पता नहीं क्यों, कवायद ”इकोनामी क्लास” में सफर कर ”इकोनामी” को संभालने की है और मेरा मन आज बतंगड़ करने पर अमादा है… हालांकि खुद से बात करते हुए मैं खुद को आम आदमी कहने या सोचने का कभी कायल न रहा लेकिन चलिए, आज मन के बंतगड़ और चिल्लपौं सुन माने लेता हूं कि ये भड़ास एक आम आदमी की निकल रही है…। तो भैया पैसा बचाने की बयार चल निकली है…
तुर्रा ये है कि देश में सूखे की आहट है…. गरीब किसान अपने भूखे पेट को सल्फास की गोलियों से भर रहे हैं…. तो ऐसे मुश्किल वक्त में देश के राजा मंत्री और चोर सिपाही को थोड़ा कंजूसी करके चलना चाहिए न भैया…। मंत्री चचा ऐसे नाक न सिकोड़ो… प्रणव दा की बात मान लो… इकोनामी क्लास में और ट्रेन के एसी चेयर कार में सफर करके पैसे भले ही थोड़े बचें लेकिन तारीफ तो पेट भरके मिलेगी न…. और रही बात पैसे की तो इस देश में भले ही पैसा कम पड़ जाए स्विस बैंक में पैसा तो पड़ा ब्याज ही कमा रहा है न… तो फिर काहे मन उदास करे बैठे हो… जितना पैसा तुम ट्रेन में सफर करके बचाओगे उससे कई गुना तो ससुरे अखबार टीवी वाले उसी ट्रेन में सफर कर के खरच देंगें…
अरे पैसा अपना खरच करें और चेहरा तुम्हारा चमकाएं तो हरज काहे का…। अरे तुम्हारा चेहरा तो अभी भी लटका है… अरे जरा देखो तो थरूर अंकल किस तरह बंगाली स्वीट्स में खाना खाए के कैमरा के सामने बिल दिखाए रहे हैं (तीन महीने बाद मूड चेन्ज और टेस्ट चेंज के लिए)…. मैडम गांधी जहाज के कम ऐश्वर्य वाले सेकेन्ड क्लास में यात्रा कर रहीं हैं… राहुल बाबा ट्रेनै से लुधियाना गामी हो रहे हैं… चचा चैनल लाख बदल लेओ ये इकोनामिकल छवि से खुद को दूर न कर पाओगे…।
अच्छा सोचो तो अगर प्रणव दा ये कहे देते कि अपने सरकारी अमले और सिक्योरिटी से एक एक आदमी कम करे देओ… गाड़ियों के काफिले की बजाए केवल एक गाड़ी से चलो और मुफ्त मिलने वाली विदेश यात्रा देश यात्रा के टिकट सूखे के नाम दान करे देओ तो फिर पड़े बिलबिलाते रहते न…. ई कहे देते कि अन्य स्त्रोतों से आती लक्ष्मी जी को सीधे स्वीजरलैंड भेजने से पहले प्रधानमंत्री राहत कोश के दर्शन करा दो… फिर का करते….। अरे भईया पक्ष और प्रतिपक्ष बड़ा दिमाग खपाए के बाद ई आइडिया सोचे हैं और प्रणव दा की इस नौंटकी के डागलाग लिख दिए हैं… ताकि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे… मान जाओ इसे….।
जर्नलिस्ट जयंत चड्ढा के ब्लाग नई कलम से साभार











