फ उन्हीं मामलों में जिस में किसी व्यक्ति के आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होने की आशंका हो या फिर किसी मामले में साक्ष्य जुटाने के लिए ऐसा करना आवश्यक हो.

पर महज सनसनी फ़ैलाने और नामी-गिरामी हस्तियों की निजी बातों को सार्वजानिक कर अपने अखबार या चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए ऐसा किया जाये तो क्या इसे सही माना जाएगा. अक्सर विपक्षी पार्टियों द्वारा सरकार पर यह आरोप लगाया जाता है उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए उनका फोन टैप किया जा रहा है. पर इंग्‍लैंड में फोन टैपिंग के जिस मामले को ले कर हंगामा मचा हुआ है, उस में फोन टेप करने का आरोप किसी नेता या सरकार पर नहीं बल्कि पत्रकारों पर लगाया गया है. पूरा मामला न्यूज़ आफ द वर्ल्ड के पत्रकारों द्वारा वहाँ के सेलेब्रिटियों के फोन हैक कर उनकी बातचीत को सार्वजानिक करने से सम्बंधित है. जिसकी वजह से लगभग 168 साल पुराने इस साप्ताहिक अखबार को बंद करने की नौबत आ गई है.

इस हंगामे की पृष्ठभूमि की शुरुआत उस समय हुई जब 2007 में न्यूज़ आफ द वर्ल्ड के उस समय के रायल एडिटर क्लाइव गुडमैन और उसके निजी जांचकर्ता को शाही सलाहकारों के मोबाइल फोन को हैक करने के मामले में जेल की सजा हुई. उसके बाद हुई कई सारी पुलिस इनक्वायरी और कोर्ट केस में यह बात निकल कर आई कि इन शाही सलाहकारों के आलावा काफी बड़े पैमाने पर कई सारे पुलिसवालों, राजनीतिज्ञों, सेलेब्रिटियों और अपराध के शिकार लोगों के मोबाइल फोनों को भी गैरकानूनी तरीके से हैक किया गया था. वह भी महज अपनी खबरों को चटपटी बनाने और सनसनी फ़ैलाने के उद्देश्य से. इसके बाद लगभग ढाई सालों तक पूरा मामला दबा रहा और जुलाई 2009 में दुबारा इसकी बात तब उठी जब गार्डियन अखबार ने यह खबर प्रकाशित की कि न्यूज़ आफ वर्ल्ड के पत्रकार लगभग 3000 सेलेब्रिटिज, राजनीतिज्ञ और खिलाडियों के फोन को हैक करने के मामले में संलिप्त थे. पर इस मामले में पुलिस और प्रेस कम्पलेंट कमीशन को फोन हैक करने के कोई नये सबूत नहीं मिले. लेकिन यह मामला तब जोर पकड़ने लगा जब आम जनता के बीच यह बात उभर कर आई कि अपराध के शिकार व्यक्ति और उनका परिवार जिनमे 7/7 के बम ब्लास्ट के शिकार लोगों के परिवारों के साथ-साथ हत्या की शिकार मिल्ली डॉउलर, होली वेल्स और जेसिका चिप मैन के माता-पिता का भी फोन टेप किया जा रहा था.

इस मामले की बढ़ती हुई गंभीरता को देखते हुए वहाँ के प्रधानमंत्री ने कहा है कि हैकिंग के मामले की पूरी जांच की जायेगी और मेट्रोपोलिटन पुलिस के चीफ ने शपथ ली है कि जो भी पुलिस वाले न्यूज़ आफ द वर्ल्ड के प्रकाशक न्यूज़ इंटरनेशनल से पैसे ले रहे हैं उन्हें अनुशासित किया जाएगा. इसके आलावा न्यूज़ इंटरनेशनल के रूपर्ट मार्डोक ने फोन हैकिंग के कई सारे मामलों में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए माफ़ी तो मांगी ही है,  साथ ही जिनका फोन हैंक किया गया था उन्हें क्षतिपूर्ति देने के लिए एक फंड भी बनाया है. इस सम्बन्ध में न्यूज़ आफ द वर्ल्ड के पूर्व एडिटर का यही कहना था कि उन्हें इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं मालूम है पर उन्होंने अपने रिपोर्टरों को काम करने की पूरी आजादी दी हुई थी और साथ में यह भी आदेश दिया था कि जब तक कि कोई मामला पूरी तरह से जनहित का न हो वे खबरों को पाने के लिए किसी भी प्रकार के गलत तरीके का इस्तेमाल नहीं करेंगे.

पर यह पूरा घटनाक्रम हमारे लिए जो सवाल खड़े करता है वह यह कि ख़बरों को आम जन तक पहुँचाने की होड़ में हमारे द्वारा नियमों के विपरीत जा कर काम करने को किस हद तक उचित ठहराया जा सकता है. पत्रकारिता के नाम पर हमें किसी दूसरे व्यक्ति के निजी जीवन में ताक-झांक और टिका-टिप्पणी करने की आजादी किस हद तक होनी चाहिए. स्वतंत्रता के नाम पर मीडिया को किस हद तक छूट मिलनी चाहिए. क्या तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर और सनसनीखेज ढंग से प्रस्तुत करने को किसी भी तरह से जायज ठहराया जा सकता है.

लेखिका डा. नूतन ठाकुर स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्त्री हैं.

दहेज उत्‍पीड़न कानून का दुरुपयोग करने वालों को मिले सजा

डा. नूतनबिना लड़की की मर्जी के किये गये विवाह का क्या दुष्परिणाम हो सकता है इस बात का अंदाजा मेरठ में हुए एक विवाह और उसके बाद उत्पन्न हुई स्थिति को देख कर लगाया जा सकता है. घटना कुछ इस प्रकार है कि नेहा नाम की एक लड़की जिसकी शादी उसके पिता ने उसकी मर्जी के विरुद्ध नितीश नाम के युवक के साथ तय की थी.

शादी के दिन घर छोड़ कर उस लड़के के साथ चली गई, जिसे वह पसंद करती थी. फिर अपनी इज्जत बचाने की खातिर नेहा के पिता ने अपनी छोटी बेटी आरती की शादी नीतिश के साथ कर दी. ससुराल आकर आरती ने यह बताया कि वह विनीत नाम के लड़के से प्यार करती है और उससे मंदिर में शादी कर चुकी है. इस बात को जानने के बाद नितीश ने आरती को विनीत को सौप देने का फैसला किया और पुलिस अधिकारियों से मिलने के बाद उसे अपनी बहन बना लिया और आरती ने भी उसे राखी बाँध कर अपना भाई मान लिया. पर बाद में इसी मामले में आरती और उसके परिजनो ने नितीश और उसके परिवार वालो पर दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए मुकद्दमा दर्ज करने की मांग की.

उनका आरोप था कि शादी में उन्होंने 12 लाख रूपये खर्च किये थे लेकिन शादी के बाद नितीश और उसके परिवारवालों ने एक सेंट्रो कार की मांग की और मांग पूरी नहीं करने पर आरती को प्रताड़ित किया गया. पूरे प्रकरण में आरती का कहना है कि नीतिश ही उसका पति है और पहले जो कुछ भी उसने कहा था वह दबाव में आकर कहा था. वही नितीश का कहना है कि उसके पास इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि आरती जो कुछ भी कह रही है वह झूठ है. और आरती के पिता द्वारा ऐसा सिर्फ इसलिए किया जा रहा है कि वह उनके परजिनों को दहेज उत्पीड़न कानून में फंसा कर उनसे पैसे वसूल कर सके.

अब इस मामले की जांच चल रही है कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ. पर इतना अवश्य है कि अगर आरती और उसके परिजन झूठ बोल रहे हैं तो उन्हें इसकी सख्त सजा मिलनी चाहिए.  इस तरह के मामलो की वजह से ही महिलाओं पर हो रहे आत्याचार को देखते हुए उनके के हितों की रक्षा के लिए बनाये गये दहेज उत्पीडन और घरेलू हिंसा अधिनियम जैसे कानूनों पर न सिर्फ सवाल उठने लगे है,  बल्कि इसके दुरूपयोग की शिकायतें भी आम हो गई हैं. शायद यही वजह है कि आज कई सारे पुरुष संगठन भी इस बात के लिए एक जुट हो रहे है कि इन कानूनों की आड़ लेकर पत्नियों द्वारा किये जाने वाले उत्पीड़न से उनकी रक्षा की जाए. उनका यही कहना है कि इन कानूनों का सहारा तभी लिया जाता है जब विवाह के निभने की सम्भावना बहुत ही कम बची रहती है. विवाह टूटने का कारण चाहे जो भी हो पर अक्सर उसमे आरोप दहेज प्रताड़ना के ही लगते हैं. जो सरासर गलत और पुरुषों के साथ अन्याय है.

वैसे अगर देखा जाए तो आज भी आमतौर से हमारे समाज में लड़के और लड़की का विवाह उसके माता पिता के द्वारा ही किया जाता है. और विवाह तय करते समय लड़के-लड़की की पसंद नापसंद या उनकी इच्छा पर कम ही ध्यान दिया जाता है खासकर लड़की की इच्छा पर तो बहुत ही कम. विवाह सम्बन्ध जोड़ते समय जहां लड़की के पिता द्वारा लड़के के परिवार और उसकी आर्थिक स्थिति को ही केंद्रबिंदु में रखा जाता है, वहीं लड़के के पिता का सारा जोर इसी बात पर रहता है कि लड़की के पिता द्वारा विवाह में कितना खर्च किया जाएगा. पर समस्या तब उत्पन्न होती है जब लड़के या लड़की के सहमत न होने के बावजूद भी जबरन उनका विवाह उनकी मर्जी के विरुद्ध कर दिया जाता है.

ऐसे ममलों में माता-पिता का यही मानना होता है कि आज चाहे भले ही उनके बच्चे उनके द्वारा तय किये गये विवाह सम्बन्ध से सहमत न हों पर एक बार विवाह बंधन में बंधने के बाद न सिर्फ इस विवाह को स्वीकार कर लेंगे बल्कि एक खुशहाल वैवाहिक जीवन भी व्यतीत करेंगे. वे इस बात को मानने को तैयार ही नहीं होते कि लड़के लड़की की इच्छा के विरुद्ध जाकर किये गये विवाह का अंजाम क्या होगा. और फिर जब विवाह के टूटने की नौबत आती है तो अक्सर लड़की के पिता द्वारा दहेज की मांग को ले प्रताड़ित करने की शिकायत की जाती है, जिसके फलस्वरूप न सिर्फ लड़का बल्कि उसका पूरा पारिवार कानून के चपेटे में आ जाता है.

इस बात में भी कोई संदेह नहीं है कि दहेज उत्पीडन कानून के दुरूपयोग के जो आरोप लगाये जाते है वह पूरी तरह से गलत हों. पर इसका यह भी अर्थ नहीं है कि दहेज प्रताडना सम्बन्धी सभी शिकायतें फर्जी और गलत हों. इसलिए मै तो यही कहूँगी कि महिलाओं को सरकार द्वारा दिया गया यह एक ऐसा हथियार है जो उनके हितों की रक्षा के लिए उन्हें दिया गया है और अगर किसी भी तरह से वे इनका दुरूपयोग करती हैं तो उन्हें भी इसकी सजा मिलनी चाहिए.

लेखिका डा. नूतन ठाकुर स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्त्री हैं.

साइबर क्राइम पर हिंदी में पहली पुस्‍तक

हिंदी में विधि सम्बंधित अच्छी पुस्तकों का हमेशा अभाव माना जाता रहा है और खास कर ऐसे विषयों पर, जिसमे तकनीकी मामले भी शामिल हों, तो लगभग नहीं के बराबर पुस्तकें मिलती हैं. आज जब चारों तरफ इन्फार्मेशन टेक्नोलोजी और साइबर जगत की धूम मची हुई है, हम पाते हैं कि हिंदी में इस विषय में सही जानकारी देने वाली पुस्तकें जल्दी नहीं मिलती.

इसमें भी साइबर क्राइम के विषय पर तो शायद ही कोई पुस्तक हो. इस दृष्टि से यूपी के आईपीएस अधिकारी अमिताभ, इलाहाबाद के अधिवक्ता मोहम्मद हसन जैदी और बरेली के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर अमित सिंह द्वारा लिखित और एलिया ला एजेंसी, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘साइबर क्राइम’  का अपना ही महत्व है.

इस पुस्तक में जहां कम्प्यूटर और इन्टरनेट की शुरुआती जानकारी दी गयी है वहीँ भारत में साइबर विधि के अंतर्गत सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000, सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम 2008,  भारतीय साक्ष्य अधिनियम में इलेक्ट्रानिक साक्ष्य एवं इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर को ले कर किये गए संशोधन एवं अन्य सम्बंधित नियमों की विस्तृत जानकारी दी गयी है.

इसके अलावा साइबर क्राइम के विभिन्न प्रकारों, जैसे वित्तीय अपराध, बौधिक सम्पदा अपराध, साइबर मानहानि, साइबर कूटरचना, ऑनलाइन जुआ, साइबर अश्लील लेखन, वेब जैकिंग, वेब डिफेसमेंट, साइबर आतंकवाद आदि की जानकारी भी प्रस्तुत है. इसी के तहत मोबाइल फोन से किये गए साइबर अपराध पर भी विस्तार में चर्चा की गयी है. हैकिंग, साइबर स्टॉकिंग, साइबर स्टेग्नोग्राफी आदि का भी विषद विश्लेषण है. इंटरनेट पर व्यक्ति की वाक-स्वतंत्रता, एकान्तता तथा गुप्तता के उल्लंघन एवं साइबर पोर्नोग्राफी को भी विस्तार में समझाया गया है.

भारत के बाहर किये गए साइबर अपराधों में जिम्मेदारी, कंपनियों द्वारा किये गए साइबर अपराधों की जिम्मेदारी तथा सेवादाता के उत्तरदायित्व का भी वर्णन है तथा साइबर अपराध की विवेचना एवं अन्वेषण को समझाया गया है. इन सबके अलावा साइबर अपराध के रोकथाम के उपाय भी बताए गए हैं. कुल मिला कर यह पुस्तक हिंदी भाषी प्रत्येक ऐसे व्यक्ति के लिए उपयोगी है जो किसी भी तरह से साइबर अपराध और साइबर विधि से तालुख रखता है.

डा. नूतन ठाकुर की रिपोर्ट.

अंततः मिली स्टडी लीव : पढ़ना उतना आसान नहीं रहा

नूतन ठाकुरएक बहुत लंबे संघर्ष के बाद मेरे पति अमिताभ जी को अंततः उत्तर प्रदेश शासन ने नियमों के अनुसार आईआईएम लखनऊ में मानव संसाधन प्रबंधन कोर्स हेतु अध्ययन अवकाश दे ही दिया. दिनांक 02/06/2011 के उत्तर प्रदेश शासन के आदेशों के अनुसार उन्हें को दिनांक 10/06/2009 से 17/02/2011 तक की अवधि के लिए अखिल भारतीय सेवा ( अध्ययन अवकाश) नियमावली 1960 के नियम चार के अंतर्गत अध्ययन अवकाश दिया गया.

इस अध्ययन अवकाश के दिए जाने से अब अमिताभजी को ना सिर्फ लगभग दो साल का वेतन एक साथ मिलेगा बल्कि अब यह दो साल की अवधि भी उनकी सेवा में शामिल की जायेगी और यह उनके पेंशन, ऐच्छिक सेवा-निवृत्ति जैसे सभी प्रकरणों में लाभकारी होगी. यही कारण भी थे कि उनको जानबूझ कर अध्ययन अवकाश नहीं दिया गया था क्योंकि शासन में बैठे कुछ अधिकारियों की इस मामले में व्यक्तिगत रूचि थी और उन्होंने नियमों को पूरी तरह दरकिनार करते हुए ऐसा विधि-विरुद्ध कार्य किया. इस मामले में विशेष कर कुंवर फ़तेह बहादुर, प्रमुख सचिव, गृह और विजय सिंह, सचिव, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश की भूमिका थी, जिन्होंने सीधे-सीधे लिखे नियमों को भी जानबूझ कर तोड़ा-मरोड़ा और क़ानून के साथ पूरी तरह खिलवाड़ किया. यही कारण था कि जब मेरे पति अध्ययन अवकाश के लिए बनी सारी अर्हताओं को पूरा करते थे, तब भी उन्हें किसी ना किसी प्रकार से इस अवकाश से वंचित रखा गया था. वह भी एक-दो महीने नहीं बल्कि पूरे तीन साल तक.

बात तब शुरू हुई थी जब अमिताभजी ने कैट परीक्षा के माध्यम से आईआईएम लखनऊ में अपने चयन के बाद 30/04/2008 को उत्तर प्रदेश सरकार को दो सालों के अध्ययन अवकाश हेतु अखिल भारतीय सेवा ( अध्ययन अवकाश) नियमावली 1960 के तहत आवेदन पत्र दिया था. यद्यपि वे इस नियमावली के अंतर्गत सभी अर्हताओं को पूरा करते थे पर उन्हें जानबूझ कर अवकाश नहीं दिया गया. बल्कि कुल मिला कर उनके फ़ाइल को पेंडिंग में डाल दिया गया. उन्होंने पूरे एक साल तक इन्तज़ार किया कि अब शायद कुछ निर्णय आये और जब कुछ नहीं हुआ तब उन्होंने पहले केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) लखनऊ और फिर इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ बेंच में वाद दायर किये. इन वाद में दिए गए निर्णय के आधार पर प्रदेश सरकार ने अमिताभजी के अध्ययन अवकाश के आवेदन को अस्वीकृत कर दिया. यहाँ तक कि उनके द्वारा मांगे गए असाधारण अवकाश को भी अस्वीकृत किया जो किसी भी अधिकारी का लगभग नैसर्गिक हक सा है और जो बहुत ही विशेष स्थितियों में ही अस्वीकृत होता है. शासन द्वारा इसके लिए तीन कारण बताए गए, एक तो यह कि अमिताभजी द्वारा कैट परीक्षा हेतु पूर्वानुमति नहीं ली गयी, दूसरा यह कि प्रदेश में एसपी स्तर के आईपीएस अफसरों की भारी कमी है और तीसरा यह कि चूँकि यह कोर्स चार साल का है अतः वे दो सालों में यह कोर्स कैसे कर पायेंगे.

यह अलग बात है कि अमिताभ जी इस मामले में लगे रहे और आगे चल के पुनः कैट में वाद संख्या 238/2009 में गए और कैट के आदेश पर उन्हें 08/06/2009 को राज्य सरकार द्वारा असाधारण अवकाश दिया गया और उन्होंने आईआईएम लखनऊ में दाखिला ले लिया. इसी वाद में अंत में 07/07/2010 को कैट ने आदेशित किया कि उत्तर प्रदेश सरकार आवेदक के अध्ययन अवकाश सम्बंधित मामले में पूर्व में लगाए गए आपत्तियों को दरकिनार करते हुए नियमों के अनुरूप चार सप्ताह में युक्तियुक्त निर्णय ले. उन्होंने उक्त निर्णय उत्तर प्रदेश सरकार को 08/07/2010 को प्रेषित कर दिया किन्तु उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया. तब उन्होंने कैट में अवमानना याचिका संख्या 57/ 2010 दायर किया जिसमे गृह सचिव, भारत सरकार,  प्रमुख सचिव, गृह तथा डीजीपी के विरुद्ध अवमानना नोटिस जारी किया गया.

इस पर भी राज्य सरकार द्वारा कैट के निर्णय का अनुपालन नहीं कर के उलटे हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में रिट याचिका 268/2011 के जरिये कैट के आदेशों को चुनौती दी गयी, पर हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की रिट याचिका को खारिज कर कैट के आदेशों के अनुरूप कार्रवाई करने को कहा. जब उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके बाद भी कार्रवाई नहीं की तब अमिताभजी ने हाई कोर्ट में अवमानना याचिका दायर किया. अब इतना कुछ करने के बाद अब अंत में जा कर उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें स्टडी लीव दिया है, जो उन्हें प्रारम्भ में ही मिल जाना चाहिए था.

इस तरह इस मामले में हाई कोर्ट और कैट में कुल आठ मुकदमे चले जिस में चार हाई कोर्ट और चार ही कैट में हुए और इन सब के बाद ही उन्हें उनका विधिक अधिकार मिल सका. वह भी तब जब इस मामले में बहुत पहले ही फ़तेह बहादुर को निर्वाचन आयोग द्वारा हटाये जाने के बाद कुछ दिनों के लिए प्रमुख सचिव गृह रहे मंजीत सिंह ने फ़ाइल पर साफ़ लिखा भी था कि मानव संसाधन प्रबंधन आईपीएस अफसरों के लिए बहुत उपयोगी है और अतः इन्हें स्टडी लीव अवश्य मिलना चाहिए. इसके अलावा इस दौरान कई ऐसे दृष्टांत आये जब दूसरे आईपीएस अधिकारियों को उन्हीं आधारों पर छुट्टी मिलती रही जिस आधार पर अमिताभजी को स्टडी लीव मना किया गया था.

मुझे इस जीत की खुशी तो है ही पर इससे अधिक इस पूरी लड़ाई के लिए खुशी है क्योंकि इसमें लाख परेशानियों के बावजूद हम लगे रहे- कई बार परिणाम की चिंता किये बगैर.

डॉ. नूतन ठाकुर

तीन नए अखबारों की तीन दिशाएं

: प्रस्‍तुति में डीएनए और जनसंदेश से आगे हैं जनवाणी : पिछले कुछ दिनों में मुझे कई सारे नए अखबारों के संपादक या मालिक से मिलने का मौक़ा मिला, जिसके बाद मेरे मन में एक बात निश्चित तौर पर आ गयी है कि इलेक्ट्रौनिक मीडिया तथा वेब मीडिया के आ जाने के बाद भी प्रिंट मीडिया अभी पूरी दमदारी से कायम है. हमारे देश में, खास कर हिंदी बेल्ट में, वैसे भी कई बार प्रिंट मीडिया को एक बहुत बड़ा लाभ मिलता है. वह है आम लोगों की वेब के प्रति गैर-जानकारी तथा अनभिज्ञता.

उसमे भी कई लोग जानकार हो कर भी वेब का नियमित इस्तेमाल नहीं कर पाते और इस तरह वेब की ताकत से महरूम रह जाते हैं. इसकी तुलना में लाख चाहने पर भी इलेक्‍ट्रानिक मीडिया प्रिंट या वेब का स्थान नहीं ले सकता, क्योंकि शब्दों को अपनी आँख से देख कर पढ़ने का जो आनन्द इन स्थानों पर मिलता है वह इलेक्ट्रौनिक चैनलों में नहीं हो पाता.

मैं बात कर रही थी हिंदी में नए उभर रहे अखबारों की, जिन्हें हम नए अखबार कह सकते हैं और कुछ हद तक छोटे अखबार भी. ऐसे ये अखबार इतने छोटे भी नहीं हैं पर दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, अमर उजाला जैसे अखबारों की तुलना में छोटे तो माने ही जायेंगे, कम से कम प्रसार और बाह्य प्रस्तुति में. इस तरह का एक अखबार मैंने बहुत पहले जनमोर्चा देखा था जब हम लोग फैजाबाद में थे. मैं शीतला सिंह जी के कार्यालय भी गयी थी और देखा था कि किस तरह वे पिछले चालीस साल से अधिक समय से अखबार निकाल रहे हैं, अपनी तरह का अखबार निकाल रहे हैं और अपनी शर्तों पर निकाल रहे हैं.

यह सही है कि इस अखबार का प्रसार और प्रचार सीमित है और यह मुख्यतया फैजाबाद और आसपास के जिलों में ही बिकता और दिखता है, यह भी सही है कि बाकी बड़े अखबारों से यह कम पृष्ठों का है. पर इससे यह नहीं कहा जा सकता कि जनमोर्चा अखबार का महत्व किसी तरह से कम है.लेकिन अब तो जनमोर्चा बहुत पुराना अखबार हो गया है. एक लंबे समय से इस तरह का कोई अखबार मैंने वास्तव मे जनता के बीच जा कर अपना प्रभाव छोड़ने वाला नहीं देखा था. बहुत पहले हम लोग मुरादाबाद में थे तो वहाँ अम्बरीश गोयल एक अखबार निकालते थे, जो सांध्यकालीन था और जिसे जनता के बीच मान्यता थी. बाकी जगहों पर मैंने इस तरह की स्थिति कम ही देखी थी.

जिन तीन नए अखबारों की मैं चर्चा करुँगी उनमें दो लखनऊ के और एक मेरठ का है. इन में सबसे पुराना अखबार डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट है, जिसे संक्षेप में डीएनए कहते हैं. निशीथ राय इसके संपादक हैं, जो लखनऊ विश्वविद्यालय में आचार्य भी हैं और समाजवादी आंदोलन से जुड़े हुए हैं. आम तौर पर यह धारणा है कि डीएनए अखबार समाजवादी विचारधारा का पोषक है और उत्तर प्रदेश के समाजवादी पार्टी से भी इसका जुड़ाव सर्व-स्वीकार्य है. मैं स्वयं देख रही हूँ कि पिछले एक लंबे समय से निशीथ राय इस अखबार के जरिये जनपक्षधरता को निरंतर सामने रख रहे हैं. मैं खास कर के शांति भूषण और उनके लड़के से जुड़े इलाहाबाद में ख़रीदे गए जमीन और मकान की खबर का जिक्र करुँगी जो सबसे पहले खबर डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में छपी थी. इस खबर में लगा आरोप कितना सही या गलत है, यह मैं नहीं जानती क्योंकि अभी मामला न्यायालय में है, पर इतना जरूर है कि इतने ताकतवर आदमी के खिलाफ खुल कर खबर लिखना बड़ी बात मानी जायेगी.

दूसरा जो नया अखबार सामने आया है वह है जनसन्देश टाइम्स. लखनऊ से प्रकाशित होने वाला यह अखबार आम तौर पर बहुजन समाज पार्टी से जुड़ा माना जा रहा है, क्योंकि इसके बोर्ड में बसपा के कई बड़े नेताओं के जुड़े होने की बात कही जा रही है. साथ ही इस अखबार के उद्घाटन में जिस तरह से सत्तारूढ़ दल के कई मंत्री आये थे उससे भी इस बात को बल मिलता है. पर मैं एक बात बड़ी ईमानदारी से कहूँगी कि सुभाष राय जैसे संपादक, जो पूरी तरह से अपने पेशे के प्रति समर्पित और निष्ठावान हैं, इस बात को पूरी तरह देख रहे हैं कि अखबार किसी पार्टी का मुखपत्र नहीं बन कर एक निष्पक्ष सामजिक दर्पण की तरह उभर कर सामने आये. इस रूप में सुभाष राय की मेहनत रंग लाती भी दिख रही है. मैं इस अखबार के सम्पादकीय विभाग से जुड़े हरेप्रकाश उपाध्याय का भी जिक्र करुँगी जो अच्छी-खासी मेहनत कर के जनसंदेश टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ को विशेष उपलब्धियों से भरा बना रहे हैं.

तीसरा अखबार जनवाणी है, जो मेरठ से प्रकाशित हो रहा है. अन्य तमाम अखबारों से यह अलग इस रूप में है कि इसके मालिक इस अखबार के प्रचार-प्रसार पर पानी पैसे की तरह बहा रहे हैं. इन तीनों अखबारों में कलेवर और प्रस्तुति में जनवाणी बहुत आगे है क्योंकि जहां बाकी दोनों अखबार साफ़ तौर पर कुछ छोटे अखबार दिखते हैं, वहीं जनवाणी की प्रस्तुति उसे किसी भी बड़े अखबार से कमतर नहीं ठहराती. इस रूप में जनवाणी का अलग महत्व है. इसके साथ ही जिस तरह से मेरठ मंडल में जनवाणी का प्रचार किया गया है वह भी काबिलेगौर है. मैंने आज तक किसी स्थानीय अखबार का इतना व्यापक प्रचार नहीं देखा है. आप मेरठ में हैं तो आपको सिर्फ एक ही अखबार के बैनर पोस्टर पूरे शहर में दिखेंगे, जनवाणी के. हर चौक-चौराहे पर, सड़कों पर, हाईवे पर. मेरी जानकारी के अनुसार इस प्रचार के अच्छे नतीजे भी आ रहे हैं. इसके साथ एक संपादक के रूप में यशपाल सिंह ने भी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभायी है और एक बड़े से टीम को काफी कुशलता के साथ संचालित कर रहे हैं. ये तीनों अखबार अलग-अलग ढंग से अपने आप को स्थापित करने और अपनी महत्ता बढाने में लगे हैं, देखें आगे स्थितियां किस तरह से परिवर्तित होती हैं.

डॉ. नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

मुआवजे के लिए लड़ रहा मनवीर तेवतिया अपराधी है!

प्रशासन के लिए हर वह आदमी अपराधी होता है जो जनता की बात करे और जनता के पक्ष में बोले. कम से कम जनविरोधी शासन के साथ तो ऐसा ही होता है, और यही हाल उस जन विरोधी शासन के हुकुमबरदारों का भी होता है. कुछ ऐसा ही बयान मैंने कल टीवी में और आज अखबारों में मनवीर सिंह तेवतिया के बारे में देखा. मनवीर सिंह तेवतिया कौन हैं और क्या करते हैं, मैं ज्यादा नहीं जानती.

अब से कुछ दिनों पहले तक मैं उनका नाम भी नहीं जानती थी और शायद बाकी और लोग भी उनसे अनभिज्ञ ही रहे होंगे. पर पिछले दिनों जब अलीगढ में किसानों के द्वारा भूमि अधिग्रहण के खिलाफ मोर्चाबंदी की गयी थी और धरना-प्रदर्शन किया था उसमे तेवतिया का नाम बहुत तेजी से उभरा था. यह मालूम हुआ कि तेवतिया एक जाट नेता हैं, जो जनता की बात रख रहे हैं और किसानों को जमीन के लिए ऊँचे से ऊँचा दाम लेने को कह रहे हैं. जब बाकी सारे राजनैतिक दलों ने आनन-फानन में समझौते की बात कही थी तब तेवतिया ही थे जिन्होंने अंत तक जनता को और ज्यादा कीमत के लिए रोके रखा.

मैं समझती हूँ कि यह उचित भी है क्योंकि जहां शासन-प्रशासन कौडियों के मोल किसानों से जमीन खरीद कर उसे करोड़ों-अरबों में बेच रहा है और इस प्रक्रिया में जितना सरकार की जेब में जा रहा है, उससे अधिक सत्ता के तमाम दलालों की जेबों में जा रहा है. ऐसे में किसानों को अपनी जमीन का वाजिब हक मिलना ना सिर्फ न्यायोचित है बल्कि नितांत अनिवार्य भी. मैं यह भी मानती हूँ कि ऐसा नहीं कर के सरकारें आम जनता का पूरी तरह से गला घोंट रही हैं और अपने जनविरोधी चेहरे को ही उजागर कर रही है.

ऐसे में मनवीर तेवतिया का किसानों के साथ खड़ा होना और उसे अधिक कीमत के लिए कहना मेरी निगाह में एक बहुत ही वाजिब बात है और इसकी भूरी-भूरी प्रशंसा होनी चाहिए. लेकिन जाहिर है कि जो कोई सत्ता से अपनी नजदीकी बनाए रखना चाहेगा उसे तेवतिया और उसकी तरह का कोई भी आदमी अच्छा नहीं लगेगा जो जनता को कहे कि अपना हक मांगों और अपनी जमीन की पूरी कीमत लो. उसकी निगाह में तो तेवतिया एक गुंडा, एक अपराधी ही होगा जैसा कल उत्तर प्रदेश के डीजीपी करमवीर सिंह प्रेस वार्ता में लखनऊ में खुलेआम कह रहे थे.

डीजीपी की माने तो इस सारे संघर्ष के लिए मात्र एक आदमी जिम्मेदार है- मनवीर सिंह तेवतिया. उन्होंने यह भी घोषणा की कि तेवतिया को जल्दी ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा. उन्होंने एक और बड़ी मजेदार बात कही- ‘नोएडा में हुए संघर्ष से भूमि के मुआवजे का कोई लेना-देना नहीं है.’  जितना अधिक डीजीपी और स्पेशल डीजीपी बृज लाल दो सिपाहियों की मौत से दुखी होंगे, उस से कम दुःख मुझे भी नहीं है. मैं यह बात पूरी तरह मानती हूँ कि ये सिपाही भी उसी माटी के लाल हैं और उसी जमीन से जुड़े हुए हैं जिसे सरकार के लोग दो पैसे में हड़प कर अपनी मुट्ठी गरम करने में लगे हैं. उनका घर भी यहीं आस-पास होगा और आज ये दोनों लोग इन सत्ता में बैठे लोलुप लोगों के कारण बेवजह मारे गए हैं. यानी कि करे कोई और भरे कोई. फिर उनकी मौत पर मुआवजा!

लेकिन इसके साथ हमें यह भी याद रखना पड़ेगा कि किसानों के हितों के संघर्ष को आपराधिक कृत्य समझने वाले से बड़ा अपराधी कोई नहीं होगा. तेवतिया भले कैसा भी आदमी हो या रहा हो, उसके अंदर चाहे जो बात हो पर सामने यह साफ़ दिख रहा है कि वह किसानों को भूमि के सही मुआवजे के लिए खुल कर संघर्ष कर रहा है. जाहिर है ऐसे में वह सत्ता पक्ष के तमाम लोगों के आँखों की किरकिरी तो माना ही जाएगा.

डीजीपी कहते हैं कि तेवतिया विगत कुछ दिनों से किसानों की भूमि अधिग्रहण एवं मुआवजा सम्बन्धी मांगों की आड़ में ग्राम भट्टा में ग्रामीणों को भ्रमित कर रहे थे और यह कि तेवतिया अपने राजनैतिक स्वार्थों के लिए कभी अलीगढ़, कभी आगरा तथा कभी गौतमबुद्ध नगर के किसानों को गुमराह करते रहते हैं. मैं कहती हूँ कि यदि यह बात सौ फीसदी सत्य हो तब भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि किसानों को मिला मुआवजा शून्यप्राय है और उन्हें अपनी जमीन के बदले कुछ भी नहीं मिल रहा है.

ऐसे में तेवतिया चाहे जिस भी अंदरूनी भावना से प्रेरित हों, पर किसान उनकी बात तो सुनेंगे ही क्योंकि कम से कम आज के समय तेवतिया उन किसानों के हित की बात तो कर रहे हैं और खुलेआम कर रहे हैं. ऐसे में तेवतिया स्वतः ही निहित स्वार्थों के लिए अपराधी और गुंडा हो गए क्योंकि वे कई सारे प्रभावशाली लोगों के हितों के बाधक जो ठहरे.

डॉ. नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

छोटेलाल की मौत और यूपी पुलिस का विद्रूप चेहरा

डा. नूतन ठाकुरआज सुबह मुझे एक ऐसी खबर मिली जो उत्तर प्रदेश पुलिस की हकीकत को और जोरों से बयान करती है. यह खबर जुडी हुई है लखनऊ स्थित न्यूज़ एक्स के फोटोग्राफर गोपाल चौधरी से. गोपाल भाई गोरखपुर के रहने वाले हैं और पिछले काफी समय से लखनऊ में इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में कैमरामैन का काम कर रहे हैं.

उनके एक सगे रिश्तेदार छोटे लाल गोरखपुर के कोतवाली थाना क्षेत्र के दीवान बाजार इलाके में रहते थे. वे एक सीधे-साधे व्यवसायी किस्म के आदमी थे. कुछ दिनों पहले उनके इलाके के कन्हैया लाल यादव नाम के बिजली विभाग के जूनियर इंजीनियर ने उन्हें कहा था कि उनके घर पर बिजली का काफी बकाया है और इस कारण उन पर बिजली चोरी का मुक़दमा दर्ज होने वाला है. कन्हैया लाल यादव ने उनसे यह भी कहा कि इससे बचने का एक ही उपाय है कि छोटे लाल उन्हें पचास हज़ार रुपये दे दें. यानी कि घूस के पचास हज़ार से छोटे लाल के सारे अपराध माफ हो जाते.

छोटे लाल इस बात से काफी डर से गए थे. एक सीधे-सादे आदमी को बिजली चोरी के मामले में जेल जाने का डर तो समा ही गया, साथ ही बचने के लिए पचास हज़ार का इंतज़ाम करने की चिंता हो गयी. इसके बात क्या हुआ यह तो कोई अभी नहीं जान रहा है पर इतना जरूर है कि छोटे लाल अपने घर से गायब हो गए. छोटे लाल के घर वाले सारे लोग बहुत परेशान हुए. उन्होंने तुरंत गोपाल भाई से संपर्क किया जिन्होंने इंस्‍पेक्‍टर कोतवाली, गोरखपुर से बात की. इंस्‍पेक्‍टर ने शुरू से ही टाल-मटोल वाली नीति अपनाई और गोपाल भाई को कह दिया कि वे इस बारे में प्रयास करेंगे, लेकिन वास्तव में कुछ भी नहीं किया. कई बार कहने के बाद और आईबीएन चैनल से जुड़ाव की बात जानने के बाद बहुत मशक्कत कर के गोपाल भाई मात्र एक गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवा सके. गोपाल भाई के रिश्तेदारों ने कन्हैया लाल यादव के खिलाफ जो एफ़आईआर दी उसे इंस्‍पेक्टर कोतवाली ने दर्ज नहीं किया.

गोपाल भाई ने एक मित्र के रूप में मेरे पति से भी बात की और अमिताभ जी ने मेरे सामने ही इंस्‍पेक्टर कोतवाली, गोरखपुर से बात की. इंस्‍पेक्टर ने कहा कि वह छोटेलाल को ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं. कुछ देर बाद गोपाल भाई का फिर फोन आया कि इंस्‍पेक्टर मुक़दमा दर्ज नहीं कर रहा है और ना ही कन्हैया लाल यादव से किसी तरह की पूछताछ ही कर रहा है.

इस बार जब अमिताभजी ने कोतवाल से बात की तो उनका बड़ा ही नायाब किस्म का जवाब मिला. उन्होंने कहा कि वे मुक़दमा दर्ज करने को तैयार हैं, बस दिक्कत यह है कि इस समय वे थाने पर बिलकुल अकेले हैं. उनके साथ मात्र एक होमगार्ड है, ना तो कोई सब इंस्‍पेक्टर है और ना ही कोई सिपाही. जैसे ही कोई भी थाने पर आ जाएगा, वे तुरंत मुक़दमा दर्ज कर देंगे और पूछताछ भी शुरू कर देंगे. अमिताभ जी ने मेरे सामने ही कहा कि ऐसा ही ठीक रहेगा क्योंकि यदि मुक़दमा भी दर्ज नहीं हुआ और कोई कार्रवाई नहीं हुई फिर यदि कल को छोटेलाल जी की लाश मिली तो बड़ी फजीहत होगी, वे निलंबित होंगे और बदनामी अलग से होगी. इंस्‍पेक्टर ने भी उनकी हाँ में हाँ मिलाई.

अमिताभजी ने यही बात गोपाल भाई को बता दी और कहा कि इंस्‍पेक्टर ने अपनी मजबूरी बताते हुए तुरंत मुक़दमा लिख कर छानबीन करने की बात कही है. आज सुबह दुबारा गोपाल भाई का फोन आया. इस बार वे काफी टूटे हुए लग रहे थे. कहने लगे कि कल रात में छोटेलाल जी की लाश मिली. गले पर चोट के निशान दिख रहे हैं. हम लोग मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर पर हैं और लाश के पोस्ट मार्टम के लिए इन्तज़ार कर रहे हैं. मैंने अपने पति को बहुत नाराज़ होते देखा और उन्हें गोपाल भाई को इस मामले में ऊपर तक कम्प्लेन करने की बात कहते सुना. उन्होंने यहाँ तक कहा कि यदि गोपाल भाई चाहें तो वे उनका नाम भी अपनी शिकायत में लिख दें और वे अपनी और इंस्‍पेक्टर के बीच हुई बात को हर जगह कहने को तैयार हैं.

इस घटना को सुन कर मैं भी सन्न रह गयी. गोपाल भाई हम लोगों के बहुत ही अच्छे मित्र हैं और एक बहुत भले, खुशमिजाज और सीधे-सादे आदमी हैं. साथ ही बहुत ही मददगार किस्म के भी हैं. एक बार हम लोगों को अपने कुछ अच्छे फोटो की जरूरत थी तो उन्होंने गोरखपुर के मूल निवासी और लखनऊ में ही आइबीएन7  के अमितेष श्रीवास्तव जी के साथ घर पर आ कर हम लोगों की काफी सारी बहुत प्यारी फोटो खींची थी. भड़ास पर मेरी और अमिताभजी की जो फोटो लगी है वह भी गोपाल भाई ने ही खींची थी. ऐसे में उनके जैसे आदमी के साथ गोरखपुर के इंस्‍पेक्टर द्वारा किया गया यह काम मुझे भी बहुत खराब लगा. मैं सोचती हूँ कि कम से कम उन्हें मुक़दमा लिख कर छोटे लाल जी की तलाश तो करनी ही चाहिए थी, कन्हैया लाल यादव से पूछताछ को करनी चाहिए थी.

मैं नहीं जानती कि आगे गोपाल भाई इस मामले में क्या करेंगे और यदि वे शिकायत देंगे भी तो कार्रवाई होगी या नहीं होगी पर इतना जरूर है कि यह घटना उतर प्रदेश पुलिस का एक विद्रूप चेहरा ही दिखाता है.

डॉ. नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

मायावती ने सचिव विजय सिंह के गलत आदेश को किया रद्द

डा. नूतनमेरे पति और 1992 बैच के आईपीएस अधिकारी अमिताभ जी ने एक लम्बे समय से अपने तमाम सेवा सम्बंधित मामलों में अपनी लड़ाई लड़ने का काम जारी रखा है. हम सब जानते हैं कि यह एक मुश्किल रास्ता है और इसमें समय भी बहुत अधिक लगता है. हम यह भी जानते हैं कि कोर्ट में मामलों का शीघ्र निस्तारण नहीं हो पाता, वर्षों लग जाते हैं. इसकी तुलना में सरकार यदि चाहे तो काम आनन-फानन में हो जाते हैं.

यह सभी जानते हैं कि अव्वल तो कोर्ट में जल्दी आदेश नहीं होते, यदि आदेश हो भी गए तो उनका अनुपालन नहीं होता. जब अनुपालन करने वाला उन्हें लागू ही नहीं करना चाहता तो वे भला कैसे लागू हो जायेंगे. फिर इन आदेशों के लागू नहीं होने पर आदमी कोर्ट दुबारा दौड़ता है, इस बार कंटेम्प्ट पेटिशन लिए. उन कंटेम्प्ट पेटिशन पर सालों बहस चलती है और अंत में जा कर कहीं मामले में कोई परिणति निकल पाती है. खुद मेरे पति अमिताभ जी के दो साल के अध्ययन अवकाश के मामले में वे अब आईआईएम से लौट आये हैं, कैट और हाई कोर्ट ने आदेश कर दिया है, कैट में कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट का मुक़दमा चल रहा है लेकिन सरकार है कि इस पर कुंडली मारे बैठी है.

ऐसे में यदि कोई आदमी इन सारी जमीनी हकीकतों से वाकिफ होते हुए भी अपनी लड़ाई जारी रखे हुए है और इसका अच्छा और बुरा झेलने को तैयार है, तो मेरी निगाह में यही अपने आप में बड़ी बात है. फिर यदि इस लड़ाई में गाहे-बगाहे कोई सफलता हाथ लग जाए तब तो कहना ही क्या? ऐसा ही कुछ अमिताभ जी के मामले में हाल में हुआ है. दरअसल उन्होंने उच्च न्यायालय, इलाहाबाद के लखनऊ खंडपीठ में एक रिट याचिका संख्या 8 / 2011 (एस/बी) दायर किया था. अपने रिट याचिका में उन्होंने कहा था कि उनके सेवा सम्बंधित कई मामलों में मुख्यमंत्री मायावती के स्थान एवं उनके नाम पर सचिव विजय सिंह द्वारा ही फाइलों पर मुख्यमंत्री के नाम पर स्वयं आदेश निर्गत कर दिए जा रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा था कि विजय सिंह द्वारा किये जा रहे इन विधि-विरुद्ध आदेशों के कारण उन्हें नुकसान हो रहा है.

अमिताभ जी ने इस सम्बन्ध में तीन विशेष दृष्टांत प्रस्तुत किये थे. इनमे दो प्रकरण उनके साल 1998-1999 तथा 1999-2000 में जनपद देवरिया में नियुक्ति से सम्बंधित दो एसीआर में दी गयी प्रतिकूल प्रविष्टियों से सम्बंधित थे और तीसरा मामला उनके दो वर्षों के अध्ययन अवकाश से सम्बंधित था. इन प्रतिकूल प्रविष्टियों की अपनी एक अलग लंबी कहानी है कि किस तरह उन्हें उनके अन्य सीनियर अफसर की बात नहीं मानने के एवज में ऐसा एसीआर मिला जैसा आज तक शायद ही किसी आईपीएस अफसर को मिला होगा. अभी इन एसीआर के बारे में भी अमिताभ जी ने कैट के लखनऊ बेंच में मुक़दमा कर रखा है जो पिछले तीन सालों से लंबित है.

अपनी इस रिट याचिका में अमिताभ जी का यह कहना था कि विजय सिंह द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र के परे जा कर अपने ही स्तर पर जनपद देवरिया में नियुक्ति से सम्बंधित एसीआर के मामलों में पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के आदेश को पलट दिया गया है, जिसमें उन्होंने प्रतिकूल प्रविष्टियों को विलोपित करने का आदेश दिया था. साथ ही आईआईएम में पढ़ाई के लिए मांगे गए अध्ययन अवकाश के मामले में जबकि विभागीय प्रमुख सचिव मंजीत सिंह ने अध्ययन अवकाश देने की स्पष्ट संस्तुति की थी, विजय सिंह ने उसके विपरीत आदेश निर्गत कर दिए थे.

इस रिट याचिका में उच्च न्यायालय के दो जजों जस्टिस उमानाथ सिंह और जस्टिस डॉ. सतीश सिंह ने दिनांक 06 जनवरी 2011 को आदेशित किया था कि अमिताभ जी द्वारा संयत भाषा में नियमों के परिप्रेक्ष्य में एक प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया जाए, जो उनके प्रकरणों में आदेश पारित करने हेतु सक्षम अधिकारी होने के नाते स्वयं मुख्यमंत्री के सामने रखा जाए. उच्च न्यायालय ने यह भी आदेश दिए कि उक्त प्रार्थना पत्र का निस्तारण मुख्यमंत्री के स्तर से चार सप्ताह के अंदर कर दिया जाए.

अमिताभ जी द्वारा इस आदेश के मिलने के बाद दिनांक 04 फरवरी 2011 को मुख्यमंत्री को अपनी पूरी बात लिखते हुए एक प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया गया. इस प्रार्थना पत्र और पूर्व में दिए गए तमाम प्रत्यावेदन के आधार पर मुख्यमंत्री मायावती ने मामले पर विचार किया और उन्होंने अमिताभ की बात सही पाए जाने पर 26 अप्रैल 2011 के आदेश द्वारा उनके वर्ष 1999-2000 में जनपद देवरिया में नियुक्ति से सम्बंधित एसीआर में दी गयी प्रतिकूल प्रविष्टियों को विलोपित कर दिया. शेष दो प्रकरण संभवतः अभी लंबित हैं.

इस तरह अमिताभ जी को ना सिर्फ एक सफलता मिली है बल्कि उनके द्वारा विजय सिंह के विरुद्ध लगाया गया आरोप भी काफी हद तक सही सिद्ध हुआ है जब स्वयं मुख्यमंत्री मायावती ने अपने सचिव द्वारा जारी आदेश को रद्द कर दिया है और अमिताभ जी की बात की पुष्टि की है.

डॉ. नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

अवैध कमेले की काली सत्‍ता और सिसकता न्‍याय

डा. नूतन ठाकुर: हाजी याकूब कुरैशी और हाजी अखलाख के संरक्षण में चल रहा है यह कारोबार : मैं एक ऐसी समस्या से आप सभी लोगों को रूबरू कराना चाहती हूँ, जिसके बारे में अभी मेरठ के बाहर बहुत कम लोग जानते हैं, पर जब अपने आप में बहुत ही गंभीर और खतरनाक समस्या है. यह मामला है मेरठ के कमेले का.  कमेला मेरठ में जानवरों का कटान करने वाला स्थान को कहते है.

यह मेरठ शहर के बाह्य इलाके में हापुड रोड पर स्थित है, यह ग्राम माफ़ी दमवा के खसरा सं0-3703 व 3708 पर स्थित है, जो मेरठ नगर निगम की जमीन है. इस तरह मूल रूप से यह कमेला मेरठ नगर निगम की सम्पत्ति है.

कमेले (पशु वधशाला) में किस प्रकार कार्य होना चाहिये, को ले कर बहुत सारे स्पष्ट नियम बनाये गए हैं. सैद्धान्तिक व कानूनी रूप से कमेले को यथा सम्भव साफ सुधरा रखा जाना चाहिये ताकि वह स्वच्छता के माप-दण्ड पूरा कर सकें. इसके साथ ही वहां जानवरो को इस प्रकार से काटा जाये जिससे किसी प्रकार का स्वच्छता सम्बन्धी खतरा उत्पन्न न हो. यह निर्देशित है कि यहॉं मात्र स्थानीय आपूर्ति के लिये कटान किया जाये, अतः यहाँ केवल वही लोग जानवरो को कटवाने के लिये जा सकते हैं जिनको उनका मॉंस बेचने का लाइसेन्स प्राप्त हो. कमेला या तो नगर निगम के द्वारा स्वयं संचालित किया जाये अथवा किसी अधिकृत ठेकेदार द्वारा नियमानुसार शुल्क जमा करने के बाद संचालित किया जाये.

जो जानवर इन कमेलों में लाये जाते है, उनकी मृत्यु पूर्व परीक्षण अवश्य किया जाये, जिससे उनके बारे में स्पष्ट जानकारी हो सकें. मुसलमानों के लिये उपयोग में लाये जाने वाले मांस के लिये इस्लाम की रीति के अनुसार हलाल खाद्य बनाने के लिए जबह की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिये.  जबह की प्रक्रिया में जानवर के गले पर एक धारदार हथियार से काफी तेज व गहरा घाव किया जाता है जिसमें कई सारी बातों का ध्यान रखा जाता है. जानवर की मृत्यु के बाद उसका पोस्टमार्टम परीक्षण होना चाहिये.

कमेला

इसके साथ ही प्रत्येक कमेले में एक ईटीपी प्लान्ट (एक्यूमेन्ट ट्रीटमेन्ट प्लान्ट) होना चाहिये. यह प्लांट दृव्य को साफ करने वाला होता है. इसमें खून, गन्दा पानी और शेष जल इत्यादि डाले जाते है, जिससे यह उसे साफ करके शुद्ध जल प्रदान करता है. इसके अलावा एक टेण्डरिंग प्लान्ट होना चाहिये. टेण्डरिग प्लान्ट सॉलिड वेस्ट मेन्जमेन्ट के लिये है. यह सभी ठोस अवशेष डाले जाते है और यह प्लान्ट उन्हें पर्यावरण के लिये हानिरहित बना देता है.

एक कमेले में अधिकतम 350 जानवरों का कटान अनुमन्य है. वह भी केवल वही जानवर काटे जा सकते है जो दुधारू न हो, जिनका कोई अन्य उपयोग न हो, जो बूढ़े हो गये हों और बीमार भी न हों. यह सब एक पशु चिकित्सक द्वारा जॉंचा जाता है जो राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है. यह नियम किया गया है कि पशु चिकित्सक द्वारा अधिकतम 96  जानवर ही एक दिन में जॉंचे जा सकते हैं.

इन नियमों के विपरीत सबसे बड़ा प्रश्न है कि मेरठ में वर्तमान स्थिति क्या है? सच्चाई यह है कि मेरठ में कमेला उप्र राज्य प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड द्वारा बन्द किये जाने के निर्देश दिये गये हैं. इस तरह से सरकारी अभिलेखों के अनुसार मेरठ का कमेला बन्द है फिर भी खुले आम अवैध तरीके से चलाया जा रहा है. इस तरह मेरठ नगर निगम की जमीन पर कब्जा करने कुछ अत्यन्त प्रभावशाली ताकतवर लोगो द्वारा पूर्णतः अवैध ढंग से यह गलत कार्य किया जा रहा है, जिसमें जानवरों को अत्यन्त ही घृणित, दूषित और अत्याचारी ढंग से काटा जा रहा है.

इस तरह जानवरों को काटने वाले लोग किसी भी नियम व कानून का पालन नहीं कर रहे है. कमेले में न कोई पशु चिकित्सक है, कोई ईटीपी प्लान्ट ही काम कर रहा है,  पर्यावरण को हो रहे नुकसान को लेकर चिन्ता नहीं है, अधिकत्म 350 के स्थान पर 3-4 हजार कटान रोज हो रहे हैं. जानवरों को काटे जाते समय न तो एन्टी मार्टम, पोस्टमार्टम ही हो रहा है. इस्लामी नियम के अनुसार जबह प्रकिया का बिल्कुल पालन नहीं हो रहा है.  दुधारू व काम लायक जानवर भी खूब काटे जा रहे हैं.

उन जानवरों के खून, शरीर के हिस्से, मॉंस के लोथडे, चर्बी, आन्तरिक अंग और अन्य बेकार की चीजे बहुत ही गन्दें तरीके से आस-पास के वातावरण में छोड़ दी जाती है. इन जानवरों की हड्डी खुली भट्टी में जलाई जा रही है, जिनसे कमेले के आस-पास 8 से 10 किलोमीटर में बहुत दुर्गन्ध आती है.

कमेला

इस तरह खून, शरीर के अंग, अवशेष आदि के आस-पास खुली नालियो में बहने के कारण काफी पर्यावरण प्रदूषण फैल रहा है. खून और अन्य अवशेष पास ही की काली नदी में जा रहे हैं, जिसके कारण व नदी इतनी प्रदूषित हो गई है कि वह मानव के लिये पूर्णतः अनुपयोगी हो गयी है. काली नदी आगे चलकर गंगा नदी में मिल जा रही है. इस कारण गंगा नदी भी प्रदूषित हो रही है. खुले-आम मॉंस के लोथड़े और शरीर के टुकड़ों से यहॉं-वहॉं फैलने से कई तरह की बीमारियॉं व स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या हो रही है. खुले नाले में शरीर के टुकडें,  खून, अवशेष के बहने से बहुत ही वीभत्स दृश्‍य दिखता है. जिस प्रकार एन्टीमार्टम व पोस्टमार्टम को बिना कराये मॉंस को बेच दिया जाता है, उससे कई प्रकार की बीमारियॉं, स्वास्थ्य सम्बन्धी खतरों को होना सम्भव है.

चूंकि इस्लाम द्वारा निर्देशित जबह प्रक्रिया का अनुपालन नहीं हो रहा है और वह मांस मुसलमानों को दिया जा रहा है, इससे उनकी धार्मिक भावना से खिलवाड़ हो रहा है. यह पूरी प्रक्रिया बहुत ही गन्दे तरीके से भ्रष्ट उपायों को अपना कर की जा रही है, जिससे भ्रष्टाचार को सीधे-सीधे बढ़ावा मिल रहा है और स्थानीय प्रशासन के तमाम स्थानीय उच्च अधिकारी जिसमें मंडलायुक्त, जिला मजिस्ट्रेट, नगर आयुक्त, स्थानीय उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारी आदि कोई भी शामिल हो सकते है, अपने अन्य कनिष्ठ अधिकारी मिलकर इस अवैध कटान को संचालित कर रहे हैं,  जिससे भारी मात्रा में काला धन पैदा हो रहा है.

इस पूरी प्रक्रिया में सरकार का भारी नुकसान हो रहा है. यद्यपि इस कमेले से निकलने वाला मांस विदेशों को निर्यात हो रहा है, लेकिन उसपर न तो कस्टम और ना ही एक्साईज ड्यूटी दिया जा रहा है तथा सरकारी धन का नुकसान हो रहा है. स्थानीय प्रशासन इस मामले में पूरी तरह चुप है, क्योंकि जो व्यक्ति इस कमेले को चला रहे हैं, वह राजनैतिक रूप से काफी ताकतवर हैं और हमेशा सत्ताधारी दलों के साथ रहते है. अतः जिला प्रशासन हमेशा अपनी जान बचाने के लिये इनके साथ रहता है. इनमें खास कर स्थानीय विधायक और बसपा नेता हाजी याकूब कुरैशी तथा बसपा से सपा और अब पुनः बसपा में आये हाजी अख़लाक़ के नाम प्रमुख हैं. फिर यह लोग भारी मात्रा में अवैध पैसा भी अधिकारियों को देते हैं, जिसके कारण यह लोग ऑंख मूंद लेते हैं.

इस मामले में इस प्रकार से जानवरों को ट्रकों तथा अन्य वाहनों से सारे नियम को दरकिनार करके एकदम ठूंस कर लाया जाता है व वास्तव में अत्यन्त चिन्ताजनक है और पशु क्रूरता से सम्बन्धित नियमों का खुला उल्लंघन है. कई बार तो यह जानवर लाद कर लाने की प्रक्रिया में ही दबकर मर जाते हैं. इस विषम स्थिति से निपटने के लिए स्थानीय लोग ना जाने कई बार लामबंद हुए हैं, पर हर बार पैसे और ताकत के मोल से कमेले के ठेकेदारों ने इन लोगों के संघर्षों को समाप्त करते हुए अपना काला धंधा बरक़रार रखा है. अभी इन दिनों भी मेरठ में कमेले को ले कर विरोध हुआ है, चार-पांच दिन पहले हुए दंगे में भी इसी कमेले की प्रमुख भूमिका मानी जाती है. इसे लेकर कई सारी रिट भी हाई कोर्ट में पेंडिंग है पर वहाँ से भी फैसला नहीं आ सकने के कारण अब तक कोई न्याय नहीं मिल सका है.

यह एक ऐसी गंभीर समस्या है जिस पर हर किसी को ध्यान देना और इसे दूर-दूर तक फैला कर ध्यानाकर्षण करना आवश्यक होगा. आईआरडीएस और नेशनल आरटीआई फोरम की तरफ से हम लोग स्थानीय अधिवक्ता और सामाजिक रूप से जुझारू संदीप पहल के साथ मिल कर इस मुद्दे पर काम करने में आगे बढे़ हैं. अभी प्रारम्भ में हम इस मुद्दे से बाहर के लोगों को जागरूक करने और जोड़ने का काम कर रहे हैं. हमने इसके लिए निम्न दो ब्लॉग भी शुरू किये हैं – http://kamelameeruthindi.blogspot.com/ एवं http://kamelameerut.blogspot.com/.  यह एक व्यापक और कठिन लड़ाई है लेकिन इसमें बिना हार-जीत की चिंता किये लड़ा जाना बहुत जरूरी है.

डॉ. नूतन ठाकुर

सचिव, आईआरडीएस एवं

कन्वेनर, नेशनल आरटीआई फोरम

भूषण पिता पुत्र पर चुप क्यों हैं सिविल सोसायटी के लोग

डा. नूतन ठाकुरकल मैंने समाचारों में देखा था कि प्रसिद्ध पत्रकार और भ्रष्टाचार-विरोधी कार्यकर्ता विनीत नारायण ने यह मांग रखी थी जब तक प्रशांत भूषण और उनके पिता शांति भूषण के खिलाफ जो गंभीर आरोप लगाए गए हैं, उनकी जांच हो कर उसका दूध का दूध, पानी का पानी नहीं हो जाता तब तक इन दोनों पिता-पुत्र को भ्रष्टाचार-विरोध के लिए बनने वाले लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमिटी से अलग रहना चाहिए.

विनीत नारायण ने इसके साथ ही इन पिता-पुत्र के साथ जैन हवाला कांड के दौरान के कुछ कटु अनुभवों को भी बताया जिसके आधार पर उन्होंने एक तरह से शांति भूषण और प्रशांत भूषण पर व्यक्तिगत आक्षेप ही लगाए.इसके ठीक बाद दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट के ही एक अन्य वकील एमएल शर्मा ने कुछ और वकीलों के साथ मिल कर उस सरकारी गजट को ही चुनौती दे डाली जिस में लोकपाल बिल के लिए ड्राफ्टिंग कमिटी बनाए जाने की बात कही गयी थी और जिसमें ‘अन्ना हजारे के पांच नुमाइंदे’  शब्द का इस्तेमाल हुआ था. अखबारों की जानकारी के अनुसार इस रिट में लगभग वही बातें कही गयीं हैं जो मैंने भी यहाँ भड़ास पर ”कमेटी में होंगे अन्‍ना हजारे के पांच नुमाइंदे”  लेख में कहा था. कुल मिला कर उनका यह तर्क है कि यह एक असंवैधानिक स्थिति है जिसे तत्काल समाप्त किया जाना चाहिए.

इसी बीच कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने अन्ना हजारे की टीम के भूषण द्वय तथा अरविन्द केजरीवाल को आरोपित किया और फिर हमेशा की तरह शुरू हो गया -‘खुला खेल फर्रुखाबादी’ यानी कौन किसे, किस तरह से आरोपित कर रहा है, यह बात किसी की भी समझ में नहीं आ रहा है. उस लोकपाल विधेयक को लेकर जो प्रारंभिक उत्साह का सृजन हुआ था वह अब धीरे-धीरे अजीब शक्ल अख्तियार करने लगा है.

लेकिन एक बात जो सबसे अधिक गंभीर है, वह है इस मामले में कथित सिविल सोसायटी के बड़े लोगों की भूमिका और उनकी चुप्पी. मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से जानती हूँ कि ये सिविल सोसायटी वाले किसी भी मुद्दे पर कितनी तेजी से लपकते हैं और उस पर किस तरह की तीखी प्रतिक्रियाएं करते हैं. इस बार भी देखिये, जब उमा भारती और कुछ और नेता अपना लाव-लश्कर ले कर जंतर-मंतर पहुंचे थे तो किस तरह सिविल सोसायटी वाले ये सेलिब्रिटी एक्टिविस्ट उन नेताओं के खिलाफ लामबंद हो गए और विरोधी नारे लगाने लगे क्योंकि उनकी निगाहों में ‘नेता भ्रष्ट होते हैं.’

ज्ञातव्य हो कि अभी तक उमा भारती किसी भ्रष्टाचार के मामले में आरोपित या सजायाफ्ता नहीं हुई हैं. लेकिन चूँकि अन्ना हजारे का यह धरना शुचिता के लिए था, एक नूतन सवेरे के लिए था और समाज में नए मानदंड स्थापित करने के लिए था, अतः उसमें ऐसे लोगों की कैसे हिस्सेदारी हो सकती थी जो किसी भी तरह से बदनाम कौम (यानी नेतागिरी) से हों.

खैर, सब ठीक रहा और सरकार ने अन्ना हजारे की बात मान ली. एक ज्वायंट ड्राफ्टिंग कमिटी बनी और उसके सदस्य ‘ अन्ना हजारे के पांच नुमाइंदे (उन्हें लेकर)’  बने. यहाँ तक भी ठीक था. वैसे इस तरह से एक व्यक्ति के नाम पर नुमाइंदगी किया जाना और उसे शासकीय पत्रों में मान्यता दिया जाना ऐतराजपरक था क्योंकि यह भविष्य के लिए खतरनाक रास्ते खोल रहा था पर फिर भी उस मनोस्थिति में लोग इन ‘छोटी-छोटी’  बातों को नज़रअंदाज़ कर रहे थे.

पर गड़बड़ी तक शुरू हो गयी जब अन्ना के समूह के पांच लोगों में दो, पिता-पुत्र शांति भूषण और प्रशांत भूषण पर गंभीर आरोप लगने शुरू हुए. अब तक उन पर जो दो आरोप लगे हैं वे दोनों ही मामूली नहीं हैं. एक आरोप के मुताबिक़ इन लोगों ने इलाहाबाद में लगभग बीस करोड़ की एक जमीन और मकान मात्र एक लाख में ख़रीदा. वैसे ऐसा हर किसी के साथ तो नहीं होता पर खैर, दुनिया में कई तरह के लोग होते ही हैं. संभव है किसी ने सच में ही बीस करोड़ की जमीन एक लाख में दे दी हो.

पर दिक्कत वहाँ है जब यह कहा जा रहा कि इन लोगों ने इस लैंड डील में नियमानुसार एक करोड तैतीस लाख रुपये की स्टैम्प ड्यूटी सरकार को देने की जगह मात्र सैंतालीस हज़ार रुपये ही दिए. इस तरह एक करोड़ से ऊपर का राजस्व का नुकसान इन लोगों द्वारा किये जाने की बात कही जा रही है. मैं नहीं कहती कि यह जो आरोप लगा है वह बिलकुल सही होगा. बहुत संभव है वह गलत हो, पर सबसे बड़ी बात यह है कि भूषण पिता-पुत्र में से किसी ने भी इस आरोप के ऊपर किसी प्रकार की प्रतिक्रया तक नहीं व्यक्त की. यह बात अपने-आप में बहुत गंभीर जरूर है. इतने बड़े वकील हैं, उनके लिए इस लैंड डील में स्थिति स्पष्ट करना कोई बड़ी बात नहीं है. ऐसे में एकदम से चुप हो जाना! कुछ हैरानी सी होती है.

दूसरा आरोप तो और भी गंभीर है. एक सीडी सामने आया है जिसमे मुलायम सिंह यादव, अमर सिंह और शांति भूषण के बीच बातचीत है. छोटी सी बातचीत हुई जिसमे शांति भूषण आगरा से जुड़े एक पीआईएल के लिए ‘मात्र चार करोड़ रुपये’  मांग रहे हैं. वे देश में फैले भ्रष्टाचार के लिए सभी लोगों को कोसते हुए अपने लड़के प्रशांत भूषण की तारीफ़ करते हैं और कहते हैं कि पीआईएल में खर्चा तो आता ही है, जज को भी देना होता है. लिहाजा चार करोड़ की मामूली धनराशि खर्च करनी होगी.

इस सीडी के आने के बाद से हर तरफ कोहराम मचा हुआ है. सभी एक दूसरे को कोस रहे हैं, गरिया रहे हैं. पर यदि यही काम नेतानगरी से होती तो मुझे कोई खास तकलीफ नहीं होती.  पर कष्ट तब होता है जब अपने आप को विशिष्ट बताने वाले ये ‘सिविल सोसायटी’  के लोग भी दोहरे मानदंडों का परिचय देते हैं. अब देखिये, इन आरोपों पर हर कोई चुप है- अरविन्द केजरीवाल भी, किरण बेदी भी, अरुणा रॉय भी, बाकी दूसरे भी. मैं पूछती हूँ कि यदि ये सब मैगसेसे पुरस्कार पाए लोग इस गंभीर आरोप के बारे में चुप हैं तो आम सामाजिक कार्यकर्ता की क्या औकात है.

फिर उससे भी बढ़ कर मैं अन्ना हजारे को कहना चाहूंगी कि यदि वे और कुछ नहीं कह सकते हैं या कर सकते हैं तो कम से कम बिना खुद जांच किये कोई फैसला तो ना दे दें. क्या अन्ना हजारे ने इस मामले में कोई जांच की, क्या अब तक कोई सरकारी जांच हुई? क्या ये दोनों आरोप बहुत गंभीर नहीं हैं? क्या इन आरोपों पर उनको तत्काल निष्पक्ष और त्वरित जांच की बात नहीं कहनी चाहिए थी? क्या उन्हें स्वयं ही इस मामले में जांच तक शांति भूषण और प्रशांत भूषण को ड्राफ्टिंग कमिटी से अलग नहीं कर देना चाहिए था?

मैं एक बार भी नहीं कह रही कि जो दो आरोप इन दोनों पर लगे हैं वह सत्य हैं. संभव हों दोनों गलत हों, बनावटी हों. जानबूझ कर वे मामले किन्ही सोची-समझी रणनीति के तहत सामने लाये गए हों, कोई घृणित साजिश हों. मैं तो कहती हूँ कि ऐसा ही निकले. पर ऐसा होने पर भी यह जरूरी है कि अन्ना हजारे तथा दूसरे सिविल सोसायटी वाले तुरंत सामने आ कर वे बातें कहें जो मैं यहाँ कह रही हूँ. अन्ना हजारे कोई मुख्यमंत्री नहीं हैं और ना ही भूषण द्वय उनके मंत्री कि उनपर आरोप लगने पर तुरंत बचाव की मुद्रा में आ जाएँ. ये लोग एक पवित्र उद्देश्य से एक साथ आये हैं ना कि किसी गिरोहबंदी के लिए. ऐसे में इस तरह से बिना जांच के ही व्यवहार करना और भूषण द्वय को सही बता देना कदापि उचित प्रतीत नहीं होता है.

इन तथ्यों के मद्देनज़र मैं अन्ना हजारे से यह निवेदन करती हूँ कि जनता के समर्थन का मान रखते हुए वे तत्काल इन दोनों आरोपों पर शीघ्र जांच कराने की बात करें, सरकार जल्द से जल्द जांच कर के सच्चाई सामने लाये और तब तक के लिए शांति भूषण और प्रशांत भूषण शुचिता और शालीनता के निगाह से इस अतिसंवेदनशील ड्राफ्टिंग कमिटी से अलग हो जाएँ.

डॉ. नूतन ठाकुर

संपादक,

पीपल’स फोरम, लखनऊ

अमेरिका और भारत की पुलिसिंग में कुछ बुनियादी अंतर

डा. नूतन ठाकुरमैं अभी बोस्टन में हूँ और अब शनैः-शनैः अपनी यात्रा के अंत की ओर बढ़ रही हूँ जब मैं तेइस तारीख को न्‍यूयार्क इंटरनेशनल एअरपोर्ट से वापसी के लिए हवाई जहाज पर बैठूंगी. कल मुझसे मिलने सत्येन्द्र आये थे. उनके भाई प्रणव भागीरथ को हम लोगों ने इस वर्ष का आईआरडीएस का मानवाधिकार विषयक पुरस्कार दिया था. प्रणव नीदरलैंड्स की राजधानी एम्स्टर्डम में रहते हैं और वहीं से सामाजिक संचेतना वाले कई सारे लोगों का समूह बना कर भारत में बुलंदशहर के आसपास कार्य संचालित करते हैं, जबकि उनके भाई सत्येन्द्र बोस्टन में हैं.

लाखों अन्य भारतीयों की तरह वे भी कंप्यूटर इंजीनियर हैं और अमेरिका में अच्छा खा-कमा रहे हैं. भारत के लिए कुछ करने की उनकी ललक उन्हें हमेशा परेशान किये रहती है, पर कई दूसरे अमेरिकी-भारतीयों की तरह वे भी यहाँ आने से घबराते हैं क्योंकि उनके अनुसार ‘इंडिया में कई सारी प्रॉब्लम हैं.’ चूँकि मैं मानवाधिकार के क्षेत्र में कार्य करती हूँ और साथ ही एक पुलिस अधिकारी की पत्नी भी हूँ, लिहाजा इनसे मिलते ही मेरी सबसे पहली रूचि यहाँ की पुलिस व्यवस्था के बारे में जानने की हुई. मैंने उनसे पुलिस के बारे में पूछा और उन्होंने इसके बाद खुद ही बताना शुरू कर दिया. लगता है, देश हो या विदेश, पॉलिटिक्स के बाद पुलिस ही हर व्यक्ति का सबसे पसंदीदा विषय होता है.

सत्येन्द्र ने बताया कि अमेरिका में जो सबसे अच्छी बात है वह यह कि यहाँ के पुलिस वाले तनिक भी बदतमीज नहीं होते. उन्हें अपने काम से मतलब होता है, धौंस डालने से नहीं. ऐसा नहीं कि अमेरिका वाले पुलिस से नहीं डरते हों. लोग यहाँ भी पुलिस से बहुत अधिक घबराते हैं, लेकिन ऐसा आदमी तब करता है जब वह क़ानून तोड़े हुए होता है. इसका भी कारण सत्येन्द्र ने यह बताया कि यहाँ पर क़ानून तोड़ कर बच पाना काफी मुश्किल होता है. पुलिस शायद ज्यादा सतर्क और चौंकन्नी होती है, जिसके कारण किसी भी घटना के होने के बाद पुलिस वाले अपराध की तह तक प्रायः पहुँच ही जाते हैं.

मैंने उनसे यह पूछा कि यदि कोई व्यक्ति किसी मुसीबत में पुलिस वालों को बुलाये तो वह अमूनन कितनी देर में आ जाते हैं. सत्येन्द्र का कहना था कि उनके खुद के अनुभव से वे कह सकते हैं कि कॉल करने के पांच से दस मिनट के अंदर पुलिस वाले आ ही जाते हैं. उन्होंने वहाँ की पुलिस से जुडी एक और महत्वपूर्ण बात बताई. उनका कहना था कि यहाँ कम्युनिटी पुलिसिंग का बड़ा ही रिवाज है. कम्युनिटी पुलिसिंग में सारे इलाकाई लोगों की सहभागिता होती है. पुलिस के लोग हर इलाके में कुछ ऐसे लोगों को चुनते हैं जिन्हें वे सामाजिक सारोकार वाला समझते हैं. फिर इन लोगों को कुछ पुलिसिया अधिकार भी मिल जाते हैं और उनके कुछ कर्तव्य भी निर्धारित होते हैं. जिस भी व्यक्ति को कम्युनिटी पुलिसिंग के लिए चुना जाता है, वह इसे बड़े ही गौरव का विषय समझता है और अपने खाली समय में अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी तत्परता से करता है.

मेरे यह कहने पर कि ऐसा तो हमारे देश में भी एसपीओ, पुलिस वार्डेन आदि के रूप में होते हैं, सत्येन्द्र ने बताया कि दोनों में बुनियादी अंतर है. जहां भारत में लोग ये पद या तो स्वयं ले लेते हैं या सिफारिश कर के पा लेते हैं, पर उसके बाद इन पदों के प्रति पूरी तरह लापरवाह हो जाते हैं, वहीँ अमेरिका में ये दावित्व पुलिस वाले बहुत सोच-विचार कर देते हैं और जिसे यह दायित्व मिलता है वह भी पूरी ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाता है.

एक और बात उन्होंने ट्रैफिक के बारे में बताई. सत्येन्द्र ने बताया कि यहाँ यदि कोई व्यक्ति तीन बार ट्रैफिक के नियमों का उल्लंघन करता है तो स्वतः ही उसका ड्राइविंग लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है. ट्रैफिक नियमों को जानने के लिए दुनिया भर के कैमरे लगे हुए हैं, जिनसे सारी बातें हर पल मालूम होती रहती हैं. इस कारण हर आदमी अपने आप ही निरंतर चौंकन्ना रहता है और ट्रैफिक विभाग को इसका अतिरिक्त सरदर्द नहीं लेना पड़ता.

अंत में सत्येन्द्र ने एक बड़ी मजेदार बात कही- ‘मैंने अपने बेटे को कह रखा है कि अमेरिका में तुम कहीं भी किसी भी तरह की परेशानी में आओ तो सबसे पहले किसी सबसे नजदीक के पुलिसवाले से संपर्क करो. पुलिसवाला तुम्हारी वाजिब मदद जरूर करेगा. लेकिन जब हम हिंदुस्तान आते हैं तो उसी बच्चे को मैं कहता हूँ कि यदि यात्रा के दौरान कभी कोई मुसीबत आ जाए तो किसी के भी पास जा कर मदद मांग लेना, पर पुलिसवाले के पास कत्तई मत जाना.’ सत्येन्द्र की यह बात सुन कर मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा, एक तो इसलिए कि मैं भी उसी हिंदुस्तान की हूँ जिसके पुलिस की वे शिकायत कर रहे थे. फिर दूसरे यह भी कि एक पुलिसवाले की पत्नी भी हूँ. पर यह भी तो जानती हूँ कि मुझे अच्छा लगे या बुरा, उनकी बात बहुत हद तक सही भी है.

डॉ.  नूतन ठाकुर

सचिव

आईआरडीएस

”लोकपाल बिल हेतु ज्वायंट ड्राफ्टिंग कमिटी मात्र सलाहकारी, सरकार का निर्णय होगा अंतिम”

: सरकार उसकी रिपोर्ट मानने को बाध्य नहीं- अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल डॉ. अशोक निगम : लखनऊ के अधिवक्ता अशोक पांडे तथा सामजिक कार्यकर्त्री डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच में दायर रिट याचिका संख्या 3556/ 2011(एमबी) में शनिवार (16/04/2011) में केंद्र सरकार के अधिवक्ता ने एक बहुत महत्वपूर्ण सूचना दी.

भारत के अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल डॉ. अशोक निगम ने साफ़ कहा कि दिनांक 08/04/2011 द्वारा लोकपाल बिल हेतु अन्ना हजारे से जुडी ज्वायंट ड्राफ्टिंग कमिटी के लिए जारी की गयी अधिसूचना मात्र सलाहकारी है, जो सरकार को राय देने के लिए बनाई गयी है. इस अधिसूचना के आधार पर बनायी गयी कमिटी के रिपोर्ट के आधार पर केन्द्र सरकार अपने हिसाब से अंतिम निर्णय लेगी.

पांडे और डॉ. ठाकुर ने रिट याचिका में उच्च न्यायालय को भारत सरकार को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप इन ला मेकिंग (पीपीपीएल) के लिए नोटिफिकेशन जारी करने का निवेदन किया था और साथ ही इन दोनों ने इस हेतु एक मॉडल नोटिफिकेशन का प्रारूप भी प्रेषित किया था. यद्यपि इस रिट याचिका को जस्टिस देवी प्रसाद सिंह और जस्टिस एससी चौरसिया की डबल बेंच ने खारिज कर दिया पर उन्होंने यह भी कहा- ‘ यद्यपि हम संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत इस तरह के आदेश निर्गत करने के हकदार नहीं हैं पर याचिकर्ता इस देश के नागरिक होने के नाते सरकार को इस सम्बन्ध में अपनी बात रख सकते हैं और जिन स्थानों पर वह सुधार चाहते हैं, उन सभी बिंदुओं पर सुधार की मांग कर सकते हैं.’

इसके अलावा उन्होंने कुछ अन्य महत्वपूर्ण बाते कहीं- ‘यह सही है कि न्यायालयों के हाथ बंधे हुए हैं पर इस लोकतांत्रिक प्रणाली में जनता के हाथ नहीं बंधे हुए. अनुच्छेद 19  के अंतर्गत न्यायिक व्यवस्था के अधीन उन्हें अपनी बात कहने और अपनी मांग रखने का पूरा-पूरा अधिकार है.’ उन्होंने यह भी कहा-‘ इसके साथ जनता को यह भी अधिकार है अपने लिए ऐसे प्रतिनिधि चुनें जो पूरी तरह से साफ़-सुथरे चरित्र के हों.’ अशोक पांडे और डॉ. नूतन ठाकुर अब इस निर्णय के आलोक में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप इन ला मेकिंग (पीपीपीएल) के अपने मॉडल नोटिफिकेशन को इस निर्णय की प्रति के साथ केंद्र सरकार को प्रेषित कर रहे हैं.

आईआरडीएस प्रदान करेगा आलोक तोमर की स्‍मृति में पुरस्‍कार

: प्रतिवर्ष प्रिंट और न्‍यू मीडिया के पत्रकारों को मिलेगा यह सम्‍मान : इंस्टीट्यूट फार रिसर्च एंड डॉक्युमेंटेशन इन सोशल साइंसेज (आईआरडीएस) की तरफ से हर वर्ष छह क्षेत्रों में युवा हस्ताक्षरों को आईआरडीएस अवार्ड प्रदान जा रहे हैं. ये क्षेत्र हैं- पत्रकारिता, मानव अधिकार, विधि एवं न्याय, चिकित्सा तथा स्वास्थ्य, प्रबंधन तथा शासकीय सेवा. इनमे से पत्रकारिता के क्षेत्र में दिया जाने वाला पुरस्कार हैं- सुरेन्द्र प्रताप सिंह पुरस्कार. ये सभी पुरस्कार ऐसे व्यक्तियों के नाम से हैं जिनकी मृत्यु अल्प अवस्था में ही तब हो गयी थी जब वे अपने कार्यों के चोटी पर थे और उनसे अभी बहुत कुछ अपेक्षित था.

ये पुरस्कार इसी आशा तथा विश्वास  के साथ प्रदान किये जाते हैं कि पुरस्कृत लोग इन महान व्यक्तियों की बीच में ही टूट गयी संभवनाओं को पूरा करेंगे. जैसा हम सभी जानते हैं सुरेन्द्र प्रताप सिंह एक प्रमुख संपादक तथा ब्रॉडकास्टर थे जिन्होंने न सिर्फ आजतक न्यूज चैनल की स्थापना की वरन जो बहुधा सच्चे आधुनिक भारतीय खोजी पत्रकारिता के जनक माने जाते हैं. उन्हें अपने विचारों से आप्लावित कई सारे पत्रकारों को खोजने का श्रेय भी जाता है.

हाल में ही एक अन्य विलक्षण पत्रकार का इसी प्रकार से असामयिक निधन मात्र पचास साल की उम्र में तब हो गया जब वे अपने कार्यों में अत्यंत सक्रिय थे और अपनी लेखनी से तमाम नये मानदंड स्थापित कर रहे थे. आलोक तोमर नामक यह पत्रकार हमारे समय के सबसे बड़े हस्ताक्षर के रूप में सामने आये हैं जिन्होंने पहले प्रेस मीडिया में और बाद में न्यू मीडिया में उतनी ही दक्षता और विलक्षणता के साथ कार्य किया.

इस असामयिक मृत्यु से हम सभी लोग भी समान रूप से मर्माहत हैं. हम आईआरडीएस की तरफ से यह नितांत आवश्यक समझते हैं कि आलोक तोमर की श्रद्धा और उनके सम्मान में आईआरडीएस अवार्ड्स प्रदान करें. इस दृष्टि से आईआरडीएस ने यह निर्णय किया है कि अगले वर्ष से हम सुरेन्द्र प्रताप सिंह अवार्ड के अलावा आलोक तोमर अवार्ड भी प्रदान किया करेंगे. जहां सुरेन्द्र प्रताप सिंह अवार्ड इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लिए दिया जाएगा वहीँ आलोक तोमर अवार्ड प्रिंट तथा न्यू मीडिया के क्षेत्र में प्रदान किया जाएगा.

डा. नूतन ठाकुर

सचिव

आईआरडीएस, लखनऊ

पाकिस्‍तान में आई बाढ़, अमेरिका जिम्‍मेदार!

पाकिस्तानी बाढ़ में अमेरिका का हाथ. जी हाँ, कुछ किसी तरह के ख्याल होते हैं पाकिस्तान की बहुसंख्यक आबादी के. मैं अभी जिस बीस दिनों के अमेरिकी ट्रिप पर यहाँ यूएसए आई हूँ उसमे मेरे साथ अफगानिस्तान के एक और पाकिस्तान के तीन लोग भी साथ आये हैं. अफगानिस्तान के मोहम्मद अनीस हेरात के एक सरकारी कार्यालय के डाइरेक्टर हैं जबकि पाकिस्तान के फैसल अहमद, मोहम्मद असगर और मोहम्मद आरिफ रहीम तीनों ही प्रोविंसियल सिविल सर्विस के अधिकारी हैं.

ये लोग वर्तमान में पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में कार्यरत हैं. उन में एक तो पाकिस्तान स्थित पंजाब में हैं जबकि दो पाकिस्तान- अफगानिस्तान बॉर्डर पर हैं. इन दोनों देशों के प्रतिनिधियों में मैंने एक सामान बात देखी- अमेरिका के प्रति कहीं ना कहीं एक गहरी नाराजगी के भाव. वे चारों ही सरकारी अधिकारी हैं और जिस तरह हमारे देश में सरकारी अधिकारियों के बोलने पर बंदिशे होती हैं उसी तरह शायद हर देश में होती होगी. तभी ये चारों लोग बहुत सोच समझ कर ही बोलते हैं. पर इसके बावजूद भी उन लोगों की बातों से यह साफ़ जाहिर हो जाता है कि आज के समय आम पाकिस्तानी और आम अफगान के मन में अमेरिका को ले कर गहरी नाराजगी है. शायद इसका प्रमुख कारण अमेरिकी हस्तक्षेप और उनका इन दोनों देशों के शासन-प्रशासन और आम जन-जीवन पर सम्पूर्ण वर्चस्व है. इन बातों के कारण पाकिस्तानी और अफगानी लोगों में जबरदस्त नाराजगी है. उन लोगों का साफ़ मानना है कि उनके देश में स्थिरता का जो भी अभाव है, उसका नंबर एक जिम्मेदार अमेरिका है.

अमेरिका

यह सही है कि ये लोग इन पेचीदे और संवेदनशील प्रकरणों पर चर्चा नहीं करते हैं पर अंदर की फीलिंग तो किसी ना किसी रूप में बाहर आ ही जाई है. आज इन देशों में बहुतायत में लोग यह मानते हैं कि स्थिति अच्छी नहीं है तथा अमेरिकी हस्तक्षेप से आम जनजीवन भी व्यापक रूप से प्रभावित होता है. वे इन देशों की तमाम गड़बडि़यों का मूल कारण अमेरिका को मानते हैं. बलूचिस्तान की सीमा से लगे पख्तूनवाना और ग्वादर के ये अधिकारी मानते हैं कि आज आम लोगों की सोच यह है कि जो भी रहा है अमेरिका करा रहा है. स्थिति इतनी हास्यास्पद (तथा विकराल) हो गयी है कि अभी हाल में ही पाकिस्तान के सीमाई इलाकों में जो जबरदस्त बाढ़ आई थी, उसके सम्बन्ध में पाकिस्तानी यह मानते हैं कि अमेरिका ने कोई ग्लेशियर जान-बूझ कर डिस्टर्ब किया जिससे यह बाढ़ आई.

इसी तरह कुछ दिनों पहले पाकिस्तान बोर्डर पर करीब डेढ़ सौ परिवार वालों का अब तक अज्ञात कुछ कारणों से मर्डर हो गया था, पर पाकिस्तानी आश्वस्त हैं कि ये सारी हत्याएं अमेरिकी सैनिकों के द्वारा की गयीं. बल्कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में इन भावनाओं के अत्यंत बलवती होने के उदाहरण तब मिल जाते हैं जब हमारे भ्रमण के दौरान कई बार इन देशों के प्रतिनिधि अमेरिकी एक्सपर्ट्स से पूछ बैठते हैं कि आप हम लोगों को तो यहाँ कुछ और बता रहे हैं और जो उनके देशों में अमेरिका और अमेरिकी सैनिकों द्वारा हो रहा है वह तो कुछ और ही है. चूँकि अमेरिका में हम जितनी भी जगह गए हैं वहाँ हर जगह लोग एथिक्स तथा मोरेलिटी पर बहुत अधिक बातें करते हैं. इसी पर इन दोनों देशों के प्रतिनिधि पूछ ही लेते हैं कि जब आपके लोग बाहर जाते हैं तो एथिक्स क्यों नहीं काम करता है?

अमेरिका

अक्सर जो उत्तर मिलते हैं वे कुछ गोल-मोल से ही होते हैं. मसलन इन प्रश्नों के उतने सही उत्तर हम नहीं दे पायेंगे क्योंकि हम मौके पर नहीं हैं अथवा हमें पूरी जानकारी नहीं है. कभी कहते हैं कि युद्ध में स्थिति अलग हो जाती है. कोई कहता है कि ऐसा सार्वभौमिक नहीं है बल्कि व्यक्ति का भी अंतर होता है. इसके अलावा भारत पाक सम्बन्ध पर भी हम लोगों की खास जिज्ञासाओं को मद्देनज़र कर मैंने उन लोगों से पूछा कि आम पाकिस्तानी भारत के बारे में क्या सोचता है. बड़ा साफ़ उत्तर मिला कि वहाँ पाकिस्तान में यह मानना रहता है कि पाकिस्तान में जो भी हो रहा है वह या तो अमेरिका करा रहा है या भारत करा रहा है. यानी कि जो बात हम सरहद के इस तरफ सोचते हैं शायद वही बात अपने ढंग से सरहद के दूसरे पार के लोग भी सोचते हैं. इनमे से कौन सच्चा है और कौन झूठा, इसका फैसला मैं अपनी सीमित जानकारी के आधार पर कैसे कर सकती हूँ.

डॉ. नूतन ठाकुर

सचिव

आईआरडीएस एवं कन्वेनर, नेशनल आरटीआई फोरम

”कमेटी में होंगे अन्‍ना हजारे के पांच नुमाइंदे”

डा. नूतन ठाकुरअन्ना हजारे के प्रयासों के बाद भारत सरकार द्वारा जन लोकपाल विधेयक के सम्बन्ध में जिस प्रकार से सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया गया वह निश्चित रूप से सराहनीय है. इस प्रस्तावित विधेयक की आवश्यकता और इसकी महत्ता के विषय में हम सभी भलीं-भाति परिचित हैं, अतः मैं उस पर नहीं जाते हुए सीधे एक ऐसे मुद्दे पर आती हूँ जो आज जल्दीबाजी में कर तो दिया गया है पर आगे चल कर इसके अत्यंत गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

कई बार कोई बात उस समय छोटी सी दिखती है और उस अवसर पर सब कुछ अच्छा ही अच्छा लगता है. पर यही मामला बाद में नासूर बन सकने की शक्ति रखती है.  यदि आप मुझसे सहमत नहीं हैं तो ज़रा गौर से पढ़िए भारत सरकार के उस गज़ट नोटिफिकेशन को जिसमें यह घोषणा है कि जन लोकपाल बिल लाने के लिए एक साझा ड्राफ्टिंग कमिटी बनेगी. इस सरकारी गजट नोटिफिकेशन में लिखा है-

“साझा ड्राफ्टिंग कमिटी में भारत सरकार के नुमाइंदे के तौर पर पांच मंत्री इसके सदस्य होंगे और इसमें अन्ना हजारे (उनको लेते हुए) के पांच नुमाइंदे होंगे.” फिर यह भी लिखा गया- “अन्ना हजारे के पांच नुमाइंदे उन्हें लेते हुए निम्न होंगे” ये वे शब्द हैं जो अपने अपने-आप में भयानक खतरा समेटे हुए हैं. इन शब्दों से सीधे-सीधे एक सरकार और एक व्यक्ति आमने-सामने खड़े से दिखते हैं और उनके बीच समानता का भाव प्रकट होता है.

मेरा यह दृढ मत है कि एक व्यक्ति चाहे वह कितना भी महान या बड़ा क्यों ना हो, एक सरकार नहीं हो सकता. इस तरह की शब्दावली के जरिये साफ़ तौर पर गलत सन्देश जाने का भी अंदेशा रहता है और भविष्य के लिए खतरनाक दृष्टांत भी बन जाया करते हैं. ठीक है कि अन्ना हजारे बहुत अच्छे आदमी हैं. यह भी सही है कि उनके साथ लगे हुए उनके “नुमाइंदे” भी उतने ही अच्छे हैं. पर यदि हमारे देश में इसी तरह से क़ानून बनाने के लिए सरकारी दस्तावेजों में निजी व्यक्तियों के नाम ले कर नुमाइंदे चुने जाने लगे तब निश्चित तौर पर आज नहीं तो कल अराजकता बढ़ेगी ही.

आज अन्ना हजारे के नुमाइंदे आये हैं, कल मेधा पाटेकर के नुमाइंदे होंगे, परसों अरुणा रॉय के नुमाइंदे, उसके अगले दिन अरुंधती रॉय के, फिर किसी अन्य मसले पर मल्लिका साराभाई के, फिर यदि मेरी सामजिक हैसियत और रसूख में बढोत्तरी हो गयी तो मेरे नुमाइंदे और इसी तरह बढते हुए ना जाने किन-किन ऐसे लोगों के भी जो पूर्णतया अवांछनीय हों. जितने लोगों के मैंने नाम लिए हैं वे सब तो आम जनता की निगाहों में सर्वमान्य तौर पर साफ़-सुथरे लोग हैं, अपराधी नहीं हैं, जनहित के कार्यों में जुड़े हुए हैं और बौद्धिक रूप से समर्थ हैं.

पर क्या ऐसा नहीं होगा कि कल को मलखान सिंह, सुल्ताना डाकू, दाउद अब्राहम या कोई अन्य व्यक्ति भी इसी तरह मांग करने लगे कि अब मेरे भी पांच या सात नुमाइंदे चुनो जो किसी नए मुद्दे पर क़ानून बनाने में मदद करेंगे. मैं पूरी तरह यह मानती हूँ कि “अन्ना हजारे के नुमाइंदे” शब्द की जगह “सिविल सोसायटी से चुने हुए लोग” या यहाँ तक कि “सरकार द्वारा अन्ना हजारे के साथ वार्ता/ सहमति से चयनित लोग” का प्रयोग होना ही चाहिए था. उसकी जगह “अन्ना हजारे के नुमाइंदे” शब्द कुछ ऐसा रूप प्रस्तुत कर रहे हैं जैसे राजनीति और दूसरे क्षेत्रों की तरह सिविल सोसायटी तथा सामाजिक कार्यों के क्षेत्रों में भी उसी प्रकार के पक्षपात या भेदभावपूर्ण व्यवहार संभव है, जैसा समाज के दूसरे क्षेत्रों में हुआ करता है.

वैसे यह एक अच्छी पहल है कि अब शायद देश में पहली बार पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) की तर्ज़ पर क़ानून के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो गयी है. मैं यह समझती हूँ कि यह प्रक्रिया आगे भी चलती रहेगी और इस तरह से जनता और सरकार के बीच में कानून-निर्माण का या पीपीपी हमेशा के लिए सुनिश्चित कर दिया जाएगा.

डॉ. नूतन ठाकुर

सचिव

आईआरडीएस, लखनऊ

“पेड न्यूज़ और भारतीय पत्रकारिता” शीर्षक पर लघु शोधपत्र आमंत्रित

हम सभी जानते हैं कि पेड न्यूज़ अर्थात मालिकों के स्तर पर ही एकमुश्त पैसे लेकर किसी व्यक्ति के पक्ष में प्रायोजित खबरें प्रकाशित करने का रोग आज हमारी पत्रकारिता के लिए एक बहुत बड़े संकट और भारी समस्या के रूप में उभर कर सामने आया है. मैं कुछ दिनों पहले प्रसिद्ध सम्मानित पत्रकार पी साईंनाथ के लखनऊ में आयोजित एक संभाषण कार्यक्रम में गयी थी.

अपने भाषण में साईंनाथ ने कहा था कि हमारी पत्रकारिता और हमारी पूरी व्यवस्था के लिए यदि कोई सबसे बड़ा खतरा है तो वह पेड न्यूज़ है, जिसमे मालिकान एकमुश्त पैसा ले कर खबरें छपवा दे रहे हैं. उन्होंने इसके ना जाने कितने ही वास्तविक उदाहरण दिए थे. मैं उनकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ.

हमारी संस्था इंस्टीट्यूट फोर रिसर्च एंड डॉक्युमेंटेशन इन सोशल साइंसेज (आईआरडीएस) द्वारा “पेड न्यूज़ और भारतीय पत्रकारिता” शीर्षक से लघु शोधपत्र आमंत्रित किये जा रहे हैं. इस शोधपत्र में भारतीय पत्रकारिता तथा पेड न्यूज़ से जुड़े किसी भी आयाम पर अपनी बात लिखी जा सकती है.

लेखक चाहें तो पूरी सम्पूर्णता में इस बिंदु पर अपना आकलन और अपने विचार प्रस्तुत कर सकते हैं और यदि वे चाहें तो वे इसके किसी खास आयाम पर अपना शोधपत्र प्रेषित कर सकते हैं. किसी एक उदाहरण पर अपने आप को केंद्रित करते हुए भी यह शोधपत्र लिखा जा सकता है.

इस शोधपत्र को प्रेषित करने की अंतिम तिथि 31 अप्रैल 2011 होगी. शोध पत्र ईमेल द्वारा irdslucknow@gmail.com , nutanthakurlko@gmail.com पर अथवा डाक द्वारा निम्न पते पर प्रेषित किया जा सकता है-

लघु शोधपत्र प्रेषित करने के निम्न नियम रहेंगे-

1. शोधपत्र को प्रेषित करने की अंतिम तिथि 31 अप्रैल 2011 होगी.

2. शोधपत्र दिए गए ईमेल अथवा बताए गए पते पर डाक द्वारा भेजा जा सकता है.

3. शोधपत्र की अधिकतम शब्द सीमा 5000 शब्द होगी जबकि इसमें न्यूनतम 1500 शब्द होने चाहिए.

4. शोधपत्र प्रेषित करने वाले अपना नाम, पता, ईमेल, फोन नंबर आदि साथ में अवश्य प्रेषित करेंगे.

5. शोधपत्र हर कीमत में मौलिक होनी चाहिए और कहीं अन्यत्र छपी नहीं होनी चाहिए.

6. पुरस्कार हेतु सर्वश्रेष्ठ शोधपत्रों का चयन करने का अंतिम अधिकार आईआरडीएस का होगा.

सर्वश्रेष्ठ दो  लघु शोधपत्रों को निम्न रूप से पुरस्कृत किया जाएगा-

प्रथम पुरस्कार– दो हज़ार रुपये

द्वितीय पुरस्कार– एक हज़ार रुपये

साथ ही सर्वश्रेष्ठ लघु शोधपत्र मूल रूप में यशवंत जी के सौजन्य से भड़ास4मीडिया में भी प्रकाशित किया जाएगा.

डॉ. नूतन ठाकुर

सचिव, आईआरडीएस

5/426, विराम खंड,

गोमती नगर, लखनऊ

अच्छा, आप आईपीएस हैं, पहले क्यों नहीं बताया?

नूतनजीमेरठ आने से ठीक पहले मैं अपने पति अमिताभ जी के साथ डीआरएम, पूर्वोत्तर रेलवे के कार्यालय गयी थी. हमें वहाँ डीआरएम, पूर्वोत्तर रेलवे के जन सूचना अधिकारी से मिलना था. उसके पीछे पृष्ठभूमि यह थी कि पिछले साल जून में अमिताभ मेरा पटना तक का एक टिकट वापस करने गोमतीनगर रेलवे स्टेशन गए थे.

वे उस समय आईआईएम लखनऊ में ही पढ़ रहे थे और उनके साथ कोई पुलिसवाले तो होते नहीं थे, नतीजतन वे अकेले ही स्टेशन गए थे. मैं उस समय पटना गयी हुई थी इसीलिए वही जानती हूँ जो इन्होंने मुझे बताया. इनके कहे के मुताबिक वहाँ टिकट-खिड़की पर जो बाबू थे वे आम जनता से बिलावजह खराब व्यवहार कर रहे थे. जो भी उनसे कुछ पूछता या निवेदन करता वे उससे ही उलझ पड़ते. अमिताभ जी की बारी आने पर उनसे भी इसी तरह की कुछ उटपटांग ढंग से बात की. टिकट वापस तो नहीं ही किया, ऊपर से कुछ ऐसी बातें कह दी जो इन्हें काफी बुरी लगीं. इन्होंने इस बारे में तुरंत वहीँ रेलवे स्टेशन से ही एके सिंह, डीआरएम, पूर्वोत्तर रेलवे से मोबाइल पर बात की और सारी बात बताते हुए उनसे मिलने का समय माँगा. चूँकि उस टिकट बाबू से कई सारे लोग नाराज़ थे, अमिताभ जी ने जब एक दरख्वास्त लिखा तो वहाँ उपस्थित पांच-छह लोगों ने मिल कर उस पर स्वतः ही दस्तखत कर दिए. इन लोगों के साइन किये गए प्रार्थना पत्र को लेकर इन्होंने एके सिंह को मिल कर वह आवेदन दिया. एके सिंह ने मौखिक तो कहा कि जांच कर के कार्रवाई की जायेगी, पर लगता है उनकी मंशा कुछ और ही रही होगी. इसीलिए एक लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.

जब मैं पटना से लौट कर लखनऊ घर आई तो मुझे यह सारी बात मालूम हुई. मैंने इन्हें कहा कि कहाँ बिना-मतलब की बात उठा कर चल देते हैं. आखिर कहाँ-कहाँ के मामलों में पीछे पड़े रहेंगे. मैंने यह भी समझाया कि चलिए बात खतम हो गयी पर चूँकि ये जिद्दी आदमी हैं, इसीलिए मेरी बात मानने से इनकार कर दिया. अब इनका टारगेट वे टिकट बाबू नहीं बल्कि डीआरएम एके सिंह थे. इनका यह कहना था कि यदि एके सिंह ने मेरी पूरी बात सुन कर उस टिकट बाबू को डांट-फटकार भी दिया होता तो मुझे बात आगे नहीं बढ़ाने की इच्छा थी, पर एक तो उन्होंने मिलने पर भी सही रेस्पांस नहीं दिया और लगता है कि अब गलत ढंग से उसे बचाने पर लगे हैं. इसीलिए मैं तो इस प्रकरण का अंत तक पीछा करूँगा.

इसके बाद इन्होंने तुरंत आरटीआई के अंदर डीआरएम, पूर्वोत्तर रेलवे के लिए एक आवेदन बनाया कि उनकी शिकायत किस अधिकारी को प्रेषित की गयी, किसके द्वारा जांच की गयी, जांच में क्या निष्कर्ष निकले और उनके आधार पर क्या कार्रवाई हुई. आश्चर्यजनक रूप से इस आरटीआई का कोई उत्तर नहीं आया. तब इन्होंने प्रथम अपीलीय अधिकारी को चिट्ठी लिखी. वहाँ से भी कोई जवाब नहीं आया. तब एक तरफ तो केन्द्रीय सूचना आयोग, नयी दिल्ली को पत्र प्रेषित करके शिकायत किया और दूसरी तरफ रेलवे बोर्ड को भी इस पूरे घटनाक्रम से अवगत कराते हुए शिकायती पत्र भेज दिया. मैंने मना भी किया लेकिन एक बार जो बात इनके मन में बैठ जाती है, वह जल्दी जाती नहीं. इनका कहना था कि चूँकि हम लोग इसी तरह हर बात को चुपचाप वैसे ही मान लेते हैं, तभी हमारे देश में आम आदमी को इस तरह की तमाम समस्याएं आती हैं. यदि हर व्यक्ति अपने हक के लिए वाजिब तरीके से लड़ेगा तो स्थिति में निश्चित सुधार आएगा. खैर सुधार आएगा या नहीं, यह तो मैं नहीं जानती पर इतना जरूर जानती हूँ कि यदि ये किसी चीज़ के पीछे पड़े हैं तो तब तक पीछे पड़े रहेंगे जब तक इनकी पूरी हिम्मत ही नहीं टूट जाए. और मुझे इनके इन सारे मामलों में साथ निभाना ही है.

डीआरएम कार्यालय से तो कोई पत्र नहीं आया पर रेलवे बोर्ड से जरूर किसी जांच के आदेश हुए. एक दिन अचानक डीआरएम कार्यालय के एक अधिकारी इनसे मिलने आये कि आपने रेलवे बोर्ड में जो शिकायत की है उसमें मुझे जांच सौंपी गयी है. मेरे सामने ही अमिताभ जी ने चार पन्ने का अपना लंबा-चौड़ा बयान लिख कर उस अधिकारी को दिया, जिसमें अपनी तमाम बातें लिखीं. यह बताया कि ना तो उनसे और ना ही अन्य तमाम लोगों, जिनके मोबाइल नम्बर उस प्रार्थना पत्र में दिए गए थे, से किसी प्रकार की कोई पूछताछ की गयी.

इस घटना को घटे भी अब लगभग तीन महीने बीत चुके हैं कि अब लगभग एक सप्ताह पहले केन्द्रीय सूचना आयोग से एक पत्र आया जिसमें इनके शिकायत का उल्लेख था. इसमें लिखा था कि अमिताभ के पत्र को एक शिकायत के रूप में लेते हुए आयोग डीआरएम, पूर्वोत्तर रेलवे कार्यालय के जन सूचना अधिकारी को निर्देशित करता है कि वह एक महीने के अंदर इन्हें पूरी सूचना उपलब्ध कराये. साथ ही यह भी कहा गया कि जन सूचना अधिकारी अब तक हुए विलम्ब के सम्बन्ध में भी अपना स्पष्टीकरण दें.

यह है हमारे डीआरएम कार्यालय जाने के पीछे की पृष्ठभूमि. जब मैं और ये डीआरएम कार्यालय पहुंचे तो पहले हम जन सूचना अधिकारी से मिले. उन्होंने एक अन्य अधिकारी, जो उनके कनिष्ठ थे और यह काम देखते थे, के पास भेजा. ये साहब भी असली सरकारी अधिकारी थे, सीधे मुंह बात नहीं करने वाले. उनकी बातचीत का ढंग ऐसा था कि इनकी जगह खुद मुझे ही बहुत गुस्सा आया. मैंने एक बार फिर जन सूचना अधिकारी से मिल कर आयोग के आदेश का अनुपालन करने की बात कही. उन्होंने अपने उस कनिष्ठ अधिकारी को बुलाया पर उस अधिकारी के बातचीत का अंदाज़ ऐसा था, जिसे देख कर अंदर से वितृष्णा के भाव जगे जा रहे थे. मैं सोच रही थी कि क्या ऐसे ही कुपात्र और घृणित किस्म के सरकारी अधिकारियों पर रेलवे की और सरकार की छवि सुधारने की जिम्मेदारी दी गयी है, जिन्हें आम पब्लिक से बात करने तक की तमीज नहीं है, बाकी काम की कौन कहे. मैंने देखा कि जल्दी मेरी और उस अधिकारी की बहस होने लगी और उसने कोई ऐसी बात कह दी कि इन्हें भी गुस्सा आया और इन्होंने उसे डांटा. इस पर तैश खा कर उस अधिकारी ने कहा कि अभी आरपीएफ यानी रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स को बुलाता हूँ. इस पर मेरे पति से रहा नहीं गया और उन्होंने अपनी आइडेंटीटी बतायी.

यही वह मुख्य बात है, जिसे मैं बताना चाहती हूँ. मेरे पति के बारे में जानते ही जन सूचना अधिकारी, जो अब तक शांत भाव से यह पूरा तमाशा देख रहे थे, एकदम से सक्रिय और चौकन्ने हो गए. उन्होंने छूटते ही कहा- “अरे, आपने पहले क्यों नहीं बताया?”. फिर कहने लगे कि आप तो जिस पद पर हैं उस पर अपनी बात बताने पर लोग ऐसे ही आपका सारा काम कर देंगे. फिर उन्होंने चाय-कॉफी के लिए पूछना शुरू कर दिया और अंत में ठंडा पानी पिला कर ही माने. यह बात तो मैं भी जानती हूँ और अमिताभ जी भी कि उनका पद ऐसा है जो बहुत सारे काम ऐसे ही आराम से हो जाते हैं. पर मेरा और उनका मुख्य मुद्दा भी यही है कि क्या इस देश में और यहाँ की व्यवस्था में हर आदमी को अपना कोई भी काम करवाने के लिए कुछ ना कुछ होना जरूर है? यानी जो इस तरह का कुछ नहीं है, अधिकारी नहीं है, नेता नहीं है, पत्रकार नहीं है, पैसे वाला नहीं है, क्या वह इस देश का नागरिक ही नहीं है? क्या उसे किसी भी सरकारी दफ्तर में जाने का हक ही नहीं है?

इस तरह के सभी अनुभवों से हमें सोचना पड़ेगा और “हम फलां व्यक्ति हैं” की सोच से हम सभी लोगों को आगे निकलना होगा. यह सही है कि ताकतवर और सामान्य व्यक्ति मे अंतर होगा पर यह अंतर इतना अधिक और इतना घृणित नहीं हो कि आम आदमी इस व्यवस्था पर पूरी तरह विश्वास ही खो बैठे. ऐसे हालात किसी भी तरह से अच्छे नहीं हैं. अमिताभ जी तो धुन के पक्के हैं और अपनी भेजी गयी दरख्वास्तों पर तब तक लगे रहेंगे जब तक उनकी अंतिम परिणति नहीं हो जाती है, पर हम सभी को यह सोचना होगा कि क्या कोई आदमी अपनी आइडेंटीटी बताया तभी उसकी इस देश के सरकारी दफ्तरों में पूछ है अन्यथा नहीं?

डॉ. नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

राज्‍य सूचना आयोग के दंड पुनर्विचार की प्रक्रिया विधि विरुद्ध

: डा. नूतन ठाकुर की याचिका पर हाई कोर्ट का निर्णय : आज 14 मार्च को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ खंडपीठ में नेशनल आरटीआई फोरम की कन्वेनर डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग तथा अन्य के विरुद्ध दायर रिट याचिका में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया. मुख्य न्यायाधीश जस्टिस फर्डिनो रिबेलो तथा जस्टिस देवी प्रसाद सिंह की पीठ ने इस याचिका को निस्तारित किया.

दोनों माननीय जजों द्वारा स्पष्ट शब्दों में यह निर्णित किया गया कि उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग को अपने द्वारा किये गए पूर्व के निर्णय, जिसमे दंड देने का प्रावधान भी शामिल है, पर पुनर्विचार करके उसे बदलने का अधिकार नहीं है. उच्च न्यायालय ने डॉ. ठाकुर के अधिवक्ता अशोक पांडे के इस तर्क को पूर्णतया स्वीकार किया कि अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने का अधिकार मात्र उन्हीं न्यायिक, अर्धन्यायिक तथा प्रशासनिक संस्थाओं को है, जिन्हें यह अधिकार स्पष्ट रूप से किसी विधि के माध्यम से प्रदत्त किया गया हो.

उच्च न्यायालय ने कहा कि चूँकि उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग को किसी क़ानून के अंतर्गत अपने निर्णयों को बदलने का अधिकार नहीं है, अतः उनके द्वारा ऐसा किया जाना विधिसम्मत नहीं है. यह स्थापित विधि है और तदनुसार यह बात आयोग द्वारा स्वयं दंड दे कर उसे वापस कर लेने के अधिकार पर भी लागू है.

डॉ. नूतन ठाकुर ने इस रिट में अपने पति और आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर से सम्बंधित दो ऐसे प्रकरण प्रस्तुत किये थे जिनमें उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग ने धारा 20(1) तथा 20(2) के अंतर्गत दंड का निर्धारण किया और बाद में उसे नियमों के विरुद्ध स्वयं ही बदल दिया. इनमें से एक मामला वार्षिक गोपनीय प्रविष्टि तथा दूसरा उनके स्टडी लीवसे सम्बंधित था.

उत्तर प्रदेश में सूचना का अधिकार अधिनियम में सूचना आयोग की इस प्रकार अपने निर्णयों को बदलने की प्रवृत्ति के सम्बन्ध में यह एक महत्वपूर्ण निर्णय है.

दीपक आजाद, अमिताभ ठाकुर समेत छह को आईआरडीएस अवार्ड

गैर सरकारी संगठन इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एण्ड डाक्युमेंटेशन इन सोशल साइन्सेंस (आईआरडीएस), लखनऊ द्वारा वर्ष 2011 के लिये छह क्षेत्रों में विशिष्ट उपलब्धियां हासिल करने वाले युवाओं को आईआरडीएस अवार्ड प्रदान किये जा रहे हैं. ये क्षेत्र हैं- पत्रकारिता, मैनेजमेंट, चिकित्सा तथा स्वास्थ्य, शासकीय सेवा, मानव अधिकार तथा विधि एवं न्याय.

इन क्षेत्रों में पुरस्कृत व्यक्तियों के नाम हैं- दीपक आज़ाद (पत्रकारिता- सुरेन्द्र प्रताप सिंह पुरस्कार), कौशलेन्द्र (मैनेजमेंट- मंजुनाथ शंमुगम पुरस्कार), डॉ मिलिंद देवगांवकर (चिकित्सा-आनंदी बाई जोशी पुरस्कार), अमिताभ ठाकुर (शासकीय सेवा-सत्येन्द्र दुबे पुरस्कार),  डॉ. प्रणव भागीरथ (मानव अधिकार- सफदर हाशमी पुरस्कार) तथा संदीप कुमार (विधि- वी एन शुक्ला पुरस्कार).

दीपक आज़ाद देहरादून के एक युवा और जुझारू स्वतंत्र पत्रकार हैं, जो विपरीत परिस्थितियों, धमकियों और प्रलोभनों के बाद भी अनवरत अपने सिद्धांतों और आदर्शों पर खड़े रहे और उसके लिए व्यक्तिगत हितों को सीधे तौर पर कुर्बान किया. पेड न्यूज़ के विरोध में इनके प्रयास काफी सराहे गए हैं.

कौशलेन्द्र आईआईएम अहमदाबाद के 2007 बैच के टॉपर हैं, जिन्होंने किसी मल्टीनेशनल में नौकरी नहीं करके समृद्धि तथा कौशल्या फाउन्डेशन के माध्यम से भारतीय परिस्थितियों में उचित दर पर सब्जी बेचने सम्बंधित कार्य प्रारम्भ किया है, जिससे आम सब्जी विक्रेताओं का भला हो.

डॉ. मिलिंद देवगांवकर क्लीवलैंड क्लिनिक फाउन्डेशन, अमेरिका में न्यूरोसर्जरी विभाग में कार्यरत हैं. रीनल न्यूरोमोड्यूलेशन, न्यूरोजेनिक डिसफंक्शन आदि के क्षेत्र में इनके कुल सात पेटेंट्स अब तक हो चुके हैं तथा स्पाइनल इंज्यूरी पर इनके विशेष आनुसंधानिक कार्य है.

अमिताभ ठाकुर 1998 बैच के उड़ीसा कैडर के एक आईपीएस अधिकारी हैं, जिन्होंने डीसीपी भुवनेश्वर के रूप में अनन्य प्रतिष्ठा अर्जित की तथा सीबीआई में महाराष्ट्र में एक दोहरी हत्या का खुलासा करते हुए एनसीपी सांसद की गिरफ़्तारी और सोहराबुद्दीन मुठभेड़ में गुजरात के पूर्व गृह मंत्री की गिरफ्तारी में प्रमुख भूमिका निभाई.

डॉ. प्रणव भागीरथ एम्स्टरडम, नीदरलैंड के छब्बीस वर्षीय युवा एमबीबीएस डॉक्टर हैं, जो अपने देश से गहरे से जुड़े हैं और प्रे संस्था के माध्यम से उत्तराँचल में जमीनी तौर पर कई सारे सराहनीय कार्य कर रहे हैं.

संदीप कुमार पटना हाई कोर्ट के एक प्रतिष्ठित अधिवक्ता हैं, जो गरीब और जरूरतमंद लोगों को न्याय दिलाने के अपने प्रयास में अनवरत लगे रहते हैं. इसके साथ ही वे आम लोगों से सरोकार रखने वाली जनहित याचिकाएं भी करते हैं, जिनमें उनकी नक़ल मुक्त बोर्ड परीक्षा तथा शेखपुरा इलाके में सरकार द्वारा अवैध तरीके से लोगों का भूमि अधिग्रहित करने सम्बंधित याचिकाएं विशेष सराही गयीं.

ये पुरस्कार ऐसे व्यक्तियों के नाम पर रखे गए हैं, जिनकी मृत्यु अल्प अवस्था में ही तब हो गयी थी जब वे अपने कार्यों के चोटी पर थे और उनसे अभी बहुत कुछ अपेक्षित था. ये पुरस्कार इसी आशा तथा विश्वास के साथ प्रदान किये जा रहे हैं कि ये पुरस्कृत लोग इन महान व्यक्तियों की बीच में ही टूट गयी संभवनाओं को पूरा करेंगे. ये सभी पुरस्कृत लोग ऐसे हैं, जिनकी आयु 28 फरवरी 2011 को 45 वर्ष से कम है.

डॉ.  नूतन ठाकुर

सचिव

आईआरडीएस

लखनऊ

अमिताभ ठाकुर स्टडी लीव प्रकरण : हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार की याचिका खारिज की

1992 बैच के आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के अध्ययन अवकाश के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट), लखनऊ के आदेश के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में रिट पेटिशन 268/ 2011 दायर किया था. आज (09/03/2011) उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के इस रिट याचिका को बलहीन बताते हुए खारिज कर दिया है.

आज जस्टिस देवी प्रसाद सिंह और जस्टिस एससी चौरसिया के बेंच में याची के अधिवक्ता अशोक पाण्डेय ने अन्य बातों को रखने के साथ यह भी बताया कि ठाकुर को पिछले दो सालों से वेतन तक नहीं मिल रहा है. कोर्ट ने शासकीय अधिवक्ता द्वारा एफिडेविट दायर करने के लिए अतिरिक्त समय मांगने के अनुरोध को सिरे से खारिज कर दिया. उन्होंने अपने निर्णय में कहा कि चूँकि कैट ने एक समय सीमा के अंदर ठाकुर के स्टडी लीव सम्बंधित प्रकरण निस्तारित करने का आदेश दिया था, अतः इसे लंबित रखने का कोई कारण नहीं दिखता है. उच्च न्यायालय ने आदेशित किया कि ठाकुर के स्टडी लीव प्रकरण में राज्य सरकार दो सप्ताह के अंदर निर्णय करे.

अमिताभ ठाकुर ने 30/04/2008 को दो सालों के लिए आईआईएम लखनऊ में फेलो प्रोग्राम इन मैनेजमेंट कोर्स के लिए अध्ययन अवकाश हेतु आवेदन किया था. राज्य सरकार ने जानबूझ कर यह प्रकरण काफी समय तक लंबित रखा. इस पर ठाकुर ने केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट), लखनऊ और उच्च न्यायालय में कई मुकदमे दायर किये और तब जा कर उन्हें असाधारण अवकाश मिला.  आगे चल कर कैट, लखनऊ ने मूल वाद संख्या 238 of 3009 में 07/07/2010 को राज्य सरकार द्वारा अध्ययन अवकाश नहीं दिए जाने के लिए बताए गए तीनों कारणों को बलहीन करार करते हुए उन्हें अस्वीकृत कर दिया और कहा कि राज्य सरकार ठाकुर के स्टडी लीव के सम्बन्ध में चार सप्ताह में नियमानुसार निर्णय ले.

इसके बाद भी राज्य सरकार द्वारा इसका पालन नहीं किया गया और अमिताभ ठाकुर द्वारा गृह सचिव, भारत सरकार जीके पिल्लई, प्रमुख सचिव गृह कुंवर फ़तेह बहादुर और डीजीपी करमवीर सिंह पर अवमानना याचिका दायर की गयी. कैट ने इन तीनों को नोटिस जारी करते हुए 21/02/2011 तक कैट के आदेशों का पालन करने के आदेश दिए. कंटेम्प्ट से बचने और कैट के आदेश का पालन नहीं करने की मंशा से उत्तर प्रदेश शासन ने उच्च न्यायालय में यह रिट दायर किया था.

डॉ. नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

बृजलाल भी लल्लनजी की तर्ज़ पर चलना पसंद करते हैं!

डा. नूतन ठाकुर शरद जोशी के उपन्यासों पर आधारित लोकप्रिय धारावाहिक “लापतागंज” में एक बहुत ही मजेदार चरित्र हैं लल्लन जी. लल्लन जी पीडब्ल्यूडी में काम करते हैं और इस बात पर उन्हें काफी अभिमान भी है. उनका एक खास अंदाज़ है कि जब तक कोई उन्हें सीधे तौर पर कोई बात नहीं कहता है, वे उसे ना तो सुनते हैं और ना उससे अपना कोई मतलब मानते हैं. वे वहीं खड़े रहेंगे, सारी बात उनके सामने होती रहेगी पर उनका कहना होगा कि हमसे क्या मतलब, क्योंकि किसी ने मुझे सीधे तो कहा नहीं है.

लगता है उत्तर प्रदेश के सबसे ताकतवर पुलिस अधिकारी स्पेशल डीजी बृजलाल भी लल्लन जी की तर्ज़ पर चलना पसंद करते हैं. तभी तो जब तब ठीक उनके सामने खड़े हो कर, उनका नाम ले कर, उनको इंगित करके कोई बात नहीं कही जाए, वे यह मानते हैं कि “हमसे तो किसी ने कहा ही नहीं.”

उत्तर प्रदेश की कांग्रेस अध्यक्षा रीता बहुगुणा जोशी चारों ओर चीख-चीख कर यह कह रही थीं कि मेरे लखनऊ स्थित निवास को जीतेंद्र सिंह बबलू और इन्तेज़ार आब्दी ने और कई लोगों के

बिरजू
ब्रृजलाल
साथ मिलकर जलाने का काम किया. उन्होंने तो इस कार्य में प्रदेश की मुख्यमंत्री तक पर परोक्ष रूप से आरोप लगाए थे. साथ ही उन्होंने कई सारे पुलिस अफसरों को भी इसके लिए नामित किया था. रीता जोशी यह सब कहती रहीं और लिखती रहीं. उन्होंने प्रदेश पुलिस को ये सारी बातें लिख कर दीं, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को यह बात बताई, हाई कोर्ट तक ये बातें रिट याचिका के रूप में लिख कर दिया पर शायद बृजलाल जी को मिल कर, उनको इंगित करते हुए, उनका नाम ले कर यह सब नहीं कहा इसीलिए उन्होंने यही माना कि उन्हें इन बातों की कोई जानकारी ही नहीं है.

इसी चलते लगभग दो सालों तक जीतेन्द्र बबलू और आब्दी के बारे में कोई कार्रवाई नहीं हुई और अब जब दो दिनों पहले ये दोनों लोग अचानक से गिरफ्तार हो भी गए तब भी बृजलाल का अखबारों में यही बयान आया कि इस पूरे मामले में विलम्ब रीता बहुगुणा जोशी के कारण ही हुआ. चूँकि उन्होंने पुलिस को अपेक्षित सहयोग नहीं दिया और पुलिस वालों को कुछ भी नहीं बताया, इसीलिए मुज्लिमों की गिरफ्तारी होने में विलम्ब हुआ. यानी जबरा मारे, रोये ना दे. रीता जोशी का घर जला और दोष भी उन्हीं का. बड़ी अजीब विडंबना है और बहुत ही दुखदायी भी. झूठ का दायरा कितना बड़ा हो सकता है, आदमी कितनी निर्लज्जता से झूठी बातें इतने शान से कह सकता है, इसका इससे बढ़ कर उदाहरण क्या हो सकता है.

अब चूँकि बृजलाल प्रदेश के सबसे “बड़े” और “ताकतवर” पुलिस अधिकारी है, अतः उनकी कही गयी हर बात सही है. ऊपर से वे इस समय तो स्वयं को क़ानून ही समझते होंगे. यदि ऐसा नहीं होता तो मैं नहीं समझती कि वे इतना खुल कर रीता जोशी की अब तक की सारी बातों को एक सिरे से दरकिनार करते हुए कह देते- “हमसे तो किसी ने कहा ही नहीं.”

मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि रीता जोशी क्या करतीं जिससे यह माना जाता कि वे पुलिस का सहयोग कर रही थीं. क्या पुलिस को दिए गए कागज़, डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में दिए गए प्रार्थना पत्र,

आग
रीता बहुगुणा के घर लगाए गए आग की फाइल फोटो
हाई कोर्ट में प्रस्तुत रिट याचिका काफी नहीं थे? प्राप्त जानकारी के अनुसार रीता जोशी ने इस मामले में इन दोनों लोगों के अलावा कई पुलिसवालों को भी मुलजिम बनाया है. घटना के समय रीता जोशी घर पर नहीं थीं. उनकी भी जानकारी के वही सूत्र हैं जिन पर पुलिस या सीबी-सीआईडी की विवेचना आधारित होगी. उन्होंने भी वही टीवी क्लिपिंग और फुटेज देखे होंगे जो पुलिस ने देखे और जिनके आधार पर अब जाकर अचानक सीबी-सीआईडी को बातें एकदम दूध और पानी की तरह साफ़ दिखने लगा है.

बबलू और आब्दी की हैसियत कितनी अधिक है इसका अंदाजा तो इसी बात से हो जाता है कि जिन लोगों को उसी सरकार के अंग सीबी-सीआईडी ने गिरफ्तार किया, उन्हीं लोगों को देखने के लिए सरकार के सबसे ताकतवर मंत्रियों में शामिल नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा स्वयं जेल में मिलने गए. क्या यही वह बात है जो उत्तर प्रदेश पुलिस या सीबी-सीआईडी को कई सारी बातों को देखने से मना कर देती हैं और बृजलाल की तरह यह कहने को मजबूर कर देती हैं कि रीता जोशी ने तो सहयोग दिया ही नहीं.

मैं यह जानती हूँ कि सत्ता में बड़ी ताकत होती है. सत्ता के बाजीगर यह सब करें, यह तो समझ में आता है पर सत्ता के प्रकाश से इधर-उधर चमकने वाले लोग भी ऐसा करने लगते हैं तो बड़ी दिक्कत होती है. आज ही देश के चुनिन्दा अवकाश प्राप्त अधिकारियों ने ब्यूरोक्रेसी को राजनैतिक हस्तक्षेप से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की है. मैं ऐसे सभी प्रयासों को पूरी तरह बेमानी और बेकार मानती हूँ. कोई भी सत्ता अधिकारियों को पीछे-पीछे दुम हिलाने को नहीं कहती- कम से कम लिखित में तो आदेश नहीं ही करती है, पर यदि अधिकारी स्वयं ही अपनी आँखें मूँद लेने को उद्धत हो तो सुप्रीम कोर्ट क्या कर लेगा?

डॉ. नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

मुख्यमंत्री मायावती के झूठ को उनकी सीबीसीआईडी ने पकड़ा!

नूतन ठाकुर: बबलू और आब्दी की गिरफ्तारी के पीछे का सच : वैसे तो जिंदगी में कोई बात शायद बेमतलब नहीं होती पर उत्तर प्रदेश में तो निश्चित तौर पर हर बात के पीछे कोई ना कोई कारण जरूर होता है. और अक्सर जो दिखता है, सच वैसा नहीं होता. अब जीतेन्द्र सिंह बबलू और इन्तेज़ार आब्दी की गिरफ्तारी का मामला ही ले लीजिए.

बबलू बीकापुर से माननीय विधायक हैं, बहुजन समाज पार्टी से. इन्तेज़ार आब्दी गन्ना संस्थान के अध्यक्ष हैं, राज्य मंत्री का दर्ज़ा हासिल किये हुए. कल ये दोनों माननीय अचानक अरेस्ट हो गए. और इन्हें अरेस्ट किया उत्तर प्रदेश की सीबी-सीआईडी विभाग ने. अब मजेदार बात यह है कि इन्हें जिस आरोप या अपराध में पकड़ा गया है वह घटना घटी थी आज से करीब दो साल पहले. उस समय उत्तर प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ने कथित तौर पर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के लिए कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग कर दिया था जो आम तौर पर अच्छे नहीं कहे जायेंगे. शायद बबलू साहब और आब्दी साहब को ये शब्द इतने नागवार गुज़रे कि संभवतः इन्होंने इसके बदले रीता बहुगुणा जोशी को सबक सिखाने की ठान ली.

इसके कुछ ही दिनों के अंदर रीता जोशी का लखनऊ स्थित मकान अचानक रात में अग्नि के हवाले हो गया. इस तरह माल एवेन्यू जैसे महत्वपूर्ण स्थान पर, प्रदेश की मुख्यमंत्री के आवास से मात्र चंद कदमों पर स्थित एक भारी-भरकम और सुरक्षित से मकान में कुछ गुंडों और आपराधिक तत्वों ने जबरिया घुस कर आग लगा दी. मकान ऐसी जगह पर था कि हर आदमी यह कह सकता था कि यह काम बिना प्रशासन की मिली-भगत से नहीं हो सकता.

चंद कदमों पर मुख्यमंत्री का भारी सुरक्षा घेरे वाला आवास, चारों ओर वीआईपी किस्म के लोग, शहर में बीचों-बीच वह आवास, और फिर भी कुछ गुंडों ने उसमे घुस कर मकान को जला दिया! बहुत शोर मचा, बहुत हंगामा हुआ. उस पर भी तुर्रा यह कि जिस समय यह कुकर्म हो रहा था लगभग उसी समय कुछ इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लोग भी पहुँच गए और आग लगाने वाले कुछ महानुभावों की तस्वीर भी उतार ली. उनमे से एक तो जीतेन्द्र सिंह बबलू से मिलती-जुलती तस्वीर थी और दूसरे एक स्थानीय बसपा नेता इन्तेज़ार आब्दी की थी. इसके साथ कुछ पुलिसवालों की भी तस्वीरें आई थीं, जिनमे एक इन्स्पेक्टर हजरतगंज, एक सीओ, एक एसपी सिटी और एक आईजी स्तर के अधिकारी की भी तस्वीरें आने की चर्चा हुई. इन खुलासों के बाद बहुत शोर-गुल हुआ, बहुत छीछालेदर हुई, बहुत भर्त्सना हुई.

पर माननीय मुख्यमंत्री जी को इस सारे प्रकरण से जैसे कोई खास वास्ता ही नहीं हो. उन्होंने घटना घटने के लगभग तुरंत बाद ही यह कह दिया कि इस मामले से बसपा के किसी भी नेता का कोई लेना-देना नहीं है. अब जब मुख्यमंत्री ने स्वयं ही यह कह दिया तो फिर किसी के कुछ और कहने का मतलब भी नहीं रह गया और ना ही किसी की कोई हिम्मत हुई होगी. उस पर तुर्रा यह कि इस मामले में पुलिस ने ताबड़तोड़ कुछ लोगों को मुलजिम के रूप में पहचान भी लिया, उनकी गिरफ्तारी भी हो गयी और इस तरह मामले का पटाक्षेप ही माना जाने लगा. पर कुछ तो इलेक्ट्रोनिक मीडिया के दिखाए गए फोटो के आधार पर, कुछ स्थानीय लोगों के भारी विरोध पर और कुछ राजनैतिक सरगर्मियों के कारण, ये बेचारे निरीह लोग इस मामले में कोर्ट के स्तर पर बख्श दिए गए. जान बची लाखों पाए, और ये गरीब लोग ऐसे गायब हुए कि गधे के सिर से सींघ.

पर चूँकि घर रीता बहुगुणा का जला था इसीलिए वे ही इससे असल रूप में आहत हुई थीं. उन्होंने इस मामले को छोड़ा नहीं और इसमें पुलिस, प्रशासन से ले कर कोर्ट-कचहरी तक का दरवाज़ा लगातार खटखटाती रहीं. मुश्किल तो बहुत आई पर धीरे-धीरे उनके रास्ते खुलते गए. पहले मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के स्तर पर इस मामले में जीतेन्द्र सिंघ बबलू और इन्तेज़ार आब्दी के खिलाफ नामजद मुक़दमा दर्ज करने के आदेश हुए. फिर इसकी विवेचना सीबी-सीआईडी को गयी. सीआईडी मामले को लिए काफी लंबे समय तक सोयी रही पर इसी बीच रीता जोशी ने हाई कोर्ट में भी रिट याचिका दायर कर दी थी जिसमे इस मामले की विवेचना सीबीआई से कराने की मांग की थी.

अब इस मामले में हाई कोर्ट की सुनवाई अपने अंतिम स्टेज में आ गयी दिखती है और अभी तक जो भी बात सामने आई है, उससे यही दिखता है कि उत्तर प्रदेश सरकार को यह महसूस हुआ हो कि संभव है मामला हाई कोर्ट के आदेश पर सीबीआई के सुपुर्द ना कर दिया जाए. चूँकि रीता बहुगुणा जोशी इस मामले में प्रदेश के चोटी के कई लोगों को शुरू से ही आरोपित करती रही हैं, इसीलिए एक बहुत बड़ा तबका यही मान रहा है कि यह बबलू और आब्दी के खिलाफ जो भी कार्यवाही हुई है, वह मूल रूप से इस पूरे मामले में हाई कोर्ट में सरकार की नाक बचाने और मामले को सीबीआई को भेजे जाने से बचाने के लिये की गयी है.

यदि ऐसा नहीं होता तो फिर यह कैसे संभव था कि जिस मामले में घटना के दो दिन के अंदर ही प्रदेश की मुख्यमंत्री स्वयं किसी बसपा नेता की सहभागिता को अस्वीकृत कर दें, कोई और निरपराध लोग पकड़ लिए जाएँ, ये दोनों आरोपित सरेआम घूम रहे हों और आब्दी को इस घटना के बाद राज्य मंत्री का दर्ज़ा दे दिया जाए (जिसे रीता जोशी और तमाम नेता इस घटना के इनाम के रूप में बताएं), उसी मामले में ये दोनों लोग उसी सीआईडी को अचानक हाई कोर्ट में सुनवाई होने के कुछ दिनों पहले ही अचानक मिल जाएँ और सारी कार्यवाहियां आनन-फानन में हो जाए.

सत्ता की ताकत का खेल खेलना सबों को अच्छा लगता है पर हममे से हर आदमी को यह याद भी रखना चाहिए कि यह सत्ता नाम की चीज़ बहुत फरेबी किस्म की है और यदि आज उसका बेजा  इस्तेमाल क़ानून को धता बताते हुए एक पक्ष करेगा तो कल यही काम दूसरा भी करता नज़र आएगा. इन हालातों से बचने का एक ही उपाय है कि आज जब मेरी सत्ता हो तो मैं यह समझूं और याद करूँ कि यह सत्ता मुझे नेक काम करने और क़ानून का पालन कराने के लिए दी गयी है, खुलेआम क़ानून का गला घोंट कर स्वयं की ताकत पर इतराने के लिए नहीं.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

पब्लिक को नौकर मानने का पुलिसिया माइंडसेट : डॉ. मंजूर अहमद

: इंटरव्यू : डॉ मंज़ूर अहमद (पुलिस अधिकारी, शिक्षाविद और राजनेता) : वर्ष 73 में जो पुलिस रिवोल्ट हुआ उसमे गलतियां अफसरों की थी : जब मांग नहीं सुनी जाती है तो पुलिस एसोशिएशन के लिए आवाज़ उठती है, जो जायज है : हमारे एक डीजी थे, बहुत ईमानदार, वो रिटायर होने के बाद वो थाने जाने से बहुत डरते थे :

डा. मंजूर अहमद एक नायब किस्म के आईपीएस अधिकारी रहे हैं. मूलतः बिहार के रहने वाले डॉ अहमद लेक्चरर के पेशे से पुलिस में आये. भारत सरकार के कई सारे दायित्वों को निभाते हुए आगरा यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर बन गए. रिटायरमेंट के बाद वे विधान सभा और लखनऊ के मेयर का चुनाव भी लड़ चुके हैं. इन चुनावों में वे बहुत कम वोटों से हारे थे. इस तरह डॉ अहमद शिक्षाविद, पुलिस अफसर और राजनेता, सभी एक साथ हैं.  इन सभी रूपों में वे समाज को अपना सक्रिय योगदान देते रहे हैं और देते रहते हैं. प्रस्तुत है पीपल’स फोरम, लखनऊ की संपादक डॉ नूतन ठाकुर की डॉ अहमद से हुई बातचीत के महत्वपूर्ण अंश-

प्र- कुछ अपने फॅमिली बैकग्राउंड के बारे में बताएं?
उ- मैं एक बहुत ही गरीब खानदान से आया हूँ. इतने गरीब परिवार से हूँ कि कोई सोच नहीं सकता है. हम अपने स्कूल के लिए सात किलोमीटर पैदल जाया करते थे, आना-जाना चौदह किलोमीटर हो गया. हमारे फादर प्राइमरी स्कूल में टीचर थे. परिवार काफी बड़ा था. हमने गाँव के ही स्कूल से हाईस्कूल की परीक्षा पास की. उसके बाद इंटरमिडीएट किया, बीए ओनर्स किया. बीए ऑनर्स में डिस्टिंक्शन के साथ पास किया. इसके बाद पटना चला गया और पटना यूनिवर्सिटी से एमए किया पोलिटिकल साइंस में. फिर मैं लेक्चरर रहा दो साल- छपरा में और मगध यूनिवर्सिटी में. चूँकि एक तो मैं खुद टीचर का बेटा था, ऊपर से पढाने का शौक था, सो लेक्चरर का जॉब मुझे अच्छा लगता था. यह शौक मेरा आइपीएस में आने के बाद भी बना रहा. अक्सर जिलों में क्लासेज लिए. जैसे मुज़फ्फरनगर में पीजी क्लासेज लिए, आजमगढ़ में लिए, जहां भी मौका मिला पढ़ाया.

इसी बीच भारत सरकार ने योजना निकली कि जामिया मिलिया को एक्सटेंटेड यूनिवर्सिटी बनाया जाए. इसके लिए उन्हें एक आदमी चाहिए था जो को-ओर्डिनेट करे, प्रोपर प्लानिंग करे. उन्होंने मुझे चुना और मैं जामिया मिलिया गया. वहाँ मैं ओएसडी रहा साढ़े तीन साल. वहाँ साइंस के तमाम पीजी क्लासेज हमने शुरू कराये. उसके बाद मैं मिनिस्ट्री ऑफ वेलफेयर में रहा, भारत सरकार में. फिर मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स में रहा और वहाँ मैं डाइरेक्टर था एसपीसी में. इस दौरान मुझे कई बार विदेश भी जाना पड़ता था. इस प्रकार मैंने भारत सरकार में भी काम किया और शिक्षा प्रसार के लिए भी काम किया. इसके अलावा चेयरमैन पुलिस हाऊसिंग कार्पोरेशन था और एडिशनल डीजी ला एंड ऑर्डर आदि कई पदों पर उत्तर प्रदेश में भी रहा. इसके बाद मुझे एक चांस मिला आगरा यूनिवर्सिटी में और मैंने अपनी आईपीएस की नौकरी छोड़ दी तथा वाईस चांसलर पद पर चला गया.

प्र- आपका तो कई विभागों का अनुभव रहा, तो उनसे पुलिस में क्या अलग लगा?
उ- बेसिकली तो मैं पुलिस अफसर था, ट्रेनिंग पुलिस की थी. दो बातें लगीं, एक तो यह कि जब तक ये पुलिस अवाम से करीब नहीं आएगी और जब तक पुलिस की छवि में तबदीली नहीं होगी, तब तक इसका भला नहीं होगा. ये जो पब्लिक को-ऑपरेशन है, हमारी सफलता का नाप यही है. हमारी गुडविल ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी है. मैं हमेशा अपने इन्स्पेक्टर, सब इन्स्पेक्टर को कहा करता था कि यदि कोई महिला थाने पर आ रही है तो समझिए आपकी बहन है, आपकी माँ है. इसी तरह आपके घर वालों की तरह दूसरों को भी समझें. मैंने दो नारे दिए थे, एक था- गेट टू द पीपुल, बजाय क़ानून झाड़ने के हम अवाम के पास जाएँ. दूसरा था- बच्चों को साथ लो. जिससे पुलिस की खराब छवि खत्म हो.

प्र- आपको क्या लगता है कि आपके समय में और अब के समय में पुलिस में अच्छे के लिए कुछ बदलाव आया है या परेशानियां बढ़ी हैं?
उ- परेशानियां बढ़ी हैं. पुलिस के लोग अपनी असली ड्यूटी भूल गए हैं. पुलिस ज्यादा ओवरबीयरिंग हो गयी है. बेलगाम सी हो गयी है और तफ्तीश वगैरह तो छोड़ दीजिए, टेक्नीकल बातें है पर आम जनता से जो बर्ताव है और आम आदमी का जो ख़याल है पुलिस के बारे में वह पहले से काफी खराब हुआ है. कोई भी आदमी थाने जाने से घबराता है, यहाँ तक रिटायर्ड पुलिस अफसर भी थाने जाने से घबराता है. हमारे एक डीजी थे बहुत ईमानदार और मशहूर थे, जेएन चतुर्वेदी वो आज रहते है देहरादून में, वे कहते थे कि रिटायर होने के बाद वो थाने जाने से बहुत डरते थे.

प्र- क्या कुछ ऐसी पोलिसी या क़ानून में बदलाव की जरूरत है जिससे पुलिस की छवि में सुधार हो?
उ- कानून लाख बना दीजिए, कोई अंतर नहीं आएगा. अलेग्जेंडर पोप एक मशहूर अंगरेज़ कवि हुआ है, उसने कहा था- “फॉर फोरम्स ऑफ गवर्नमेंट, लेट फूल्स कांटेस्ट, व्हाट एवर इज बेस्ट एडमिनिस्टरड इज द बेस्ट” मतलब कि चाहे कोई भी व्यवस्था और क़ानून ले आया जाये, जब तक उसका सही पालन नहीं हो पायेगा, वह बेकार है. असल तो प्रशासन की बात है. आज मुख्यमंत्री और मंत्री कह दें पुलिसवालों से कि यह बात बर्दाश्त नहीं होगी तो पुलिसवाले ठीक हो जायेंगे, पर कहने का ढंग सही हो. पर राजनितिक लोग यह सोचते हैं कि यदि पुलिस ठीक हो गयी तो हमारा क्या होगा. आज कल पोलिटिक्स तो चोरों की चल रही है. अब उन्हें सोचना है कि जालिम के तौर पर याद किये जायेंगे या अवाम के दोस्त के तौर पर.

प्र- आज कल पुलिस एसोशिएशन की जो मांग हो रही है, उस पर आपकी क्या राय है?
उ- बिलकुल होना चाहिए, क्यों नहीं होना चाहिए. सवाल यह है कि जब मांग सुनी नहीं जाती तो ही इस प्रकार की आवाज़ उठती है. जब हम शुरू में नौकरी में आये थे तो मंगल और शुक्र के दिन ऑर्डरली रूम हुआ करते थे. तो मैंने कहा कि जिसको जो परेशानी हो वह अपनी बात कह सकता है. मुझे याद है कि हम लोग अपने सब काम छोड़ कर छुट्टी तक से लौट आते थे कि आज आर्डरली रूम है. आज पूछिए कितने अफसर आर्डरली रूम जाते हैं. अरे एक सिस्टम था जिसमे शिकायतों का निस्तारण होता था. अब वह सब खतम हो गया. बिलकुल उनकी यूनियन होनी चाहिए, उनकी तकलीफों का निस्तारण कैसे हो.

प्र- जैसे यूपी में एक सोच बनी हुई है कि एक बार पहले पीएसी के दंगे हो चुके हैं तो दुबारा ऐसा हो सकता है. इस पर आपका क्या सोचना है?
उ- ऐसा है कि पुलिस अफसर को सोचना चाहिए कि कॉन्स्टेबल, हेड कॉन्स्टेबल, इन्स्पेक्टर, सब इन्स्पेक्टर हमारे हाथ में रहें, हमारे साथ रहें. उन्हें सजा भी दीजिए, पर उनसे मोहब्बत भी करेंगे. अब फ़ोर्स में अफसर को भी यह सोचना होगा कि ये लोग क्लर्क नहीं हैं फ़ोर्स के लोग हैं. इनकी समस्या को रीड करना होगा. और सच्चाई यही है कि जो सन तिहत्तर में पुलिस रिवोल्ट हुआ था उसमे गलतियां हम लोगों की थीं, अफसरों की थी. शुरू में चीजों को हलके से लिया और जब बात बढ़ गयी, तक चौकन्ने हुए

प्र- इसका मतलब इन लोगों को वाजिब छूट दी जाये?
उ- उसमे सवाल ये है कि जो यूनियन बने तो सारे लोग उसके मेंबर हों. यदि आईपीएस अफसरों का यूनियन है जहां वे अपने मामले उठाते हैं तो इन लोगों का यूनियन क्यों नहीं बन सकता है. यदि वे फील करते हैं कि उनकी समस्यायों का निराकरण सही ढंग से नहीं हो रहा है तो उन्हें हक है अपना यूनियन बनाने का.

प्र- आप तो पुलिस और पोलिटिक्स दोनों में रहे हैं. इस तरह आपको दोनों जगहों में कैसा लगता है और क्या अंतर महसूस होता है?
उ- असल बुनियादी खराबी यहीं पर है. पुलिस का माइंडसेट इस तरह का है कि पब्लिक उसकी नौकर है. पुलिस भी ऐसा करते हैं और पोलिटिशियन भी ऐसा ही चाहते हैं ताकि उनका बाजार बना रहे. एक जिले में तैनात हुआ तो ऊपर मेरी यही शिकायत हुई कि जब ये सब लोगों की बात सीधे सुन लेते हैं तो हम लोग किस मर्ज़ की दवा हैं. पोलिटिशियन ये चाहते हैं कि हम जाएं, हम ही पूरी बात कहें, और इसके बदले पैसे भी जनता से लें.

प्र- अभी आपका आगे क्या सोचना हैं? चुनाव लड़ना है?
उ- मेरा इलेक्शन लड़ना एक बड़े मकसद के तहत है. मैं लोगों को सेंसिटाईज करना चाहता हूँ कि उन्हें अपने अंदर एक आत्मविश्वास पैदा हो, मेरे लिए जीतना-हारना महत्वपूर्ण नहीं है. मेरी स्पीचेज में भी मैं यही कहता हूँ.

प्र- चुनावों में क्या सुधार होने चाहिए?
उ- हम लोगों ने इलेक्शन प्रोसेस को करप्ट कर दिया है. इतना पैसा खर्च हो रहा है इलेक्शन में, इलेक्शन कमीशन लाख कोशिश करता है, कुछ रोक नहीं पाता है. और पोलिटिशियन भी यही चाहते हैं कि ये गलत तरीके बने रहें ताकि उनके लोग आ जाएँ. इसके लिए अवाम को ही जागना होगा और सोचना होगा. उनमे यह भावना पैदा हो कि जो भी पैसा खर्ज करते हैं उन्हें रिजेक्ट कर दें. अभी जो लोक सभा में लोगों के काफी पैसा खर्च कर दिया और वही लोग जीते, जो अच्छी बात नहीं है. इसे बदलना होगा.

डॉ. नूतन ठाकुर प्रतिष्ठित अमेरिकी प्रोग्राम के लिए चयनित

नूतन ठाकुर: अनुभा रस्‍तोगी और प्रदीप भी आतंत्रित : पत्रकार तथा सामजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर, कन्वेनर नेशनल आरटीआई फोरम, लखनऊ को अमेरकी सरकार के प्रतिष्ठित इंटरनेशनल विजिटर लीडरशिप प्रोग्राम के लिए चयनित किया गया है. यह अमेरिकी सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट का एक प्रमुख कार्यक्रम है, जिसमे लोक प्रशासन, एनजीओ प्रशासक, अकादमिक क्षेत्र तथा मीडिया कर्मियों को अमेरिका में अमेरिकी शासकीय व्यवस्था की पारदर्शिता से रू-ब-रू करने के लिए आमंत्रित किया जाता है.

इसमें डॉ. नूतन के अतिरिक्त भारत से दो अन्य लोगों, मानवाधिकार सम्बंधित अधिवक्ता अनुभा रस्तोगी और सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप आमंत्रित किये गए हैं. इन चयनित लोगों को यह बताया जाता है कि किस प्रकार शासन में पारदर्शिता लायी जाती है, कैसे इंटेग्रिटी और समरूपता स्थापित की जाती है और कैसे मीडिया और सिविल सोसायटी पारदर्शिता को प्रभावित करते हैं. इस वर्ष यह आइवीएलपी प्रोग्राम 02 अप्रैल से 23 अप्रैल 2011 के बीच प्रस्तावित है. इस दौरान ये लोग वाशिंगटन, न्यू योर्क, बोस्टन, मैनचेस्टर, डल्लास तथा मिआमी जायेंगे जहां वे अन्य लोगों के अलावा सीनेटरों, वरिष्ठ अधिकारियों, पत्रकारों आदि से मिलेंगे और अमेरिका की विभिन्न विषयों पर कार्यपद्धति के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे.

हिंदी संस्‍थान में अध्‍यक्ष एवं निदेशक की नियुक्ति करे राज्‍य सरकार

: डॉ. नूतन ठाकुर एवं अन्‍य की याचिका पर हाईकोर्ट ने दिया आदेश : डॉ. नूतन ठाकुर के साथ निर्मला राय, डॉ. प्रणव कुमार मिश्रा, राजेंद्र प्रताप सिंह तथा अन्य लोगों द्वारा उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की बदहाल व्यवस्था और पुरस्कारों के प्रति लापरवाहीपूर्ण नज़रिए के दृष्टिगत एक रिट याचिका उच्च न्यायालय, इलाहाबाद के लखनऊ खंडपीठ में दायर की गयी थी. इसमें प्रतिवादी प्रमुख सचिव भाषा, उत्तर प्रदेश, अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान तथा निदेशक, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान बनाए गए. याचिकर्ता के वकील अशोक पाण्डेय हैं.

डॉ. ठाकुर ने बताया कि इस रिट की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय में दो-सदस्यीय पीठ ने राज्य सरकार को यह निर्देशित किया कि वह एक महीने के अन्दर हिंदी संस्थान में पूर्णकालीन कार्यकारी अध्यक्ष एवं निदेशक की नियुक्ति करे. साथ ही शीघ्रातिशीघ्र साधारण सभा तथा कार्यकारिणी समिति गठित करने के निर्देश भी राज्य सरकार को दिए गए हैं. उच्च न्यायालय के सरकारी वकील से यह भी पूछा है कि एक लम्बे समय से पुरस्कार क्यों नहीं दिए जा रहे हैं. मामले में सुनवाई एक महीने बाद होगी, जब उत्तर प्रदेश सरकार को कृत कार्यवाही से अवगत कराने की अपेक्षा की गयी है.

ज्ञातव्य हो कि रिट में डॉ. ठाकुर तथा अन्य द्वारा कहा गया कि यह संस्थान हिंदी भाषा और साहित्य के उन्नयन और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और प्रौद्योगिकी में राष्ट्रभाषा की वर्तमान भूमिका के दृष्टिगत स्थापना हुई. यह संस्थान 1998 में संशोधित नियमावली से संचालित है, जिसके अनुसार इस संस्थान के पदेन अध्यक्ष उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. इस नियमावली के नियम 10 के अनुसार साधारण सभा और नियम 12 और 13 कार्यकारिणी समिति के बारे में है.

साथ ही वरिष्ठ साहित्यकारों को सम्मानित करने हेतु प्रतिवर्ष उत्कृष्ट साहित्य सृजन और दीर्घकालीन हिंदी सेवा के लिए भारत-भारती सम्मान, लोहिया साहित्य सम्मान आदि से ले कर प्रवासी भारतीय हिंदी भूषण सम्मान तथा हिंदी विदेश प्रसार सम्मान तक दिए जाने की व्यवस्था है. इस हेतु उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान पुरस्कार नियमावली 1997 बना है, जिसके नियम 4 के अनुसार प्रतिवर्ष ये पुरस्कार दिए जायेंगे.

रिट में कहा गया कि इन नियमों के विपरीत उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में एक लंबे समय से साधारण सभा और कार्यकारिणी समिति भंग है. इसके साथ ही डॉ. शम्भू नाथ के बाद दिनांक 30/06/2009 से कार्यकारी पूर्णकालीन अध्यक्ष और डॉ. सुधाकर अदीब के बाद 26/04/2010 से निदेशक का पद खाली हैं. इन कारणों से संस्थान के कार्यों पर व्यापक दुष्प्रभाव पड़ रहा है. इसके अलावा हिंदी संस्थान द्वारा नियमानुसार प्रति वर्ष प्रदान किये जाने वाले कई सारे पुरस्कार भी एक लंबे से नहीं दिए गए हैं. साथ ही इस संस्थान को दिए जाने वाले वित्तीय संसाधनों में भी निरंतर कटौती की जाती रही है. 2007-08 तथा 2008-09 के लिए जो प्लान बजट 16 लाख रुपये था, वह 2009-10 में घटा कर दस लाख कर दिया गया था.

इनके आधार पर रिट में डॉ. ठाकुर तथा अन्य ने निवेदन किया कि उत्तर प्रदेश शासन एक निश्चित समय सीमा के अंदर साधारण सभा और कार्यकारिणी समिति का गठन कराये और पूर्णकालीन कार्यकारी अध्यक्ष एवं निदेशक की नियुक्ति करे. यह भी प्रार्थना की गयी कि उत्तर प्रदेश शासन 2008, 2009 तथा 2010 के सभी पुरस्कार उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान पुरस्कार नियमावली के अनुरूप यथाशीघ्र प्रदान करे.

अमरनाथ पाण्‍डेय पर हमला करने वालों पर रासुका लगे

धरना: कई संगठनों ने लखनऊ में किया प्रदर्शन : गणतंत्र दिवस के दिन बुधवार को सोनभद्र जिले में आरटीआई कार्यकर्ता अमरनाथ पाण्डेय पर जानलेवा हमला हुआ. नेशनल आरटीआई फोरम के साथ अग्रणी फाउन्डेशन, सीसीआरएस, यूथ इनिशिएटिव तथा अन्य तमाम सामाजिक संगठन एवं अधिवक्ता समुदाय ने इस घटना के विरोध में एक मीटिंग और प्रदर्शन शहीद स्मारक, गाँधी पार्क, लखनऊ में किया.

नेशनल आरटीआई फोरम की कन्वेनर डॉ. नूतन ठाकुर ने आरटीआई कार्यकर्ता अमरनाथ पाण्डेय पर हुए जानलेवा हमले की तीव्र निंदा की और कहा कि डॉ. पाण्डेय पर हुए हमले और उन पर इससे पूर्व हुए हमले के मामलों में तत्काल गिरफ्तारी करते हुए उन लोगों पर कठोरतम वैधानिक प्रावधानों जैसे रासुका, गैंगस्टर एक्ट, गुंडा एक्ट आदि में कार्रवाई की जाए. साथ ही उन्होंने आरटीआई कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के मुद्दे को भी सामने रखा. मानावाधिकार कार्यकर्ता आशीष अवस्थी ने कहा कि इस प्रकार की घटनाएं सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं के मन में भय उत्पन्न करती हैं और क़ानून-व्यवस्था का मजाक हैं.

अग्रणी फाउन्डेशन के अनुपम पाण्डेय ने कहा कि डॉ. पाण्डेय ने मनरेगा में हुए भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में अपने इलाके में कई बार आवाज उठायी थी और इस हेतु सूचना का अधिकार अधिनियम का समुचित इस्तेमाल किया था. अतः यह हमला लोकतंत्र पर हमला है. अधिवक्ता अभय कुमार सिंह ने कहा कि अपने ब्लॉक के जिस बीडीओ और अन्य स्थानीय अधिकारियों और ताकतवर लोगों के खिलाफ डॉ. पाण्डेय ने आवाज उठायी थी, उन्हें किसी प्रकार से बख्शा नहीं जाना चाहिए.

अधिवक्ता विनय शाही का मानना था कि इन सभी मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट के माध्यम से मुकदमे की तुरंत सुनवाई होनी चाहिए जिससे तुरंत न्याय हो सके. वाराणसी के सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण राय ने बताया कि वे उसी इलाके के हैं और अमरनाथ पाण्डेय के कार्यों से भली-भाँती परिचित हैं. उन पर हुआ हमला नितांत निंदनीय है. आल इंडिया बैंक एसोसिएशन के आरके अग्रवाल ने इसे देश में व्याप्त भ्रष्टाचार का एक ज्वलंत उदाहरण माना और इसे महाराष्ट्र में घटित यशवंत सोनावाने को ज़िंदा जलाने की घटना से जोड़ कर देखा.

इसके साथ ही आरटीआई कार्यकर्ता अखिलेश सक्सेना तथा देवदत्त शर्मा, अधिवाक्तागण सौरभ मिश्रा, राज कुमार शर्मा, सीमा त्रिपाठी, अश्विनी राय, निलय शंकर आदि ने भी इसमें सहभागिता की. इन लोगों ने राज्यपाल के नाम से एक ज्ञापन दिया जिसमें नेशनल आरटीआई फोरम की ओर से इस प्रकरण में और पूर्व प्रकरण में दोषी व्यक्तियों पर कठोरतम वैधानिक कार्यवाही जैसे रासुका, गैंगस्टर एक्ट, गुंडा एक्ट आदि में कार्यवाही करने, मामले में शामिल सभी शासकीय अधिकारियों के खिलाफ जांच उनके गलत प्रशासनिक और आपराधिक कृत्यों के लिए दण्डित करने, पुलिस अधिकारियों के स्तर पर जानबूझ कर सुरक्षा अथवा न्यायोचित कार्यवाही करने में लापरवाही के लिए उनके विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्यवाही करने तथा भविष्य में आरटीआई कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के सम्बन्ध में गंभीरता से देखने और तत्काल कार्यवाही करने विषयक शासनादेश सभी आयुक्तों, पुलिस रेंज अधिकारियों, जिला मजिस्ट्रेटों, पुलिस अधीक्षकों के लिए जारी करने की मांग रखी.

करमवीर सिंह और बृजलाल के खिलाफ याचिका

: दिव्‍या एवं शीलू प्रकरण में आईआरडीएस ने हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में दायर की :  आज 17/01/2011 को स्वयंसेवी संगठन इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एंड डाक्यूमेंटेशन इन सोशल साइंसेज (आईआरडीएस) ने शीलू और दिव्या प्रकरणों में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में एक रिट याचिका दायर किया है. भारत सरकार, द्वारा गृह सचिव, उत्तर प्रदेश सरकार, द्वारा प्रमुख सचिव गृह और प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री, सीबीआई, सीबी-सीआईडी, करमवीर सिंह, डीजी, उत्तर प्रदेश तथा बृज लाल, एडीजी (ला-ऑर्डर तथा अपराध) इसमें प्रतिवादीगण बनाए गए हैं. वादी की ओर से अधिवक्ता अशोक पाण्डेय हैं.

आईआरडीएस का स्पष्ट मत है कि इस मामले में वास्तविक न्याय नहीं हुआ है. अब इन दोनों मामलों में यह साबित हो चुका है कि डीजी, उत्तर प्रदेश तथा बृजलाल ने अन्य पुलिस अधिकारियों के साथ मिल कर असल अपराधियों की पूरी तरह मदद की. इन दोनों अधिकारियों ने जान-बूझ कर कर्तव्यहीनता की और संभवतः अधीनस्थों को गलत निर्देश भी दिए और बाद में दोनों मामलों में अधीनस्थ अधिकारियों को दण्डित कर अपनी जान बचाने का प्रयास कर रहे हैं.

आईआरडीएस ने याचिका में कहा है कि करमवीर सिंह और बृज लाल ने अपनी सोची-समझी सक्रियता और निष्क्रियता के जरिये गलत साक्ष्य बनाने, एफआईआर दर्ज नहीं होने देने और असल अपराधियों को बचाने का कार्य किया. याचिका में इनकी पुष्टि के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 36, जो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की शक्ति और कर्तव्य के विषय में है और पुलिस एक्ट की धारा 4 तथा धारा 23, जो डीजीपी को प्रदेश पुलिस के सक्षम नियंत्रण और प्रशासन के लिए उत्तरदायी बनाते हैं, के उल्लेख किये गए हैं. साथ ही अपने कर्तव्यों में लोप सम्बन्धी पुलिस एक्ट की धारा 29 तथा अपने कर्तव्य में अवहेलना एवं जान-बूझ कर विधि के निर्देशों का पालन नहीं करके किसी व्यक्ति तो क्षति पहुचाने सम्बंधित आईपीसी की धारा 166 का भी उल्लेख किया गया है. साथ ही आईपीसी की धारा 32, जो अवैध लोप से सम्बंधित है, को भी सामने लाया गया है.

इन कानूनी तथ्यों के आधार पर आईआरडीएस की डॉ नूतन ठाकुर ने याचिका में कहा है कि यह करमवीर सिंह और बृज लाल की सीधी जिम्मेदारी थी कि वे विधि के अनुरूप अपना कर्तव्य करते और न्यायोचित कदम उठाते. उनका मानना है कि आज जब इन अधिकारियों को जिले के अधिकारियों से प्रात-कालीन ब्रीफिंग, इंटेलिजेंस विभाग की रिपोर्टें, एक अंत्यंत सक्रिय मीडिया, 24×7 न्यूज़ चैनल तथा स्वयं डीजीपी कार्यालय में एक जन सूचना अधिकारी (पीआरओ) उपलब्ध हैं, तो यह मानना असंभव है कि इन दोनों अधिकारियों को इन दोनों घटनाओं के बारे में सही सूचनाएं नहीं मिल सकी होंगी. ऐसे में यह उनकी न्यूनतम जिम्मेदारी थी कि वे इन मामलों में सही मार्गदर्शन करते और दिव्या प्रकरण में कानपुर पुलिस पर इतनी सारी उँगलियों के उठने के कारण इसे तत्काल सीबी-सीआईडी के सुपुर्द करते. इसी प्रकार शीलू प्रकरण में कम से कम एफआईआर दर्ज कराना उनका विधिक कर्तव्य था.

अतः आईआरडीएस का मानना है कि उत्तर प्रदेश पुलिस के इन दोनों मुखिया करमवीर सिंह और बृजलाल पर कर्तव्य की लापरवाही तथा जानबूझ कर लिए गए अवैध कृत्य और विधिक कृत्यों के विलोप के सम्बन्ध में गहराई से जांच कराई जाए. याचिका में यह अनुरोध किया गया है कि सीबीसीआईडी इस सम्बन्ध में अपने ही वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध जांच करने में सक्षम नहीं हो सकेगी. अतः याचिका में यह मांग की गयी है कि इन दोनों प्रकरणों एवं इनसे सम्बंधित पुलिस वालों के खिलाफ दर्ज कराये गए या आगे दर्ज होने वाले सभी प्रकरणों की विवेचना सीबीआई के सुपुर्द की जाए. ऐसा न हो पाने की दशा में इस हेतु कम से कम एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) बनायी जाए, जो प्रदेश पुलिस से अवकाशप्राप्त कोई सक्षम और समर्थ आईपीएस अधिकारी के नेतृत्व में हो. आईआरडीएस द्वारा इस हेतु प्रकाश सिंह, ईश्वर चंद्र द्विवेदी, श्रीराम अरुण तथा एसवीएम त्रिपाठी के नाम सुझाए गए हैं. इसके साथ ही याचिका में इन दोनों प्रकरणों के सम्बन्ध में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक अवकाशप्राप्त न्यायाधीश के नेतृत्व में एक न्यायिक जांच समिति बनाने का निवेदन भी किया गया है, जो डीजीपी और एडीजी (अपराध) सहित पुलिस के वरिष्ठ अफसरों की भूमिका की जांच के साथ-साथ सभी पीड़ितों को दिए जाने वाले क्षतिपूर्ति और किस-किस व्यक्ति से ये क्षतिपूर्ति की भरपाई हो के बारे में अपनी रिपोर्ट प्रेषित करे.

PIL filed against Karamveer Singh and Brijlal

A Public Interest Litigation has been filed today (17/01/2011) in Allahabad High Court, Lucknow bench by Institute for Research and Documentation and Social Sciences (IRDS), a non-government organization in the Divya and Sheelu cases. Union of India, through the Secretary, Ministry of Home Affairs, CBI, State of Uttar Pradesh through the Principal Secretary, Chief Minister Office and Principal Secretary (Home), DGP, UP, CB-CID, UP, Karamvir Singh, DGP and Brij Lal, ADG (Law & Order and Crime) have been made the respondents in this case. Asok Pandey is the advocate counsel for the petitioner.

IRDS is of the strong view that the real justice in both cases is still far away and that the real accused are not the lower police officials but Karamvir Singh, DGP, UP and Brij Lal, the ADG (Law/Order and Crime). It feels that the DGP and ADG (Law/order, crime) deliberately and intentionally overlooked their assigned responsibility and played active parts in shielding the real accused and when the matter blew out of proportion, they are trying to save their skin by taking action against subordinate police officers.

Dr Nutan Thakur, Secretary, IRDS says in the PIL that in both cases these two officers just kept waiting and watching the crimes of wrongful framing of evidence, non-registration of FIR and non-action against the real accused being committed. She has quoted section 36 of CrPC about powers and responsibilities of superior police officers and section 4 and section 23 of the Police Act 1861 which fixes the duties, responsibilities and administration of the State police to the DGP. Dr Thakur has also quoted section 29 of the Police Act and section 166 of IPC about penalties for neglect of duty and for knowingly disobeying any direction of the law to cause injury to any person. She has also referred to section 32 of IPC related with illegal omissions.

Based on these facts, Dr Thakur says in the petition that it was the direct responsibility of Karamvir Singh and Brij Lal to perform their duty as per law and to take appropriate actions.  The petition says that today there are so mechanisms like morning briefing of senior officers by the district officers, reports by the Intelligence Department, an active media, 24×7 news channels and a Public Relations Officer (PRO) in the DGP office. Hence it is very easy to understand that the true information about both these cases must have reached the DGP and the ADG (Law/order and crime) immediately.  Thus it was the basic duty of these two senior officers to provide proper supervision and to transfer the Divya case to CB-CID immediately, when so many allegations were being made against the Kanpur police and to get at least the FIR registered in the Sheelu case as soon as the matter came to their knowledge.

Hence, the PIL demands enquiry into the roles of Karamvir Singh and Brij Lal, as heads of UP Police regarding both their dereliction of duty and their criminal omissions and commissions. It feels that CB-CID will not be able to properly probe and investigate the roles of their senior Police officers and hence has prayed to transfer both these cases along with all the related cases against police officers registered presently or subsequently to CBI for investigation or at least to some Special Investigation Team (SIT), supervised by a capable and efficient retired UP cadre IPS officer. IRDS has suggested the names of Prakash Singh, Ishwar Chandra Dwivedi, Sri Ram Arun or SVM Tripathi as a few possible alternatives. It has prayed to form a Judicial enquiry committee under a retired High Court Judge to enquire into these two cases in great details, including the role of the senior police officers including the DGP and ADG (law/order and crime), the amount of compensation to be given to the victims in the two cases and the persons from whom to charge these compensation amounts.

करमवीर और बृजलाल के खिलाफ कार्रवाई हो

डा. नूतन : दिव्‍या एवं शीलू मामले में आईआरडीएस ने की मांग : कानपुर में 27 सितम्बर 2010 को दिव्या के साथ हुए दुराचार और उसकी हत्‍या तथा 12 दिसंबर 2010 को बांदा में शीलू के साथ हुए संभावित गैंग-रेप के मामले में स्वयंसेवी संगठन इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एंड डोक्युमेंटेशन इन सोशल साइंसेज (आईआरडीएस) का मत है कि इस मामले में वास्तविक न्याय नहीं हुआ है. अब इन दोनों मामलों में यह साबित हो चुका है कि स्थानीय पुलिस ने निर्लज्ज तरीके से असल अपराधियों की पूरी तरह मदद की.

हमारा मानना है कि इस मामले में दोषी पुलिस कर्मियों के विरुद्ध अब तक न्यायोचित कार्रवाई नहीं हुई है और हम इन सभी दोषी कर्मियों के विरुद्ध कठोरतम कार्यवाही की मांग करते हैं. उससे बढ़ कर हमारा यह मानना है कि इन दोनों मामलों में असल आपराधिक भूमिका उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक करमवीर सिंह और अपर पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था तथा अपराध) बृज लाल की है. ये प्रदेश के सर्वोच्च पुलिस अधिकारी हैं और इनका सीधा दायित्व था कि ये इन मामलों में न्यायोचित कार्यवाही करते.

लेकिन इन दोनों मामलों में मामले की तुरंत जानकारी हो जाने के बावजूद इन लोगों ने कोई कार्यवाही नहीं की बल्कि स्थानीय पुलिस को विधि-विरुद्ध कार्य करने का पूरा अवसर दिया और संभवतः इस हेतु निर्देश भी दिए. इस प्रकार ये दोनों अधिकारी अपने शासकीय कर्तव्य से जान-बूझ के विलग होने, अवैध कार्य को संरक्षण देने और विधि की रक्षा नियमानुसार नहीं करने के सीधे-सीधे दोषी हैं. इन दोनों मामलों में कार्यवाही अंत में राज्य सरकार के स्तर से करनी पड़ी और करमवीर सिंह और बृज लाल ने अपनी सोची-समझी सक्रियता और निष्क्रियता के जरिये गलत साक्ष्य बनाने, एफआईआर दर्ज नहीं होने और असल अपराधियों को बचाने का कार्य किया.

आईआरडीएस “शीलू और दिव्या के लिए न्याय” नाम से एक अभियान शुरू किया है जो इन दोनों मामलों में अंतिम न्याय के मिलने तक जारी रहेगा. साथ ही डीजीपी और एडीजी (ला ऑर्डर तथा अपराध) के रूप में अपने कर्तव्यों के प्रति जान-बूझ कर लापरवाही करने के लिए हम इन दोनों अधिकारियों के खिलाफ तत्काल कार्यवाही की मांग करते हैं. इस हेतु हमने गृह मंत्री, भारत सरकार और मुख्य मंत्री, उत्तर प्रदेश को पत्र लिख कर उनसे इन दोनों अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही करने का निवेदन किया है. साथ ही इस प्रकरण को सीबीआई को दिए जाने हेतु भी पत्राचार किया है.

हम इस मामले में न्याय पाने में मदद हासिल करने के लिए उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका भी दायर करेंगे जिसमें इन दोनों अधिकारियों के विरुद्ध उनके जान-बूझ कर कर्तव्यहीनता करने और संभवतः अधीनस्थों को गलत निर्देश देने से सम्बन्ध में उचित धाराओं में अभियोग पंजीकृत कर उसकी नियमानुसार विवेचना करने का निवेदन करेंगे. साथ ही प्रदेश के सर्वोच्च पुलिस अधिकारियों की संलिप्तता होने के नाते हम इन सभी मुकदमों की विवेचना सीबीआई से कराने की मांग भी करेंगे.

Action to be taken against Karmveer and Brijlal

In the cases related with rape and subsequent death of Divya from Kanpur city on 27th September, 2010 and possible gang-rape of Sheelu on 12th December, 2010 Institute for Research and Documentation and Social Sciences (IRDS), a non-government organization is of the strong view that the real justice is still far away. In both cases, it has now been proved that the local police was completely hands in gloves with the accused and has aided and assisted these accused in the most shameless manner. IRDS states that no suitable action has so far been taken against the accused Police officers and demands suitable action to be taken immediately.

IRDS also feels that in these cases, the real accused are Karamvir Singh, the Director General of Police and Brij Lal, the Additional DG (Law/Order and Crime). They are the top ranking officers of the State, responsible for proper functioning of the State Police. But in both these cases, they have not only failed in performing their duty, but possibly have also actively aided and assisted in the crime committed by the local Police, where it shielded the real culprits and acted against innocent people. In both the cases, these two officers got to know of the incidence and its details almost immediately. They not only kept quite (omission of their duty) but quite probably also actively acted by instructing the local officers to perform illegal acts.

In both cases, action was initiated finally at the level of the State government while these two officers just kept waiting and watching the crimes of wrongful framing of evidence, non-registration of FIR and non-action against the real accused being committed.

IRDS has initiated a campaign called “Justice for Sheelu and Divya” which shall remain there till the time final justice is delivered in both these cases. Since justice was delayed and denied in these cases because of the intentional omission of their described duty by the DGP and ADG(Law/order and crime), we demand immediate action against Karamvir Singh and Bril Lal for dereliction of their duty. We are presenting our complaint to the Home Minister, Government of India and the Chief Minister, Uttar Pradesh to take suitable action against these delinquent officers. We are also corresponding with the concerned authorities to get these cases transferred to CBI.

At the same time, we shall be filing a PIL for getting suitable criminal cases registered against these two officers for possibly directing the subordinate police officers for the criminal conduct they got engaged in or at least being passive observer of the crime being committed when it was their duty to intervene and act. We shall also be requesting the High Court to get these cases transferred to CBI, because of the involvement of the top Police officers of the State.

डा. नूतन ठाकुर

सचिव, आईआरडीएस

लखनऊ

कैट ने यूपी के कई अफसरों को नोटिस जारी किया

केन्द्रीय प्रशासनिक अभिकरण (कैट) के लखनऊ बेंच ने आज (13/01/2010)  को केन्द्रीय गृह सचिव गोपाल कृष्ण गोखले,  प्रमुख सचिव गृह उत्तर प्रदेश कुंवर फ़तेह बहादुर तथा करमवीर सिंह, पुलिस महानिदेशक, यू पी के विरुद्ध अवमानना की नोटिस जारी की है. ये नोटिस कैट द्वारा 1992 बैच के आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर, जो वर्तमान में आईआईएम लखनऊ में फेलो प्रोग्राम इन मैनेजमेंट कोर्स में असाधारण अवकाश पर हैं, के अध्ययन अवकाश से सम्बंधित एक प्रकरण में जारी किये गए हैं.

अमिताभ ठाकुर ने 30/04/2008 को उत्तर प्रदेश सरकार को दो सालों के अध्ययन अवकाश हेतु अखिल भारतीय सेवा (अध्ययन अवकाश) नियमावली 1960 के तहत आवेदन पत्र दिया था. यद्यपि ठाकुर इस नियमावली के अंतर्गत अर्हताओं को पूरा करते थे पर उन्हें अवकाश नहीं दिया गया. आगे चल के कैट के आदेश पर उन्हें 08/06/2009 को राज्य सरकार द्वारा असाधारण अवकाश दिया गया और उन्होंने आईआईएम लखनऊ में दाखिला ले लिया.

अंत में 07/07/2010 को कैट ने आदेशित किया कि प्रतिवादी आवेदक के अध्ययन अवकाश सम्बंधित पर आवेदन पर पूर्व में लगाए गए आपत्तियों को दरकिनार करते हुए नियमों के अनुरूप चार सप्ताह में युक्तियुक्त निर्णय ले. ठाकुर ने उक्त निर्णय उत्तर प्रदेश सरकार को 08/07/2010 को प्रेषित कर दिया किन्तु उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया. अब कैट द्वारा अवमानना याचिका संख्या 49/ 2010 में इन तीनों अधिकारियों के विरुद्ध अवमानना नोटिस जारी किया गया है. याचिका में अग्रिम तिथि 21/02/2011 को लगी है.

CAT Lucknow issues Contempt notice against Union Home Secretary, others

Central Administrative Tribunal (CAT),  Lucknow Bench today (13/01/2010) issued Contempt notice against Gopal Krishna Pillai, Union Home Secretary, Kunwar Fateh Bahadur, Principal Secretary (Home), Uttar Pradesh and Karamvir Singh, Director General of Police, UP. These contempt notices have been issued by CAT in a case related with study leave matter of Amitabh Thakur, a 1992 batch IPS officer presently on extra-ordinary leave at IIM Lucknow for a Fellow Program in Management course.

Amitabh Thakur was not granted study leave as per the provisions of the All India Services (Study Leave) Regulations 1960 when he had applied to the State government on 30/04/2008 for 2 years study leave though he fulfilled the requirements mentioned in the Regulations.  After the intervention by CAT, he was given extra-ordinary leave by the State government on 08/06/2009 and he joined IIM Lucknow.

Finally on 07/07/2010, CAT ordered the respondents to reconsider the claim of the applicant for grant of study leave as per rules, overlooking earlier objections and pass a reasoned order as per rules within four weeks from the date of receipt of copy of the order. While Thakur presented this order on 08/07/2010, no order has been passed so far. Thus in the Contempt Petition No 49 of 2010, CAT has today issued contempt notice against these three officers. The next date has been fixed as 21/02/2011.

शीला की जवानी और मुन्‍नी की बदनामी से उथल-पुथल

: डा. नूतन ठाकुर ने प्रस्‍तुत किया एफिडेविट : लखनऊ की सामजिक कार्यकत्री डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा मुन्नी बदनाम और शीला की जवानी गानों को प्रतिबंधित करने हेतु इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच में जो रिट याचिका संख्या 12856/2010 दायर किया गया है उसमें एक पूरक एफिडेविट भी प्रस्तुत किया है. इस पूरक एफिडेविट में यह कहा गया है कि रिट याचिका दायर करने के बाद से डॉ. ठाकुर के संज्ञान में कम से कम आधा दर्ज़न ऐसे मामले आये हैं जिनमें इन गानों के प्रसारण के बाद से मारपीट, हत्या, छेडखानी, मानसिक कष्ट जैसे गंभीर दृष्टांत हुए हैं.

इनमें से पहले प्रकरण में ठाणे की दो बहनों, नौपदा निवासी शीला गिरि और कोपरी निवासी मुन्नी गिरि को इन गानों ने अपना नाम बदलने के लिए मजबूर कर दिया है, क्योंकि वे पड़ोसियों और लोगों के भद्दे कमेंट से परेशान हैं. डॉ. ठाकुर द्वारा मुन्नी गिरी के पति निर्मल गिरी से बात करने पर उन्होंने इन गानों से बेहद परेशान होने की बात बतायी. दूसरे मामले में लखनऊ के एक विद्यालय की शीला नाम की लड़की को इसी गाने के नाम पर इतना परेशान किया गया कि वह आत्महत्या तक का प्रयास कर बैठी. उस लड़की के पिता ने डॉ. ठाकुर को ई-मेल भेज कर जानकारी दी और गाना बनाने वाले लोगों पर कार्यवाही करने की मांग की.

तीसरे मामले में ग्राम मछली, मनकापुर, गोंडा (उत्तर प्रदेश) में 27/11/2010 की सुबह जब नरेश सोनी उर्फ बच्चू ‘मुन्नी बदनाम हुई’ गाना राजेश कुमार गुप्ता, जिनकी माँ को मुन्नी कह कर बुलाते हैं, की दूकान के पास गा रहा था, तो इसी गाने पर दोनों लोगों में झगड़ा शुरू हुआ जो इतना बढ़ गया कि फायरिंग तक की नौबत आ गयी, जिसमें एक वृद्ध महिला की मौके पर ही मृत्यु हो गयी. इस सम्बन्ध में थाना मनकापुर में अपराध संख्या 383/10 धारा 304 आईपीसी पंजीकृत है. चौथी घटना बलिया के बांसडीह रोड थाना क्षेत्र के शंकरपुर गांव की 13/14 दिसंबर 2010 की रात की है, जहां कामेश्वर तिवारी के घर बारात आई थी और ‘मुन्नी बदनाम’ गाना बज रहा था. पड़ोस में इस नाम की लड़की के होने के कारण ऐतराज हुआ, पहले विवाद और फिर फायरिंग हुई और करीब दर्जनों राउंड फायरिंग में गोली लगने से दस लोग घायल हो गए. इस बारे में बांसडीह रोड थाने पर मुक़दमा संख्या 259/10 धारा 279, 324 आईपीसी पंजीकृत हुआ है.

पांचवीं घटना नोएडा के राजपुरकलां गांव से है जहां नामकरण संस्कार के दौरान ‘शीला की जवानी’ गाने पर डांस करते समय पड़ोस में शीला नाम की एक महिला के परिवार वालों द्वारा मना किया गया और फिर युवकों और उनके पड़ोसियों में गंभीर मारपीट हुई. इसमें आधा दर्ज़न लोग घायल हो गए और राजपुर कलां में मुक़दमा दर्ज है. छठी घटना भी नोएडा से है जहां सेक्टर 127 में 26/12/2010 को ‘शीला की जवानी’ बजने पर शीला नामक महिला के परिवार वालों ने ऐतराज़ किया और फिर वहीं मारपीट शुरू हो गयी. इसमें कुछ बीपीओ कर्मचारी को मिला कर कुल 25 लोग बुरी तरह घायल हुए और एक दर्ज़न से अधिक गाडियां क्षतिग्रस्त हुयीं. इस विषय में केस नंबर 805/2010 तथा 805ए/2010 धारा 147, 323, 427 आईपीसी थाना सेक्टर 39, गौतम बुद्ध नगर में दर्ज किया गया है.

इन सारे प्रकरणों को उदाहरणों के रूप में प्रस्तुत करते हुए याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय से निवेदन किया है कि इन प्रकरण में सभी प्रतिवादियों को इस समस्त गंभीर तथा कष्टप्रद घटनाओं के लिए व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार माना जाये, क्योंकि ये सारी घटनाएं इन लोगों के गैर-जिम्मेदाराना कृत्य के फलस्वरूप हुए हैं. ये साफ़ तौर सिनेमेटोग्राफी एक्ट 1952 की धारा 5(बी)(1) के खिलाफ हैं, जिसमे दिया गया है कि किसी फिल्म या उसके उस अंश को सेंसर बोर्ड द्वारा सर्टिफिकेट नहीं दिया जाएगा जो पब्लिक आर्डर, डीसेंसी, मोरालिटी के विरुद्ध हो, किसी की अवमानना करता हो अथवा जिससे किसी अपराध के कारित होने की संभावना हो.

इनके आधार पर डॉ नूतन ठाकुर ने उच्च न्यायालय से इन गानों पर रोक लगाने की मांग के साथ-साथ प्रतिवादिगण पर आपराधिक तथा सिविल जिम्मेदारी भी नियत करने का आग्रह किया है.

बिजेंद्र यादव को शहीद नहीं कर पाओगे!

नूतन तो क्या सिपाही बिजेंद्र यादव शहीद हो गए हैं? जैसी कि मुझे पहले से भी उम्मीद थी, उत्तर प्रदेश के इस वीर और साहसी सिपाही को बहादुरी और जज्बे के साथ अपनी बात कहने की सजा झेलनी पड़ी है. अभी कुछ दिनों पहले ही हम लोगों ने बिजेंद्र यादव के बारे में यह जाना था कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के अधीनस्थ पुलिस वालों के हितों के रक्षार्थ एक एसोशिएशन बनाया है, जिसकी जरूरत हम सभी लोग खुद ही एक लंबे समय से महसूस कर रहे हैं.

खुद एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की पत्नी हूँ, पर ह्रदय से यह मानती हूँ कि उत्तर प्रदेश (और शायद देश भर) में पुलिस के नीचे तबके के कर्मचारियों के साथ आज भी वैसा ही व्यवहार होता है जैसा शायद अंग्रेजों के समय भी नहीं होता हो. आज तो उनकी दशा उस समय से भी बदतर है. उस समय तो कम से कम जनता में उनकी धमक थी. आज एक तरफ नेताजी लोग उनको सड़कों पर सरेआम उनकी औकात दिखा रहे हैं और दूसरी तरफ खुद उन्हीं के विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, जो नेताओं और अपने विभाग के ऊपर के हाकिमों की जी हुजूरी और गुलामी करते नहीं थकते, इन नीचे के अधिकारियों के साथ ऐसा व्यवहार करते रहें कि देख के शर्म सी आ जाती है कि ये लोग पढ़े-लिखे लोग हैं या अनपढ़-जाहिल. उससे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि खुद अफसर तो अफसर, उनकी बीवी-बच्चे भी इसी प्रकार का आचरण करते हैं मानो ये लोग सरकार के नहीं, उनके घर के नौकर हों.

मैं कई जगहों पर पुलिस अधीक्षक बंगलों में रही. शुरू में देखती थी कि जो भी सिपाही या फालोवर घर में रहते, वे इस तरह से डरे-सहमे से दिखते मानो उन लोगों ने भूत देख रखा हो. एकदम

बृजेंद्र सिंह यादव
ब्रिजेंद्र सिंह यादव
सिहरे हुए से बात करते, काफी घबराये से रहते. मुझे ये सब बड़ा अटपटा सा लगता. और मेरे पति तो इस मामले में और भी फक्कड़ और अलमस्त मिजाज रहे हैं. उन्होंने जीवन में और जो भी सही या गलत किया हो, पर एक चीज़ तो मैं दावे से कह सकती हूँ कि उन्होंने किसी सिपाही, दारोगा या इन्स्पेक्टर को नीचा दिखाने, उन्हें भला-बुरा कहने या उनके साथ अमानवीय एवं निंदनीय आचरण करने का काम कभी नहीं किया है.

इसके विपरीत मैं ऐसी कई कहानियाँ अधिकारी और उनकी पत्नी के नाम सहित जानती हूँ जिसमें उन लोगों ने सिपाही, दरोगा या फालोवर को गाली-गलौज करने, दुर्व्यवहार करने, प्रताडि़त करने, घंटों धूप में खड़ा कर देने जैसे कार्य कई-कई बार किये हैं. इन लोगों की छुट्टियों की समस्या पुलिस विभाग में भयानक रूप से है, जहां कई बार तो अपने बहुत ही निकट सगे-सम्बन्धी की मौत और दुर्घटना तक में छुट्टी नहीं मिल पाती. सरकारी काम-काज की परेशानी, आवास की असुविधा जैसी न जाने कितनी ही समस्याएं हैं जिनसे ये अधीनस्थ पुलिस वाले रोज-रोज रूबरू हो रहे हैं, पर इनके ऊपर के अधिकारी जानबूझ कर अनजान बने हुए हैं.

ऐसे में यदि कोई बिजेंद्र यादव सामने आ कर पुलिस वालों की इन समस्याओं को कम करने की कोशिश करता है तो मेरी निगाह में तो वह बहुत ही पुनीत और आवश्यक कार्य कर रहा है. साथ ही यदि वह पुलिस में आईपीएस अफसरों द्वारा एक लंबे समय से किये जा रहे एक कथित भ्रष्टाचार को सामने लाता है, तो हम सबों को उनकी तारीफ़ करनी चाहिए थी, शाबाशी देनी चाहिए थी. पर हुआ तो बिलकुल उल्टा ही. पुलिस अधीक्षक गाजीपुर के आदेश से बिजेंद्र यादव निलंबित कर दिए गए हैं. आईये सबसे पहले हम ये देखें कि उन्हें किस नियम के तहत और क्या कहते हुए निलंबित किया गया है.

बिजेंद्र यादव का निलंबन आदेश कहता है- “आरक्षी को दिनांक 06/09/2010 को पुलिस लाइन से थाना जमनिया स्थानांतरित किया गया तो थाने पर आने के उपरांत कार्य सरकार में रूचि ना लेकर राजकीय हित से अलग अनावश्यक कार्यों में लिप्त रह कर एवं मीडिया में बिना अनुमति बयान प्रकाशित करने के फलस्वरूप, इसके इस कृत्य से पुलिस विभाग में अनुशासनहीनता एवं पुलिस बल की छवि जनता में धूमिल होने के कारण.”

वैसे उत्तर प्रदेश में सिपाही से इन्स्पेक्टर तक का निलंबन उत्तर प्रदेश अधिनस्थ श्रेणी के पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों की आचरण एवं अपील नियमावली 1991 के नियम 17(1) (क) के अंतर्गत होता है. लेकिन बिजेंद्र यादव के आदेश में इस नियम या किसी भी नियम का उल्लेख किये बिना ही उन्हें निलंबित कर दिया गया है. साथ ही यह बात ही महत्वपूर्ण है कि जो उनके राजकीय हित से अलग अनावश्यक कार्यों में लिप्त रहने की बात कही गयी है, वह भी बिना किसी प्रमाण के मनगढंत तथ्यों पर ही आधारित दिखती हैं. या हो सकता है कि बिजेंद्र यादव द्वारा अधीनस्थ कर्मचारियों के कल्याण की बात सोचने को अनावश्यक कार्य मान लिया गया हो.

हम लोगों के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि उनपर जो एक आरोप लगा है वह हम मीडिया वालों से बातचीत करने और हमारे सामने बयानबाजी करने का भी है. यानी कि उन्होंने जो सच्चाई सामने लाने की कोशिश की है, वह अधिकारियों की निगाहों में अनावश्यक बयानबाजी है और जो अब तक संभवतः गड़बडि़यां हो रही थीं, जिन्हें बिजेंद्र यादव ने उजागर करने की कोशिश की है, वह ऐसे आवश्यक कार्य थे जिनसे पुलिस बल की छवि चमक रही थी. बिजेंद्र यादव से साक्षात्कार लेने वालों में एक मैं भी थी और मुझे इस बात का गर्व है. हाँ, एक बार मन में कसक जरूर होता है कि शायद उनका तात्कालिक नुकसान कराने में मेरी भी कुछ भूमिका हो. लेकिन मैं जानती हूँ कि सच की लड़ाई में ये कठिनाईयां आती ही हैं. मुझे प्राप्त जानकारी के अनुसार उनका मामला इलाहाबाद के एक सक्षम और समर्पित अधिवक्ता अपने हाथ में ले चुके हैं और शीघ्र ही वे इलाहाबाद हाई कोर्ट में इस सम्बन्ध में निशुल्क रिट दायर करने वाले हैं. मैं ऐसे अधिवक्ता को भी सलाम करती हूँ. मुझे विश्वास है इस लड़ाई में बिजेंद्र यादव की ही फतह होगी.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

द फ्रेश ब्रू : कहानी अपने चुने रास्‍तों की

फ्रेशआईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर तथा आईआईएम लखनऊ के द्वितीय वर्ष के छात्र अमित हरलालका द्वारा “द फ्रेश ब्रू – क्रोनिकल ऑफ बिजनेस एंड फ्रीडम” नामक पुस्तक लिखी गयी है. एलकेमी पब्लिशर, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित होने वाली इस पुस्तक में आईआईएम लखनऊ के पच्चीस ऐसे विद्यार्थियों की जीवन गाथा है, जिन्होंने सामान्य जीवन पथ छोड़ कर अपनी मर्जी का कैरियर चुना.

ये वो लोग थे जिनके पास अपना एक अच्छा-ख़ासा कैरियर और सुरक्षित भविष्य था, जिसमे ये लोग चोटी के बैंकों, कंसल्टिंग फर्मों, मार्केटिंग तथा तकनीकी फर्मों में अच्छी सैलेरी पर कार्यरत थे, पर इनके अंदर स्वतंत्र ढंग से अपनी मर्जी के अनुसार कुछ अलग करने की कुलबुलाहट थी, जिसके कारण इन लोगों ने उन रास्तों को ठुकरा कर अपने लिए नए और चुनौतीपूर्ण रास्ते अपना लिए. जाहिर है इन लोगों को इस प्रक्रिया में काफी दिक्कतें भी आयीं और कई स्तरों पर विरोध भी झेलना पड़ा पर इन धुन के पक्के लोगों ने अपने इरादे को हमेशा मजबूत रखा और इस पथ पर चलते हुए सफलताएं पायीं.

इस पुस्तक में इन सभी लोगों के व्यक्तिगत तथा प्रोफेशनल जीवन में हुए अनुभवों को सामने लाया गया है. इन पच्चीस लोगों में विशेष रूप से उल्लेखनीय व्यक्ति हैं आईआईएम लखनऊ के गोल्ड मेडलिस्ट बिमल पटवारी, जिन्होंने श्रेष्ठतम कंसल्टिंग फर्म एएफ फर्गुसन छोड़ कर कैड डिजाइन का काम शुरू किया. सत्यजीत सदानंदन, जो अब फीफा तथा दूसरे विश्व-स्तरीय फुटबाल क्लबों के लिए काम करते हैं. तरुण त्रिपाठी, जिन्होंने यशराज फिल्म्स में काम किया, हम तुम के निर्माण के सक्रिय भूमिका निभाई और अब एक टीवी सीरियल लिख रहे हैं. गायत्री अय्यर, जो अंतर्राष्ट्रीय थियेटर में काम करती हैं और ब्लैक, सलाम नमस्ते समेत बीस फिल्मों में गा चुकी हैं. मैककिन्सकी के पूर्व कंसल्टेंट मयंक शिवम, जो अब ग्रामीण रेडियो तथा कम्युनिटी रेडियो का काम कर रहे हैं. सामजिक सरोकारों वाली फिल्मों के निर्माता नितिन दास, जिन्होंने न्यूयार्क फिल्म एकेडेमी से अध्ययन किया. वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर के लिए जेनेवा में काम कर रहे सुधांशु सिरोनवाला. बच्चों के लिए स्कूल चलाने वाले रत्नेश माथुर. छोटे शहरों के लिए मल्टीप्लेक्स के चेन शुरू करने वाले सुमंत भार्गव. मंजुनाथ शंमुगम ट्रस्ट के माध्यम से भ्रष्टाचार से लड़ने वाली अंजलि मुलाटी. कई सारे रेस्तरां शुरू करने वाले गौरव आहूजा. स्पोर्ट्स मिडिया और स्पोर्ट्स मनोरंजन के क्षेत्र में काम कर रहे आशीष काले तथा दो दशकों से ग्रीटिंग कार्ड के बिजिनेस में काम कर रहे किरीट मोदी शामिल हैं.

ये सारे वे लोग हैं जो सामान्य किस्म के थे पर जिन्होंने अपनी आँखों और दिलो-दिमाग को खुला रख के अपनी इच्छा के अनुरूप काम किये और सफलता अर्जित की. इस पुस्तक का प्राक्कथन पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलम द्वारा लिखा गया है. पुस्तक 31 जनवरी 2011 को बुक स्टोरों पर आएगी.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

अश्लील गानों पर रोक की मांग क्यों?

नूतनजीमैंने दो-तीन दिन पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की है, जिसमे दो फिल्मों- तीस मार खान और दबंग के निर्माता-निर्देशक, सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सेंसर बोर्ड) तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को प्रतिवादी बनाया है. इस याचिका में मैंने दो गानों दबंग का गाना ‘मुन्नी बदनाम हुई’ और तीस मार खान का गाना ‘शीला की जवानी’ को पब्लिक डीसेंसी, मोरालिटी, पब्लिक आर्डर के खिलाफ मानते हुए उन्हें सिनेमेटोग्राफी एक्ट के धारा 5(बी)(1) का उल्लंघन होने के आधार पर इन गानों पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है.

साथ ही यह भी कहा कि इन दोनों गानों के परिणामस्वरूप अपराध के कारित होने की भी संभावना रहती है. मैंने यह तथ्य उठाया है कि खास कर के नाम शीला, मुन्नी, मुनिया या ऐसे ही मिलते-जुलते नाम वाली स्कूलों तथा कॉलेजों में जाने वाली लडकियां, दफ्तरों के जाने वाली कामकाजी महिलाएं और यहाँ तक कि घरेलू महिलायें भी इस गाने के कारण गलत रूप से प्रभावित हो रही हैं.

मेरे इस कार्य पर मुझे बहुत सारी टिप्पणियां और प्रतिक्रियाएं मिली हैं जो कई तरह की हैं. कई लोगों ने खुल कर मेरी बात का समर्थन किया और इस कार्य को आगे बढ़ाते हुए लक्ष्य तक ले जाने की हौसला-आफजाई की. लोगों ने कोटिशः धन्यवाद और आभार प्रकट किये. लोगों के दूर-दूर से फोन आये. उदाहरण के लिए मुंबई से एक सज्जन का फोन आया जिन्होंने मेरे इस कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की और इसमें हर तरह से योगदान देने का आश्वासन दिया. इसी तरह से पटना से एक फोन आया जिसमे मुझे शुक्रिया अदा किया गया था. एक महिला ने साफ़ शब्दों में बताया कि जब मैं पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफर करती हूँ तो कई लोग जान-बूझ कर यह गाना बजाते हैं और इसका उपयोग कर के लड़कियों के प्रति अश्लील आचरण करते हैं और उन्हें शर्मिंदगी की स्थिति में ला देते हैं. दूसरे व्यक्ति का कहना था कि हमारा समाज ऐसा हो गया है, जिसमे जो चाहे जैसा करे और हम लोग इतने शिथिल प्राणी हो चुके हैं कि हम इनमें किसी भी बात का प्रतिरोध नहीं करते.

इसके उलट मुझे कई ऐसी टिप्पणियां भी मिलीं, जिनमे मुझे बुरा-भला कहने और आलोचना करने से लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देते हुए इन गानों के प्रति उदार नजरिया अख्तियार करने जैसी बात कही गयी है. एक अच्छे मित्र ने कहा-“इस तरह की बातों में अदालतों का समय जाया करने से कोई लाभ नहीं है. ये गाने इसीलिए हैं क्योंकि इनकी जन-स्वीकार्यता है. एक दूसरे सज्जन हैं जो इससे पहले मेरे जस्टिस काटजू की इलाहाबाद हाई कोर्ट से सम्बंधित टिप्पणी के बारे में इलाहाबाद हाई कोर्ट में किये गए रिट के खारिज होने पर पहले ही कह चुके थे कि आपको जुर्माना नहीं हुआ इसकी खैर मनाएं. अबकी मेरे इस कदम के बारे में जानते ही कहा- “इस बार तो आप पर जुर्माना हो कर ही रहेगा, सभ्यता के ठेकेदार. आपको सिर्फ पब्लिसिटी चाहिए, और कुछ नहीं.”

मैं इस प्रकार के व्यक्तिगत आरोपों के बारे में कुछ अधिक नहीं कह सकती, इसके बात के अलावा कि अपनी पब्लिसिटी हर आदमी चाहता है, यह नैसर्गिक मानवीय स्वभाव है- चाहे आप हों या मैं. फिर यदि मैं इस भावना से प्रभावित हो कर ही सही, यदि कुछ अच्छा काम कर रही हूँ तो मेरी पब्लिसिटी पाने की दुर्भावना और कमजोरी माफ की जानी चाहिए.

रहा मुख्य मुद्दा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कितनी हो और इस सम्बन्ध में क़ानून की बंदिश कितनी हो, तो इस प्रश्न को समझने के लिए हमें किसी भी समाज को उसकी सम्पूर्णता में जानना-समझना होगा. जो मेरी खुद की स्थिति है या जो कई सारे पढ़े-लिखे उच्च-स्तरीय महिलाओं की स्थिति है वह अलग होती है. ये लोग समझदार लोग हैं, रसूखदार भी हैं. इनके सामने शायद कोई इस तरह के गाने बजा कर इनका अपमान नहीं करे, इन पर फब्तियां नहीं कसे, इन्हें नहीं छेड़े. पर उन तमाम गाँव, कस्बों, गली-मोहल्लों में रहने वाली मुन्नी और शीला के बारे में सोचिये जो उतनी पढ़ी-लिखी नहीं हैं, जो उतनी आज़ाद ख़याल नहीं हैं, जो साधारण सोच वाली हैं, जिनके समाज में अभी भी पुरातनपंथ हावी है. वहाँ की वे असहाय महिलायें, बच्चियां, लडकियां वास्तव में इस प्रकार के फूहड़ गानों से प्रभावित भी हो रही हैं और अन्याय का शिकार भी. इस रिट में तो मैंने पाकिस्तान के लाहौर की दो बच्चों की माँ के बारे में लिखा है, जिसे अपनी दुकानदारी का काम मात्र इसीलिए छोड़ देना पड़ा क्योंकि उसका नाम मुन्नी था और उसे पूरे मोहल्ले का हर शरीफ-बदमाश आदमी इसी गाने के बोल गा कर परेशान करता था.

रिट करने के बाद मुझे कई ऐसे दृष्टांत ज्ञात हुए हैं जिनमें इस गाने को ले कर हत्या, बलवा, छेड़खानी आदि तक हो चुके हैं. नोयडा के राजपुरकलां गांव में जमकर बवाल मचा. नामकरण संस्कार के दौरान शीला की जवानी गाने पर डांस कर रहे युवकों और उनके पड़ोसियों में भारी मारपीट हुई. बताया गया है कि पड़ोस में शीला नाम की एक महिला रहती है जिसके परिवार वालों को यह बुरा लग रहा था. कई बार मना किया पर नहीं माने और फिर झगड़ा शुरू हो गया, जिसमे आधा दर्ज़न लोग घायल हो गए. इसी तरह बलिया के बांसडीह रोड थाना क्षेत्र के शंकरपुर गांव में एक बारात में इस गीत पर नशे में धुत पार्टी का दूसरे पक्ष से विवाद हुआ, फायरिंग हुई और करीब दर्जनों राउंड फायरिंग में गोली लगने से दस लोग घायल हो गए. मुंबई के ठाणे की दो बहनों शीला गिरि और मुन्नी गिरि को इन गानों ने अपना नाम बदलने के लिए मजबूर कर दिया है, क्योंकि वे पड़ोसियों और लोगों के भद्दे कमेंट से परेशान हैं. दो बच्चों की मां मुन्नी ने बताया कि जैसे ही वह घर से बाहर निकलती हैं, उन पर इस गाने की आड़ में भद्दे कमेंट किए जाते हैं. अब शीला अपने बेटे को स्कूल छोड़ने तक नहीं जाती हैं. वह कहती हैं कि जब भी मैं स्कूल जाती हूं तो बच्चे ‘शीला की जवानी’ गाने लगते हैं जिससे वे और उनका बेटा शर्मसार होकर रह जाते हैं. उन्होंने गवर्नमेंट गैजेट ऑफिस में अपना नाम बदलने के लिए अप्लाई किया. ये तो मात्र वे मामले हैं जिनमे बातें छन के ऊपर आई हैं. अंदरखाने हर गली-कूचे में ना जाने ऐसी कितनी घटनाएं हो रही होंगी, कितनी बेचारी शीला और मुन्नी इसका मूक शिकार हो रही होंगी, इसके कारण परेशान होंगी, सताई जा रही होंगी.

यह किस सभ्यता का तकाजा है कि अपनी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के नाम पर आदमी इस हद तक अंधा हो जाए कि उसे दूसरे का कोई भी हित-अहित करने में तनिक भी शर्म नहीं आये. यह अभिव्यक्ति की स्वत्रंता है या व्यापक स्वार्थ-लिप्सा. यह सही है कि मलाइका अरोरा और कटरीना कैफ जैसी सशक्त महिलाओं को कोई कुछ नहीं कहेगा, चाहे वे अर्ध-नग्न घूमें या कुछ भी करें. परसों एक कार्यक्रम में मल्लिका शेरावत की बात सुन रही थी. कह रही थीं- “मेरे पास दिखाने को शरीर है तो दूसरों को क्या ऐतराज़ है,” सच है कि उनके पास शरीर है. शरीर शायद और भी कई उन साधारण घर की महिलाओं के पास भी हो, पर उनकी स्थिति दूसरी है, उनके हालत दूसरे हैं. मलाइका जाती हैं, सुरक्षा घेरे में ठुमका लगाती हैं, पांच करोड़ लिया और चल दीं. उन गरीब और साधारण महिलाओं की सोचिये जो इसका शिकार बनती हैं और चीख तक नहीं पाती. अपनी माँ, बहनों, बेटियों को सोचिये जिनके नाम शीला और मुन्नी हैं और जिन्हें इस गाने के नाम पर शोहदे और मक्कार किस्म के लोग छेड़ रहे हैं और अपनी वहशी निगाहों और गन्दी लिप्सा का शिकार बनाने की कोशिश करते रहते हैं.

इसीलिए यह जरूरी है कि इस तरह से स्वतंत्रता के नाम पर हम अंधे नहीं हो जाएँ और इस तरह के सभी प्रयासों का खुल कर विरोध करें और उन पर रोक लगवाएं. फिर यदि मुझ पर कोई कोर्ट इस काम में जुर्माना भी लगाए तब भी मुझे अफ़सोस नहीं होगा, क्योंकि यह मेरे अंदर की आवाज़ है.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

शीला की जवानी और मुन्‍नी की बदनामी ठीक नहीं

: प्रतिबंध लगाने के लिए याचिका दायर : आज इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ बेंच में डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा तीस मार खान के निर्माता ट्विंकल खन्ना, शिरीष कुंदर, रोनी स्क्रूवाला तथा निर्देशक फराह खान, दबंग के निर्माता अरबाज़ खान, मलाइका अरोड़ा तथा ढीलीन मेहता एवं निर्देशक अभिनव कश्यप, सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सेंसर बोर्ड) तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के विरुद्ध एक रिट याचिका दायर किया गया. अशोक पांडे इस प्रकरण में याचिकर्त्री के अधिवक्ता हैं.

इस याचिका में यह कहा गया है कि फिल्म दबंग तथा तीस मार खान और अन्य सभी हिंदी तथा अन्य भाषाओं के फिल्मों में सेंसर बोर्ड के सर्टिफिकेट मिलने के पूर्व ही कई सारे नाच, गाने, डॉयलाग, सीन आदि दिखाया जाना शुरू कर दिया जाता है, जिनमें कई बार ऐसा भी होता है कि ये आगे चल कर सेंसर बोर्ड द्वारा काट दिए जाते हैं अथवा इनकी स्वीकृति नहीं दी जाती है. यह सिनेमेटोग्राफी एक्ट 1952 की धारा 3(1), 4, 5(ए), 5(सी) तथा 5(ई) का स्पष्ट उल्लंघन है. अतः डॉ ठाकुर ने हाई कोर्ट से यह अनुरोध किया है कि सेंसर बोर्ड और सूचना तथा प्रसारण मंत्रालय को निर्देशित करें कि वे इस प्रकार से फिल्मों के सेंसर बोर्ड द्वारा सर्टिफिकेट दिए जाने के पूर्व टेलीविजन, रेडियो, ऑडियो कैसेट, विडियो कैसेट या किसी भी अन्य तरह से गाना, डांस, डॉयलाग, सीन, ऑडियो माध्यम या प्रोमो आदि के जरिये अपने फिल्म के भागों को जनता के समक्ष पब्लिक डिस्प्ले के लिए प्रस्तुत नहीं करें.

डॉ. ठाकुर ने यह भी अनुरोध किया है कि दो गाने- दबंग का गाना ‘मुन्नी बदनाम हुई’ और आगामी फिल्म तीस मार खान का गाना ‘शीला की जवानी’ खास तौर कर पब्लिक डीसेंसी, मोरालिटी, पब्लिक आर्डर के खिलाफ हैं और इनसे अपराध के कारित होने की भी संभावना रहती है. यह सीधे तौर पर सिनेमेटोग्राफी एक्ट के धारा 5(बी)(1) का उल्लंघन है. उन्होंने कहा कि स्कूलों तथा कॉलेजों में जाने वाली लडकियां, दफ्तरों के जाने वाली कामकाजी महिलाएं और यहाँ तक कि घरेलू महिलायें भी इस गाने के कारण गलत रूप से प्रभावित हो रही हैं, खास कर के वे जिनके नाम शीला, मुन्नी, मुनिया या ऐसे ही मिलते-जुलते नाम हैं. अतः डॉ ठाकुर ने इन दोनों गानों के प्रदर्शन को तुरंत रुकवाने का अनुरोध किया है. इसके लिए भारत के अलावा पाकिस्तान के लाहौर की एक मुन्नी नामक दो बच्चों की माँ का जिक्र प्रस्तुत किया गया है, जिसे इसी गाने के चलते अपनी दुकान तक बंद करनी पड़ गयी.

अनंतिम प्रार्थना के रूप में याचिकर्त्री ने तीस मार खान फिल्म के प्रदर्शन पर ‘शीला की जवानी’ गाने के नहीं हटने तक और दबंग फिल्म के प्रदर्शन पर ‘मुन्नी बदनाम हुई’ गाने के नहीं हटने तक रोक लगाने का अनुरोध किया है. इस बारे में सुनवाई की तारीख तीन जनवरी 2011 लगाई गयी है.

यह याचिका अंग्रेजी में इस प्रकार है.

A Writ petition has been filed today 23/12/2010 in the Allahabad High Court, Lucknow Bench by Dr Nutan Thakur against Twinkle Khanna, Shirish Kunder and Ronnie Screwvala, Producers of  Tees Maar Khan, Farah Khan, Director of Tees Maar Khan,  Arbaaz Khan, Malaika Arora Khan and Dhillin Mehta  , Producers of Dabangg,  Abhinav Kashyap, Director of Dabangg, Central Board of Film Certification (Censor Board) and Union of India through the Secretary of Information and Broadcasting. Asok Pandey is the advocate Counsel of the Petitioner.

The petition presents the fact that in film ‘Dabangg’ and Tees Maar Khan, as in almost all other cases of Hindi films and films of other languages, many indecent, immoral and vulgar songs, dialogues and visual representations start being shown and disseminated to general public through the means of channels of mass media like Televisions, radios and audio/ video cassettes even before the issue of certificate under the law of the land. This is completely against sections 3(1), 4, 5(A), 5(C) and 5(E) of the Cinematography Act 1952 because in many cases such songs, dances, scenes, dialogues etc do not get certificate
later on but by that time it has been publicly exhibited to a very large extent. Hence the petitioner has requested the High Court to direct the Censor Board and Ministry of Information and Broadcasting to intervene and issue directives to the film-makers in all the languages and all other concerned bodies like the Television channels, radio stations, audio cassette and video cassette companies not to display anything (including songs, dances, dialogues, audio inputs, sequences, promos or other such materials of the film) before the Censor Board has issued the required Certificate to the respective films.

Dr Thakur has also prayed that in the songs Munni Badnam Hui and Sheila ki jawaani, there  is the specific problem of use of such songs which are against decency, morality and public order and which can incite commitment of offences. This is against the provisions of section 5(B)(1) of the Cinematographer Act. She says that such unfortunate events have already started taking place where helpless and poor girls studying in schools and colleges, working women in all kinds of establishments, Institutions and organizations and even housewives are being teased, molested and sarcastically treated, more so when the name of the women/girls is Sheila/ Sheela/ Munni/ Muniya or other similar sounding ones. Hence she has requested to issue orders to immediately stop the public exhibition of these two songs. She has presented an example from Lahore, Munni, a mother of two in this Pakistani city, was harassed so much that she has shut her small shop.

As an interim relief, the petitioner has requested ordering the respondents to stop the release of the Hindi film ‘Tees Maar Khan’ as long as the song ‘Sheila ki jawaani’ is not removed from the film and to stop the screening/ public exhibition of the Hindi film ‘Dabangg’ as long as the song ‘Munni badnaam hui’ is not removed from the film. The mater shall come for hearing on 03rd January 2011.

तहलका के साथ खड़े हों

नूतनजीमैं तहलका के साथ हूँ. ठीक है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में आज साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘तहलका’ के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की गयी है. यह भी ठीक है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ता सुशील कुमार मिश्रा की ओर से ‘तहलका’ के खिलाफ दायर याचिका में पत्रिका के खिलाफ स्वत: संज्ञान लेकर कार्रवाई की मांग की गयी है. जानकारी के अनुसार मिश्रा की दलील है कि ‘तहलका’ के 18 दिसंबर 2010 के अंक में उच्च न्यायालय के 35 न्यायाधीशों की तस्वीरें प्रकाशित की गयी हैं और इसमें उनकी ‘मानहानि’ करती टिप्पणियां भी प्रकाशित की गयी हैं. बताया जा रहा है कि न्यायालय द्वारा बुधवार को इस याचिका पर सुनवाई किए जाने की संभावना है.

मैं नहीं कह पाउंगी कि इस मामले में न्यायालय का क्या रुख रहेगा और न्यायालय क्या निर्णय करेगी. पर जहां तक मेरी बुद्धि जाती है, मैं अपने आप को तहलका के साथ पाती हूँ. 18 दिसंबर 2010 के अंक के ठीक पहले भी तहलका ने अपने 11 दिसंबर 2010 के अंक में इसी से जुड़ा एक खबर प्रकाशित किया था, जिसका शीर्षक था- “Judges hear cases argued by sons. Not good counsel at all”. यह खबर कुणाल मजुमदार द्वारा लिखी गयी थी. यह खबर मूल रूप से उच्चतम न्यायालय के जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस ज्ञानसुधा मिश्रा द्वारा एक मामले में दिए गए कुछ अत्यंत गंभीर टिप्पणियों के आलोक में लिखी गयी थी. इन दोनों न्यायाधीशगणों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के दोनों बेंचों में कार्यरत कुछ न्यायाधीशगण के विषय में उनके रिश्तेदारों के सम्बंधित कतिपय कड़ी टिप्पणियां की थीं.

कुणाल मजुमदार की खबर इसी निर्णय को आगे बढाते हुए लिखी गयी थी, जिसमे यह कहा गया था कि ऐसे आठ जज हैं जिनके भाई या पुत्र उसी हाई कोर्ट में वकालत कर रहे हैं, जहां वे जज हैं. इस आर्टिकल में कुछ जजों के लड़कों से बात करने पर उनके द्वारा कोई टिप्पणी नहीं करने की बात लिखी गयी थी और लखनऊ में प्रैक्टिस कर रहे सीएम शुक्ला की इस बारे में एक कड़ी टिप्पणी दी गयी थी. चूँकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के मद्देनज़र मैंने भी इलाहबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच में एक रिट याचिका दायर किया था, अतः कुणाल ने इस खबर में मेरी बात भी लिखी थी जहां मैंने अपने रिट का उद्देश्य बताया था. यह अलग बात है कि बाद में यह रिट उल्‍टे मेरे ही खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए खारिज कर दी गयी.

अब अगले अंक में ब्रिजेश पाण्डेय और कुणाल मजुमदार ने पुनः उसी निर्णय की पृष्ठभूमि में इन आठ न्यायाधीशों की जगह अबकी पैंतीस ऐसे जजों के नाम और फोटो प्रकाशित किये हैं जिनके पुत्र, पिता, अन्य निकट सम्बन्धी उसी न्यायालय में कार्यरत हैं. लेखकद्वय ने साफ़ कहा है कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि जहां जज हों वहाँ उनके सम्बन्धी काम नहीं करें, पर इस आर्टिकल में खुद पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया वीएन खरे का बयान है कि जैसे ही वे सुप्रीम कोर्ट में आये, उन्होंने पहला काम यह किया कि अपने लड़के को दिल्ली से इलाहाबाद भेज दिया. शायद नैसर्गिक न्याय के नियम- “न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए, न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए” और “किसी भी व्यक्ति को अपने मामले में जज नहीं होना चाहिए” इस प्रकार की सोच और ऐसी आवश्यकता के पीछे मुख्य कारण हैं. यह भी दिखता है कि सुप्रीम कोर्ट ने शायद  इन्हीं कारणों से अपने सबसे बड़े हाई कोर्ट के खिलाफ इतनी तल्ख़ टिप्पणी की हो. यह भी काबिलेगौर है कि जब उच्च न्यायालय, इलाहाबद ने इस बारे में पुनर्विचार याचिका दायर की थी तब भी सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी टिप्पणियां वापस लेने की जगह यही कहा- “सभी जानते हैं कि कौन ईमानदार है और कौन बेईमान.”

अब ऐसे में यदि तहलका किसी प्रकार की विपरीत टिप्पणी करने या किसी न्यायाधीश को व्यक्तिगत तौर पर दोषी ठहराने की कोशिश की जगह मात्र कुछ तथ्य प्रस्तुत कर रहा है, तो मैं उसे किसी भी तरह से गलत नहीं मानती. बल्कि मैं उसे पूरी तरह से एक अच्छे उद्देश्य के लिए जनता के समक्ष तथ्यों को प्रस्तुत करने के लिए किया गया एक सद्प्रयास मानती हूँ ,जिसकी हमारे देश को नितांत जरूरत है. इस प्रकार के तथ्यों को जानना इस देश के नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है. बाकी निर्णय लेना और अपना मंतव्य बनाना आम आदमी का काम है. जहां तक मैं तहलका के इस आर्टिकल को समझ पायी हूँ, इसमें उसने किसी भी प्रकार से उच्च न्यायालय की गरिमा पर प्रहार करने या उसे अवमानित करने की कोई भी कोशिश नहीं की गयी है.

ऐसे में मैं मानती हूँ कि तहलका के इस हिम्मत को और उसके प्रयास को सराहा जाना चाहिए और हम सभी पत्रकार साथियों को अपनी पूरी शक्ति के साथ तहलका और उसके इन दोनों पत्रकारों के साथ रहना चाहिए, जिन्होंने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है और बाकी पत्रकारों के लिए भी न्यायपालिका से जुड़े सुरुचिपूर्ण और सोद्देश्यपूर्ण आलेख और आर्टिकल लिखने का मार्ग प्रशस्त किया है. मेरी जितनी भी ताकत और शक्ति है, मैं पूरी तरह तहलका के साथ हूँ और उसे इस काम के लिए सलाम करती हूँ.

डॉ नूतन ठाकुर,

संपादक,

पीपल’स फोरम, लखनऊ

हथियारों की सौदागरी और मीडिया ट्रायल

नुतनमैंने कुछ दिनों पहले यहीं भड़ास पर लखनऊ से निकलने वाले अखबार निष्पक्ष प्रतिदिन के संस्थापक-संपादक जगदीश नारायण जी का एक इंटरव्यू भेजा था, जिसे यशवंत जी ने प्रकाशित किया था. इस इंटरव्यू को ले कर कई टिप्पणियां आयीं, लेकिन एक ऐसी टिप्पणी थी जो मुझे यकबयक अतीत के झरोखे में ले गयी. यह टिप्पणी थी इंडिया न्यूज़ की विशेष संवाददाता नसीम अंसारी की. अपनी टिप्पणी में नसीम ने मुझे मेरे पति अमिताभ ठाकुर के गोंडा जिले के एसपी के रूप में किये गए तथाकथिक दुष्कृत्य के बारे में याद दिलाया और इसी आधार पर उन्होंने यह भी कह दिया कि उस रिपोर्ट के आधार पर जगदीश नारायण ने मेरे पति से जरूर कोई सौदेबाजी की होगी.

दरअसल यह रिपोर्ट नसीम ने ही लिखी थी. उस समय वह जगदीश नारायण की पत्रिका ‘आखिर कब तक’ में ही काम करती थीं. इस रिपोर्ट में उन्होंने मेरे पति को अपराधियों को शस्त्र लाइसेंस बाँट कर पैसे कमाने की बात कही थी और इससे जोड़ते हुए ही कई अन्य गंभीर आरोप लगाए थे. वैसे यह रिपोर्ट मात्र ‘आखिर कब तक’ में ही नहीं छपी थी बल्कि व्यापक सर्कुलेशन वाले ‘इंडिया टुडे’ और कई बड़े हिंदी और अंग्रेजी अखबारों के लखनऊ संस्करण में भी निकली थी. सभी रिपोर्ट लगभग एक से थे और उनमें मेरे पति को गोंडा जिले के एसपी के रूप में बड़े-बड़े अपराधियों को गलत पते पर और गलत रिपोर्ट के आधार पर आर्म्स लाइसेंस देने और इस तरह से शस्त्र सप्लाई करने का दोषी ठहराया गया था. इन कहानियों में इन शस्त्रों के तार नागालैंड से लेकर कर जम्मू-कश्मीर तक जोड़ दिए गए थे और इस प्रकार यह फ़साना बन गया कि एक आईपीएस अफसर (जो जिले के एसपी जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण पद पर तैनात हो) द्वारा इस प्रकार का देशद्रोही और घृणित कृत्य किया जा रहा है. फिर जैसा कभी-कभी मीडिया में दिख जाता है, इस रिपोर्ट के आधार पर एकतरफ़ा मीडिया ट्रायल शुरू हो गया था, जिसके आधार पर मेरे पति को एक खलनायक, घृणित तथा कर्तव्यच्युत व्यक्ति के रूप में प्रदर्शित कर दिया गया था.

आप सोच सकते हैं कि जिस आदमी के बारे में इस तरह ही बातें लगातार अखबारों में आ रही हों, पत्र-पत्रिकाओं में छप रही हों, उसकी दशा कैसी हो जायेगी. वह भी तब, जब वह भली-भांति जानता हो कि इस पूरे मामले में उसकी कोई गलती नहीं है.

हुआ यह था कि मेरे पति जिस समय गोंडा के एसपी थे तो किन्हीं सूत्रों से उनके डीआईजी को यह खबर मिली कि पूर्व में गोंडा जिले से कई अपराधियों को गलत ढंग से शस्त्र लाइसेंस मिले हैं. उन्होंने मेरे पति से यह जांच एडिशनल एसपी से कराने को कहा. जांच शुरू हो गयी. इसी बीच कुछ ऐसा हुआ कि मेरे पति के आधिकारिक सम्बन्ध एक साथ उन डीआईजी और एडिशनल एसपी साहब से खराब हो गए. देखते ही देखते यह मनमुटाव व्यक्तिगत स्तर पर पहुँच गया. फिर एक दिन उन एडिशनल एसपी का गोंडा से ट्रांसफर हो गया और किसी भ्रम में डीआईजी ने समझा कि मेरे पति ने ही अपने राजनैतिक रसूख का इस्तेमाल कर के ऐसा करा दिया है. उन्होंने एडिशनल एसपी को अपने पास फैजाबाद बुला लिया और उनसे नब्बे पेज की एक बहुत मोटी रिपोर्ट बनवाई जिसमें कई तरह के निष्कर्ष निकाले.

इस रिपोर्ट में अन्य बातों के अलावा एडिशनल एसपी साहब ने मेरे पति के बारे में लिखा- “कुल सात लाइसेंस वर्तमान पुलिस अधीक्षक, गोंडा  श्री अमिताभ ठाकुर की संस्तुति पर स्वीकृत हैं, जो सभी फर्जी पते दे कर प्राप्त किये गए हैं और इनमे से तीन के आपराधिक इतिहास की पुष्टि हुई है. उल्लेखनीय है कि उक्त सातों प्रकरण थाने के पश्चात बिना क्षेत्राधिकारी अथवा अपर पुलिस अधीक्षक की संस्तुति के सीधे पुलिस अधीक्षक अमिताभ ठाकुर द्वारा संस्तुति किये गए हैं.”  उन्होंने इन तथ्यों के आधार पर मेरे पति के विरुद्ध तमाम धाराओं में अभियोग पंजीकृत करने की संस्तुति की.

इस रिपोर्ट में अन्य बातों के अलावा तीन खास बातें थी-

1. इसमें एक कनिष्ठ अधिकारी (एडिशनल एसपी) ने अपने से वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ जांच कर रिपोर्ट दी थी जबकि शासकीय नियमों में इसकी मनाही है.

2. यद्यपि उन्होंने यह रिपोर्ट एसपी को संबोधित किया था पर सौंपा था सीधे डीआईजी को. मेरे पति को इसकी कॉपी तक नहीं दी.

3. इस जांच के दौरान मेरे पति से कोई पूछ-ताछ तक नहीं की गयी.

डीआईजी साहब ने इस रिपोर्ट को लेकर इस पर अपनी कुछ टिप्पणियाँ लिखीं जो और भी खतरनाक थीं. उन्होंने लिखा- “पुलिस अधीक्षक गोंडा श्री अमिताभ ठाकुर की सीधे-सीधे रैकेट में संलिप्तता है.” अपनी रिपोर्ट में उन्होंने भी मेरे पति के खिलाफ मुक़दमा दर्ज करने की संस्तुति की. लेकिन चूँकि मुख्य मकसद एडिशनल एसपी का ट्रांसफर रुकवाना था, इसीलिए यह भी लिखा कि आगे की सही जांच के लिए एडिशनल एसपी साहब का ट्रांसफर रोका जाए और मेरे पति का तुरंत ट्रांसफर हो. इस रिपोर्ट की प्रति उन्होंने कई जगहों पर भेज दी. जो भी स्थितियां हो, एडिशनल एसपी साहब का ट्रांसफर नहीं रुका और मेरे पति गोंडा में ही रहे. इसके बाद शुरू हुआ मेरे पति के खिलाफ भयानक दुष्प्रचार का काम. ताबडतोड़ खबरें और अपमानजनक बातें.

इसके बाद उत्तर प्रदेश शासन द्वारा जांच शुरू हुई. मैं तो इसे अपना और इनका अहो-भाग्य मानती हूँ कि जांच एक ऐसे आईएएस अधिकारी एके बिश्नोई को मिली, जो अवश्य ही न्यायप्रिय रहे होंगे, तभी तो हमें न्याय मिल सका. देखिये बिश्नोई जी ने अपनी जांच के अंत में क्या लिखा- “ इस सम्पूर्ण जांच की छानबीन के बाद यह तथ्य परिलक्षित होता है कि सभी मामलों में पुलिस अधीक्षक की संस्तुति उनके अधीनस्थ कर्मियों की संस्तुति पर आधारित थी और स्वयं अपने स्तर से कोई ऐसी संस्तुति नहीं की गयी थी, जो कि निचले स्तर से प्रस्तुत संस्तुति के विपरीत हो.” साथ ही यह भी लिखा- “ऐसे मामलों में, जिनके आवेदक के आपराधिक इतिहास होने के बावजूद पुलिस द्वारा शस्त्र लाइसेंस स्वीकृत करने हेतु संस्तुति की गयी थी, उनमे भी श्री अमिताभ ठाकुर को दोषी मानना उचित नहीं होगा.” अंत में उन्होंने यह तक लिख दिया- “ श्री (एबीसी) द्वारा अपनी आख्या तथ्यों के आधार पर नहीं दी गयी और गैर-जिम्मेदाराना तरीके से निष्कर्ष निकाले गए थे.”

पर जैसा कि पत्रकारिता के क्षेत्र में अक्सर होता है, पहले वाली झूठी खबर तो सुर्खियाँ बनीं पर बाद की सच्चाई कहीं गहरे-खाने दफ़न हो गयी, जिसकी चर्चा तक नहीं हुई. इस तरह मेरे पति तमाम लोगों की निगाहों में हमेशा के लिए शस्त्रों के सौदागर और आर्म्स लाइसेंस रैकेट के सरगना बन के रह गए. मेरे पति उसके बाद से आज तक लगातार अधिकारियों को पत्र लिख कर उन्हें इस तरह फंसाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग कर रहे हैं पर बात वहीं की वहीं हैं.

अब अंत में कुछ खास बातें. एक तो यह कि हमारे खुद के इस अनुभव से हम कह सकते हैं कि मीडिया एक ऐसा यंत्र है जिसकी मार एकतरफा होती है. चूँकि कभी-कभी गलत बात पहले निकल जाती है फिर वही बात हमेशा के लिए चिपक जाती है, जिससे सच हमेशा के लिए ओझल हो जाता है. पर मैं इस मामले में मीडिया को दोषी नहीं मान रही. मैं सोचती हूँ कि यदि उतना मोटा झूठ का पुलिंदा तैयार कर के कोई मेरे पास ही ले आता तो मैं भी इसे सच ही मान बैठती. किसी के बारे में बुरी बात को सही मानना वैसे भी इंसानी फितरत होती है. गलती हमारी भी है कि हम लोगों ने बढ़-चढ कर सही बात हर जगह सबसे सामने नहीं रखी. दूसरी बात यह कि शस्त्र लाइसेंस देने का जो आरोप मेरे पति पर लगा था, असल में लाइसेंस एसपी देता ही नहीं है, यह काम डीएम का होता है. इस तरह मेरे पति उस अपराध के अपराधी हो गए थे, जो उनके अधिकार में ही नहीं था. डीएम यह लाइसेंस पुलिस और राजस्व विभाग दोनों की रिपोर्ट के आधार पर देते हैं. इस तरह डीएम के अधिकार क्षेत्र की बात के लिए, जिस पर जानकारी के लिए उसके पास पुलिस के अलावा अन्य भी स्रोत होते हैं, कुछ चालाक लोगों के षडयंत्र के शिकार मेरे पति हो गए.

और अंतिम बात मेरे पति के लिए और इनके जैसे तमाम लोगों के लिए जो कुछ ज्यादा ही उदार ह्रदय होते हैं. मैं जानती थी कि वह आज नहीं तो कल जरूर फंसेंगे. कारण दो. एक तो किसी पर विश्वास कर लेना और दूसरे अपनी औकात से आगे बढ़ कर किसी की मदद करने की कोशिश करना. इस मामले में भी यही हुआ था. वे ऑफिस में बैठे थे. एक परिचित आ गए. कहा कि शस्त्र रिपोर्ट डीएम साहब के यहाँ जल्दी चली जाती तो वहाँ से हो जाता. आदत से लाचार पतिदेव ने फाइलें मंगवाई और उन पर सीओ और एडिशनल एसपी की रिपोर्ट के बगैर ही अपनी संस्तुति कर के आगे भेज दिया. यह तो मैं ईश्वर की कृपा मानती हूँ कि उस पर लोकल थानाध्यक्ष के अलावा डीसीआरबी, जहां पूरे जिले के अपराध का ब्यौरा होता है, की भी रिपोर्ट लगी थी, नहीं तो पतिदेव का इस षडयंत्र से बच के निकालना मुश्किल था. वे कानूनी तौर पर सही इसीलिए भी साबित हुए कि क्षेत्राधिकारी और एडिशनल एसपी भी लोकल एसओ और डीसीआरबी की रिपोर्ट पर ही अपनी संस्तुति करते हैं और एसपी भी. इस प्रक्रिया से गुजरने में थोडा समय अधिक लग जाता है, लाइसेंस देने पर कुछ अंकुश लगा रहता है और कुछ नीचे के पुलिस के कर्मचारियों की थोड़ी-बहुत कमाई भी हो जाती है.

हाँ, इस घटना से मुझे यह लाभ जरूर हुआ कि इन्हें एक सबक जरूर मिल गया, जिसकी इन्हें सख्त जरूरत थी. लेकिन क्या यह पूरी तरह इन आदतों से अलग हो सके हैं, इस पर मैं आज भी दावे से कुछ नहीं कह पाउंगी.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक,

पीपल’स फोरम, लखनऊ

धमाके का खेल और आईबी की सूचना

नूतनमायावती और केन्द्र सरकार में अभी तकरार चल रही है कि वाराणसी बम धमाके में किसकी गलती मानी जाए. होम मिनिस्टर पी चिदंबरम भी सब जगह नहीं जाते पर वाराणसी तुरंत पहुँच गए क्योंकि वहाँ राजनैतिक खेल जो खेलना था. आते ही यह बयान भी दे दिया कि केन्द्र ने तो राज्य सरकार को चेताया था पर राज्य सरकार ने उस पर समय रहते ध्यान नहीं दिया. लिहाजा इस बम धमाके के लिए राज्य सरकार की शिथिलता ही प्रमुख कारण है.

मायावती कहाँ पीछे रहने वाली थीं. तुरंत अपने कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह को आदेश दिया कि प्रेस बुलाओ और उन्हें बताओ कि ये सारी गलती केन्द्र सरकार की है. शशांक शेखर ने प्रेस वालों को बुलाया और उनको बताया कि राज्य सरकार नहीं, केन्द्र सरकार इसके लिए जिम्मेदार है. साथ ही यह भी कहा कि जिस प्रकार से केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार पर ठीकरा फोड़ने की कोशिश की है वह पूरी तरह से गलत और औचित्यहीन है. लेकिन इतना कहने के साथ-साथ उन्होंने 25 फरवरी 2010 तथा 26 नवंबर 2010 के आईबी के दो कथित अलर्ट भी दिखाए. दिखाए अभिलेख के अनुसार 25 फरवरी वाले अलर्ट में दशहरा मेला के समय दशाश्वमेध घाट पर सुरक्षा के बारे में सामान्य किस्म का अलर्ट था और 26 नवंबर  को बाबरी मस्जिद की शहादत से जुड़ा एक अलर्ट था.

यद्यपि मूल अलर्ट मैंने नहीं देखे हैं, अतः निश्चित तौर पर तो नहीं कह पाऊंगी पर पुलिस विभाग के इतना नजदीक रह कर एक चीज़ तो जरूर देखा है कि यहाँ इंटेलिजेंस और अभिसूचना के नाम पर ऐसे ही अति-सामान्य किस्म की सूचनाएं आती-जाती रहती हैं, जिन्हें ये लोग बड़े शान से अलर्ट जैसा सम्मानित नाम देते हैं. मुझे एक पुलिस अधिकारी, जो उत्तर प्रदेश अभिसूचना के लंबे समय तक रहे थे, ने स्वयं एक किस्सा बताया था कि किस तरह के अलर्ट आईबी और रा जैसी नामचीन संस्थाओं से आते रहते हैं. उनका कहना था कि एक बार वे शाम में दफ्तर से उठ ही रहे थे कि एक ‘अलर्ट’ उनके सामने रखा गया. अलर्ट में लिखा था- “दो लोग कल पाकिस्तान से पंजाब सीमा में घुस आये है. दोनों कम उम्र के, औसत कद-काठी के और सामान्य रंग-रूप के हैं. दोनों ने शर्ट-पैंट पहन रखी है और ऐसा लगता है कि वे किसी बड़ी वारदात के चक्कर में भारत आये हैं.”

उनका यह कहना था कि यह अलर्ट देख कर मैंने सर पीट लिया कि अब इस अलर्ट का क्या करूँ. अपने पास भी नहीं रख सकता था कि यदि कोई बात हो गयी और ऐसे ही किन्हीं लोगों ने वारदात कर दिया तो मेरी नौकरी खतरे में. लेकिन भेजूंगा भी तो इसका क्या फायदा होगा, यह मैं खूब समझ रहा था. इस तरह के तो इस देश में करोड़ों लोग होंगे, तो पुलिस फिर कितने सारे कम उम्र के, औसत कद-काठी के और सामान्य रंग-रूप के शर्ट-पैंट पहनने वाले लोगों की तलाश लेती रहेगी. फिर इससे भी हद तब हो गयी कि जब मैंने कुछ इसी तरह का एक समाचार अगले दिन एक टीवी चैनल पर भी देख लिया.

यह कहानी बताने के बाद उन अधिकारी का यही कहना था कि इस प्रकार के अलर्ट केवल दिखावा होते हैं, झूठी कोशिश होती है अपनी अहमियत कायम रखने की और बेकार के प्रयास होते हैं जिसमे केवल कागज काले होते हैं. मुझे लगता है उनकी बात शायद कोई बहुत गलत नहीं थी.

सचमुच इस तरह से अलर्ट भेज कर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करना किसी भी प्रकार से उचित नहीं जान पड़ता है. ऐसे में मुझे शशांक शेखर की बात वाजिब ही लगती है जब वे कहते हैं- “ राज्य उन्हीं सूचनाओं पर कार्य कर सकती है जो स्पष्ट हो और जिस पर क्रिया की जा सके.” बाकी बेकार की सूचनाओं का ताना-बाना अब बंद होना चाहिए. इस तरह के खेल इन अभिसूचना ईकाईओं ने शायद बहुत खेल लिया है.

इस सब से यह जरूर जान पड़ता है कि इस बार मायावती सरकार का केन्द्र पर आरोप बिल्‍कुल वाजिब है. यदि ऐसा नहीं होता और इसके विपरीत यदि राज्य सरकार गलतबयानी कर रही होती तो केन्द्र सरकार अभी तक चुप नहीं रही होती और चिदंबरम जरूर सामने आते और बताते कि किस प्रकार की महत्वपूर्ण सूचनाएं दी गयी थी, जिन पर कार्रवाई नहीं हुई.

डॉ नूतन ठाकुर,

संपादक,

पीपल’स फोरम, लखनऊ

ब्‍लैकमेलर तो वीर, बरखा और प्रभु जैसे लोग हैं

: इंटरव्‍यू – जगदीश नारायण शुक्‍ला (वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ) : जगदीश नारायण शुक्ला अपने ही ढंग के आदमी हैं और कुछ विचित्र किस्म के पत्रकार भी. जो सोचते हैं सो करते हैं, जो सही लगता है, वह लिखते और छापते हैं, दिन भर सरकार और व्यवस्था से लोहा लेते रहते हैं लेकिन इस प्रक्रिया में कभी थकान नहीं महसूस करते. सफ़ेद लहराते बाल और दुबले-पतले शरीर वाले शुक्ला जी वास्तव में अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं. निर्भीक पत्रकारिता की धारणा, जो पहले हम लोगों के मन में रहा करती थी, ये उसके जीते-जागते प्रतीक हैं. सबसे विचित्र बात ये है कि उम्र के साथ भी उनकी आक्रामकता और उनके तेवरों में कोई कमी नहीं आई है. शुक्ला जी का हिंदी दैनिक ”निष्पक्ष प्रतिदिन” लखनऊ में धमाके करता रहता है. हाल ही में उन्होंने इसे सांध्य से सुबह का बनाया.

जगदीश नारायण शुक्ला से पीपुल्स फोरम, लखनऊ की संपादक नूतन ठाकुर ने कई मुद्दों पर बातचीत की. पेश है कुछ अंश-

-आपने पत्रकारिता की शुरुआत कहां से की?

मैंने अपनी पत्रकारिता 1970 में सीतापुर से शुरू की. मैंने लगभग इसी समय सीतापुर से साप्ताहिक अखबार शांतिदूत शुरू किया. इसके पीछे मुख्य कारण यह था कि उस समय ग्रामीण क्षेत्रों की खबरें अखबारों में लगभग नहीं के बराबर प्रकाशित होती थीं. मैंने इसी उद्देश्य से यह अखबार शुरू किया. इससे पहले मैंने अवधेश अवस्थी के साथ भी कुछ समय तक काम किया था. वे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे और राष्ट्र सन्देश नाम से एक साप्ताहिक अखबार निकाला करते थे. मैंने कुछ दिन उनके साथ काम किया- फिर उन्होंने कहा कि तुम नौजवान हो, कुछ अपना काम करो, अपना अखबार निकालो. उन्हीं की प्रेरणा से मैंने अपना साप्ताहिक निकालना शुरू किया.

-कुछ उन दिनों की बात बताएंगे?

शुरुआत में हम अपने आप से अखबार प्रेस में छपवा कर के खुद ही लोगों को देने जाते थे,  कम्पोजिंग खुद करते फिर छपवाया करते. इमरजेंसी में मेरा अखबार बंद कर दिया गया और मुझे जेल भेज दिया गया. डेढ़ साल जेल में रहा. इमरजेंसी खत्म होने के बाद जेल से बाहर आ गया. फिर जनता पार्टी की सरकार बनी पर अफसर तो कुल मिला कर वही थे इसीलिए मदद नहीं हो पायी. मैं भी इससे तंग आ कर 1979 में दुबारा लखनऊ शिफ्ट हो गया. लेकिन इससे पहले मेरी पढाई-लिखी लखनऊ में ही हुई थी. अबकी लखनऊ में आ कर सरकारी नौकरी शुरु की पर उस समय तक भ्रष्टाचार का रूप शुरू हो गया.

-उस समय का भ्रष्टाचार आज की तुलना में कैसा पाते हैं?

आज की तुलना में तो बहुत कम था. लेकिन शुरु हो गया था- इसके खिलाफ मैं आगे बढ़ा. मैं सिविल डिफेंस विभाग में था. लेकिन जब मैं इन भ्रष्टाचारों के खिलाफ आगे बढ़ा तो मेरे खिलाफ भी भयानक षडयंत्र शुरू हो गया और मजबूरन मुझे हटना पड़ गया. वे होम गार्डों के मस्टर रोल फर्जी बनाते थे. उस समय दैनिक भत्ता पचहत्तर पैसे मिलता था और ये उसमे भी कुछ फर्जी बनाते थे. मैंने उसका प्रतिवाद करना शुरू किया. लिखा-पढ़ी मैंने शुरू कर दी. उस समय एक एडीएम हुआ करते थे- मिस्टर सच्चिदानंद पांडे, बाद में आईएएस अफसर भी हुए पर उस वक्त जगदीशएडीएम थे. और एक डिस्ट्रिक्ट लेवल अफसर हुआ करते थे- छत्रपाल सिंह. ये कई अधिकारी थे जो इस मामले में फंसे और इन के खिलाफ मुकदमे भी चले- फर्जी मस्टर रोल बनाने के. ये सब दुश्मन हो गए और इन्हीं के मारे मैंने सोचा कि यह ठीक नहीं रहेगा, नौकरी छोड़ दी और अपनी खेती-बाड़ी गाँव जा कर करने लगा था. इसी बीच एक बार फिर अखबारों से जुड़ना शुरू हो गया था और एक बार फिर मैं लखनऊ में था. मैंने लगभग इसी समय लखनऊ में डेढ़ साल तक एक साप्ताहिक निकाला और फिर 30 जनवरी 1982 को निष्पक्ष प्रतिदिन का प्रकाशन शुरू किया और तब से हमारा अखबार निरंतर चलता रहा. सरकारें जो भी आयीं- कांग्रेस सरकार के खिलाफ लिखा, मुलायम सिंह के खिलाफ लिखा, कल्याण सिंह, मायावती जब भी मुझे जो बात मालूम हुई मैंने जरूर उसके खिलाफ खुल कर लिखा. राजनाथ सिंह आये, उस सरकार से भी झगडा हुआ. इस तरह मामला इतना बढ़ गया कि 2002 में मुझे अखबार बंद करना पड़ गया. और 2007 अप्रैल तक बंद रखा. फिर 2007 में ही अखबार दुबारा शुरू किया. जो लिखने की बात थी वो मैंने लिखा. वैसे कहने को तो लोग कहते हैं कि अखबारों को सही लिखना चाहिए पर सच तो यही है कि ये जितने पूंजीपतियों के अखबार हैं वे अपना धंधा और अपना हित बढाने के चक्कर में लगे रहते हैं. छोटे अखबार जो हैं, वे बेचारे कुछ लिखते-पढते हैं पर उन्हें तरह-तरह की तकलीफे उठानी पड़ती हैं.

-अपना अखबार निकालना और वह भी बिना पूंजी के, आपको कैसा अनुभव हुआ?

मैंने जब साप्ताहिक निकाला तो मेरे खिलाफ लगभग 30 या 35 मुकदमे चलाये गए. और हिंदी दैनिक अखबार जब से शुरू हुआ है तब से सहारा ने ही लगभग 25 मुकदमे मानहानि के किये हुए हैं. और कई अफसरों ने चलाये कि साहब इन पर मानहानि चले. जबकि खबरें सही हैं पर मुक़दमा डाल देते हैं क्योंकि इसको ले कर कोई ठोस कानून तो है नहीं. अब मुक़दमा डाल दिया, आप लड़ते रहिये.

-क्या आपको ऐसा लगता है कि जो नए अखबार शुरू होते हैं या जैसा आपने शुरू किया, बड़े अखबार नहीं चाहते हैं कि ये आगे आयें?

ये बात बिलकुल सही है. अव्वल तो ये चाहते नहीं कि कोई नया आये और उनकी कोशिश ये होती है कि इन को हर तरह से दबा दिया जाए और अपना काम चले. अभी आपने जो बात दिल्ली की सुनी है कि दिल्ली में जो सो-कॉल्ड जर्नलिस्ट हैं, वो बरखा दत्त हों या वीर संघवी  हों, ये लोग पैसा केवल कमाने का धंधा करते हैं. आपके जो प्रभु चावला हैं उनके लड़के की सीबीआई जांच हो रही है, उनके खिलाफ भी तमाम आरोप हैं. ये एक जरिया बना हुआ है और पैसा कमाने का उपाय है. ब्लैकमेलिंग का काम जो वास्तव में कर रहे हैं, वे बड़े अखबार के और बड़े संस्थान के लोग हैं. प्रचार ये होता है कि छोटे अखबार वाले तो ब्लैकमेलर हैं. छोटे अखबार वाले किसको ब्लैकमेल करेंगे भाई? ये ब्लैकमेलर तो साबित हुए हैं बरखा दत्त, प्रभु चावला, वीर संघवी. इनके बारे में कोई कुछ नहीं कहता. हाँ, ये लड़ाई तो चल ही रही है.

-आपकी पत्रकारिता जो रहती है, आपका अखबार ‘निष्पक्ष प्रतिदिन’ आक्रामक तेवर लिए रहता है तो उससे परेशानी भी आती है?

परेशानी बराबर आती है- मतलब धमकियां आती हैं, तमाम चीज़ें होती हैं पर इस मामले में मेरे जो गुरु थे पंडित अवधेश अवस्थी,  जिनके सानिध्य में मैंने अखबार शुरु किया था, उनका कहना था कि यदि अखबार निकालिए तो अखबार होना चाहिए, पढ़ के लगे कि कोई अखबार है. अखबार में आप सही लिखिए- राग-द्वेष से हट कर. और इसीलिए मैंने अपने अखबार में एक स्लोगन दिया है- ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर. जो कहा गया था न कि कबीरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर. अब हम उसी परिपाटी पर चल रहे हैं और उसी पर चलते रहेंगे. बाकी आप देख रहे हैं कि हमारे अखबार का उत्तर प्रदेश शासन ने विज्ञापन बंद कर रखा है पिछले दो साल से. क्योंकि अधिकारी नहीं चाहते. सभी चीज़ें हैं, सभी नियमों के अंतर्गत हमारा अखबार है पर उन अखबारों को विज्ञापन मिल जाता है जो ब्लैकलिस्टेड हैं और छापते ही नहीं, महीने में एक बार केवल ऑफिस कॉपी बन जाती है और अपने को अखबार वाला बता कर अफसरों के साथ लगे हुए हैं.

-इसमें कमीशन का भी चक्कर होगा?

फिफ्टी परसेंट. यहाँ कमीशन फिफ्टी परसेंट चल रहा है. मैंने तो एक से कहा कि यदि मुझे कमीशन देना होगा तो अपने गाँव नहीं चला जाऊंगा, मेरे पास तो पर्याप्त जमीन है- मैं खेती करूँगा. जब मैंने यहाँ मकान बनाया तो तीन हज़ार की ज़मीन खरीदी थी 1964 में. ट्यूशन पढाता था, यहीं रहता था- उसी पैसे से ज़मीन खरीदी अब यहाँ धीरे-धीरे बड़ा घर बना लिया. मेरे खिलाफ लोगों ने कहा कि बहुत बड़े नेता बनते हैं, स्वनामधन्य पत्रकार हैं- इनका इन्कम टैक्स देखा जाए, तो मेरे इन्कम टैक्स की जांच करा दी गयी. पिछले बीस साल से जब से डेली अखबार है, मैं बराबर इन्कम टैक्स देता रहा हूँ. टैक्स जो बनता है हमेशा देता हूँ. यहाँ तो ऐसे ऐसे लोग हैं जो टैक्स नहीं देते और चलते हैं पन्द्रह लाख की गाड़ी से.

-क्या इसमें बड़े अखबारों की साजिश होती है?

यही तो साजिश है. लखनऊ में जो बड़े अखबार हैं उनके ऊपर कीमत लिखा है चार रुपया. और ये अखबार बेचते हैं साठ पैसे में. नाम नहीं लेना चाहता. वे ऐसा इसीलिए करते हैं ताकि छोटे अखबार बिक नहीं पायें.

-उस दौर और आज के दौर में क्या अंतर आया है?

उस दौर में कई पत्रकार दूसरे ढंग के थे. 1986-87 में मैं सचिवालय की प्रेस कमिटी का चेयरमैन था. उस समय के सीनियर-मोस्ट जर्नलिस्ट थे पीटीआई के मिस्टर नकवी, मिस्टर नय्यर, पंडित एसके त्रिपाठी इंडियन एक्सप्रेस के थे, आकाशवाणी में आरके टंडन थे, विधान सभा अध्यक्ष रह चुके पुरुषोत्तम दास टंडन के लड़के, ये लोग स्कूटर या रिक्शे से चलते थे. आज सभी अखबारों में दो-पहिया वाहन ही दिखेंगे. और इन पत्रकारों की रिहायिश इनकी तनख्वाह से तीन गुणा ज्यादा है. लेकिन आज भी दूसरे तरह के लोग हैं. लखनऊ में ही प्रदीप कपूर हैं जो अब ब्लिट्ज में है, उनके पिता ने कभी उन्हें स्कूटर दिया था, उसी स्कूटर पर वह गरीब चल रहा है- नया नहीं खरीद पाए- जबकी बीवी नौकरी करती है- खुद भी लिखते-पढ़ते हैं और अच्छा पैसा पाते हैं. यहाँ ऐसे भी हैं जो कहीं नहीं हैं पर बीस करोड़ की सम्पति के मालिक हैं. मैं एक ऐसे पत्रकार को जानता हूँ जो अपने घर के बिजली का किराया नहीं देते पर बीस लाख की गाड़ी में चलते हैं. यह सब नैतिक मूल्य में गिरावट का परिणाम है. हर समाज की तरह पत्रकारिता में भी, प्रयास करना चाहिये, सुधार की कोशिश होनी चाहिए, यहाँ कई अच्छे लोग भी हैं.

-क्या इसके पीछे पत्रकार की कम तनख्वाह भी है?

तनख्वाह से सुधार नहीं होगा, चरित्र में सुधार की जरूरत है. तनख्वाह पहले से बीस गुणा ज्यादा हो गयी है. पहले 200- 250  रुपये मिला करते थे, अब पचीस-तीस-पचास हज़ार की तनख्वाह मिल रही है. जरूरी है अपने सेंस को सुधारे, अपनी ओर उंगली ना उठने दें.

-क्या स्ट्रिंगर की तनख्वाह में कमी इसका कारण है?

ये कोई कारण नहीं है. जो ठीक हैं वो अपना जीवन बीता लेते हैं- इसी रकम में. यहीं लखनऊ में गिरिधारी लाल पाहवा थे, अब इस दुनिया में नहीं रहे. वो स्ट्रिंगर थे, कम तनख्वाह थी पर इसी में अपना जीवन जिया करते थे, कोई गलत काम नहीं करते थे. हम लोगों को इस बारे में खुद सोचना पड़ेगा.

विकीलीक्‍स की पत्रकारिता को सलाम

नूतनविकीलीक्स को सलाम. वास्तव में 2006 में स्थापित विकीलीक्स ने पत्रकारिता और शासकीय अभिलेखीकरण को एक नयी दिशा प्रदान की है और आज विकीलीक्स का लोहा सारा विश्व मान रहा है. इस मीडिया समूह की स्थापना का उद्देश्य गोपनीय तथा अज्ञात सूत्रों के माध्यम से तमाम गोपनीय शासकीय तथा अशासकीय दस्तावेजों को लीक करके इनकी सूचना आम जन तक लाना था. अपने शुरुआत के एक साल के अंदर ही विकीलीक्स के पास बारह लाख से अधिक अभिलेख आ चुके थे, जिनमे कई तो ऐसे गहन, गंभीर दस्तावेज़ थे जिन्होंने अमेरिका तक को हिला कर रख दिया. ऑस्ट्रेलिया के इन्टरनेट उपयोगकर्ता जूलियन असांज इसके मूल प्रवर्तक माने जाने हैं.

ना जाने कितने ही महत्वपूर्ण मामलों में विकीलीक्स ने अंदरखाने छिपे अभिलेखों को सामने ला कर रख दिया, जिससे कितने सारे लोग, कितनी सारी व्यवस्थाएं बेनकाब हुईं और कितनी मान्यताएं तक टूटने को मजबूर हो गयीं. खास कर इस साल के अप्रैल महीने में इराकी नागरिकों को अमेरिकी सेना द्वारा मारे जाने की घटनाओं से जुड़े वीडियो जारी करने के बाद तो विकीलीक्स पूरी अमेरिकी शासकीय तंत्र का दुश्मन नंबर एक हो गया है, जिसे अमेरिका के राष्ट्रपति से लेकर समस्त अमेरिकी तंत्र बहुत ही गहराई तक अपना दुश्मन मानने लगा है. इसके अलावा भी कई देशों की सरकारें विकीलीक्स के प्रति अत्यंत घृणा का भाव रखती हैं. लेकिन इसके साथ ही काफी घबराती भी हैं.

विकीलीक्स ने अन्य बातों के अलावा गोपनीयता और जानने के हक के बहस को भी एक वृहद आयाम दिया है. यदि एक तरफ बातों को गुप्त रखने का सरकारों का हक है और उसकी जरूरत है तो दूसरी ओर इन सारी बातों के आम जन के सामने आने की बात भी अपने आप में उतनी ही जरूरी है. यदि हम अपने देश का ही सन्दर्भ लें तो यहाँ यदि शासकीय गोपनीय दस्तावेजों से सम्बंधित ऑफिशिएल सीक्रेट्स एक्ट है तो आम जन को शासकीय नीतियों, रीतिओं और कृत्यों के बारे में बताये जाने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम बनाया गया है. लेकिन सूचना का अधिकार अधिनियम कई मायनों में सीमित विस्तार का है और बहुत सारी बातें इस अधिनियम की परिधि के बाहर रखी गयी हैं. ये सारी सूचनाएं इस अधिनियम की धारा आठ के अंतर्गत देश की सुरक्षा और संरक्षा, वैदेशिक नीति, वैदेशिक व्यापार, अपराध अन्वेषण आदि के नाम पर प्रतिबंधित सूचनाओं के अंतर्गत शामिल कर दी गयी हैं. फिर ऑफिशिएल सीक्रेट्स एक्ट तो है ही, जिसमें गोपनीय सूचनाओं को लीक करने पर गंभीर दंड तक का प्रावधान है. इस एक्ट का कैसे दुरूपयोग होता है, इसका एक अच्छा उदाहरण भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी आरएडब्लू के पूर्व अधिकारी मेजर जनरल वीके सिंह की पुस्तक द रा एक्सपीरिएंस के बाद भारत सरकार द्वारा उठाया गया कदम है. इस पुस्तक में इस गुप्तचर संगठन की कई सारी बुराईयों और कमियों को सामने लाया गया था और वहाँ फैले भ्रष्टाचार को प्रकट किया गया था. नतीजा यह रहा कि इन कमियों को सही ढंग से लेने की जगह सरकार ने उलटे वीके सिंह के ऊपर ही मुकदमा दर्ज कर दिया और उन्हें जेल तक जाना पड़ा.

अब यदि कोई अधिकारी अपनी ओर से आगे बढ़ कर देश और समाज के हित में वैसे तथ्य प्रस्तुत करता है, जिससे उसकी समझ में सीधा नुकसान हो रहा है, तो देश के सत्तारुढ लोग उसे तंत्र के प्रति विद्रोह के रूप में लेते हैं और तुरंत ऐसे लोगों को दबाने के काम में लग जाते हैं. कमोबेश यही बात दूसरे मामलों में भी देखा गया है. यह भी देखा जा सकता है कि ज्यादातर ऐसे मामलों में बाहर लायी जा रही सूचनाएं देश के सामान्य हित में होती हैं, जिन्हें सत्ताधारी लोग अपने निजी स्वार्थों के लिए छुपाये रखने की बात करते हैं.

इसी निगाह से विकीलीक्स जैसे मीडिया समूहों की सख्त आवश्यकता है, जो आगे बढ़ कर अपने रिस्क पर तमाम उन ख़बरों को जनता के सामने रख रही हैं जिनके कारण सरकारों के काले कारनामे और उनके नुमाइंदों के दुराचरण और कुकृत्य परदे के पीछे से निकल कर सबके सामने आ रहे हैं.

एक तरह से हम कह सकते हैं कि जिस तरह का काम भड़ास जैसे पोर्टल मीडिया से जुड़े मामलों में काम कर रहे हैं, उसी तरह से देश और शासन के स्तर पर गोपनीयता के कृत्रिम बांधों को तोड़ कर विकीलीक्स अंदर का सारा कचरा सामने रख दे रहा है जिससे हम इन अंदरूनी बातों को समझ सकें और इनके अनुसार अपने निर्णय अपने विवेकानुसार ले सकें.

मैं विकीलीक्स जैसे मीडिया चैनल को सलाम करती हूँ और आशा करती हूँ कि जल्दी ही भारत के परिप्रेक्ष्य में भी ऐसी पहल की जायेगी जिससे अंदरखाने बजबजा रही गंदगियां खुल कर सामने आ सकेंगी और इस तरह उनका सफाया करने में मदद मिलेगी.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक,

पीपल’स फोरम, लखनऊ

वे बोले- मेरे संपादकीय के खिलाफ लिखो, मैं छापूंगा

रामदत्‍त त्रिपाठी
रामदत्‍त त्रिपाठी
: इंटरव्‍यूरामदत्‍त त्रिपाठी (वरिष्ठ पत्रकार) : रामदत्त त्रिपाठी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. उत्तर प्रदेश का कोई ऐसा कोना नहीं है जहां उनके जानने-चाहने वाले लोग भारी तादाद में नही मिल जाएंगे. जिस प्रकार बीबीसी पूरे विश्व और भारत में निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए प्रसिद्ध है, उसी प्रकार लंबे समय से बीबीसी के उत्तर प्रदेश प्रभारी रामदत्त इस विशाल प्रदेश में अपनी निष्पक्ष, सारगर्भित शब्दावलियों और साफगोई के लिए जाने जाते है. पिछले दिनों उनसे पीपुल्स फोरम, लखनऊ की संपादक नूतन ठाकुर ने कई मुद्दों पर बातचीत की. पेश है कुछ अंश-

-कुछ अपने और अपने परिवार के बारे में बताएं?

मैं इलाहाबाद का रहने वाला हूँ और इलाहबाद विश्वविद्यालय से ला स्नातक हूँ. मेरी पत्नी पुष्पा भी इलाहाबाद की रहने वाली हैं और  एक गृहिणी है. मेरे दो बच्चे हैं. बड़ा बेटा अहमदाबाद के प्रतिष्ठित मैनेजमेंट कॉलेज मुद्रा इन्स्टिच्यूट ऑफ कम्‍यूनिकेशंस माइका से पढ़ कर दिल्ली में एक विज्ञापन कंपनी में मीडिया प्लानिंग का काम कर रहा है. छोटा बेटा इंजीनियर है, जो इसी साल आईआईएम रायपुर में चयनित हो कर वहाँ पढाई कर रहा है.

-आप पत्रकारिता में कैसे आये?

पत्रकारिता में! मैं तो समाज सेवा के लिए आया. मै यूनिवर्सिटी में यूथ लीडर था. (मुझे सहसा विश्वास नहीं हुआ, बोल पड़ी- यूथ लीडर) हाँ भाई, मैं जब 1972-73 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र था तो उस समय के इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कई लब्धप्रतिष्ठित और सामाजिक सरोकार वाले प्रोफेसर लोगों के संपर्क में आ गया. उनमे प्रमुख रूप गणित के प्रोफ़ेसर बनवारी लाल शर्मा, हिंदी के डाक्टर रघुवंश, कामर्स के प्रोफ़ेसर जे एस माथुर, प्राचीन इतिहास के प्रोफ़ेसर उदय प्रकाश अरोड़ा आदि शामिल थे. ये ऐसे लोग थे जो एक महान शिक्षक होने के साथ-साथ दार्शनिक, विचारक और सामाजिक संचेतना से भी भरपूर थे. इन लोगों ने एक समिति बना रखी थी जिसका नाम सर्वोदय विचार प्रचार समिति था. इस समिति की तरफ से साप्ताहिक विचार गोष्ठी होती थीं. मैं भी इस समिति की ओर आकर्षित हो गया था. यह समिति एक पाक्षिक अखबार नगर स्वराज्य छपती थी, रेलवे स्टेशन पर सर्वोदय साहित्य स्टाल चलाती थी और लोगों तक अच्छा साहित्य पहुंचाने के लिए एक सचल पुस्तकालय चलाती थी. हम जिन लोगों के घर साइकिल पर किताबें पहुचाते थे वे सब बड़े और पढ़ने लिखने वाले लोग थे. जैसे इनमें से एक रामवृक्ष मिश्र हाईकोर्ट जज थे. मैं इन सब कामों में जुटता गया और देखते ही देखते वह मेरे दूसरे घर की तरह हो गया. फिर तो मैं अपनी पढ़ाई के साथ ही उस समिति के एक प्रमुख कार्यकर्ता के रूप में भी काम करने लगा और मेरी पहचान भी बनती चली गयी. इस समिति की अध्यक्ष महादेवी वर्मा थीं, जिनकी सादगी ने मुझे बहुत प्रभावित किया. इसी बीच मेरे जीवन में जेपी का पदार्पण हुआ.

-जेपी यानी जयप्रकाश नारायण?

जी हाँ. युवा होने के नाते सर्वोदय आंदोलन की तरुण शान्ति सेना का था. बात शायद 1973 – 74  की रही होगी, जब जेपी ने देश में लोकतांत्रिक मूल्यों में गिरावट और भ्रष्टाचार पर एक लेखमाला लिखी और यूथ फॉर डेमोक्रेसी के नाम से आह्वान किया. तभी गुजरात और बिहार में छात्र आंदोलन शुरू हो गया. हम लोगों ने जून 74 में इलाहाबाद में दो दिन का छात्र युवा सम्मलेन आयोजित किया. मैं मंच संचालन कर रहा था. दो दिनों में कई बार जेपी से मिला. मैं तो पहली बार में ही उनसे प्रभावित हो गया था और उनका मुरीद हो गया था, पर कहीं ना कहीं मैंने भी शायद उन्हें प्रभावित किया होगा क्योंकि देखते ही देखते उन्होंने मुझे अपने बहुत नजदीक लोगों में स्थान देना शुरू कर दिया. जब हम रेलवे स्टेशन पर उन्हें पटना के लिए विदा कर रहे थे तो जेपी ने हम लोगों से कहा मैं तो बिहार में फंसा हूँ, यूपी आप लोग ही संभालो. इलाहाबाद में तो मैं जेपी आंदोलन का प्रमुख कार्यकर्ता हो गया. पूरे उत्तर प्रदेश के लिए जो छात्र युवा संघर्ष समिति बनी मैं उसका मेंबर बनाया गया. उसके बाद जेपी ने अपनी एक निर्दलीय छात्र युवा संघर्ष वाहिनी बनायी, जिसमें उन्होंने पांच युवा लोगों का एक कोर ग्रुप बनाया, मैं भी उसका सदस्य बना. मेरे अलावा संतोष भारतीय, जो आज एक बड़े पत्रकार हैं और संसद सदस्य भी रह चुके हैं, भी उस कोर ग्रुप में मेम्बर थे.

-उस कोर ग्रुप का क्या काम था और उस दौरान क्या-क्या गतिविधियां रहीं?

जेपी ने यह कोर ग्रुप पूरे उत्तर प्रदेश में अपने आन्दोलन के संचालन के लिए बनाया था. हमारा मुख्य कार्य पूरे प्रदेश में घूम कर हर जिले स्तर पर इस सम्पूर्ण क्रान्ति आंदोलन में सहभागिता करना भी था और इसका हाल-हुलिया लेना भी. उस दौरान सचमुच बहुत अधिक भ्रमण करना पड़ता था हम लोगों को. और वह भी लगभग बिना पैसे के. पास में शायद ही सौ-पचास रुपये हुआ करते हों. बस दो जोड़ी कपडे रहते और हम एक पहने और एक साथ लिए एक जिले से दूसरे जिले चलते ही चले जाते थे. ना जाने कितने ही जिले हमने इस अवधि में कवर किये- कितने सारे सभा, सम्मलेन, कितनी मीटिंग्स, कितने प्रेस कांफ्रेंस.

-उस समय का कोई खास वाकया?

एक वाकया मुझे अभी तक याद है. मैं बिजनौर जिले गया था. वहाँ एक परंपरा थी. वहाँ टाउन हॉल में सभा रात में खाने के बाद हुआ करती रही. मैं जिला परिषद डाक बंगले में ठहरा था. कई रोज के सफर में कपडे गंदे हो गए थे. मैंने अपने कपडे धो दिए थे और तौलिया और बनियान में आराम से बैठा हुआ था. तभी मालूम हुआ कि स्थानीय आयोजकों ने वहीं प्रेस कांफ्रेंस बुला राखी है. प्रेस वाले लोग आये हैं. समझ लीजिए कि मुझे उसी तौलिए और बनियान में ही प्रेस के सामने आना पड़ा और मैंने वैसे ही उन लोगों को इंटरव्यू दिया. कपडे सूखे तब रात में जनसभा में गया.

-जेपी आंदोलन के चलते पढ़ाई पर भी प्रभाव पड़ा?

उस समय की एक बात बताता हूँ. मैं उस दौरान ला के पहले साल में था. जेपी ने बिहार के सभी युवाओं को एक साल के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ कर सम्पूर्ण क्रान्ति और देश की सेवा में समर्पित होने का आह्वार किया था. उनके इस आह्वान की बड़ी आलोचना हुई. मैंने अपने अखबार नगर स्वराज्य में जेपी की हिमायत में लेख लिखा. इसके कुछ दिन बाद मेरे भी इम्तेहान आ गए. तब मैंने और मेरे दोस्त भारत भूषण शुक्ल ने जेपी आंदोलन में पूरी भागीदारी के लिए एक साल के लिए पढ़ाई छोड़ने का तय कर लिया. घर से ले कर बाहर तक सभी लोगों ने मुझे परीक्षा देने को कहा पर मैंने अपने आदर्शों और जेपी के प्रभाव के नाते अपनी परीक्षा नहीं दी और अपना साल बर्बाद होने दिया. नतीजा यह रहा कि मैंने अपनी परीक्षा छोड़ दी. इस तरह त्याग और बलिदान के जज्‍बे उभर आये थे उस समय के युवा वर्ग में. फिर इमरजेंसी के बाद मैंने ला की पढ़ाई पूरी की.

-कुछ और बातें उस समय की?

जी, जून 1975 में इमरजेंसी लगने के कुछ समय के अंदर ही मैं बनारस में गिरफ्तार हो गया और मीसा बंदी के रूप में अट्ठारह महीने बनारस और नैनी जेल में रहा.

-जेल में?

जी हाँ, जेल में रहा और बड़े मजे से रहा. चूँकि उस समय के आदर्श ही कुछ दूसरे थे लिहाजा जेल में रहने में कोई तकलीफ नहीं होती थी. कई सारे दूसरे लोग भी थे उस समय जेल में- वे लोग भी जो बाद में बड़े-बड़े मंत्री और नेता बने. जिस जेल में मैं था वहीँ राम नरेश यादव जी भी थे, जो आगे चल के उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री बने थे.

-फिर ये पत्रकारिता कहाँ से आ गयी?

दरअसल पत्रकारिता से मेरा लगाव पहले से था. बल्कि जिस समय यह जेपी आंदोलन चल रहा था उस समय ही मैंने सर्वोदय समिति की अपनी पत्रिका का प्रबंध संपादन और संचालन कार्य संभाला था. नगर स्वराज्य नामक यह पत्रिका काफी दिनों से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आचार्य और सर्वोदय समिति के लोग निकालते रहे थे, पर उस समय वह बस किसी तरह निकल रहा था. इसके लिए हम लोगों ने हैंड कम्पोजिंग भी सीखी. मैंने समिति के लोगों से कहा कि इसे प्रोफेशनल ढंग से निकाला जाए. जिम्मेदारी मैंने स्वयं ली. फिर मैंने उसे एक सिस्टम से निकालना शुरू कर दिया. मैंने उसके लिए एक देश सेवा प्रेस के मालिक से बात कर के वहां छपाना शुरू किया. मालिक गांधीवादी थे. उन्होंने हमको कम्पोजिंग, कागज़, छपाई आदि एडवांस देने के बंधन से मुक्त कर दिया. तय हो गया कि पैसे को ले कर कोई जल्दीबाजी नहीं रहेगी. फिर हमने इस पत्रिका का डाक से भेजने का रजिस्ट्रेशन कराया. पूरे देश में अखबार एजेंटों से संपर्क कर एजेंसी बनायी. प्रतिनिधि रखे. डाक्टर रघुवंश और प्रोफ़ेसर बनवारी लाल शर्मा जैसे लोगों के मार्गदर्शन में यह पत्रिका पूरे देश में जेपी आंदोलन के मुखपत्र के रूप में उभरी. और आप विश्वास नहीं करेंगी, उस ज़माने में हमने इसकी प्रसार संख्या आठ हज़ार तक पहुंचा दिया था. गुवाहाटी से ले कर गुजरात तक के लोग इस पत्रिका को पढ़ते और खरीदते थे. फिर कुछ विज्ञापन भी आने लगे. हम लोग जेल में थे तो पत्रिका का प्रकाशन बंद था. मार्च 1977 में जेल से बाहर आया तो मैंने सोचा कि अब जब देश में चुनाव के जरिये नयी सरकार बन गयी है अब सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन तो चल नही पायेगा. और मैं दलीय राजनीति कर पाउँगा जो आम तौर पर होती है. गांधी, विनोबा और जेपी के आदर्श रग-रग में भरे हुए थे. मैंने यही सोचा कि मैं समाज सेवा के लिए पत्रकारिता में जाऊँगा. इससे आजीविका भी चलेगी और जनसेवा का बोध भी होगा. कई बार मन में अपना ही कुछ निकालने की बात आई पर फिर सोचा कि सर्वोदय और जेपी अन्दोलन की पत्रिका निकालना दूसरी बात है और एक व्यावसायिक पत्रिका निकालना दूसरी बात. इन सब बातों को ध्यान में रख कर मेरे गुरु जी प्रोफ़ेसर बनवारी लाल शर्मा मुझे उस समय के इलाहाबाद से निकलने वाले दैनिक भारत अखबार के संपादक डाक्टर मुकुंद देव शर्मा के पास ले गए और मैंने भारत अखबार में नौकरी शुरू कर दी.

-वहाँ कब तक रहे?

मैं वहाँ पहले तो आराम से रहा, पर एक ऐसी घटना हो गयी जिसके कारण मैंने वो अखबार छोड़ दिया. बात यह हुई कि उस दौरान मैंने जनता पार्टी की सरकार के नीतियों और कार्यों की समीक्षा करते हुए लेख लिखे और उस समय के इलाहाबाद से नये निकलने वाले चर्चित अखबार अमृत प्रभात को भेज दिया. जब वे लेख वहाँ छप गए तो मेरे भारत अखबार के संपादक मुझसे खफा से हो गए और एक-आध जगह कुछ ऐसी बातें कहीं जो मुझे अच्छी नहीं लगीं. फिर मैंने वह नौकरी छोड़ दी और अमृत प्रभात के उस समय के संपादक सत्य नारायण जायसवाल जी से मिला. वे मेरे लेखनी से प्रभावित थे ही. उन्होंने एक टेस्ट लिया और उसके बाद मुझे रख लिया. वे सचमुच के संत पुरुष थे. इस समय जो हिंदुस्तान में वरिष्ठ पत्रकार रवींद्र जायसवाल हैं, इन्ही के पिता थे. एक बार की बात बताऊँ. चरण सिंह जब प्रधानमंत्री बने तो जायसवाल जी ने एक सम्पादकीय लिखा कि “यह असंवैधानिक सरकार है”, क्योंकि उनकी पार्टी को बहुमत नही है. लेख पढ़ कर मैं उनके पास पहुंचा और मैंने कहा कि संविधान और कानून की दृष्टि से आपका सम्पादकीय ठीक नही है. जरूरी नही कि प्रधानमंत्री संसद में बहुमत प्राप्त दल का ही नेता हो. कांग्रेस ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर कहा है कि वह समर्थन दे रही है. राष्ट्रपति के लिए इतना पर्याप्त है. मैं ठहरा सबसे जूनियर उपसंपादक. कोई और संपादक होता तो डांटकर भगा देता. मगर वे बोले- “ठीक है तुम मेरे ही सम्पादकीय के खिलाफ अपना लेख लिखो, मैं छापूंगा.” और उन्होंने ऐसा किया भी. इतनी डेमोक्रटिक व्यवस्था थी उस समय और ऐसे संपादक भी.

-फिर बीबीसी?

इलाहाबाद से मैं लखनऊ भेजा गया था अमृत प्रभात में और वहाँ से सन्डे मेल में गया. उसी दौराम मार्क टूली के संपर्क में आया और उन्हीं के कहने से बीबीसी में चला आया. तब से यहीं हूँ.

-समय के साथ परिवर्तन?

सबसे बड़ा परिवर्तन राजनीतिक नेताओं में हुआ है. नेता अब सुरक्षा घेरे के नाम पर आम जनता और पत्रकारों दोनों से दूर हो गए हैं. एक समय था जब बड़े नेता, मुख्यमंत्री और मंत्री किसी भी मुद्दे पर पत्रकारों के सवालों का जवाब देते थे. मैंने हिंदुस्तान के अनेक बड़े नेताओं के इंटरव्यू लिए हैं- चाहे राजीव गांधी हों, वीपी सिंह, चंद्रशेखर या वाजपेयी जी हों या आडवाणी, कल्याण सिंह या मायावती अथवा मुलायम. पर आज ये सारे नेता मीडिया से दूर होते जा रहे हैं. हर पार्टी में प्रवक्ता बैठे हैं जिन्हें पार्टी की रीति-नीति भी नही पता होती. पर मैं समझता हूँ कि शायद राजीव गांधी की हत्‍या के बाद से सारा परिदृश्य बदलता गया. उसके बाद से न केवल नेता बल्कि अफसर और दूसरे न्यूज़मेकर या समाचार स्रोत मीडिया से दूर ही होते चले गए हैं और बीच की जमीन अब नौकरशाहों और सुरक्षा वालों ने घेर लिया है.

मंजुनाथ समाज के लिए सच्‍चे आदर्श : अमिताभ ठाकुर

: पुण्‍यतिथि पर याद किए गए : इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एंड डाक्युमेंटेशन इन सोशल साईंसेज (आईआरडीएस) तथा नेशनल आरटीआई फोरम की तरफ से आईआईएम लखनऊ के पूर्व छात्र मंजुनाथ शंमुगम की याद में एक मीटिंग आयोजित की गयी. मंजुनाथ शंमुगम की हत्‍या खीरी लखीमपुर जिले में वहाँ के एक पेट्रोल पम्प मालिक ने अपने गुंडों के साथ मिलकर मात्र इसीलिए कर दिया था, क्योंकि मंजुनाथ ने उसके गलत मीटर  इस्तेमाल और मिलावटी पेट्रोल के खिलाफ कार्रवाई की थी.

यह मीटिंग आईआईएम लखनऊ के पीजीपी ब्लाक में आयोजित हुई, जिसमे मंजुनाथ शंमुगम को उनके पुण्यतिथि पर स्मरण किया गया, साथ ही मंजुनाथ को मरणोपरांत पद्म पुरस्कार से मंजुनाथ सम्मानित करने के अभियान को आगे बढाने के सम्बन्ध में भी चर्चा हुई. आईआईएम लखनऊ के छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस कार्यक्रम में शिरकत की. आईआरडीएस तथा आरटीआई फोरम के अध्यक्ष अमिताभ ठाकुर ने कहा कि मंजुनाथ आज के हमारे समाज के लिए एक सच्चे आदर्श हैं, जिन्होंने अपनी खुद की कुर्बानी दे कर पूरे समाज के समक्ष एक अद्भुत मिसाल कायम की है. उन्होंने इस बात पर भी गर्व प्रकट किया कि किस्मत से वे इन दोनों अकादमिक संस्थानों से जुड़े रहे हैं.सीसीएसआर के उत्कर्ष कुमार सिन्हा का मानना था कि एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में वे पाते है कि मंजुनाथ को सरकारी तंत्र से वह सम्मान नहीं मिला जो उन्हें मिलना चाहिए था.

आरटीआई कार्यकत्री डॉ नूतन ठाकुर का कहना था कि उनकी संस्था मंजुनाथ तथा आईआईटी कानपुर के सत्येन्द्र नाथ दुबे, जिनकी हत्या भी इसी प्रकार के कारणों से तब कर दी गयी थी जब वे नेशनल हाईवे ऑथोरिटी में कार्यरत थे, को सरकार द्वारा उच्च श्रेणी के पद्म पुरस्कार दिये जाने की मांग के अपने अभियान को निरंतर जारी रखेगी. उन्होंने बताया कि इस कार्य हेतु आईआरडीएस तथा आरटीआई फोरम की तरफ से राष्ट्रपति से ले कर कैबिनेट सचिव, गृह सचिव तक सभी सम्बंधित को कई पत्र भेजे गए हैं. इसके अलावा जनजागरण हेतु इन्टरनेट का भी भारी सहारा लिया गया है तथा फेसबुक जैसे सोशल नेट्वोर्किंग साइट और ऑनलाइन पेटीशन से हज़ारों लोग इस अभियान में शामिल हो चुके हैं.

मानवाधिकार कार्यकर्ता आशीष अवस्थी का मानना था कि मंजुनाथ और सत्येन्द्र आम आईआईएम और आईआईटी वालों से अलग थे और वे इस रूप में इनका सम्मान मन से करते हैं. वे लोग पूंजीवादी व्यवस्था के अनुरूप नहीं थे और इसीलिए मार दिए गए. कक्षा नौ के छात्र आदित्य और कक्षा ग्यारह की छात्रा तनया ने मंजुनाथ की याद में स्वरचित कवितायें प्रस्तुत की. अग्रणी संस्था के अनुपम पाण्डेय, जेएन डिग्री कॉलेज के मनोज पाण्डेय तथा आईआईएम लखनऊ के विशाल गुप्ता, शुशोवन नायक, यतीन्द्र कटारिया आदि छात्रों ने इस कार्यक्रम में शिरकत की. अंत में यह निर्णय लिया गया कि यह अभियान मंजुनाथ और सत्येन्द्र को पद्म पुरस्कार दिए जाने तक लगातार जारी रहेगा.

सरकार की दुनिया : बड़े साहब की जांच करेंगे छोटे साहब

नूतन : मुख्‍य सूचना आयुक्‍त के खिलाफ इंक्‍वायरी करेंगे सूचना सचिव :  मेरे द्वारा दिनांक 10 जून 2010 को उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को एक पत्र प्रेषित किया गया था, जिसमे मुख्य सूचना आयुक्त, उत्तर प्रदेश रंजित सिंह पंकज द्वारा मुरादाबाद निवासी पवन अग्रवाल के साथ अपील संख्या एस 1-16 सी/2009 तथा अपील संख्या एस 1-750 सी/2009 में निर्णय पारित करते समय कथित तौर पर दुर्व्यवहार की शिकायत प्रस्तुत करते हुए इस सम्बन्ध में जांच कराने की मांग की गयी थी.

उस शिकायत पर अब तक तो शायद कोई भी कार्रवाई नहीं हुयी है, पर मुझे उत्तर प्रदेश शासन के प्रशासनिक सुधार विभाग का एक पत्र दिनांक 02 नवम्बर 2010 अवश्य प्राप्त हुआ है. यह पत्र विभाग के अनु सचिव रामचंद्र यादव द्वारा हस्ताक्षरित है और इनमे कहा गया है कि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अंतर्गत राज्य सूचना आयोग के समक्ष विचाराधीन वादों में आयोग द्वारा पारित आदेशों में राज्य सरकार को हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है. अतः इन सम्बन्ध में राज्य सूचना आयोग को कोई निर्देश नहीं दिया जा सकता. साथ में यह भी कहा गया है कि यदि प्रार्थिनी यानी कि मैं आयोग के आदेश से क्षुब्ध हूँ तो सक्षम फोरम पर जाऊं. इतना कह कर मेरे द्वारा प्रेषित शिकायती प्रार्थना पत्र राज्य सूचना आयोग के सचिव के पास आवश्यक कार्यवाही हेतु भेज दिया गया है.

मुझे राज्य सूचना आयोग के किसी निर्णय से शिकायत नहीं थी और न ही मैंने आयोग के किसी निर्णय में शासन को हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था. मैंने तो मुख्य सूचना आयुक्त के कथित दुर्व्यवहार के विरुद्ध को राज्यपाल को शिकायत की थी और उनमे कोई जांच नहीं हो कर पत्र घूम कर उसी आयोग के सचिव के पास भेज दी गयी है. यह समझना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं है कि आयोग के सचिव अपने ही मुख्य सूचना आयुक्त के विरुद्ध क्या जांच कर सकते हैं. अब मैंने आज पुनः राज्यपाल को पत्र लिख कर इस सम्बन्ध में तथ्यों से अवगत कराते हुए उस पत्र पर अपने स्तर से जांच कराने का अनुरोध किया है.

डा. नूतन ठाकुर

कन्‍वीनर

नेशनल आरटीआई फोरम

विराम खंड, लखनऊ.

‘इस दाल में कुछ काला है’

नूतन इन दिनों लखनऊ में एक मामला काफी चर्चा में है. ऊपर से तो मामला छोटा सा ही नज़र आता है- चोरी का, पर अंदरखाने बात कुछ ज्यादा ही गंभीर दिख रही है. ये हम सभी जानते हैं कि पुलिस वाले ज्यादातर चोरी के मुक़दमे लिखते ही नहीं और बड़ी मुश्किल से यदि लिख भी दें, तो उनमें चीज़ों और रुपये की बरामदगी लगभग नहीं के बराबर होती है. ऐसे भी वे लोग चोरी के मामलों को बहुत ही हल्‍की निगाह से देखते हैं. इसमें उन्हें कुछ खास सनसनी फैलने वाली बात नहीं नज़र आती.

पर इस बार चोरी ऐसी हुई है और उस जगह हुई है कि पूरा पुलिस महकमा इस बात को ले कर हैरान-परेशान है. फिर इस मामले में घटना घटने का समय भी काफी महत्वपूर्ण है. दरअसल हुआ यह है कि लखनऊ में एसएसपी के सरकारी आवास पर ही चोरी हो गयी है. जी हाँ, खुद एसएसपी के घर, जिसकी जिम्मेदारी होती है पूरे जिले के अपराध पर नियंत्रण की. ऐसे में खुद उन्हीं के घर में चोरी की घटना घट जाना ही अपने आप में चिंतनीय है. लेकिन पूरी बात यहीं खत्म नहीं हुई. चोरी मामूली धनराशि की नहीं थी- पूरे दस लाख रुपये चोरी गए बताए जा रहे हैं. जी हाँ, दस लाख रुपये. कहा यह जा रहा है कि ये रुपये एसएसपी के स्टेनो की आलमारी में रखे थे जहां से वे गायब हो गए. आलमारी का ताला टूटा नहीं, बस किसी ने खोल कर दस लाख रुपये निकाल लिए. यह भी कहा जा रहा है कि इस मामले में इतनी बड़ी रकम चोरी होने के बावजूद पुलिसवालों का पहला प्रयास यह था कि मामले को दबा दिया जाए.

आखिर क्या बात थी कि जिस रकम के चोरी हो जाने पर बाकी दुनिया हाय-तौबा मचाने लगती है, उसमें लखनऊ पुलिस के अधिकारी उसे चुपचाप दबाने में लग गए थे? क्या उन लोगों के पास पैसे ज्यादा हो गए हैं या ये कोई ऐसा पैसा था जिसकी चर्चा ठीक नहीं रहती? वो कौन सी बात थी जिसके कारण पुलिस के लोग, और खुद एसएसपी और उनके शेष अधिकारी इस मामले में तुरंत सक्रिय न हो कर शान्ति की मुद्रा में चले आये और सब ने मौन धारण कर लिया. इन सारी बातों से शक तो पैदा होता ही है. क्योंकि यह बात तो नहीं मानी जा सकती कि बाकी सारे लोगों जैसे ही पुलिस ने एसएसपी आवास में हुई चोरी पर भी मुक़दमा लिखने से इनकार कर दिया. ठीक है कि पुलिस में भी गलत-सही बहुत होता है और पुलिस के अफसरों का इकबाल घटा है, पर यह बात नहीं मानी जा सकती कि हालात ऐसे हो गए हैं जो खुद एसएसपी के घर में हुई चोरी का मुकदमा नहीं लिखा जा सके. फिर क्यों इस भीषण और बड़ी चोरी के मामले में मुकदमा लिखने में देर हुई?

इसके साथ ही एक और सोचने वाली बात यह है कि यह चोरी ठीक इसी दिन हुई जिस दिन लखनऊ के पुराने एसएसपी राजीव कृष्ण का ट्रांसफर हो गया था और अभी आवास पर नए एसएसपी डी के ठाकुर नहीं आये थे. और पैसा भी था उनके ही स्टेनो सरोज वर्मा के आलमारी में. अब कई कहने वाले तरह-तरह से बातें कह रहे हैं- कुछ पैसे के लेने-देने की बातें, कुछ नीयत में आ गयी खोट के बारे में और कुछ दूसरी और ही तरह की चर्चाएं. अब सच क्या है यह तो अभी तक कोई नहीं जानता और शायद इस पर से पर्दा कभी नहीं उठ सके, क्योंकि पुलिस की ये गहरी बातें क्या उजागर हो सकती हैं जब पूरा महकमा ही उसे दबाने पर लग जाएगा.

ये अलग बात है कि इस बात के आम चर्चा में आने पर अंत में झक मार पर पुलिस को इसमें मुकदम भी लिखना पड़ा. एक और मजेदार बात कि इस प्रकरण में अब तक और कोई कार्रवाई नहीं करके एसएसपी के स्टेनो को एसएसपी आवास से फिलहाल ट्रांसफर कर दिया गया है और ये कहानी सामने ला दी गयी है कि वह पैसा वर्मा के एक मित्र एन पी सिंह का था, जो उन्हें किसी जमीन के बेचने के बाद मिला था. लेकिन कोई भी आदमी यह बात नहीं मान रहा है. हर आदमी का यही सवाल है कि सिंह साहब इतने बेवकूफ थोड़े ही होंगे कि अपना पैसा किसी तीसरे आदमी के पास यूँ ही छोड़ देंगे. बस एक ही मुहावरा हर कोई दोहरा रहा है- “दाल में कुछ काला है” पर यह काली दाल कब पक कर सबके सामने आएगी या फिर आएगी भी या नहीं, यह अपने आप में एक बड़ा राज़ है.

हाँ, इतना जरूर है कि लखनऊ के तमाम बड़े-छोटे पत्रकार इस राज़ के तह में जा कर पर्दाफ़ाश करने में अपनी ओर जुट गए हैं. देखना यह है कि इस खेल में पत्रकार जीतते हैं या फिर पुलिस वाले.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

यशवंत जी, ये आपका निजी मामला नहीं है

नूतन ठाकुर ये हम सभी जान रहे हैं कि यशवंत जी की मां श्रीमती यमुना सिंह, चाची श्रीमती रीता सिंह और चचेरे भाई की पत्नी श्रीमती सीमा सिंह को दिनांक  12-10-2010 को रात में लगभग नौ बजे गाजीपुर जिले के नंदगंज थाने की पुलिस ने उनके गाँव अलीपुर बनगांवा से जबरन उठा लिया.

अब तक जो बातें आई हैं उनके अनुसार ऐसा खुद गाजीपुर के पुलिस अधीक्षक तथा लखनऊ में प्रदेश पुलिस के अन्य उच्चाधिकारियों के निर्देश पर ऐसा हुआ. कारण यह बताया गया कि उनके गाँव में ही उस दिन शमशेर सिंह की हत्या में नामजद अभियुक्तों की गिरफ्तारी नहीं हो सकने के कारण इन महिलाओं को दवाब बनाने के लिए थाने ले जाना पड़ रहा है. जितने भी सबूत सामने आये हैं उनसे यह साफ है कि इन तीनों महिलाओं को नंदगंज की पुलिस ने रात भर थाने में बंधक बनाए रखा.

शायद यशवंत जी ने भी इस सम्बन्ध में तुरंत लखनऊ व गाजीपुर के मीडिया के अपने वरिष्ठ साथियों और खुद गाजीपुर से ले कर वाराणसी तक के पुलिस अफसरों से संपर्क किया और उनसे अपनी माँ को थाने से मुक्त कराने का निवेदन किया. सभी जगहों पर पुलिस से एक ही जवाब मिला कि हत्या का मामला है, हत्यारोपी का सरेंडर कराओ तो महिलाएं छोड़ दी जाएंगी वरना थाने में ही बंधक बनाकर रखी जाएंगी. नीचे के अधिकारियों ने यह भी कहा कि यह प्रकरण ऊपर से देखा जा रहा है, शासन का बहुत दवाब है और स्वयं पुलिस महानिदेशक इस मामले को देख रहे हैं, इसीलिए उनके स्तर से कोई भी मदद संभव नहीं है. लखनऊ भी बात हुई पर हर जगह मुलजिम गिरफ्तार होने पर ही मदद करने की बात कही गयी.

यशवंत जी ने इसी बीच एक काम जरूर अच्छा किया कि कुछ पत्रकार मित्रों से अनुरोध कर के महिलाओं को थाने में बंधक बनाकर रखे जाने के प्रकरण का वीडियो बनवा लिया और फोटो भी ले लिया ताकि इस मामले में कल के लिए सबूत रहे. अंत में इन लोगों को अगले दिन दोपहर बाद करीब एक या दो बजे तभी छोड़ा गया जब एक आरोपी ने अचानक थाने पहुंचकर सरेंडर कर दिया.

यशवंत जी ने इस बात को अपने स्वयं के मामले के रूप में नहीं पर एक वृहद सामाजिक प्रश्न के रूप में सामने लाने का बीड़ा उठाया. उन्होंने अपने स्वयं और अपने परिवार पर इस प्रकरण के द्वारा होने वाले तमाम खतरों को दरकिनार करते हुए इस सम्बन्ध में एक अभियान सा चलाया और हमारे जैसे न जाने कितने ही लोग उनके इस अभियान के साथी बने. क्योंकि उनका यह अभियान उनके स्वयं का निजी अभियान नहीं था, पूरी व्यवस्था से जुड़ा एक अभियान था, जहां उन्होंने आम आदमी की आवाज को सामने लाने और जान-बूझ कर पुलिस द्वारा गलत और अवैध काम करने पर जिम्मेदारी नियत करने और न्याय करने की बात कही थी.

हम सब लोग बहुत प्रसन्न थे कि इससे न सिर्फ यशवंत जी के मामले में न्याय होगा बल्कि शासन और प्रशासन इसे एक मिसाल के तौर पर लेते हुए अन्य तमाम मामलों में भी कुछ इस प्रकार के निर्देश जारी करेगी और उनका अनुपालन कराएगी जिससे महिलाओं से संबंधित कानूनों का पूरी तरह वास्तविक अनुपालन सुनिश्चित हो सके. हम सभी जानते हैं कि महिलाओं को किसी भी कीमत में थाने पर अकारण नहीं लाया जा सकता है. उनकी गिरफ्तारी के समय और थाने में रहने के दौरान महिला पुलिसकर्मियों का रहना अनिवार्य है. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 160 के अनुसार उन्हें पूछताछ तक के लिए थाने नहीं ला सकते.

फिर इस मामले में करना ही क्या था? पूरे साक्ष्य थे- हर तरह के मौखिक और अभिलेखीय साक्ष्य. उन महिलाओं के थाने में रखे जाने के फोटो हैं, वीडियो है, मौखिक यह बात कहने वाले लोग हैं. स्वयं वे महिलायें यह बात कह रही हैं. पर फिर भी कार्रवाई के नाम पर सिफर. लखनऊ में प्रदेश के सारे वरिष्ठ पत्रकारों ने यह बात गृह सचिव और अपर पुलिस महानिदेशक के सामने रखी और उन्होंने कार्यवाही करने का आश्वासन दिया. उम्मीद बढ़ी. फिर दिखाने को कोई पुलिस का अधिकारी जांच करने उस गाँव भी गया था और तब उम्मीद और बढ़ी थी कि अब कुछ न्याय होगा.

पर वो दिन है और आज का दिन है. कुछ भी नहीं किया गया. न्याय का सरे-आम गला घोटने पर कोई कार्रवाई नहीं. गैर-कानूनी काम करने की पूरी छूट और आजादी. यानी कि वास्तव में राम-राज्य.

यशवंत जी ने इस व्यवस्था को देखते हुए और यह सोच कर कि लोग यह न समझ लें कि वे पोर्टल को अपने निजी मामलों के लिए प्रयोग कर रहे हैं इस अभियान को समाप्त कर दिया. उन्होंने लिखा- “यही सच है. बिना न्याय मिले अभियान खत्म. हर दरवाजे खटखटा लिए. सबको मेल भेज दिया. सब तक घटनाक्रम की जानकारी पहुंचा दी. पर हुआ कुछ नहीं.” उन्होंने कारण भी बता दिया- “माया सरकार के नेता कान में तेल डाले मस्त है. सत्ता द्वारा संरक्षित व पोषित अधिकारी विवेकहीन व तानाशाह हो चुके हैं. सो, वे दोषी भी हों तो उनका बाल बांका हो नहीं सकता, और वे अपने दोषी अधीनस्थों का बाल बांका करेंगे नहीं.”

यशवंत जी का दर्द इन बातों में साफ़ झलक रहा है- “मैं मां के अपमान को भूल नहीं सका हूं और न भुलूंगा, सो मुझे कैसे रिएक्ट करना है, क्या करना है, कहां कहां जाना है या नहीं जाना है, ये अब मैं निजी तौर पर तय करूंगा. इसमें अब किसी की सहभागिता नहीं चाहता. जो कुछ गिने-चुने लोग इस प्रकरण को लेकर मेरे साथ सक्रिय हैं, उनके संपर्क में रहते हुए मामले को यह मानते हुए आगे बढ़ाऊंगा कि यह लंबी व थका देने वाली न्याय की लड़ाई है, एक दिन में या एक महीने में कुछ नहीं होना.”

मैंने तब भी कहा था और आज भी यशवंत जी से कहूँगी कि “ये अभियान नहीं रुकेगा, किसी भी कीमत पर नहीं रुकेगा. आप ने अपनी तरफ से रोक भले दिया हो पर हम लोग इसे सही नहीं मान रहे हैं. “ कारण भी बहुत साफ़ है. ये अभियान अब उनका नहीं है, हम सबों का है. यह लड़ाई न्याय के लिए लड़ाई है, लंबी हो सकती है, उबाऊ भी, कठिन भी और शायद खतरनाक भी. हम लोगों को झेलना भी पड़ेगा पर लड़ाई तो अब तभी खत्म होगी जब या तो न्याय होगा या हम लोग उस स्थिति में पहुंच जायेंगे जब हम लोग और अधिक लड़ाई के लायक ही नहीं रहें.

अपने पति के अध्ययन अवकाश की लंबी और थकाने वाली लड़ाई को लड़ने में मैंने उनका साथ दिया और इस बात से खुश हूँ कि हार मानने के स्थान पर उन्होंने लड़ना उचित समझा. अब इसी बात पर पुस्तक भी लिख रही हूँ और हम इस लड़ाई को अंत तक लड़ेंगे.

मेरी निगाहों में ये छोटी-छोटी लड़ाईयां एक व्यक्ति की निजी लड़ाईयां नहीं हैं- ये व्यवस्था से जुड़ी और व्यवस्था को नए राह पर ले जाने की कोशिश के बड़े-बड़े स्तंभ के रूप में हैं. और सब से बढ़ कर यह कि हममें से हर आदमी के लिए जरूरी है कि ऐसी हर लड़ाई लडें जो कहीं ना कहीं अन्याय और मनमानेपन का विरोध करती हों.

मैं जानती हूँ कि यशवंत जी तो माँ के न्याय को बंद नहीं करेंगे पर यह भी चाहूंगी कि उनकी लड़ाई में हम में से हर आदमी अपना उतना ही योगदान दे जितना वो अपने मामले में करता. नहीं तो आज यशवंत जी की तो कल मेरी और आपकी बारी है.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक

पीपु्ल्स फोरम, लखनऊ

बिजनेस वर्ल्‍ड पत्रिका पर मुकदमा

: आईआरडीएस की सचिव डा. नूतन ठाकुर ने दायर किया : पत्रिका में छपे एक लेख से चरित्र हनन का आरोप : आनंद कुमार, संस्थापक, सुपर 30, पटना के विरुद्ध नयी दिल्ली से प्रकाशित बिजिनेस वर्ल्ड नामक पत्रिका के अक्टूबर प्रथम अंक में, जो 11 अक्टूबर 2010 को प्रकाशित हुआ था “Super 30: True Or False? The success story that got Anand Kumar much fame now has many holes” अर्थात “सुपर 30: सत्य या असत्य? आनंद कुमार को असीम लोकप्रियता दिलाने वाली सफलता की कहानी में कई सारे छेद हैं” नामक एक लेख प्रकाशित हुआ. उक्त लेख की लेखिका शालिनी एस शर्मा हैं.

इस लेख में यह कहा गया था कि यदि सतह को तनिक भी खुरचा जाए तो आनंद कुमार की कहानी में कई सारे छेद नज़र आयेंगे, और कई सारे आधे-अधूरे सच भी. सुपर 30 वह नहीं है जो वह दिखता है. यह भी आरोप लगाया गया था कि आनंद कुमार द्वारा तीस में से तीस गरीब बच्‍चों को आईआईटी भेजने का उनका दावा गलत है. उस लेख में यह भी कहा गया है कि कुमार उन 30 लड़कों का नाम उजागर नहीं करते.

लेख में यह आरोप लगाया गया है कि चूंकि उनके द्वारा सुपर 30 के अलावा रामानुजम स्कूल ऑफ मैथेमेटिक्स में भी हज़ारों ऐसे बच्चे पढ़ रहे हैं, जो पैसे दे कर अध्ययन कर रहे हैं. अतः आईआईटी में स्थान पा लेने वाले वे तथाकथित सुपर 30 वास्तव में ऐसे बच्चे हो सकते हैं, जिन्हें कुमार रामानुजम स्कूल ऑफ मैथेमेटिक्स में पढ़ाया हो. लेखिका का आरोप है कि इस प्रकार कुमार सुपर 30 और रामानुजम स्कूल ऑफ मैथेमेटिक्स को चतुराई से मिला देते हों.

इसके लिए लेखिका ने कंकड़बाग कॉलोनी, पटना के संजीव कुमार, जिन्होंने आईआईटी में 1725 वां स्थान पाया और कोमल अग्रवाल, पटना नामक दो लड़कों के नाम भी गिनाए हैं, किन्तु सुपर 30 से जुड़े लोगों से हुयी डा. नूतन ठाकुर की वार्ता के अनुसार तथ्यों को गलत ढंग से प्रस्तुत किया गया है. इस लेख के अनुसार वर्ष 2000 में अभयानंद नामक एक 1977 बैच के आईपीएस अधिकारी के साथ मिल कर आनंद कुमार ने सुपर 30 का आइडिया शुरू किया था. लेकिन 2007 में अभयानंद आनंद कुमार से अलग हो गए क्योंकि तब तक स्थिति काफी बिगड चुकी थी.

लेख के अनुसार अभयानंद के जाने के बाद आज सुपर 30 केवल नाम के लिए बचा है, जिसका उपयोग रामानुजम स्कूल ऑफ मैथेमेटिक्स के लिए बच्चे बढ़ाने के मुखौटे के रूप में किया जाता है. लेखिका के अनुसार- “ऐसा लगता है कि स्वयं कुमार भी यह बात जान चुके हैं कि उनका यह बुलबुला बहुत जल्द ही फूटने वाला है और वे सुपर 30 को समेट कर किसी सुरक्षित रास्ते को तलाशने में लग गए हैं.”

संस्था इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एंड डोक्यूमेंटेशन इन सोशल साइंसेस (आईआरडीएस) द्वारा आईआरडीएस पुरस्कार 2010 के नाम से शिक्षा कार्यों हेतु एस रामानुजम पुरस्कार आनंद कुमार को 24 जुलाई 2010 को प्रदान किया गया था. आईआरडीएस संस्था की सचिव की हैसियत से और व्यक्तिगत रूप से प्रभावित होने के आधार पर डा. नूतन ठाकुर ने प्रथमदृष्टया इन तमाम असत्य, भ्रामक तथा हानिपरक बातों को बिना किसी भी आधार के लिखे जाने के आधार पर शालिनी एस शर्मा द्वारा आनंद कुमार को जान-बूझ कर नुकसान पहुचाने के उद्देश्य से उनका चरित्र हनन के आरोप में धारा 500, भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ के कोर्ट में धारा 200, दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के अनुसार परिवाद दायर किया है. परिवाद उनके अधिवक्ता अभय कुमार सिंह द्वारा दायर किया गया है.

साथ ही डा. नूतन ठाकुर ने आनंद कुमार को पत्र लिख कर इस सम्बन्ध में सबों के सामने स्थिति स्पष्ट करने और अपने विरुद्ध इस लेख में लगाए गए आरोपों का समुचित जवाब देने का भी निवेदन किया है. उन्‍होंने कहा है कि आनंद कुमार ने अपने कार्यों से जनता में बहुत अधित आशाएं जाग्रत की हैं और ऐसे में उनसे यह अपेक्षित है कि उन पर लगे आरोपों को वे अपनी ओर साफ़ करें.

शराबी-कबाबी प्रत्याशी और हरिवंश राय बच्चन

क्या उत्तर प्रदेश में इन दिनों हो रहे पंचायतों के चुनावों में तमाम शराबी-कबाबी प्रत्याशी और अमरकृति “मधुशाला” के रचयिता हरिवंश राय बच्चन में कोई कामन प्लेटफ़ॉर्म भी है?  कल बहराइच (यूपी)  के एक फ्रीलांस जर्नलिस्ट व सोशल एक्टिविस्ट हरिशंकर शाही का जो मेल मिला उससे तो कुछ ऐसा ही जान पड़ता है. उन्होंने अपने मेल में लिखा कि “समाचार पत्र हिंदुस्तान के लखनऊ से प्रकाशित बहराइच संस्करण में डा. हरिबंश राय बच्चन कि रचना मधुशाला की पंक्तियों का बहुत अभद्र प्रयोग हुआ है.”  उनका यह अनुरोध था कि- “कृपया मदद करें साहित्य का मजाक ना बनने दें.”

इस पर मैंने उन्हें पूरे विषय वस्तु तथा उस खबर से अवगत कराने को कहा. हरिशंकर शाही ने इसके जवाब में समाचार पत्र में छपी वह खबर और इसके साथ एक स्वयं का मेल भेजा है जिसमे उन्होंने अपनी व्यथा सुनाई है. उनका मुख्य रूप से यह कहना है कि जिस प्रकार से मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन की बहुप्रशंसित “मधुशाला” की पंक्तियों का उद्धरण जिले के शराबियों और मवालियों से तुलना करने के लिए किया गया है वह उचित नहीं है और साहित्य की मर्यादा के साथ सीधा छेड़-छाड़ है. वे इस बात से गहरे आहत हैं कि जिस मधुशाला की रचना बच्चन ने जीवन के गूढ़-गंभीर सिद्धांतों को प्रतिपादित करने, समाज के महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर खोजने और दार्शनिक अनुसंधान के लिए किया था, ये पत्रकार महोदय उसका प्रयोग तमाम शराबी और कबाबी पंचायत के प्रत्याशियों के सम्बन्ध में कर रहे हैं. हरिशंकर द्वारा उठाई गई बात से कई लोगों की असहमति हो सकती है फिर भी उनके द्वारा उठाई गयी बात सुनने-समझने लायक तो है ही.

डॉ. नूतन ठाकुर

सम्पादक, पीपुल्स फोरम, लखनऊ



हिन्दुस्तान अखबार का वैचारिक दिवालियापन

हरिशंकर शाही

पत्रकारिता के क्षेत्र में अब दिनोदिन नये नये गिरावटों का पता चलता रहता है। इन सब चीजों से दुःख भी होता है, और क्रोध भी आता है। पहले अधिकतर पत्रकार साहित्यकार होते थे, व्यंग्यकार होते थे। पत्रकारिता में आये गिरावट से पत्रकार अब केवल भाट कलमकार बनकर रह गये हैं। पत्रकारों ने साहित्य की क्या दुर्गति कर दी है इसका एक उदाहरण उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से प्रकाशित हो रहे बडे़ समाचार पत्र हिन्दुस्तान के बहराइच संस्करण के 29 सितंबर को प्रकाशित अंक के तीसरे पन्ने पर दर्ज है। इस पन्ने पर एक तहसील स्तर के पत्रकार का लेख पंचायत चुनावों में बंट रही शराब को लेकर छपा है। इस लेख में मशहूर कवि साहित्यकार डा. हरिबंश राय बच्चन की मधुशाला की पंक्तियों का ऐसा अभद्र  उपयोग किया गया है, जिससे हर पढने में रुचि रखने वाले को शर्म आ जाये।

अपने प्रस्तावना में ही इस लेख में यह लिखा है-‘‘ बच्चन की मधुशाला की पंक्तिया चरितार्थ कर रहा पंचायत चुनाव का नजारा’’।  डा. हरिबंश राय बच्चन ने जब मधुशाला लिखी होगी तब उन्होंने भी नहीं सोचा था कि उनकी यह अमूल्य कृति एक दिन उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव में शराब बंटवाने की प्रेरणा स्रोत बन जायेगी। पत्रकार ने जिस साहित्यिक अंदाज में बच्चन जी का मजाक उड़ाया वह पत्रकारिता में आयी जड़ता का द्योतक बन गया है। आगे इसमें मधुशाला की पंक्तियों का प्रयोग होता है- ‘‘यज्ञ अग्नि सी धधक रही है। मधु की भट्ठी की ज्वाला। मुनि सा ध्यान लगा बैठा है। हर मदिरा पीने वाला।।’’ अब इन पंक्तियों का भाव तो विद्वान करेंगे सो तो करेंगें, इसका भाव सामान्य व्यक्ति भी यह नहीं निकाल सकता है जो इस लेख में निकाला गया है। अब इस लेख में इन पंक्तियों का भावार्थ देखकर हिन्दुस्तान अखबार के वैचारिक दिवालियेपन का पता चलता है- ‘‘कवि हरवंश राय बच्चन की मधुशाला की यह लाइने पंचायत चुनाव पर बिल्कुल सटीक साबित हो रही हैं। मदिरा के शौकीन लोग शाम ढलते ही प्रत्याशियों की तलाश में जुट जाते हैं और इनके मिलते ही शुरू होती है प्रत्याशियों को रिझाने की गुणा और गणित।’’

यह लेख जहां कवि बच्चन की कविता का अपमान करती है, वहीं यह अखबार के कार्यप्रणाली को भी दर्शाती है और इसके कर्मचारियों के बौद्धिक स्तर को भी। आश्चर्य यह होता है कि अखबारों में समाचार के लिए हर स्तर पर जांच की व्यवस्था होती है। यह समाचार जिला कार्यालय फिर समाचार डेस्क और प्रूफ रीडिंग से भी पास होता हुआ छप भी गया। इस प्रकार के कृत्य की भर्त्सना होनी चाहिए। आश्चर्य की बात है कि इस प्रकार का कार्य ऐसे समूह के अखबार द्वारा किया गया जिसके पास स्वयं साहित्यिक पत्रिका ”कादम्बिनी” है।

हिंदुस्तान में प्रकाशित मूल खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें… शाम होते ही मतदाताओं को तलाशते हैं मदिरा के शौकीन

फोटो जर्नलिस्ट राजेश ने ललित भनोट पर लगाया धोखाधड़ी का आरोप

कॉमनवेल्‍थ: मुकदमा दर्ज करने के लिए थाने में दी तहरीर : उत्‍तर मध्‍य सांस्‍कृतिक केन्‍द्र, इलाहाबाद के निदेशक के खिलाफ भी शिकायत : पहले से ही विवादित रहे कॉमनवेल्‍थ आर्गेनाइजिंग कमेटी पर एक और आरोप लगा है. यह आरोप लगाया है इलाहाबाद के फोटो जर्नलिस्‍ट राजेश कुमार सिंह ने. राजेश ने इलाहाबाद के सिविल लाइंस में दिए गए तहरीर में आरोप लगाया कि उनके साथ धोखाधड़ी की गई है.

उन्‍होंने इसके लिए उत्‍तर मध्‍य क्षेत्र सांस्‍कृतिक केन्‍द्र, इलाहाबाद के निदेशक आनंद वर्धन शुक्‍ल एवं कॉमनवेल्‍थ आर्गेनाइजिंग कमेटी के चेयरमैन ललित भनोट के खिलाफ तहरीर दिया है तथा दोनों पर उनके द्वारा खीची गई फोटोग्राफ्स का बिना उनकी अनुमति एवं धोखे से इस्‍तेमाल करने का आरोप लगाया है.जानकारी के अनुसार राजेश सिंह से उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र इलाहाबाद के निदेशक आनंद वर्धन शुक्ल, जो मूल रूप से राजस्थान के आईपीएस अधिकारी हैं, ने जुलाई 2009 में यूनिसेफ के फ़्रांस में हो रहे एक समारोह के लिए कई सारे फोटोग्राफ खिंचवाने का कांट्रैक्‍ट दिया.

आनंद वर्धन शुक्ल ने उक्त फोटोग्राफ का अपने उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के प्रचार-प्रसार के लिए अनुबंध किया था. इन फोटो का कांट्रैक्‍ट के टर्म कंडीशन के अतिरिक्त किसी भी अन्य प्रकार से उपयोग नहीं किया जाना चाहिए था. लेकिन बाद में जब राजेश कुमार सिंह 12/08/2010 को इलाहाबद से दिल्‍ली जाने के लिए स्‍टेशन पहुंचे तो इलाहाबाद स्‍टेशन पर उनके द्वारा खींचे गए एक फोटो पर नजर पड़ी. ये फोटो कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए लगाए गए एक पोस्टर पर नज़र आया.

उन्होंने जब इसे और गौर से देखा तो उन्हें  पोस्टर में अपना नाम कहीं भी नहीं दिखा. इसके बाद राजेश समझ गए कि उनके साथ धोखाधड़ी की गयी है. और उनके द्वारा लिए गए फोटोग्राफ्स का गलत इस्‍तेमाल लाभ कमाने के लिए उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, इलाहाबाद के निदेशक आनंद वर्धन शुक्ल और कॉमनवेल्थ गेम्स ओर्गेनाइजिंग कमिटी के डाइरेक्‍टर जनरल तथा सचिव ललित भनोट ने मिल कर किया है. यह सीधे-सीधे बौद्धिक सम्पदा के नियमों का खुला उल्लंघन था. साथ ही यह कॉपीराइट एक्ट के नियमों का भी उल्लंघन है.

27/08/2010 को जब राजेश सिंह नई दिल्‍ली से आकर उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, इलाहाबाद के कार्यालय में पहुंच कर इस सम्बन्ध में जानकारी लेनी चाही तो यहां के लोगों ने इस बारे में पूरी अनभिज्ञता जताई. ज्‍यादा पूछताछ करने पर वहां मौजूद अधिकारियों ने पहले राजेश को डराने-धमकाने का प्रयास किया, लेकिन जब राजेश नहीं माने तो उन्हें काम दिलाने का लालच दिया गया. राजेश सिंह इस बात से संतुष्ट नहीं हुए.

इस मामले में कोई अन्‍य विकल्प ना होने के चलते राजेश ने 18/10/2010 को प्रभारी निरीक्षक,  थाना सिविल लाइंस, इलाहाबाद को एक लिखित तहरीर दी. जिसमे उन्होंने उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र इलाहाबाद के निदेशक आनंद वर्धन शुक्ल तथा कॉमनवेल्थ गेम्स ओर्गेनाइज़िन्ग कमिटी के डाइरेक्टर जेनेरल तथा सचिव ललित भनोट के खिलाफ उचित धाराओं में मुकदमा दर्ज करने का अनुरोध किया है. अभी तक पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं किया है. इस मामले में पूछे जाने पर राजेश सिंह ने उनके साथ हुए धोखाधड़ी पर कड़ी आपत्ति जताई और न्याय के लिए अंत तक संघर्ष करने की बात कही.

राजेश द्वारा सिविल लाइंस थाना, इलाहाबाद में दी गई तहरीर नीचे है.

लखनऊ से डा. नूतन ठाकुर की रिपोर्ट


सेवा में,

प्रभारी निरीक्षक

थाना सिविल लाइन्‍स, इलाहाबाद.

महोदय,

प्रार्थी राजेश कुमार सिंह, पेशे से एक फोटो जर्नलिस्‍ट है, सरकारी/गैर सरकारी संस्‍थाओं में प्रार्थी से फोटोग्राफी कराने के अनुरोध पर प्रार्थी भुगतान प्राप्‍त कर फोटोग्राफी का कार्य करता है. जिस उद्देश्‍य से फोटोग्राफ प्रदान की जाती है, उसके अतिरिक्‍त अन्‍य किसी प्रयोजन में मेरे द्वारा प्रदान की गई फोटोग्राफ को फोटो बिना मेरी अनुमति के प्रयोग में नहीं लाई जाती है. मेरे द्वारा की गई फोटोग्राफी पर मेरा सर्वाधिकार सुरक्षित रहता है. यदि किसी व्‍यक्ति द्वारा बिना मेरे संज्ञान में लाये अथवा धोखाधड़ी कर अवैध लाभ अर्जन करने की कोशिश अथवा कार्य किया जाता है, तो वह विधिक मान्‍यताओं का सर्वथा उल्‍लंघन होता है. वह व्‍यक्ति/संस्‍था द्वारा ऐसा करके मेरे साथ धोखाधड़ी करते हुए अपने लाभ के उद्देश्‍य से मेरे कॉपीराइट अधिकारों का हनन करते हुए मेरी बौद्धिक सम्‍पदा का अवैधानिक तरीके से अपने लाभ में, प्रयोग करने का दण्‍डनीय आपराधिक कृत्‍य करता है.

अवगत कराना है कि विगत जुलाई 2009 में उत्‍तर मध्‍य सांस्‍कृतिक केन्‍द्र, इलाहाबाद के निदेशक श्री आनन्‍द वर्धन शुक्‍ला द्वारा अपने कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार करने के उद्देश्‍य से यूनेस्‍को (फ्रांस) में भेजने हेतु मुझसे फोटोग्राफी करायी गई. इन फोटोग्राफ्स का कहीं अन्‍य प्रयोग मेरी अनुमति के बिना किया जाना सर्वथा दण्‍डनीय अपराध है.

मैं दिल्‍ली जाने के लिए दिनांक 12.08.2010 को रेलवे स्‍टेशन इलाहाबाद के प्‍लेटफार्म नम्‍बर एक पर गया था, वहां देखा उत्‍तर मध्‍य क्षेत्र सांस्‍कृति केन्‍द्र, इलाहाबाद में जुलाई 2009 में तैयार की गई फोटोग्राफ कामनवेल्‍थ गेम्‍स 2010 के प्रचार हेतु लगाए गए पोस्‍टर में लगा हुआ है. इसे देखकर मैं भौचक्‍का रह गया कि मेरे द्वारा तैयार की गई फोटोग्राफ में उत्‍तर मध्‍य क्षेत्र सांस्‍कृतिक केन्‍द्र, इलाहाबाद के सौजन्‍य से अथवा फोटोग्राफ लेने वाले व्‍यक्ति यानी कि मेरा भी नाम नहीं है.

मैं यह समझ गया कि मेरे द्वारा उत्‍तर मध्‍य सांस्‍कृतिक केन्‍द्र, इलाहाबाद हेतु जुलाई 2009 में मेरे द्वारा तैयार की गई फोटोग्राफ्स, इस केन्‍द्र के निदेशक द्वारा कामनवेल्‍थ गेम्‍स, नई दिल्‍ली के डीजी (डाइरेक्‍टर जनरल) एवं सेक्रेटरी ललित भनोट, आर्गेनाइजिंग कमेटी कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स 2010 को बिना मेरी अनुमति के अपने अवैध लाभ के लिए उपलब्‍ध कराई गई है. जिसका इस प्रकार से दुरुपयोग किया जा रहा है. उस दिन मैं दिल्‍ली चला गया, रेलवे स्‍टेशन नई दिल्‍ली के प्‍लेटफार्मों सहित नई दिल्‍ली के कई हिस्‍सों में कई जगह उक्‍त फोटोग्राफ्स के पोस्‍टर लगाए गए हैं. पोस्‍टर लगाए जाने के पूर्व डीजी कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स नई दिल्‍ली द्वारा इसके कापी राइटस के संदर्भ में अवश्‍य ही जानकारी कर लेनी चाहिए थी, जबकि उन्‍होंने ऐसा न करके मुझे धोखे में रखकर तथा अनुचित लाभ लेकर मेरे कापी राइटस अधिकारों का हनन, मेरी बौद्धिक सम्‍पदा का अपने लाभ हेतु प्रयोग किये जाने और मेरे साथ धोखा देने आदि का आपराधिक कृत्‍य किया जा रहा है. (फोटो संलग्‍न)

मैं वापस इलाहाबाद आकर दिनांक 27.08.2010 को कार्यालय निदेशक उत्‍तर मध्‍य सांस्‍कृतिक केन्‍द्र गया, वहां पर उपस्थित स्‍टाफ से अपनी आपत्ति जताई तो वहां उपलब्‍ध स्‍टाफ ने इस संदर्भ में अपनी अनभिज्ञता जाहिर करते हुए संभावना जताया कि निदेशक महोदय द्वारा कद‍ाचित ऐसा किया गया हो.

महोदय निवेदन है कि मेरे साथ श्री आनंद वर्धन शुक्‍ल, निदेशक उत्‍तर मध्‍य सांस्‍कृतिक केन्‍द्र (NCZCC), इलाहाबाद एवं डीजी (डाइरेक्‍टर जनरल) कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स व सेक्रेटरी जनरल ललित भनोट, आर्गेनाइजिंग कमेटी कॉमनवेल्‍थ्‍ा गेम्‍स 2010, नई दिल्‍ली मेरे द्वारा ली गई फोटोग्राफ्स का प्रयोग मुझसे धोखाधड़ी करके, मेरी अनुमति के बिना, मेरा क्रेडिट (बाइ लाइन) यानी मेरा नाम मुद्रित किए बिना तथा फोटोग्राफ्स के एवज में बिना कोई भुगतान किए, कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स नई दिल्‍ली 2010 के प्रचार सामग्री एवं पोस्‍टर इत्‍यादि में देश भर में किया जा रहा है. अत: आपसे निवेदन है कि उपरोक्‍त व्‍यक्तियों पदाधिकारियों द्वारा किए गए आपराधिक कृत्‍य के संबंध में यथा वांछित विधिक कार्यवाही करने का कष्‍ट करें. अन्‍यथा प्रार्थी को व्‍यवसायिक-बौद्धिक एवं मानसिक क्षति पहुंचेगी. प्रार्थी आपका आभारी रहेगा.

दिनांक- सितम्‍बर 18, 2010

प्रार्थी

राजेश कुमार सिंह  (फोटो जर्नलिस्‍ट)

निवासी- ए-4 अग्निपथ कालोनी

टीबी सप्रू रोड

थाना-सिविल लाइन्‍स, इलाहाबाद

मोबाइल 0915215920

प्रतिलिपि

1- श्रीमान पुलिस उप महानिरीक्षक जनपद इलाहाबाद को सूचनार्थ एंव आवश्‍यक कार्रवाई हेतु.

2- पुलिस महानिदेशक उत्‍तर प्रदेश सरकार को आवश्‍यक कार्रवाई हेतु.

महारानी या राजकुमार ना करें खेल का उदघाटन

: आरटीआई फोरम की कन्‍वीनर डॉ. नूतन ठाकुर ने खटखटाया कोर्ट का दरवाजा : कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स का उदघाटन ब्रिटेन की महारानी से कराने के बजाय भारत के राष्‍ट्रपति से कराने के लिए एक याचिका दायर की गई है. याचिका में मौलिक अधिकारों के हनन की बात भी कही गई है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के लखनऊ बेंच में आर्टिकल 226 के अंतर्गत दायर रिट याचिका की संख्या 9565/2010 है.

इसमें कहा गया है कि यह खेल ब्रिटिश प्रभुत्‍व का द्योतक है. इस याचिका को आईआरडीएस की सचिव तथा नेशनल आरटीआई फोरम की कन्‍वीनर डॉ. नूतन ठाकुर ने दायर किया है. इस याचिका में भारत सरकार के कैबिनेट सचिव, सचिव, युवा व खेल मामले व विदेश सचिव एवं कॉमन वेल्थ गेम्स आयोजन समिति के सेक्रेटरी जेनरल को प्रतिवादी बनाया गया हैं. याची डा. ठाकुर ने याचिका में निवेदन किया है कि प्रतिवादियों को यह आदेशित किया जाए कि वे भारत के राष्ट्रपति को कॉमनवेल्‍थ खेलों के उदघाटन के लिए आमंत्रित करें. सरकार को यह आदेश दिया जाये कि यह कॉमनवेल्थ जैसे असमानता के आधार पर बने संस्था से खुद को तत्काल अलग करे. याचिका में यह भी मांग की गई है कि भारत भविष्य में कभी भी कॉमनवेल्थ खेलों तथा कॉमनवेल्थ के दूसरे आयोजनों में हिस्सा न ले तथा भारत के प्रतिनिधि के लिए जो दो प्रकार की नामावली प्रयुक्त होती है- कॉमनवेल्थ देशों में उच्चायुक्त तथा अन्य देशों में राजदूत उसे भी समाप्त किया जाए.

याचिका में अंतरिम राहत यह मांगी गयी है कि नई दिल्‍ली में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्‍स का उद्घाटन ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ के पुत्र राजकुमार चार्ल्स को करने से रोका जाए. इस खेल का उद्घाटन भारत के राष्ट्रपति द्वारा कराने के आदेश दिए जाएं. डॉ ठाकुर ने अपनी याचिका में कहा है कि भारत के संविधान की प्रस्तावना में साफ अंकित है- “हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न, लोकतांत्रिक प्रजातंत्र बनायेंगे” पर कॉमनवेल्थ जिसे पहले ब्रिटिश कॉमनवेल्थ कहते थे और जिसका उदय 1884 में लोर्ड सालिसबरी ने किया था, वह शुरू से ही असमानता तथा वर्चस्व के सिद्धांत पर आधारित था.

इसमें केवल वही देश शामिल हो सकते हैं जो कभी ब्रिटेन के गुलाम रहे हों और इस प्रकार यह गुलामी का प्रतीक है. ब्रिटिश शब्द 1949 के लन्दन घोषणा के बाद भले ही समाप्त कर दिया गया हो, पर आज भी ब्रिटेन का सम्राट ही इसका अध्यक्ष होता है और इसका मुख्यालय भी मेलबोरो हाउस, पाल माल, लन्दन में है, जो ब्रिटेन की प्रभुता का स्पष्ट प्रतीक है.

रिट में यह भी कहा गया है कि क्वीन बैटन गुलामी और ब्रिटिश प्रभुत्व का सबसे बड़ा प्रतीक है, जो बकिंघन पैलेस से निकल कर बाकी देशों में घूमता है और जिसके बाद ब्रिटेन का सम्राट आ कर खेलों का उदघाटन करता है. अनुच्छेद 14 तथा 21 के मौलिक अधिकारों का हनन होने की दशा में यह रिट याचिका दायर की गयी है. अशोक पाण्‍डेय तथा डॉ. शेष नारायण पाण्‍डेय वादी पक्ष के अधिवक्‍ता हैं.

‘हां, डीजीपी तो मेरा पुराना साथी है’

नूतन ठाकुर “ओहो, तो आप अमिताभ की वाईफ हैं. हाँ, परसों मिला था विक्रम भाई के ऑफिस के सामने.” ये वे शब्द हैं जो आम-तौर पर मुझे तब सुनने को मिले जब मैं लखनऊ में किसी पत्रकार से मिली और मेरा परिचय कराया गया. यहाँ अमिताभ हुए मेरे पति अमिताभ ठाकुर, जो उत्तर प्रदेश में एक आईपीएस अधिकारी हैं और विक्रम भाई हुए विक्रम सिंह या कोई भी वह आदमी जो उस समय उत्तर प्रदेश पुलिस में डीजीपी हों.

यानी कि एक बार में ही मुझे यह एहसास करा दिया जाना कि वे हलके आदमी नहीं हैं, उनकी पहुँच और दायरा बहुत बड़ा है. जब डीजीपी साहेब, जो मेरे पति के विभाग के मुखिया हुए और पुलिस जैसे अनुशासनिक महकमे के एक प्रकार से सर्वे-सर्वा हुए, इस सामने वाले व्यक्ति के मित्र और भाई हैं तो फिर बाकी लोगों की क्या औकात होगी. लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं होगी.

उस सज्जन के पास समय होगा तो वे लपेटने का काम आगे जारी रखेंगे- “असल में विक्रम भाई की गद्दी जाने वाली थी, परसों रात बहन जी बहुत नाराज़ हो गयी थीं, कह दिया था कि आज ही इसको हटाओ. रात ही में विक्रम भाई ने मुझे फोन किया और तुरंत घर बुलाया. मैंने कहा कि अरे अब इस समय रहने दो भाई, कल सुबह आ जाउंगा पर उनकी तो हालत खराब थी, अभी के अभी बुला रहे थे. उसी समय गाडी आई और उनके घर गया. बहुत कुछ ऐसा बताया जो कहा नहीं जा सकता है. अंदरूनी बातें थी, अरे आप तो समझ ही रही होंगी. मैंने भी उनको समझाया कि ऐसा काम क्यूँ करते हो. अपनी गलती माने. लेकिन उस समय तो उनको बचाना जरूरी था. तुरंत शशांक भाई से संपर्क किया. बोले कि अभी बहुत रात हो गयी है, कल आना. पर मैंने भी कह दिया कि दोस्ती की बात है, आना जरूरी है. गया और सब कुछ ठीक किया.”

शशांक भाई का मतलब होगा शशांक शेखर सिंह से, जो वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार के कबिनेट सेक्रेटरी हैं और प्रदेश के सबसे रसूखदार सरकारी ओह्देकार माने जाते हैं. इस समय शशांक शेखर होंगे, पिछली मुलायम सिंह यादव के सरकार में अनीता सिंह या चन्द्रमा प्रसाद थे, उनसे पहले बहन जी की सरकार में पीएल पुनिया थे, उससे पहले राजनाथ सिंह की भाजपा सरकार में अनंत कुमार सिंह और इसी तरह हर सरकार में कोई ना कोई ताकतवर ब्यूरोक्रेट होता है जो ऐसे पत्रकारों का ख़ास मित्र होता है और जिसके जरिये वे दूसरे दोस्त अधिकारियों के प्राणों की तथा-कथित रूप से रक्षा करते हैं.

फिर उससे भी मजेदार बात तब होती है, जिस समय ये पत्रकार बंधु अपनी वीर-गाथा सुना रहे हों और वहां कोई और पत्रकार साथी भी उपस्थित हों तो पहले सज्जन के रहते हुए तो वे बिलकुल शांत रहेंगे या फिर हाँ में हाँ करते रहेंगे, पर पहले वाले के जाने के बाद से ही एकदम सक्रिय हो जायेंगे. एक बानगी देखिये- “झूठ बोल रहा था साला. विक्रम भाई तो उसे देखते ही चिढ जाते हैं. दलाल जो है. दिन भर विभाग में घूमता रहता है, अपना राग अलापता रहता है. कभी किसी आईजी के पास, तो कभी किसी डीआईजी के पास. फिर कोई इन्स्पेक्टर या दारोगा पकड़ लिया, अपना रिश्तेदार बता दिया और ट्रान्सफर-पोस्टिंग के नाम पर पैसे कमा लिए. विक्रम भाई ये सब जानते हैं. इसीलिए बैठने भी नहीं देते. लेकिन फिर भी जबरदस्ती लबर-झबर करता रहता है. और कुछ ना कुछ कमा ही लेता है.”

इसके बाद ये भाई-साहेब अपनी तारीफ़ शुरू कर देंगे- “विक्रम भाई असल में तो मेरे मित्र हैं. और आज से नहीं हैं, तब से हैं जब वे एसएसपी थे. तब से भाई साहेब और भाभीजी से मेरा घर का सम्बन्ध रहा है.” और ये कह कर वे अपनी ही बात कहना शुरू हो जायेंगे.

मैं ये कहानी किसी भी अफसर विशेष के लिए नहीं कह रही और ना ही किसी एक पत्रकार साथी के लिए. मुझे लगता है ऐसा ये लोग लगभग सभी अफसरों के साथ ही करते होंगे. आखिर सचिवालय और पुलिस विभाग में कोई ना कोई तो आईएएस या आईपीएस अधिकारी ही बैठेगा. जो भी ताकतवर जगह बैठा, उसके ये लोग स्वयंभू मित्र-बंधू हो जायेंगे और फिर अपनी राम-कहानी का सिलसिला यहाँ-वहां जारी रखेंगे.

मैं पहले नहीं जानती थी पर पत्रकार साथियों के बीच रह कर ही यह बात सुनने और जानने का मौका मिला कि इनमें से कई ऐसे लोग भी हैं, जो अपने पत्रकार साथियों के बीच में पत्रकार कम दलाल ज्यादा माने जाते हैं. पर मैं यहाँ ये बात कहने से भी नहीं हिचकिचाउंगी कि इसी लखनऊ में पत्रकारिता के क्षेत्र में मुझे एक से बढ़ कर एक ऐसे भले, कर्त्तव्य-निष्ठ, अपने काम से काम रखने वाले और मानवीय सारोकारों वाले पत्रकार साथी भी मिले, जिनके लिए मन में स्वयं ही सम्मान जग जाता है.

मैं इस पूरी कहानी के बाद सिर्फ ये प्रश्न उठाना चाहती हूँ-

1. जब हम पत्रकार साथियों का अपना अलग काम है तो फिर हमें इन अधिकारियों से दोस्ती बाँधने और उसे सार्वजनिक तौर पर दिखाने की क्या जरुरत पड़ती है?

2. इस तरह से अपना गलत या सही रोब झाड़ने वाले पत्रकार साथियों को इससे क्या मिलता है?

3. क्या ऐसे लोग पूरी पत्रकारिता को बदनाम नहीं करते?

लेखिका डॉ. नूतन ठाकुर लखनऊ से प्रकाशित ‘पीपल्स फोरम’ की एडिटर हैं.

माया की मार से त्रस्त एक डिप्टी एसपी

: सीबीआई में रहते माया से पूछताछ की थी : साजिश-फ्राड के जरिए प्रताड़ित किए गए : कोर्ट ने सरकार को फटकारा, जुर्माना ठोंका : मैं आप तक एक ऐसे मामले को पहुंचा रही हूं जिससे अंदाजा लगा सकते हैं कि ईमानदार-कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति बगैर गलती किस हद तक प्रताड़ित किया जा सकता है।

मामला उत्तर प्रदेश के पुलिस उपाधीक्षक धीरेन्द्र कुमार राय से संबंधित है। उन्हें 26/05/2008 को निलंबित किया गया। उसी दिन आरोप-पत्र भी दे दिया गया। उनके उपर आरोप लगाया गया कि 21 जुलाई 2007 को, उत्तर प्रदेश के मशहूर डकैत ठोकिया उर्फ अंबिका पटेल जिला चित्रकूट को पकड़ने के लिये चलाये गये अभियान में उन्होंने अपनी जिम्मेदारी ठीक ढंग से नही निभायी।

सच्चाई इसके ठीक उलट है।

डीके राय ने परिस्थितियां विपरीत होते देख वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, एसटीएफ अमिताभ यश के मोबाइल फोन नंबर 9415902216, एडीजी, एसटीएफ शैलजाकांत मिश्रा के मोबाइल फोन नंबर 9415902048 तथा डा. प्रीतेन्द्र सिंह, पुलिस अधीक्षक चित्रकूट के मोबाइल फोन नंबर 9415902832 पर लगातार फोन कर अतिरिक्त पुलिस बल की मांग की। पर घटनास्थल पर कोई फोर्स नहीं पहुंची। इसके फलस्वरूप छ: पुलिसकर्मी मारे गये। धीरेन्द्र राय को अपने दायित्वों को ठीक ढंग से न निभाने का दोषी मानते हुये निलंबित कर दिया गया।

इस घटना के बाद राय न्याय पाने की उम्मीद में दर-दर भटक रहे हैं। परन्तु अभी तक उन्हें राहत नहीं मिली है। पर कोर्ट ने जो कुछ कहा है उससे राय को मानसिक संबल मिला है। उनके दामन पर लगे दाग धुले हैं।

हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ पीठ ने रिट पेटिशन संख्या 768/2008 में राय को बहाल करने के बहुत ही स्पष्ट आदेश देने के साथ-साथ सरकार को जुर्माने के तौर पर दो लाख रुपये भी देने के आदेश दिये। श्री राय का कहना है कि प्रदेश सरकार उन्हें इस वजह से प्रताड़ित कर रही है क्योंकि उन्होंने राज्य की मुख्यमंत्री मायावती से तब पूछताछ की थी, जब वे सीबीआई में थे। हाई कोर्ट ने राय का सर्विस रिकार्ड देखने के बाद पाया कि वे ब्रह्मदत्त द्विवेदी मर्डर केस, ताज हेरिटेज कारिडोर तथा सेंचुरी स्कैम केस आदि महत्वपूर्ण मामलों से जुड़े रहे हैं।

राय के निलंबन के मामले में भी हाई कोर्ट ने पाया कि उनके द्वारा एडीजी स्तर से लेकर स्थानीय स्टेशन अधिकारी तक को कम से कम 29 फोन किये गये थे। इसके बावजूद मौके पर कोई पुलिस फोर्स नहीं भेजी गयी तथा बाद में इसी मामले में राय को छ: पुलिसकर्मियों की मौत का जिम्मेदार माना गया। इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है।

बहस के दौरान सरकारी वकील ने सरकार को प्राप्त विशेषाधिकारों का हवाला देते हुये रिट पेटिशन की वैधता को चुनौती दी। परन्तु उच्च न्यायालय ने वेबस्टर्स इनसाइक्लोपीडिया से 1598 के रूक केस से उच्चतम न्यायालय के यूनियन आफ इंडिया बनाम कुलदीप सिंह के निर्णयों को हवाला दिया। इसमें कहा गया है कि प्रदत्त अधिकार का प्रयोग करते समय सही और गलत का ध्यान रखना चाहिये और इसलिये अधिकारों का प्रयोग भेदभाव, एकपक्षीय और मनमाने तरीके से नहीं होना चाहिये।

इसी प्रकार, न्यायिक समीक्षा के अधिकार के संबंध में सरकारी वकील के तर्क को उच्च न्यायालय ने यह कहते हुये अस्वीकार कर दिया कि कार्यपालिका के निर्णय में न्यायपालिका के हस्तक्षेप न करने का वेडनसबरी सिद्धांत अब खत्म हो रहा है। साथ ही उच्चतम न्यायालय द्वारा हाल ही में दिये गये  कुछ निर्णयों का भी हवाला दिया जिसमें वेडनसबरी सिद्धांत को अलग रख कर निर्णय किया गया।

डीके राय के मामले में तथ्यों को देख कर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश भी हतप्रभ थे तभी तो उन्होंने ऐसी प्रतिक्रिया दी कि- “पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट को एक नजर पढ़ने से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि पूरी रिपोर्ट एकतरफा है। पूरी रिपोर्ट में यह इस बात की कहीं झलक भी नहीं दिखायी पड़ती कि अपीलकर्ता द्वारा बार-बार मदद मांगने पर भी क्यों अपीलकर्ता की टीम की सहायता के लिये अतिरिक्त पुलिस बल उस पूरे दिन नहीं भेजी गयी।”

यह बात भी अपने-आप में कितनी भयावह और ध्यान देने वाली है कि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, एसटीएफ द्वारा यह स्वीकार किया गया कि मुठभेड़ की खबर मिलने पर भी ददुआ गिरोह के विरूद्ध चलाये जा रहे अभियान में शामिल होने की वजह से वे कोई सहायता मुहैया नहीं करा पाये। लेकिन यदि वे अपीलकर्ता की टीम को मदद पहुंचाने की स्थिति में नहीं थे तब भी उन्हें अन्य अधिकारियों से पुलिस बल भेजने का आग्रह करना चाहिये था जो नहीं किया गया बल्कि मुठभेड़ में मारे गये छहों पुलिसकर्मियों की मौत का सारा भार अपीलकर्ता के कंधों पर डाल दिया गया।

यह तो राय का सौभाग्य था कि पुलिस विभाग में घनश्याम अहिरवार तथा शैलजाकांत मिश्र जैसे लोग भी हैं जो दबाव के सामने नहीं झुके। उस इलाके के क्षेत्राधिकारी अहिरवार ने साफ शब्दों में कहा कि उन्होंने राय के खिलाफ राज्य सरकार को कोई रिपोर्ट नहीं भेजी है। इस बयान के बाद राज्य सरकार अपनी बात से पलट गई तथा वह अब यह कहने लगी कि रिपोर्ट अखिलेश नारायण सिंह ने भेजी थी, अहिरवार ने नहीं।

एसटीएफ के एडीजी शैलाजाकांत ने जांच कमेटी के सामने खुल कर यह कहा कि राय ने उनसे तथा तमाम अन्य अधिकारियों से बार-बार पुलिस बल का अनुरोध किया था और गड़बड़ियों के लिये वे कदापि जिम्मेदार नहीं माने जा सकते। उन्होंने स्थानीय पुलिस पर अपना कर्तव्य नहीं निर्वहन करने तथा राय पर गलत आरोप लगाने का आरोप भी लगाया।

इस मामले में कागजात में तमाम गड़बड़ियां की गईं। तथ्यों के साथ छेड़छाड़ तक किये गये। उच्च न्यायालय के अनुसार- 01/09/2007 के सीओ, सिटी, चित्रकूट की रिपोर्ट में घटना का दिन 22/02/2007 से 22/07/2007 बदला गया है।  फ्यूइड लगा कर क्षेत्राधिकारी नगर शब्द के स्थान पर प्रभारी निरीक्षक, कर्वी शब्द डाला गया है। यह सब साफ दिखता है।

उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि याची राय के खिलाफ आरोप बनाने के लिए और उन्हें फंसाने के लिए अभिलेखों से खिलवाड़ किया गया। इसके आधार पर उच्च न्यायालय यह निष्कर्ष निकालती है कि इतने सारे ठोस सबूतों से ऐसा दिखता है कि अधिकारियों ने याची को अकारण, बिना आधार के राजनैतिक अथवा अन्य कारणों के वशीभूत हो कर प्रताड़ित करने का काम किया है। उच्च न्यायालय का मानना है कि इस मामले में सीधे-सीधे फ्राड किया गया है जिसके आधार पर याची राय के खिलाफ विभागीय कार्यवाही की जा सके।

उच्च न्यायालय द्वारा प्रस्तुत शब्दों में छिपी पीड़ा को पहचानें- “याची के खिलाफ की गयी कार्यवाहियां न केवल रंजिशन की गयी दिखती हैं अपितु साफ तौर पर उत्पीड़नात्मक हैं।”

इन तथ्यों के आधार पर उच्च न्यायालय ने न सिर्फ राय को बहाल करने का आदेश दिया अपितु उन्हें मुआवजे के तौर पर 2 लाख रूपये अतिरिक्त दिये जाने के आदेश तक दे डाले। उसने यह धनराशि उन लोगों से वसूले जाने की बात भी कही जिनकी नूतन ठाकुरइस कृत्य में गलत भूमिका थी। साथ ही एक कमेटी बना कर इस बात की जांच कराने के निर्देश  भी दिये गये कि सही समय पर आवश्यक पुलिस बल क्यों नहीं प्रदान किया गया और इसके लिये जिम्मेदार कौन हैं।

तो ये हाल है उत्तर प्रदेश की सरकार का और उसके इशारे पर नाचने वाले अफसरों का. कोई ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ कैसे काम करे?.

लेखिका डॉ. नूतन ठाकुर लखनऊ से प्रकाशित ‘पीपल्स फोरम’ की एडिटर हैं.