भास्कर के इस साहस और विजन को सलाम

अगर कोई अच्छा काम करे तो उसकी सराहना होनी चाहिए. पूरी ईमानदारी से. भास्कर की आज सराहना करने को जी चाह रहा है. 6 दिसंबर 2010 के दिन का दैनिक भास्कर सभी को देखना चाहिए. इस दिन का जितने बहुत शानदार अखबार निकाला है दैनिक भास्कर ने. अदभुत कापी, जोरदार लेआउट व पठनीय कंटेंट. 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की कहानी, नीरा राडिया के टेपों को समेटते हुए. कह सकते हैं कि देश के बड़े अखबारों में दैनिक भास्कर पहला अखबार हो गया है जिसने नीरा राडिया के टेपों की हिंदी ट्रांसक्रिप्ट को प्रकाशित कर दिया है. शायद दैनिक जागरण, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, प्रभात खबर आदि अखबार यह काम अभी तक नहीं कर पाए हैं. ’45 मिनट में कैसे लुटा 2जी’शीर्षक से दैनिक भास्कर के 6 दिसंबर के अंक में प्रथम पेज पर लीड स्टोरी है.

यह स्टोरी शरद गुप्ती की है. उनके नाम से छपी है खबर. लीड शीर्षक के ठीक बाद नीचे है- भास्कर श्रृंखला. 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला. सत्ता की सबसे बड़ी दलाली की कहानी. एक महिला, 9 फोन लाइनें, 300 दिन, 5851 कॉल्स. पहले पेज पर डबल कालम में लीड स्टोरी के ठीक दाएं कल्पेश याज्ञनिक की इसी मसले पर विशेष संपादकीय टिप्पणी है. शीर्षक है- आप प्रधानमंत्री हैं, राजदंड क्यों नहीं उठाते? यह संपादकीय टिप्पणी झकझोरने वाली है. अंदर इसी मसले पर दो विशेष पेज हैं. इन दोनों पेजों के नाम हैं- ”फोन टेप्स में सत्ती की सबसे बड़ी दलाली की कहानी”. एक विशेष पेज पर शीर्षक है- एक लाख से बनाए 400 करोड़. इस पेज पर नीरा राडिया की प्रोफाइल के साथ ही बरखा दत्त और वीर सांघवी की नीरा राडिया से बातचीत के ट्रांसक्रिप्ट हैं तो दूसरे विशेष पेज पर वीर सांघवी, ए राजा और रतन टाटा की नीरा राडिया से बातचीत के ट्रांसक्रिप्ट हैं. इस विशेष आयोजन के जरिए भास्कर ने अपने पाठकों तक बेहद पठनीय और चिंतनीय मुद्दे को पहुंचाया है जो कोई और अखबार अभी तक नहीं कर सका है.

भास्कर के इस आयोजन से बौखलाए पत्रिका समूह ने मध्य प्रदेश में पहले पेज पर नीरा राडिया टेप में दैनिक भास्कर के जिक्र आने की खबर को पहले पेज पर दो कालम में प्रमुखता से प्रकाशित किया है. देखने-पढ़ने के लिए क्लिक करें- पत्रिका में खबर. चलिए, जो कुछ भास्कर ने छिपाया, उसे पत्रिका ने सामने लाकर कहानी पूरी कर दी. यह सच बात है कि नीरा राडिया दैनिक भास्कर का नाम रतन टाटा से बातचीत के दौरान लेती हैं और वह अखबारों को मैनेज किए जाने की बात टाटा को बताती हैं. कायदे से दैनिक भास्कर को इस प्रकरण पर चुप्पी साधे रहना चाहिए था क्योंकि उसका नाम इन टेपों में एक जगह पर है लेकिन भास्कर प्रबंधन ने पूरे प्रकरण को प्रमुखता से प्रकाशित करने का निर्णय लेकर अपने संपादकीय साहस का परिचय दिया है. सवाल उठने, खिलाफ खबर छापे जाने से जरा भी न चिंतित भास्कर ने नीरा राडिया मसले को बेहद विस्तार से प्रकाशित किया.

भास्कर से आप लाख नाराज हों, उसकी बुराई करें, लेकिन यह सच है कि कंटेंट के मामले में, लेआउट के मामले में यह अखबार कई बार अदभुत नजर आता है. बताया जाता है कि यह सब कल्पेश याज्ञनिक की मेहनत और विजन के कारण संभव हो पाता है. कल्पेश याज्ञनिक की प्रतिभा को देखते हुए भास्कर प्रबंधन उन्हें काम करने की पूरी आजादी देता है.

कई मौकों यथा- नए साल पर, महिला दिवस पर… दैनिक भास्कर में जिस तरह से विशेष पेज प्लान किए, और उन पेजों पर दमदार और प्रयोगधर्मी कंटेंट को परोसा है, वह चमत्कृत करता है. मुझे पता है कि मेरे यह सब लिखने से कई लोग दुखी हो जाएंगे लेकिन मुझे हमेशा ये लगता है कि आप भले किसी से खुन्नस रखें, विरोधी मानें लेकिन अगर वो ऐसा कोई काम करता है जो आपको भी पसंद आता है तो तारीफ सामने करने में झिझकना नहीं चाहिए. अगर हम लोगों के अंदर लोकतांत्रिक आत्मा है, तो यह करना हमारा कर्तव्य बन जाता है. उम्मीद करते हैं कि दैनिक जागरण और अमर उजाला जैसे अखबार भी जल्द अपने पाठकों तक नीरा राडिया के टेपों की पूरी कहानी ले जाएंगे और आम जनता को भी बताएंगे कि हमाम में मीडिया भी नंगा हो चुका है. दैनिक भास्कर ने राडिया टेपों को छापकर बाकी अखबारों से बाजी मार ली है, इसमें कोई दो राय नहीं है. आइए, आपको दैनिक भास्कर में प्रकाशित उस लीड स्टोरी की कापी को पढ़ाते हैं. दोनों विशेष पेजों और प्रथम पेज की लीड स्टोरी के पेजेज को भी नीचे आखिर में दिया जा रहा है.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया


2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की मुख्य किरदार नीरा राडिया के नौ टेलीफोन 300 दिन तक आयकर विभाग ने टैप किए। कुल 5,851 कॉल्स रिकार्ड की गईं। इनमें से सौ का रिकॉर्ड लीक हो चुका है। अपने पाठकों के लिए भास्कर प्रस्तुत कर रहा है – टेप हुई गोपनीय बातचीत के मुख्य अंश। साथ में, इससे जुड़े संपादकों और किरदारों की सफाई भी। ताकि पता चले कि दुनिया को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले खुद क्या कर रहे हैं।

45 मिनट में ऐसे लुटा 2जी

: एक महिला, 9 फोन लाइनें, 300 दिन, 5851 कॉल्स : फोन कॉल्स में दर्ज फरेब :

शरद गुप्ता, नई दिल्ली

अशोक रोड। संचार भवन। पहली मंजिल। दस जनवरी 2008। वक्त दोपहर पौने तीन बजे। संचार मंत्री एंदीमुथु राजा के निजी सहायक आरके चंदोलिया का दफ्तर। राजा के हुक्म से एक प्रेस रिलीज जारी होती है। 2 जी स्पेक्ट्रम 3.30 से 4.30 के बीच जारी होगा। तुरंत हड़कंप मच गया। सिर्फ 45 मिनट तो बाकी थे..

वह एक आम दिन था। कुछ खास था तो सिर्फ ए. राजा की इस भवन के दफ्तर में मौजूदगी। राजा यहां के अंधेरे और बेरौनक गलियारों से गुजरने की बजाए इलेक्ट्रॉनिक्स भवन के चमचमाते दफ्तर में बैठना ज्यादा पसंद करते थे। पर आज यहां विराजे थे। 2जी स्पेक्ट्रम के लिए चार महीने से चक्कर लगा कंपनियों के लोग भी इन्हीं अंधेरे गलियारों में मंडराते देखे गए।

लंच तक माहौल दूसरे सरकारी दफ्तरों की तरह सुस्त सा रहा। पौने तीन बजते ही तूफान सा आ गया। गलियारों में भागमभाग मच गई। मोबाइल फोनों पर होने वाली बातचीत चीख-पुकार में तब्दील हो गई। वे चंदोलिया के दफ्तर से मिली अपडेट अपने आकाओं को दे रहे थे। साढ़े तीन बजे तक सारी खानापूर्ति पूरी की जानी थी। उसके एक घंटे में अरबों-खरबों रुपए के मुनाफे की लॉटरी लगने वाली थी।

जनवरी की सर्दी में कंपनी वालों के माथे से पसीना चू रहा था। मोबाइल पर बात करते हुए आवाज कांप रही थी। सबकी कोशिश सबसे पहले आने की ही थी। लाइसेंस के लिए कतार का कायदा फीस जमा करने के आधार पर तय होना था। फीस भी कितनी- सिर्फ 1658 करोड़ रुपए का बैंक ड्राफ्ट। साथ में बैंक गारंटी, वायरलेस सर्विस ऑपरेटर के लिए आवेदन, गृह मंत्रालय का सिक्यूरिटी क्लीरेंस, वाणिज्य मंत्रालय के फॉरेन इंवेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड (एफआईपीबी) का अनुमति पत्र.। ऐसे करीब एक दर्जन दस्तावेज जमा करना भी जरूरी था। वक्त सिर्फ 45 मिनट…

परदे के आगे की कहानी

25 सितंबर 2007 तक स्पेक्ट्रम के लिए आवेदन करने वाली कंपनियों में से जिन्हें हर प्रकार से योग्य माना गया उन कंपनियों के अफसरों को आठवीं मंजिल तक जाना था। डिप्टी डायरेक्टर जनरल (एक्सेस सर्विसेज) आर के श्रीवास्तव के दफ्तर में। यहीं मिलने थे लेटर ऑफ इंटेट। फिर दूसरी मंजिल के कमेटी रूम में बैठे टेलीकॉम एकाउंट सर्विस के अफसरों के सामने हाजिरी। यहां दाखिल होने थे 1658 करोड़ रुपए के ड्राफ्ट के साथ सभी जरूरी कागजात। यहां अफसर स्टॉप वॉच लेकर बैठे थे ताकि कागजात जमा होने का समय सेकंडों में दर्ज किया जाए।

किसी के लिए भी एक-एक सेकंड इतना कीमती इससे पहले कभी नहीं था। सबकी घड़ियों में कांटे आगे सरक रहे थे। बेचैनी, बदहवासी और अफरातफरी बढ़ गई थी। चतुर और पहले से तैयार कंपनियों के तजुर्बेकार अफसरों ने इस सख्त इम्तहान में अव्वल आने के लिए तरकश से तीर निकाले। अपनी कागजी खानापूर्ति वक्त पर पूरी करने के साथ प्रतिस्पर्धी कंपनियों के लोगों को अटकाना-उलझाना जरूरी था। अचानक संचार भवन में कुछ लोग नमूदार हुए। ये कुछ कंपनियों के ताकतवर सहायक थे। दिखने में दबंग।

हट्टे-कट्टे। कुछ भी कर गुजरने को तैयार। इनके आते ही माहौल गरमा गया। इन्हें अपना काम मालूम था। अपने बॉस का रास्ता साफ रखना, दूसरों को रोकना। लिफ्ट में पहले कौन दाखिल हो, इस पर झगड़े शुरू हो गए। धक्का-मुक्की होने लगी। सबको वक्त पर सही टेबल पर पहुंचने की जल्दी थी। पूर्व टेलीकॉम मंत्री सुखराम की विशेष कृपा के पात्र रहे हिमाचल फ्यूचरस्टिक कंपनी (एचएफसीएल) के मालिक महेंद्र नाहटा की तो पिटाई तक हो गई। उन्हें कतार से निकाल कर संचार भवन के बाहर धकिया दिया गया।

दबंगों के इस डायरेक्ट-एक्शन की चपेट में कई अफसर तक आ गए। किसी के साथ हाथापाई हुई, किसी के कपड़े फटते-फटते बचे। आला अफसरों ने हथियार डाल दिए। फौरन पुलिस बुलाई गई। घड़ी की सुइयां तेजी से सरक रही थीं। हालात काबू में आते-आते वक्त पूरा हो गया। जो कंपनियां साम, दाम, दंड, भेद के इस खेल में चंद मिनट या सेकंडों से पीछे रह गईं, उनके नुमांइदे अदालत जाने की घुड़कियां देते निकले।

लुटे-पिटे अंदाज में। एक कंपनी के प्रतिनिधि ने आत्महत्या कर लेने की धमकी दी। कई अन्य कंपनियों के लोग वहीं धरने पर बैठ गए। पुलिस को बल प्रयोग कर उन्हें हटाना पड़ा। आवेदन करने वाली 46 में से केवल नौ कंपनियां ही पौन घंटे के इस गलाकाट इम्तहान में कामयाब रहीं। इनमें यूनिटेक, स्वॉन, डाटाकॉम, एसटेल और श्ििपंग स्टॉप डॉट काम नई कंपनियां थीं जबकि आइडिया, टाटा, श्याम टेलीलिंक और स्पाइस बाजार में पहले से डटी थीं।

एचएफसीएल, पाश्र्वनाथ बिल्डर्स और चीता कारपोरेट सर्विसेज के आवेदन खारिज हो गए। बाईसेल के बाकी कागज पूरे थे सिर्फ गृहमंत्रालय से सुरक्षा जांच का प्रमाणपत्र नदारद था। सेलीन इंफ्रास्ट्रक्चर के आवेदन के साथ एफआईपीबी का क्लियरेंस नहीं था। बाईसेल के अफसर छाती पीटते रहे कि प्रतिद्वंद्वियों ने उनके खिलाफ झूठे केस बनाकर गृह मंत्रालय का प्रमाणपत्र रुकवा दिया। उस दिन संचार भवन में केवल लूटमार का नजारा था। पौन घंटे का यह एपीसोड कई दिनों तक चर्चा का विषय बना रहा।

परदे के पीछे की कहानी

इसी दिन। सुबह नौ बजे। संचार मंत्री ए. राजा का सरकारी निवास। कुछ लोग नाश्ते के लिए बुलाए गए थे। इनमें टेलीकॉम सेक्रेट्री सिद्धार्थ बेहुरा, डीडीजी (एक्सेस सर्विसेज) आर के श्रीवास्तव, मंत्री के निजी सहायक आर. के. चंदोलिया, वायरलेस सेल के चीफ अशोक चंद्रा और वायरलेस प्लानिंग एडवाइजर पी. के. गर्ग थे।

कोहरे से भरी उस सर्द सुबह गरमागरम चाय और नाश्ते का लुत्फ लेते हुए राजा ने अपने इन अफसरों को अलर्ट किया। राजा आज के दिन की अहमियत बता रहे थे। खासतौर से दोपहर 2.45 से 4.30 बजे के बीच की। राजा ने बारीकी से समझाया कि कब क्या करना है और किसके हिस्से में क्या काम है? चाय की आखिरी चुस्की के साथ राजा ने बेफिक्र होकर कहा कि मुझे आप लोगों पर पूरा भरोसा है। अफसर खुश होकर बंगले से बाहर निकले और रवाना हो गए।

दोपहर तीन बजे। संचार भवन। आठवीं मंजिल। एक्सेस सर्विसेज का दफ्तर। फोन की घंटी बजी। दूसरी तरफ डीडीजी (एक्सेस सर्विसेज) आर. के. श्रीवास्तव थे। यहां मौजूद अफसरों को चंदोलिया के कमरे में तलब किया गया। मंत्री के ऑफिस के ठीक सामने चंदोलिया का कक्ष है। एक्शन प्लान के मुताबिक सब यहां इकट्ठे हुए। इनका सामना स्वॉन टेलीकॉम और यूनिटेक के आला अफसरों से हुआ। चंदोलिया ने आदेश दिया कि इन साहेबान से ड्राफ्ट और बाकी कागजात लेकर शीर्ष वरीयता प्रदान करो। बिना देर किए स्वॉन को पहला नंबर मिला, यूनिटेक को दूसरा।

सबकुछ इत्मीनान से। यहां कोई धक्कामुक्की और अफरातफरी नहीं मची। बाहर दूसरी कंपनियों को साढ़े तीन बजे तक जरूरी औपचारिकताएं पूरी करने में पसीना आ रहा था। अंदर स्वॉन और यूनिटेक को पंद्रह मिनट भी नहीं लगे। इन कंपनियों को पहले ही मालूम था कि करना क्या है। इसलिए इनके अफसर चंदोलिया के दफ्तर से प्रसन्नचित्त होकर विजयी भाव से मोबाइल कान से लगाए बाहर निकले। दूर कहीं किसी को गुड न्यूज देते हुए। 45 मिनट के तेज रफ्तार घटनाक्रम ने एक लाख 76 हजार करोड़ रुपए के घोटाले की कहानी लिख दी थी। राजा के लिए बेहद अहम यह दिन सरकारी खजाने पर बहुत भारी पड़ा था।

 


 

विशेष संपादकीय: आप प्रधानमंत्री हैं, राजदंड क्यों नहीं उठाते?

विशेष संपादकीय टिप्पणी : कल्पेश याज्ञनिक

प्रधानमंत्री को ‘मैं आजाद हूं’ फिल्म देखनी चाहिए। पूरी नहीं। आखिर के एक-दो दृश्य। उसमें संकट से घिरे मुख्यमंत्री से भ्रष्ट कारोबारी अवैध लाइसेंस व दीगर फायदे मांग रहे हैं। मुख्यमंत्री बेबसी जाहिर कर रहे हैं। इस पर उन्हें धमकाया जाता है: ‘क्यों नहीं दे सकते टेंडर, आखिर आप मुख्यमंत्री हैं। जो चाहे कर सकते हैं।’ बस, इस बात से माहौल ही बदल जाता है। मुख्यमंत्री में नई जान आ जाती है : ‘ अच्छा याद दिलाया कि मैं मुख्यमंत्री हूं, जो चाहे कर सकता हूं। अफसरों, जेल में डाल दो इन सब भ्रष्टों को!’ जाहिर है, राजदंड के चलते ही सारे उद्दंड समाप्त।

देश में अब तक के सबसे बड़े घोटाले 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन पर हमारे ईमानदार प्रधानमंत्री आखिर मौन क्यों? यह प्रश्न सुप्रीम कोर्ट ने इतनी ही सीधी भाषा में उठाया था। लेकिन ‘आप प्रधानमंत्री हैं, जो चाहे कर सकते हैं’ जैसी ललकार उन्हें एक ऐसे शख्स से मिली, जो सारे 2जी घोटाले में खुद कुछ इस तरह फंसा कि उनके जैगुआर जैसी विशाल प्रतिष्ठा के नैनो जैसी छोटी होने का खतरा सामने दीख रहा है। रतन टाटा की बात हो रही है यहां।

उनकी कंपनी को 1658 करोड़ रुपए में लाइसेंस मिला। तत्काल इसका 27 प्रतिशत हिस्सा जापानी कंपनी डोकोमो को 12,924 करोड़ रु. में बेच दिया। यानी महाघोटाले से भारी मुनाफा। फिर भी गरजे सरकार पर। कहा: देश ‘बनाना रिपब्लिक’ बन जाएगा, यदि भ्रष्टाचार नहीं रोका। बनाना रिपब्लिक यानी ऐसी गरीब अर्थव्यवस्था वाला देश, जिसकी इकोनॉमी सिर्फ एक फसल (जैसे केले) पर टिकी हो और देश भ्रष्ट नेतृत्व के कब्जे में हो! जो लोग इस शर्मनाक घोटाले के टेप से वाकिफ हैं, उन्हें इस बयान ने बुरी तरह चौंकाया। कठघरे में खड़े लोग भी अब प्रधानमंत्री को चेतावनी दे रहे हैं। लेकिन ‘मन’ है कि मौन ही है।

मीडिया-राडिया गठजोड़ का क्या? : भारतीय मीडिया के लिए यह शर्मनाक से ज्यादा दर्दनाक है। गौर सिर्फ यह करना होगा कि जिन जर्नलिस्ट के नाम लॉबीस्ट होने का दाग लगा है- वे सहज सामान्य पत्रकार नहीं है। वे सभी सेलिब्रिटी हैं। चमत्कारिक व्यक्तित्व वाले। इसलिए चमत्कारिक काम भी सामने आ रहे हैं। लेकिन पाठकों, दर्शकों और श्रोताओं के लिए मीडिया के इस वर्ग का ऐसा बेनकाब होना खुशखबरी है। क्योंकि बड़ा साहस दिखाते हुए, बड़ी जिम्मेदारी से अलग-अलग मीडिया इस पर खुलकर बोल रहा है, सबकी आंखें खोल रहा है। हमेशा दूसरों को आइना दिखाया, अब अपनी शक्ल सुधारने में जुट गया है। अच्छा यह है कि अब जनता उसे और कड़ाई से जांचेगी।

.. लेकिन इसी को फरेब कहते हैं : इस अपवित्र गठजोड़ ने ही 2जी महाघोटाले को राष्ट्रीय धोखाधड़ी बना दिया है। जब इतने बड़े पैमाने पर, इतने बड़े संपादक ‘ऐसा’ साक्षात कर रहे हों तो यह भ्रष्टाचार को भी मात कर फरेब की श्रेणी में आ जाता है। यह ‘पेड न्यूज’ से भी ज्यादा भयावह है। खबरों में दुनिया तलाशने वाले पाठकों/दर्शकों के लिए दैत्याकार धक्का है। लेकिन मीडिया ही सत्ता की दलाली की सबसे बड़ी कहानी की परतें खोलेगा। यही हमारी अगली, असली चुनौती होगी। मूर्तिभंजन का दौर होगा यह।

बोफोर्स व हवाला से तुलना कितनी सही? : इस लूट के किरदारों के कुछ समर्थक यह प्रचारित करने में लग गए हैं कि बोफोर्स और हवाला कांड के समय जो भय और भ्रम फैलाया गया था, उससे देश को भारी नुकसान पहुंचा। कुछ सिद्ध तो नहीं ही हुआ, सरकार चली गई, मंत्री बर्खास्त हो गए। धब्बा लग गया। हर किसी को ‘चोर’ बना दिया गया। फिर वैसा ही वातावरण बनाया जा रहा है। यह प्रचार ठीक नहीं है। डॉ. मनमोहन सिंह की हालत तो हर्षद मेहता कांड के समय के वित्त मंत्री जैसी है। जो तब भी उतना ही नैराश्य में डूबा हुआ था, जितना आज। सिर्फ पद का अंतर है। घोटाला भी बोफोर्स या हवाला जैसा नहीं है। इसमें भ्रष्टाचार चाहे जैसा हो, चरित्रहीनता ठीक वैसी है जैसी संसद में प्रश्न पूछने के बदले कापरेरेट घरानों से पैसे वसूलने में दिखी थी। या कि जैसा राव सरकार को बचाने के लिए सांसदों को घूस देने में।

क्या हम सवा सौ करोड़ लोगों ने किया घोटाला? : देश में स्वास्थ्य पर खर्च होने वाली रकम से कोई नौ गुना बड़ी राशि लूट ली गई है इस पूरी साजिश में। लेकिन पीएम की चुप्पी के कारण कठघरे में खड़ा हर व्यक्ति राजा बन बैठा और हमें रंक बनाता रहा। अब सभी कह रहे हैं ‘हम तो अपना काम कर रहे थे।’ जैसिका हत्याकांड में सबके बरी होने पर एक शीर्षक मशहूर हुआ था ‘नोबडी किल्ड जैसिका!’ ऐसा ही इसमें है। किसी ने घोटाला नहीं किया। तो क्या पौने दो लाख करोड़ रुपए, हम सवा सौ करोड़ लोग खा गए?

जवाब सिर्फ प्रधानमंत्री दे सकते हैं। जो स्वयं 2 नवंबर 2007 को इस घपले को भांप गए थे और आपत्ति लेते हुए पत्र लिखा था राजा को। ठीक दो माह बाद अचानक न जाने क्या दबाव आया कि उन्होंने राजा को इसकी मंजूरी दे डाली। क्यों? कुछ लोग संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) पर कह रहे हैं कि इससे क्या हो जाएगा? बोफोर्स जेपीसी के सदस्य की टिप्पणी से समझिए : ,‘मैं तमिल हूं और मेरे ईष्ट भगवान शिव हैं। यदि आज साक्षात शिव भी आकर कहें कि बोफोर्स घोटाले में शीर्ष पर बैठे लोग शामिल नहीं थे तो मैं उनकी भी नहीं सुनूंगा।’ यानी रिपोर्ट भले ही रद्दी में फेंक दी जाए, लेकिन उसमें ऐसे शब्द आ सकते हैं जो सच्चाई के रूप में हमेशा गूंजते रहेंगे।

Comments on “भास्कर के इस साहस और विजन को सलाम

  • भास्कराचार्य says:

    बिना सैटिंग के कोई इतना बड़ा ग्रुप कैसे बन सकता है। सेलेक्टेड एप्रोच के साथ भास्कर ने जितना खुलासा किया. वही काफ़ी है। बची कसर पत्रिका ने निकाल दी। ही ही। अपना तो यही मानना है कि इक-दूजे की चड्डी उतारने का ये सिलसिला चलते रहना चाहिए। हमाम में सभी नंगों के चेहरे जनता देख ले तो भला होगा पत्रकारिता का। ये काम अंदर के लोगों को करना चाहिए। ख़बर दबाने से पत्रकारिता मर जाएगी। अगर हिम्मत नहीं है तो दूसरों को पहुंचा दो ताकि ख़बर छप जाए और आप पर भी आंच ना आए। ;D

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  • shiv prasad narayan singh says:

    Bhaskar ka yeh saahas katai nahi aata agar Neera Radia ne unhey paisa maangney waala chota aadmi nahi bataya hota.

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  • बिल्‍लू says:

    झूठी हिम्‍मत दिखाकर जनता को बेवकूफ बना रहे हैं। यह तो बताया ही नहीं कि राडिया से भास्‍कर को रुपए कितने मिले। कितने के विज्ञापन बटोरे। रतन टाटा से मुलाकात के दौरान क्‍या खाया, क्‍या पिया। अग्रवाल कुछ भी फोकट में नहीं छापते, बात बात में पैसे मांगते हैं यह तो राडिया का कहना है।

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  • Rohit Mathur says:

    Yashwant bhai…. vaise to apne tata radia ki baatcheet kai baar suni hogi , lekin ek jagah radia bhaskar ke malikon ke sandarbh me tata se keh rahi hain ” are wohi bhaskar wale jinse maine apko milwaya tha… baat baat pe paise ki baat kar rahe the… chote log hain paisa zyada aa gaya hai”… Ye full page khabar radia ji ke is kathan ke jawab me hai na ki kisi sahas ka natija… apni headline tatkal change karen..

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  • Ankit Khandelwal says:

    Yashwant ji.. yeah saaf saaf dhyan batane ke liye likha gaya hain..
    is scam ke baarein main patrakar jaante hain.. net users jaante hain.. but aam aadmi nahi..
    so bhaskar ne masiha banane ki koshishki hain.. to mere hisab se patrika ki story bilkul sahi kehti hain ki. sant bane hue bhaskar vaale bhi is kand main shamil hain..

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  • mahesh bihari sharma lalsot says:

    Yashwant bhai
    apse hi ummid nhi thi Bhaskar or kalpsji 100 chuha kha kr bille hj ko chli bat kr rhi hi

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  • umesh shukla says:

    Yashwantji, aapko badhai 2g ghotale ki poori katha ke bare me vistar se jaankari dene ke liye. rahi baat bhaskar ki to uska prayas bhi sarahniy mana jayega. der se hi sahi uska zameer to jaaga aur usne raadia ki kartoot vistar se aamjan ko batana jarrori samajha.

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  • umesh shukla says:

    yashwantji sabse pahle aap ko badhai 2g ghotale ki porri katha vistar se aamjan ko batane ke liye. rahi baat bhaskar ki to der hi sahi jaaga to uska zameer. patrakarita ki takat use yaad aayee aur ujagar kar diya Raadia ka sach.

    Reply
  • सवाल केवल पौने दो लाख करोड का या राजा और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नहीं है। सवाल उस आवाम से भी जुडा है जो पन्‍द्रह अगस्‍त और छब्‍बीस जनवरी को घर की छत पर तिरंगा टांग अपने को भारतीय होने पर गौरवान्वित महसूस करता है। सवाल अनपढ गंवार उस भारतीय मजदूर का है जो सचिन तेंदुलकर के शतक लगाने पर केवल इसलिये खुश होता है, क्‍योंकि वह भारतीय है। बचपन में आपने घोडा और डाकू खडग सिंह की कहानी सुनी होगी। डाकू असहाय का ढोंग रचा साधु से उनका घोडा सुल्‍तान छीन लेता है। तब साधु बाबा खडग सिंह से इस घटना का जिक्र कहीं और न करने की प्रार्थना सिर्फ इसलिये करते हैं क्‍योंकि इस घटना को सुन कोई असहाय व लाचार पर विश्‍वास नहीं करेगा। शुक्र है कि देश की आम गरीब जनता अपने साथ हुए इस विश्‍वासघात को बहुत गहरायी से नहीं समझ पा रही है। आम आदमी तो यही समझता है कि जाति और जन्‍म प्रमाणपत्र में लगने वाला बीस-तीस रुपये का घूस ही भ्रष्‍टाचार है और उसी का प्रतिकार कर वह देश का जागरुक नागरिक होने का दंभ भरता है। आम आदमी के उस दंभ को पत्रकारिता जरूर सलाम करे। क्‍योंकि, देश के प्रधानमंत्री तक में इतना नैतिक साहस नहीं कि वह भ्रष्‍टाचार में लाखों करोड हजम करने वालों पर सीधी कार्रवाई करें। जहां तक टेलीकाम घोटाले में सीबीआई जांच के नतीजों की बात है तो एक सवाल हम जैसे आम भारतीयों का है। किसी भी इंसान की नैतिकता को खरीदने के लिये कितनी रकम की दरकार होती है। महत्‍वपूर्ण व बडा आदमी है तो एक करोड, दस करोड, पचास करोड या हजार करोड। उक्‍त रकम किसी भी जांच टीम को प्रभावित करने के लिए काफी है। मुगालते में मत रहिये कि देश के साथ इतने बडे विश्‍वासघात पर किसी को सजा हो जायेगी। इसलिये बंधु जबतक लाखों-करोडों के दूसरे घोटाले की खबर नहीं आ जाये, इसी पर हल्‍ला-गुल्‍ला मचाते रहिये।

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  • सवाल केवल पौने दो लाख करोड का या राजा और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नहीं है। सवाल उस आवाम से भी जुडा है जो पन्‍द्रह अगस्‍त और छब्‍बीस जनवरी को घर की छत पर तिरंगा टांग अपने को भारतीय होने पर गौरवान्वित महसूस करता है। सवाल अनपढ गंवार उस भारतीय मजदूर का है जो सचिन तेंदुलकर के शतक लगाने पर केवल इसलिये खुश होता है, क्‍योंकि वह भारतीय है। बचपन में आपने घोडा और डाकू खडग सिंह की कहानी सुनी होगी। डाकू असहाय का ढोंग रचा साधु से उनका घोडा सुल्‍तान छीन लेता है। तब साधु बाबा खडग सिंह से इस घटना का जिक्र कहीं और न करने की प्रार्थना सिर्फ इसलिये करते हैं क्‍योंकि इस घटना को सुन कोई असहाय व लाचार पर विश्‍वास नहीं करेगा। शुक्र है कि देश की आम गरीब जनता अपने साथ हुए इस विश्‍वासघात को बहुत गहरायी से नहीं समझ पा रही है। आम आदमी तो यही समझता है कि जाति और जन्‍म प्रमाणपत्र में लगने वाला बीस-तीस रुपये का घूस ही भ्रष्‍टाचार है और उसी का प्रतिकार कर वह देश का जागरुक नागरिक होने का दंभ भरता है। आम आदमी के उस दंभ को पत्रकारिता जरूर सलाम करे। क्‍योंकि, देश के प्रधानमंत्री तक में इतना नैतिक साहस नहीं कि वह भ्रष्‍टाचार में लाखों करोड हजम करने वालों पर सीधी कार्रवाई करें। जहां तक टेलीकाम घोटाले में सीबीआई जांच के नतीजों की बात है तो एक सवाल हम जैसे आम भारतीयों का है। किसी भी इंसान की नैतिकता को खरीदने के लिये कितनी रकम की दरकार होती है। महत्‍वपूर्ण व बडा आदमी है तो एक करोड, दस करोड, पचास करोड या हजार करोड। उक्‍त रकम किसी भी जांच टीम को प्रभावित करने के लिए काफी है। इसलिये बंधु जबतक लाखों-करोडों के दूसरे घोटाले की खबर नहीं आ जाये, इसी पर हल्‍ला-गुल्‍ला मचाते रहिये।

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  • pradeeppallove@gmail.com says:

    BHASKAR sahi me bhaskar hi. inki rosni me bulb aur cfl ka kya aokat. oshye number one nahi hi bahi. RAGVENDRA YESHE LOG V INKE SATH HI. MERIT KO bhaskar PAHANTA HI BAHI.PALLOVE

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  • ek tep me to bhashakr ka bhi nam aaya hai,tata se bat karte huye radiya ne bhashkar walo ko chote log kaha hai syayad isliye to bhashkar ne ye sab likha honga……….kyoki ham bhi dube sanam ab tum bhi dubo………..

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