महुआ में डेस्‍क वालों को न बात करने की तमीज है और ना ही खबर की समझ

आंधी आने पर दीपक तेजी से फ़ड़फड़ाने लगता है जिसके कारण थोड़ी देर के लिये उसकी रोशनी बढ़ जाती है, यही हाल है महुआ न्यूज चैनल का.  रह- रहकर टीआरपी में उछाल आ जाता है और फ़िर लुढ़क जाता है. चैनल में उपर से नीचे तक बैठे लोगों को गाहे-बेगाहे पागलपन का दौरा भी पड़ता रहता है, जिसके कारण भागमभाग की स्थिति बनी हुई है. जिला में काम करने वाले स्ट्रिंगरों की भी स्थिति भी ठीक नहीं है.

जो स्ट्रिंगर शुरुआती दौर में चैनल पर बेहतर खबर भेजने के लिये दिन-रात एक कर रखे थे, वो अब चैनल को तौबा करने की सोच रहे हैं. वजह है डेस्क पर बैठे लोगों की हेकड़ीवबाजी. पिछले दिनों पूर्णिया के स्ट्रिंगर से डेस्क पर फ़ोन रिसीव करने वाला देवेश नाम का लड़का बकवास कर लिया. स्ट्रिंगर ने भी देवेश को ठेठ भाषा में समझा दिया.  इसी बात पर स्ट्रिंगर की छुट्टी कर दी गयी.  अब हाल ये है कि पूर्णिया का कोई स्ट्रिंगर महुआ के तरफ़ झांक भी नहीं रहा है.

कोसी और पूर्णिया प्रमण्डल में महुआ में काम करने वाले सभी स्ट्रिंगर से मेरी बात होती रहती है,  सभी कमोवेश चैनल में बैठे लफ़ंगों से नाराज हैं.  डेस्क पर बैठने वालों को स्ट्रिंगर से बात करने की तमीज नहीं है और ना ही खबर की समझ. दूसरे चैनल पर जिस खबर को प्रमुखता से चलायी जाती है उस खबर को महुआ पर जगह नहीं मिल पाती है. दिन भर न्यूज कवर करने के बाद जब स्ट्रिंगर डेस्क पर खबर बताता है तो खबर भेजने से मना कर दिया जाता है.  ये तो हुई मेहनत पर पानी फ़िरने वाली बात.

चैनल स्ट्रिंगरों का आर्थिक रूप से भी शोषण करने में भी लगा हुआ है. शुरुआती दौर में स्ट्रिंगरों को पांच महीने तक रुपया नहीं दिया गया, जो अब तक लटका हुआ है. कहने के लिये तो चैनल स्ट्रिंगरों को पांच सौ रुपया प्रति स्टोरी देता है,  लेकिन वास्‍तविकता ये है कि एक सौ पचास रुपया प्रति स्टोरी के हिसाब से ही चेक मिलता है. कुल मिलाकर हर महीने स्ट्रिंगरों को तीन से चार हजार रुपया घर से वहन करना पड़ रहा है.

खर्च से बचने के लिये महुआ के स्ट्रिंगर दूसरे चैनल के स्ट्रिंगर के मोटरसाइकिल पर लद कर न्यूज कवर करने के फ़िराक में लगे रहते हैं. न्यूज कवर करने के बाद फ़ीड भेजने के लिये साइबर कैफ़े वालों की चिरौरी करते रहते हैं. हालात अब इस मुकाम तक पहुंच गया है कि कोसी और पूर्णिया प्रमण्डल के सारे स्ट्रिंगर चैनल छोड़ने की तैयारी में जुट गये हैं. फ़िलहाल सभी टाइमपास कर अपना पांच महीने का बकाया भुगतान मिलने का इंतजार कर रहे हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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Comments on “महुआ में डेस्‍क वालों को न बात करने की तमीज है और ना ही खबर की समझ

  • मदन कुमार तिवारी says:

    अयोग्य को ५०० रु० भी मिल जाय बहुत है । स्ट्रिंगर का खेल मैं खुब जानता हूं और कितना न्यूज सेंस होता है वह भी पता है । डान गोबरा नाम पडा है । काम है पैसा वसुली और दलाली । किसी सर्‍टिफ़िकेट की जरुरत तो है नही एक कैमरा थाम लिया और चल दियें । महा अयोग्य होते हैंं स्ट्रिंगर । खुद में काबिलियत पैदा करो । एक चैनल की बात नही कर रहा हूं सभी चैनलों के स्ट्रिंगरों का यही हाल है .

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  • जीन लोग ने आरोप लगाया है उनकों दलाली वाली खबरों के लिये मना किया गया होगा……॥शायद तभी लगा होगा कि ड़ेस्क के लोगो को बात करने नहीं आती है………॥

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  • दक्षिण बिहार के सारे स्ट्रींगर दलाली वाले ही खबर करते है, ड़ेस्क से जिस खबर के लिये बोला जाता हैं और उस खबर को करने से उनका पी आर खराब होने का ड़र रहता हैं…॥यही बात ड़ेस्क कि बुरी लग जाती है साहब लोगो को………॥

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  • प्रवीण says:

    कोसी और पुर्णिया प्रमण्डल हीं नही , महुआ में जो भी अच्छा पत्रकार काम कर रहा है सभी खिसकनें के चक्कर में है | वक़्त रहते डेस्क के चिबिल्ला किस्म के लोगों को गटर का रास्ता नहीं दिखाया गया तो चैनल को अच्छे और अनुभवी पत्रकारों का टोटा पड़ जायेगा | वात रही पैसों की तो भाई काम करनें वालों को पैसा नहीं मिलेगा तो कितना दिन ठग-फ़ूस चलेगा |

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  • मदन तिवारी जी , आपके गन्दे दिमाग में सिर्फ़ गन्दा सोच हीं क्यों आ रहा है | जरा अपने गिरेवान में झांक कर देखिये फ़िर पता चलेगा आप किस हद तक गिरे हुए हैं | स्ट्रिंगर जो कुछ कर रहा है उसके लिये जवावदेह चैनल द्वारा शोषन और आप जैसे गन्दे लोगों की मानसिकता है | यदि स्ट्रिंगर जैसी काविलियत और जज्वा तनखा पाने वालों में पैदा हो जाय तो चैनल मालीक का कल्यान हो जायेगा |

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  • संवाददाता , ईण्डिया न्यूज says:

    मदन कुमार तिवारी उर्फ़ देवेश जी , आपके व्यवहार से महुआ में काम कर रहे पत्रकार खफ़ा हैं उपर से आपनें वेवकुफ़ी भरी वातें लिखकर सभी चैनल के पत्रकारों को इस वहस में शामील कर लिया है | आपको बता दूं कि पत्रकार वो होता है जो समाज के आखरी कतार में खड़े लोगों के दुख दर्द को करीव से देखकर देश और दुनियां के सामनें लाता है | धुप हो या वरसात अपने गम को भुलकर दुसरों के लिये जिता है |सच्चे पत्रकार को ना तो जिने की तमन्ना होती है और ना हीं मरनें का गम | सच्चे पत्रकार वही हैं जो चैनल के टी आर पी के लिये नहीं वल्की मानवता की सेवा और समाज को आईना दिखानें के लिये पत्रकारिता करते है | हां , ये वात अलग है कि आज के दौर में टी आर पी वटोरनें में सक्षम लोगों को ही पत्रकार की संग्या दी जाती है | सच्चे पत्रकार को ये कह कर जलील किया जाता है कि न्यूज सेंस हीं नही है | सिधे शव्दों में ये कहा जा सकता है कि टी आर पी वटोरने में सक्षम “वटोरन“ नामक प्राणी खुद को पत्रकार कहता है और सच्चे पत्रकार को जलील करनें में लगा रहता है | अरे वटोरन , थोड़ा वहुत भी शर्म नाम की चीज वची हुई है तो ईज्जत दो उन्हे जो सच्चे पत्रकार हैं | याद करो उस क्षण को जब अपने घर परिवार की चिन्ता छोर कर आजादी के दिवानों नें देश की आजादी के लिये अपनी आहुती दे दी | यही जज्वा और दिवानगी होती है सच्चे पत्रकार में | पत्रकार अपना घर परिवार चलानें और वेहतर जिन्दगी के लिये पत्रकारिता नहीं करता है बल्कि एक नेक मकशद से जज्वा और जुनुन लिये पत्रकारिता करता है | तुम जैसे “वटोरन “ नामक प्राणी से मेरा यही सलाह है कि हम मतवालों और दिवानों को नशीहत मत दो | हम वो दिवाने हैं जो मिडिया हाउस या टी आर पी के लिये नहीं वल्कि देश की वेहतरी के लिये पत्रकारिता करते हैं | ना तो हमें न्यूज सेंस की जरुरत है और ना हीं तेरे नशीहत की |

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  • सोनु जी , यदि आप किसि चैनल में डेस्क पर काम कर रहे हैं तो आप को बता दूं कि पी आर की चिन्ता स्ट्रिंगरों को नहिं वल्कि आप जैसे लोगों को लगी रहती है | स्ट्रिंगर को चैनल के ए सी कमरा में बैठ कर नौकरी बचानें के लिये दलाली और चापलुसी की जरुरत नहीं पड़ती है | दलाली जैसे शव्द आप जैसे लोगों पर फ़ीट बैठता है | जो शब्द आप जैसों के लिये वना है उसे स्ट्रिंगरों के साथ मत जोड़िये |

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  • ek reporter says:

    भाई मदन जी ,दुसरे को अयोग्य खाने से पहले अपने गिरेवा में झाक ने ज्यादा बेहतर होता चमचई और पैरबी के बल पर या जातिगत रिश्ते को जोड़ कर डेस्क पहुच जाना योग्यता का सर्टिफिकेट नहीं होता डिग्रिया बिकाऊ होती है जबकि अनुभव टिकाऊ सारे स्ट्रिंगरो सर्टिफिकेट के लिए इस तरह के शब्द का इस्तेमाल
    करना मदन जी आपकी योग्यता का परिचायक है ,आज भी फिल्ड में ऐसे कई स्ट्रिंगरो काम कर रहे है यदि उन्हें मौका मिला जाये तो आपसे बेहतर
    साबित होगे परन्तु पैरबी और चमचई इसलिए वो आज स्ट्रिंगरो कहलाते है

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  • MUKESH KUMAR SINGH says:

    महानुभाव,स्ट्रिंगर या फिर रिपोर्टर.पहले यह तय करना आवश्यक है की पूरा पत्रकार होने के लिए शर्तें और उसके लिए तय मानक क्या हैं.जिले और कस्बाई इलाकों में इलेक्ट्रौनिक मीडिया में काम करने वालों को अमूमन स्ट्रिंगर की संज्ञा दी जाती है.मेरी समझ से पहले यह बताना लाजमी है की आज पत्रकारिता के मायने और मकसद दोनों बदल चुके हैं.जाहिर सी बात है की जिन और जैसे लोगों को पत्रकारिता में आना चाहिए वे आ नहीं पाते हैं.चमक–दमक और अधिकारी,नेता से लेकर रसूखदारों के बीच उठने–बैठने की ललक में लोगों का रुझान पत्रकारिता की तरफ हुआ है जो बेहतर लोगों को पत्रकारिता में आने देने के अवरोधक हैं.आज छोटी जगह से लेकर बड़ी जगहों में पत्रकारिता की आड़ में रकम उगाही के साथ–साथ बड़े–बड़े ठेके भी हासिल किये जा रहे हैं.अब विषय की बात.इनदिनों महुआ न्यूज़ के स्ट्रिंगरों को लेकर तरह–तरह की बातें की जा रही है.स्ट्रिंगरों के शोषण और उनकी ख़बरों को मिहनत और सोच के मुताबिक़ माकूल जगह और वाजिब पैसे नहीं दिए जाने को लेकर बहस का बाजार गर्म है.यहाँ मैं अपनी राय बेबाकी से रख रहा हूँ.सबसे पहले पत्रकारिता पूजा है इसे स्वीकार और आत्मसात करके ही पत्रकारिता में आना चाहिए.इलेक्ट्रौनिक मीडिया में ऊपर की कुर्सी पर बैठे लोग नीचे के लोगों को जरुरत से ज्यादा कमतर आंककर चलते हैं.उन्हें लगता है की नीचे के लोग कई धंधे एक साथ करते हैं जिसमें एक धंधा ख़बरें बनाना और भेजना भी है.वातानुकूलित कमरे बैठे इन लोगों को लगता है की सारी समझ उन्हीं के पास है.बांकी के सारे लोग उठाईगीर और छोटी अक्ल के हैं.ये ऊपर वाले लोग क्षेत्र की परिस्थिति के मुताबिक़ या खबर भेजने वालों की मानसिकता को सामने रखकर ख़बरें नहीं देखते हैं बल्कि उनका दिमागी अहंग उनको सर्वोपरि बनाए रखता है.ये लोग चाहते हैं की नीचे से ख़बरें भेजने वाले लोग उनकी खूब चाकरी करें.इसमें कोई शक नहीं की ये लोग जमकर लॉबिंग भी करते हैं.जाति–धर्म भी इनके लिए खूब महत्व रखता है.मैंने भी देखा है की कई नामी खबरिया चैनल के स्ट्रिंगर बड़ी सफाई से दूसरे चैनल को भी छद्म नाम से ना केवल ख़बरें भेजते हैं बल्कि जरुरत पड़ने पर अपना फ़ोनों भी करते हैं.यह जायज नहीं है लेकिन इसे समझना भी जरुरी है की यह आखिर क्यों हो रहा है.मैं ऊपर बैठे लोगों से कहना चाहता हूँ की छोटी जगह पर भी बड़ी सोच और बड़े हुनर वाले लोग रहते हैं जो इतिहास गढ़ने की क्षमता रखते हैं.लेकिन उनकी अपनी परिस्थिति उनको कस्बाई इलाके में ही रहने को तयशुदा किये रहता है.ऐसे में जो लोग बड़ी कुर्सी पर काबिज हुए हैं उन्हें विनम्र बनकर कुर्सी का मान रखना चाहिए.छोटी जगह पर भी निष्ठा और नैसर्गिक होकर पत्रकारिता करने वाले लोग हैं लेकिन उनको देखने-समझने की कोई कोशिश नहीं कर रहा है.दूसरों को सिर्फ अपनी समझ से समझना अच्छी बात नहीं है.लोगों को उनकी समझ से समझने की कोशिश भी की जानी चाहिए.आखिर में इतना ही कहना है की बेहतर खबर भेजने वालों को समय–समय पर मान–सम्मान के तोहफे के साथ–साथ उनके पारिश्रमिक के साथ भी इन्साफ होना चाहिए.इस सच को स्वीकारना होगा की यह कोई जरुरी नहीं है की ओहदे से बड़ी जगह पर पहुँचने वाले सारे लोग व्यक्तित्व से भी बड़े हैं.पद व्यक्ति के अंदर अच्छा लगता है.मेरी समझ से पद के अंदर समाया हुआ व्यक्ति कहीं से भी संजोने और उहारने–बुहारने के काबिल नहीं है.आज बस इतना ही.

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  • mahuaanews k stringer itne samjhdar hain ki, unko samjhane ki jarurat nahi, koi bhi stringer paise k liye nahi balki , media k liye kaam karta hai, kyunki media is desh ka 4 stamb kaha jata hai.. or mahuaa news ki un stringero se ja kar pucho jinke sath koi durghatna hui ho , or unhe time pr payment na mili ho,,, ye sab ki chaal hai, jo mahuaa news ke stringeron ko bhadka raha hai, or todna chahta hai, lekin me janta hun, ki , kisi ke bhadkane se kuch nahi hone wala,, mahuaa news no 1 hai or rahega… hum mein thoda devesh ke bare me btata hun, jis pr ye aarop hai ki use baat karne ki tamij nahi, aisa kuch nahi hai, ager mahuaa input me koi kaam puri lagan se karta hai to usme devesh ka naam sabse pehle aata hai, ager wo kisi se thoda gussa ho jaye to use vaktigat na le, wo sirf apne stringeron se kaam chahta hai, or kuch nahi,,, iliye… thoda guss ho jata hai…

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  • मदन तिवारी जी, वाकई आपने जो बाते कही हैं वह कई फीसदी सच हो सकती हैं लेकिन आपको मुकेश सिंह जी की टिपण्णी भी पड़नी जरुरी हैं और जरुरत पड़े तो उसे आत्मसात करने की भी..मदन जी, मैं यह नहीं जानता कि क्या आप इस क्षेत्र से जुड़े हैं और अगर जुड़े हैं तो आपने अपनी पत्रकारिता की शुरुआत और उस दौर का संघर्ष को देखा होगा. उसे करीब से महसूस किया होगा. सच कड़वा होता हैं लेकिन हकीकत तो यह हैं कि अंधी पत्रकारिता के इस दौर में उर्जावान, तेजस्वी, शिक्षित और मेधावी पत्रकारों को कुछ नामचीन और परखवान मीडिया हॉउस को छोड़कर बाकी तवज्जो नहीं देते और यहाँ पहुच, पैरवी और रिवेन्यू के आधार पर पत्रकारों को टटोला जाता हैं. प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक्स मीडिया सभी में नंबर वन बनने की होड़ लगी हुई हैं. युवाओ को रोजगार चाहिए और मीडिया को खबर. ऐसे में तैयार की जाती है ऐसे तैसे पत्रकारों की जमात जिन्हें न्यूज़ सेन्स तो छोड़ दीजिये खबर ही पता नहीं होती. रही बात स्ट्रिंगरो की दलाली की, तो साहेब इनकी कंपनी इनपर कितनी मेहरबान होती हैं. ऐसे में आखिरकार उनके सामने कोई ऑप्शन नहीं होता! मदन जी, प्रभु चावला और बरखा दत्त जैसे शख्सियत को क्यों भूल जाते हैं! इन स्ट्रिंगरो में कई ऐसे होते हैं जो अपनी हुनर, अनुभव और इमानदारी के बलबूते एक बेहतर मुकाम तक भी पहुचते हैं. कहते हैं न कि कोई बच्चा माँ की कोख से सीखकर नहीं आता बल्कि जिंदगी, समय, संघर्ष और लक्ष्य ही सबकुछ सिखा जाता हैं. बस स्ट्रिंगरो को भी यही बात ध्यान रखने की हैं कि बॉस इज आलवेज राईट..

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  • महुआ न्यूज का एक पत्रकार says:

    मदन तिवारी जी और सोनु जी , आप दोनों का उत्तम विचार और सोच पढकर हैरानी हो रही है | मदन तिवारी जी नें स्ट्रिंगरों को अच्छा-अच्छा नाम दिया और सोनू जी नें दक्षिण विहार के स्ट्रिंगरों पर दलाली करनें का आरोप मढ दिया | आप दोनों महानुभाव को मैं यही कहना चाहुंगा कि कुछ लिखने से पहले अच्छी तरह सोच लेना चाहीये | इस तरह की अलुल-जलुल बातें आप दोनों की ओछी मानसिकता को दर्शाती है | किसि भी क्षेत्र में अच्छे और वुरे दोनों किस्म के लोग होते हैं हो सकता है आप दोनों का वास्ता सिर्फ़ बुरे लोगों से पड़ा हो | आप दोनो से यही कहुंगा कि जिलों में काम करने वाले अच्छे स्ट्रिंगरों को भी जाननें समझने का प्रयाश करें | यदी सभी बुरे होते तो अन्ना हजारे दिल्ली में स्ट्रिंगरों के विरुद्ध हीं अनसन पर वैठते | जिला में काम करनें वाले जो सवसे वुरे स्ट्रिंगर होते हैं वो भी स्टुडियों में वैठकर चापलुसी करनें और ईश्क फ़रमानें वालों से लाख गुणा अच्छा होता है | जरुरत है उसे समझनें और परखनें की |

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  • AJAYNANDANCHAUDHARY says:

    -बिहार के एक जिले से महुआ न्यूज़ का स्ट्रिंगर हूँ
    महुआ न्यूज़ में चल रहा है उथल पुथल और जिस का खामियाजा भुगत रहे है बिहार के सभी जिलो के स्ट्रिंगर जिन लोगो को करीब दिसम्बर महीनो से वेतन भुगतान नहीं हुआ है और प्रत्येक न्यूज़ के रूप में AVO के 150 रूपये ,AVB के 250 रुपये ,और हार्ड पैकेज के 350 रूपये दिए जा रहे मगर इतनी महगाई के दौर आखिर इतने दिनों से वेतन का भुगतान नहीं होना कैसे करेगे जिला स्ट्रिंगर काम,जबकि महुआ न्यूज़ इन दिनों जिले के कस्बाई इलाको से कुछ हट की खबरे खोज निकालने का फरमान दे रहे है वही हाल में बदल कर आये इनपुट हेड धर्मेन्द्र सिंह अपनी जाति समुदाय के लोगो को तरजी देने में ही नहीं बल्कि वे नॅशनल चैनल की तर्ज पर काम करवाने में जुटे है अंशुमान जी के चले जाने के बाद महुआ न्यूज़ ग्रुप हेड बन कर आये यंशवंत राणा शायद इस बात की खबर हो भी या नहीं लेकिन महुआ न्यूज़ के कुछ चाटुकार देवेश मिश्रा,कृष्णा, विवेक मिश्रा, सरीखे लोग अपनी काम को चाटुकार के बल पर जिला स्ट्रिंगरो के स्टोरी को ड्राप ही नहीं बल्कि अपने चुन्दे बन्दों को रख वाने में लगे है वही कई जिला स्ट्रिंगर अपनी अपनी आप बीती सुनाने में लगे है जबकि इधर कई स्ट्रिंगरो को खाने के लाले पड़े और चैनल अपनी मोटी कमाई कर कई चैलनो को खोलने में जुटा हुआ है उन्हें तो बस आफिस में काम करने वालो को प्रत्येक सात तारीख को वेतन देना है मगर जिला के झुझारू बन्दों से क्या लेना उन्हें तो आज ऐसे बन्दों की तलाश है जो फ्री में काम करके देदे एक तो पहले जंहा छोटी छोटी खबरे मगवाई जाती थी वे आज बहुत ख़राब खबरे लगने लगी क्योकि उन्हें तो नॅशनल खबर और चटपटे खबरों की तलाश है जबकि पटना के कई छोटी छोटी खबरे दिखलाई जा रही है और वेतन के नाम पर सिर्फ शोषण किया जा रहा है लगता है जो महुआ न्यूज़ कल तक इस जिला स्त्रिगर के बल पर आज इतनी शिखर पर जा पंहुचा है और यही रहा तो जिले के तमाम बन्दे छोड़ कर चले जायेगे
    कृपया कर इस नाम को गोपनीय रखे सिर्फ महुआ के सभी स्ट्रिंगर की जुबानी लिखी है

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  • rakesh kumar says:

    अरे साहब स्ट्रिंगर के दर्द को आप क्या समझोगे / स्ट्रिंगर जिसे एक मजदुर से भी कम पैसा मिलता है इसे तो बस आपलोगों से थोड़ी इज्जत चाहिए थी वो भी आपको बुरी लगती है / कभी आपने चोराहे पर खड़े मजदुर को सुबह देखा है उस मजदुर की तरह होते है ये स्ट्रिंगर जैसे एक मजदुर सुबह इस आस में आता है की अगर सुबह उसको कोई काम के लिए ले जाता है तो उस दिन उसे १२० रुपये मिलते है वरना दिन में कभी अगर कोई अचानक आ जाए तो रोटी का जुगाड़ होता है वरना उस दिन रोटी नहीं मिलते एक स्ट्रिंगर की भी यही कहानी है सुबह उसे ये पता चले की स्टोरी अप्रूवल है तो उस दिन की रोटी मिलेगी और अगर नहीं है तो उस दिन इन्तेजार कीजिये की कोई घटना हो जाए ताकि एक avo भी चल गया तो १०० रुपये मिलेंगे लेकिन इस मामले में भी मजदुर खुश किस्मत है वे शाम को घर आते है तो उनके हाथ में १२० रुपये होते है लेकिन इन स्ट्रिंगरो के हाथ वो म्हणत की कमी ५ महीने बाद मिलती है / आप इस दर्द को समझिये / और जहा तक जानकारी की बात है तो साहब हम भी पढ़े लिखे लोग है लेकिन क्या करे धुप में काम करते करते रंग कुछ ऐसा हो गया है की आप हमें रंगों से तोल रहे मेरी भावनाओ से नहीं याद रखिये वक्त का पहिया कब किस करवट घूमेगा पता नहीं हम मेहनत करते है और आप कम से कम गाली मत दीजिये / हां कुछ लोग गलत हो सकते है / आज भी महुआ न्यूज़ के रिपोर्टर दुसरे चैनल के रिपोर्टर से २० है और जरा सोचिये ६ महीने तक पैसे नहीं मिलने के बाद भी महुआ न्यूज़ को नंबर one बना रखा है .. आपके महुआ न्यूज़ के बड़े अधिकारी ये समझ ले की आप २ सालो में आये और गए कई से सड़क पर आ गए लेकिन हम मेहनत करने वाले आज भी है और कल भी रहेंगे हमारे जिले में आकर तो देखिये किस अदब से आपको नमस्कार करते है क्युकी यही हमारी तहजीब है ये हमें किसी न्यूज़ चेंनेल से नाम से नहीं एक एक इंसान की तरह इज्जत देते है इन बातो को आप सोचियेगा जरुर …

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  • MUKESH KUMAR SINGH,SAHARSA,BIHAR says:

    सम्मानित कुर्सीदारों,इलेक्ट्रौनिक मीडिया में TRP की दौड़ सही है या गलत,मुझे इस बहस में नहीं पड़ना.लेकिन TRP के लिए छोटे शहर और कस्बाई इलाकों के तथाकथित स्ट्रिंगरों को कमतर आंककर उनके साथ शब्द बाण छोड़ने से लेकर उनके पारिश्रमिक के साथ घाघमेल करना कहीं से भी जायज प्रतीत नहीं हो रहा है.खासकर महुआ न्यूज़ में मची खलबली इस बात को प्रमाणित करता है की खून चूंसकर पहलवान बनने की परम्परा आज भी ना केवल कायम है बल्कि खूब फल-फूल रहा है.वातानुकूलित कमरे में बाबुओं के बने चेंबर में सजे तमाम गुलदस्ते पूरी तरह से महज छोटी जगहों के खबरवीरों की मिहनत का नतीजा ना हो लेकिन इस बाबत अधिक से अधिक हिस्सेदारी उन्हीं की है.विज्ञापन अति महत्वपूर्ण है लेकिन चैनल पर अच्छी खबर ना दिखे तो फिर खबरिया चैनल पर आखिर कोई क्योंकर विज्ञापन भर देखेगा.ऊपर बैठे कुर्सीदारों को नीचे के लोगों को कमतर आंककर चलने की बेखुद रिवायत से बाज आना होगा.सम्मानित सज्जन अमूमन दूसरों को भी सम्मान दिया करते हैं.छोटी जगहों से खबर भेजने वाले किन–किन मुसीबतों से दो-चार होते हैं,इसे अब महसूसने की जरुरत है.आम जनता से लेकर अपराधी–अधिकारी के वर्जन लेने बड़े कठिन टास्क होते हैं जिसे छोटी जगह के खबरवीर बाखूबी पूरा करते हैं.यह सच है की ये स्ट्रिंगर मोती चुनकर भेजते हैं जिसे ऊपर बैठे लोग करीने से गुंथकर बेहतरीन माला बना डालते हैं.ये नीचे के लोग किसी भी खबरिया चैनल की बुनियाद हैं.जहांतक मेरी समझ जाती है की ऊपर के लोग अधिक पैसे और अपनी पहचान बढाने की गरज से जब–तब पाला बदलने की फिराक में रहते हैं लेकिन नीचे से महज ख़बरें भेजकर अथाह संतोष बटोरने वाले ये तथाकथित स्ट्रिंगर खुद को उस चैनल परिवार का स्थायी सदस्य होने की खुशफहमी पाले रहते हैं.अब वक्त का तकाजा है की इन छोटी जगहों के स्ट्रिंगरों के साथ न्याय होना चाहिए.जाहिर सी बात है की इन स्ट्रिंगरों को समय पर उचित पारिश्रमिक के साथ–साथ ऊपर के लोगों से वाजिब सम्मान नहीं मिलने की वजह से खबर को बेहतर तरीके से बनाने और उसे भेजने की ललक धीरे–धीरे उनमें कम पड़ने लगी है.यह एक बड़े अंदेशे का संकेत है.हताशा का यह एक ऐसा समय है जब चैनलों को खबर का टोंटा पड़ जाएगा.ताली दोनों हाथ से बजती है तो अच्छा लगता है.खुद को तीसमार खाँ समझने से भी परहेज करने की जरुरत है.चैनल मालिकों को भी पूरे चैनल परिवार के दुःख–दर्द को समझना चाहिए.उन्हें चाटुकारों और चमचई करने वालों को अपने चश्मे नजर से देखते रहने की जरुरत है.सभी सम्मानित लोगों को आखिर में निचौड़ के तौर पर यही कहना है की खबरिया चैनल में सबसे ज्यादा महत्व ख़बरों का है,फिर उसके बाद किसी और चीज का.आज यहीं पर अर्धविराम,
    ——————————————————-मुकेश कुमार सिंह,सहरसा.

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  • rajesh harma says:

    मुकेश तुम तो महुआ न्यूज़ में कहते हो की मेरे पास इतना पैसा है की चैनल खोल सकता हु …बात बड़ी बड़ी करते हो खबर की समझ तुम्हे नहीं है …रही बात बासी खबर भेजते हो महुआ को ..कहते हो की नेट कम नहीं कर रहा है तुम्हारे पास तो ओबी भी क्यों नहीं फीड ओबी से भेजते हो …..कोशी क्षेत्र के सभी स्ट्रिंगर के तुम नेता बने हुए हो….सिर्फ पेरसोनल सम्बन्ध की खबर नहीं चलती है समझे रही बात एक कमरे में बैठ कर और कहते हो की लोग यहाँ पला बदल लेते है स्ट्रिंगर तो चैनल के लिए लगे रहते है ..पहले तुम यह बताओ की तुम्हारा सहरसा में कितनी दलाली चलती है ….

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  • MUKESH KUMAR SINGH,SAHARSA,BIHAR says:

    पत्रकारिता जगत के सभी सम्मानित जन,मैंने कभी किसी व्यक्ति विशेष के लिए कोई टिपण्णी नहीं की है.हाँ किसी की आलोचना करने का दमखम रखता हूँ कतिपय कारणों से बताना लाजिमी है की चुकी न ही मेरी विरासत ओछी और गन्दी रही है और न ही मैंने गंदगी से कभी कोई याराना रखा है,इसलिए किसी का निंदक नहीं हूँ.सबसे पहले जिस ओहदेदार ने मेरे बारे में राय रखी है,कमसे कम मैं उन्हें मैं किसी भी माध्यम से नहीं जानता हूँ.सबसे पहले खासकर उन्हें बता दूँ की पत्रकारिता मेरे लिए मेरा हाड–मांस,रक्त और ओढना बिछौना,सभी कुछ है.मैंने आजतक पत्रकारिता में क्या कुछ किया है कम से कम यह उन्हें बताने की जरुरत नहीं समझता जिन्होनें जमीन पर खड़ा होना भी नहीं सीखा मगर आसमान के बारे में कसीदे कढ़ते हैं.आज सिर्फ उनके लिए मेरे शब्द हैं जिन्होनें बिना मुझे जाने मेरे बारे मैं राय रखी है.खबर के बारे में मेरी समझ कितनी कम या कितना ज्यादा है इसके लिए मैं रोजाना खुद को उहारता–बुहारता हूँ.मुझे बच्चों से भी सिखने मैं कोई गुरेज नहीं.लेकिन आज की परिपाटी है की लोग बस औरों को नसीहत देते और सिखाते रहते हैं.कहते हैं की सीखने की कोई उम्र नहीं होती,और मैं उसी का हिमायती हूँ.महानुभाव,आपने मुझपर फिकरे कसते हुए लिखा है की मैं बासी खबरें भेजता हूँ.ज़रा गौर से पढ़ें की मैं जबाब में क्या लिख रहा हूँ.मैं महुआ न्यूज़ में काम शुरू करने से पहले महुआ में ख़बरें भेजता था.उस वक्त महुआ की कोई ख़ास पहचान खासकर के कोसी इलाके मैं नहीं बन पायी थी.आज मैंने महुआ परिवार में ढाई साल से ज्यादा की यात्रा कर ली है.कोई कद ना सही लेकिन मैंने अपनी हिस्सेदारी इमानदारी से दी है.बता दूँ की चैनल को ख़बरें किसी अन्य जगहों से नहीं आने पर अपराध से लेकर समस्या वाली ख़बरें ऊपर वाले बड़े साब के द्वारा मुझसे बराबर मांगी जाती थी.इस बात की जानकारी चाहें तो आदरणीय आलोक उपाध्याय और अजय पाठक जी से ले सकते हैं.यूँ उनसे भी मेरी कोई जान–पहचान नहीं है.मेरी समझ से वे लोग अभी महुआ न्यूज़ में ही बने हुए हैं.एक बुलेटिन में सहरसा की तीन कभी चार ख़बरें तक लगी थीं.अगर मुझे खबर की समझ नहीं थी तो आखिर मुझसे ख़बरें मंगवाकर आखिर क्यों चलाई जाती थी.इसका जबाब आप खुद लें.41 वर्ष की आयु गुजार चुका हूँ लेकिन आजतक कोई दाग अपने पर नहीं लगने दिया लेकिन आपने तो मुझे दलाल तक कह डाला.आप जान लें की पत्रकारिता में में छात्र जीवन से हूँ और ऊँची डिग्री उच्चे विश्वविद्यालय से पढ़कर हासिल की है,खरीदी नहीं है.कोई दूसरी बड़ी नौकरी की ख्वाहिश नहीं थी.भीतर एक आग थी जो जीने का मकसद बन गया.मैं आपको समझाने की कतरा भर इच्क्षा नहीं रखता.मैंने जीवन में रूपये को कोई अहमियत नहीं दी.मैं पत्रकारिता में रूपये कमाने नहीं आया.आजतक जितना काम मैंने महुआ न्यूज़ में किया उसके बदले महुआ न्यूज़ ने जब जितना रुपया चाहा भेज दिया.मैंने कभी खिलाफत नहीं किया.हद की बात जानिये की मैं अपना बिल तक नहीं भेजता हूँ.मैं अपने को महुआ परिवार का एक ईमानदार और जिम्मेवार सदस्य समझकर अपनी सेवा देता रहा हूँ.मेरा संग्रहण काफी पुख्ता और साबूत है.मेरे माता–पिता ने ऐसा संस्कार मुझमें भरा है जिससे किसी को आहत करने की सोच मुझमें कभी नहीं पनपती है.साब जी,एक बात तो है की व्यक्ति का जैसा संग्रहण होगा निस्सरण भी वैसा ही होगा.मैंने पल–पल अपने को टटोला है.मेरे अन्तः में समृधि का साम्राज्य है.मुझे बाहर के भौतिकवादी झंझावतों में कोई रूचि नहीं है.आपने मुझपर यह भी आरोप लगाया है की मैंने चैनल खोलने की बात कही है.इसे भी करीने से जान लें.मेरे शब्दों में शालीनता के सिवा कुछ भी नहीं है.ऊपर के वे सारे लोग जिनसे मेरी बात होती है मैं आजतक नहीं जान पाया की वे कितने भारी पद पर बने हुए हैं.मैंने अपनी विरासत के मुताबिक़ सभी का सम्मान किया.मेरे सम्मान में एक परिवार के सदस्य होने की निष्ठा रही है उसमें चापलूसी और चमचई की चासनी नहीं.मैंने एक-दो दफा यह बताने का काम जरुर किया है की छोटे और कस्बाई इलाके में भी अच्छी समझ और हैसियत वाले लोग रहते हैं,इसका ख्याल बड़े लोगों को रखना चाहिए.जो उम्र में बड़े हैं उनसे सलीके से बात की जानी चाहिए.चैनल में आप भी एक मुलाजिम हैं.मैं भी खुद को एक मुलाजिम ही समझता हूँ.जगह का फासला जरुर है.आपने कहा की खबर बासी भेजता हूँ.आप इसके बारे में भी जान लें की सहरसा की ख़बरें सबसे पहले महुआ को लिखायी और भेजी जाती है अब चालायी कब जाती है इसके बारे में जबाब–तलब किससे करूँ.में सिर्फ एक चैनल के लिए काम करता हूँ.पाँच चैनलों में मुंह नहीं मारता.खबर के ट्रीटमेंट को लेकर मुझे खूब मतलब है जो बस मुझे दुःख पहुंचाता है.हाँ कभी–कभार एकाध खबर में कोई और चैनल वाले बाजी मार लेतें हैं.आखिर वे भी तो मैदान में हैं.पर्सनल रिलेशन मेरे सिर्फ अपने घर के लोगों से है.खबर रिश्ता निभाने के लिए बनाता तो पुलिस और प्रशासन से रोज पंगा नहीं ले रहा होता.अपराधी से लेकर तमाम अफसरानों के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले मुकेश को आपने रिश्तेदारी निभाने वाला समझ लिया.मैं आपको सहरसा के वर्तमान जिलाधिकारी देवराज देव का मोबाइल नंबर 9431243600 और पुलिस अधीक्षक मुहम्मद रहमान का मोबाइल नंबर 9431822995 दे रहा हूँ.जबसे महुआ न्यूज़ में काम कर रहा हूँ तबसे यहाँ जो–जो जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक रहे हैं अगर आप चाहें तो उनके नंबर भी दूंगा.आप इनसे मेरे बारे में पूछिये की मैं क्या हूँ.दलाल हूँ,बेसमझ आदमी हूँ या फिर कोई नेता.आपने यह भी लिखा है की मैं कोसी क्षेत्र के स्ट्रिंगरों का नेता हूँ.आप जान लें की मैं अधिकांश स्ट्रिंगरों का नाम तक नहीं जानता हूँ और किसी से मेरी बात भी नहीं होती है.अब और ज्यादा लिखने की इच्क्षा नहीं है.आखिर में,मैं सम्मान के साथ आपसे आग्रह करता हूँ की अगर आप मुझे बेसमझ की छोडिये सिर्फ दलाल साबित कर दें तो मैं अपनी जिन्दगी वहीँ खत्म कर दूंगा.आप क्या हैं और क्या होंगे इसपर मुझे अपनी कोई राय नहीं रखनी.आलोचक को सदियों से बेहतर व्यक्तित्व का समझा गया है निंदक के लिए क्या संज्ञा है शायद आप जान रहे होंगे.मुझे अपने आप पर फक्र है.मैं अपना मूल्यांकन रोजाना करता हूँ.मैं लड़ता भी हूँ तो बस भगवान् से,शिकायत भी करता हूँ तो बस भगवान् से.बड़े मतलबी लोग बसते हैं इस जहां में.हो सके तो बिना किसी पहचान के बेवजह किसी के बारे में कोई राय नहीं देंगे.आखिर में आपके चिर उज्व्वल और खुशियों से सराबोर जीवन की ईमानदार कामना ईश्वर से करता हूँ.एक ख़ास बात—–जबतक महुआ न्यूज़ में हूँ,मूल्य संचित,नैसर्गिक,तटस्थ,निष्ठा और पूरे समर्पण के साथ हूँ.खुद को महुआ परिवार का एक मजबूत सदस्य समझता हूँ और समझता रहूँगा.आप लोग चाहे जो समझें,कोई मलाल नहीं.
    —————————मुकेश कुमार सिंह,महुआ न्यूज़,सहरसा.

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  • ashish, saharsa says:

    दिल्ली या पटना मैं कम करने से कोई महान नहीं होता है ….डेस्क पर बैठने वाले भाई पहले तमीज़ सीखे—-हम गांव कि जनता है अपने मन से दिल्ली कि सरकार बदल देते है आप तो सिर्फ ………इशारा काफी है …कुमार आशीष बिहार

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  • mohan supoul says:

    मुकेश भैया जी के बारे मैं जहा तक जानता हूँ वो बेदाग़ है

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  • mithilesh पटना says:

    बड़े बड़े जगहों पर कम करने वालो ने कभी छोटे जगह पर पत्रकारिता नहीं कि है उन्हें कुछ बोलना और कोलकाता पैदल जाना बराबरहै- मैं मुकेश जी के बात्तों से सहमत हूँ-

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